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घिनौने भारतीयों के नियम

उन्मादियों के ‘अच्छे दिन’ में इंसाफ़, गरिमा और बहस की गुंज़ाइश ही नहीं!

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2014 के बाद से घिनौने भारतीयों की तादाद में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ है। इन्होंने राजनीतिक सत्ता का भारी चोट पहुँचायी है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अब ख़बरें दिखाने के नहीं बल्कि ऐसे नज़रिया को फैलाने के सरकारी भोंपू बन गये हैं, जो खोखले मूल्यों पर आधारित हैं। लोकतंत्र का इम्तिहान चल रहा है। देश में तरह-तरह के उन्मादियों का बोलबाला है।

तर्कवादी गौरी लंकेश की हत्या भी बिल्कुल वैसे ही की गयी है, जैसे सुबह की सैर कर रहे डॉ नरेन्द्र डाभोलकर को पुणे में 20 अगस्त 2013 को मार गिराया गया। इसी तरह, कोल्हापुर में गोविन्द पंसारे को फरवरी 2015 में उस वक़्त गोली मार दी, जब वो अपनी पत्नी उमा के साथ टहल रहे थे। हत्यारे मोटरसाइकिल पर सवार थे। धारवाड में अगस्त 2015 में एम एम कलबुर्गी को भी यही दिन देखने पड़े। किसी भी मामले में अभी तक हत्यारों का पता नहीं लगा है। ये तो हमारी पुलिस नकारा है या फिर उसकी जाँच सही नहीं है।

‘हिन्दू-विरोधी’ तर्कवादियों को सबक सिखाया जा रहा है। यही काम सड़कों पर पीट-पीटकर मार डालने वाले भी कर रहे हैं। ये लोग दलितों और मुसलमानों को ऐसे अपना निशाना बना रहे हैं, मानो यही उनका पेशा हो! कहीं कोई पकड़ा भी गया तो उसके ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की नौबत नहीं आती। जो धरे भी जाते हैं, उनके ख़िलाफ़ इंसाफ़ का पहिया जोश से नहीं घूमता। बड़ी आसानी से ज़मानत मिल जाती है। राजनीति में मौजूद घिनौने भारतीयों की चाहत ख़ून का बदला ख़ून बन चुकी है। हिंसा, दस्तूर बन चुका है।

टीवी चैनलों पर हमें ऐसे घिनौने चेहरे ही दिखते हैं, जो एक ख़ास मानसिकता का प्रलाप करने में गर्व महसूस करते हैं। तर्क का कोई स्थान नहीं बचा। संवाद की कोई गुंज़ाइश नहीं है। तीख़ी राय को एंकर का समर्थन मिलता है। तार्किक बातें करने वालों की आवाज़ दबा दी जाती है और बेहूदा बातों के ज़रिये दर्शकों को मनोरंजन किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बड़े हिस्से की दिलचस्पी सच को जानने और बताने में नहीं रही। नज़रिया भी काल्पनिक ही होता है।

घिनौने लोगों की अगली प्रजाति सोशल मीडिया पर निन्दा करने वालों (ट्रोलर्स) की है। ये लोग ग़ाली-ग़लौज़ करते हैं, उत्तेजकता दिखाते हैं, किसी बात को समझने-समझाने से इनका कोई ताल्लुक नहीं होता, ये असहिष्णु बाहुबलियों की तरह बर्ताव करते हैं। जिन बातों से वो असहज होते हैं, उसका रुख़ ही मोड़ देते हैं। अज्ञानियों में सच को जानने की ख़्वाहिश नहीं होती। भाड़े के निन्दकों के शब्द भी अभद्र होते हैं। वो आत्मरक्षा के लिए आक्रमण को ही सही समझते हैं। निन्दकों को चुनौती देना या उनसे सवाल पूछना बेहद ख़तरनाक है। वो ग़ालियाँ देने लगते हैं। इस दौर में घिनौने भारतीयों की पौ-बारह है और हमें ख़ामोश रहना है।

घिनौने भारतीयों की एक और क़िस्म उस वक़्त नज़र आती है, जब सरकारी उपेक्षा और लापरवाही की वजह से गोरखपुर और फ़र्रूख़ाबाद में मासूमों की मौत होती है। उनकी दलील होती है कि इंसेफ़लाइटिस से पहले भी मौते होती रही हैं। मौत ऑक्सीजन की कमी की वजह से होती है, लेकिन तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा जाता है। मीडिया को ख़ामोश कर दिया जाता है। सरकार अपने ढर्रे पर ही चलती रहती है। घिनौने भारतीयों को लोग देखते रहते हैं, वो बेफ़िक्र रहते हैं, उन्हें कोई उन्हें छूता तक नहीं।

ग़रीब को अस्पताल की फर्श पर खाना परोसा जाता है। फिर भी अन्तर्आत्मा नहीं झकझोरती। मृतकों के प्रति अमानवीय रवैये से भी हमारी गरिमा अप्रभावित रहती है। हम लाशों के ठेले पर, साइकिल पर और यहाँ तक कि कंधों पर ढोये जाने को देखते रहते हैं। 16 दिसम्बर 2012 को राजधानी दिल्ली में हुए निर्भया कांड में भले ही सज़ा-ए-मौत मिली हो, लेकिन बलात्कार की वारदातें घट नहीं रहीं। सरकार की सेवा में लगे कान्ट्रेक्ट टीचर्स को दस हज़ार रुपये महीना या इससे भी कम के वेतन पर काम करना पड़ता है।

अध्यापक, हमारी सबसे उपेक्षित सम्पदा हैं। उनके पास युवाओं को दिशा देने लायक साधन नहीं हैं। ग्रामीण इलाकों में तो कई जगह छात्र-शिक्षक अनुपात 90:1 है। अध्यापकों की ग़ैरहाज़िरी सामान्य बात है। शिक्षा से जुड़ी वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक़, कक्षा पाँच के छात्र सिर्फ़ कक्षा दो तक की ही पुस्तकें पढ़ पाते हैं। युवाओं की शिक्षा के प्रति घिनौने भारतीयों की कोई प्रतिबद्धता नहीं है। उच्च शिक्षा संस्थानों में भरपूर भ्रष्टाचार है। मेडिकल शिक्षा भी उन माफ़ियाओं के शिकंजे में है जो दाख़िलों में ही हेराफेरी कर लेते हैं।

रईसों के लिए सस्ता निर्यात और महँगा आयात करके पैसे बनाना सबसे आसान है। आयात की क़ीमत को बढ़ाचढ़ाकर दिखाने (ओवर इनव्यासिंग) को रातों-रात क़ानूनी बना दिया जाता है। काले धन को देश के बाहर भेजने का ये आसान तरीक़ा है। उद्यमी ज़्यादा क़र्ज़ बटोरने के लिए अपने प्रोजेक्ट की लागत को बढ़ाचढ़ाकर दिखाते हैं। इससे बैंक के आसमान छू रहे एनपीए का बोझ पैदा हुआ और इसका बोझ आम करदाताओं पर पड़ रहा है। ग़रीब की मुट्ठी खाली ही रहती है, लेकिन धन्ना सेठों को जनता के पैसों को हज़म करके विदेश भागने दिया जाता है। नोटबन्दी की वजह से देश को कम से कम 3 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। लेकिन घिनौने भारतीय इसका बचाव करते हैं। दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों ने नोटबन्दी को ऐसी आपदा बताया है, जिससे हुए नुकसान की भरपायी नहीं हो सकती। ग़रीबों का भट्ठा बैठ गया। लेकिन अमीरों का काला धन बैंकों में जमा होकर सफ़ेद बन गया। इसमें घिनौने बैंकरों की पूरी मिलीभगत रही। घिनौने भारतीयों को राजनीति के सामने अर्थनीति बेमानी लगती है।

घिनौने भारतीयों ने किसानों को उनका हक़ देने से इनकार कर दिया है। सूखे के वक़्त किसान इसलिए आत्महत्या करते हैं, क्योंकि वो साहूकार का क़र्ज़ नहीं उतार पाते। बारिश यदि भारी हो गयी तो किसान की फ़सल डूब जाती है। यहाँ तक कि उसके सिर पर छत भी नहीं बचती। नौकरशाही के जंजाल से मुट्ठी भर किसान ही फ़सल बीमा की रक़म ले पाते हैं। घिनौने नौकरशाह अच्छी तरह जानते हैं कि सत्ता के गलियारे में बैठा उनका बॉस (राजनेता) क्या सुनना चाहता है! हिंसा फैलाने वालों को सरकार से ईनाम मिलता है। ख़ुद को औरों से अलग दिखाने वाले बेशर्म लोगों का कहना है कि वो दबाव में नहीं आते। इनके राजनीतिक शब्दकोश में नैतिकता नाम का शब्द ही नदारद है।

समुदायों को तार-तार किया जा रहा है। विवेकपूर्ण लोगों को ख़ामोश रहने के लिए मज़बूर किया जा रहा है। महिलाएँ और बच्चे सबसे अधिक असुरक्षित हैं। ग़रीबों और कमज़ोरों को बेज़ुबान बना दिया गया है। अभी घिनौने भारतीयों की सत्ता है। सड़कों चलते लोगों को मौत के घाट पहुँचा दिया जाता है क्योंकि घिनौने भारतीय जानते हैं कि उनका कुछ नहीं बिगाड़ेगा। उम्मीद है कि चौतरफ़ा पतन के मौजूदा दौर के ख़िलाफ़ कोई तो खड़ा होगा। अभी तो सत्ता हमसे धोखा कर रही है और हम सत्ता से। यही वजह है कि घिनौने भारतीय कहके हैं कि ‘अच्छे दिन’ आ चुके हैं।

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस। लेखक राज्यसभा सांसद, वरिष्ठ काँग्रेस नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं।)

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दुनिया के सबसे रोमांटिक डेस्टीनेशंस में से एक है सैंटा मोनिका

सैंटा मोनिका आपको पूरे दिन व्यस्त रखने और आपका मनोरंजन करने वाले आकर्षणों से भरपूर है।

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Santa Monica Pier Area-Ocean Ave

सैंटा मोनिका का नाम सुनते ही एक ऐसा समुद्रतटीय शहर जेहन में घूमने लगता है, जो अपने अंदर कई तरह के विशेषताएं और आकर्षण समाए हुए हो। मालिबू या फिर वेनिस बीच से अलग सैंटा मोनिका समुद्रतटीय आकर्षण और तटीय इलाकों की परिष्कृत जीवनशैली का शानदार संतुलन पेश करता है। इसी कारण यह जोड़ों के लिए एक बेहद खास गंतव्य बन जाता है। इस शहर में आकर्षणों की भरमार है। अगर आप सैंटा मोनिका घूमने का मन बना रहे हैं तो आपका दिन वैश्विक ब्रांडों के बीच खरीददारी के साथ-साथ समुद्रतट पर रिलैक्स करने और दुनिया को निहारने में कब बीत जाएगा, आपको पता भी नहीं चलेगा। इसका कारण यह है कि सैंटा मोनिका आपको पूरे दिन व्यस्त रखने और आपका मनोरंजन करने वाले आकर्षणों से भरपूर है।

पेश हैं कुछ एसे ही आकर्षण के केंद्र :

सैंटा मोनिका पीयर

सैंटा मोनिका की बात हो तो सैंटा मोनिका पीयर का जिक्र न हो, ऐसा भला कैसा हो सकता है। इसकी लाल और पीले रंग की फेरीज शहर की पहचान बन चुकी हैं। पीयर में पैसिफिक पार्क के अलावा, एक फुल सर्विस एम्यूजमेंट पार्क, कई तरह के रेस्टोरेंट, बार और ऐसी कई दुकाने हैं, जहां से आप अपने लिए यागदार निशानी खरीद सकते हैं। इसके अलावा सैंटा मोनिका पीयर में 200 से अधिक गेम्स से सज्जित एर्केड है। सोलर पावर से चलने वाले पैसेफिक पार्क की फेरी व्हील अद्वीतीय अनुभव प्रदान करती है।

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दिन में यहां का पूरा आकर्षण लूफ हिप्पोड्रोम कोलोजियल में शिफ्ट हो जाता है, जहां स्ट्रीय परफारमेंस होते हैं। यहां आप काटन कैंडी का भी आनंद ले सकते हैं। हाथ में बीयर लिए जब आप यहां से मालिबू और साउथ बे का नजारा लेते हैं तो यह शानदार अनुभव प्रदान करता है। सूर्यास्त के समय आप समुद्रतट पर जाकर स्थानीय संगीत का आनंद ले सकते हैं। लहरों के बीच संगीत की धुनें कानों में रस घोल देती हैं। सैंटा मोनिका पीयर एक एसा डेल्टीनेशन है, जिसे आप कतई नहीं चूकना चाहेंगे क्योंकि यह हर उमर के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

सैंटा मोनिका बीच पर साल के 300 दिन खिली रहती है धूप

सैंटा मोनिका बीच अपने आप में बेहद खास है। यहां साल के 300 दिन धूप खिली रहती है और यही कारण है कि नेशनल ज्योग्राफिक ने सैंटा मोनिका को टाप-10 बीच सटीज इन द वलर्ड में शामिल किया है। प्रशांत महासागर पर स्थित सैंटा मोनिका में साढ़े तीन मील लम्बा चमकता हुआ कोस्टलाइन है। सैंटा मोनिका बीच यहां आने वाले लोगों को यहां रमने और यहां की लाइफस्टाइल को अपनाने और उसमें खो जाने के अनंत अवसर प्रदान करता है। सैंटा मोनिका आने वाले पर्यटकों को बीच पर पैर रखने के साथ सबसे आकर्षक गतिविधियों का दीदार होता है और वे सबकुछ भूलकर उसमें खो जाते हैं।

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सैंटा मोनिका बीच की खोज 1875 में जान पी. जोंस ने किया था। जोंस ने इस स्थान को खरीद लिया और 8.3 वर्ग मील क्षेत्रफल वाले इस शहर की नींव रखी। तब से लेकर आज तक सैंटा मोनिका दुनिया की सबसे आकर्षक बीच डेस्टीनेशंस में जगह बना चुका है। 1909 में यहां पहला प्लेजर पीयर खुला और इसके बाद से यह स्थान हालीवुड स्टार्स के लिए पसंदीदा बन गया। साथ ही 1920 के दशक में यह इंटरनेशनल फिटनेस क्रेजी लोगों का पसंदीदा डेस्टीनेशन बना और फिर 1980 के दशक में यहां लेजेंड्री होटल कलेक्शन खुले। सैंटा मोनिका के साथ एक समृद्ध इतिहास जुड़ा है और यही कारण है कि यह लगातार दुनिया भर के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता रहता है।

शापिंग के लिए भी परफेक्ट डेस्टीनेशन

अगर आपको समुद्रतट के अलावा शापिंग पसंद है तो सैंटा मोनिका आपके लिए परफेक्ट डेस्टीनेशन है। यहां काफी कम दूरी पर कई शापिंग डेस्टीनेशन हैं, जहां आपको शानदार सेल और काफी सस्ते में डिजाइनर मटेरियल मिल जाएंगे। आप दुनिया भर में मशहूर जिस किसी ब्रांड का नाम आप लेंगे, वह यहां मिल जाएगा। मोंटाना एवेन्यू से लेकर ब्लूमिंगडेल और नार्डस्ट्राम तक, हर जगह आपको बेहतरीन ब्रांड काफी सस्ती कीमत में मिल जाएंगे। सैंटा मोनिका में आप जहां चाहें शापिंग कर सकते हैं क्योंकि यहां आब्शंस की कोई कमी नहीं।

सबको आकर्षित करता है मोंटाना एवेन्यू

सैंटा मोनिका के उत्तरी इलाके में स्थित मोंटाना एवेन्यू सबको अपनी ओर आकर्षित करता है। यह 150 से अधिक रेस्टोरेंट्स और रीटेलर्स का घर है। डाउनटाउन सैंटा मोनिका से थोड़ी दूरी पर स्थित मोंटाना एवेन्यू प्रोमेनेड और पीयर की गहमागहमी से दूर एक शांत स्थान है। यह स्थान लेट नाइट शापिंग के लिए भले ही उपयुक्त न हो लेकिन सनराइज से लेकर सनसेट तक यह शापिंग के लिए परफेक्ट डेस्टीनेशन है। यहां शापिंग के समय ए-लिस्ट सेलीब्रिटीज, शहर से बाहर के लोग, स्ट्रालर्स लिए टहलते स्थानीय लोग दिख जाते हैं। यहां आने वाला क्राउड काफी रिलैक्स रहता है क्योंकि यहां शापिंग के अलावा खाने-पीने के भरपूर आब्शन हैं।

देसी और विदेशी पर्यटक जमकर लेते हैं नाइटलाइफ का लुत्फ

सैंटा मोनिका लाइटलाइफ न सिर्फ स्थानीय लोगों को अपनी ओर खींचता है बल्कि यहां देश और दुनिया से रात की मस्ती के लिए यहां पहुंचते हैं। लास एंजेलिस इलाके से हजारों लोग रोजाना सैंटा मोनिका आते हैं और जमकर मौज मस्ती करते हैं। सैंटा मोनिका में रात में मौज-मस्ती के कई साधन हैं। प्रशांत महासागर का रुख किए यहां के रूफटॉप रेस्टोरेंट और बार्स सबको अपनी ओर खींचते हैं।

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शांगरीला का ओएनवाईएक्स या फिर सैंटा मोनिका का सोनोमना वाइन गार्डन बार काफी लोकप्रिय हैं। रात भर चुस्कीयां लेते हुए नाचते हुए सुबह कर देने के लिए सर्किल बार या फिर बार कोपा अपने आप में खास तरह का आकर्षण है। इसके अलावा शहर में कई डाइव बार्स भी हैं, जिनमें चेज जे काफी फेमस है।

सैंटा मोनिका खाने-पीने के शौकीनों के लिए भी है शानदार जगह

सैंटा मोनिका में कई मशहूर रेस्टोरेंट हैं। यहां कई शेफ अपनी कला से लोगों के अच्छे भोजन की चाह को शांत करते हैं। फिग, हकलबरी कैफे एंड बेकरी, टार एंड रोजेज जैसे रेस्टोरेंट यहां हैं और इनके यहां आने का कारण यह है कि सैंटा मोनिका का लोकेशन शानदार है। सैंटा मोनिका फ्यूजन क्यूजीन का जन्मदाता है। यह अमेरिका का इंटरनेशनल डाइनिंग डेस्टीनेशन है क्योंकि दुनिया भर के रेस्टोरेंट चेन और शेफ यहां आकर अपनी पाककला दिखाते हैं और ढेरों धन कमाते हैं।

लक्जरी होटल्स, रेजाट्स और स्पा की है भरमार

सैंटा मोनिका में लक्जरी होटल्स, रेजाट्स और स्पा की भरमार है। इसका कारण यह है कि यह एक इंटरनेशनल डेस्टीनेशन है। यहां के होटल हालीवुड के होटलों से बिल्कुल अलग हैं। यहां के होटल सीफेसिंग हैं और लोकल टच लिए हुए हैं। यहां बीच पर अनेकों होटल और रेजाट्स मिल जाएंगे, जहां हालीवुड के इलीट लोग आराम करते देखे जा सकते हैं। होटलों और रेजार्टस के अलावा कई ऐसे बंग्लो हैं, जहां रात की जिंदगी बड़ी सुकून भरी होती है।

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साथ ही साथ यहां अनेकों स्पा हैं, जो दिन भर मौज-मस्ती करते, बीच पर खेलकर और सर्फि ग करते थके लोगों को सुकून देते हैं। यहां के स्पा, योगा स्टुडियोज जूसिंग बार्स काफी लोकप्रिय हैं।

कला और संस्कृति का अद्भुत संगम

सैंटा मोनिका लॉस एंजेलिस काउंटी का हिस्सा है लेकिन यह दक्षिणी केलीफोर्निया में कला और सांस्कृतिक जीवनशैली के लिए अहम किरदार निभाता रहा है। असल में यहां के आधे के करीब लोग किसी ने किसी रूप में कला से जुड़े हुए हैं। सैंटा मोनिका में अनेकों राष्ट्रीय स्तर की आर्ट गैलरियां, पब्लिक आर्ट सेंटर्स, प्रमुख म्यूजियम, थिएटर हैं जहां हमेशा कुछ न कुछ चलता रहा है और स्थानीय तथा बाहर से आए लोग परफामिर्ंग आर्ट, प्ले और कंसटर्स का लुत्फ लेते रहते हैं।

–आईएएनएस

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बुंदेलखंड की महिलाएं पानी से भरेंगी धरती का पेट

बुंदेलखंड वह इलाका है, जहां कभी 9000 से ज्यादा तालाब और इससे कहीं ज्यादा कुएं हुआ करते थे। लगभग हर घर में एक कुआं होता था। आज ऐसा नहीं है। दूसरी तरफ, पानी संग्रहण और संचय की प्रवृत्ति भी कम हो गई है। इसके साथ ही पानी का दोहन बढ़ गया है।

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छतरपुर/ललितपुर, 20 जून | मानसून दस्तक देने की तैयारी में है, मगर बुंदेलखंड का इलाका बूंद-बूंद पानी के संकट के दौर से गुजर रहा है। कई-कई किलोमीटर का रास्ता तय करने के बाद पीने का पानी नसीब हो पा रहा है। पानी का इंतजाम करने के लिए सबसे ज्यादा संघर्ष करने वाली महिलाओं ने संकल्प लिया है कि वे पानी से धरती का पेट भरने में पीछे नहीं रहेंगी, ताकि आने वाले वर्षो में उन्हें इस तरह की समस्या से न जूझना पड़े।

बुंदेलखंड वह इलाका है, जहां कभी 9000 से ज्यादा तालाब और इससे कहीं ज्यादा कुएं हुआ करते थे। लगभग हर घर में एक कुआं होता था। आज ऐसा नहीं है। दूसरी तरफ, पानी संग्रहण और संचय की प्रवृत्ति भी कम हो गई है। इसके साथ ही पानी का दोहन बढ़ गया है।

छतरपुर जिले के बड़ा मलेहरा के झिरिया झोर की पानी पंचायत की सचिव सीमा विश्वकर्मा बताती हैं, “इस इलाके में पानी का संकट बना हुआ है। झिरिया झोर की महिलाओं ने बीते वर्षो में कई स्थानों पर पानी रोकने का काम किया था, उसी का नतीजा है कि एक तालाब में अब भी पानी बचा हुआ है। गांव के हैंडपंप ने पानी देना बंद कर दिया है, यहां की कई महिलाएं हैंडपंप भी सुधार लेती हैं, अगर पाइप मिल जाएं तो हैंडपंप को और गहरा करके पानी हासिल करने का प्रयास कर सकती हैं।”

ललितपुर के तालबेहट के निवासी बुजुर्ग रामसेवक पाठक हरिकिंकर (70) बताते हैं, “पहले बुंदेलखंड के लगभग हर घर में कुआं हुआ करता था, आज लोगों ने कुएं खत्म कर दिए हैं, बोरिंग पर जोर है, लिहाजा पानी का स्तर नीचे चला गया है। इतना ही नहीं, तालाबों व अन्य जलस्रोतों तक बारिश का पानी पहुंचने के रास्ते भी बंद हो गए हैं, अगर अब भी नहीं जागे तो आने वाले वर्षो में हालात और भी बिगड़ेंगे।”

बुंदेलखंड में महिलाओं में जल संरक्षण के प्रति जागृति लाने के लिए ग्रामीण स्तर पर काम करने वाली जल सहेली गनेशी बाई बताती हैं कि क्षेत्र की महिलाओं ने संकल्प लिया है कि इस बार बारिश के पानी को बहकर नहीं जाने देंगी। उसे धरती के पेट तक पहुंचाने के लिए जगह-जगह पानी को रोकेंगी। ऐसा करने से भूजल स्तर बढ़ेगा और पानी के संकट से काफी हद तक मुक्ति मिलेगी।

तालबेहट नगर पंचायत की अध्यक्ष मुक्ता सोनी का कहना है कि पानी से सीधा जुड़ाव महिलाओं का होता है, यह वह इलाका है, जहां पानी की व्यवस्था भी महिलाओं के जिम्मे होती है। पानी संरक्षण के लिए तो महिलाएं काम करेंगी ही। साथ ही वे एक महिला जनप्रतिनिधि हैं, इसलिए उन्होंने निर्णय लिया है कि जो नए मकान नगर में बनेंगे और रेन वाटर हार्वेटिंग सिस्टम की व्यवस्था करेगा, उसे 100 फीसदी गृहकर में छूट दी जाएगी।

बुंदेलखंड के कई गांव में सामाजिक संगठनों ने पानी पंचायतें बनाई हैं, इन पानी पंचायतों में से दो को ‘जल सहेली’ चुना जाता है। यह पानी पंचायत और जल सहेलियां मिलकर पानी संरक्षण के प्रति जनजागृति लाने का प्रयास करती हैं। जल सेहली रानी उपाध्याय कहती हैं कि ‘जल है तो जीवन है’- यही संदेश वे महिलाओं को दे रही हैं।

उन्होंने कहा, “हम सबने ठाना है कि इस बार मानसून की बारिश के पानी को जगह-जगह रोकेंगे और बेकार बह जाने वाले पानी को तालाबों तक पहुंचाएंगे, ताकि जलस्तर नीचे न जाए और गर्मियों में पानी का संकट न गहराए।”

मध्य प्रदेश के छह जिले- छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, दमोह, सागर, दतिया और उत्तर प्रदेश के सात जिलों- झांसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, बांदा, महोबा, कर्वी (चित्रकूट) को मिलाकर बुंदेलखंड बनता है। सूखे के कारण इस क्षेत्र में खेती हो नहीं पा रही है और गांव में काम नहीं है, लिहाजा यहां से बड़ी संख्या में लोग काम की तलाश में दिल्ली, गुरुग्राम, गाजियाबाद, पंजाब, हरियाणा और जम्मू कश्मीर के लिए पलायन कर रहा है। तालाब मैदान में बदल गए हैं। कुओं की तलहटी सूखी नजर आने लगी है। कई हिस्सों में तो लोग पानी के लिए पूरा-पूरा दिन लगा देते हैं।

बुंदेलखंड की महिलाओं ने पानी बचाने, संग्रहीत करने और धरती का पेट भरने का संकल्प लिया है और अगर इसमें वे सफल होती हैं तो आने वाले दिनों में इस इलाके की सूरत बदलेगी जरूर, ऐसी उम्मीद तो की ही जा सकती है।

–आईएएनएस

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महबूबा को तलाक़ देने से भी संघियों के दिन नहीं फ़िरने वाले

एनडीए के बिखरने का मौसम दस्तक दे चुका है। चन्द्रबाबू नायडू (टीडीपी) ने बीजेपी का साथ छोड़ा। चन्द्रशेखर राव (टीआरएस) ने छोड़ा। शिव सेना (उद्धव ठाकरे) ने एकला चलो का राग छेड़ रखा है। महबूबा मुफ़्ती (पीडीपी) को तलाक़ मिल चुका है।

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बीजेपी ने जिस तीन तलाक़ (तलाक़-ए-बिद्दत या फ़ौरी तलाक़) को लेकर मुसलिम महिलाओं का दिल जीतने की रणनीति बनायी, उसी का बेज़ा इस्तेमाल करते हुए अचानक मुसलिम महिला, महबूबा को तलाक़ दे दिया। तीन साल का बेमेल रिश्ता बिल्कुल उसी तरह से तोड़ दिया गया जिसे भगवा ख़ानदान ‘ज़ुल्म और ज़्यादती’ की दुहाई दिया करता था! बहरहाल, महबूबा सरकार को गिराकर बीजेपी ने अपनी गिरती साख और घटती लोकप्रियता पर रोक लगाने का आख़िरी दाँव भी चल दिया। हालाँकि, संघ-बीजेपी के इस पैंतरे के बावजूद मोदी सरकार का हाल ‘बकरे की माँ कब तक ख़ैर मनाएगी’ जैसा ही बना रहेगा!

इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि भगवा ख़ानदान ने अब खुले तौर पर ये क़बूल कर लिया है कि मोदी सरकार की कश्मीर नीति चारों खाने चित हो गयी है! लगे हाथ, संघ-बीजेपी ने ये भी मान लिया है कि सीमापार से आ रहे आतंकवाद से सख़्ती से निपटने का उसका नज़रिया खोखला साबित हो चुका है! नियंत्रण रेखा पर युद्ध-विराम के उल्लंघन और आतंकवादियों की पाकिस्तान से होने वाली घुसपैठ में जैसी तेज़ी मोदी-राज में दिखायी दी, वैसी पहले कभी नहीं रही। महबूबा सरकार गिराकर संघ-बीजेपी ने साबित किया कि सर्ज़िकल हमले का गुणगान करने की उसकी नीति निहायत भोथरी थी।

चार साल में 373 जवानों का शहीद होना और 239 नागरिकों का मारा जाना भी चीख़-चीख़कर मोदी-राज की नाकामी की दास्ताँ ही सुना रहा है। जम्मू-कश्मीर में सेना के बड़े ठिकानों ख़ासकर पठानकोट, उरी और नगरोटा जैसी वारदातों ने दिखा दिया कि रक्षा और गृह मंत्रालय तथा ख़ुफ़िया विभाग की क़मान अपने हाथों में रखने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की रणनीतियों से राज्य के हालात दिन-ब-दिन बद से बदतर ही होते रहे। कश्मीर का अमन-चैन ही नहीं, वहाँ के लोगों के रोटी-रोज़गार की तबाही और युवाओं का बड़े पैमाने पर पत्थरबाज़ बनने के सिलसिले से जितनी मिट्टीपलीद मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की हुई, उससे कहीं ज़्यादा संघ-बीजेपी की पोल खुलती रही!

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लाहौर जाना और ‘एक के बदले दस सिर लाने’ जैसे वीर रस से ओत-प्रोत भाषणों की कलई भी अब खुल चुकी है। महबूबा के साथ गलबहियाँ करने से पहले संघ-बीजेपी जिस तरह से जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने की बातें किया करता था, जैसे कश्मीरी पंडितों को बीजेपी के सत्तासीन होते ही घर-वापसी के सब्ज़बाग़ दिखाये गये थे, सैनिक ताक़त की बदौलत जैसे पाक अधिकृत कश्मीर को छीनने की बातें की जाती थीं, उसे कौन भूल सकता है। लेकिन ऐसी सभी बातों की हक़ीक़त अब सबके सामने है। जम्मू-कश्मीर में केन्द्र सरकार की ओर से दिनेश्वर शर्मा को वार्ताकर नियुक्त करके जैसी लीपापोती की गयी, उसकी गम्भीरता भी अब देश के सामने है।

मोदी-राज के दौरान जम्मू-कश्मीर के सन्दर्भ में पर्दे के सामने या उसके पीछे, जो कुछ भी हुआ, उसने राज्य और देश को भारी नुकसान पहुँचा है। 2015 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी में सत्ता की मलाई खाने की जो ललक पैदा हुई, उससे भी उसकी मुसलिम विरोधी छवि में कोई गिरावट नहीं आयी। बीजेपी के प्रति कश्मीर घाटी में हमेशा से नफ़रत का माहौल रहा है। क्योंकि कश्मीरीयत और साम्प्रदायिकता कभी साथ-साथ नहीं चल सकते। उधर, चौतरफ़ा नाक़ामी के बावजूद महबूबा के हिस्से में इतनी क़ामयाबी तो आयी ही कि वो अपने समर्थकों को बता सकें कि उन्होंने संघ-बीजेपी को 370 से दूर रहने के लिए मजबूर बनाये रखा।

तीन साल की सत्ता के बाद बीजेपी ने पहली बार ये क़बूल किया कि कश्मीर में हालात बहुत ख़राब हो चुके हैं। झूठ फैलाने की अपनी आदत के मुताबिक़, संघियों की ओर से अपनी नाक़ामी का ठीकरा महबूबा के सिर फोड़ने की रणनीति में कुछ भी अटपटा नहीं है। अब तो नये झूठ गढ़े जाएँगे कि ‘मोदी की नोटबन्दी की बदौलत आतंकवाद की क़मर टूट चुकी थी, लेकिन ऐसा होता देख महबूबा ने ही आतंकवादियों के पास रुपये भेजने शुरू कर दिये थे!’ संघी ये झूठ भी फैलाएँगे कि ‘महबूबा नहीं चाहती थीं कि सेना खुलकर आतंकवादियों की सफ़ाया करे, इसीलिए उनकी सरकारी गिरा दी गयी।’ 370 को लेकर भी नये झूठ सामने आएँगे।

कश्मीर और कश्मीरियत को समझने वाले हर शख़्स जानता है कि पीडीपी और बीजेपी का गठबन्धन शुरू से ही नापाक था। ये रिश्ता पहले दिन से ही ‘कुत्ते-बिल्ली की शादी’ की तरह बेमेल था। मुफ़्ती मोहम्मद सईद और संघ-बीजेपी ने 2015 में जिस लाचारी की वजह से इसे बनाया था, वो मुफ़्ती साहब के निधन के बाद से ही ज़िन्दा लाश बन चुकी थी। सियासी मजबूरियों की वजह से महबूबा इसे ढो रही थीं। उधर, येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करने की भूखी बीजेपी के लिए इससे सुनहरा मौक़ा शायद ही कभी आ पाता! क्योंकि संघ की ख़्वाहिश महज सत्ता नहीं, बल्कि इसके ज़रिये हिन्दू-राष्ट्र तक पहुँचना है।

महबूबा की सरकार को चलाते रहने से संघ-बीजेपी का हाल ‘माया मिली ना राम’ वाला हो चुका था। भगवा ख़ानदान को अब 2019 की चिन्ता सता रही है। उसे साफ़ दिख रहा है कि मोदी राज के ‘अच्छे दिन’, ‘विकास’, ‘तेज़ी से कड़े फ़ैसले लेने वाले’ जैसी हरेक बात या वादा सिर्फ़ जुमला ही साबित हुआ है। इसीलिए यदि चुनाव तक हिन्दुओं को डराकर उनका वोट बटोरने की नीति परवान नहीं चढ़ी तो मोदी सरकार को गिरने से कोई नहीं बचा सकता। भगवा ख़ानदान के पास अब अपनी इसी भूल को दोहराने के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचा है। 2014 में भगवा-झूठ का खाद-पानी पाकर जो मोदी लहर लहलहाने लगी थी, वही अब साथ छोड़ती परछाई में बदलती जा रही है। मोदी नाम की ब्रॉन्डिंग और सरकार की झूठी उपलब्धियों का बख़ान अब जनता को और नहीं बरगला पा रहा।

बीजेपी को कश्मीर जीतने के लिए अभी कई चुनाव लड़ने होंगे। इसीलिए कश्मीर के चक्कर में वो देश की सत्ता के हाथ से निकल जाने के आसार को देखकर ख़ौफ़ज़दा है। अब राष्ट्रपति शासन लगाकर बीजेपी भले ही परोक्ष रूप से राज्य की सत्ता को पूरी तरह से अपनी मुट्ठी में कर ले, लेकिन कश्मीरियों का भरोसा वो कभी नहीं जीत पाएगी। अवाम के जज़्बातों से खिलवाड़ करने वाले बड़े-बड़े शूरमाओं की सरकारों के हाथ जल जाते हैं। तो नरेन्द्र मोदी किस खेत की मूली हैं! अभी तो महबूबा सरकार गिराकर संघ-बीजेपी ने भी अपने हाथ वैसे ही जलाये हैं, जैसे इस सरकार को बनाते वक़्त महबूबा ने अपने हाथ जलाये थे।

बहरहाल, एनडीए के बिखरने का मौसम दस्तक दे चुका है। चन्द्रबाबू नायडू (टीडीपी) ने बीजेपी का साथ छोड़ा। चन्द्रशेखर राव (टीआरएस) ने छोड़ा। शिव सेना (उद्धव ठाकरे) ने एकला चलो का राग छेड़ रखा है। महबूबा मुफ़्ती (पीडीपी) को तलाक़ मिल चुका है। सुदेश महतो (ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन यानी आजसू) विदाई की ओर बढ़ रहे हैं। नीतीश कुमार (जेडीयू) तो जन्मजात पलटू राम हैं ही। उपेन्द्र कुशवाहा (आरएलएसपी) वाज़िब मुद्दे उठाकर मोल-तोल कर रहे हैं। रामविलास पासवान (एलजेपी) दलितों को लेकर मुखर दिखने की कोशिश कर रहे हैं। बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता आये दिन अपनी पार्टी और मोदी-शाह के ख़िलाफ़ बयान दे रहते हैं।

सारा माहौल भक्तों को साफ़ सन्देश दे रहा है कि ‘इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या, आगे-आगे देखिये होता है क्या!’

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