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राम मन्दिर: क़ानून मंत्री का ढोंग, हिन्दुओं का धैर्य और कोर्ट की लाज

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Ayodhya Verdict Supreme Court

क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद पेशेवर वक़ील हैं। वो ख़ुद को अयोध्या विवाद का बहुत बड़ा विशेषज्ञ मानते हैं। क्योंकि उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में हिन्दू पक्ष की पैरवी की थी। इसीलिए जैसे ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो ‘विवादित ज़मीन के मालिकाना हक़’ को तय करने वाले मुक़दमे की सुनवाई को आगे बढ़ाने के बारे में जनवरी में विचार करेगा, वैसे ही रवि बाबू राजनीति बतियाने लगे। बोले कि “हम राम मन्दिर के मुद्दे को चुनाव से नहीं जोड़ते। हमें कोर्ट पर पूरा भरोसा है। हम कोर्ट का सम्मान करते हैं।” लेकिन मोदी सरकार के ही एक ‘विचित्र’ मंत्री गिरिराज किशोर को लगा कि ‘हिन्दुओं के धैर्य को अब जवाब दे देना चाहिए!’

संघ-बीजेपी समेत पूरा देश गिरिराज किशोर को एक विक्षिप्त नेता मानता है। वर्ना, उन्हें कैसे पता कि भारत के सौ करोड़ से ज़्यादा हिन्दुओं के धैर्य का पैमाना क्या है और उनका धैर्य कब जवाब देगा? सारे हिन्दुओं की बातें करने वाले ये हैं कौन? इन्हें हिन्दुओं ने कब अपना ठेकेदार बनाया? लेकिन रवि शंकर प्रसाद के पास तो करीब चार दशकों से झूठ फैलाने का अनुभव है। वो कभी मोदी सरकार के प्रवक्ता के रूप में सरकार की उपलब्धियों, उसके वादों-इरादों और जुमलों-नारों को लेकर फैलाये जा रहे झूठ का, झूठ बोलकर ही बचाव करते हैं, तो कभी यही काम बीजेपी के प्रधान प्रवक्ता के रूप में करते नज़र आते हैं। फ़िलहाल, रविशंकर प्रसाद ने केन्द्रीय क़ानून और सूचना-तकनीक मंत्री के संवैधानिक पद पर रहते हुए राम मन्दिर को लेकर सरासर ग़लत और भ्रामक बयान दिया है। क्योंकि…

• ये विशुद्ध झूठ है कि राम मन्दिर के मुद्दे को बीजेपी चुनाव से नहीं जोड़ती। सच ये है कि हमेशा जोड़ती रही है। डंके की चोट पर जोड़ती रही है। अब भी जोड़ रही है। और, आगे भी जोड़ती रहेगी। जोड़े बग़ैर बीजेपी का गुज़ारा ही नहीं है। अरे, चुनाव से नहीं जोड़ते तो चुनाव दर चुनाव बीजेपी के घोषणापत्र में हमेशा राम मन्दिर की बात क्यों की जाती! ज़ाहिर है, बीजेपी के लिए मन्दिर, चुनावी मुद्दा ही है!

• बीजेपी का ही नहीं, बल्कि पूरे के पूरे भगवा ख़ानदान का, कभी कोर्ट पर कोई भरोसा नहीं रहा। कोर्ट की लड़ाई तो इन फॉसिस्टों को मज़बूरन झेलनी पड़ रही है। वर्ना, उनके ख़ानदान से दिन-रात लोग चिल्ला-चिल्लाकर अध्यादेश लाकर मन्दिर निर्माण का रास्ता बनाने की बातें क्यों करते रहते? जिन्हें क़ानून और कोर्ट पर भरोसा होता वो मोदी सरकार की चला-चली की बेला में अध्यादेश लाने का बातें क्यों करते? क्या इन्हें नहीं पता कि अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का स्टे यानी यथास्थिति का आदेश लागू है। इस स्टे को ख़ारिज़ किये बग़ैर अध्यादेश के आ जाने से भी कुछ नहीं होगा। उल्टा इसी आधार पर अध्यादेश को यदि सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गयी तो?

• अध्यादेश की मियाद छह महीने से अधिक नहीं हो सकती। उसे क़ानून बनाना पड़ेगा, लेकिन क़ानून बनाने लायक वक़्त ही अब सरकार के पास नहीं बचा। लिहाज़ा, रविशंकर प्रसाद जब मोदी सरकार की ओर से ये बयान देते हैं कि ‘हमें कोर्ट पर पूरा भरोसा है’, तो इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि सरकार कोई अध्यादेश लाने नहीं जा रही। फिर अध्यादेश की बातें क्यों? हिन्दुओं के धैर्य की धमकी क्यों? ज़ाहिर है, रविशंकर का बयान पूरी तरह से ‘मुँह में राम बग़ल में छुरी’ वाली बात है!

• रविशंकर का अगला झूठ है कि ‘हम कोर्ट का सम्मान करते हैं!’ बीजेपी और भगवा ख़ानदान ने कभी कोर्ट का सम्मान नहीं किया। यदि सम्मान किया होता तो 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद को ढहाया ही क्यों जाता? क्या तब मामला अदालत के विचाराधीन नहीं था? क्या तब अदालत के फ़ैसले का इन्तज़ार करने की ज़रूरत नहीं थी? क्या तब सुप्रीम कोर्ट से वादा नहीं किया गया था कि कार सेवा की आड़ में बाबरी मस्जिद और विवादित क्षेत्र को कोई नुक़सान नहीं पहुँचाया जाएगा तथा वहाँ यथास्थिति को क़ायम रखा जाएगा? क्या तब ‘संविधान की गरिमा को सर्वोपरि’ रखने का वादा नहीं किया गया था?

• कोर्ट का सम्मान करने की दुहाई देने वाले ‘तथाकथित हिन्दू पक्ष’ यानी भगवा ख़ानदान के किसी भी सियासी या धार्मिक नेता ने, क्या कभी ये कहा कि अदालत का जो भी फ़ैसला होगा वो उन्हें मंज़ूर होगा और उसे वो सिर-माथे पर रखेंगे? उल्टा, अदालत का सम्मान करने का ढोंग रचने वाले दर्जनों भगवा नेता सैकड़ों बार ये कह चुके हैं कि कोर्ट का फ़ैसला यदि उनके हक़ में नहीं आया तो वो उसे हर्ग़िज़ नहीं मानेंगे!

• लिहाज़ा, यदि सुप्रीम कोर्ट को ये अन्देशा हो कि उसका फ़ैसला लागू होने की कोई गारंटी नहीं है तो फिर वो फ़ैसला करे ही क्यों? क्यों हड़बड़ी दिखाये? क्यों अपनी इज़्ज़त दाँव पर लगाये? क्या सुप्रीम कोर्ट को अपनी लाज बचाने का हक़ नहीं हो सकता! इसीलिए यदि आफ़त को सामने खड़ा देख, सुप्रीम कोर्ट ने लम्बी तारीख़ दे दी तो ग़लत क्या किया! यदि अदालत आगे भी लम्बी-लम्बी तारीख़ें देकर मामले को लम्बा ही खींचती रहे तो भी उसे क्या सिर्फ़ इसी आधार पर ग़लत ठहराया जाना चाहिए कि ‘सुप्रीम कोर्ट का काम है फ़ैसला सुनाना!’ तो क्या पक्षकारों का काम ये नहीं है कि वो फ़ैसले को मानें!

ज़रा सोचिए कि यदि किसी झगड़े के दौरान कोई आपसे कहे कि “मेरे मोहल्ले में आओ, तो तुम्हारी बोटी-बोटी कर दूँगा।” और आप अगले दिन बग़ैर मुनासिब तैयारियों के उसके मोहल्ले में जा पहुँचे और उससे अपने टुकड़े-टुकड़े करवा लिये तो क्या कोई आपको समझदार, होशियार, होनहार, पराक्रमी, वीर, बहादुर वग़ैरह कहेगा! यदि नहीं तो क्या यही दुविधा सुप्रीम कोर्ट के सामने नहीं होगी! अलबत्ता, सुप्रीम कोर्ट की ये लाचारी ज़रूर है कि वो अयोध्या विवाद के पक्षकारों से ऐसे आश्वासन की शर्त नहीं रख सकता कि वो हर हाल में उसके फ़ैसले का सम्मान करेंगे और उसे लागू करवाएँगे! सुप्रीम कोर्ट, अपने फ़ैसले का अनादर करने वालों को दंडित तो कर सकता है, लेकिन उनसे इस तरह का कोई हलफ़नामा नहीं ले सकता।

• जो लोग सुप्रीम कोर्ट को बेहद शक्तिशाली मानना चाहते हैं, उन्हें भी कान खोलकर सुन लेना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट की लाज ख़तरे में है। उसकी इज़्ज़त लूटने के लिए दुष्कर्मियों का एक जत्था घात लगाये बैठा है। तभी तो चुनावों से ऐन पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत जहाँ मोदी सरकार से क़ानून बनाकर मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने की माँग करते हैं, वहीं ‘सबरीमाला महिला प्रवेश’ की आड़ में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, सुप्रीम कोर्ट का नाम लिये बग़ैर उसे ललकारते हैं कि ‘कोर्ट को ऐसा फ़ैसला नहीं देना चाहिए, जिसे लागू नहीं कर जा सके!’ इसका मतलब ये हुआ कि कोर्ट ये हर्ग़िज़ नहीं देखे कि इंसाफ़ क्या है? बल्कि ये देखे कि क्या वो इंसाफ़ को लागू करवा पाएगा!

• यदि कोर्ट को ज़रा भी सन्देह हो कि उसका फ़ैसला लागू नहीं हो पाएगा तो क्या उसे जानबूझकर इंसाफ़ की ख़ातिर अग्नि-कुंड में कूद जाना चाहिए? अयोध्या विवाद से जुड़ा मुस्लिम पक्ष हमेशा से कहता रहा है कि उसे कोर्ट का आदेश मंज़ूर होगा। लेकिन यही हिम्मत हिन्दू पक्ष ने कभी नहीं दिखायी। ऐसा क्यों है? हिन्दू पक्ष की दलीलें क्या हैं? पहला, फ़ैसला हमारे पक्ष में होगा तभी मानेंगे! दूसरा, राम का जन्म वहीं हुआ था जहाँ वो कह रहे हैं, क्योंकि ये उनकी आस्था है! तीसरा, अदालतें आस्था के सवाल को कैसे हल कर सकती हैं?

• हिन्दू पक्ष की ‘आस्था’ से सुप्रीम कोर्ट कन्नी काट चुका है। वो कह चुका है कि उसका आस्था से कोई वास्ता नहीं है। उसे तो सिर्फ़ विवादित ज़मीन का मालिकाना हक़ तय करना है? ज़मीन का मालिक तो कोई एक ही होगा। तीनों पक्षकार बराबर के मालिक नहीं हो सकते। यही सहज तर्क, इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले की सबसे कमज़ोर कड़ी बना। हाईकोर्ट ने जिस ढंग से विवादित ज़मीन के तीन बराबर हिस्से करने का फ़ैसला सुनाया था वो कमोबेश ऐसा था जैसे एक पिता की ज़मीन का बँटवारा उसके तीन बेटों के बीच बराबर-बराबर कर दिया जाए। जबकि सारे झगड़े का असली सवाल तो ये है कि ज़मीन का मालिक कौन है?

• ये समझना बेहद दिलचस्प है कि अयोध्या का झगड़ा ज़मीन के वारिस का नहीं, बल्कि उसके मालिक का है! तीन पक्षकार हैं। एक मुस्लिम और दो हिन्दू। मुस्लिम पक्ष कहता है कि कोर्ट तय कर दे कि मालिक कौन है? हिन्दू पक्षों का कहना है कि कोर्ट ने यदि हमें मालिक बताया तब तो हम उसका फ़ैसला मानेंगे! वर्ना, यदि कोर्ट में हिम्मत है तो अपना फ़ैसला लागू करवाकर दिखा दे! ऐसे में बेचारा कोर्ट करे भी तो करे क्या!

• संघ प्रमुख मोहन भागवत को भी हिन्दुओं को उल्लू ही बनाना है। वर्ना, उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि यदि मोदी सरकार को राम मन्दिर के लिए अध्यादेश लाना होता तो ये काम जून 2014 में ही क्यों नहीं हो जाता? संसद के संयुक्त सत्र में बहुमत की ताक़त तो मोदी सरकार के पास चार साल से है। वक़्त रहते क़ानून बनाया होता तो क्या अब तक भव्य मन्दिर बनकर तैयार नहीं हो गया होता? लेकिन सबको पता है कि संघ-बीजेपी की निष्ठा राम मन्दिर को बनवाने में नहीं बल्कि इसे सियासी तौर पर भुनाने में है, इसे लेकर धार्मिक उन्माद फ़ैलाने में है, हिन्दुओं के धैर्य को भड़काने में है!

• दरअसल, संघ-बीजेपी की ये दृढ़ धारणा है कि हिन्दू मूर्ख हैं। इन्हें हिन्दुत्व के नाम पर मूर्ख बनाकर वोट बटोरो और मौज़ करो! तीन तलाक़ की ड्रामेबाज़ी भी इसीलिए है, लव-जिहाद, गाय-गोबर-बीफ़ भी इसीलिए! देश में 80 फ़ीसदी हिन्दू हैं लेकिन उनके लिए 20 फ़ीसदी मुसलमान ख़तरा हैं, क्योंकि संघियों की ओर से हिन्दुओं को यही घुट्टी पिलायी जाएगी, तभी तो हिन्दू डरेगी और संघ-बीजेपी उनकी रक्षा करेगा!

• सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हिन्दुओं से ‘धर्म के लिए बलिदान देने को तैयार रहने’ का आह्वान किया है!’ मतलब साफ़ है, जैसे किसान आर्थिक दुर्दशा से तंग आकर आत्महत्या कर लेते हैं, वैसे ही राम मन्दिर को ‘वहीं’ बनाने के लिए अबकी बार कारसेवा नहीं होगी, बल्कि राम भक्तों को आत्म-बलिदान देते हुए ख़ुदकुशी का सिलसिला चालू करना होगा! वर्ना, बलिदान का क्या कोई और तरीक़ा भी हो सकता है?

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

चुनाव

मप्र में शिवराज के दांव पर कांग्रेस ने फेंका जाल

कांग्रेस का वचनपत्र मध्यप्रदेश की समृद्धि का नया इतिहास लिखेगा। यह विकास के साथ-साथ प्रदेश के हर नागरिक, चाहे वह किसान हो, युवा हो, गरीब मजदूर हो, महिला हो, इससे सभी वर्गो की तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा।

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Shivraj-Ajay

भोपाल, 10 नवंबर | मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के ‘किसानपुत्र’, ‘महिला हितैषी’ और ‘युवाओं के हमदर्द’ होने के दांव पर कांग्रेस ने ‘वचनपत्र’ के जरिए ऐसा जाल फेंका है, जो शिवराज की बीते डेढ़ दशक में बनी छवि पर चादर डालता दिख रहा है।

शिवराज की अगुवाई में भाजपा तीसरा विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही है। पिछले दो चुनावों में शिवराज की जीत में किसानों और महिलाओं की बड़ी भूमिका रही है। लाडली लक्ष्मी योजना और किसानों के लिए बनी योजनाओं ने शिवराज के सिर जीत का सेहरा बांधा था। शिवराज और भाजपा इस बार भी जीतने की रणनीति में व्यस्त है, मगर इसी बीच शनिवार को कांग्रेस ने ऐसा ‘वचनपत्र’ जारी किया, जिसमें सरकार बनने पर किसानों, युवाओं और महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव लाने के वादे किए गए हैं।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक साजी थॉमस कहते हैं कि शिवराज बीते डेढ़ दशक में राज्य में खुद को किसानपुत्र, महिलाओं का भाई, लड़कियों का मामा और युवाओं के आदर्श के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। कांग्रेस ने अपने वचनपत्र में उन्हीं वर्गो के जीवन को बदलने का वादा किया है, जो शिवराज के निशाने पर और उनका सबसे बड़ा वोट बैंक रहा है। कांग्रेस के वादे पर यह वर्ग कितना भरोसा करता है, यह तो समय ही बताएगा।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा, “कांग्रेस का वचनपत्र मध्यप्रदेश की समृद्धि का नया इतिहास लिखेगा। यह विकास के साथ-साथ प्रदेश के हर नागरिक, चाहे वह किसान हो, युवा हो, गरीब मजदूर हो, महिला हो, इससे सभी वर्गो की तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा।”

वहीं कांग्रेस के वचनपत्र पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चुटकी लेते हुए कहा कि कांग्रेस वचन तो देती है, मगर उसे पूरा कभी नहीं करती। इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाने का वचन दिया था, मगर गरीबी नहीं हटी। राजीव गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था, मगर गरीबी की जगह गरीब ही हटा दिए।

सच तो यह है कि भाजपा किसानों की आय दोगुनी करने और उन्हें फसल का उचित दाम दिलाने के वादे करती रही, मगर सरकार की ये कोशिशें जमीनी स्तर पर रंग नहीं ला पाईं। बीते दो साल में किसानों के कई आंदोलनों ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया है।

वहीं उद्योगों की स्थापना के बावजूद पर्याप्त संख्या में युवाओं को रोजगार नहीं मिला, साथ ही महिला असुरक्षा की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर कांग्रेस ने वचनपत्र तैयार किया है, और सभी वर्गो से वादे किए हैं कि उनके कल्याण की योजनाएं तो बनेंगी ही, साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य के हालात में बदलाव आाएगा।

बहरहाल, कांग्रेस का वचनपत्र तो आ गया है, अब भाजपा का घोषणापत्र आने वाला है। अब देखना होगा कि भाजपा की क्या रणनीति होती है और वह कांग्रेस के वादों का किस तरह जवाब देती है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने तो मीडिया के सामने कह दिया है कि भाजपा संकल्पपत्र बनाती है, जो महज ‘जुमलापत्र’ बनकर रह जाता है।

–आईएएनएस

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ब्लॉग

व्यंग्य – जन-गण नामकरण आन्दोलन: मुसलमान मंत्री बदलें नाम, अब ‘पक्षीफल’ कहलाएगा अंडा

भगवा ख़ानदान का इरादा है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ को राम मन्दिर आन्दोलन से भी बड़ा और विश्वव्यापी बनाया जाएगा! हिन्दुत्व के नायकों का मानना है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ के आगे बढ़ने से मुसलमानों में गुस्सा पैदा होगा। यदि इस गुस्से को और भड़का दिया जाए तो जहाँ-तहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़क जाएगी।

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Politicians Cartoon

अभी-अभी केन्द्रीय कैबिनेट की एक आपात और बेहद ख़ुफ़िया बैठक हुई है! इसमें पहली बार संघ, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के शीर्ष पदाधिकारी भी शामिल हुए! महामहिम चौकीदार महोदय ने सर्वोच्च स्तर की इस रणनीतिक मंत्रणा में अपने मंत्रियों को पीछे बैठाया और हिन्दू हित के संरक्षक महापुरुषों को अगली पंक्ति में बैठाया गया! बैठक में कई क्रान्तिकारी फ़ैसले लिये गये, लेकिन ये भी तय हुआ कि इनका औपचारिक ऐलान नहीं होगा! लिहाज़ा, सोशल मीडिया पर प्रकाशित इस पोस्ट को आप बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ मान सकते हैं!

सरकार ने तय किया है कि अब देश में ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ चलाया जाएगा! चुनाव आचार संहिता को देखते हुए अभी इस आन्दोलन का ऐलान नहीं किया जाएगा, लेकिन भगवा ख़ानदान का इरादा है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ को राम मन्दिर आन्दोलन से भी बड़ा और विश्वव्यापी बनाया जाएगा! हिन्दुत्व के नायकों का मानना है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ के आगे बढ़ने से मुसलमानों में गुस्सा पैदा होगा। यदि इस गुस्से को और भड़का दिया जाए तो जहाँ-तहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़क जाएगी। और, ऐसा होते ही जहाँ मुसलमानों का क़त्लेआम शुरू हो जाएगा, वहीं हिन्दुओं के ध्रुवीकरण इतना ज़ोर पकड़ लेगा, जैसे जंगल की बेक़ाबू आग!

भगवा ख़ानदान का यक़ीन है कि यदि उसकी ये रणनीति परवान चढ़ गयी तो न सिर्फ़ आगामी विधानसभा चुनावों में बीजेपी को ऐतिहासिक कामयाबी मिलेगी, बल्कि 2019 के आम चुनाव में भी पार्टी कम से कम 350 सीटें जीतने में सफल होगी! कैबिनेट की विशेष बैठक में ये भी तय हुआ कि भगवा ख़ानदान के जुड़े लोग बड़े पैमाने पर शहरों, जगहों और भवनों के नाम बदलने की माँग करने वाले बयान देने पर ज़ोर दें। ताकि मीडिया में उन्हें भरपूर सुर्ख़ियाँ मिलती रहें। इसका सबसे बड़ा फ़ायदा ये होगा कि जनता का ध्यान राफ़ेल और नोटबन्दी जैसे विश्वस्तरीय घोटालों से हट जाएगा और वो मूर्खों की तरह से इस झाँसे में फँस जाएगी कि मोदी का कोई विकल्प नहीं है! मोदी अजेय है!

  1. मुसलमान मंत्री बदले नाम

भगवा ख़ानदान के आग्रह पर ढोंगी सरकार ने तय किया है कि देश भर में बीजेपी की सरकारों में जो भी इक्का-दुक्का मुसलमान मंत्री हैं, उनके नाम फ़ौरन बदले जाएँ! वर्ना, इन मुसलमानों को मंत्री पद गँवाना होगा!

  1. ‘पक्षीफल’ कहलाएगा अंडा

भगवान ख़ानदान ने तय किया है कि अब अंडे को ‘पक्षीफल’ कहा जाएगा! इस फल से न सिर्फ़ मन्दिरों में भगवान का भोग लगाया जा सकेगा, बल्कि व्रत-उपवास में इसे फलाहार के रूप में इस्तेमाल करना होगा!

  1. वीर सावरकर पक्षीपालक योजना

वीर सावरकर पक्षीपालक योजना की आत्मा को मेक इन इंडिया की आत्मा से जोड़ा जाएगा। भगवा ख़ानदान को यक़ीन है कि आत्माओं के मिलन वाली इस क्रान्तिकारी नीति से पक्षीफलों की माँग में ज़बरदस्त उछाल आएगा और पक्षीपालकों के रूप में कम से कम 10 करोड़ युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर खुलेंगे। इसे वीर सावरकर पक्षीपालक योजना कहा जाएगा। प्रधानमंत्री फ़सल बीमा की सुविधा भी आरक्षण की तरह इस अद्भुत योजना के तहत में पहले दस साल तक मुफ़्त मिलेगी और भविष्य में भी इसे आरक्षण की ही तरह दस-दस वर्षों के लिए बढ़ाया जा सकेगा।

  1. दीनदयाल पकौड़ा योजना

वीर सावरकर पक्षीपालक योजना में उन लोगों को वरीयता मिलेगी जो अपने ‘भक्त होने का आधार कार्ड’ दिखा सकें और जो ‘दीनदयाल पकौड़ा योजना’ के लाभार्थी नहीं हो! ग़ौरतलब है कि प्रधानमंत्री पकौड़ा रोज़गार योजना का भी नया नामकरण कर दिया गया है! उसे अब ‘दीनदयाल पकौड़ा योजना’ कहा जाएगा!

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ओपिनियन

अंतिम सांस तक कांग्रेसी, मगर बेटे का साथ दूंगा : सत्यव्रत चतुर्वेदी

सत्यव्रत चतुर्वेदी के पिता बाबूराम चतुर्वेदी और मां विद्यावती चतुर्वेदी कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में रही हैं। दोनों ने आजादी की लड़ाई लड़ी, इंदिरा गांधी के काफी नजदीक रहे।

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Satyavrat Chaturvedi

छतरपुर, 9 नवंबर | कांग्रेस के पूर्व प्रवक्ता और पूर्व राज्यसभा सदस्य सत्यव्रत चतुर्वेदी के बेटे नितिन बंटी चतुर्वेदी ने बगावत कर समाजवादी पार्टी का दामन थामकर छतरपुर जिले के राजनगर विधानसभा क्षेत्र से नामांकनपत्र भरा है। चतुर्वेदी का कहना है कि वे अंतिम सांस तक कांग्रेसी हैं, मगर एक पिता के तौर पर बेटे का हर संभव साथ देंगे, क्योंकि छुपकर राजनीति करना उनकी आदत में नहीं है।

नितिन बंटी चतुर्वेदी राजनगर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के दावेदार थे, मगर कांग्रेस ने अंतिम समय में उसका टिकट काट दिया। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के कहने पर नितिन ने सपा का दामन थामकर चुनाव लड़ने का फैसला लिया।

सत्यव्रत चतुर्वेदी ने आईएएनएस से खास बातचीत में कहा, “नितिन बालिग है, उसे अपने फैसले करने का हक है, पिछले दो चुनाव से वह कांग्रेस से टिकट मांग रहा था, पार्टी ने हर बार अगले चुनाव का भरोसा दिलाया, मगर इस बार फिर वही हुआ। पार्टी ने टिकट नहीं दिया, इन स्थितियों में बंटी ने सपा से चुनाव लड़ने का फैसला लिया, यह उसका व्यक्तिगत फैसला है। मैं तो अंतिम सांस तक कांग्रेसी रहूंगा। हां, पिता के नाते बंटी का साथ दूंगा। छुपकर कहने और राजनीति करना आदत में नहीं है, जो करना है वह कहकर करता हूं, छुपाता नहीं हूं।”

चतुर्वेदी से जब पूछा गया कि बेटा सपा से चुनाव लड़ रहा है, पार्टी आप पर कार्रवाई कर सकती है, तो उनका जवाब था, “मैं कांग्रेस में जन्मा हूं, कांग्रेसी रक्त मेरी नसों में प्रवाहित होता है, दिल में कांग्रेस है, पार्टी को फैसले लेने का अधिकार है, मगर मेरे दिल से कोई कांग्रेस को नहीं निकाल सकता। अंतिम सांस भी कांग्रेस के लिए होगी।”

सत्यव्रत चतुर्वेदी के पिता बाबूराम चतुर्वेदी और मां विद्यावती चतुर्वेदी कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में रही हैं। दोनों ने आजादी की लड़ाई लड़ी, इंदिरा गांधी के काफी नजदीक रहे। बाबूराम चतुर्वेदी राज्य सरकार में मंत्री रहे और विद्यावती कई बार सांसद का चुनाव जीतीं। बुंदेलखंड में उनकी हैसियत दूसरी इंदिरा गांधी के तौर पर रही है।

चतुर्वेदी के समकालीन नेताओं में शामिल दिग्विजय सिंह, कांतिलाल भूरिया, सुभाष यादव आदि ऐसे नेता हैं, जिनके परिवार में एक और एक से ज्यादा सदस्यों को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया है, मगर चतुर्वेदी के बेटे को पार्टी ने टिकट देना उचित नहीं समझा। इसी के चलते उनके बेटे बंटी ने बगावत कर दी।

अन्य नेताओं के परिजनों को टिकट दिए जाने के सवाल पर चतुर्वेदी का कहना है, “इस सवाल का जवाब तो मैं नहीं दे सकता, यह जवाब तो पार्टी के बड़े नेता और टिकटों का वितरण करने वाले ही दे सकते हैं, जहां तक बात मेरी है, मन में तो मेरे भी सवाल आता है कि आखिर ऐसा हुआ क्यों।”

कांग्रेस में टिकट वितरण की कवायद छह माह पहले ही शुरू करने का ऐलान कर दिया गया था, जगह जगह पर्यवेक्षक भेजे गए, सर्वे का दौर चला, नेताओं की टीमों ने डेरा डाला और वादा किया गया कि न तो पैराशूट वाले नेता चुनाव मैदान में उतारे जाएंगे और न ही बीते चुनावों में भारी मतों से हारे उम्मीदवारों को मौका दिया जाएगा। मगर उम्मीदवारों की सूचियां इन सारे दावे और वादे की पोल खोलने के लिए काफी है।

चतुर्वेदी भी इस बात से हैरान हैं कि जो व्यक्ति पिछला चुनाव 38 और 40 हजार से हारा, उसे उम्मीदवार बना दिया गया। आखिर किसने और कैसा सर्वे किया, यह वे समझ नहीं पा रहे हैं। अब तो चुनाव के बाद ही पार्टी को इन हालात की समीक्षा करनी चाहिए, आखिर किसने किस तरह का खेल ख्ेाला।

–आईएएनएस

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