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घिनौने भारतीयों के नियम

उन्मादियों के ‘अच्छे दिन’ में इंसाफ़, गरिमा और बहस की गुंज़ाइश ही नहीं!

2014 के बाद से घिनौने भारतीयों की तादाद में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ है। इन्होंने राजनीतिक सत्ता का भारी चोट पहुँचायी है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अब ख़बरें दिखाने के नहीं बल्कि ऐसे नज़रिया को फैलाने के सरकारी भोंपू बन गये हैं, जो खोखले मूल्यों पर आधारित हैं। लोकतंत्र का इम्तिहान चल रहा है। देश में तरह-तरह के उन्मादियों का बोलबाला है।

तर्कवादी गौरी लंकेश की हत्या भी बिल्कुल वैसे ही की गयी है, जैसे सुबह की सैर कर रहे डॉ नरेन्द्र डाभोलकर को पुणे में 20 अगस्त 2013 को मार गिराया गया। इसी तरह, कोल्हापुर में गोविन्द पंसारे को फरवरी 2015 में उस वक़्त गोली मार दी, जब वो अपनी पत्नी उमा के साथ टहल रहे थे। हत्यारे मोटरसाइकिल पर सवार थे। धारवाड में अगस्त 2015 में एम एम कलबुर्गी को भी यही दिन देखने पड़े। किसी भी मामले में अभी तक हत्यारों का पता नहीं लगा है। ये तो हमारी पुलिस नकारा है या फिर उसकी जाँच सही नहीं है।

‘हिन्दू-विरोधी’ तर्कवादियों को सबक सिखाया जा रहा है। यही काम सड़कों पर पीट-पीटकर मार डालने वाले भी कर रहे हैं। ये लोग दलितों और मुसलमानों को ऐसे अपना निशाना बना रहे हैं, मानो यही उनका पेशा हो! कहीं कोई पकड़ा भी गया तो उसके ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की नौबत नहीं आती। जो धरे भी जाते हैं, उनके ख़िलाफ़ इंसाफ़ का पहिया जोश से नहीं घूमता। बड़ी आसानी से ज़मानत मिल जाती है। राजनीति में मौजूद घिनौने भारतीयों की चाहत ख़ून का बदला ख़ून बन चुकी है। हिंसा, दस्तूर बन चुका है।

टीवी चैनलों पर हमें ऐसे घिनौने चेहरे ही दिखते हैं, जो एक ख़ास मानसिकता का प्रलाप करने में गर्व महसूस करते हैं। तर्क का कोई स्थान नहीं बचा। संवाद की कोई गुंज़ाइश नहीं है। तीख़ी राय को एंकर का समर्थन मिलता है। तार्किक बातें करने वालों की आवाज़ दबा दी जाती है और बेहूदा बातों के ज़रिये दर्शकों को मनोरंजन किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बड़े हिस्से की दिलचस्पी सच को जानने और बताने में नहीं रही। नज़रिया भी काल्पनिक ही होता है।

घिनौने लोगों की अगली प्रजाति सोशल मीडिया पर निन्दा करने वालों (ट्रोलर्स) की है। ये लोग ग़ाली-ग़लौज़ करते हैं, उत्तेजकता दिखाते हैं, किसी बात को समझने-समझाने से इनका कोई ताल्लुक नहीं होता, ये असहिष्णु बाहुबलियों की तरह बर्ताव करते हैं। जिन बातों से वो असहज होते हैं, उसका रुख़ ही मोड़ देते हैं। अज्ञानियों में सच को जानने की ख़्वाहिश नहीं होती। भाड़े के निन्दकों के शब्द भी अभद्र होते हैं। वो आत्मरक्षा के लिए आक्रमण को ही सही समझते हैं। निन्दकों को चुनौती देना या उनसे सवाल पूछना बेहद ख़तरनाक है। वो ग़ालियाँ देने लगते हैं। इस दौर में घिनौने भारतीयों की पौ-बारह है और हमें ख़ामोश रहना है।

घिनौने भारतीयों की एक और क़िस्म उस वक़्त नज़र आती है, जब सरकारी उपेक्षा और लापरवाही की वजह से गोरखपुर और फ़र्रूख़ाबाद में मासूमों की मौत होती है। उनकी दलील होती है कि इंसेफ़लाइटिस से पहले भी मौते होती रही हैं। मौत ऑक्सीजन की कमी की वजह से होती है, लेकिन तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा जाता है। मीडिया को ख़ामोश कर दिया जाता है। सरकार अपने ढर्रे पर ही चलती रहती है। घिनौने भारतीयों को लोग देखते रहते हैं, वो बेफ़िक्र रहते हैं, उन्हें कोई उन्हें छूता तक नहीं।

ग़रीब को अस्पताल की फर्श पर खाना परोसा जाता है। फिर भी अन्तर्आत्मा नहीं झकझोरती। मृतकों के प्रति अमानवीय रवैये से भी हमारी गरिमा अप्रभावित रहती है। हम लाशों के ठेले पर, साइकिल पर और यहाँ तक कि कंधों पर ढोये जाने को देखते रहते हैं। 16 दिसम्बर 2012 को राजधानी दिल्ली में हुए निर्भया कांड में भले ही सज़ा-ए-मौत मिली हो, लेकिन बलात्कार की वारदातें घट नहीं रहीं। सरकार की सेवा में लगे कान्ट्रेक्ट टीचर्स को दस हज़ार रुपये महीना या इससे भी कम के वेतन पर काम करना पड़ता है।

अध्यापक, हमारी सबसे उपेक्षित सम्पदा हैं। उनके पास युवाओं को दिशा देने लायक साधन नहीं हैं। ग्रामीण इलाकों में तो कई जगह छात्र-शिक्षक अनुपात 90:1 है। अध्यापकों की ग़ैरहाज़िरी सामान्य बात है। शिक्षा से जुड़ी वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक़, कक्षा पाँच के छात्र सिर्फ़ कक्षा दो तक की ही पुस्तकें पढ़ पाते हैं। युवाओं की शिक्षा के प्रति घिनौने भारतीयों की कोई प्रतिबद्धता नहीं है। उच्च शिक्षा संस्थानों में भरपूर भ्रष्टाचार है। मेडिकल शिक्षा भी उन माफ़ियाओं के शिकंजे में है जो दाख़िलों में ही हेराफेरी कर लेते हैं।

रईसों के लिए सस्ता निर्यात और महँगा आयात करके पैसे बनाना सबसे आसान है। आयात की क़ीमत को बढ़ाचढ़ाकर दिखाने (ओवर इनव्यासिंग) को रातों-रात क़ानूनी बना दिया जाता है। काले धन को देश के बाहर भेजने का ये आसान तरीक़ा है। उद्यमी ज़्यादा क़र्ज़ बटोरने के लिए अपने प्रोजेक्ट की लागत को बढ़ाचढ़ाकर दिखाते हैं। इससे बैंक के आसमान छू रहे एनपीए का बोझ पैदा हुआ और इसका बोझ आम करदाताओं पर पड़ रहा है। ग़रीब की मुट्ठी खाली ही रहती है, लेकिन धन्ना सेठों को जनता के पैसों को हज़म करके विदेश भागने दिया जाता है। नोटबन्दी की वजह से देश को कम से कम 3 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। लेकिन घिनौने भारतीय इसका बचाव करते हैं। दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों ने नोटबन्दी को ऐसी आपदा बताया है, जिससे हुए नुकसान की भरपायी नहीं हो सकती। ग़रीबों का भट्ठा बैठ गया। लेकिन अमीरों का काला धन बैंकों में जमा होकर सफ़ेद बन गया। इसमें घिनौने बैंकरों की पूरी मिलीभगत रही। घिनौने भारतीयों को राजनीति के सामने अर्थनीति बेमानी लगती है।

घिनौने भारतीयों ने किसानों को उनका हक़ देने से इनकार कर दिया है। सूखे के वक़्त किसान इसलिए आत्महत्या करते हैं, क्योंकि वो साहूकार का क़र्ज़ नहीं उतार पाते। बारिश यदि भारी हो गयी तो किसान की फ़सल डूब जाती है। यहाँ तक कि उसके सिर पर छत भी नहीं बचती। नौकरशाही के जंजाल से मुट्ठी भर किसान ही फ़सल बीमा की रक़म ले पाते हैं। घिनौने नौकरशाह अच्छी तरह जानते हैं कि सत्ता के गलियारे में बैठा उनका बॉस (राजनेता) क्या सुनना चाहता है! हिंसा फैलाने वालों को सरकार से ईनाम मिलता है। ख़ुद को औरों से अलग दिखाने वाले बेशर्म लोगों का कहना है कि वो दबाव में नहीं आते। इनके राजनीतिक शब्दकोश में नैतिकता नाम का शब्द ही नदारद है।

समुदायों को तार-तार किया जा रहा है। विवेकपूर्ण लोगों को ख़ामोश रहने के लिए मज़बूर किया जा रहा है। महिलाएँ और बच्चे सबसे अधिक असुरक्षित हैं। ग़रीबों और कमज़ोरों को बेज़ुबान बना दिया गया है। अभी घिनौने भारतीयों की सत्ता है। सड़कों चलते लोगों को मौत के घाट पहुँचा दिया जाता है क्योंकि घिनौने भारतीय जानते हैं कि उनका कुछ नहीं बिगाड़ेगा। उम्मीद है कि चौतरफ़ा पतन के मौजूदा दौर के ख़िलाफ़ कोई तो खड़ा होगा। अभी तो सत्ता हमसे धोखा कर रही है और हम सत्ता से। यही वजह है कि घिनौने भारतीय कहके हैं कि ‘अच्छे दिन’ आ चुके हैं।

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस। लेखक राज्यसभा सांसद, वरिष्ठ काँग्रेस नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं।)

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