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दुनिया के सबसे रोमांटिक डेस्टीनेशंस में से एक है सैंटा मोनिका

सैंटा मोनिका आपको पूरे दिन व्यस्त रखने और आपका मनोरंजन करने वाले आकर्षणों से भरपूर है।

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Santa Monica Pier Area-Ocean Ave

सैंटा मोनिका का नाम सुनते ही एक ऐसा समुद्रतटीय शहर जेहन में घूमने लगता है, जो अपने अंदर कई तरह के विशेषताएं और आकर्षण समाए हुए हो। मालिबू या फिर वेनिस बीच से अलग सैंटा मोनिका समुद्रतटीय आकर्षण और तटीय इलाकों की परिष्कृत जीवनशैली का शानदार संतुलन पेश करता है। इसी कारण यह जोड़ों के लिए एक बेहद खास गंतव्य बन जाता है। इस शहर में आकर्षणों की भरमार है। अगर आप सैंटा मोनिका घूमने का मन बना रहे हैं तो आपका दिन वैश्विक ब्रांडों के बीच खरीददारी के साथ-साथ समुद्रतट पर रिलैक्स करने और दुनिया को निहारने में कब बीत जाएगा, आपको पता भी नहीं चलेगा। इसका कारण यह है कि सैंटा मोनिका आपको पूरे दिन व्यस्त रखने और आपका मनोरंजन करने वाले आकर्षणों से भरपूर है।

पेश हैं कुछ एसे ही आकर्षण के केंद्र :

सैंटा मोनिका पीयर

सैंटा मोनिका की बात हो तो सैंटा मोनिका पीयर का जिक्र न हो, ऐसा भला कैसा हो सकता है। इसकी लाल और पीले रंग की फेरीज शहर की पहचान बन चुकी हैं। पीयर में पैसिफिक पार्क के अलावा, एक फुल सर्विस एम्यूजमेंट पार्क, कई तरह के रेस्टोरेंट, बार और ऐसी कई दुकाने हैं, जहां से आप अपने लिए यागदार निशानी खरीद सकते हैं। इसके अलावा सैंटा मोनिका पीयर में 200 से अधिक गेम्स से सज्जित एर्केड है। सोलर पावर से चलने वाले पैसेफिक पार्क की फेरी व्हील अद्वीतीय अनुभव प्रदान करती है।

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दिन में यहां का पूरा आकर्षण लूफ हिप्पोड्रोम कोलोजियल में शिफ्ट हो जाता है, जहां स्ट्रीय परफारमेंस होते हैं। यहां आप काटन कैंडी का भी आनंद ले सकते हैं। हाथ में बीयर लिए जब आप यहां से मालिबू और साउथ बे का नजारा लेते हैं तो यह शानदार अनुभव प्रदान करता है। सूर्यास्त के समय आप समुद्रतट पर जाकर स्थानीय संगीत का आनंद ले सकते हैं। लहरों के बीच संगीत की धुनें कानों में रस घोल देती हैं। सैंटा मोनिका पीयर एक एसा डेल्टीनेशन है, जिसे आप कतई नहीं चूकना चाहेंगे क्योंकि यह हर उमर के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

सैंटा मोनिका बीच पर साल के 300 दिन खिली रहती है धूप

सैंटा मोनिका बीच अपने आप में बेहद खास है। यहां साल के 300 दिन धूप खिली रहती है और यही कारण है कि नेशनल ज्योग्राफिक ने सैंटा मोनिका को टाप-10 बीच सटीज इन द वलर्ड में शामिल किया है। प्रशांत महासागर पर स्थित सैंटा मोनिका में साढ़े तीन मील लम्बा चमकता हुआ कोस्टलाइन है। सैंटा मोनिका बीच यहां आने वाले लोगों को यहां रमने और यहां की लाइफस्टाइल को अपनाने और उसमें खो जाने के अनंत अवसर प्रदान करता है। सैंटा मोनिका आने वाले पर्यटकों को बीच पर पैर रखने के साथ सबसे आकर्षक गतिविधियों का दीदार होता है और वे सबकुछ भूलकर उसमें खो जाते हैं।

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सैंटा मोनिका बीच की खोज 1875 में जान पी. जोंस ने किया था। जोंस ने इस स्थान को खरीद लिया और 8.3 वर्ग मील क्षेत्रफल वाले इस शहर की नींव रखी। तब से लेकर आज तक सैंटा मोनिका दुनिया की सबसे आकर्षक बीच डेस्टीनेशंस में जगह बना चुका है। 1909 में यहां पहला प्लेजर पीयर खुला और इसके बाद से यह स्थान हालीवुड स्टार्स के लिए पसंदीदा बन गया। साथ ही 1920 के दशक में यह इंटरनेशनल फिटनेस क्रेजी लोगों का पसंदीदा डेस्टीनेशन बना और फिर 1980 के दशक में यहां लेजेंड्री होटल कलेक्शन खुले। सैंटा मोनिका के साथ एक समृद्ध इतिहास जुड़ा है और यही कारण है कि यह लगातार दुनिया भर के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता रहता है।

शापिंग के लिए भी परफेक्ट डेस्टीनेशन

अगर आपको समुद्रतट के अलावा शापिंग पसंद है तो सैंटा मोनिका आपके लिए परफेक्ट डेस्टीनेशन है। यहां काफी कम दूरी पर कई शापिंग डेस्टीनेशन हैं, जहां आपको शानदार सेल और काफी सस्ते में डिजाइनर मटेरियल मिल जाएंगे। आप दुनिया भर में मशहूर जिस किसी ब्रांड का नाम आप लेंगे, वह यहां मिल जाएगा। मोंटाना एवेन्यू से लेकर ब्लूमिंगडेल और नार्डस्ट्राम तक, हर जगह आपको बेहतरीन ब्रांड काफी सस्ती कीमत में मिल जाएंगे। सैंटा मोनिका में आप जहां चाहें शापिंग कर सकते हैं क्योंकि यहां आब्शंस की कोई कमी नहीं।

सबको आकर्षित करता है मोंटाना एवेन्यू

सैंटा मोनिका के उत्तरी इलाके में स्थित मोंटाना एवेन्यू सबको अपनी ओर आकर्षित करता है। यह 150 से अधिक रेस्टोरेंट्स और रीटेलर्स का घर है। डाउनटाउन सैंटा मोनिका से थोड़ी दूरी पर स्थित मोंटाना एवेन्यू प्रोमेनेड और पीयर की गहमागहमी से दूर एक शांत स्थान है। यह स्थान लेट नाइट शापिंग के लिए भले ही उपयुक्त न हो लेकिन सनराइज से लेकर सनसेट तक यह शापिंग के लिए परफेक्ट डेस्टीनेशन है। यहां शापिंग के समय ए-लिस्ट सेलीब्रिटीज, शहर से बाहर के लोग, स्ट्रालर्स लिए टहलते स्थानीय लोग दिख जाते हैं। यहां आने वाला क्राउड काफी रिलैक्स रहता है क्योंकि यहां शापिंग के अलावा खाने-पीने के भरपूर आब्शन हैं।

देसी और विदेशी पर्यटक जमकर लेते हैं नाइटलाइफ का लुत्फ

सैंटा मोनिका लाइटलाइफ न सिर्फ स्थानीय लोगों को अपनी ओर खींचता है बल्कि यहां देश और दुनिया से रात की मस्ती के लिए यहां पहुंचते हैं। लास एंजेलिस इलाके से हजारों लोग रोजाना सैंटा मोनिका आते हैं और जमकर मौज मस्ती करते हैं। सैंटा मोनिका में रात में मौज-मस्ती के कई साधन हैं। प्रशांत महासागर का रुख किए यहां के रूफटॉप रेस्टोरेंट और बार्स सबको अपनी ओर खींचते हैं।

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शांगरीला का ओएनवाईएक्स या फिर सैंटा मोनिका का सोनोमना वाइन गार्डन बार काफी लोकप्रिय हैं। रात भर चुस्कीयां लेते हुए नाचते हुए सुबह कर देने के लिए सर्किल बार या फिर बार कोपा अपने आप में खास तरह का आकर्षण है। इसके अलावा शहर में कई डाइव बार्स भी हैं, जिनमें चेज जे काफी फेमस है।

सैंटा मोनिका खाने-पीने के शौकीनों के लिए भी है शानदार जगह

सैंटा मोनिका में कई मशहूर रेस्टोरेंट हैं। यहां कई शेफ अपनी कला से लोगों के अच्छे भोजन की चाह को शांत करते हैं। फिग, हकलबरी कैफे एंड बेकरी, टार एंड रोजेज जैसे रेस्टोरेंट यहां हैं और इनके यहां आने का कारण यह है कि सैंटा मोनिका का लोकेशन शानदार है। सैंटा मोनिका फ्यूजन क्यूजीन का जन्मदाता है। यह अमेरिका का इंटरनेशनल डाइनिंग डेस्टीनेशन है क्योंकि दुनिया भर के रेस्टोरेंट चेन और शेफ यहां आकर अपनी पाककला दिखाते हैं और ढेरों धन कमाते हैं।

लक्जरी होटल्स, रेजाट्स और स्पा की है भरमार

सैंटा मोनिका में लक्जरी होटल्स, रेजाट्स और स्पा की भरमार है। इसका कारण यह है कि यह एक इंटरनेशनल डेस्टीनेशन है। यहां के होटल हालीवुड के होटलों से बिल्कुल अलग हैं। यहां के होटल सीफेसिंग हैं और लोकल टच लिए हुए हैं। यहां बीच पर अनेकों होटल और रेजाट्स मिल जाएंगे, जहां हालीवुड के इलीट लोग आराम करते देखे जा सकते हैं। होटलों और रेजार्टस के अलावा कई ऐसे बंग्लो हैं, जहां रात की जिंदगी बड़ी सुकून भरी होती है।

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साथ ही साथ यहां अनेकों स्पा हैं, जो दिन भर मौज-मस्ती करते, बीच पर खेलकर और सर्फि ग करते थके लोगों को सुकून देते हैं। यहां के स्पा, योगा स्टुडियोज जूसिंग बार्स काफी लोकप्रिय हैं।

कला और संस्कृति का अद्भुत संगम

सैंटा मोनिका लॉस एंजेलिस काउंटी का हिस्सा है लेकिन यह दक्षिणी केलीफोर्निया में कला और सांस्कृतिक जीवनशैली के लिए अहम किरदार निभाता रहा है। असल में यहां के आधे के करीब लोग किसी ने किसी रूप में कला से जुड़े हुए हैं। सैंटा मोनिका में अनेकों राष्ट्रीय स्तर की आर्ट गैलरियां, पब्लिक आर्ट सेंटर्स, प्रमुख म्यूजियम, थिएटर हैं जहां हमेशा कुछ न कुछ चलता रहा है और स्थानीय तथा बाहर से आए लोग परफामिर्ंग आर्ट, प्ले और कंसटर्स का लुत्फ लेते रहते हैं।

–आईएएनएस

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अरे, ये ‘तेल-पानी का मिलन’ नहीं, मोदी राज का मर्सिया है!

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MODI-SHAH

बेशक़, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को विपक्षी एकजुटता ने बेचैन कर दिया है। इससे तिलमिलाए मोदी ने अपने चिर-परिचित अन्दाज़ में ताबड़तोड़ और लम्बी-चौड़ी फेंकने का रास्ता थाम लिया। उनकी ताज़ा पेशकश है कि विपक्ष का निर्माणाधीन गठबन्धन, जो ‘तेल-पानी का बेमेल संगम है, जिसके बाद न तेल काम का रहता है और ना पानी!’ शायद, मोदी भूल चुके हैं कि वो ख़ुद भी तेल-पानी के बेमेल संगम वाली उस नाँव पर सवार हैं, जिसे एनडीए यानी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबन्धन कहते हैं।

दरअसल, संघ-बीजेपी और मोदी-शाह इस ख़ुशफ़हमी में हैं कि एनडीए के दल एक-दूसरे के साथ इसलिए गलबहियाँ डाले हुए हैं क्योंकि वो प्राकृतिक गठबन्धन है। जबकि ज़मीनी सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। उद्धव की शिवसेना, महबूबा की पीडीपी और चन्द्रबाबू की टीडीपी का अफ़साना सबके सामने है! ये नये किस्से हैं। पुराने तज़ुर्बों की बातें तो बहुत लम्बी-चौड़ी हैं। अटल बिहारी वाजपेयी आज इस हालत में नहीं हैं कि वो अपने सियासी वंशजों को गठबन्धन पर मुँह निपोड़ने से आगाह कर सकें। दरअसल, मोदी-शाह को ये समझना होगा कि गठबन्धन कभी प्राकृतिक नहीं होता।

मजबूरी और आपसी निर्भरता हरेक गठबन्धन की बुनियादी शर्त है। फिर भी कुछ गठबन्धन स्वाभाविक होते हैं तो कुछ सत्तालोलुप और मौक़ापरस्त। अच्छा हो या बुरा, हरेक गठबन्धन सियासी ही होता है। वाम मोर्चा और शिवसेना-अकाली-बीजेपी के गठबन्धन को स्वाभाविक माना जा सकता है। जबकि नीतीश, पासवान और महबूबा जैसों की नज़दीकी विशुद्ध रूप से सत्तालोलुप और मौक़ापरस्त गठबन्धन की श्रेणी में आएगी। इसीलिए मौक़ापरस्तों को बार-बार दावा करना पड़ता है कि वो बीजेपी के साम्प्रदायिक एजेंडे के ख़िलाफ़ हैं। इनके पास कभी इस सवाल का जबाब नहीं होता कि यदि वो संघियों की साम्प्रदायिकता ख़िलाफ़ हैं तो उस पर नकेल कसने के लिए करते क्या हैं?

गठबन्धन की एक और किस्म उन दलों से जुड़ी है जिनका अपने मुख्य विरोधी के रूप में काँग्रेस या बीजेपी से मुक़ाबला होता है। पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी ने टिकाऊ गठबन्धन की मिसाल क़ायम की, तो उन्हें सत्ता से बेदख़ल भी गठबन्धन ने ही किया। ऐसे दोनों गठबन्धनों यानी एनडीए और यूपीए के जन्म के दरम्यान वाजपेयी के कई सहयोगी पाला बदल चुके थे। गठबन्धनों में आना-जाना भले ही सामान्य हो, लेकिन बीजेपी से छिटकने वाले दलों की संख्या काँग्रेस के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा रही है। एक दौर था जब करूणानिधि, नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, मायावती, फ़ारूख़ अब्दुल्ला, ओम प्रकाश चौटाला और चन्द्रबाबू नायडू ने बीजेपी की मदद से सत्ता-सुख भोगा। बीजेपी से गलबहियाँ का इनका तज़ुर्बा ऐसा रहा कि अगली बार इन्होंने भगवा गोदी से तौबा कर ली। जयललिता और नवीन पटनायक ने भले ही समय-समय पर एनडीए की मदद की, लेकिन दोनों ने बीजेपी से ख़ासी दूरी भी बनाये रखी।

Opposition leaders

In Pics: Opposition unity on display for 2019 as HD Kumaraswamy sworn in as Karnataka Chief Minister

इसीलिए जिन्हें विपक्षी दलों का निर्माणाधीन महागठबन्धन, ‘तेल और पानी के मेल’ जैसा दिख रहा है, उन्हें ज़रा अपने गठबन्धन के गिरेबान में भी झाँक लेना चाहिए। अरे, गठबन्धन का अर्थ ही है बेमेल को मेल बनाने का कौशल! दूसरों पर ‘तेल और पानी के मेल’ का कीचड़ फेंकने वाले नरेन्द्र मोदी को क्या याद है कि बेमेल जोड़-तोड़ की सबसे बड़ी मिसाल तो वो ख़ुद हैं! पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर उन्होंने ऐसा बेमेल गठजोड़ बनाया कि वो न तो वर के काम आया और ना वधू के! उस गठबन्धन की गाँठ भी इतनी वाहियात निकली कि वर-वधू में से कोई भी उससे पिंड छुड़ाने नहीं गया। दोनों अभी तक गाँठ को दुम में लटकाये ढो रहे हैं!

धार्मिक अनुष्ठान के तहत वैदिक मंत्रोचार के बीच स्थापित वो गठबन्धन तकनीकी रूप से आज भी जीवित है। लेकिन जनाब नरेन्द्र मोदी और उनके प्रथम भक्त अमित शाह ने तो कभी उस गठबन्धन को तेल-पानी का संगम नहीं कहा। कभी उस नारी के हक़, गरिमा और स्वाभिमान की परवाह नहीं की जिसे बाक़ायदा, विधि-विधान से और गाजे-बाजे के साथ ब्याह कर लाया गया था। इसीलिए इन्हें जितनी परवाह तीन तलाक़ और हलाला से पीड़ित महिलाओं के अधिकारों की होती है, उतनी मुज़फ़्फ़रपुर, देवरिया, हरदोई, पटना जैसी जगहों पर रहने वाली बेसहारा महिलाओं के लिए क्यों नहीं होती?

बीजेपी की नैतिकता में यदि ज़रा भी दम होता तो इन दुष्कर्मों और बर्बरता की वारदातों के बाद वहाँ की सरकारें एक पल भी सत्ता में नहीं रह पातीं। ऐसे मामलों में प्रधानमंत्री को ‘तेल और पानी का बेमेल संगम’ कहीं नज़र नहीं आता। इसी तरह, बंगाल में दुर्गा पूजा में ख़लल पड़ने पर अमित शाह, सचिवालय की ईंट से ईंट बजा देने की धमकी तो देते हैं, लेकिन बेसहारा नारियों के ठिकानों पर साक्षात दुर्गाओं के साथ हो रहे ज़ुल्म को लेकर ना तो उनका ख़ून खौलता है और न ही उन्हें कहीं कोई ईंट दिखायी देती है।

भगवा ख़ानदान से जुड़ा एक भी नेता, कार्यकर्ता या ट्रोल ऐसा नहीं है, जिसे इस बात की चिन्ता खाये जा रही हो कि मोदी सरकार ने अभी तक अपना एक भी वादा निभाकर नहीं दिखाया! किसी मोदी भक्त को परवाह नहीं है कि चुनाव में विकास और अच्छे दिन की छटा को जनता को कैसे दिखाया जाएगा? हिन्दू-मुसलमान में उलझे भक्तों को अब एनआरसी के रूप में नया शिगूफ़ा मिल गया है। गाय-गोबर-बीफ़-लिंचिंग, लव-जिहाद, एंटी रोमियो, दलित उत्पीड़न जैसे कारतूसों को फ़ुस्स होता देख भगवा ख़ेमे में बेहद मायूसी है। इसीलिए विपक्षी एकजुटता का मज़ाक उड़ाया जा रहा है।

विपक्षी एकता के अलावा बीजेपी के हरेक नेता को एनआरसी यानी नैशनल रज़िस्टर ऑफ़ सिटीजन्स की चिन्ता भी बहुत सता रही है। भगवा ख़ानदान को लगता है कि एनआरसी के रूप में उसे अलाद्दीन का चिराग़ या हर मर्ज़ की दवा मिल गयी है! दरअसल, कल तक जो भारत को काँग्रेस मुक्त करने का दावा कर रहे थे, उसे मरा हुआ बता रहे हैं, उन्हें अब ‘मरी हुई काँग्रेस और ज़िन्दा मुसलमानों’ का ख़ौफ़ जीने नहीं दे रहा। मोदी बेचैन हैं कि वो जिस काँग्रेस को मृतप्राय बताते नहीं अघाते थे, जनता उसे पुनर्जीवित कर रही है। तमाम विपक्षी दिग्गज काँग्रेस के साथ लामबन्द होकर उस फिर से सत्ता में लाना चाहते हैं, जिसे बड़ी मुश्किल से, असंख्य से झूठ फैलाकर मोदी की बीजेपी और एनडीए ने सत्ता से बाहर किया था।

अपने जुमलेबाज़ और अहंकारी स्वभाव की वजह से मोदी ये समझने में असमर्थ हैं कि देश को उनसे मुक्ति दिलाने के लिए शेर और बकरी भी एक घाट पर पानी पीने के लिए तैयार हो गये हैं। सियासत, इसीलिए अनन्त सम्भावनाओं की विधा है! इसीलिए, कल तक विकास की बाँसुरी बजा रहे अमित शाह अब बौराये हुए हैं कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर उगले बग़ैर हिन्दुओं को झाँसा कैसे देंगे? उनकी इसी दुविधा को देखते हुए संघ ने बाँग्लादेशी घुसपैठियों के लिए ‘हिन्दू अन्दर, मुस्लिम बाहर’ की नीति बनायी है। जो भी इस नीति में साम्प्रदायिकता, हिन्दू तुष्टिकरण या हिन्दू राष्ट्र जैसी बातों की बू सूँघने की ज़ुर्रत करेगा, उसे देशद्रोही माना जाएगा और फ़ौरन लिंचिंग की सज़ा मिलेगी!

2019 में बीजेपी ने 350 सीटें जीतने वाला मुँगेरी लाल का अद्भुत सपना देखा है। इस सपने का झाँसा देने के लिए फेंकने की आदत से लाचार होने अनिवार्य है। इसीलिए नरेन्द्र मोदी को रोज़ाना कुछ न कुछ फेंके बग़ैर चैन नहीं मिलता। वो देश में हों या विदेश में, फेंकने का योगाभ्यास जारी रहता है। फेंकना अब उनके लिए शौक़ नहीं बल्कि नशा बन चुका है। एकजुट विपक्ष उन्हें नशामुक्त कर देगा, इसीलिए वो अपने विरोधियों के लिए हमेशा उटपटांग शब्द ही ढूँढ़ते रहते हैं। अभी राज्यसभा में इसी नशे की वजह से उन्होंने ‘बीके’ में ‘बिके’ बना दिया। इससे प्रधानमंत्री की गरिमा को ऐसी चोट पहुँची जैसा 70 साल में कभी नहीं हुआ। इतिहास में पहली बार प्रधानमंत्री के शब्द सदन की कार्यवाही से बाहर किये गये।

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नरेन्द्र मोदी अपनी छीछालेदर से कभी शर्मिन्दा नहीं होते। शायद, कम शिक्षित होने की वजह से ऐसा होता हो। मुमकिन है कि कामदार और चौकीदार जैसे जुमलों के अति-इस्तेमाल की वजह से उनका मन-मस्तिष्क वैसे ही ढीठ हो गया हो जैसे कई किस्म के एंटीबायटिक असरहीन बन जाते हैं। मोदी की तरह अमित शाह को भी ‘लपलपाती जीभ’ वाले असाध्य रोग ने जकड़ रखा है। इस रोग के लक्षणों ने 2013 में ही उस वक़्त महामारी का रूप ले लिया था जब गुजरात मॉडल, अच्छे दिन, महँगाई की मार, पेट्रोल और डॉलर के भाव, काला धन वापस लाने, सबको 15–15 लाख रुपये देने जैसे जुमलों ने धमाका किया था। तब भारत की भोली-भाली जनता समझ नहीं पायी कि उन्हें उल्लू बनाया गया है।

मज़े की बात ये है कि 2014 के बाद तीन साल तक जनता के उल्लू बनने का संक्रमण राज्य दर राज्य फैलता गया। संघी मदमस्त थे कि जनता में इस बात की होड़ लग चुकी है कि अन्य राज्यों की तरह हम भी कम से कम एक बार तो बीजेपी के झूठे वादों और इरादों को चखकर ज़रूर देखेंगे। लेकिन जिस तरह से तमाम विपक्षी नेताओं ने बीजेपी को एक बार आज़माने के बाद उसे अगली बार के लिए भरोसेमन्द नहीं पाया, उसी तरह से तमाम उपचुनावों में जनता भी उस बीजेपी से अपना दामन छुड़ाने लगी, जिसे थोड़े वक़्त पहले उसने चुना था।

इसीलिए, विपक्षी एकता को ‘तेल-पानी का मिलन’ बताने वाले गाँठ बाँध लें कि उनका नज़रिया ‘दिल बहलाने को ग़ालिब ख़्याल अच्छा है’ के सिवाय और कुछ नहीं है! यही मोदी राज का मर्सिया है! फ़िलहाल, बीजेपी की झूठ फैलाने वाली महामारी का प्रकोप देश को अभी और नौ महीने तक सताता रहेगा। तब तक जनता को ‘तेल-पानी के बेमेल मिलन’, ‘हिन्दू अन्दर, मुस्लिम बाहर’ जैसी असंख्य बातें वैसे ही बतायी जाएँगी जैसे ‘अच्छे दिन’ का खेल हुआ था!

मुकेश कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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70 साल में पहली बार किसी प्रधानमंत्री के शब्द संसद की कार्रवाई से हटाये गये

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भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि प्रधानमंत्री के शब्दों को आपत्तिजनक, अमर्यादित और अवांछित मानते हुए उसे सदन कार्यवाही से हटा दिया गया है! गुरुवार, 9 अगस्त को राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव हुआ। इसमें विजयी हुए एनडीए के उम्मीदवार हरिवंश नारायण सिंह को बधाई देने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो भाषण दिया, उसके एक अंश को सदन की कार्यवाही से हटा दिया गया है। प्रधानमंत्री के शब्दों पर राष्ट्रीय जनता दल के सदस्य मनोज झा ने सख़्त ऐतराज़ जताया था। उन आपत्तियों को सही पाने के बाद सभापति वेंकैया नायडू ने मोदी के शब्दों को राज्यसभा की कार्यवाही से बाहर कर दिया।

मोदी ने कहा था कि “ये ऐसा चुनाव था, जिसमें दोनों तरफ ‘हरि’ थे, लेकिन एक के नाम के आगे बी.के. था – ‘बी.के. हरि’, कोई न बिके। इधर भी हरि थे, लेकिन नाम के आगे कोई बी.के., वी.के. नहीं था। मैं श्री बी.के. हरिप्रसाद जी को भी…।” इसी बयान से वेंकैया नायडू ने ‘कोई न बिके’ वाले शब्दों को राज्यसभा की कार्यवाही से निकाल दिया है। क्योंकि मनोज झा का कहना था कि ‘बिके, बिका, बिकना’ जैसे शब्द का इस्तेमाल ग़लत मंशा से किया गया है। इसीलिए उसे दुर्भावनापूर्ण और आपत्तिजनक मानते हुए सदन की कार्यवाही से बाहर किया जाए।

सभापति वेंकैया नायडू ने इस पर ग़ौर फ़रमाने का वादा किया। इसके बाद राज्यसभा सचिवालय की ओर से जानकारी दी गयी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मनोज झा और केन्द्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्यमंत्री रामदास अठावले के भी आपत्तिजनक शब्दों को सदन की कार्यवाही से बाहर कर दिया गया है। इसी प्रसंग में रामदास अठावले से तुकबन्दी भरी कविता सुनाते हुए कहा था कि “लेकिन हरिप्रसाद को काँग्रेस ने दे दिया है धोखा”। इस वाक्य से ‘धोखा’ शब्द को कार्यवाही से हटा दिया। राम दास अठावले के बेतुके और आपत्तिजनक शब्दों को पहले भी कई बार संसद की कार्यवाही से हटाया गया है। लेकिन किसी प्रधानमंत्री के शब्द को ग़लत पाये जाने का ये अपनी तरह का पहला मामला है।

दरअसल, नरेन्द्र मोदी अक्सर ही अपनी लपलपाती ज़ुबान की वजह से विपक्ष के निशाने पर रहते हैं। उन्हें अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए अमर्यादित और अनुपयुक्त शब्दों के इस्तेमाल से कभी गुरेज नहीं होता। विरोधियों से चुटकी लेने की आड़ में मोदी शब्दों की लक्ष्मण रेखा को अक्सर तोड़ते नज़र आते हैं। उन्हें इसमें बहुत मज़ा आता है। वो इसे अपनी बहादुरी समझते हैं। तभी तो उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ‘रेनकोट पहनकर नहाने वाला’ और ‘देशद्रोही’ कहने में अपार आनन्द की अनुभूति होती है। मोदी ने राहुल, सोनिया, ममता, लालू, नीतीश, मायावती, मुलायम जैसे अपने हरेक राजनीतिक विरोधी के लिए अक्सर ही निम्नस्तरीय शब्दों का इस्तेमाल किया है।

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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‘नये भारत’ में गेरुआ रंग त्याग-तपस्या का नहीं बल्कि आतंकियों का हुलिया बना

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Kanwariyas vandalise vehicle

महज 50 महीने में ही नरेन्द्र मोदी के सपनों का ‘नया भारत’ बनकर तैयार हो चुका है! बीजेपी के आलीशान मुख्यालय के डेढ़ साल में बनकर तैयार होने के बाद 50 महीने की अल्पावधि में ‘नये भारत’ का निर्माण हर मायने में ऐतिहासिक उपलब्धि है! इस ‘नये भारत’ में उत्तर प्रदेश पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक प्रशान्त कुमार जहाँ काँवड़ियों पर हेलिकॉप्टर से पुष्प वर्षा करते हैं, वही काँवड़िये कभी बुलन्दशहर में पुलिस के वाहन में तोड़फोड़ करते हैं, तो कभी मेरठ में इसलिए बलवा किया जाता है कि वहाँ काँवड़ियों को एक मीट की दुकान खुली दिख गयी।

बरेली के खेलुम गाँव से 250 स्थानीय हिन्दुओं और मुसलमानों ने इसलिए पलायन कर लिया कि वहाँ से शिवभक्त काँवड़ियों का जुलूस गुज़रने वाला है। ग्रेटर नोएडा में काँवड़ियों के दो गुटों के बीच हुई हिंसक झड़प को भी ‘नये भारत’ की गौरवशाली घटना के रूप में देखा जा सकता है। गोरखपुर में एक दारोगा का वर्दी में योगी आदित्यनाथ को शाष्टांग करना भी ‘नये भारत’ की अद्भुत उपलब्धि है। साध्वी प्राची जैसे भगवा प्रचारक ने तो ये माँग करके ‘नये भारत’ में चार चाँद जड़ दिये कि काँवड़-यात्रा को देखते हुए मस्जिदों के लाउडस्पीकरों पर रोक लगा दी जाए। दिल्ली में भी काँवड़ियों ने एक कार को अपना ताँडव रूप दिखाकर ‘नये भारत’ का जश्न मनाया।

‘नये भारत’ का ही जश्न मुज़फ़्फ़रपुर और देवरिया के बालिका आश्रय गृहों में रहने वाली बच्चियों को देह-व्यापार में ढकेलकर मनाया गया। इसे भी उन्हीं हिन्दुओं ने अन्ज़ाम दिया जो नवरात्रियों में कन्या-पूजन का पुण्य बटोरते हैं। हरदोई में भी ऐसे ही एक नारी निकेतन पर ज़िलाधिकारी की गाज़ गिरी जहाँ सरकारी अनुदान की बन्दरबाँट के लिए रिकॉर्ड में महिलाओं की संख्या को बढ़ाचढ़ाकर दिखाया गया था। ‘नये भारत’ की ऐसी तमाम उपलब्धियों में लिंचिंग की अनेक गौरवशाली घटनाएँ भी शामिल हैं। मुमकिन है कि ऐसे पाप मोदी युग से पहले भी होते रहे होंगे, लेकिन मौजूदा ‘नये भारत’ में बीते ज़माने के पापों का उद्धार करके उन्हें पुण्य का जामा पहनाया जा चुका है। इसीलिए मोदी राज का ‘नया भारत’ अद्भुत है! अतुलनीय है!

‘नये भारत’ की इन ताज़ातरीन उपलब्धियों के केन्द्र में काँवड़ियों का वो गेरुआ या भगवा रंग भी है जो कभी त्याग और वैराग्य का प्रतीक होता था। लेकिन 1990 के दशक वाले अयोध्या कांड के दौर के बाद यही गेरुआ रंग उन्मादी, दंगाई, बलवाई, व्याभिचारी और आतंकवादियों की रंगत बन गया। कालान्तर में गेरुआ की आड़ में हरेक कुकर्म होने लगे। शिवसैनिकों और बजरंगदलियों को भी गेरुआ रंग बहुत प्रिय रहा है। गेरुआ धारण करते ही उनका ख़ून भी वैसे ही उबलता है, जैसे काँवड़ियों का रक्तचाप और मानसिक सन्तुलन बेक़ाबू हो जाता है। इसीलिए ‘नये भारत’ में गेरुआ रंग त्याग-तपस्या का नहीं बल्कि हिन्दू आतंकवादियों का पसन्दीदा हुलिया बन चुका है। काँवड़िये जब हाथों में तिरंगा थाम लेते हैं तो वो ऐसे और उदंड हो जाते हैं, जैसे राष्ट्रसेवा की तीर्थयात्रा कर रहे हों!

मोदी राज के ‘नये भारत’ में हिन्दू आतंकियों को हिन्दू तालिबानी भी कह सकते हैं और हिन्दुत्व के क्रान्तिकारी भी! इन गेरुआधारियों को संघ-बीजेपी की खुली शह हासिल है। लिंचिंग इनकी भाषा का बुनियादी व्याकरण है। मौजूदा दौर में यही राष्ट्रभक्त और धर्मभीरू लोगों की जमात भी है। यही सोशल मीडिया वाले पालतू ट्रोलर भी हैं। इनकी मानसिकता ही अब पुलिस की वर्दी में घूमते सुपारीबाज़ हत्यारों में भी देखी जा सकती है। गेरुआ से ओतप्रोत सत्ता प्रतिष्ठान ऐसे पुलिसवालों को भी वैसे ही अपनी भ्रष्ट जाँच एजेंसियों से सुरक्षा प्रदान करवाता है, जैसे काँवड़ियों को अभय-दान हासिल होता है। यही लिंचिंग-वीर कभी-कभार मीडिया के स्टिंग ऑपरेशन में अपनी वीरगाथा सुनाते हुए भी दिख जाते हैं!

अब सवाल ये है कि क्या ये उत्पाती गेरुआधारी हमारे-आपके परिवारों के ही भटके हुए, अल्प-शिक्षित, आंशिक रोज़गारधारी लोग नहीं हैं? क्या इनके दिमाग़ को ही वैसे विषाक्त (indoctrinated) नहीं किया गया है, जैसा हम पाकिस्तान से आने वाले आतंकियों के मामले में देखते आये हैं? गेरुआधारी हिन्दू आतंकियों को पाकिस्तान, सीमापार के शिविरों से नहीं भेजता। इन्हें तो नागपुर अकादमी की शाखाएँ दिन-रात भारत के ही कोने-कोने में दीक्षित और प्रशिक्षित करती रहती हैं। यही गेरुआधारी थोड़े दिनों बाद गणेश-उत्सव और फिर दुर्गापूजा और कालीपूजा के वक़्त भी उन्माद फैलाते नज़र आएँगे। यही लोग मोदी-राज की पकौड़ा-योजना को भी सफलता की नयी बुलन्दियों पर पहुँचा रहे हैं, ताकि मोदी-शाह के ‘नये भारत’ को यथाशीघ्र संघ प्रमुख मोहन भागवत के सपनों वाला ‘विश्व-गुरु’ बनाया जा सके!

अगला सवाल है कि विश्व-गुरु के गेरुआधारी परम शिष्यों की करतूतों को शर्मनाक या दुःखद कैसे कहा जा सकता है? जिस दिन बहुसंख्यक-मध्यमवर्गीय-मन्दबुद्धि-सवर्ण हिन्दू समाज इन सवालों का जबाब जान जाएगा, उसी दिन मक्कारों का राज ख़त्म हो जाएगा। हालात वैसे ही अपने आप सुधरने लगेंगे, जैसे ज्वलनशील पर्दाथों के जलकर खाक़ हो जाने के बाद बड़ी से बड़ी आग भी अपने आप शान्त हो जाती है!

फ़िलहाल, आप चौकन्ना रहकर इस बात का हिसाब रख सकते हैं कि किन-किन नेताओं ने गेरुआ परिधानों में घूम रहे काँवड़ियों के उत्पातों की निन्दा की और उनके ख़िलाफ़ ‘कड़ी कार्रवाई’ की दुहाई दी! ग़ौर कीजिएगा कि कितने भगवा बयान-वीर ये कहने का साहस जुटा पाते हैं कि ‘क़ानून अपना काम करेगा!’ अरे, क़ानून कहीं होगा, तभी तो कुछ करेगा! अभी तो आप क़ानून-रहित भारत में आनन्दित होने का सुख लीजिए, यदि ले सकें तो!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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