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घिनौने भारतीयों के नियम

उन्मादियों के ‘अच्छे दिन’ में इंसाफ़, गरिमा और बहस की गुंज़ाइश ही नहीं!

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2014 के बाद से घिनौने भारतीयों की तादाद में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ है। इन्होंने राजनीतिक सत्ता का भारी चोट पहुँचायी है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अब ख़बरें दिखाने के नहीं बल्कि ऐसे नज़रिया को फैलाने के सरकारी भोंपू बन गये हैं, जो खोखले मूल्यों पर आधारित हैं। लोकतंत्र का इम्तिहान चल रहा है। देश में तरह-तरह के उन्मादियों का बोलबाला है।

तर्कवादी गौरी लंकेश की हत्या भी बिल्कुल वैसे ही की गयी है, जैसे सुबह की सैर कर रहे डॉ नरेन्द्र डाभोलकर को पुणे में 20 अगस्त 2013 को मार गिराया गया। इसी तरह, कोल्हापुर में गोविन्द पंसारे को फरवरी 2015 में उस वक़्त गोली मार दी, जब वो अपनी पत्नी उमा के साथ टहल रहे थे। हत्यारे मोटरसाइकिल पर सवार थे। धारवाड में अगस्त 2015 में एम एम कलबुर्गी को भी यही दिन देखने पड़े। किसी भी मामले में अभी तक हत्यारों का पता नहीं लगा है। ये तो हमारी पुलिस नकारा है या फिर उसकी जाँच सही नहीं है।

‘हिन्दू-विरोधी’ तर्कवादियों को सबक सिखाया जा रहा है। यही काम सड़कों पर पीट-पीटकर मार डालने वाले भी कर रहे हैं। ये लोग दलितों और मुसलमानों को ऐसे अपना निशाना बना रहे हैं, मानो यही उनका पेशा हो! कहीं कोई पकड़ा भी गया तो उसके ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की नौबत नहीं आती। जो धरे भी जाते हैं, उनके ख़िलाफ़ इंसाफ़ का पहिया जोश से नहीं घूमता। बड़ी आसानी से ज़मानत मिल जाती है। राजनीति में मौजूद घिनौने भारतीयों की चाहत ख़ून का बदला ख़ून बन चुकी है। हिंसा, दस्तूर बन चुका है।

टीवी चैनलों पर हमें ऐसे घिनौने चेहरे ही दिखते हैं, जो एक ख़ास मानसिकता का प्रलाप करने में गर्व महसूस करते हैं। तर्क का कोई स्थान नहीं बचा। संवाद की कोई गुंज़ाइश नहीं है। तीख़ी राय को एंकर का समर्थन मिलता है। तार्किक बातें करने वालों की आवाज़ दबा दी जाती है और बेहूदा बातों के ज़रिये दर्शकों को मनोरंजन किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बड़े हिस्से की दिलचस्पी सच को जानने और बताने में नहीं रही। नज़रिया भी काल्पनिक ही होता है।

घिनौने लोगों की अगली प्रजाति सोशल मीडिया पर निन्दा करने वालों (ट्रोलर्स) की है। ये लोग ग़ाली-ग़लौज़ करते हैं, उत्तेजकता दिखाते हैं, किसी बात को समझने-समझाने से इनका कोई ताल्लुक नहीं होता, ये असहिष्णु बाहुबलियों की तरह बर्ताव करते हैं। जिन बातों से वो असहज होते हैं, उसका रुख़ ही मोड़ देते हैं। अज्ञानियों में सच को जानने की ख़्वाहिश नहीं होती। भाड़े के निन्दकों के शब्द भी अभद्र होते हैं। वो आत्मरक्षा के लिए आक्रमण को ही सही समझते हैं। निन्दकों को चुनौती देना या उनसे सवाल पूछना बेहद ख़तरनाक है। वो ग़ालियाँ देने लगते हैं। इस दौर में घिनौने भारतीयों की पौ-बारह है और हमें ख़ामोश रहना है।

घिनौने भारतीयों की एक और क़िस्म उस वक़्त नज़र आती है, जब सरकारी उपेक्षा और लापरवाही की वजह से गोरखपुर और फ़र्रूख़ाबाद में मासूमों की मौत होती है। उनकी दलील होती है कि इंसेफ़लाइटिस से पहले भी मौते होती रही हैं। मौत ऑक्सीजन की कमी की वजह से होती है, लेकिन तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा जाता है। मीडिया को ख़ामोश कर दिया जाता है। सरकार अपने ढर्रे पर ही चलती रहती है। घिनौने भारतीयों को लोग देखते रहते हैं, वो बेफ़िक्र रहते हैं, उन्हें कोई उन्हें छूता तक नहीं।

ग़रीब को अस्पताल की फर्श पर खाना परोसा जाता है। फिर भी अन्तर्आत्मा नहीं झकझोरती। मृतकों के प्रति अमानवीय रवैये से भी हमारी गरिमा अप्रभावित रहती है। हम लाशों के ठेले पर, साइकिल पर और यहाँ तक कि कंधों पर ढोये जाने को देखते रहते हैं। 16 दिसम्बर 2012 को राजधानी दिल्ली में हुए निर्भया कांड में भले ही सज़ा-ए-मौत मिली हो, लेकिन बलात्कार की वारदातें घट नहीं रहीं। सरकार की सेवा में लगे कान्ट्रेक्ट टीचर्स को दस हज़ार रुपये महीना या इससे भी कम के वेतन पर काम करना पड़ता है।

अध्यापक, हमारी सबसे उपेक्षित सम्पदा हैं। उनके पास युवाओं को दिशा देने लायक साधन नहीं हैं। ग्रामीण इलाकों में तो कई जगह छात्र-शिक्षक अनुपात 90:1 है। अध्यापकों की ग़ैरहाज़िरी सामान्य बात है। शिक्षा से जुड़ी वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक़, कक्षा पाँच के छात्र सिर्फ़ कक्षा दो तक की ही पुस्तकें पढ़ पाते हैं। युवाओं की शिक्षा के प्रति घिनौने भारतीयों की कोई प्रतिबद्धता नहीं है। उच्च शिक्षा संस्थानों में भरपूर भ्रष्टाचार है। मेडिकल शिक्षा भी उन माफ़ियाओं के शिकंजे में है जो दाख़िलों में ही हेराफेरी कर लेते हैं।

रईसों के लिए सस्ता निर्यात और महँगा आयात करके पैसे बनाना सबसे आसान है। आयात की क़ीमत को बढ़ाचढ़ाकर दिखाने (ओवर इनव्यासिंग) को रातों-रात क़ानूनी बना दिया जाता है। काले धन को देश के बाहर भेजने का ये आसान तरीक़ा है। उद्यमी ज़्यादा क़र्ज़ बटोरने के लिए अपने प्रोजेक्ट की लागत को बढ़ाचढ़ाकर दिखाते हैं। इससे बैंक के आसमान छू रहे एनपीए का बोझ पैदा हुआ और इसका बोझ आम करदाताओं पर पड़ रहा है। ग़रीब की मुट्ठी खाली ही रहती है, लेकिन धन्ना सेठों को जनता के पैसों को हज़म करके विदेश भागने दिया जाता है। नोटबन्दी की वजह से देश को कम से कम 3 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। लेकिन घिनौने भारतीय इसका बचाव करते हैं। दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों ने नोटबन्दी को ऐसी आपदा बताया है, जिससे हुए नुकसान की भरपायी नहीं हो सकती। ग़रीबों का भट्ठा बैठ गया। लेकिन अमीरों का काला धन बैंकों में जमा होकर सफ़ेद बन गया। इसमें घिनौने बैंकरों की पूरी मिलीभगत रही। घिनौने भारतीयों को राजनीति के सामने अर्थनीति बेमानी लगती है।

घिनौने भारतीयों ने किसानों को उनका हक़ देने से इनकार कर दिया है। सूखे के वक़्त किसान इसलिए आत्महत्या करते हैं, क्योंकि वो साहूकार का क़र्ज़ नहीं उतार पाते। बारिश यदि भारी हो गयी तो किसान की फ़सल डूब जाती है। यहाँ तक कि उसके सिर पर छत भी नहीं बचती। नौकरशाही के जंजाल से मुट्ठी भर किसान ही फ़सल बीमा की रक़म ले पाते हैं। घिनौने नौकरशाह अच्छी तरह जानते हैं कि सत्ता के गलियारे में बैठा उनका बॉस (राजनेता) क्या सुनना चाहता है! हिंसा फैलाने वालों को सरकार से ईनाम मिलता है। ख़ुद को औरों से अलग दिखाने वाले बेशर्म लोगों का कहना है कि वो दबाव में नहीं आते। इनके राजनीतिक शब्दकोश में नैतिकता नाम का शब्द ही नदारद है।

समुदायों को तार-तार किया जा रहा है। विवेकपूर्ण लोगों को ख़ामोश रहने के लिए मज़बूर किया जा रहा है। महिलाएँ और बच्चे सबसे अधिक असुरक्षित हैं। ग़रीबों और कमज़ोरों को बेज़ुबान बना दिया गया है। अभी घिनौने भारतीयों की सत्ता है। सड़कों चलते लोगों को मौत के घाट पहुँचा दिया जाता है क्योंकि घिनौने भारतीय जानते हैं कि उनका कुछ नहीं बिगाड़ेगा। उम्मीद है कि चौतरफ़ा पतन के मौजूदा दौर के ख़िलाफ़ कोई तो खड़ा होगा। अभी तो सत्ता हमसे धोखा कर रही है और हम सत्ता से। यही वजह है कि घिनौने भारतीय कहके हैं कि ‘अच्छे दिन’ आ चुके हैं।

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस। लेखक राज्यसभा सांसद, वरिष्ठ काँग्रेस नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं।)

ओपिनियन

विपक्षी दलों को साझा उम्मीदवार उतारना चाहिए : सलमान खुर्शीद

राहुल गांधी पार्टी में बदलाव लाएंगे और वह कांग्रेस को नया स्वरूप देंगे।

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Salman Khurshid

वरिष्ठ कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद का कहना है कि विपक्षी दलों को अगले लोकसभा चुनाव में साथ मिलकर सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के खिलाफ प्रत्येक चुनाव क्षेत्र में अपना साझा उम्मीदवार उतारना चाहिए। इसके लिए उनके बीच गठबंधन पर बातचीत पहले शुरू होनी चाहिए, जिससे सभी दलों के कार्यकर्ता आपस में तालमेल बैठा सकें।

सलमान खुर्शीद ने आईएएनएस को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि जाहिर है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी की पसंद हैं, लेकिन किसी प्रकार की घोषणा के लिए विपक्षी दलों के साथ गठबंधन की बातचीत के नतीजों का इंतजार करना होगा।

खुर्शीद का मानना है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले राजग के खिलाफ समान विचार वाले विपक्षी दलों को एक साथ लाने के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की अध्यक्ष सोनिया गांधी सबसे उत्तम व्यक्ति हैं।

खुर्शीद ने कहा, “जहां तक मेरा और हमारी पार्टी की बात है, तो पसंद जाहिर है। लेकिन वृहत सहयोग व गठबंधन की स्थिति में तो यह होना चाहिए कि गठबंधन बनने तक हम प्रतीक्षा करें। लेकिन हमारे लिए बिल्कुल स्पष्ट है कि राहुल गांधी ही वह शख्सियत हैं, जो इस कार्य के लिए उपयुक्त हैं और वह हमारा नेतृत्व करेंगे।”

पूर्व केंद्रीय मंत्री से जब पूछा गया कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ 2019 के आम चुनाव में विपक्ष की ओर से किसी प्रधानमंत्री उम्मीदवार की घोषणा होनी चाहिए, तो उन्होंने कहा कि मोदी की विश्वसनीयता काफी घट गई है।

सलमान खुर्शीद की हाल ही में आई किताब ‘ट्रिपल तलाक : एग्जामिनिंग फेथ’ में उन्होंने तीन तलाक के मसले पर सवाल उठाया है।

उन्होंने कहा, “जहां तक मोदीजी का सवाल है, तो उनकी विश्वसनीयता में काफी कमी आई है, लेकिन मैं यह नहीं कहता कि यह गिरावट अभी पर्याप्त है। गिरावट लगातार जारी है।

राजग के खिलाफ विपक्षी एकता की संभावना के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “इस समय यह कहना कठिन है, लेकिन अगर गठबंधन नहीं बनता है तो मौका गंवाने का हमें खेद रहेगा।” उन्होंने कहा कि भिन्न-भिन्न स्तरों पर बातचीत चल रही है।

खुर्शीद ने कहा, “सभी दल मान रहे हैं कि भारत के इतिहास के लिए यह बेहद अहम व क्रांतिकारी परिवर्तन का दौर है। मेरा मानना है कि बीती बातों को भुला देना चाहिए। लेकिन इसके लिए अभी कदम उठाने होंगे। कुछ लोगों को धीरे-धीरे ऐसी पहल शुरू कर देनी चाहिए। मैं नहीं बता सकता कि वह शख्सियत कौन होंगे और कौन इस काम को अंजाम देंगे। लेकिन धीरे-धीरे बातचीत चल रही है।”

विपक्षी दलों को एकजुट करने में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अहम भूमिका होने की संभावना के बावत पूछे जाने पर खुर्शीद ने कहा कि वही नहीं, कोई और भी यह काम कर सकता है।

उन्होंने कहा कि राहुल गांधी पार्टी में बदलाव लाएंगे और वह कांग्रेस को नया स्वरूप देंगे।

पूर्व विदेश मंत्री ने माना कि पूर्वोत्तर के प्रांत त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है, लेकिन उन्होंने अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों में पार्टी की बेहतर स्थिति रहने की संभावना जताई।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

हिंदू चरमपंथियों को परोक्ष रूप से बढ़ावा दे रही है सरकार : रामानुन्नी

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Ramanunney

साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखक के. पी. रामानुन्नी का कहना है कि भाजपानीत केंद्रीय सरकार अप्रत्यक्ष रूप से हिंदू सांप्रदायिक चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई करने से बच रही है और उन्हें बढ़ावा दे रही है। इस वजह से देश में अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना बढ़ी है।

रामानुन्नी ने आईएएनएस के साथ एक साक्षात्कार में कहा, “(केंद्रीय) सरकार हिंदू सांप्रदायिक चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही है। वह इस मुद्दे से बच रही है। यह अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देने जैसा है।”

उन्होंने कहा, “जब बात अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार की आती है तो वे (सरकार) कानून के तहत सख्त कदम नहीं उठाते हैं। अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं।”

मलयालम भाषा के लेखक रामानुन्नी पिछले सप्ताह सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने अपनी साहित्य अकदामी पुरस्कार की इनामी राशि लेने के कुछ ही मिनटों बाद उसे जुनैद खान की मां को दे दिया था। 16 वर्षीय जुनैद की जून 2017 में एक ट्रेन के अंदर लोगों के एक समूह ने हत्या कर दी थी।

उन्होंने इनाम राशि में से केवल तीन रुपये अपने पास रखे और बाकी के एक लाख रुपये जुनैद की मां सायरा बेगम को दे दिए थे।

रामानुन्नी ने आईएएनएस से कहा, “सांप्रदायिक घृणा कैंसर की तरह है और जब यह हो जाता है तो इसे रोक पाना बहुत मुश्किल होता है।”

यह पूछने पर कि क्या आपको लगता है कि सांप्रदायिक घटनाएं वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद बढ़ गई हैं, उन्होंने कहा, ‘हां।’

उन्होंने कहा, “वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद कई सांप्रदायिक मुद्दे उठे हैं। जब मैं सांप्रदायिक कहता हूं तो मेरा दोनों पक्षों से मतलब नहीं होता, यह अधिकतर हिंदू समुदाय के लिए है जो मुस्लिमों के साथ असहिष्णुता बरत रहे हैं।”

उन्होंने कहा कि सरकार इन सांप्रदायिक झगड़ों को समाप्त करने का प्रयास नहीं कर रही और एक दर्शक की तरह बर्ताव कर रही है। उन्होंने कहा कि वर्तमान हालात राष्ट्र के हित के लिए खराब हैं।

रामानुन्नी के साहित्यिक काम सांप्रदायिक सद्धभाव के उनके संदेश के लिए जानें जाते हैं। उनकी किताब ‘दैवाथिंते पुस्तकम’ (ईश्वर की अपनी पुस्तक) के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार 2017 मिला है।

जब उनसे यह पूछा गया कि उन्होंने अपनी इनाम की राशि जुनैद की मां को क्यों दी, तो उन्होंने कहा, “यह दान नहीं है। अगर ऐसा होता तो मैं जुनैद की मां को उनके घर जाकर यह देता। जब आप यह साहित्य अकादमी के मंच पर दे रहे हैं तो इसके कई मायने हैं। यह अन्य लेखकों को अत्याचारों के बारे में लिखने के लिए प्रोत्साहित करेगा और दूसरे हिंदुओं को बताएगा कि असली और सच्चे हिंदू सिद्धांतों के मुताबिक आपको सांप्रदायिक नहीं होना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि जुनैद की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि वह मुस्लिम था और यह सच्ची और असली हिंदू संस्कृति के लिए शर्मनाक है।

रामानुन्नी को जुलाई 2017 में उनका दाहिना हाथ काटने की धमकी मिली थी। उन्होंने कहा कि इस तरह की बातें लेखक के दिमाग को जकड़ देती हैं।

उन्होंने कहा, “बहुत से लोगों ने मुझसे पूछा कि क्या मैं सांप्रदायिक एकता पर लिखना बंद कर दूंगा। मैंने उनसे कहा कि नहीं। यह आत्महत्या करने जैसा होगा। एक लेखक के लिए अपना पक्ष नहीं जाहिर करना आत्महत्या के समान है।”

लेखक ने कहा, “हालांकि यह भी सही है कि आप यह सब कहते तो हैं, लेकिन जब आपको धमकियां मिलती हैं तो कई लोगों का अवचेतन मन उन्हें सब कुछ कहने से रोकता है। यह एक तरह से किसी को परोक्ष रूप से नियंत्रित करना है। धमकियां लोगों में यह डर पैदा करती हैं। यह तथ्य है।”

इंटरनेट के आज के दौर में किताबों के बारे में पूछने पर रामानुन्नी ने कहा कि पढ़ने की गुणवत्ता पिछले कुछ सालों में कम हुई है। उन्होंने कहा कि पढ़ने में लोग अब उस तरह का आनंद नहीं लेते जैसे पहले लिया जाता था। पढ़ने की आदत मरी तो नहीं है लेकिन इसकी गुणवत्ता घटी है।

–आईएएनएस

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श्रीलंका में चीन की उपस्थिति भारत के लिए चिंताजनक!

श्रीलंकाई लोगों के मुंह से अक्सर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वे चीनी उपस्थिति से कितने असंतुष्ट और नाखुश हैं, जो काफी कठोर और अभिमानी हैं।

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70th Independence Day celebrations in Colombo,

मेरी पत्नी और मैं हाल ही में अपने कुछ मित्रों के साथ छुट्टियों के लिए श्रीलंका गए थे। हम दोनों के लिए लगभग 15 वर्षों बाद यह पहली श्रीलंका यात्रा थी, जबकि उससे पहले यह सुंदर द्वीपीय देश हिंसक गृहयुद्ध में जकड़ा था, जिसने अनगिनत जानें लीं और देश की अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया था।

यह वह दौर था जब महिंदा राजपक्षे ने श्रीलंका के राष्ट्रपति के रूप में सत्ता संभाली और तमिल टाइगर्स के सफाए को अपना सबसे प्रमुख उद्देश्य बनाया। 30 महीनों की असहनीय हिंसा के बाद लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम(लिट्टे) के नेता वेलु पिल्लई प्रभाकरन और उसके समर्थकों की मौत के साथ ही 2009 में 26 सालों का गृहयुद्ध समाप्त हो गया।

यह तर्क दिया जाता है कि उस समय बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ था और तमिलों के साथ खुले तौर पर भेदभाव किया गया था। यह सच है। लेकिन सच यह भी है कि यह द्वीपीय देश अंत में अशांति, अनिश्चितता और आतंकवाद के दशकों के बाद पहली बार शांति की ओर लौट आया। जिस श्रीलंका का मैं पहले आदी हो गया था, वह अब उससे बिलकुल विपरीत है। उस समय बंदूक लिए सुरक्षा कर्मी हर तरफ घूमते रहते थे। अब यहां शांति है।

भारत के लिए भी गृहयुद्ध और लिट्टे का अंत अच्छी खबर थी। इससे पहले ही लिट्टे को एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया गया था, लेकिन तमिलनाडु में प्रभाकरन के साथ कुछ संगठनों का गठबंधन नई दिल्ली के लिए चुनौती बन गया था। दुर्भाग्य से गृहयुद्ध के अंत के साथ इतिहास ने खुद को एक बार फिर दोहराया और भारत ने अपनी स्थिति खराब कर ली और आज हम एक बार फिर चीन की कूटनीति के बीच श्रीलंका को खोने के कगार पर हैं।

श्रीलंका में चीनी उपस्थिति कोई छिपी हुई बात नहीं है। आप उन्हें हर जगह पाएंगे। चीनी ड्रेजिंग (समुद्री पानी को साफ करने वाले) जहाजों को खुले तौर पर काम करते हुए देखा जा सकता है। हंबनटोटा बंदरगाह पर काम शुरू हो गया है। शॉपिंग मॉल से लेकर पब तक हर जगह चीनी श्रमिक नजर आएंगे। कई चीनी श्रीलंका की भाषा सिंहली बोलना सीख रहे हैं। होटल, सड़कों, बुनियादी ढांचों, थिएटरों और सुख-सुविधाओं से लैस क्रिकेट स्टेडियम केवल कागजों पर लिखी परियोजना भर नहीं हैं, बल्कि लोग उन्हें देख सकते हैं। आंखों देखी चीजों के महत्व को कभी भी कम करके आंका नहीं जाना चाहिए और जिस गति से चीन यहां परियोजनाओं को अंजाम दे रहा है, वह इस बात की बानगी है कि श्रीलंका में रियल एस्टेट परिवर्तन तेजी से हो रहा है।

2005-17 के बीच 12 वर्षों की अवधि में बीजिंग ने श्रीलंका की परियोजनाओं में 15 अरब डॉलर का निवेश किया है। वहीं, चीन के एक राजदूत भारत को एक स्पष्ट संदेश दे चुके हैं, जो श्रीलंका में चीनी उपस्थिति को अपने प्रभाव क्षेत्र में घुसपैठ के रूप में देखता है। राजदूत ने भारत को स्पष्ट जवाब देते हुए कहा था, “कोई नकारात्मक ताकत श्रीलंका और चीन के बीच सहयोग को कमजोर नहीं कर सकती है।”

भारत के लिए यह परेशान करने वाला है। भारतीय विदेश नीति समय की कसौटी पर खरा उतरे संबंधों पर काफी भरोसा करती है, लेकिन श्रीलंकाई लोगों में उम्मीदों की अधीरता रही है, जिन पर भारत ध्यान देने और प्रतिक्रिया करने में विफल रहा और चीन सफल रहा है।

श्रीलंकाई लोगों के मुंह से अक्सर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वे चीनी उपस्थिति से कितने असंतुष्ट और नाखुश हैं, जो काफी कठोर और अभिमानी हैं। इसे एक खतरे को गले लगाने के रूप में समझा जा सकता है, लेकिन जब उनके मन-मस्तिष्क में एक समृद्ध भविष्य की इच्छा उभरती है तो वे इस मौके को काफी आकर्षक पाते हैं।

वहीं, दूसरी ओर भारत सभी ओर से अलग-थलग पड़ता जा रहा है। पाकिस्तान से दुश्मनी है। मालदीव अस्थिर है। नेपाल की स्थिति लगभग असमजंस से भरी है और श्रीलंका एक स्पष्ट लुभावने मायाजाल में फंसा है। भारत वास्तव में इस समय अब तक की सबसे गंभीर सुरक्षा चुनौती का सामना कर रहा है।

अगर भारत को एक साथ मिलकर काम करना है तो इसके लिए केवल कल्पना की नहीं, बल्कि गति और दक्षता की जरूरत है, ताकि श्रीलंका के भविष्य को लेकर किए गए वादे पूरे हो सकें।

दिग्गज शतंरज खिलाड़ी बॉबी फिशर ने एक बार कहा था, “अगर आप खेल खेल रहे हैं तो आप जीतने के लिए खेलें, लेकिन अगर आप खेल हार गए तो वह इसलिए क्योंकि आपने अपनी आंखों को प्यादों से हटा लिया था, इसलिए आप हारने के ही लायक थे।”

By : अमित दासगुप्ता

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