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सरदार पटेल के निधन के बाद नेहरू ने उनकी दोनों सन्तानों को सांसद बनवाया

सरदार पटेल की दूसरी औलाद डाह्या भाई पटेल, बम्बई में एक निजी बीमा कम्पनी में नौकरी करते थे। वो मणिबेन से तीन साल छोटे थे। जब सरदार पटेल उपप्रधानमंत्री बने तो उनके सेठ ने डाह्याभाई को किसी काम से दिल्ली भेजा। सरदार पटेल ने शाम को उन्हें खाने के समय समझाया कि जब तक मैं यहाँ काम कर रहा हूँ, तुम दिल्ली मत आना! डाह्या भाई भी काँग्रेस के टिकट पर 1957 और 1962 में लोकसभा के सदस्या रहे। 1970 में डाह्या भाई राज्यसभा सदस्य बने। सांसद रहते ही उनका निधन हुआ।

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Nehru-Patel

मोदी राज में भगवा ख़ानदान और उसके मूर्ख भक्तों को असंख्य बार ये अफ़ीम चटायी गयी है कि जवाहर लाल नेहरू ने सरदार बल्लभ भाई पटेल के साथ अच्छा सलूक नहीं किया। या, नेहरू ने पटेल को गच्चा देकर प्रधानमंत्री का पद हड़प लिया था। जबकि सच ये है कि सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद महात्मा गाँधी ने नेहरू को आज़ाद भारत का पहला प्रधानमंत्री बनवाया था। गाँधीजी इस पद के लिए सरदार पटेल को भी उपयुक्त मानते थे, लेकिन उन्हें आख़िरकार किसी एक को ही तो चुनना था। यदि पटेल को इसमें नाइंसाफ़ी दिखी होती तो वो उपप्रधानमंत्री का पद भी क्यों स्वीकार करते? ये कल्पना भी नहीं की जा सकती कि पटेल जैसा जन-नेता सत्तालोलुप भी हो सकता है! लेकिन संघी हमेशा ये भ्रम फ़ैलाते रहे कि गाँधी जी को नेहरू की ज़िद के आगे झुकना पड़ा और इससे पटेल को वो नहीं मिला जिसके वो हक़दार थे। ये भ्रम उस मोहन दास करम चन्द गाँधी का भी चरित्रहनन करता है कि वो किसी के आगे झुक भी सकते थे! सरासर झूठ, और निपट झूठ है, ये सारी बातें!

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डाह्या भाई पटेल

दरअसल, मोदी राज की ये एक जगज़ाहिर साज़िश है कि किसी भी तरह से काँग्रेस से उसके सरदार पटेल, आम्बेडकर, सुभाष चन्द्र बोस, महामना मदन मोहन मालवीय जैसे नेताओं के कृतित्व को हड़प लो! किसी भी तरह से ख़ुद को शहीद भगत सिंह, राजगुरु, राम प्रसाद बिस्मिल और चन्द्र शेखर आज़ाद जैसे क्रान्तिकारियों का क़रीबी बताओ! जबकि सच्चाई तो ये है कि इनमें से किसी ने भी, कभी भी, किसी रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा और कार्यशैली की सराहना नहीं की। उल्टा, ये महापुरुष जब तक जीये, उन्होंने संघ को ना सिर्फ़ नापसन्द किया, बल्कि इसे नफ़रत के क़ाबिल भी बताया।

बहरहाल, अभी बात सरकार पटेल के जाने के बाद उनके परिवार के प्रति नेहरू के रवैये की। सरदार पटेल की दो सन्तानें थीं। बेटी मणिबेन पटेल और बेटा डाह्याभाई (Dahya Bhai) पटेल। महात्मा गाँधी की तरह, पटेल और नेहरू दोनों ही नहीं चाहते थे कि उनके जीते-जी उनकी सन्तानें उनकी हैसियत का फ़ायदा उठाएँ। हालाँकि, दोनों नेताओं की सन्तानों ने अपने-अपने स्तर पर स्वतंत्रता आन्दोलन में भी बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था। लेकिन उन्हें पिता के नाम के आधार पर अपनी राजनीति चमकाने का मौका नहीं दिया गया। नेहरूजी ने भी बेटी इन्दिरा गाँधी को अपने जीते-जी कभी चुनाव लड़ने का टिकट नहीं मिलने दिया। हालाँकि, इन्दिरा गाँधी इसके लिए बहुत उत्सुक रहती थीं। इसीलिए जवाहर लाल नेहरू के निधन के बाद ही इन्दिरा, सांसद बन पायीं।

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पिता सरदार बल्लभ भाई पटेल के साथ बेटी मणिबेन पटेल, 1946.

उधर, 1950 में सरदार बल्लभ भाई पटेल के निधन के बाद जवाहर लाल नेहरू ने उनकी दोनों सन्तानों को टिकट देकर संसद में भेजने का रास्ता बनाया। 1952 में मणिबेन पटेल, गुजरात के दक्षिण कैरा सीट से और 1957 में आणंद सीट से काँग्रेस के टिकट पर जीतकर लोकसभा पहुँचीं। 1962 में जवाहर लाल नेहरू ने मणिबेन को 6 साल के लिए राज्यसभा सदस्य के रूप में निर्वाचित करवाया। कालान्तर में, मणिबेन ने आपातकाल का विरोध किया। इसके बाद 1977 में वो जनता पार्टी के टिकट पर मेहसाणा सीट से लोकसभा पहुँची।

मणिबेन, एक परिपक्व राजनीतिक कार्यकर्ता थीं। 1930 में वो अपने पिता सरदार पटेल की सहायक बनीं और जीवनभर उनके साथ ही रहीं। जवाहर लाल ने कई बार मणिबेन की ख़ूब तारीफ़ की। मणिबेन के नाम पर ही अहमदाबाद के एक विधानसभा क्षेत्र का नाम मणिनगर रखा गया। प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेन्द्र मोदी वहीं से विधायक थे।

सरदार पटेल की दूसरी औलाद डाह्या भाई पटेल, बम्बई में एक निजी बीमा कम्पनी में नौकरी करते थे। वो मणिबेन से तीन साल छोटे थे। जब सरदार पटेल उपप्रधानमंत्री बने तो उनके सेठ ने डाह्याभाई को किसी काम से दिल्ली भेजा। सरदार पटेल ने शाम को उन्हें खाने के समय समझाया कि जब तक मैं यहाँ काम कर रहा हूँ, तुम दिल्ली मत आना! डाह्या भाई भी काँग्रेस के टिकट पर 1957 और 1962 में लोकसभा के सदस्या रहे। 1970 में डाह्या भाई राज्यसभा सदस्य बने। सांसद रहते ही उनका निधन हुआ।

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बस, एक-एक बार ही जीते विश्वास और अविश्वास

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No-trust motion Parliament

संसदीय लोकतंत्र में ऐसे अनोखे मौक़े भी आते हैं जब विश्वास या अविश्वास का मतलब एक ही होता है! सरकार को गिराने के लिए अविश्वास और बचाने के लिए विश्वास प्रस्ताव लाया जाता है। विपक्ष का प्रस्ताव सरकार के प्रति अविश्वास और गुस्सा दिखाने के लिए होता है तो प्रधानमंत्री का प्रस्ताव अपने लिए विश्वास की दुहाई माँगता है! दोनों से सरकार की ताक़त और उसकी क़िस्मत तय होती हैं। दोनों से बहुमत की जाँच होती है। दोनों लोकसभा के एक ही नियम से संचालित होते हैं।

विश्वास और अविश्वास को मिलाकर, लोकसभा में अब तक 27 बार शक्ति-परीक्षण के मौके आये हैं। विपक्ष की ओर से 20 बार अविश्वास प्रस्ताव लाये गये। लेकिन वो सिर्फ़ एक बार ही सरकार गिरा पाया। जुलाई 1979 में मोरारजी देसाई को अपने ख़िलाफ़ पेश हुए अविश्वास प्रस्ताव के पारित होने पर इस्तीफ़ा देना पड़ा। दूसरी ओर, अब तक 7 बार प्रधानमंत्रियों को विश्वास मत पेश करना पड़ा है। इसमें से 6 बार उन्हें हार मिली। जुलाई 2008 में विश्वास मत जीतने वाले मनमोहन सिंह एकलौते प्रधानमंत्री बने।

प्रथम अविश्वास प्रस्ताव की नौबत तीसरी लोकसभा में आयी। अगस्त 1963 में समाजवादी नेता आचार्य जेबी कृपलानी ने प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। वो चार दिनों तक चली 21 घंटे लम्बी बहस के बाद गिर गया। लाल बहादुर शास्त्री ने भी अपने छोटे कार्यकाल के बावजूद तीन बार अविश्वास प्रस्तावों को नाकाम किया। सबसे ज़्यादा अविश्वास प्रस्तावों के सामने अडिग रहने का कीर्तिमान इन्दिरा गाँधी के नाम है। उन्होंने 15 बार अविश्वास प्रस्तावों को परास्त किया। 1966 से 1975 के बीच 12 बार और 1981 से 1982 के दरम्यान तीन बार।

मोरारजी देसाई ने दो बार शक्ति-परीक्षण का सामना किया। 1977 में उन्होंने पहला विश्वास प्रस्ताव जीता था। लेकिन 1979 में दूसरे अविश्वास प्रस्ताव पर लोकसभा में वोटिंग की नौबत आने से पहले जब मोरारजी ने पाया कि वो बहुमत गँवा बैठे हैं तो उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। वो पहला मौक़ा था जब अविश्वास प्रस्ताव पारित होने की वजह से सरकार गिरी थी। बाक़ी जितनी भी सरकारें अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले गिरीं, वो सभी विश्वास प्रस्तावों के पारित नहीं होने से सत्ता से बाहर हुई थीं।

पहली बार जुलाई 2008 में मनमोहन सिंह की ओर से लाया गया विश्वास प्रस्ताव लोकसभा में पारित हुआ। जबकि उससे पहले पेश हुए तीन विश्वास प्रस्तावों को नकारा जा चुका था। 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह, 1997 में एचडी देवेगौड़ा और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के विश्वास प्रस्ताव लोकसभा ने पारित नहीं किये। तीन मौके ऐसे भी रहे जब प्रधानमंत्री ने अपने विश्वास प्रस्ताव पर मत-विभाजन यानी वोटिंग की नौबत आने से पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया। जुलाई 1979 में मोरारीजी देसाई, अगस्त 1979 में चौधरी चरण सिंह और मई 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी ने विश्वास प्रस्ताव पर मतदान होने से पहले इस्तीफ़ा दे दिया था।

नरसिम्हा राव ने तीन बार और राजीव गाँधी तथा अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारों को एक-एक बार अविश्वास प्रस्ताव को हराने का मौक़ा मिला। वाजपेयी ने 17 अप्रैल 1999 को एक वोट से अपने विश्वास प्रस्ताव पर हार का मुँह देखा। लेकिन चार साल बाद 2003 में उनके ख़िलाफ़ पेश हुआ अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं हुआ।

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ज़रा हटके

अब कौन कहेगा, ‘ऐ भाई! जरा देख के चलो’

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Gopaldas Neeraj

नई दिल्ली, 19 जुलाई | ‘लिखे जो खत तुझे‘, ‘ऐ भाई! जरा देख के चलो‘, ‘दिल आज शायर है‘, ‘जीवन की बगिया महकेगी‘, ‘खिलते हैं गुल यहां’ जैसे मशहूर गानों के जरिए लोगों के दिलों में जगह बनाने वाले हिंदी के प्रख्यात गीतकार और कवि गोपाल दास नीरज 93 वर्ष की उम्र में गुरुवार को दुनिया छोड़ चले, लेकिन ऐसा जिंदादिल कवि कभी मरता है क्या!

उत्तर प्रदेश के इटावा जिले स्थित पुरवली गांव में 4 जनवरी, 1925 को जन्मे गोपाल दास नीरज जब छह वर्ष के थे, तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। सन् 1942 में एटा से हाईस्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास करने के बाद उन्होंने इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया। उसके बाद सिनेमाघर की एक दुकान पर नौकरी की, लेकिन लिखने की कला अपने हाथ में समेटे गोपाल दास लंबी बेकारी के बाद दिल्ली आ गए।

दिल्ली आकर उन्होंने सफाई विभाग में टाइपिस्ट की नौकरी की। वहां से नौकरी छूट जाने पर कानपुर के डीएवी कॉलेज में क्लर्की की। फिर बाल्कट ब्रदर्स नाम की एक प्राइवेट कंपनी में पांच साल तक टाइपिस्ट का काम किया। नौकरी करने के साथ प्राइवेट परीक्षाएं देकर 1949 में 12वीं, 1951 में बीए और 1953 में प्रथम श्रेणी में हिंदी से एमए पास किया।

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‘दर्द दिया है’, ‘आसावरी’, ‘बादलों से सलाम लेता हू’ं, ‘गीत जो गाए नहीं’, ‘कुछ दोहे नीरज के’, ‘नीरज की पाती’ जैसे रचना संग्रह, ‘तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा’, ‘हम तेरी चाह में, ऐ यार! वहां तक पहुंचे’, ‘अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए’, ‘दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था’ , ‘पीछे है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिये’ जैसी गजलें लिखने वाले मशहूर कवि और गीतकार गोपाल दास नीरज को 1991 में पद्मश्री और 2007 में पद्मभूषण सम्मान से भी नवाजा गया था।

उत्तर प्रदेश सरकार ने भी यश भारती सम्मान से सम्मानित कर उनके दमदार लेखनी को सराहा था। बॉलीवुड फिल्मों में कई सुपरहिट गाने लिखकर अपना लोहा मनवाया था। उन्हें उनकी लेखनी के लिए कई बार सम्मानित किया गया था। उन्होंने तीन बार फिल्म फेयर अवार्ड भी अपने नाम किया था।

हिंदी मंचों के प्रसिद्ध कवियों में शुमार नीरज को अंतिम दिनों में सांस लेने में तकलीफ हो रही थी, जिस कारण मंगलवार को तबीयत बिगड़ने के बाद आगरा के लोटस हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था, लेकिन तबीयत ज्यादा खराब होने पर उन्हें एम्स लाया गया, हालांकि बुधवार को तबीयत में सुधार की भी खबरें आई थीं, लेकिन अगले दिन नीरज ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके लाखों चाहने वालों का दिल आज रोएगा बहुत, उनकी प्रसिद्ध कविता ‘रोने वाला ही गाता है’ सबको ढाढस बंधाएगी। कवि कभी मरता नहीं, नीरज सदियों अपनी रचनाओं के रूप में जीवित रहेंगे। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि!!!

–आईएएनएस

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ज़रा हटके

ग्रेटर नोएडा : इमारत में इसी सप्ताह हुआ था ‘गृह प्रवेश’

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Greater Noida building collapse

ग्रेटर नोएडा, 18 जुलाई (आईएएनएस)| ग्रेटर नोएडा में मंगलवार रात धराशायी हुई इमारत में हाल ही में अपनी मां के साथ रहने आए शिव त्रिवेदी (25) ने इसी सप्ताहांत गृह प्रवेश की पूजा आयोजित की थी। उनके सपनों के घर को सजाने के लिए उनकी साली अपने एक वर्षीय बच्चे के साथ यहीं रुक गईं थीं।

बुधवार को वे सभी एक बहुमजिला इमारत के उनकी इमारत के ऊपर ढहने से उसके मलवे में फंसे थे और इसमें उनके जीवित नहीं रहने की संभावना है।

दर्जनों बचाव कर्मी मलबे को हटाने के लिए क्रेनों और बुलडोजरों का इस्तेमाल कर रहे हैं। दूर रोते हुए खड़े त्रिवेदी परिवार के सदस्य मलवे में फंसे चारों लोगों के जीवन की प्रार्थना कर रहे थे।

Greater Noida Building

नोएडी की एक कंपनी में शाखा प्रबंधक शिव उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में रह रहे अपने माता-पिता के दो बेटों में छोटे हैं। तीन साल पहले बेहतर जीवन की तलाश में वे नोएडा रहने लगे थे।

उनके पिता ने कहा कि शिव परिवार के लिए आशा की किरण है और हमेशा से ही होनहार रहे हैं।

शिव ने दिल्ली आने के मात्र तीन सालों के अंदर इसी मार्च में ये घर खरीदा था।

शिव के एक चाचा ने आईएएनएस को बताया, “उसने काफी कम उम्र में बहुत कुछ हासिल कर लिया था। मेरी आयु 50 है और मैं अपने परिवार के लिए घर नहीं खरीद सकता। लेकिन उसने मात्र 25 वर्ष की आयु में घर खरीद लिया।”

उन्होंने अपने कार्यालय में आखिरी बार मंगलवार को रात लगभग 8.50 बजे बात की थी। लेकिन उसके बाद से उनसे संपर्क नहीं हो सका क्योंकि वे इस हादसे का शिकार हो गए। उनकी इमारत दिल्ली के व्यावसायिक केंद्र कनॉट प्लेस से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित है।

शिव के पिता, बड़े भाई, दो चाचा, चचेरे भाई और अन्य करीबी रिश्तेदार बुधवार सुबह तक घटनास्थल पर पहुंच गए थे।

शिव के भाई राम त्रिवेदी (27) ने आईएएनएस को बताया, “मुझे विश्वास है कि वे मलबे में हैं और उनके जीवित होने का भी पूर्ण विश्वास है लेकिन उन्हें जल्दी निकाले जाने की जरूरत है।”

पेशे से वकील राम ने कहा कि शिव ने शनिवार को गृह प्रवेश पूजा का आयोजन किया था जिसके बाद शिव की मां, साली और उनकी एक वर्षीय बेटी को छोड़कर लगभग सभी लोग मैनपुरी चले गए थे। ये लोग नए घर में कुछ दिन उनके साथ रहने और घर को व्यवस्थित करने के लिए यहीं रुक गए थे।

विचलित राम ने बैठने से मना कर दिया, इस दौरान वे मुट्ठी बांधे लगातार मलबे की तरफ देख रहे थे।

परिजनों ने आरोप लगाया कि इमारत के निर्माण में बिल्डर ने घटिया निर्माण सामग्री का उपयोग किया था। उन्होंने बचाव अभियान के देर से शुरू होने की भी शिकायत की, जिससे इमारत में फंसे हुए लोगों के जीवित बचने की उम्मीद कम हो गई है।

शिव के एक रिश्तेदार ने क्षेत्र में नियमों में ढिलाई का आरोप लगाते हुए कहा, “इतना समय हो गया है और हमारे परिवार का अभी तक कोई पता नहीं लगा है। उन्होंने अगर रात में ही बचाव अभियान शुरू किया होता तो मेरे परिवार को बचाया जा सकता था।”

–आईएएनएस

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