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Ravi Shankar Prasad Ravi Shankar Prasad

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मोदी ही बता दें कि नोटबन्दी से देह-व्यापार और गाँधी परिवार को कितना नुकसान हुआ?

यदि इस लेख में पेश सवालों का जबाव देश के सामने नहीं आएगा तो भी क्या देश को ये मानकर चलना चाहिए कि रविशंकर प्रसाद और स्मृति इरानी जैसे नेता सच बोलते हैं, सोच-समझकर बोलते हैं और ठोक-बजाकर बोलते हैं। लिहाज़ा, इन्हें मोदी सरकार का नग़ीना बना ही रहना चाहिए।

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मोदी राज में विश्व गुरु बनने निकला भारतवर्ष दो महान न्यायविदों और एक बड़बोला विदुषी के चंगुल में बहुत बुरी तरह से फँस चुका है। पहले न्यायविद हैं महामहिम अरूण जेटली। जो दुर्भाग्य से अभी देश के वित्त मंत्री हैं। इन्होंने नोटबन्दी और खोटे जीएसटी के रूप में सवा सौ करोड़ भारतीयों पर ऐसा कहर बरपा किया है, जिसकी मिसाल सहस्त्राब्दी (मिलेनियम) में भी मिलना नामुमकिन है! जेटली और इनके मुखिया नरेन्द्र मोदी की करतूतों का अंज़ाम तो भारतवासी भुगत ही रहे हैं। लेकिन, चूँकि देश का बँटाढार करने में इनकी मूर्खताओं में कोई कसर न रह जाए, इसलिए इनके बचाव का मोर्चा जब-तब एक और महान न्यायविद रविशंकर प्रसाद सम्भाल लेते हैं। इतना ही नहीं, रही-सही कसर को देवी-भवानी यानी सुश्री स्मृति इरानी, पूरा कर देती हैं!

इत्तेफ़ाक़ से रविशंकर प्रसाद इस देश के क़ानून मंत्री, संचार मंत्री और सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्री भी हैं। इनका कामकाज भी इनके सहयोगी अरूण जेटली जैसा ही घनघोर निराशाजनक है। हालाँकि, क़िस्मत के धनी रविशंकर प्रसाद, मोदी सरकार में भी मंत्री बनने और कई अहम मंत्रालयों के मुखिया बनने में सफ़ल रहे हैं। लेकिन इनकी हालत द्रौपदी रूपी भारतमाता का चीरहरण करने वाले दुस्सासन जैसी है। ये भारत सरकार की ओर से नोटबन्दी के रूप में हुए देशवासियों के चीरहरण को सही ठहराने की भूमिका भी निभाते हैं! रविशंकर प्रसाद का ताज़ा शिगूफ़ा ये है कि उन्हें पुख़्ता जानकारी है कि “नोटबन्दी का सबसे बड़ा फ़ायदा भारतवर्ष में फैले देह व्यापार पर भी पड़ा है!” हाल ही में, ‘आजतक’ के एक कार्यक्रम में रविशंकर प्रसाद ने बेहद सनसनीख़ेज़ ख़ुलासा किया कि “नोटबन्दी के बाद अब देश में देह व्यापार का काला कारोबार ठप पड़ चुका है।”

अब क़ानून, संचार और सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्री तथा सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के प्रधान प्रवक्ता के रूप में रविशंकर प्रसाद, जब नोटबन्दी की वजह से देह-व्यापार में आयी गिरावट की जानकारी पूरे देश के साथ साझा करते हैं, तो उस पर संशय या सन्देह की गुंजाइश ही कहाँ रह जाती है! अलबत्ता, उनके बयान से ये कौतूहल ज़रूर पैदा हुआ है कि जिस सरकार को ये नहीं मालूम कि नोटबन्दी की वजह से देश का वो असंगठित क्षेत्र त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहा है, जिससे 90 फ़ीसदी आबादी की रोज़ी-रोटी जुड़ी हुई है, उसने उस देह-व्यापार के बारे में सूचनाएँ कैसे एकत्र कर लीं, जो भारत में पूरी तरह से ग़ैरक़ानूनी है!

सार्वजनिक जीवन में शुचिता अपनाये जाने के सबसे बड़े प्रणेता माननीय रविशंकर प्रसाद, क्या देश को ये भी बताएँगे कि उन्हें इतनी सनसनीख़ेज़ जानकारियाँ मोदी सरकार के किस विभाग के प्रतिभाशाली कर्मचारियों से मिली? केन्द्र सरकार का सांख्यिकी मंत्रालय या वित्त मंत्रालय या वाणिज्य मंत्रालय या नीति आयोग, कौन देह-व्यापार के आँकड़ों का भी संकलन करता है? इस काम के लिए क्या गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाले ख़ुफ़िया विभाग के अनुभवी कर्मचारियों की भी मदद ली जाती है?

क्या रविशंकर प्रसाद, भारतवासियों को ये बता सकते हैं कि देश में देह-व्यापार से कितने लोग जुड़े हुए हैं? कितने लोग इसी पेशे पर आश्रित हैं? उनकी औसत आमदनी क्या है? देह-व्यापार को अर्थव्यवस्था के किस सेक्टर में रखा गया है? मसलन, ये संगठित क्षेत्र में है या असंगठित? इस सेक्टर का सालाना कारोबार (टर्नओवर) कितना है? क्या इसकी सरकार के राजस्व में भी कोई भूमिका होती है? यानी, क्या इस सेक्टर से सरकार को कोई टैक्स भी प्राप्त होता है? यदि हाँ, तो कितना और यदि नहीं, तो क्यों? क्या देह-व्यापार से जुड़े लोगों को सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजना जैसे भविष्य निधि (ईपीएफओ), पेंशन, कर्मचारी स्वास्थ्य सेवा (ईएसआई) का लाभ दिया जाता है? यदि हाँ, तो उसका ब्यौरा देश के सामने रखिए और यदि नहीं, तो इन सवालों पर स्पष्टीकरण दीजिए। रविशंकर प्रसाद को ये भी बताना चाहिए कि क्या मोदी सरकार, देह-व्यापार को भी एक मान्य कारोबार का दर्ज़ा देना चाहेगी? चूँकि ये एक व्यापार है और सरकार का फ़र्ज़ है कि वो व्यापार को बढ़ावा दे। लिहाज़ा, मोदी सरकार साफ़ करे कि वो देह-व्यापार के चहुमुखी विकास के लिए क्या नीति अपनाना चाहेगी?

ये सारे सवाल बहुत अहम हैं। सरकार से इनका ब्यौरा मिलना ही चाहिए। सरकार चाहे तो जानकारी देने की ज़िम्मेदारी केन्द्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री स्मृति इरानी को भी सौंप सकती है। उन्हें मीडिया में सुर्ख़ियाँ बटोरने और रूपहले पर्दे पर तरह-तरह के किरदारों का अभिनय करने में महारथ हासिल है। वो आगे आएँगी तो सरकार का पक्ष बेहद प्रभावशाली तरीके से देशवासियों के सामने रखा जा सकता है। वैसे, देश देख चुका है कि स्मृति इरानी का सूचना तंत्र भी बेहद दमदार है। इन्होंने भी ये धमाकेदार रहस्योद्घाटन किया है कि “नोटबन्दी, गाँधी परिवार के लिए बहुत बड़ा हादसा साबित हुई है!” स्मृति भी कैबिनेट मंत्री के बेहद ज़िम्मेदार और संवैधानिक पद पर शोभायमान हैं। किसी भी तरह का झूठ बोलना या मनगढ़न्त बयान देना, न तो इनसे अपेक्षित है और ना ही इनके स्वभाव में है! ये इतनी संजीदा प्रवृत्ति की जन-नेता हैं कि एक बार ‘मैडम’ कहे जाने से आहत हो चुकी हैं!

लिहाज़ा, मोदी सरकार में मौजूद इस सबसे विदुषी नेता को देश को सामने ये ब्यौरा पेश करना चाहिए कि कैसे नोटबन्दी, गाँधी परिवार के लिए बड़ा हादसा बन गयी? क्योंकि ये महज़ हवाबाज़ी है कि गाँधी परिवार, भ्रष्टाचार और काले धन की गंगोत्री है! कैसे है, ये भी तो बताना पड़ेगा। गाँधी परिवार का कितना पैसा ऐसा है, जिसके बारे में मोदी सरकार जान चुकी है कि वो काला धन है और वो नोटबन्दी में डूब चुका है? क्योंकि अभी तक तो देश को यही पता है कि नोटबन्दी की वजह से बन्द हुए तक़रीबन सारे नोट, बैंकों में जमा होकर सफ़ेद धन बन चुके हैं। तो फिर गाँधी परिवार का काला धन कहाँ है? विदेश में है तो कहाँ? उसका ब्यौरा कौन देगा? 41 महीने से तो सत्ता में आप हैं, आपने ही तो शपथ लेते ही सबसे पहले काले धन को लेकर एसआईटी बनायी थी, आयकर विभाग, सीबीआई, ईडी, एनआईए, आईबी और रॉ, सब कुछ तो आपकी मुट्ठी में है। तो फिर अभी तक देश को बताया क्यों नहीं कि आपने गाँधी परिवार की कितनी दौलत को ज़ब्त किया है? कितने लोगों की गिरफ़्तारी हुई है? किन-किन मामलों में, सरकार का कौन-कौन सा महक़मा, गाँधी परिवार का टेटुआ दबाने की फ़िराक़ में है और किन-किन मामलों में सच्ची या झूठी जाँच पूरी हो चुकी है और आरोपपत्र दाख़िल किये जा चुके हैं?

बहरहाल, इस लेख में पेश सवालों का जबाव यदि देश के सामने नहीं आएगा तो भी क्या देश को ये मानकर ही चलना चाहिए कि रविशंकर प्रसाद और स्मृति इरानी जैसे नेता सच बोलते हैं, सोच-समझकर बोलते हैं और ठोक-बजाकर बोलते हैं। लिहाज़ा, इन्हें मोदी सरकार का नग़ीना बना ही रहना चाहिए। वैसे, ये सवाल इतने अहम और गम्भीर हैं कि प्रधानमंत्री मोदी को ख़ुद आगे आकर हरेक बात का ब्यौरा देना चाहिए। प्रेस कॉन्फ्रेस में पत्रकारों के सवालों का सामना करने का साहस भले ही इस 56 इंची नेता में नहीं हो, लेकिन चुनावी मंच से वीर-रस में ओत-प्रोत भाषण देने में तो इनका कोई सानी नहीं है। लिहाज़ा, मोदी चाहें तो अपनी चुनावी सभाओं में ही उपरोक्त सवालो को लेकर देश की आँखें खोल सकते हैं। दूसरी ओर, यदि ऐसा कुछ नहीं होता, यदि आपकी राय ऐसी बनती है कि रविशंकर और स्मृति, सरीख़े झूठे और मक्कार नेताओं ने देश का नाम नीचा किया है तो संकल्प लीजिए कि सही वक़्त आने पर आप इन्हें ज़रूर बताएँगे कि आप इनके झाँसे में आकर बार-बार उल्लू बनने के लिए तैयार नहीं हैं!

ब्लॉग

बस, एक-एक बार ही जीते विश्वास और अविश्वास

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No-trust motion Parliament

संसदीय लोकतंत्र में ऐसे अनोखे मौक़े भी आते हैं जब विश्वास या अविश्वास का मतलब एक ही होता है! सरकार को गिराने के लिए अविश्वास और बचाने के लिए विश्वास प्रस्ताव लाया जाता है। विपक्ष का प्रस्ताव सरकार के प्रति अविश्वास और गुस्सा दिखाने के लिए होता है तो प्रधानमंत्री का प्रस्ताव अपने लिए विश्वास की दुहाई माँगता है! दोनों से सरकार की ताक़त और उसकी क़िस्मत तय होती हैं। दोनों से बहुमत की जाँच होती है। दोनों लोकसभा के एक ही नियम से संचालित होते हैं।

विश्वास और अविश्वास को मिलाकर, लोकसभा में अब तक 27 बार शक्ति-परीक्षण के मौके आये हैं। विपक्ष की ओर से 20 बार अविश्वास प्रस्ताव लाये गये। लेकिन वो सिर्फ़ एक बार ही सरकार गिरा पाया। जुलाई 1979 में मोरारजी देसाई को अपने ख़िलाफ़ पेश हुए अविश्वास प्रस्ताव के पारित होने पर इस्तीफ़ा देना पड़ा। दूसरी ओर, अब तक 7 बार प्रधानमंत्रियों को विश्वास मत पेश करना पड़ा है। इसमें से 6 बार उन्हें हार मिली। जुलाई 2008 में विश्वास मत जीतने वाले मनमोहन सिंह एकलौते प्रधानमंत्री बने।

प्रथम अविश्वास प्रस्ताव की नौबत तीसरी लोकसभा में आयी। अगस्त 1963 में समाजवादी नेता आचार्य जेबी कृपलानी ने प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। वो चार दिनों तक चली 21 घंटे लम्बी बहस के बाद गिर गया। लाल बहादुर शास्त्री ने भी अपने छोटे कार्यकाल के बावजूद तीन बार अविश्वास प्रस्तावों को नाकाम किया। सबसे ज़्यादा अविश्वास प्रस्तावों के सामने अडिग रहने का कीर्तिमान इन्दिरा गाँधी के नाम है। उन्होंने 15 बार अविश्वास प्रस्तावों को परास्त किया। 1966 से 1975 के बीच 12 बार और 1981 से 1982 के दरम्यान तीन बार।

मोरारजी देसाई ने दो बार शक्ति-परीक्षण का सामना किया। 1977 में उन्होंने पहला विश्वास प्रस्ताव जीता था। लेकिन 1979 में दूसरे अविश्वास प्रस्ताव पर लोकसभा में वोटिंग की नौबत आने से पहले जब मोरारजी ने पाया कि वो बहुमत गँवा बैठे हैं तो उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। वो पहला मौक़ा था जब अविश्वास प्रस्ताव पारित होने की वजह से सरकार गिरी थी। बाक़ी जितनी भी सरकारें अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले गिरीं, वो सभी विश्वास प्रस्तावों के पारित नहीं होने से सत्ता से बाहर हुई थीं।

पहली बार जुलाई 2008 में मनमोहन सिंह की ओर से लाया गया विश्वास प्रस्ताव लोकसभा में पारित हुआ। जबकि उससे पहले पेश हुए तीन विश्वास प्रस्तावों को नकारा जा चुका था। 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह, 1997 में एचडी देवेगौड़ा और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के विश्वास प्रस्ताव लोकसभा ने पारित नहीं किये। तीन मौके ऐसे भी रहे जब प्रधानमंत्री ने अपने विश्वास प्रस्ताव पर मत-विभाजन यानी वोटिंग की नौबत आने से पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया। जुलाई 1979 में मोरारीजी देसाई, अगस्त 1979 में चौधरी चरण सिंह और मई 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी ने विश्वास प्रस्ताव पर मतदान होने से पहले इस्तीफ़ा दे दिया था।

नरसिम्हा राव ने तीन बार और राजीव गाँधी तथा अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारों को एक-एक बार अविश्वास प्रस्ताव को हराने का मौक़ा मिला। वाजपेयी ने 17 अप्रैल 1999 को एक वोट से अपने विश्वास प्रस्ताव पर हार का मुँह देखा। लेकिन चार साल बाद 2003 में उनके ख़िलाफ़ पेश हुआ अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं हुआ।

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ज़रा हटके

अब कौन कहेगा, ‘ऐ भाई! जरा देख के चलो’

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Gopaldas Neeraj

नई दिल्ली, 19 जुलाई | ‘लिखे जो खत तुझे‘, ‘ऐ भाई! जरा देख के चलो‘, ‘दिल आज शायर है‘, ‘जीवन की बगिया महकेगी‘, ‘खिलते हैं गुल यहां’ जैसे मशहूर गानों के जरिए लोगों के दिलों में जगह बनाने वाले हिंदी के प्रख्यात गीतकार और कवि गोपाल दास नीरज 93 वर्ष की उम्र में गुरुवार को दुनिया छोड़ चले, लेकिन ऐसा जिंदादिल कवि कभी मरता है क्या!

उत्तर प्रदेश के इटावा जिले स्थित पुरवली गांव में 4 जनवरी, 1925 को जन्मे गोपाल दास नीरज जब छह वर्ष के थे, तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। सन् 1942 में एटा से हाईस्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास करने के बाद उन्होंने इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया। उसके बाद सिनेमाघर की एक दुकान पर नौकरी की, लेकिन लिखने की कला अपने हाथ में समेटे गोपाल दास लंबी बेकारी के बाद दिल्ली आ गए।

दिल्ली आकर उन्होंने सफाई विभाग में टाइपिस्ट की नौकरी की। वहां से नौकरी छूट जाने पर कानपुर के डीएवी कॉलेज में क्लर्की की। फिर बाल्कट ब्रदर्स नाम की एक प्राइवेट कंपनी में पांच साल तक टाइपिस्ट का काम किया। नौकरी करने के साथ प्राइवेट परीक्षाएं देकर 1949 में 12वीं, 1951 में बीए और 1953 में प्रथम श्रेणी में हिंदी से एमए पास किया।

Image result for neeraj poet पद्मभूषण सम्मान

‘दर्द दिया है’, ‘आसावरी’, ‘बादलों से सलाम लेता हू’ं, ‘गीत जो गाए नहीं’, ‘कुछ दोहे नीरज के’, ‘नीरज की पाती’ जैसे रचना संग्रह, ‘तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा’, ‘हम तेरी चाह में, ऐ यार! वहां तक पहुंचे’, ‘अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए’, ‘दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था’ , ‘पीछे है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिये’ जैसी गजलें लिखने वाले मशहूर कवि और गीतकार गोपाल दास नीरज को 1991 में पद्मश्री और 2007 में पद्मभूषण सम्मान से भी नवाजा गया था।

उत्तर प्रदेश सरकार ने भी यश भारती सम्मान से सम्मानित कर उनके दमदार लेखनी को सराहा था। बॉलीवुड फिल्मों में कई सुपरहिट गाने लिखकर अपना लोहा मनवाया था। उन्हें उनकी लेखनी के लिए कई बार सम्मानित किया गया था। उन्होंने तीन बार फिल्म फेयर अवार्ड भी अपने नाम किया था।

हिंदी मंचों के प्रसिद्ध कवियों में शुमार नीरज को अंतिम दिनों में सांस लेने में तकलीफ हो रही थी, जिस कारण मंगलवार को तबीयत बिगड़ने के बाद आगरा के लोटस हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था, लेकिन तबीयत ज्यादा खराब होने पर उन्हें एम्स लाया गया, हालांकि बुधवार को तबीयत में सुधार की भी खबरें आई थीं, लेकिन अगले दिन नीरज ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके लाखों चाहने वालों का दिल आज रोएगा बहुत, उनकी प्रसिद्ध कविता ‘रोने वाला ही गाता है’ सबको ढाढस बंधाएगी। कवि कभी मरता नहीं, नीरज सदियों अपनी रचनाओं के रूप में जीवित रहेंगे। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि!!!

–आईएएनएस

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ज़रा हटके

ग्रेटर नोएडा : इमारत में इसी सप्ताह हुआ था ‘गृह प्रवेश’

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Greater Noida building collapse

ग्रेटर नोएडा, 18 जुलाई (आईएएनएस)| ग्रेटर नोएडा में मंगलवार रात धराशायी हुई इमारत में हाल ही में अपनी मां के साथ रहने आए शिव त्रिवेदी (25) ने इसी सप्ताहांत गृह प्रवेश की पूजा आयोजित की थी। उनके सपनों के घर को सजाने के लिए उनकी साली अपने एक वर्षीय बच्चे के साथ यहीं रुक गईं थीं।

बुधवार को वे सभी एक बहुमजिला इमारत के उनकी इमारत के ऊपर ढहने से उसके मलवे में फंसे थे और इसमें उनके जीवित नहीं रहने की संभावना है।

दर्जनों बचाव कर्मी मलबे को हटाने के लिए क्रेनों और बुलडोजरों का इस्तेमाल कर रहे हैं। दूर रोते हुए खड़े त्रिवेदी परिवार के सदस्य मलवे में फंसे चारों लोगों के जीवन की प्रार्थना कर रहे थे।

Greater Noida Building

नोएडी की एक कंपनी में शाखा प्रबंधक शिव उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में रह रहे अपने माता-पिता के दो बेटों में छोटे हैं। तीन साल पहले बेहतर जीवन की तलाश में वे नोएडा रहने लगे थे।

उनके पिता ने कहा कि शिव परिवार के लिए आशा की किरण है और हमेशा से ही होनहार रहे हैं।

शिव ने दिल्ली आने के मात्र तीन सालों के अंदर इसी मार्च में ये घर खरीदा था।

शिव के एक चाचा ने आईएएनएस को बताया, “उसने काफी कम उम्र में बहुत कुछ हासिल कर लिया था। मेरी आयु 50 है और मैं अपने परिवार के लिए घर नहीं खरीद सकता। लेकिन उसने मात्र 25 वर्ष की आयु में घर खरीद लिया।”

उन्होंने अपने कार्यालय में आखिरी बार मंगलवार को रात लगभग 8.50 बजे बात की थी। लेकिन उसके बाद से उनसे संपर्क नहीं हो सका क्योंकि वे इस हादसे का शिकार हो गए। उनकी इमारत दिल्ली के व्यावसायिक केंद्र कनॉट प्लेस से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित है।

शिव के पिता, बड़े भाई, दो चाचा, चचेरे भाई और अन्य करीबी रिश्तेदार बुधवार सुबह तक घटनास्थल पर पहुंच गए थे।

शिव के भाई राम त्रिवेदी (27) ने आईएएनएस को बताया, “मुझे विश्वास है कि वे मलबे में हैं और उनके जीवित होने का भी पूर्ण विश्वास है लेकिन उन्हें जल्दी निकाले जाने की जरूरत है।”

पेशे से वकील राम ने कहा कि शिव ने शनिवार को गृह प्रवेश पूजा का आयोजन किया था जिसके बाद शिव की मां, साली और उनकी एक वर्षीय बेटी को छोड़कर लगभग सभी लोग मैनपुरी चले गए थे। ये लोग नए घर में कुछ दिन उनके साथ रहने और घर को व्यवस्थित करने के लिए यहीं रुक गए थे।

विचलित राम ने बैठने से मना कर दिया, इस दौरान वे मुट्ठी बांधे लगातार मलबे की तरफ देख रहे थे।

परिजनों ने आरोप लगाया कि इमारत के निर्माण में बिल्डर ने घटिया निर्माण सामग्री का उपयोग किया था। उन्होंने बचाव अभियान के देर से शुरू होने की भी शिकायत की, जिससे इमारत में फंसे हुए लोगों के जीवित बचने की उम्मीद कम हो गई है।

शिव के एक रिश्तेदार ने क्षेत्र में नियमों में ढिलाई का आरोप लगाते हुए कहा, “इतना समय हो गया है और हमारे परिवार का अभी तक कोई पता नहीं लगा है। उन्होंने अगर रात में ही बचाव अभियान शुरू किया होता तो मेरे परिवार को बचाया जा सकता था।”

–आईएएनएस

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