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राम मन्दिर: क़ानून मंत्री का ढोंग, हिन्दुओं का धैर्य और कोर्ट की लाज

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Ayodhya Verdict Supreme Court

क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद पेशेवर वक़ील हैं। वो ख़ुद को अयोध्या विवाद का बहुत बड़ा विशेषज्ञ मानते हैं। क्योंकि उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में हिन्दू पक्ष की पैरवी की थी। इसीलिए जैसे ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो ‘विवादित ज़मीन के मालिकाना हक़’ को तय करने वाले मुक़दमे की सुनवाई को आगे बढ़ाने के बारे में जनवरी में विचार करेगा, वैसे ही रवि बाबू राजनीति बतियाने लगे। बोले कि “हम राम मन्दिर के मुद्दे को चुनाव से नहीं जोड़ते। हमें कोर्ट पर पूरा भरोसा है। हम कोर्ट का सम्मान करते हैं।” लेकिन मोदी सरकार के ही एक ‘विचित्र’ मंत्री गिरिराज किशोर को लगा कि ‘हिन्दुओं के धैर्य को अब जवाब दे देना चाहिए!’

संघ-बीजेपी समेत पूरा देश गिरिराज किशोर को एक विक्षिप्त नेता मानता है। वर्ना, उन्हें कैसे पता कि भारत के सौ करोड़ से ज़्यादा हिन्दुओं के धैर्य का पैमाना क्या है और उनका धैर्य कब जवाब देगा? सारे हिन्दुओं की बातें करने वाले ये हैं कौन? इन्हें हिन्दुओं ने कब अपना ठेकेदार बनाया? लेकिन रवि शंकर प्रसाद के पास तो करीब चार दशकों से झूठ फैलाने का अनुभव है। वो कभी मोदी सरकार के प्रवक्ता के रूप में सरकार की उपलब्धियों, उसके वादों-इरादों और जुमलों-नारों को लेकर फैलाये जा रहे झूठ का, झूठ बोलकर ही बचाव करते हैं, तो कभी यही काम बीजेपी के प्रधान प्रवक्ता के रूप में करते नज़र आते हैं। फ़िलहाल, रविशंकर प्रसाद ने केन्द्रीय क़ानून और सूचना-तकनीक मंत्री के संवैधानिक पद पर रहते हुए राम मन्दिर को लेकर सरासर ग़लत और भ्रामक बयान दिया है। क्योंकि…

• ये विशुद्ध झूठ है कि राम मन्दिर के मुद्दे को बीजेपी चुनाव से नहीं जोड़ती। सच ये है कि हमेशा जोड़ती रही है। डंके की चोट पर जोड़ती रही है। अब भी जोड़ रही है। और, आगे भी जोड़ती रहेगी। जोड़े बग़ैर बीजेपी का गुज़ारा ही नहीं है। अरे, चुनाव से नहीं जोड़ते तो चुनाव दर चुनाव बीजेपी के घोषणापत्र में हमेशा राम मन्दिर की बात क्यों की जाती! ज़ाहिर है, बीजेपी के लिए मन्दिर, चुनावी मुद्दा ही है!

• बीजेपी का ही नहीं, बल्कि पूरे के पूरे भगवा ख़ानदान का, कभी कोर्ट पर कोई भरोसा नहीं रहा। कोर्ट की लड़ाई तो इन फॉसिस्टों को मज़बूरन झेलनी पड़ रही है। वर्ना, उनके ख़ानदान से दिन-रात लोग चिल्ला-चिल्लाकर अध्यादेश लाकर मन्दिर निर्माण का रास्ता बनाने की बातें क्यों करते रहते? जिन्हें क़ानून और कोर्ट पर भरोसा होता वो मोदी सरकार की चला-चली की बेला में अध्यादेश लाने का बातें क्यों करते? क्या इन्हें नहीं पता कि अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का स्टे यानी यथास्थिति का आदेश लागू है। इस स्टे को ख़ारिज़ किये बग़ैर अध्यादेश के आ जाने से भी कुछ नहीं होगा। उल्टा इसी आधार पर अध्यादेश को यदि सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गयी तो?

• अध्यादेश की मियाद छह महीने से अधिक नहीं हो सकती। उसे क़ानून बनाना पड़ेगा, लेकिन क़ानून बनाने लायक वक़्त ही अब सरकार के पास नहीं बचा। लिहाज़ा, रविशंकर प्रसाद जब मोदी सरकार की ओर से ये बयान देते हैं कि ‘हमें कोर्ट पर पूरा भरोसा है’, तो इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि सरकार कोई अध्यादेश लाने नहीं जा रही। फिर अध्यादेश की बातें क्यों? हिन्दुओं के धैर्य की धमकी क्यों? ज़ाहिर है, रविशंकर का बयान पूरी तरह से ‘मुँह में राम बग़ल में छुरी’ वाली बात है!

• रविशंकर का अगला झूठ है कि ‘हम कोर्ट का सम्मान करते हैं!’ बीजेपी और भगवा ख़ानदान ने कभी कोर्ट का सम्मान नहीं किया। यदि सम्मान किया होता तो 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद को ढहाया ही क्यों जाता? क्या तब मामला अदालत के विचाराधीन नहीं था? क्या तब अदालत के फ़ैसले का इन्तज़ार करने की ज़रूरत नहीं थी? क्या तब सुप्रीम कोर्ट से वादा नहीं किया गया था कि कार सेवा की आड़ में बाबरी मस्जिद और विवादित क्षेत्र को कोई नुक़सान नहीं पहुँचाया जाएगा तथा वहाँ यथास्थिति को क़ायम रखा जाएगा? क्या तब ‘संविधान की गरिमा को सर्वोपरि’ रखने का वादा नहीं किया गया था?

• कोर्ट का सम्मान करने की दुहाई देने वाले ‘तथाकथित हिन्दू पक्ष’ यानी भगवा ख़ानदान के किसी भी सियासी या धार्मिक नेता ने, क्या कभी ये कहा कि अदालत का जो भी फ़ैसला होगा वो उन्हें मंज़ूर होगा और उसे वो सिर-माथे पर रखेंगे? उल्टा, अदालत का सम्मान करने का ढोंग रचने वाले दर्जनों भगवा नेता सैकड़ों बार ये कह चुके हैं कि कोर्ट का फ़ैसला यदि उनके हक़ में नहीं आया तो वो उसे हर्ग़िज़ नहीं मानेंगे!

• लिहाज़ा, यदि सुप्रीम कोर्ट को ये अन्देशा हो कि उसका फ़ैसला लागू होने की कोई गारंटी नहीं है तो फिर वो फ़ैसला करे ही क्यों? क्यों हड़बड़ी दिखाये? क्यों अपनी इज़्ज़त दाँव पर लगाये? क्या सुप्रीम कोर्ट को अपनी लाज बचाने का हक़ नहीं हो सकता! इसीलिए यदि आफ़त को सामने खड़ा देख, सुप्रीम कोर्ट ने लम्बी तारीख़ दे दी तो ग़लत क्या किया! यदि अदालत आगे भी लम्बी-लम्बी तारीख़ें देकर मामले को लम्बा ही खींचती रहे तो भी उसे क्या सिर्फ़ इसी आधार पर ग़लत ठहराया जाना चाहिए कि ‘सुप्रीम कोर्ट का काम है फ़ैसला सुनाना!’ तो क्या पक्षकारों का काम ये नहीं है कि वो फ़ैसले को मानें!

ज़रा सोचिए कि यदि किसी झगड़े के दौरान कोई आपसे कहे कि “मेरे मोहल्ले में आओ, तो तुम्हारी बोटी-बोटी कर दूँगा।” और आप अगले दिन बग़ैर मुनासिब तैयारियों के उसके मोहल्ले में जा पहुँचे और उससे अपने टुकड़े-टुकड़े करवा लिये तो क्या कोई आपको समझदार, होशियार, होनहार, पराक्रमी, वीर, बहादुर वग़ैरह कहेगा! यदि नहीं तो क्या यही दुविधा सुप्रीम कोर्ट के सामने नहीं होगी! अलबत्ता, सुप्रीम कोर्ट की ये लाचारी ज़रूर है कि वो अयोध्या विवाद के पक्षकारों से ऐसे आश्वासन की शर्त नहीं रख सकता कि वो हर हाल में उसके फ़ैसले का सम्मान करेंगे और उसे लागू करवाएँगे! सुप्रीम कोर्ट, अपने फ़ैसले का अनादर करने वालों को दंडित तो कर सकता है, लेकिन उनसे इस तरह का कोई हलफ़नामा नहीं ले सकता।

• जो लोग सुप्रीम कोर्ट को बेहद शक्तिशाली मानना चाहते हैं, उन्हें भी कान खोलकर सुन लेना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट की लाज ख़तरे में है। उसकी इज़्ज़त लूटने के लिए दुष्कर्मियों का एक जत्था घात लगाये बैठा है। तभी तो चुनावों से ऐन पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत जहाँ मोदी सरकार से क़ानून बनाकर मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने की माँग करते हैं, वहीं ‘सबरीमाला महिला प्रवेश’ की आड़ में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, सुप्रीम कोर्ट का नाम लिये बग़ैर उसे ललकारते हैं कि ‘कोर्ट को ऐसा फ़ैसला नहीं देना चाहिए, जिसे लागू नहीं कर जा सके!’ इसका मतलब ये हुआ कि कोर्ट ये हर्ग़िज़ नहीं देखे कि इंसाफ़ क्या है? बल्कि ये देखे कि क्या वो इंसाफ़ को लागू करवा पाएगा!

• यदि कोर्ट को ज़रा भी सन्देह हो कि उसका फ़ैसला लागू नहीं हो पाएगा तो क्या उसे जानबूझकर इंसाफ़ की ख़ातिर अग्नि-कुंड में कूद जाना चाहिए? अयोध्या विवाद से जुड़ा मुस्लिम पक्ष हमेशा से कहता रहा है कि उसे कोर्ट का आदेश मंज़ूर होगा। लेकिन यही हिम्मत हिन्दू पक्ष ने कभी नहीं दिखायी। ऐसा क्यों है? हिन्दू पक्ष की दलीलें क्या हैं? पहला, फ़ैसला हमारे पक्ष में होगा तभी मानेंगे! दूसरा, राम का जन्म वहीं हुआ था जहाँ वो कह रहे हैं, क्योंकि ये उनकी आस्था है! तीसरा, अदालतें आस्था के सवाल को कैसे हल कर सकती हैं?

• हिन्दू पक्ष की ‘आस्था’ से सुप्रीम कोर्ट कन्नी काट चुका है। वो कह चुका है कि उसका आस्था से कोई वास्ता नहीं है। उसे तो सिर्फ़ विवादित ज़मीन का मालिकाना हक़ तय करना है? ज़मीन का मालिक तो कोई एक ही होगा। तीनों पक्षकार बराबर के मालिक नहीं हो सकते। यही सहज तर्क, इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले की सबसे कमज़ोर कड़ी बना। हाईकोर्ट ने जिस ढंग से विवादित ज़मीन के तीन बराबर हिस्से करने का फ़ैसला सुनाया था वो कमोबेश ऐसा था जैसे एक पिता की ज़मीन का बँटवारा उसके तीन बेटों के बीच बराबर-बराबर कर दिया जाए। जबकि सारे झगड़े का असली सवाल तो ये है कि ज़मीन का मालिक कौन है?

• ये समझना बेहद दिलचस्प है कि अयोध्या का झगड़ा ज़मीन के वारिस का नहीं, बल्कि उसके मालिक का है! तीन पक्षकार हैं। एक मुस्लिम और दो हिन्दू। मुस्लिम पक्ष कहता है कि कोर्ट तय कर दे कि मालिक कौन है? हिन्दू पक्षों का कहना है कि कोर्ट ने यदि हमें मालिक बताया तब तो हम उसका फ़ैसला मानेंगे! वर्ना, यदि कोर्ट में हिम्मत है तो अपना फ़ैसला लागू करवाकर दिखा दे! ऐसे में बेचारा कोर्ट करे भी तो करे क्या!

• संघ प्रमुख मोहन भागवत को भी हिन्दुओं को उल्लू ही बनाना है। वर्ना, उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि यदि मोदी सरकार को राम मन्दिर के लिए अध्यादेश लाना होता तो ये काम जून 2014 में ही क्यों नहीं हो जाता? संसद के संयुक्त सत्र में बहुमत की ताक़त तो मोदी सरकार के पास चार साल से है। वक़्त रहते क़ानून बनाया होता तो क्या अब तक भव्य मन्दिर बनकर तैयार नहीं हो गया होता? लेकिन सबको पता है कि संघ-बीजेपी की निष्ठा राम मन्दिर को बनवाने में नहीं बल्कि इसे सियासी तौर पर भुनाने में है, इसे लेकर धार्मिक उन्माद फ़ैलाने में है, हिन्दुओं के धैर्य को भड़काने में है!

• दरअसल, संघ-बीजेपी की ये दृढ़ धारणा है कि हिन्दू मूर्ख हैं। इन्हें हिन्दुत्व के नाम पर मूर्ख बनाकर वोट बटोरो और मौज़ करो! तीन तलाक़ की ड्रामेबाज़ी भी इसीलिए है, लव-जिहाद, गाय-गोबर-बीफ़ भी इसीलिए! देश में 80 फ़ीसदी हिन्दू हैं लेकिन उनके लिए 20 फ़ीसदी मुसलमान ख़तरा हैं, क्योंकि संघियों की ओर से हिन्दुओं को यही घुट्टी पिलायी जाएगी, तभी तो हिन्दू डरेगी और संघ-बीजेपी उनकी रक्षा करेगा!

• सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हिन्दुओं से ‘धर्म के लिए बलिदान देने को तैयार रहने’ का आह्वान किया है!’ मतलब साफ़ है, जैसे किसान आर्थिक दुर्दशा से तंग आकर आत्महत्या कर लेते हैं, वैसे ही राम मन्दिर को ‘वहीं’ बनाने के लिए अबकी बार कारसेवा नहीं होगी, बल्कि राम भक्तों को आत्म-बलिदान देते हुए ख़ुदकुशी का सिलसिला चालू करना होगा! वर्ना, बलिदान का क्या कोई और तरीक़ा भी हो सकता है?

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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सेना ने माना, आईएलएंडएफएस बांड में फंसा एजीआईएफ का पैसा

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Indian Army insurance ILFS bonds

नई दिल्ली, 18 मार्च | भारतीय सेना जो पहले यह मानने को तैयार नहीं थी कि उनके कल्याण की निधि का पैसा आईएनएंडएफएस के विषैले बांड में फंस गया है, जबकि आईएनएस इस बात को बार-बार दोहराता रहा, लेकिन अब वह स्वीकार करती है कि भारत की एकमात्र निष्पक्ष न्यूज वायर का विश्लेषण सही है।

सेना के पीआरओ ने आखिरकार सवालों का जबाव देते हुए कहा कि आर्मी ग्रुप इंश्योरेंस फंड (एजीआईएफ) के काफी सख्त निवेश नियम हैं। देश के अत्यंत सम्मानित व प्रख्यात वित्तीय शख्सियतों की सलाह पर निवेश किया जाता है। इससे पहले सेना के पीआरओ लेफ्टिनेंट कर्नल मोहित वैष्णव मसले को उलझाते रहे और जवाब नहीं दिए थे। सेना का हालिया बयान आईएएनएस के तथ्यों के साथ इस प्रकार है :

एजीआईएफ का वर्षो से रिटर्न निर्धारित जोखिम लाभ सांचे में काफी बेहतर रहा। आईएएनएस ने इसपर कभी संदेह नहीं किया।

एजीआईएफ को 200 से कोई एनपीए नहीं रहा। इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आईएनएंडएफएस) ट्रिपल ‘ए’ रेटेड कंपनी थी और जब एजीआईएफ का निवेश हुआ उस समय उसे केंद्र व राज्य सरकारों दोनों की मदद मिली थी। कंपनी अगस्त 2018 में अचानक चूक के कारण ट्रिपल ‘ए’ से नीचे आ गई।

आईएएलएंडएफएस के 91,000 करोड़ के कर्ज में बैंकों का 63 फीसदी, म्यूचुअल फंड का तीन फीसदी से ज्यादा और बीमा कंपनियों, ईपीएफ वे पेंशन निधि का पांच फीसदी से ज्यादा फंस गया है।

बैंक/एएमसी/पेंशन निधि के मुकाबले एजीआईएफ की रकम अत्यल्प (0.5 फीसदी से कम) है। (सारा कुछ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है और आईएएनएस का कहना है कि विषैले आईएलएंडएफएस बांड में एजीआईएफ की 210 करोड़ रुपये की रकम फंस गई है।)

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राफ़ेल सौदे में सीएजी ने उड़ाई पारदर्शिता की धज़्ज़ियाँ

राफ़ेल रिपोर्ट में सीएजी ने अपनी प्रतिष्ठा गँवाई, इसने जितने सवालों के जबाब दिये उसके ज़्यादा तो प्रश्न खड़े किये

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Rafale deal scam

राफ़ेल विमानों की ख़रीदारी के लिए भारत और फ़्राँस के बीच हुए सौदे को अन्तर-सरकारी क़रार (आईजीए) कहा गया। आईजीए के इस नामकरण को समझना बहुत मुश्किल है। ख़ासकर, उस घटनाक्रम को देखते हुए जो 10 अप्रैल 2015 से पहले का रहा है। इस दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फ़्राँसिसी कम्पनी डसॉल्ट से 36 विमान ख़रीदने के फ़ैसले का ऐलान किया था।

यूपीए सरकार ने ग्लोबल टेंडर के ज़रिये दो विमानों के चुना था। पहला, डसॉल्ट कम्पनी का राफ़ेल और दूसरा, चार यूरोपीय देशों में बनने वाला यूरोफ़ाईटर टाइफून। टेंडर में राफ़ेल का दाम कम था। तब यूपीए ने 126 राफ़ेल विमानों की ख़रीदारी के लिए सौदेबाज़ी शुरू की।

ये क़रार दो सरकारों के बीच होने वाला जी-टू-जी समझौता नहीं था। क्योंकि ग्लोबल टेंडर को इस ढाँचे में नहीं रखा जा सकता। यही वजह है कि यूपीए सरकार ने जब रूस या अमेरिका से रक्षा उपकरणों की ख़रीदारी की तभी जी-टू-जी क़रार किये गये। यूपीए ने डसॉल्ट से जिस सौदे की बातचीत की थी, उसके तहत 18 विमानों का निर्माण सीधे डसॉल्ट को करना था और बाक़ी 108 का निर्माण हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को करना था और डलॉल्ट को इसकी तकनीक मुहैया करवानी थी।

मार्च 2015 में डसॉल्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि एचएएल के साथ हो रहा समझौता 95 फ़ीसदी पूरा हो चुका है और बाक़ी भी जल्द ही पूरा हो जाएगा। लेकिन प्रधानमंत्री ने उस समझौते को ख़त्म कर दिया और उसकी जगह डसॉल्ट से सीधे 36 विमान ख़रीदने का सौदा किया। इस समझौते से एचएएल को बाहर कर दिया गया। साफ़ है कि अब भी राफ़ेल विमानों की आपूर्ति का ज़िम्मा डसॉल्ट पर ही है, फ़्राँसिसी सरकार पर नहीं। इसके बावजूद, नये सौदे को ‘सरकार से सरकार के बीच’ (जी-टू-जी) नहीं, बल्कि ‘अन्तर-सरकारी क़रार’ (आईजीए) कहा जा रहा है।

नये सौदे की आड़

प्रधानमंत्री की घोषणा का अंज़ाम ये हुआ कि पुराने समझौते से जुड़ी वो सारे शर्ते ख़त्म हो गयीं जिनका ताल्लुक राफ़ेल के दाम से था और जिसे इसे रक्षा ख़रीद प्रक्रिया यानी डिफ़ेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसिज़र्स (डीपीपी) के तहत तय किया गया था। दूसरे शब्दों में, अब पुराना क़रार ख़त्म हो गया और उसकी जगह 36 विमानों की पूरी तरह से नयी डील (सौदे) ने ले ली। 2015 में फ़्राँस की धरती पर किये गये प्रधानमंत्री के ऐलान से भारत सरकार पशोपेश में फँस गयी, क्योंकि ये प्रधानमंत्री का एकतरफ़ा फ़ैसला था। अब आगे की बातचीत का दारोमदार सीधे-सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) पर आ गया।

नये सौदे की शर्तों पर बातचीत करने का जो रास्ता प्रधानमंत्री कार्यालय ने चुना वो रक्षा ख़रीद प्रक्रिया (डीपीपी) और रक्षा ख़रीद परिषद (डिफ़ेंस एक्वीज़ीशन काउन्सिल – डीएसी) के दायरे से बाहर था। क्योंकि रक्षा ख़रीद के लिए सौदेबाज़ी करने का काम डीपीपी को करना होता है। ये उसी का क्षेत्राधिकार है। इसीलिए राफ़ेल की फ़ाइल में रक्षा मंत्रालय के अफ़सरों की टिप्पणी ने प्रधानमंत्री कार्यालय पर सीधा-सीधा आक्षेप किया। दस्तावेज़ों से साबित हो गया कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने सौदेबाज़ी में रक्षा मंत्रालय की रसूख़ को गिरा दिया। दिलचस्प ये भी रहा कि नये सौदे में दो नयी बातें हुईं। पहला, एक ऑफ़सेट पार्टनर का जुड़ना और दूसरा, हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के हाथों से 108 विमानों के निर्माण की शर्ते का ख़त्म होना।

नया क़रार ‘अन्तर-सरकारी’ (आईजीए) नहीं है। क्योंकि डसॉल्ट एक निजी कम्पनी है। ये फ़्रेंच सरकार की भी कम्पनी नहीं है। इसीलिए फ़्रेंच सरकार ने 36 विमानों की सप्लाई की गारंटी लेने वाली शर्त से अपना पल्ला झाड़ लिया। फिर सप्लायर होने के नाते डसॉल्ट को गोपनीयता और कमीशन की शर्तों से छुटकारा दिलाने के लिए ज़ुर्माने और भ्रष्टाचार से जुड़े प्रावधानों को हटाया गया। ये काम प्रधानमंत्री कार्यालय की शह के बग़ैर कैसे मुमकिन हुआ? इसकी क्या वजह रही और ऐसा किससे कहने से हुआ? इन सवालों का कोई जबाब नहीं मिला।

रक्षा ख़रीद परिषद (डीएसी) को दरकिनार करने के लिए ऐसी शर्तें तैयार की गयीं जिससे प्रधानमंत्री और फ़्रेंच सरकार के लिए मुश्किलें पैदा नहीं हों। गारंटी की जगह उस ‘लेटर ऑफ़ कम्फर्ट’ (सहुलियत पत्र) ने ले ली जिसका कोई क़ानूनी प्रभाव नहीं होता। यहाँ तक कि फ़्रेंच सरकार ने डसॉस्ट को भुगतान करने के लिए अपने ‘स्क्रू खाते’ की सुविधा भी नहीं दी। शायद इसीलिए, क्योंकि फ़्रेंच सरकार इस सौदे की किसी भी ज़िम्मेदारी लेने से बचना चाहती थी। स्क्रू खाते के ज़रिये फ़्रेंच सरकार को ये सुनिश्चित करना होता कि डसॉल्ट ने अपनी शर्तों को निभाया, तभी उसे भुगतान हुआ।

ख़ामियों भरी रिपोर्ट

सीएजी ने कई तरह से देश को गच्चा दिया। पहला, इसकी रिपोर्ट 36 विमानों के दाम तक सीमित रही। इसका कहना है कि यूपीए के दौर वाले क़रार के मुक़ाबले नया सौदा 2.86% सस्ता है। लेकिन इस नतीज़े पर पहुँचने से पहले सीएजी ने सभी तथ्यों का ख़ुलासा नहीं किया। कहना मुश्किल है कि सीएजी ऐसा कैसे कर सकता है! दूसरा, सीएजी ने ये नहीं बताया कि प्रधानमंत्री ने किस आधार पर 36 विमानों की सीधी ख़रीदारी का साहसिक फ़ैसला लिया। तीसरा, सीएजी रिपोर्ट ने 2013 से लागू रक्षा ख़रीद प्रक्रिया (डीपीपी) को दरकिनार किये जाने के प्रति अपने नज़रें पूरी तरह से फेर लीं।

चौथा, सीएजी रिपोर्ट में इस तथ्य के प्रति भी उदासीनता दिखायी गयी है कि भारत की सौदेबाज़ी टीम ने एक ऐतराज़ ज़ाहिर किया है और उसे ठुकराने या ख़ारिज़ करने के लिए क्या दलीलें हैं। पाँचवाँ, सीएजी रिपोर्ट ने ये भी साफ़ नहीं किया कि नये क़रार के मसौदे से भ्रष्टाचार-विरोधी प्रावधान ग़ायब क्यों हैं। छठा, सीएजी रिपोर्ट ये तो बताती है कि गारंटी नहीं मिलने का कोई वित्तीय नुकसान नहीं होगा, लेकिन रिपोर्ट ये साफ़ नहीं करती कि गारंटी का प्रावधान क्यों नहीं है।

सबसे आश्चर्यजनक तो ये रहा कि सीएजी ने राफ़ेल के चयन के लिए यूपीए की आलोचना की, लेकिन उसी विमान को जब प्रधानमंत्री ने चुनने का फ़ैसला किया तो सीएजी की बोलती बन्द थी। इतना ही नहीं, राफ़ेल विमानों की संख्या को 126 से घटाकर 36 करने को लेकर भी जो उद्देश्य बताया गया वो ये कि भारतीय वायुसेना में विमानों की भारी कमी है जिसे यथाशीघ्र पूरा करना ज़रूरी था। लेकिन जब यूपीए के सौदे की तुलना मोदी सरकार के क़रार से की गयी तो पता चला कि नये सौदे में सिर्फ़ एक महीने की बचत होगी।

साफ़ है कि मौके की नज़ाक़त को देखते सीएजी अपनी अपेक्षाओं पर ख़रा नहीं उतरा। उसने अपने दायरे से बाहर जाकर सरकार की सुरक्षा करने का रास्ता चुना। अब तो सीएजी की प्रतिष्ठा को भी सुरक्षित करना होगा।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)
(साभार: TheHindu)

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सरकार और मीडिया ही बने लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक

लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन का सबसे बड़ा सबूत है, ग़लत जानकारियों को ही विश्वसनीय बनाकर पेश करना

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Modi on TV

ज़माना बदल गया। हमारा राष्ट्रीय संवाद अब पक्ष-विपक्ष का नहीं रहा, बल्कि दोस्तों और दुश्मनों का हो चुका है। चर्चा और बहस की गुंज़ाइश नहीं रही। आज जो सरकार या उसके बैठे लोगों के विरोध में हो, उसे देशद्रोही कहा जाता है। ऐसा माहौल बना दिया गया है कि पाकिस्तान से सम्बन्धित सरकार के हरेक क़दम का समर्थन करना ज़रूरी है। यदि विपक्ष ऐसे सवाल पूछता है, जिन्हें पूछा ही जाना चाहिए तो उस पर राष्ट्रविरोधी होने का आरोप मढ़ दिया जाता है। फ़ेसबुक औऱ ट्वीटर जैसे सोशल मीडिया के माध्यमों पर भी यदि कोई सरकार की आलोचना करता है तो उसके ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा ठोंक दिया जाता है।

लोकसभा के चुनाव सामने पाकर जन-संवाद को इतना हानिकारक बना दिया गया है कि बात बर्दाश्त से बाहर हो गयी है। प्रधानमंत्री कुछ भी बोलें लेकिन उनके गुणगान के लिए इलेक्ट्रानिक मीडिया ने चीयरलीडर्स या भाँडों की भूमिका थाम ली है। जब ‘द हिन्दू’ अख़बार ने बोफ़ोर्स ख़ुलासा किया था, तब विपक्ष ने राजीव गाँधी से सवाल पूछे थे। लेकिन जब उसी ‘द हिन्दू’ ने राफ़ेल सौदे का भाँडाफोड़ किया तो सरकार ने ‘द हिन्दू’ को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। विपक्ष के सवालों को ऐसे पेश किया गया जिनसे सुरक्षा बल कमज़ोर पड़ जाएँगे।

मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर आतंकी हमला हुआ था, तब मुठभेड़ के दौरान ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुम्बई पहुँचकर केन्द्र सरकार को नकारा होने और राष्ट्रीय सुरक्षा में नाकाम रहने का तमग़ा दे दिया। लेकिन जब पुलवामा हमला हुआ तो सरकार ने उन्हीं लोगों पर सवाल दाग़ने शुरू कर दिये जो उससे सवाल पूछ रहे थे। लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी की यादाश्त बहुत कमज़ोर है। मोदी उस वक़्त देश की सरकार के समर्थन में नहीं खड़े जब मुम्बई में आतंकी तबाही मचा रहे थे। शायद, उन्हें उस वक़्त अपनी कथनी और करनी में राष्ट्रभक्ति की छटा दिखायी दे रही थी।

ऐसी वारदातों के सामने मीडिया का दोहरा चरित्र बेनक़ाब हो गया है, क्योंकि अब उसके पास प्रधानमंत्री के दोमुँही बातों को उजागर करने का वक़्त नहीं है। ये मिसाल है कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएँ अब कहाँ से कहाँ पहुँच चुकी हैं। 2014 से पहले पहले प्रेस और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (यूपीए) की क़दम-क़दम पर चीड़फाड़ की। आज वही लोग इस सरकार के लिए भाँड या चीयरलीडर्स बन गये हैं। हालाँकि, ये बात मीडिया का सभी वर्गों पर लागू नहीं होती है। आज विपक्षी नेताओं के तक़रीबन सारे बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है। आज सरकार के हर क़दम को राष्ट्रभक्ति बताकर उसका स्तुतिगान किया जाता है। प्रधानमंत्री और इस सरकार के हरेक मंत्री के बयान को अक्षरशः सत्य बनाकर पेश किया जाता है। उन आँकड़ों को लेकर कोई सवाल नहीं पूछे जाते जिन्हें राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे (एनएसएसओ) जारी करता है। कोई सरकार से ये नहीं पूछ रहा कि वो किस आधार पर बालाकोट में 300-400 आतंकियों के सफ़ाये का दावा कर रही है। पत्रकारों और टीवी के एंकरों में प्रधानमंत्री को उनकी हैसियत से बड़े से बड़ा करके दिखाने की होड़ मची हुई है।

कई योजनाओं के नाम बदलकर उनकी उपलब्धियों के बारे में सरकार जो आँकड़े पेश करती है, कोई उसकी सच्चाई को जाँचने वाला नहीं है। जो लोग सच्चाई को सामने रखते हैं उनके साथ दक्षिण-पन्थी भक्तों की टोली ग़ाली-गलौज़ करती है। विपक्ष के नेताओं को फ़र्ज़ी बयान को जोड़कर उन्हें वायरल करवाया जाता है, ताकि उनका चरित्र-हनन किया जा सके। लेकिन दूसरी ओर, फ़ेसबुक और ट्वीटर के अफ़सरों को बुलाकर सरकार तलाड़ती है कि वो उसके क़रीबियों के चुनिन्दा पोस्ट को क्यों हटा रही है। सरकार को उन फ़ेक-पोस्ट की परवाह नहीं है, जिनमें विपक्षियों को निशाना बनाया जाता है। भ्रष्ट जानकारियों को आज विश्वसनीय सूचनाएँ बनाकर पेश किया जाता है। हर तरफ़ से ये झूठ फ़ैलाया जा रहा है कि मोदी सरकार ने भारत की दिशा ही बदल दी है।

अख़बारों में प्रधानमंत्री के विज्ञापन भरे पड़े हैं। इन पर जनता का पैसा बहाया जा रहा है, लेकिन कोई सवाल उठाने वाला नहीं है। मुट्ठीभर सम्पादकों ने सरकार को आड़े हाथों लेने का साहस दिखाया है। वो बधाई के पात्र हैं। लेकिन लोकतंत्र के चौथे खम्भे का ज़्यादातर हिस्सा सरकार की जाग़ीर बन चुका है। मीडिया की साख़ इतनी गिर चुकी है कि समाज के बहुत बड़े तबक़े ने टेलीविज़न देखना बन्द कर दिया है, क्योंकि अब वो इसे ख़बरें देने वाले माध्यम के रूप में नहीं पाते हैं। हर शाम को कुछ चैनलों पर कुछ ख़ास लोगों की साउंड बाइट सर्कस करते नज़र आती है। इनके ज़रिये समाज में ज़हर परोसा जाता है। ये लोकतंत्र का अराजक चेहरा है, जो सिर्फ़ झूठ और दुष्प्रचार के भरोसे क़ायम है।

यदि सरकार और चौथा खम्भा यानी मीडिया, एक ही चट्टा-बट्टा बन चुके हैं तो लोकतंत्र भारी ख़तरे में है। इसीलिए बहुत महत्वपूर्ण है कि वो लोग आगे आयें जो अपनी बातों को प्रभावी तरह से रखना जानते हैं। यदि ऐसे लोग मुखर नहीं होंगे तो झूठ और अफ़वाह को कौन चुनौती देगा। सच को कौन सामने लाएगा। हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को संविधान से जो ज़िम्मेदारियाँ मिली हैं, उसे लेकर उन्हें सरकार के प्रति नहीं बल्कि देश के प्रति जबाबदेह होना चाहिए। उन्हें सरकार की रखैल बनने के बजाय अपने विवेक के काम लेना चाहिए। चाहे केन्द्रीय हो या प्रादेशिक, जाँच एजेंसियों को चाहिए कि वो डर और पक्षपात के बग़ैर क़सूरवार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करें। लेकिन ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जाँच एजेंसियाँ चुन-चुनकर उन लोगों को निशाना बना रही हैं, जो सरकार के विरोधी हैं, जबकि उन लोगों को नज़रअन्दाज़ किया जाता है जो या तो सरकार के क़रीबी हैं और फिर उसका हिस्सा हैं। न्यायपालिका को भी ये समझना होगा कि यदि वो बेक़सूर लोगों के हक़ में नहीं खड़ी होती तो उसे निष्पक्ष नहीं माना जा सकता।

ख़ुशहाली और अच्छे दिन के लिए शान्ति, सद्भाव और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा ज़रूरी है। ऐसा लगता है कि आज हम ऐसे अन्यायपूर्ण भारत में रह रहे हैं, जहाँ कमज़ोर तबकों के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ सपने हैं। मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर चारों ओर नाउम्मीदी नज़र आती है।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)
(साभार: द टेलिग्राफ)

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