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विदेश में पढ़ रही नेताजी की बेटी अनिता को नेहरू का बनाया ट्रस्ट भेजता था मासिक ख़र्च

1964 तक तक अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी की ओर से अनिता बोस को सालाना 6,000 रुपये की मदद भेजी जाती रही। इस आर्थिक सहयोग को 1965 में अनिता की शादी के बाद बन्द कर दिया गया।

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anita bose

बात बहुत लम्बी-चौड़ी है। लेकिन कोशिश है कि कम से कम शब्दों में बयाँ की जाए। कई पीढ़ियों से संघियों के लिए सबसे बड़ा संताप यही है कि उनके पूर्वजों में एक भी नेता ऐसा नहीं रहा जो काँग्रेस के महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, भीम राव आम्बेडकर, सुभाष चन्द्र बोस, महामना मदन मोहन मालवीय जैसे नेताओं का पसंगा भी साबित हो सके। उल्टा संघ के शूरमाओं का अतीत तो बेहद शर्मसार करने वाला रहा है। इन्होंने अँग्रेज़ों के तलवे चाटे, उनके लिए मुख़बिरी की, अँग्रेज़ों के इशारे पर ही उग्र-हिन्दुत्व की ऐसी नीति बनायी जिसमें हिन्दू-मुसलमान हमेशा लड़ते ही रहें। ताकि अँग्रेज़ों की ‘फूट डालो और राज करो’ की साज़िश सफल होती रहे। हालाँकि, ऐसा करके भी संघी आज़ादी को नहीं टाल नहीं सके। अलबत्ता, संघियों के योगदान की वजह से मुल्क के बँटवारे को नहीं रोका जा सका।

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राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाक़ात करती नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की बेटी अनिता बोस

बहरहाल, आज़ादी के बाद जब संघियों को ये समझ में आने लगा कि उनकी करतूतों की वजह से ही देश की जनता उन्हें चुनाव दर चुनाव सिरे से ख़ारिज़ कर रही है, तो उन्होंने नयी साज़िश रची कि तरह-तरह की मनगढ़न्त बातों को फैलाकर काँग्रेस के शीर्ष नेताओं का चरित्रहनन करो। ताकि जनता का काँग्रेस के प्रति लगाव घट सके। इस साज़िश के प्रति मूल चिन्तन ये था कि यदि विरोधी के मुक़ाबले अपनी लकीर को लम्बा न खींच सको तो विरोधियों की लकीर को छल-प्रपंच से मिटाने का रास्ता थामो! इत्तेफ़ाक़ से, संघियों को धीरे-धीरे ही सही, लेकिन अपनी ऐसी साज़िश में कामयाबी मिलती गयी। लेकिन इन्दिरा, संजय और फिर राजीव गाँधी के प्रति भारतीय जनमानस में पनपे स्नेह को देखते हुए संघियों की अगली रणनीति बनी कि नेहरू-गाँधी ख़ानदान को वंशवादी बताकर इसका चरित्रहनन करो और इस परिवार के नेताओं को छोड़कर काँग्रेस के तमाम महान और चोटी के नेताओं के कृतित्व को हड़प लो! यही नहीं, किसी भी तरह से ख़ुद को शहीद भगत सिंह, राजगुरु, राम प्रसाद बिस्मिल और चन्द्र शेखर आज़ाद जैसे क्रान्तिकारियों का क़रीबी बताते फिरो! जबकि सच्चाई तो ये है कि इनमें से किसी ने भी, कभी भी, किसी रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा और कार्यशैली की सराहना नहीं की। उल्टा, ये सभी महापुरुष जब तक जीये, उन्होंने संघ को ना सिर्फ़ नापसन्द किया, बल्कि इसे नफ़रत के क़ाबिल भी बताया। आज भी संघियों की सर्वोच्च रणनीति ये है कि झूठ को ही इतनी बार और इतनी तरह से बोलो कि मूर्ख लोग उसे ही सच मानकर संघ के समर्थक बन जाएँ! फिर उन्हें धर्म और पोंगापन्थ की ऐसी अफ़ीम चटाते रहे कि वो कभी झूठ से बाहर नहीं ही ना पाएँ!

उपरोक्त वजहों से ही नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को लेकर भी संघियों ने ख़ूब दुष्प्रचार फैलाया। अफ़वाह फैलायी गयी कि सुभाष चन्द्र बोस से जुड़ी ‘फ़ाइलों’ में ऐसी गोपनीय बातें हैं जिससे नेहरू-गाँधी परिवार और काँग्रेस शर्मसार हो सकती है, इसलिए उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जाता! ऐसा करते वक़्त इस सच्चाई को बिल्कुल भुला दिया जाता है कि नेहरू और बोस, दोनों ही काँग्रेस के समाजवादी खेमे के नेता थे। उनके बीच कोई निजी मतभेद नहीं था। सुभाषचन्द्र बोस की ‘सैन्यवादी प्रवृत्ति’ को गाँधी और उनके अनुयायी उचित नहीं मानते थे। नेहरू भी उनमें थे। लेकिन उन सभी के बीच परस्पर सम्मान ऐसा था कि सुभाष चन्द्र बोस ने जब आज़ाद हिन्द फ़ौज बनायी तो उसके एक ब्रिगेड का नाम ‘नेहरू’ रखा गया! यहाँ तक कि गाँधीजी को ‘राष्ट्रपिता’ का सम्बोधन भी नेताजी ने ही दिया था!

बहरहाल, प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर से संघ की चरित्र-हनन रणनीति को ख़ूब हवा दी। वो जहाँ-तहाँ सरदार पटेल, आम्बेडकर, सुभाष चन्द्र बोस जैसे नेताओं से अपनी और संघ परिवार की वैचारिक नज़दीकियाँ दिखाने का भ्रम फैलाने लगे। इसी सिलसिले में ‘बोस फ़ाइल्स’ का भी ख़ूब हल्ला मचाया गया। जनवरी 2016 में बोस से जुड़ी कई गोपनीय फ़ाइलें सार्वजनिक भी गयीं, लेकिन इससे जो तथ्य सामने आये, उससे तो भगवा ख़ानदान के हाथ से तोते ही उड़ गये। दशकों से संघियों की ओर फैलाये जा रहे दुष्प्रचार पर भी पानी फिर गया।

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शरत चन्द्र बोस और सुभाष चन्द्र बोस के साथ जवाहर लाल नेहरू (साभार: नेहरू मेमोरियल)

इन्हीं ‘बोस फ़ाइल्स’ के दस्तावेज़ों से पहली बार पता चला कि जवाहर लाल नेहरू ने वियना में पल रही सुभाष चन्द्र बोस की बेटी अनिता को हर महीने आर्थिक मदद भिजवाने की व्यवस्था की थी। इसके लिए 23 मई 1954 को ‘अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी’ (एआईसीसी) ने नेताजी की बेटी अनिता बोस के लिए 2 लाख रुपये की पूँजी से एक ट्रस्ट बनाया। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिधान चन्द्र रॉय, इसके ट्रस्टी थे। ट्रस्ट के ज़रिये अनिता बोस को हर महीने 500 रुपये की आर्थिक मदद दी जाती थी। 23 मई 1954 को नेहरू की ओर से हस्ताक्षरित एक दस्तावेज़ के अनुसार, “डॉ. बी. सी. राय और मैंने आज वियना में सुभाष चन्द्र बोस की बच्ची के लिए एक ट्रस्ट डीड पर हस्ताक्षर किये हैं। दस्तावेज़ों को सुरक्षित रखने के लिए मैंने उनकी मूल प्रति एआईसीसी को दे दी है।”

1954 से लेकर 1964 तक तक अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी की ओर से अनिता बोस को सालाना 6,000 रुपये की मदद भेजी जाती रही। इस आर्थिक सहयोग को 1965 में अनिता की शादी के बाद बन्द कर दिया गया। यहाँ ये समझना भी बहुत ज़रूरी है कि उस ज़माने में 500 रुपये महीना अपने आप में ख़ासी बड़ी रक़म थी, क्योंकि इतना वेतन तो बड़े-बड़े अफ़सरों का भी नहीं होता था! इस प्रसंग का एक दिलचस्प पहलू ये भी रहा कि जवाहर लाल नेहरू ने कभी अपनी नेक़-दिली का ढिंढ़ोरा नहीं पीटा। यहाँ तक कि इन्दिरा, राजीव, सोनिया और राहुल वग़ैरह ने भी कभी इन जानकारियों का सियासी लाभ बटोरने की कोशिश नहीं की। एक ओर ये ऐतिहासिक तथ्य हैं और दूसरी ओर है संघियों की जगज़ाहिर बदनीयत!

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लोगों ने 3 महीनों में व्हाट्सएप पर बिताए 85 अरब घंटे

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WhatsApp

सैन फ्रांसिस्को, 21 अगस्त | सोशल मीडिया प्लेटफार्म व्हाट्सएप के संबंध में एक रोचक जानकारी सामने आई है। एक रपट से पता चला है कि लोगों ने बीते तीन महीनों में फेसबुक के स्वामित्व वाले व्हाट्सएप पर 85 अरब घंटे समय बिताया। फोर्ब्स की सोमवार को रपट के अनुसार, अमेरिका स्थित एप विश्लेषक कंपनी एप्पटोपिया की ओर से जारी आंकड़े में बताया गया है कि बीते तीन महीनों में लोगों ने व्हाट्सएप पर अपने 85 अरब घंटे खर्च किए। इस एप को दुनिया भर में 1.5 अरब प्रयोगकर्ता इस्तेमाल करते हैं।

इसी प्रकार, प्रयोगकर्ताओं ने इस दौरान इसकी स्वामित्व वाली कंपनी, फेसबुक पर 30 अरब घंटे का समय बिताया।

एप्पटोपिया के प्रवक्ता एडम ब्लैकर ने कहा, “यह स्पष्ट है कि व्हाट्सएप पसंद किया जाने वाला वैश्विक मैसेजिंग एप है।”

दुनियाभर में प्रयोगकर्ता जिन 10 एप पर सबसे ज्यादा समय बिताते हैं, उनमें व्हाट्सएप, वीचैट, फेसबुक, मैसेंजर, पेंडोरा, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, ट्विटर, गूगल मैप्स और स्पॉटीफाई प्रमुख हैं।

–आईएएनएस

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लड़कियों की तुलना में लड़कों का यौन उत्पीड़न ज्यादा!

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Child Sexual Abuse in India

नई दिल्ली, 6 अगस्त | देश में अक्सर जब बात बच्चों से यौन उत्पीड़न के मामलों की आती है तो दिमाग में लड़कियों के साथ होने वाली यौन उत्पीड़न की घटनाएं आंखों के सामने उमड़ने लगती हैं, लेकिन इसका एक पहलू कहीं अंधकार में छिप सा गया है। महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की 2007 की रिपोर्ट दर्शाती है कि देश में 53.22 फीसदी बच्चों को यौन शोषण के एक या अधिक रूपों का सामना करना पड़ा, जिसमें से 52.94 फीसदी लड़के इन यौन उत्पीड़न की घटनाओं का शिकार हुए।

चेंज डॉट ओआरजी के माध्यम से बाल यौन उत्पीड़न के मामले को उठाने वाली याचिकाकर्ता, फिल्म निर्माता और लेखक इंसिया दरीवाला ने मुंबई से फोन पर आईएएनएस को बताया, “सबसे बड़ी समस्या है कि इस तरह के मामले कभी सामने आती ही नहीं क्योंकि हमारे समाज में बाल यौन उत्पीड़न को लेकर जो मानसिकता है उसके कारण बहुत से मामले दर्ज ही नहीं होते और होते भी हैं तो मेरी नजर में बहुत ही कम ऐसा होता है। इस तरह के मामले सामने आने पर समाज की पहली प्रतिक्रिया होती है कि लड़कों के साथ तो कभी यौन शोषण हो नहीं सकता, क्योंकि वे पुरुष हैं और पुरुषों के साथ कभी यौन उत्पीड़न नहीं होता।”

उन्होंने कहा, “समाज का जो यह नजरिया है लड़कों को देखने का ठीक नहीं है क्योंकि पुरुष बनने से पहले वह लड़के और बच्चे ही होते हैं। बच्चों की यह जो श्रेणी है काफी दोषपूर्ण है इसमें कोई लड़का-लड़की का भेद नहीं होता। लड़कों का जो शोषण हो रहा है अधिकतर पुरुषों द्वारा ही हो रहा है। मेरे हिसाब से यह काफी नजरअंदाज कर दी जाने वाली सच्चाई है और मैं पहले भी कई बार बोल चुकी हूं हम जो बच्चों व महिलाओं पर यह यौन हिंसा हमारे समाज में देख रहे हैं, कहीं न कहीं हम उसकी जड़ को नहीं पकड़ पा रहे हैं।”

लड़कों के साथ यौन उत्पीड़न होने पर बताने में कतराने की वजह के सवाल पर फिल्मनिर्माता ने कहा, “दरअसल जब समाज में किसी लड़की के साथ यौन उत्पीड़न की घटना होती है तो समाज की पहली प्रतिक्रिया हमदर्दी की होती है, उन्हें बचाने के लिए सपोर्ट सिस्टम होता है लेकिन अगर कोई लड़का अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामले को लेकर बोलता भी है तो पहले लोग उसपर हंसेंगे, उसका मजाक उड़ाएंगे व मानेंगे भी नहीं और उसकी बातों का विश्वास नहीं करेंगे, कहेंगे तुम झूठ बोल रहे हो यह तो हो नहीं सकता। हंसी और मजाक बनाए जाने के कारण लड़कों को आगे आने से डर लगता है इसलिए समाज बाल यौन उत्पीड़न में एक अहम भूमिका निभा रहा है।”

उन्होंने बताया, “पिछले एक साल में जब से मैंने अपना अभियान और लोगों से बात करना शुरू किया है तब से काफी चीजें हुई हैं। इसलिए मैं सरकार की शुक्रगुजार हूं कि कम से कम वह इस ओर ध्यान दे रहे हैं। आज सामान्य कानूनों को निष्पक्ष बनाने की प्रक्रिया चल रही है, इसकी शुरुआत पॉस्को कानून से हुई और अब धारा 377, पुरुषों के दुष्कर्म कानून को भी देखा जा रहा है। अब अखिरकार हम लोग लिंग समानता की बात कर सकते हैं, जिससे वास्तव में समानता आएगी। लिंग समानता का मतलब यह नहीं है कि वह एक लिंग को ध्यान में रखकर सारे कानून बनाए, यह सिर्फ महिलाओं की बात नहीं है। पुरुष और महिलाओं को समान रूप से सुरक्षा मिलनी चाहिए।”

लेखक इंसिया दरीवाल ने कहा, “देखिए पॉस्को कानून निष्पक्ष है लेकिन जब आप लड़कों के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में दंड के प्रावधान को देखते हैं तो वह धारा 377 के तहत दिया जाता था। जैसे पहले अगर दो पुरुषों के बीच सहमति से हुआ तो भी धारा 377 के तहत दोनों लोगों को सजा मिलती थी और नहीं हुआ तो भी दोनों को इसी धारा के तहत सजा दी जाती थी। इसमें पीड़ित को भी सजा मिलने का खतरा था, हालांकि अब चीजों में सुधार हुआ है और इसपर अब काफी चर्चा हो रही है और समाज में भी बदलाव आ रहा है।”

महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी से मिले समर्थन पर उन्होंने कहा, “उन्होंने मेरे काम की सराहना की है और कहा कि यह काम काफी जरूरी है। मैंने उनसे एक स्टडी की मांग की थी, जिसमें यह देखना था कि बाल यौन उत्पीड़न की हमारे समाज में कितनी प्रबलता है और इसके जो प्रभाव हैं वह बच्चों और पुरुषों पर क्या हैं, इसमें यौन प्रभाव, उनके संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ता है, उनके मानसिकता और शारिरिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता यह सब शामिल है। इस स्टडी के निष्कर्षो से मुझे मापदंड तैयार करने हैं और उन मापदंड़ों को मैं इसलिए तैयार करना चाहती हूं क्योंकि जब तक हम जड़ की जांच नहीं करेंगे तब तक नहीं पता चलेगा कि यह क्यों हो रहा है।”

बाल यौन उत्पीड़न मामलों में समाज की गलती के सवाल पर इंसिया ने कहा, “समाज कौन है हम लोग, इसलिए मानसिकता बदलना बहुत जरूरी है क्योंकि अगर हम लोग मानसिकता नहीं बदल पाए तो कानून कितने भी सख्त हो जाए तो उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। जब भी कोई घटना होती है तो हम सरकार, कानून और वकीलों को दोषी ठहराते हैं लेकिन हमें कहीं न कहीं खुद को भी देखना चाहिए क्योंकि हमारे समाज में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग भूमिका तैयार कर दी गई है, जिसे उन्हें निभाना पड़ता है, इसे बदलने की जरूरत है।”

भारत सरकार ने लिंग निष्पक्ष कानून बनाने के मद्दनेजर लड़कों के साथ होने वाले यौन शोषण को मौजूदा यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा (पॉस्को) अधिनियम में संशोधनों को मंजूरी दे दी है जिसे कैबिनेट के पास मंजूरी के लिए भेजा जाना बाकी है।

–आईएएनएस

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Viral सच

अपहरण के आरोपी सबसे अधिक सांसद-विधायक भाजपा से

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नई दिल्ली, 30 जुलाई | भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कम से कम 16 सांसदों और विधायकों के खिलाफ अपहरण से संबंधित आपराधिक मामले दर्ज हैं। यह भारत में किसी भी राजनीतिक दल से सबसे ज्यादा है। मौजूदा 4,867 सांसदों और विधायकों द्वारा दाखिल हलफनामों के एक विश्लेषण से यह खुलासा हुआ है। चुनाव एवं राजनीतिक सुधारों के लिए काम करने वाली एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स द्वारा सोमवार को यह निष्कर्ष जारी किया गया।

निष्कर्ष में कहा गया है कि 770 सांसदों और 4,086 विधायकों के हलफनामों से यह खुलासा हुआ कि 1,024 या कुछ 21 फीसदी देश के सांसदों-विधायकों ने यह घोषित किया है कि उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

इसमें से 64 ने अपने खिलाफ अपहरण से संबंधित मामलों की घोषणा की है। इसमें से 17 विभिन्न राजनीतक दलों से ताल्लुक रखते हैं, जबकि चार निर्दलीय हैं।

भाजपा इस सूची में शीर्ष पर है। जबकि कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) दोनों दूसरे स्थान पर हैं। दोनों के छह-छह सदस्य इस सूची में शामिल हैं।

एडीआर के मुताबिक, सूची में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के पांच, बीजू जनता दल (बीजद) और द्रमुक के चार-चार, समाजवादी पार्टी (सपा), तेदेपा के तीन-तीन, तृणमूल कांग्रेस, माकपा, और शिवसेना के दो-दो सदस्य शामिल हैं।

साथ ही इस सूची में लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा), जद (यू), टीआरएस और उत्तर प्रदेश की निषाद पार्टी के एक-एक सदस्य का नाम भी शामिल है।

अपहरण से संबंधित आरोपों की घोषणा करने वाले विधायकों में बिहार व उत्तर प्रदेश से नौ-नौ, महाराष्ट्र के आठ, पश्चिम बंगाल के छह, ओडिशा व तमिलनाडु से चार-चार, आंध्र प्रदेश, गुजरात व राजस्थान से तीन-तीन, और छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, पंजाब व तेलंगाना से एक-एक सदस्य शामिल हैं।

–आईएएनएस

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