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5 महीनों में 2 आईपीएस अधिकारियों की आत्महत्या से उप्र पुलिस परेशान

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लखनऊ, 12 सितंबर | मई से सितंबर के बीच दो बेहद प्रतिभाशाली अधिकारियों की आत्महत्या उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए परेशानी का सबब बन गया है, जो देश का एक सबसे बड़ा पुलिस बल है। आत्महत्या करने वाले अधिकारियों में एक आतंकवाद-रोधी दस्ते (एटीएस) के थे, तो दूसरे कानपुर में एसपी (पूर्वी) के पद पर तैनात थे।

यह सवाल भी उठाता है, जैसा कि यह देश भर में अन्य असैन्य बलों के लिए सवाल खड़े करता है कि क्या खाकी वर्दीधारी राजनीतिक व सत्ताधारी आकाओं के नापाक, अवास्तविक लक्ष्यों व मंसूबों को पूरा करने के चक्कर में अत्यधिक तनाव से गुजर रहे हैं और अपने पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन के बीच संतुलन बनाने में असमर्थ हैं।

राजेश साहनी, जो भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) में एक उच्च अधिकारी थे और एटीएस के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के रूप में तैनात थे, उन्होंने 29 मई को राज्य की राजधानी के गोमतीनगर में अपने कार्यालय में खुद को गोली मार ली। 2014 बैच के आईपीएस अधिकारी सुरेंद्र कुमार दास ने छह सितंबर को अधिक मात्रा में सल्फास निगल लिया और तीन दिनों बाद उनकी मौत हो गई। इतना बड़ा कदम उठाने के पीछे का कारण अभी तक ज्ञात नहीं है, लेकिन सहकर्मियों का कहना है कि अलग-अलग कारणों से दोनों ‘तनाव’ में थे।

पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) ओ.पी. सिंह, जिन्होंने जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहे 30 वर्षीय दास की हालत जानने के लिए आठ सितंबर को कानपुर के एक निजी अस्पताल का दौरा किया था, उन्होंने स्वीकार किया कि पुलिस महकमा बेहद तनाव में है, जबकि अधिकारी लंबे समय से ‘काम का ज्यादा दबाव होने’, ‘लगातार कई घंटों तक काम करने’, ‘बर्बाद व्यक्तिगत जीवन’ और ‘मांग करने वाले मालिकों’ के बारे में निजी रूप से शिकायत करते आ रहे हैं। पुलिस पर बढ़ते दबाव से ऐसा मालूम पड़ता है जैसे अचानक इसके चलते आम जनता को हासिए पर धकेल दिया गया है।

राज्य सरकार पुलिस बल के लिए लक्ष्य निर्धारित कर रही है, जिससे कि वह खुद को एक अलग सरकार के रूप में दिखा सके, जो अपराधियों की धर-पकड़ करवाती है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न उजागर करने की शर्त पर आईएएनएस को बताया, “काम पहले से कहीं ज्यादा कठिन है।” आत्महत्याएं इसी दबाव का परिणाम हैं।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक और एसएसपी स्तर के अधिकारी का कहना है, “राजनीतिक वर्ग, पिछला और मौजूदा, जमीनी हालात को समझने और जिन मुश्किलों का हम सामना कर रहे हैं, उसे समझने में नाकाम रहा है.. परिणामों के बाद यह एक तरह से पागल कर देने वाला है।”

एक सहकर्मी ने कहा कि निराशा चाहे वह निजी हो या पेशेवर, इससे निकलने के लिए..इसका मतलब मरना ही क्यों न हो..इसका इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दास ने मौत के तरीके गूगल पर ढूंढ़े।

पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह, जिन्होंने ‘सख्त व रौब जमाने वाली मायावती’ सरकार में तीन साल तक सेवा दी थी, उन्होंने भी यह स्वीकार किया कि उच्च राजनीतिक दबाव पुलिसकर्मियों को तनाव में जाने पर मजबूर कर देते हैं। उन्होंने कहा, “किसी भी मामले में पुलिस बहुत अधिक काम कर रही है और अपराधों के बढ़ने व इसे अंजाम देने के बदलते तरीके इसके लिए और मुसीबत बढ़ाते हैं।”

उन्होंने इस पर अफसोस जाहिर किया कि बिना छुट्टी के काम करने, नींद की कमी, असफल होने की भावना, पुलिसकर्मियों की निंदा, राजनीतिक आकाओं की उदासीनता और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ लगभग कोई संबंध नहीं होने के कारण सहनशक्ति के स्तर में काफी कमी आई है।

विक्रम सिंह ने कहा, “युवा अधिकारी के तौर पर, हमने प्रसिद्ध आईपीएस अधिकारी बी.एस. बेदी के साथ काम किया था। वे सभी अपने अधीनस्थ अधिकारियों के भले की चिंता करते थे.. दुख की बात है कि पुलिस का संयुक्त परिवार टूट गया है।”

एक और पूर्व डीजीपी के.एल. गुप्ता ने कहा कि पुलिस एक ‘द्रौपदी’ बन गई है, जो राजनेताओं, जनता, आरटीआई प्रश्नों, अदालतों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के प्रति जवाबदेह है।

उन्होंने आईएएनएस को बताया, “निश्चित रूप से ऐसी चीजें हैं, जो किसी के आत्म-सम्मान को कम करती हैं और पारिवारिक विवाद इस तरह के कदमों का एक कारण हैं।”

एक अन्य पूर्व डीजीपी और वर्तमान में उत्तर प्रदेश एससी/एसटी आयोग के अध्यक्ष बृज लाल ने कहा कि वह 1981 से ऐसे कई मामलों के बारे में जानते हैं, जब पुलिस अधिकारियों ने वैवाहिक विवाद के कारण बड़े कदम उठा लिए। हालांकि, उन्होंने कहा कि पुलिस बल पर निश्चित रूप से अधिक काम का दबाव है और इसका तुरंत समाधान किए जाने की जरूरत है।

एक अन्य बेहद सम्मानित पूर्व डीजीपी श्रीराम अरुण ने कहा कि पुलिस सेवा में खींचतान और दबाव “आजकल पहले से कहीं अधिक है।”

उन्होंने कहा, “सभी तरफ से राजनीतिक दबाव है, अधिकारियों का एक झटके में तबादला कर दिया जाता है।” उन्होंने कहा कि इन चीजों से निपटने के लिए पुलिसकर्मियों को गलतियों के खिलाफ खड़े होने और अपने निजी और पेशेवर जीवन को संतुलित करने की जरूरत है, जबकि राजनीतिक महकमे को यह समझने की जरूरत है कि “बेहतर पुलिस व्यवस्था केवल पुलिस और उसके अधिकारियों के साथ बेहतर और सौहार्द्रपूर्ण संबंधों के माध्यम से हासिल की जा सकती है।”

कई सेवारत अधिकारियों ने आईएएनएस से कहा कि वे इस तरह की दुखद घटनाओं के बारे में चिंतित हैं और उन्होंने सुझाव दिया कि वार्षिक मेंटल प्रोफाइलिंग इस तरह की घटनाओं से बचने का एक रास्ता हो सकता है, जैसा कि कई देशों में पुलिस बलों और यहां तक कि कुछ अर्धसैनिक बलों के लिए किया जाता है। वे यह भी महसूस करते हैं कि काम करने की परिस्थितियों में कुछ सुधार के साथ ही पुलिस की काम करने की पुरानी शैली और वरिष्ठ और कनिष्ठ स्टाफ के बीच भाईचारगी जरूरी है।

–आईएएनएस

चुनाव

मप्र में शिवराज के दांव पर कांग्रेस ने फेंका जाल

कांग्रेस का वचनपत्र मध्यप्रदेश की समृद्धि का नया इतिहास लिखेगा। यह विकास के साथ-साथ प्रदेश के हर नागरिक, चाहे वह किसान हो, युवा हो, गरीब मजदूर हो, महिला हो, इससे सभी वर्गो की तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा।

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Shivraj-Ajay

भोपाल, 10 नवंबर | मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के ‘किसानपुत्र’, ‘महिला हितैषी’ और ‘युवाओं के हमदर्द’ होने के दांव पर कांग्रेस ने ‘वचनपत्र’ के जरिए ऐसा जाल फेंका है, जो शिवराज की बीते डेढ़ दशक में बनी छवि पर चादर डालता दिख रहा है।

शिवराज की अगुवाई में भाजपा तीसरा विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही है। पिछले दो चुनावों में शिवराज की जीत में किसानों और महिलाओं की बड़ी भूमिका रही है। लाडली लक्ष्मी योजना और किसानों के लिए बनी योजनाओं ने शिवराज के सिर जीत का सेहरा बांधा था। शिवराज और भाजपा इस बार भी जीतने की रणनीति में व्यस्त है, मगर इसी बीच शनिवार को कांग्रेस ने ऐसा ‘वचनपत्र’ जारी किया, जिसमें सरकार बनने पर किसानों, युवाओं और महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव लाने के वादे किए गए हैं।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक साजी थॉमस कहते हैं कि शिवराज बीते डेढ़ दशक में राज्य में खुद को किसानपुत्र, महिलाओं का भाई, लड़कियों का मामा और युवाओं के आदर्श के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। कांग्रेस ने अपने वचनपत्र में उन्हीं वर्गो के जीवन को बदलने का वादा किया है, जो शिवराज के निशाने पर और उनका सबसे बड़ा वोट बैंक रहा है। कांग्रेस के वादे पर यह वर्ग कितना भरोसा करता है, यह तो समय ही बताएगा।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा, “कांग्रेस का वचनपत्र मध्यप्रदेश की समृद्धि का नया इतिहास लिखेगा। यह विकास के साथ-साथ प्रदेश के हर नागरिक, चाहे वह किसान हो, युवा हो, गरीब मजदूर हो, महिला हो, इससे सभी वर्गो की तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा।”

वहीं कांग्रेस के वचनपत्र पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चुटकी लेते हुए कहा कि कांग्रेस वचन तो देती है, मगर उसे पूरा कभी नहीं करती। इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाने का वचन दिया था, मगर गरीबी नहीं हटी। राजीव गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था, मगर गरीबी की जगह गरीब ही हटा दिए।

सच तो यह है कि भाजपा किसानों की आय दोगुनी करने और उन्हें फसल का उचित दाम दिलाने के वादे करती रही, मगर सरकार की ये कोशिशें जमीनी स्तर पर रंग नहीं ला पाईं। बीते दो साल में किसानों के कई आंदोलनों ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया है।

वहीं उद्योगों की स्थापना के बावजूद पर्याप्त संख्या में युवाओं को रोजगार नहीं मिला, साथ ही महिला असुरक्षा की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर कांग्रेस ने वचनपत्र तैयार किया है, और सभी वर्गो से वादे किए हैं कि उनके कल्याण की योजनाएं तो बनेंगी ही, साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य के हालात में बदलाव आाएगा।

बहरहाल, कांग्रेस का वचनपत्र तो आ गया है, अब भाजपा का घोषणापत्र आने वाला है। अब देखना होगा कि भाजपा की क्या रणनीति होती है और वह कांग्रेस के वादों का किस तरह जवाब देती है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने तो मीडिया के सामने कह दिया है कि भाजपा संकल्पपत्र बनाती है, जो महज ‘जुमलापत्र’ बनकर रह जाता है।

–आईएएनएस

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ब्लॉग

व्यंग्य – जन-गण नामकरण आन्दोलन: मुसलमान मंत्री बदलें नाम, अब ‘पक्षीफल’ कहलाएगा अंडा

भगवा ख़ानदान का इरादा है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ को राम मन्दिर आन्दोलन से भी बड़ा और विश्वव्यापी बनाया जाएगा! हिन्दुत्व के नायकों का मानना है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ के आगे बढ़ने से मुसलमानों में गुस्सा पैदा होगा। यदि इस गुस्से को और भड़का दिया जाए तो जहाँ-तहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़क जाएगी।

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Politicians Cartoon

अभी-अभी केन्द्रीय कैबिनेट की एक आपात और बेहद ख़ुफ़िया बैठक हुई है! इसमें पहली बार संघ, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के शीर्ष पदाधिकारी भी शामिल हुए! महामहिम चौकीदार महोदय ने सर्वोच्च स्तर की इस रणनीतिक मंत्रणा में अपने मंत्रियों को पीछे बैठाया और हिन्दू हित के संरक्षक महापुरुषों को अगली पंक्ति में बैठाया गया! बैठक में कई क्रान्तिकारी फ़ैसले लिये गये, लेकिन ये भी तय हुआ कि इनका औपचारिक ऐलान नहीं होगा! लिहाज़ा, सोशल मीडिया पर प्रकाशित इस पोस्ट को आप बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ मान सकते हैं!

सरकार ने तय किया है कि अब देश में ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ चलाया जाएगा! चुनाव आचार संहिता को देखते हुए अभी इस आन्दोलन का ऐलान नहीं किया जाएगा, लेकिन भगवा ख़ानदान का इरादा है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ को राम मन्दिर आन्दोलन से भी बड़ा और विश्वव्यापी बनाया जाएगा! हिन्दुत्व के नायकों का मानना है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ के आगे बढ़ने से मुसलमानों में गुस्सा पैदा होगा। यदि इस गुस्से को और भड़का दिया जाए तो जहाँ-तहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़क जाएगी। और, ऐसा होते ही जहाँ मुसलमानों का क़त्लेआम शुरू हो जाएगा, वहीं हिन्दुओं के ध्रुवीकरण इतना ज़ोर पकड़ लेगा, जैसे जंगल की बेक़ाबू आग!

भगवा ख़ानदान का यक़ीन है कि यदि उसकी ये रणनीति परवान चढ़ गयी तो न सिर्फ़ आगामी विधानसभा चुनावों में बीजेपी को ऐतिहासिक कामयाबी मिलेगी, बल्कि 2019 के आम चुनाव में भी पार्टी कम से कम 350 सीटें जीतने में सफल होगी! कैबिनेट की विशेष बैठक में ये भी तय हुआ कि भगवा ख़ानदान के जुड़े लोग बड़े पैमाने पर शहरों, जगहों और भवनों के नाम बदलने की माँग करने वाले बयान देने पर ज़ोर दें। ताकि मीडिया में उन्हें भरपूर सुर्ख़ियाँ मिलती रहें। इसका सबसे बड़ा फ़ायदा ये होगा कि जनता का ध्यान राफ़ेल और नोटबन्दी जैसे विश्वस्तरीय घोटालों से हट जाएगा और वो मूर्खों की तरह से इस झाँसे में फँस जाएगी कि मोदी का कोई विकल्प नहीं है! मोदी अजेय है!

  1. मुसलमान मंत्री बदले नाम

भगवा ख़ानदान के आग्रह पर ढोंगी सरकार ने तय किया है कि देश भर में बीजेपी की सरकारों में जो भी इक्का-दुक्का मुसलमान मंत्री हैं, उनके नाम फ़ौरन बदले जाएँ! वर्ना, इन मुसलमानों को मंत्री पद गँवाना होगा!

  1. ‘पक्षीफल’ कहलाएगा अंडा

भगवान ख़ानदान ने तय किया है कि अब अंडे को ‘पक्षीफल’ कहा जाएगा! इस फल से न सिर्फ़ मन्दिरों में भगवान का भोग लगाया जा सकेगा, बल्कि व्रत-उपवास में इसे फलाहार के रूप में इस्तेमाल करना होगा!

  1. वीर सावरकर पक्षीपालक योजना

वीर सावरकर पक्षीपालक योजना की आत्मा को मेक इन इंडिया की आत्मा से जोड़ा जाएगा। भगवा ख़ानदान को यक़ीन है कि आत्माओं के मिलन वाली इस क्रान्तिकारी नीति से पक्षीफलों की माँग में ज़बरदस्त उछाल आएगा और पक्षीपालकों के रूप में कम से कम 10 करोड़ युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर खुलेंगे। इसे वीर सावरकर पक्षीपालक योजना कहा जाएगा। प्रधानमंत्री फ़सल बीमा की सुविधा भी आरक्षण की तरह इस अद्भुत योजना के तहत में पहले दस साल तक मुफ़्त मिलेगी और भविष्य में भी इसे आरक्षण की ही तरह दस-दस वर्षों के लिए बढ़ाया जा सकेगा।

  1. दीनदयाल पकौड़ा योजना

वीर सावरकर पक्षीपालक योजना में उन लोगों को वरीयता मिलेगी जो अपने ‘भक्त होने का आधार कार्ड’ दिखा सकें और जो ‘दीनदयाल पकौड़ा योजना’ के लाभार्थी नहीं हो! ग़ौरतलब है कि प्रधानमंत्री पकौड़ा रोज़गार योजना का भी नया नामकरण कर दिया गया है! उसे अब ‘दीनदयाल पकौड़ा योजना’ कहा जाएगा!

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ओपिनियन

अंतिम सांस तक कांग्रेसी, मगर बेटे का साथ दूंगा : सत्यव्रत चतुर्वेदी

सत्यव्रत चतुर्वेदी के पिता बाबूराम चतुर्वेदी और मां विद्यावती चतुर्वेदी कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में रही हैं। दोनों ने आजादी की लड़ाई लड़ी, इंदिरा गांधी के काफी नजदीक रहे।

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Satyavrat Chaturvedi

छतरपुर, 9 नवंबर | कांग्रेस के पूर्व प्रवक्ता और पूर्व राज्यसभा सदस्य सत्यव्रत चतुर्वेदी के बेटे नितिन बंटी चतुर्वेदी ने बगावत कर समाजवादी पार्टी का दामन थामकर छतरपुर जिले के राजनगर विधानसभा क्षेत्र से नामांकनपत्र भरा है। चतुर्वेदी का कहना है कि वे अंतिम सांस तक कांग्रेसी हैं, मगर एक पिता के तौर पर बेटे का हर संभव साथ देंगे, क्योंकि छुपकर राजनीति करना उनकी आदत में नहीं है।

नितिन बंटी चतुर्वेदी राजनगर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के दावेदार थे, मगर कांग्रेस ने अंतिम समय में उसका टिकट काट दिया। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के कहने पर नितिन ने सपा का दामन थामकर चुनाव लड़ने का फैसला लिया।

सत्यव्रत चतुर्वेदी ने आईएएनएस से खास बातचीत में कहा, “नितिन बालिग है, उसे अपने फैसले करने का हक है, पिछले दो चुनाव से वह कांग्रेस से टिकट मांग रहा था, पार्टी ने हर बार अगले चुनाव का भरोसा दिलाया, मगर इस बार फिर वही हुआ। पार्टी ने टिकट नहीं दिया, इन स्थितियों में बंटी ने सपा से चुनाव लड़ने का फैसला लिया, यह उसका व्यक्तिगत फैसला है। मैं तो अंतिम सांस तक कांग्रेसी रहूंगा। हां, पिता के नाते बंटी का साथ दूंगा। छुपकर कहने और राजनीति करना आदत में नहीं है, जो करना है वह कहकर करता हूं, छुपाता नहीं हूं।”

चतुर्वेदी से जब पूछा गया कि बेटा सपा से चुनाव लड़ रहा है, पार्टी आप पर कार्रवाई कर सकती है, तो उनका जवाब था, “मैं कांग्रेस में जन्मा हूं, कांग्रेसी रक्त मेरी नसों में प्रवाहित होता है, दिल में कांग्रेस है, पार्टी को फैसले लेने का अधिकार है, मगर मेरे दिल से कोई कांग्रेस को नहीं निकाल सकता। अंतिम सांस भी कांग्रेस के लिए होगी।”

सत्यव्रत चतुर्वेदी के पिता बाबूराम चतुर्वेदी और मां विद्यावती चतुर्वेदी कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में रही हैं। दोनों ने आजादी की लड़ाई लड़ी, इंदिरा गांधी के काफी नजदीक रहे। बाबूराम चतुर्वेदी राज्य सरकार में मंत्री रहे और विद्यावती कई बार सांसद का चुनाव जीतीं। बुंदेलखंड में उनकी हैसियत दूसरी इंदिरा गांधी के तौर पर रही है।

चतुर्वेदी के समकालीन नेताओं में शामिल दिग्विजय सिंह, कांतिलाल भूरिया, सुभाष यादव आदि ऐसे नेता हैं, जिनके परिवार में एक और एक से ज्यादा सदस्यों को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया है, मगर चतुर्वेदी के बेटे को पार्टी ने टिकट देना उचित नहीं समझा। इसी के चलते उनके बेटे बंटी ने बगावत कर दी।

अन्य नेताओं के परिजनों को टिकट दिए जाने के सवाल पर चतुर्वेदी का कहना है, “इस सवाल का जवाब तो मैं नहीं दे सकता, यह जवाब तो पार्टी के बड़े नेता और टिकटों का वितरण करने वाले ही दे सकते हैं, जहां तक बात मेरी है, मन में तो मेरे भी सवाल आता है कि आखिर ऐसा हुआ क्यों।”

कांग्रेस में टिकट वितरण की कवायद छह माह पहले ही शुरू करने का ऐलान कर दिया गया था, जगह जगह पर्यवेक्षक भेजे गए, सर्वे का दौर चला, नेताओं की टीमों ने डेरा डाला और वादा किया गया कि न तो पैराशूट वाले नेता चुनाव मैदान में उतारे जाएंगे और न ही बीते चुनावों में भारी मतों से हारे उम्मीदवारों को मौका दिया जाएगा। मगर उम्मीदवारों की सूचियां इन सारे दावे और वादे की पोल खोलने के लिए काफी है।

चतुर्वेदी भी इस बात से हैरान हैं कि जो व्यक्ति पिछला चुनाव 38 और 40 हजार से हारा, उसे उम्मीदवार बना दिया गया। आखिर किसने और कैसा सर्वे किया, यह वे समझ नहीं पा रहे हैं। अब तो चुनाव के बाद ही पार्टी को इन हालात की समीक्षा करनी चाहिए, आखिर किसने किस तरह का खेल ख्ेाला।

–आईएएनएस

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