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Ravi Shankar Prasad Ravi Shankar Prasad

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मोदी ही बता दें कि नोटबन्दी से देह-व्यापार और गाँधी परिवार को कितना नुकसान हुआ?

यदि इस लेख में पेश सवालों का जबाव देश के सामने नहीं आएगा तो भी क्या देश को ये मानकर चलना चाहिए कि रविशंकर प्रसाद और स्मृति इरानी जैसे नेता सच बोलते हैं, सोच-समझकर बोलते हैं और ठोक-बजाकर बोलते हैं। लिहाज़ा, इन्हें मोदी सरकार का नग़ीना बना ही रहना चाहिए।

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मोदी राज में विश्व गुरु बनने निकला भारतवर्ष दो महान न्यायविदों और एक बड़बोला विदुषी के चंगुल में बहुत बुरी तरह से फँस चुका है। पहले न्यायविद हैं महामहिम अरूण जेटली। जो दुर्भाग्य से अभी देश के वित्त मंत्री हैं। इन्होंने नोटबन्दी और खोटे जीएसटी के रूप में सवा सौ करोड़ भारतीयों पर ऐसा कहर बरपा किया है, जिसकी मिसाल सहस्त्राब्दी (मिलेनियम) में भी मिलना नामुमकिन है! जेटली और इनके मुखिया नरेन्द्र मोदी की करतूतों का अंज़ाम तो भारतवासी भुगत ही रहे हैं। लेकिन, चूँकि देश का बँटाढार करने में इनकी मूर्खताओं में कोई कसर न रह जाए, इसलिए इनके बचाव का मोर्चा जब-तब एक और महान न्यायविद रविशंकर प्रसाद सम्भाल लेते हैं। इतना ही नहीं, रही-सही कसर को देवी-भवानी यानी सुश्री स्मृति इरानी, पूरा कर देती हैं!

इत्तेफ़ाक़ से रविशंकर प्रसाद इस देश के क़ानून मंत्री, संचार मंत्री और सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्री भी हैं। इनका कामकाज भी इनके सहयोगी अरूण जेटली जैसा ही घनघोर निराशाजनक है। हालाँकि, क़िस्मत के धनी रविशंकर प्रसाद, मोदी सरकार में भी मंत्री बनने और कई अहम मंत्रालयों के मुखिया बनने में सफ़ल रहे हैं। लेकिन इनकी हालत द्रौपदी रूपी भारतमाता का चीरहरण करने वाले दुस्सासन जैसी है। ये भारत सरकार की ओर से नोटबन्दी के रूप में हुए देशवासियों के चीरहरण को सही ठहराने की भूमिका भी निभाते हैं! रविशंकर प्रसाद का ताज़ा शिगूफ़ा ये है कि उन्हें पुख़्ता जानकारी है कि “नोटबन्दी का सबसे बड़ा फ़ायदा भारतवर्ष में फैले देह व्यापार पर भी पड़ा है!” हाल ही में, ‘आजतक’ के एक कार्यक्रम में रविशंकर प्रसाद ने बेहद सनसनीख़ेज़ ख़ुलासा किया कि “नोटबन्दी के बाद अब देश में देह व्यापार का काला कारोबार ठप पड़ चुका है।”

अब क़ानून, संचार और सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्री तथा सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के प्रधान प्रवक्ता के रूप में रविशंकर प्रसाद, जब नोटबन्दी की वजह से देह-व्यापार में आयी गिरावट की जानकारी पूरे देश के साथ साझा करते हैं, तो उस पर संशय या सन्देह की गुंजाइश ही कहाँ रह जाती है! अलबत्ता, उनके बयान से ये कौतूहल ज़रूर पैदा हुआ है कि जिस सरकार को ये नहीं मालूम कि नोटबन्दी की वजह से देश का वो असंगठित क्षेत्र त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहा है, जिससे 90 फ़ीसदी आबादी की रोज़ी-रोटी जुड़ी हुई है, उसने उस देह-व्यापार के बारे में सूचनाएँ कैसे एकत्र कर लीं, जो भारत में पूरी तरह से ग़ैरक़ानूनी है!

सार्वजनिक जीवन में शुचिता अपनाये जाने के सबसे बड़े प्रणेता माननीय रविशंकर प्रसाद, क्या देश को ये भी बताएँगे कि उन्हें इतनी सनसनीख़ेज़ जानकारियाँ मोदी सरकार के किस विभाग के प्रतिभाशाली कर्मचारियों से मिली? केन्द्र सरकार का सांख्यिकी मंत्रालय या वित्त मंत्रालय या वाणिज्य मंत्रालय या नीति आयोग, कौन देह-व्यापार के आँकड़ों का भी संकलन करता है? इस काम के लिए क्या गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाले ख़ुफ़िया विभाग के अनुभवी कर्मचारियों की भी मदद ली जाती है?

क्या रविशंकर प्रसाद, भारतवासियों को ये बता सकते हैं कि देश में देह-व्यापार से कितने लोग जुड़े हुए हैं? कितने लोग इसी पेशे पर आश्रित हैं? उनकी औसत आमदनी क्या है? देह-व्यापार को अर्थव्यवस्था के किस सेक्टर में रखा गया है? मसलन, ये संगठित क्षेत्र में है या असंगठित? इस सेक्टर का सालाना कारोबार (टर्नओवर) कितना है? क्या इसकी सरकार के राजस्व में भी कोई भूमिका होती है? यानी, क्या इस सेक्टर से सरकार को कोई टैक्स भी प्राप्त होता है? यदि हाँ, तो कितना और यदि नहीं, तो क्यों? क्या देह-व्यापार से जुड़े लोगों को सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजना जैसे भविष्य निधि (ईपीएफओ), पेंशन, कर्मचारी स्वास्थ्य सेवा (ईएसआई) का लाभ दिया जाता है? यदि हाँ, तो उसका ब्यौरा देश के सामने रखिए और यदि नहीं, तो इन सवालों पर स्पष्टीकरण दीजिए। रविशंकर प्रसाद को ये भी बताना चाहिए कि क्या मोदी सरकार, देह-व्यापार को भी एक मान्य कारोबार का दर्ज़ा देना चाहेगी? चूँकि ये एक व्यापार है और सरकार का फ़र्ज़ है कि वो व्यापार को बढ़ावा दे। लिहाज़ा, मोदी सरकार साफ़ करे कि वो देह-व्यापार के चहुमुखी विकास के लिए क्या नीति अपनाना चाहेगी?

ये सारे सवाल बहुत अहम हैं। सरकार से इनका ब्यौरा मिलना ही चाहिए। सरकार चाहे तो जानकारी देने की ज़िम्मेदारी केन्द्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री स्मृति इरानी को भी सौंप सकती है। उन्हें मीडिया में सुर्ख़ियाँ बटोरने और रूपहले पर्दे पर तरह-तरह के किरदारों का अभिनय करने में महारथ हासिल है। वो आगे आएँगी तो सरकार का पक्ष बेहद प्रभावशाली तरीके से देशवासियों के सामने रखा जा सकता है। वैसे, देश देख चुका है कि स्मृति इरानी का सूचना तंत्र भी बेहद दमदार है। इन्होंने भी ये धमाकेदार रहस्योद्घाटन किया है कि “नोटबन्दी, गाँधी परिवार के लिए बहुत बड़ा हादसा साबित हुई है!” स्मृति भी कैबिनेट मंत्री के बेहद ज़िम्मेदार और संवैधानिक पद पर शोभायमान हैं। किसी भी तरह का झूठ बोलना या मनगढ़न्त बयान देना, न तो इनसे अपेक्षित है और ना ही इनके स्वभाव में है! ये इतनी संजीदा प्रवृत्ति की जन-नेता हैं कि एक बार ‘मैडम’ कहे जाने से आहत हो चुकी हैं!

लिहाज़ा, मोदी सरकार में मौजूद इस सबसे विदुषी नेता को देश को सामने ये ब्यौरा पेश करना चाहिए कि कैसे नोटबन्दी, गाँधी परिवार के लिए बड़ा हादसा बन गयी? क्योंकि ये महज़ हवाबाज़ी है कि गाँधी परिवार, भ्रष्टाचार और काले धन की गंगोत्री है! कैसे है, ये भी तो बताना पड़ेगा। गाँधी परिवार का कितना पैसा ऐसा है, जिसके बारे में मोदी सरकार जान चुकी है कि वो काला धन है और वो नोटबन्दी में डूब चुका है? क्योंकि अभी तक तो देश को यही पता है कि नोटबन्दी की वजह से बन्द हुए तक़रीबन सारे नोट, बैंकों में जमा होकर सफ़ेद धन बन चुके हैं। तो फिर गाँधी परिवार का काला धन कहाँ है? विदेश में है तो कहाँ? उसका ब्यौरा कौन देगा? 41 महीने से तो सत्ता में आप हैं, आपने ही तो शपथ लेते ही सबसे पहले काले धन को लेकर एसआईटी बनायी थी, आयकर विभाग, सीबीआई, ईडी, एनआईए, आईबी और रॉ, सब कुछ तो आपकी मुट्ठी में है। तो फिर अभी तक देश को बताया क्यों नहीं कि आपने गाँधी परिवार की कितनी दौलत को ज़ब्त किया है? कितने लोगों की गिरफ़्तारी हुई है? किन-किन मामलों में, सरकार का कौन-कौन सा महक़मा, गाँधी परिवार का टेटुआ दबाने की फ़िराक़ में है और किन-किन मामलों में सच्ची या झूठी जाँच पूरी हो चुकी है और आरोपपत्र दाख़िल किये जा चुके हैं?

बहरहाल, इस लेख में पेश सवालों का जबाव यदि देश के सामने नहीं आएगा तो भी क्या देश को ये मानकर ही चलना चाहिए कि रविशंकर प्रसाद और स्मृति इरानी जैसे नेता सच बोलते हैं, सोच-समझकर बोलते हैं और ठोक-बजाकर बोलते हैं। लिहाज़ा, इन्हें मोदी सरकार का नग़ीना बना ही रहना चाहिए। वैसे, ये सवाल इतने अहम और गम्भीर हैं कि प्रधानमंत्री मोदी को ख़ुद आगे आकर हरेक बात का ब्यौरा देना चाहिए। प्रेस कॉन्फ्रेस में पत्रकारों के सवालों का सामना करने का साहस भले ही इस 56 इंची नेता में नहीं हो, लेकिन चुनावी मंच से वीर-रस में ओत-प्रोत भाषण देने में तो इनका कोई सानी नहीं है। लिहाज़ा, मोदी चाहें तो अपनी चुनावी सभाओं में ही उपरोक्त सवालो को लेकर देश की आँखें खोल सकते हैं। दूसरी ओर, यदि ऐसा कुछ नहीं होता, यदि आपकी राय ऐसी बनती है कि रविशंकर और स्मृति, सरीख़े झूठे और मक्कार नेताओं ने देश का नाम नीचा किया है तो संकल्प लीजिए कि सही वक़्त आने पर आप इन्हें ज़रूर बताएँगे कि आप इनके झाँसे में आकर बार-बार उल्लू बनने के लिए तैयार नहीं हैं!

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‘मी टू मूवमेंट’ का एकजुट होकर समर्थन करना चाहिए : महेश भट्ट

“हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

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नई दिल्ली, 16 अक्टूबर | फिल्मों के जरिए बेबाकी से सामाजिक मुद्दों को सुनहरे पर्दे पर उतारने वाले निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट ने देश में चल रहे ‘मी टू मूवमेंट’ पर भी बेबाकी से अपनी राय दी है। उन्होंने कहा है कि यह कुछ ऐसा है, जिससे हम अलग-अलग विचार रखकर नहीं निपट सकते हैं। हमें पूरी जिम्मेदारी व एकजुटता के साथ इसका समर्थन करना चाहिए।

महेश भट्ट 12 अक्टूबर को रिलीज हुई अपनी होम प्रोडक्शन की फिल्म ‘जलेबी’ के प्रचार के लिए दिल्ली आए थे। उन्होंने बताया कि उनकी फिल्म में दिखाया गया प्यार किस तरह हिंदी फिल्मों में दिखाए जाने वाले पारंपरिक प्यार से अलग है।

महेश से जब पूछा गया कि फिल्म की कहानी अन्य प्रेम कहानियों से कितनी अलग है तो उन्होंने आईएएनएस को बताया, “हमारी फिल्म प्यार के उतार-चढ़ावों और उसकी बारीकियों से बड़ी हिम्मत से आंख मिलाती है। यह पारंपरिक हिंदी फिल्मों से इतर है। इसके अंत में लिखा आता है ‘एंड दे लिव्ड हैपिली एवर आफ्टर’। लेकिन वास्तव में प्यार परियों की कहानी से परे है। इंसानी सोच ने प्यार को शादी की परंपरा से जोड़ दिया, लेकिन प्यार तो कुदरत की देन है।

उन्होंने कहा, “आप देखें कि इस देश में राधा-कृष्ण के प्रेम को मंदिरों में बिठाया गया है, जबकि राधा-कृष्ण का प्यार शादी के बंधन तक सीमित नहीं था। हमारी फिल्म एक तरह से इसी तरह के प्यार और दो इंसानों की भावनाओं को पेश करती है।”

महेश कहते हैं, “फिल्म की सबसे खास बात यह है कि इसने नौजवान पीढ़ी को बहुत सम्मान दिया है। फिल्म के माध्यम से बताया गया है कि यह आज के दौर के जो युवा हैं या दर्शक हैं, वे जिंदगी से जुड़ी इस गहरी बात को समझेंगे।”

‘जलेबी’ के पोस्टर ने सुर्खियां और विवाद दोनों बटोरे थे। इसमें फिल्म की हीरोइन ट्रेन की खिड़की से चेहरा निकालकर हीरो को ‘किस’ करती नजर आती है। इसका जिक्र करने पर महेश हंसते हुए कहते हैं, “यह मार्केटिंग की जरूरत थी कि हम फिल्म की पहली ऐसी तस्वीर जारी करें, जिससे हल्ला मच जाए और देखिए आज आप भी यही सवाल पूछ रही हैं।..दरअसल, जब से हमारे संचार के माध्यम बदले हैं और हम शब्दों से तस्वीरों पर आए हैं, तब से अभिव्यक्ति ज्यादा असरदार हो गई है। तस्वीरों का असर ज्यादा होता है..उसका मिजाज कुछ अलग होता है। वास्तव में यह तस्वीर महिलाओं की आजादी को प्रतिबिंबित करती है।”

फिल्म की पृष्ठभूमि पुरानी दिल्ली है। इसके पीछे की वजह पूछे जाने पर महेश ने कहा, “इसका श्रेय फिल्म के निर्देशक (पुष्पदीप भारद्वाज) को जाता है। इनकी परवरिश पुरानी दिल्ली की जिन गलियों में हुई है, उन्होंने उन्हीं गलियों को पर्दे पर उतारा है। कोई शख्स जब किसी दौर में जिन पलों को जीता है तो जब वह उन्हें पर्दे पर उतारता है तो उसकी अदा कुछ और होती है।

महेश कहते हैं, “हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

‘मी टू मूवमेंट’ के बारे में आलिया भट्ट के पापा ने कहा, “हमें इस पहल का समर्थन करना चाहिए। यहां हमें अपनी जिम्मेदारी भी निभाने की जरूरत है। हम अलग-अलग राय रखकर इस समस्या का हल नहीं निकाल सकते, हम संवेदना और समझदारी के साथ इसका समाधान तलाशना होगा।”

–आईएएनएस

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‘आयुष्मान योजना काफी नहीं, लोगों को मिले स्वास्थ्य का अधिकार’

मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।

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Picture Credit : Quartz

नई दिल्ली, 17 अक्टूबर | देश में एक तरफ जहां महिला सशक्तिकरण का बड़ा जोरो-शोरो से ढिंढोरा पीटा जाता है, वहीं एक विश्वविद्यालय की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कामकाजी 92 प्रतिशत महिलाओं को प्रति माह 10,000 रुपये से भी कम की तनख्वाह मिलती है। इस मामले में पुरुष थोड़ा बेहतर स्थिति में हैं। लेकिन हैरत की बात यह है कि 82 प्रतिशत पुरुषों को भी 10,000 रुपये प्रति माह से कम की तनख्वाह मिलती है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र ने श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधार पर स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें उन्होंने देश में कामकाजी पुरुषों और महिलाओं पर आंकड़े तैयार किए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर 67 प्रतिशत परिवारों की मासिक आमदनी 10,000 रुपये थी जबकि सातवें केंद्रीय वेतन आयोग (सीपीसी) द्वारा अनुशंसित न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये प्रति माह है। इससे साफ होता है कि भारत में एक बड़े तबके को मजदूरी के रूप में उचित भुगतान नहीं मिल रहा है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है। यह आंकड़े पूरे भारत के हैं।”

उन्होंने कहा, “मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुताबिक, चिंता की बात यह है कि विनिर्माण क्षेत्र में भी 90 प्रतिशत उद्योग मजदूरों को न्यूनतम वेतन से नीचे मजदूरी का भुगतान करते हैं। असंगठित क्षेत्र की हालत और भी ज्यादा खराब है। अध्ययन के मुताबिक, तीन दशकों में संगठित क्षेत्र की उत्पादक कंपनियों में श्रमिकों की उत्पादकता छह प्रतिशत तक बढ़ी है, जबकि उनके वेतन में मात्र 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

क्या आप मानते हैं कि शिक्षित युवाओं के लिए वर्तमान हालात काफी खराब हो चुके हैं, जिस पर सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने कहा, “आज की स्थिति निश्चित रूप से काफी खराब है, खासकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में। हमें उन कॉलेजों से बाहर आने वाले बड़ी संख्या में शिक्षित युवाओं का बेहतर उपयोग करने की आवश्यकता है।”

इस स्थिति को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है, के सवाल पर उन्होंने आईएएनएस को बताया, “स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं, जैसे अगर सरकार सीधे गांवों व छोटे शहरों में रोजगार पैदा करे, इसके साथ ही बेहतर बुनियादी ढांचे (बिजली, सड़कों) उपलब्ध कराएं और युवाओं को कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध को सुनिश्चित करें, जिससे कुछ हद तक हालात सुधर सकते हैं।”

श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) के मुताबिक, 2015-16 के दौरान, भारत की बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी जबकि 2013-14 में यह 4.9 फीसदी थी। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि बेरोजगारी दर शहरी क्षेत्रों (4.9 फीसदी) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों (5.1 फीसदी) नें मामूली रूप से अधिक है।

अध्ययन के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाओं के बीच बेरोजगारी दर अधिक है। राष्ट्रीय स्तर पर महिला बेरोजगारी दर जहां 8.7 प्रतिशत है वहीं पुरुषों के बीच यह दर चार प्रतिशत है। काम में लगे हुए व्यक्तियों में से अधिकांश व्यक्ति स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं। राष्ट्र स्तर पर 46.6 प्रतिशत श्रमिकों स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं, इसके बाद 32.8 प्रतिशत सामयिक मजदूर हैं।

अध्ययन के मुताबिक, भारत में केवल 17 प्रतिशत व्यक्ति वेतन पर कार्य करते हैं और शेष 3.7 प्रतिशत संविदा कर्मी हैं।

–आईएएनएस

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नई नौकरियां नहीं पैदा हुई, देश में बढ़ी बेरोजगारी दर

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

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unemployment in India

नई दिल्ली/बेंगलुरू, 16 अक्टूबर | अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र की एक हालिया रिपोर्ट में बेरोजगारी दर के 20 वर्षो में सबसे अधिक होने की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने भारत में बेरोजगारी दर के बढ़ने की वजह नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना और शिक्षित युवाओं के तेजी से श्रमबल में शामिल होने को बताया है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है।”

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

अमित बसोले ने कहा, “देश में बढ़ती बेरोजगारी के पीछे दो कारक हैं, पहला 2013 से 2015 के बीच नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना क्योंकि कुल कार्यबल (नौकरियों में लगे लोगों की संख्या) बढ़ने की बजाय घट गया है। दूसरा कारक यह है कि श्रम बल में प्रवेश करने वाले अधिक शिक्षित युवा, जो उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी, जो पिछले 20 वर्षो में सबसे ज्यादा देखी गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में वृद्धि नहीं हुई है। अध्ययन के मुताबिक, जीडीपी में 10 फीसदी की वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में एक प्रतिशत से भी कम की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में बढ़ती बेरोजगारी को भारत के लिए एक नई समस्या बताया गया है।

इन हालात से निपटने के लिए क्या सरकार ने पर्याप्त कदम उठाए हैं, इस पर अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने बताया, “इन हालात पर सरकार के प्रदर्शन का मूल्यांकन करना थोड़ा मुश्किल है, विशेष रूप से 2015 के बाद क्योंकि उसके बाद से सरकार ने समग्र रोजगार की स्थिति पर कोई डेटा जारी नहीं किया है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग द इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) जैसे निजी स्रोतों के उपलब्ध डेटा से पता चलता है कि नौकरियों का सृजन कमजोर ही बना रहेगा। सीएमआईई डेटा यह भी इंगित करता है कि नोटबंदी के परिणामस्वरूप नौकरियों में कमी आई है, सरकार ने इस पर भी कोई डेटा जारी नहीं किया है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2018 की रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में अंडर एंप्लॉयमेंट और कम मजदूरी की भी समस्या हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त और युवाओं में बेरोजगारी 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है। बेरोजगारी पूरे देश में हैं, लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देश के उत्तरी राज्य हैं।

अमित बसोले ने यह भी कहा कि भारत के नौकरी बाजार की प्रकृति बदल गई है क्योंकि बाजार में अब अधिक शिक्षित लोग आ चुके हैं, वह उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं। उन्होंने कहा, “पिछले दशक में श्रम बाजार बदल गया है, विभिन्न डिग्रियों के अनुरूप रोजगार पैदा नहीं हुए हैं।”

हालात को सामान्य बनाने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाने चाहिए, इस सवाल पर रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने आईएएनएस को बताया, “यह हालात को सामान्य बनाने का सवाल नहीं है। इसके बजाय, हमें एक उचित राष्ट्रीय रोजगार नीति विकसित करने की आवश्यकता है, जो केंद्र द्वारा आर्थिक नीति बनाने में नौकरियों का सृजन करेगी।”

–आईएएनएस

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