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बात महात्मा गांधी की, काम उसके ठीक उलट : राजगोपाल

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Gandhi Ji

भोपाल, 26 जनवरी | एकता परिषद के संस्थापक पी.वी. राजगोपाल का कहना है कि देश के 69वें गणतंत्र दिवस पर सभी राजनेता महात्मा गांधी के आदर्शो को अपनाने और उस पर चलने की बात तो कर रहे हैं, मगर उस पर अमल नहीं होगा।

यही कारण है कि राष्ट्रीय पर्व के बावजूद गरीब को गड्ढ़ा खोदकर, पसीना बहाकर रोटी का इंतजाम करना पड़ रहा होगा।

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एकता परिषद के संस्थापक और गांधीवादी नेता डॉ. पी.वी. राजगोपाल

राजगोपाल को अभी हाल ही में पुणे में आयोजित ‘छात्र संसद’ में कृषि योद्धा पुरस्कार दिया गया। उन्होंने गणतंत्र दिवस के मौके पर आईएएनएस से दूरभाष पर बातचीत करते हुए कहा, “संविधान में आम आदमी को मतदान का अधिकार दिया गया तब भी बात उठी थी कि आर्थिक अधिकार भी मिलना चाहिए। तब ऐसा नहीं हो पाया। उसी का नतीजा है कि तमाम अध्ययन बता रहे हैं कि इस देश की 73 फीसदी संपत्ति पर सिर्फ एक फीसदी लोगों का अधिकार है और शेष लोग रोज कमाने खाने में अपनी जिंदगी निकाल देते हैं।

राजगोपाल ने कहा, “गणतंत्र दिवस हो या स्वाधीनता दिवस या अन्य राष्ट्रीय पर्व हर मौके पर राजनेता और सरकारें महात्मा गांधी को याद करते हैं। आज भी ऐसा हुआ मगर यह सिर्फ बातें ही हैं, इन बातों पर आजादी के बाद आज तक अमल नहीं हुआ, अगर अमल हुआ होता तो देश में इतनी आर्थिक विषमता नहीं होती।”

महात्मा गांधी की भावना और संदेशों का जिक्र करते हुए राजगोपाल ने कहा, “गांधी ने कहा था कि आप जो भी योजनाएं बनाएं, अंतिम व्यक्ति को अपनी नजर में रखें, अंतिम व्यक्ति को ताकतवर बनाएंगे तभी आपको यह कहने का अधिकार है कि हमने विकास किया। एक बार फिर गांधी को याद करने और उनके बताए मार्ग पर चलने का समय आ गया है।”

एक सवाल के जवाब में राजगोपाल ने कहा, “वास्तव में अंतिम व्यक्ति को सक्षम और ताकतवर बनाना है तो योजनाएं गांव के स्तर पर बनानी होगी, दिल्ली या भोपाल से बनी योजनाएं गांव की हालत नहीं बदल सकती। अभी हाल ही में ‘सस्टेनेवल गोल’ में भारत सरकार ने वर्ष 2030 तक देश में गरीबी खत्म करने का वादा किया है मगर जब तक लोगों को जमीन नहीं मिलेगी, काम नहीं मिलेगा, जीने के संसाधन नहीं मिलेंगे, सम्मान को बढ़ाएंगे नहीं, तो गरीबी मिटाएंगे कैसे। गरीबी मिटाने का काम पलभर में तो नहीं होगा।”

उन्होंने कहा, “गांव के सारे संसाधन जमीन, खदान, जंगल जब सरकारें पूंजीपतियों को देगी और गांव वालों को धक्का मारकर झुग्गी-झोपड़ी में रहने को मजबूर करेंगी तो सवाल उठता है कि आखिर गरीबी दूर होगी कैसे।”

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सहरिया आदिवासियों को एक हजार रुपये प्रतिमाह दिए जाने की घोषणा पर राजगोपाल ने कहा कि हजार दो हजार रुपयों से इन परिवारों का क्या होगा। जब तक गांव स्तर पर योजना नहीं बनेगी उनकी जरूरतों को ध्यान नहीं रखा जाएगा तब तक गांव की स्थिति और गरीबी खत्म नहीं हो सकती। उन गांव के पंच और सरपंचों को प्रोत्साहित करना होगा जो गरीबी मिटाने और गांव को संपन्न बनाने की कोशिश करें। इसके लिए प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित करना होगी, जैसी रेलवे प्लेटफॉर्म की सफाई को लेकर प्रतिस्पर्धा का दौर चल रहा है और अच्छे स्टेशन पुरस्कृत किए जा रहे हैं।

राजगोपाल का मानना है कि गांव के विकास की जिम्मेदारी पंचायतों को सौंपनी चाहिए। सरकार अपने स्तर पर हालात नहीं बदल सकती है। वर्तमान में जो चल रहा है उससे न तो गरीबी खत्म होगी और न ही भ्रष्टाचार। लिहाजा सरकारों को अपना तरीका बदलना हेागा। गांव को अपनी जिम्मेदारी उठाने के लिए छोड़ना होगा। बच्चा भी जब पांच साल का हो जाता है तो मां-बाप उंगली पकड़कर चलाना छोड़ देते हैं, ताकि वह गिरे और खुद चलना सीखे, मगर सरकारें आजादी के 70 साल बाद भी गांव की उंगली छोड़ने को तैयार नहीं है।

(आईएएनएस)

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गन्ना उत्पादकों का बकाया 9 हजार करोड़ रुपये चिंता का विषय : एनएफसीएसएफ

चालू गन्ना पेराई वर्ष 2017-18 (अक्टूबर-सितंबर) में देशभर में चालू 504 चीनी मिलों में 15 जनवरी 2018 तक 135.37 लाख टन चीनी का उत्पादन हो चुका था।

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Sugarcane growers

चीनी की कीमतों में गिरावट से भले ही उपभोक्ता को सस्ती चीनी में ज्यादा मिठास का अनुभव हो रहा हो, लेकिन गन्ना उत्पादक किसानों के लिए एक बार फिर यह कड़वा अनुभव देने वाला साबित हो सकता है। चालू गन्ना पेराई वर्ष 2017-18 (अक्टूबर-सितंबर) में चीनी मिलों पर गन्ना उत्पादकों का बकाया साढ़े नौ हजार करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है और चीनी मिलों के सामने नकदी का संकट पैदा हो गया है जिससे किसानों को गóो की कीमतों का भुगतान नहीं हो रहा है।

सहकारी चीनी मिलों का शीर्ष संगठन नेशनल फेडरेशन ऑफ कॉपरेटिव शुगर फैक्टरीज लिमिटेड (एनएफसीएसएफ) के प्रबंध निदेशक प्रकाश नाइकनवरे बुधवार को आईएएनएस को बताया कि मंगलवार शाम तक देशभर की चीनी मिलों पर इस सत्र में किसानों खरीद किए गए गóो के एवज में भुगतान की जाने वाली राशि का बकाया 9,576 करोड़ रुपये हो गया है, जिसमें सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में 3,940 करोड़ रुपये है।

चीनी उद्योग की खराब सेहत के बारे में आईएएनएस से बातचीत में नाइकनवरे ने कहा, “चिंता का विषय यह नहीं है कि इस साल चीनी का उत्पादन ज्यादा है क्योंकि 260 लाख टन उत्पादन के अनुमान का आंकड़ा कोई बहुत बड़ा नहीं है। हमारी सालाना खपत भी 250 लाख टन के आसपास है। किसानों को समय पर गóो का भुगतान नहीं होना और उनका बकाया उत्तरोत्तर बढ़ता जाना हमारे लिए ज्यादा गंभीर चिंता की बात है।”

उन्होंने कहा कि चीनी के भाव में गिरावट होने से मिलों के सामने नकदी की समस्या पैदा हो गई है जिससे किसानों को गóो का भुगतान समय से नहीं हो पा रहा है और उनका बकाया बढ़ता जा रहा है। नाइकनवरे के मुताबिक, चालू सत्र में चीनी की कीमतों में उत्तर प्रदेश में 15 फीसदी गिरावट आई है। वहीं महाराष्ट्र में चीनी के भाव में 16 फीसदी, कर्नाटक में 17 फीसदी और तमिलनाडू में 12 फीसदी की गिरावट आई है। उन्होंने बताया कि एथेनॉल और मोलैसिस यानी शीरा से भी चीनी मिलों की लागत की भरपाई नहीं हो पा रही है।

नाइकनवरे ने कहा कि वर्ष 2017-18 में निश्चित रूप से मांग के मुकाबले आपूर्ति 50 लाख टन ज्यादा है लेकिन 10-20 लाख टन निर्यात हो जाने पर आपूर्ति आधिक्य की समस्या नहीं रहेगी।

उन्होंने कहा, ” इस साल हमने 260 लाख टन चीनी उत्पाद का अनुमान लगाया है और 40 लाख टन पिछले साल का स्टॉक है। इस प्रकार आपूर्ति 300 लाख टन है जबकि मांग 250 लाख है। इस साल के अंत में हमारे पास 50 लाख टन अंतिम स्टॉक बचेगा, लेकिन चीनी निर्यात एवं बफर स्टॉक को लेकर हमारी सरकार से बात चल रही है। हम चीन, इंडोनेशिया, बांग्लादेश और श्रीलंका को चीनी निर्यात कर सकते हैं।”

नाइकनवरे के मुताबिक, 2006-07 में सरकार ने 50 लाख टन चीनी का बफर स्टॉक किया था, अगर इस बार भी सरकार 20 लाख चीनी का बफर स्टॉक कर लेती है तो कीमतों में गिरावट की समस्या नहीं रहेगी और चीनी मिलों का संकट दूर हो जाएगा।

पाकिस्तान से चीनी आयात के विषय पर नाइकनवरे ने कहा कि 2000 टन चीनी पाकिस्तान से आई थी, लेकिन यह अक्टूबर की ही बात है। उन्होंने कहा, “इस समय चीनी पर आयात कर 50 फीसदी और निर्यात कर 20 फीसदी है। मौजूदा दर पर पाकिस्तान से चीनी आयात हो सकती है क्योंकि पाकिस्तान ने 11.50 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से चीनी पर सब्सिडी दी है और यह और भी सस्ती हो जाएगी जब सिंध्र प्रांत की ओर से प्रस्तावित 7.50 रुपये प्रति किलोग्राम की सब्सिडी इसमें जुड़ जाएगी। यही कारण है कि हम सरकार से चीनी पर आयात कर बढ़ाकर 100 फीसदी करने की मांग की है।” उन्होंने कहा कि चीनी निर्यात को सुगम बनाने के लिए सरकार से निर्यात कर भी समाप्त करने की मांग की गई है।

चालू गन्ना पेराई वर्ष 2017-18 (अक्टूबर-सितंबर) में देशभर में चालू 504 चीनी मिलों में 15 जनवरी 2018 तक 135.37 लाख टन चीनी का उत्पादन हो चुका था।

प्रमोद कुमार झा

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हज 2018 होगा महंगा, मगर सब्सिडी की समाप्ति वजह नहीं

केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मंगलवार को इस साल से हज सब्सिडी की समाप्ति की घोषणा की थी।

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haj-2018

हज 2018 की यात्रा पिछले साल के मुकाबले ज्यादा महंगी रहने वाली है। लेकिन इसकी वजह सरकार द्वारा मंगलवार को सब्सिडी समाप्त करने की घोषणा नहीं है।

इसके पीछे का कारण हज के दौरान सऊदी अरब में होने वाला खर्च है, जिसमें रहना, परिवहन, खाना और दूसरी चीजें शामिल हैं। यहां ध्यान दिलाने वाली बात यह है कि सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी इन खर्चो का वहन नहीं करती और साथ ही वह हवाई सफर में भी सीमित है।

भारतीय हज समिति (एचसीआई) के अध्यक्ष महबूब अली कैसर ने आईएएनएस को बताया कि कीमतों पर नियंत्रण के लिए सऊदी प्रशासन से सौदेबाजी करना कठिन था, लेकिन इस साल स्थानीय कारक हज की यात्रा में खर्चा बढ़ा सकते हैं।

2017 में एचसीआई हज के लिए साधारण आवास (अजीजिया) के साथ दो लाख रुपये और डीलक्स आवास (ग्रीन) के साथ 234,000 रुपये वसूलता था। डीलक्स आवास (ग्रीन) मक्का में हरम के समीप है।

कैसर ने कहा, “पिछले साल से सऊदी अरब में बिजली का शुल्क तीन गुना बढ़ गया है। इसके साथ ही पेट्रोल की कीमतें भी दोगुनी हो चुकी हैं। आवास की कीमतें भी बढ़ रही हैं। ये सभी कारक इस साल हज में आने वाली कुल लागत को बढ़ा सकते हैं।”

उन्होंने कहा कि इस वक्त हज 2018 में प्रत्येक श्रद्धालु पर आने वाली अंतिम लागत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

उन्होंने कहा, “ऐसा मानना बेमानी होगी कि बिजली की कीमतों में तीन गुना और पेट्रोल की कीमतों में दोगुनी वृद्धि हो जाने पर हर बार सऊदी अरब में सभी चीजों की कीमतें समान रहेंगी। दूसरा, सऊदी के लोग सौदेबाजी करने वालों को गाली देते हैं और हमें उनसे हर रियाल के लिए वास्तव में बहुत सौदेबाजी करनी पड़ी।”

कैसर ने कहा, “तब भी, हम अपना सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास कर रहे हैं और उनसे बहुत सौदेबाजी कर रहे हैं, ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि कीमतें जबरदस्त रूप से न बढ़ें।”

केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मंगलवार को इस साल से हज सब्सिडी की समाप्ति की घोषणा की थी।

कैसर ने कहा कि एचसीआई को पता था कि ऐसा होने वाला है और इसके लिए हम मानसिक रूप से तैयार थे।

उन्होंने कहा, “किसी भी हालत में सब्सिडी को वापस लेने का फैसला मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद और बेंगलुरू जैसे बड़े शहरों के हवाई किराए को प्रभावित नहीं करेगा, लेकिन श्रीनगर, गया जैसे छोटी जगहों से किराया बढ़ सकता है। लेकिन इन राज्यों के लोग जहां किराया कम है, जैसे मुंबई, दिल्ली और अहमदाबाद जाकर उड़ानें पकड़ सकते हैं।”

हालांकि आने वाले वर्षो में हज की लागत कम होने के आसार हैं, क्योंकि भारत सरकार पहले से ही जेद्दाह जाने वाले समुद्री रास्ते को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम कर रही है।

नकवी ने कहा कि सरकार ने इस बाबत पहले से ही इस दिशा में सक्रिय कदम उठाए हैं और एक बार लागू होने के बाद किराये में जबरदस्त गिरावट आएगी।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि हज सब्सिडी की शुरुआत 1980 (जब आजाद एचसीआई के सदस्य थे) के दशक में हुई थी, जब हज यात्रियों को ढोने वाली जहाजें पुरानी होने लगी थीं।

आजाद ने कहा, “बजट की कमी के कारण सरकार ने नई जहाजों की खरीद पर पैसा नहीं खर्च किया था। इस लिए श्रद्धालुओं को जेद्दाह ले जाने के लिए उड़ानें शुरू करने का फैसला किया गया था। लेकिन हवाई सफर जहाज के किराए से चार गुना महंगा था। इसलिए सरकार ने उस लागत का वहन करने के लिए सब्सिडी का भुगतान करना शुरू किया था।”

समुद्री रास्ते को 1995 में बंद कर दिया गया था।

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ओपिनियन

मोदी विरोधी चेहरा के रूप में उभरीं ‘दीदी’

देश की सभी संस्थाओं पर हमले हो रहे हैं। यह एक खतरनाक खेल है। प्रधानमंत्री कालिदास की तरह व्यवहार कर रहे हैं, वह जिस शाखा पर बैठे हैं उसी को काटने की कोशिश कर रहे हैं।

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जिन्हें उनके समर्थक ‘दीदी’ कहते हैं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विरोधी अपनी लय को बरकरार रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर साल भर हमलावर रहीं। उन्होंने अपने भाषणों व सोशल मीडिया पर लेखों व व्यंग्य के जरिए मोदी सरकार पर कड़े हमले किए और उनकी सरकार का केंद्र से कई मुद्दों पर संघर्ष जारी रहा।

पौराणिक कथाओं से लेकर प्राचीन भारतीय इतिहास तक तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी मोदी पर सभी तरह के हमलावर रहीं, जबकि पश्चिम बंगाल में भाजपा का वोट शेयर विभिन्न उपचुनावों व स्थानीय निकाय के चुनावों में बढ़ना जारी रहा।

भाजपा ने जिस तरह से तृणमूल के विकल्प के तौर पर उभरने का प्रयास किया, ममता ने इसके उलट राष्ट्रीय तौर पर खुद को हिंदुत्व समूह के प्रमुख विरोधी के तौर पर पेश किया।

ममता ने क्षेत्रीय नेताओं के साथ मिलकर संघ परिवार का विरोध किया और अपने फैसलों व कार्रवाई से केंद्र के कामकाज पर दबाव बनाया व अपना हित साधा।

उन्होंने मोदी की प्रमुख नीतियों जैसे नोटबंदी व वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लेकर उन पर निशाना साधा, जबकि आर्थिक वृद्धि में गिरावट, अहिष्णुता, गोमांस प्रतिबंध व गोरक्षकों जैसे ज्वलंत मुद्दों से फायदा उठाने की कोशिश की।

हालांकि, वह मोदी पर जोरदार हमलों की वजह से सुर्खियों में रहीं।

ममता ने एक मौके पर मोदी की तुलना संस्कृत के महान कवि व नाटककार कालिदास से की थी। हालांकि उन्होंने तुलना उस कालिदास से की थी, जिसे कभी महान मूर्ख समझा जाता था। कहानी का संदर्भ यह था कि राजकुमारी विद्योत्तमा के लिए जब महामूर्ख की तलाश की जा रही थी तो देखा गया कि एक युवक बुद्धिमत्ता की कमी की वजह से जिस डाल पर बैठा था, उसी को काट रहा था। वह युवक कालिदास था, जो विद्योत्तमा के साथ विवाह के बाद बुद्धिमान बना।

ममता बनर्जी ने अपनी टिप्पणी में कहा, “देश की सभी संस्थाओं पर हमले हो रहे हैं। यह एक खतरनाक खेल है। प्रधानमंत्री कालिदास की तरह व्यवहार कर रहे हैं, वह जिस शाखा पर बैठे हैं उसी को काटने की कोशिश कर रहे हैं।”

ममता ने अपने एक अन्य आक्रामक भाषण में मोदी व रामायण महाकाव्य के दैत्य राजा रावण की तुलना की।

मोदी के 56 इंच के सीने की टिप्पणी का जिक्र करते हुए ममता ने कहा, “वह दावा करते हैं कि उनका सीना व कंधा चौड़ा है। रावण के कंधे भी चौड़े थे और उसके दस सिर थे।”

बंकुरा जिले में एक सार्वजनिक सभा में ममता बनर्जी ने मोदी पर फिर से हमला किया और मोदी सरकार को ‘गूंगा व बहरा’ बताया।

उन्होंने कहा, “वह पहले खुद को चायवाला कहते थे। अब वह करोड़पति पेटीएम वाला बन चुके हैं।”

ममता बनर्जी ने नोटबंदी को ‘शर्मनाक’ बताया और ट्विटर पर मोदी के इस फैसले को ‘एक तानाशाह की दृष्टिहीन, उद्देश्यहीन व दिशाहीन फैसला’ बताकर खारिज किया था।

ममता बनर्जी ने लोकतांत्रिक प्रदर्शन के हर तरीके को अपनाया। उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का दरवाजा भी खटखटाया था और उनसे देश की अव्यवस्था को बचाने का आग्रह किया था।

ममता ने मोदी से इतर भाजपा के दूसरे नेताओं- लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह व अरुण जेटली के नेतृत्व को स्वीकार करने की बात कही।

जीएसटी को समर्थन देते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि मोदी सरकार ने इस नई प्रणाली को ‘विनाशकारी रूप से जल्दबाजी’ में एक जुलाई से लागू कर दिया। उन्होंने केंद्र के इस कदम को ‘एक अन्य बड़ी भूल’ बताया।

हालांकि, ममता बनर्जी ने ‘संयुक्त नेतृत्व’ के जरिए मोदी को चुनौती देने पर जोर दिया। लेकिन एक मीडिया कॉन्क्लेव में बीते महीने उन्होंने संकेत दिया कि वह 2019 में सभी विपक्षी दलों को भाजपा के खिलाफ एक मंच पर लाने में कोई भूमिका निभाने नहीं जा रही हैं, कोई ऐसा साझा मंच बनेगा तो उसका समर्थन जरूर करेंगी।

By : शीर्षेदु पंत

–आईएएनएस

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