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Ravi Shankar Prasad Ravi Shankar Prasad

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मोदी ही बता दें कि नोटबन्दी से देह-व्यापार और गाँधी परिवार को कितना नुकसान हुआ?

यदि इस लेख में पेश सवालों का जबाव देश के सामने नहीं आएगा तो भी क्या देश को ये मानकर चलना चाहिए कि रविशंकर प्रसाद और स्मृति इरानी जैसे नेता सच बोलते हैं, सोच-समझकर बोलते हैं और ठोक-बजाकर बोलते हैं। लिहाज़ा, इन्हें मोदी सरकार का नग़ीना बना ही रहना चाहिए।

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मोदी राज में विश्व गुरु बनने निकला भारतवर्ष दो महान न्यायविदों और एक बड़बोला विदुषी के चंगुल में बहुत बुरी तरह से फँस चुका है। पहले न्यायविद हैं महामहिम अरूण जेटली। जो दुर्भाग्य से अभी देश के वित्त मंत्री हैं। इन्होंने नोटबन्दी और खोटे जीएसटी के रूप में सवा सौ करोड़ भारतीयों पर ऐसा कहर बरपा किया है, जिसकी मिसाल सहस्त्राब्दी (मिलेनियम) में भी मिलना नामुमकिन है! जेटली और इनके मुखिया नरेन्द्र मोदी की करतूतों का अंज़ाम तो भारतवासी भुगत ही रहे हैं। लेकिन, चूँकि देश का बँटाढार करने में इनकी मूर्खताओं में कोई कसर न रह जाए, इसलिए इनके बचाव का मोर्चा जब-तब एक और महान न्यायविद रविशंकर प्रसाद सम्भाल लेते हैं। इतना ही नहीं, रही-सही कसर को देवी-भवानी यानी सुश्री स्मृति इरानी, पूरा कर देती हैं!

इत्तेफ़ाक़ से रविशंकर प्रसाद इस देश के क़ानून मंत्री, संचार मंत्री और सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्री भी हैं। इनका कामकाज भी इनके सहयोगी अरूण जेटली जैसा ही घनघोर निराशाजनक है। हालाँकि, क़िस्मत के धनी रविशंकर प्रसाद, मोदी सरकार में भी मंत्री बनने और कई अहम मंत्रालयों के मुखिया बनने में सफ़ल रहे हैं। लेकिन इनकी हालत द्रौपदी रूपी भारतमाता का चीरहरण करने वाले दुस्सासन जैसी है। ये भारत सरकार की ओर से नोटबन्दी के रूप में हुए देशवासियों के चीरहरण को सही ठहराने की भूमिका भी निभाते हैं! रविशंकर प्रसाद का ताज़ा शिगूफ़ा ये है कि उन्हें पुख़्ता जानकारी है कि “नोटबन्दी का सबसे बड़ा फ़ायदा भारतवर्ष में फैले देह व्यापार पर भी पड़ा है!” हाल ही में, ‘आजतक’ के एक कार्यक्रम में रविशंकर प्रसाद ने बेहद सनसनीख़ेज़ ख़ुलासा किया कि “नोटबन्दी के बाद अब देश में देह व्यापार का काला कारोबार ठप पड़ चुका है।”

अब क़ानून, संचार और सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्री तथा सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के प्रधान प्रवक्ता के रूप में रविशंकर प्रसाद, जब नोटबन्दी की वजह से देह-व्यापार में आयी गिरावट की जानकारी पूरे देश के साथ साझा करते हैं, तो उस पर संशय या सन्देह की गुंजाइश ही कहाँ रह जाती है! अलबत्ता, उनके बयान से ये कौतूहल ज़रूर पैदा हुआ है कि जिस सरकार को ये नहीं मालूम कि नोटबन्दी की वजह से देश का वो असंगठित क्षेत्र त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहा है, जिससे 90 फ़ीसदी आबादी की रोज़ी-रोटी जुड़ी हुई है, उसने उस देह-व्यापार के बारे में सूचनाएँ कैसे एकत्र कर लीं, जो भारत में पूरी तरह से ग़ैरक़ानूनी है!

सार्वजनिक जीवन में शुचिता अपनाये जाने के सबसे बड़े प्रणेता माननीय रविशंकर प्रसाद, क्या देश को ये भी बताएँगे कि उन्हें इतनी सनसनीख़ेज़ जानकारियाँ मोदी सरकार के किस विभाग के प्रतिभाशाली कर्मचारियों से मिली? केन्द्र सरकार का सांख्यिकी मंत्रालय या वित्त मंत्रालय या वाणिज्य मंत्रालय या नीति आयोग, कौन देह-व्यापार के आँकड़ों का भी संकलन करता है? इस काम के लिए क्या गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाले ख़ुफ़िया विभाग के अनुभवी कर्मचारियों की भी मदद ली जाती है?

क्या रविशंकर प्रसाद, भारतवासियों को ये बता सकते हैं कि देश में देह-व्यापार से कितने लोग जुड़े हुए हैं? कितने लोग इसी पेशे पर आश्रित हैं? उनकी औसत आमदनी क्या है? देह-व्यापार को अर्थव्यवस्था के किस सेक्टर में रखा गया है? मसलन, ये संगठित क्षेत्र में है या असंगठित? इस सेक्टर का सालाना कारोबार (टर्नओवर) कितना है? क्या इसकी सरकार के राजस्व में भी कोई भूमिका होती है? यानी, क्या इस सेक्टर से सरकार को कोई टैक्स भी प्राप्त होता है? यदि हाँ, तो कितना और यदि नहीं, तो क्यों? क्या देह-व्यापार से जुड़े लोगों को सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजना जैसे भविष्य निधि (ईपीएफओ), पेंशन, कर्मचारी स्वास्थ्य सेवा (ईएसआई) का लाभ दिया जाता है? यदि हाँ, तो उसका ब्यौरा देश के सामने रखिए और यदि नहीं, तो इन सवालों पर स्पष्टीकरण दीजिए। रविशंकर प्रसाद को ये भी बताना चाहिए कि क्या मोदी सरकार, देह-व्यापार को भी एक मान्य कारोबार का दर्ज़ा देना चाहेगी? चूँकि ये एक व्यापार है और सरकार का फ़र्ज़ है कि वो व्यापार को बढ़ावा दे। लिहाज़ा, मोदी सरकार साफ़ करे कि वो देह-व्यापार के चहुमुखी विकास के लिए क्या नीति अपनाना चाहेगी?

ये सारे सवाल बहुत अहम हैं। सरकार से इनका ब्यौरा मिलना ही चाहिए। सरकार चाहे तो जानकारी देने की ज़िम्मेदारी केन्द्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री स्मृति इरानी को भी सौंप सकती है। उन्हें मीडिया में सुर्ख़ियाँ बटोरने और रूपहले पर्दे पर तरह-तरह के किरदारों का अभिनय करने में महारथ हासिल है। वो आगे आएँगी तो सरकार का पक्ष बेहद प्रभावशाली तरीके से देशवासियों के सामने रखा जा सकता है। वैसे, देश देख चुका है कि स्मृति इरानी का सूचना तंत्र भी बेहद दमदार है। इन्होंने भी ये धमाकेदार रहस्योद्घाटन किया है कि “नोटबन्दी, गाँधी परिवार के लिए बहुत बड़ा हादसा साबित हुई है!” स्मृति भी कैबिनेट मंत्री के बेहद ज़िम्मेदार और संवैधानिक पद पर शोभायमान हैं। किसी भी तरह का झूठ बोलना या मनगढ़न्त बयान देना, न तो इनसे अपेक्षित है और ना ही इनके स्वभाव में है! ये इतनी संजीदा प्रवृत्ति की जन-नेता हैं कि एक बार ‘मैडम’ कहे जाने से आहत हो चुकी हैं!

लिहाज़ा, मोदी सरकार में मौजूद इस सबसे विदुषी नेता को देश को सामने ये ब्यौरा पेश करना चाहिए कि कैसे नोटबन्दी, गाँधी परिवार के लिए बड़ा हादसा बन गयी? क्योंकि ये महज़ हवाबाज़ी है कि गाँधी परिवार, भ्रष्टाचार और काले धन की गंगोत्री है! कैसे है, ये भी तो बताना पड़ेगा। गाँधी परिवार का कितना पैसा ऐसा है, जिसके बारे में मोदी सरकार जान चुकी है कि वो काला धन है और वो नोटबन्दी में डूब चुका है? क्योंकि अभी तक तो देश को यही पता है कि नोटबन्दी की वजह से बन्द हुए तक़रीबन सारे नोट, बैंकों में जमा होकर सफ़ेद धन बन चुके हैं। तो फिर गाँधी परिवार का काला धन कहाँ है? विदेश में है तो कहाँ? उसका ब्यौरा कौन देगा? 41 महीने से तो सत्ता में आप हैं, आपने ही तो शपथ लेते ही सबसे पहले काले धन को लेकर एसआईटी बनायी थी, आयकर विभाग, सीबीआई, ईडी, एनआईए, आईबी और रॉ, सब कुछ तो आपकी मुट्ठी में है। तो फिर अभी तक देश को बताया क्यों नहीं कि आपने गाँधी परिवार की कितनी दौलत को ज़ब्त किया है? कितने लोगों की गिरफ़्तारी हुई है? किन-किन मामलों में, सरकार का कौन-कौन सा महक़मा, गाँधी परिवार का टेटुआ दबाने की फ़िराक़ में है और किन-किन मामलों में सच्ची या झूठी जाँच पूरी हो चुकी है और आरोपपत्र दाख़िल किये जा चुके हैं?

बहरहाल, इस लेख में पेश सवालों का जबाव यदि देश के सामने नहीं आएगा तो भी क्या देश को ये मानकर ही चलना चाहिए कि रविशंकर प्रसाद और स्मृति इरानी जैसे नेता सच बोलते हैं, सोच-समझकर बोलते हैं और ठोक-बजाकर बोलते हैं। लिहाज़ा, इन्हें मोदी सरकार का नग़ीना बना ही रहना चाहिए। वैसे, ये सवाल इतने अहम और गम्भीर हैं कि प्रधानमंत्री मोदी को ख़ुद आगे आकर हरेक बात का ब्यौरा देना चाहिए। प्रेस कॉन्फ्रेस में पत्रकारों के सवालों का सामना करने का साहस भले ही इस 56 इंची नेता में नहीं हो, लेकिन चुनावी मंच से वीर-रस में ओत-प्रोत भाषण देने में तो इनका कोई सानी नहीं है। लिहाज़ा, मोदी चाहें तो अपनी चुनावी सभाओं में ही उपरोक्त सवालो को लेकर देश की आँखें खोल सकते हैं। दूसरी ओर, यदि ऐसा कुछ नहीं होता, यदि आपकी राय ऐसी बनती है कि रविशंकर और स्मृति, सरीख़े झूठे और मक्कार नेताओं ने देश का नाम नीचा किया है तो संकल्प लीजिए कि सही वक़्त आने पर आप इन्हें ज़रूर बताएँगे कि आप इनके झाँसे में आकर बार-बार उल्लू बनने के लिए तैयार नहीं हैं!

ओपिनियन

हज 2018 होगा महंगा, मगर सब्सिडी की समाप्ति वजह नहीं

केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मंगलवार को इस साल से हज सब्सिडी की समाप्ति की घोषणा की थी।

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haj-2018

हज 2018 की यात्रा पिछले साल के मुकाबले ज्यादा महंगी रहने वाली है। लेकिन इसकी वजह सरकार द्वारा मंगलवार को सब्सिडी समाप्त करने की घोषणा नहीं है।

इसके पीछे का कारण हज के दौरान सऊदी अरब में होने वाला खर्च है, जिसमें रहना, परिवहन, खाना और दूसरी चीजें शामिल हैं। यहां ध्यान दिलाने वाली बात यह है कि सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी इन खर्चो का वहन नहीं करती और साथ ही वह हवाई सफर में भी सीमित है।

भारतीय हज समिति (एचसीआई) के अध्यक्ष महबूब अली कैसर ने आईएएनएस को बताया कि कीमतों पर नियंत्रण के लिए सऊदी प्रशासन से सौदेबाजी करना कठिन था, लेकिन इस साल स्थानीय कारक हज की यात्रा में खर्चा बढ़ा सकते हैं।

2017 में एचसीआई हज के लिए साधारण आवास (अजीजिया) के साथ दो लाख रुपये और डीलक्स आवास (ग्रीन) के साथ 234,000 रुपये वसूलता था। डीलक्स आवास (ग्रीन) मक्का में हरम के समीप है।

कैसर ने कहा, “पिछले साल से सऊदी अरब में बिजली का शुल्क तीन गुना बढ़ गया है। इसके साथ ही पेट्रोल की कीमतें भी दोगुनी हो चुकी हैं। आवास की कीमतें भी बढ़ रही हैं। ये सभी कारक इस साल हज में आने वाली कुल लागत को बढ़ा सकते हैं।”

उन्होंने कहा कि इस वक्त हज 2018 में प्रत्येक श्रद्धालु पर आने वाली अंतिम लागत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

उन्होंने कहा, “ऐसा मानना बेमानी होगी कि बिजली की कीमतों में तीन गुना और पेट्रोल की कीमतों में दोगुनी वृद्धि हो जाने पर हर बार सऊदी अरब में सभी चीजों की कीमतें समान रहेंगी। दूसरा, सऊदी के लोग सौदेबाजी करने वालों को गाली देते हैं और हमें उनसे हर रियाल के लिए वास्तव में बहुत सौदेबाजी करनी पड़ी।”

कैसर ने कहा, “तब भी, हम अपना सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास कर रहे हैं और उनसे बहुत सौदेबाजी कर रहे हैं, ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि कीमतें जबरदस्त रूप से न बढ़ें।”

केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मंगलवार को इस साल से हज सब्सिडी की समाप्ति की घोषणा की थी।

कैसर ने कहा कि एचसीआई को पता था कि ऐसा होने वाला है और इसके लिए हम मानसिक रूप से तैयार थे।

उन्होंने कहा, “किसी भी हालत में सब्सिडी को वापस लेने का फैसला मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद और बेंगलुरू जैसे बड़े शहरों के हवाई किराए को प्रभावित नहीं करेगा, लेकिन श्रीनगर, गया जैसे छोटी जगहों से किराया बढ़ सकता है। लेकिन इन राज्यों के लोग जहां किराया कम है, जैसे मुंबई, दिल्ली और अहमदाबाद जाकर उड़ानें पकड़ सकते हैं।”

हालांकि आने वाले वर्षो में हज की लागत कम होने के आसार हैं, क्योंकि भारत सरकार पहले से ही जेद्दाह जाने वाले समुद्री रास्ते को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम कर रही है।

नकवी ने कहा कि सरकार ने इस बाबत पहले से ही इस दिशा में सक्रिय कदम उठाए हैं और एक बार लागू होने के बाद किराये में जबरदस्त गिरावट आएगी।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि हज सब्सिडी की शुरुआत 1980 (जब आजाद एचसीआई के सदस्य थे) के दशक में हुई थी, जब हज यात्रियों को ढोने वाली जहाजें पुरानी होने लगी थीं।

आजाद ने कहा, “बजट की कमी के कारण सरकार ने नई जहाजों की खरीद पर पैसा नहीं खर्च किया था। इस लिए श्रद्धालुओं को जेद्दाह ले जाने के लिए उड़ानें शुरू करने का फैसला किया गया था। लेकिन हवाई सफर जहाज के किराए से चार गुना महंगा था। इसलिए सरकार ने उस लागत का वहन करने के लिए सब्सिडी का भुगतान करना शुरू किया था।”

समुद्री रास्ते को 1995 में बंद कर दिया गया था।

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कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया

कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।

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कश्मीर समस्या अब तक इसलिए नहीं सुलझ पाई, क्योंकि हमने इसे हमेशा जमीन के एक टुकड़े की तरह देखा है। हमने कश्मीरियों को कभी भारत का नागरिक माना ही नहीं। दोनों देशों ने कश्मीर को अपने ‘अहं’ का सवाल बना लिया है। आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता, उसकी पैन इस्लामिज्म में कोई दिलचस्पी नहीं है। वह रोजगार और शांति से जीना चाहता है। यह कहना है ‘कश्मीरनामा’ के लेखक अशोक कुमार पांडेय का।

कश्मीर की नब्ज समझने वाले लेखक कहते हैं कि कश्मीरी लोगों को लेकर हमारे अंदर मोहब्बत नहीं, संशय बना हुआ है। वह कहते हैं, “कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया है। मेरा मानना है कि यदि कश्मीर को अपना मानना है, तो वहां के लोगों की परेशानियों को अपनी परेशानियां समझना होगा। जैसे देखिए, अभी कश्मीर का एक लड़का शताब्दी एक्सप्रेस में बिना टिकट यात्रा करते पाया गया और उसे आतंकवादी और पता नहीं क्या-क्या कह दिया गया, यह सोच खत्म करने की जरूरत है।”

अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘कश्मीरनामा’ कश्मीर के भारत में विलय और उसकी परिस्थितियों को बयां करती है। वह कहते हैं, “जब मैं कश्मीर का अध्ययन कर रहा था, तो कश्मीर का मतलब मेरे लिए सिर्फ एक जगह नहीं थी, बल्कि वहां के लोग थे। पिछले कुछ दशकों में कश्मीर का मामला सुलझने की बजाय और उलझ गया है।”

वह कहते हैं कि कश्मीर के लोग परेशान हैं कि उनसे जो वादे किए गए थे, उन्हें निभाया नहीं गया। सारी समस्याओं की जड़ यही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों कश्मीर पर अपना हक जताना चाहते हैं। पांडेय कहते हैं, “अगर आप कानूनी रूप से देखें, तो कश्मीर और हिंदुस्तान के बीच संधि हुई थी, तो इस लिहाज से कश्मीर पर भारत का हक बनता है। लेकिन पाकिस्तान इसे अलग तरह से परिभाषित करता है। दोनों देशों ने इसे अपने अहं का सवाल बना लिया है।”

उन्होंने कहा, “इन सभी उलझनों के बीच में पैन इस्लामिज्म ने प्रवेश किया। पैन इस्लामिज्म के बाद यह पूरा मूवमेंट ही बदल गया। सच्चाई यह है कि आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता। पैन इस्लामिज्म में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। वह चैन की जिंदगी गुजर-बसर करना चाहता है। वह चाहता है कि कश्मीर में तैनात सुरक्षाबलों की संख्या में घटाई जाए। नौकरियां दी जाएं और वह हिंदुस्तान में शांति से रह सके।”

अशोक पांडेय की इस किताब का आज प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले में औपचारिक लोकार्पण हुआ। किताब के बारे में वह कहते हैं, “इस किताब को पूरा करने में उन्हें चार साल लगे। इनमें से दो साल शोध कार्यो में, जबकि दो साल लेखन में लगे। इस दौरान मैंने 125 किताबों की मदद ली, जिसमें आठ से नौ शोधग्रंथ भी हैं। इस सिलसिले में चार बार कश्मीर जाना हुआ।”

उन्होंने कहा, “यह शोधकार्य था। इसलिए जरूरी था दस्तावेज इकट्ठा करना। इसे लेकर मैंने श्रीनगर विश्वविद्यालय, जम्मू और कश्मीर के शोपियां और कई गांवों की खाक छानी। इंटरनेट से भी काफी मदद ली। कुछ ऐसे लोगों से भी मिला, जो पहले आतंकवादी थे लेकिन अब मुख्यधारा में शामिल हो गए हैं।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर की एक समस्या यह भी है कि यहां कभी जनमत संग्रह नहीं हो पाया और इसके लिए हिंदुस्तान अकेला जिम्मेदार नहीं है, पाकिस्तान भी उतना ही जिम्मेदार है। हमने कश्मीर की समस्या को हिंदू-मुसलमान समस्या में तब्दील कर दिया है। दूसरी बात है कि कश्मीर लोग सिर्फ घूमने जाते हैं। यह सिर्फ पर्यटन तक सिमट गया है, कश्मीरियों से कोई संवाद नहीं है। दोनों के बीच में संवाद बेहद जरूरी है। मैंने किताब के अंत में यही बात लिखी है कि यदि कश्मीर के स्कूली बच्चे अन्य राज्यों में जाएं और वहां के छात्र यहां आएं तो संवाद की स्थिति बेहतर हो सकती है।”

वह कहते हैं, “कश्मीर में जिस तरह का माहौल है, उस पर लेबल चिपकाना बहुत गलत है। हम किसी को देशद्रोही या देशभक्त नहीं कह सकते। कश्मीर के साथ दिक्कत यही है कि वहां उद्योग-कारखाने नहीं हैं, लोगों के पास नौकरियां नहीं हैं, कहीं विकास नहीं है और ऊपर से कश्मीरियों का अपमान अलग से। मेरे लिए विकास का सीधा मतलब है कि लोगों को रोजगार मिले। लोगों को पढ़ने का मौका मिले।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर के मसले पर सभी सरकारों ने कोई न कोई गलती की है। इंदिरा गांधी की अपनी गलतियां थीं, राजीव गांधी की अपनी और वाजपेयी जी के समय में कुछ काम जरूर हुआ, लेकिन वो कहीं पहुंच नहीं पाया। उसके बाद की सरकार की अपनी गलतियां और इस सरकार की अपनी गलतियां हैं। दिक्कत यही है कि कश्मीर को हमने कभी अपना नहीं समझा। हम सिर्फ यह मान बैठे हैं कि यह एक ऐसा इलाका है, जिस पर हमें कब्जा रखना है। इस मानसिकता को खत्म करना होगा। “

वह कहते हैं कि देश में हर जगह बवाल हो रहा है, हरियाणा में आरक्षण को लेकर कितनी हिंसा हुई। बिहार में जमकर बवाल हुआ। दलितों को छोटी सी बातों पर उन्हें मार दिया जाता है, खाप पंचायतों की करनी किसी से छिपी हुई न हीं है, लेकिन वे देशविरोधी नहीं कहलाते। वहीं, जब बात कश्मीर की आती है तो बलवा करने वाले को फौरन देशद्रोही बता दिया जाता है। हम कश्मीर को गैर मानकर चलते हैं। वे नाराज हैं और अपनी बात कहते हैं तो समझा जाता है कि वे पाकिस्तान का समर्थन कर रहे हैं। यही मानसिकता उन्हें एक दिन पाकिस्तान के पक्ष में धकेल देगी।

पांडेय कहते हैं, “नरेंद्र मोदी जब गुजरात में भाजपा के महासचिव थे तो उन्होंने कहा था कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए तीन ‘डी’ सूत्र जरूरी है- डेवलपमेंट, डेमोक्रेसी और डायलॉग और जब ये तीनों असफल रहें तो चौथे डी ‘डिफेंस’ का प्रयोग करना चाहिए, लेकिन दिक्कत यह है कि कश्मीर में अक्सर चौथा डी पहले प्रयोग में लाया जाता है। अगर पहले तीनों डी का सही तरीके से उपयोग किया जाए, थोड़ा धीरज रखा जाए, सेना को नियंत्रण में रखा जाए और लोगों का विश्वास जीता जाए तो एक दशक में ही कश्मीर में काफी हद तक आतंकवाद खत्म हो जाएगा।”

वह आगे कहते हैं, “कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।”

By : रीतू तोमर

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‘स्लोगन बाबा’ ने गंगा प्रेमियों को भी ठगा : राजेंद्र सिंह

गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।

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लगभग पौने चार वर्षो में केंद्र सरकार गंगा नदी की अविरलता और इसे प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कोई सार्थक काम कर पाने में नाकाम रही। इससे गंगा प्रेमी नाराज हैं। दुनिया में ‘जलपुरुष’ के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह का तो यहां तक कहना है कि ‘स्लोगन बाबा (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) ने गंगा प्रेमियों को भी ठगने में कसर नहीं छोड़ी है।’

स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह ने आईएएनएस से फोन पर चर्चा के दौरान कहा, “वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जब केंद्र में नई सरकार आई थी, तो इस बात की आस बंधी थी कि गंगा नदी का रूप व स्वरूप बदलेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने कहा था- ‘गंगा मां ने मुझे बुलाया है।’ उनकी इस बात पर प्रो. जी.डी. गुप्ता, नदी प्रेमी और संत समाज शांत होकर बैठ गया था, बीते पौने चार साल के कार्यकाल को देखें तो पता चलता है कि केंद्र सरकार ने अपने उन वादों को ही भुला दिया है, जो चुनाव के दौरान किए गए थे, अब तो सरकार गंगा माई का नाम ही नहीं लेती।”

Image result for स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह

Waterman India Rajendra Singh

बीते पौने चार वर्ष तक गंगा प्रेमियों के किसी तरह की आवाज न उठाने के सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “सभी गंगा प्रेमियों को इस बात का भरोसा था कि नई सरकार वही करेगी, जो उसने चुनाव से पहले कहा था। मगर वैसा कुछ नहीं हुआ। तीन साल तक इंतजार किया, अब गंगा प्रेमियों में बेचैनी है, क्योंकि जो वादा किया गया था, उसके ठीक उलट हो रहा है।”

उन्होंने कहा, “गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।”

‘जलपुरुष’ ने याद दिलाया कि वर्तमान सरकार ने नोटीफिकेशन कर गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया था, मगर गंगा को वैसा सम्मान नहीं मिला, जैसा प्रोटोकॉल के तहत मिलना चाहिए था। गंगा को वही सम्मान दिया जाए, जो राष्ट्रंीय ध्वज को दिया जाता है।

सरकार आखिर गंगा की अविरलता के लिए काम क्यों नहीं कर रही? इस सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “उन्हें लगता है कि गंगा माई की सफाई में कोई कमाई नहीं हो सकती, इसलिए उस काम को किया ही न जाए। ऐसा सरकार से जुड़े लोगों ने सोचा। छोटे-छोटे काम भी अपने दल से जुड़े लोगों को ही दिया गया है।”

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अपनी मांगों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “रिवर और सीवर को अलग-अलग किया जाए, हिमालय से गंगासागर तक गंगा को साफ किया जाए, गंगा के दोनों ओर की जमीन का संरक्षण हो, न कि विकास के नाम पर उद्योगपतियों को सौंपने की साजिश रची जाए।”

राजेंद्र सिंह का आरोप है, “कुछ पाखंडी गुरुओं ने नदियों की जमीन पर पौधरोपण करने के नाम पर सरकारों से जमीन और पैसे पाने के लिए सहमतिपत्र तैयार किए हैं। यह संकट पुराने संकट से बड़ा है, क्योंकि इसमें किसानी की जमीन बड़े औद्योगिक घरानों को दिलाने का षड्यंत्र नजर आता है। इस षड्यंत्र के बारे में भी गंगा के किसानों को बताना जरूरी है। इस सब संकटों के समाधान के लिए गंगा प्रेमी एक साथ बैठकर चर्चा करने की तैयारी में हैं।”

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