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राम मन्दिर: क़ानून मंत्री का ढोंग, हिन्दुओं का धैर्य और कोर्ट की लाज

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Ayodhya Verdict Supreme Court

क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद पेशेवर वक़ील हैं। वो ख़ुद को अयोध्या विवाद का बहुत बड़ा विशेषज्ञ मानते हैं। क्योंकि उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में हिन्दू पक्ष की पैरवी की थी। इसीलिए जैसे ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो ‘विवादित ज़मीन के मालिकाना हक़’ को तय करने वाले मुक़दमे की सुनवाई को आगे बढ़ाने के बारे में जनवरी में विचार करेगा, वैसे ही रवि बाबू राजनीति बतियाने लगे। बोले कि “हम राम मन्दिर के मुद्दे को चुनाव से नहीं जोड़ते। हमें कोर्ट पर पूरा भरोसा है। हम कोर्ट का सम्मान करते हैं।” लेकिन मोदी सरकार के ही एक ‘विचित्र’ मंत्री गिरिराज किशोर को लगा कि ‘हिन्दुओं के धैर्य को अब जवाब दे देना चाहिए!’

संघ-बीजेपी समेत पूरा देश गिरिराज किशोर को एक विक्षिप्त नेता मानता है। वर्ना, उन्हें कैसे पता कि भारत के सौ करोड़ से ज़्यादा हिन्दुओं के धैर्य का पैमाना क्या है और उनका धैर्य कब जवाब देगा? सारे हिन्दुओं की बातें करने वाले ये हैं कौन? इन्हें हिन्दुओं ने कब अपना ठेकेदार बनाया? लेकिन रवि शंकर प्रसाद के पास तो करीब चार दशकों से झूठ फैलाने का अनुभव है। वो कभी मोदी सरकार के प्रवक्ता के रूप में सरकार की उपलब्धियों, उसके वादों-इरादों और जुमलों-नारों को लेकर फैलाये जा रहे झूठ का, झूठ बोलकर ही बचाव करते हैं, तो कभी यही काम बीजेपी के प्रधान प्रवक्ता के रूप में करते नज़र आते हैं। फ़िलहाल, रविशंकर प्रसाद ने केन्द्रीय क़ानून और सूचना-तकनीक मंत्री के संवैधानिक पद पर रहते हुए राम मन्दिर को लेकर सरासर ग़लत और भ्रामक बयान दिया है। क्योंकि…

• ये विशुद्ध झूठ है कि राम मन्दिर के मुद्दे को बीजेपी चुनाव से नहीं जोड़ती। सच ये है कि हमेशा जोड़ती रही है। डंके की चोट पर जोड़ती रही है। अब भी जोड़ रही है। और, आगे भी जोड़ती रहेगी। जोड़े बग़ैर बीजेपी का गुज़ारा ही नहीं है। अरे, चुनाव से नहीं जोड़ते तो चुनाव दर चुनाव बीजेपी के घोषणापत्र में हमेशा राम मन्दिर की बात क्यों की जाती! ज़ाहिर है, बीजेपी के लिए मन्दिर, चुनावी मुद्दा ही है!

• बीजेपी का ही नहीं, बल्कि पूरे के पूरे भगवा ख़ानदान का, कभी कोर्ट पर कोई भरोसा नहीं रहा। कोर्ट की लड़ाई तो इन फॉसिस्टों को मज़बूरन झेलनी पड़ रही है। वर्ना, उनके ख़ानदान से दिन-रात लोग चिल्ला-चिल्लाकर अध्यादेश लाकर मन्दिर निर्माण का रास्ता बनाने की बातें क्यों करते रहते? जिन्हें क़ानून और कोर्ट पर भरोसा होता वो मोदी सरकार की चला-चली की बेला में अध्यादेश लाने का बातें क्यों करते? क्या इन्हें नहीं पता कि अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का स्टे यानी यथास्थिति का आदेश लागू है। इस स्टे को ख़ारिज़ किये बग़ैर अध्यादेश के आ जाने से भी कुछ नहीं होगा। उल्टा इसी आधार पर अध्यादेश को यदि सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गयी तो?

• अध्यादेश की मियाद छह महीने से अधिक नहीं हो सकती। उसे क़ानून बनाना पड़ेगा, लेकिन क़ानून बनाने लायक वक़्त ही अब सरकार के पास नहीं बचा। लिहाज़ा, रविशंकर प्रसाद जब मोदी सरकार की ओर से ये बयान देते हैं कि ‘हमें कोर्ट पर पूरा भरोसा है’, तो इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि सरकार कोई अध्यादेश लाने नहीं जा रही। फिर अध्यादेश की बातें क्यों? हिन्दुओं के धैर्य की धमकी क्यों? ज़ाहिर है, रविशंकर का बयान पूरी तरह से ‘मुँह में राम बग़ल में छुरी’ वाली बात है!

• रविशंकर का अगला झूठ है कि ‘हम कोर्ट का सम्मान करते हैं!’ बीजेपी और भगवा ख़ानदान ने कभी कोर्ट का सम्मान नहीं किया। यदि सम्मान किया होता तो 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद को ढहाया ही क्यों जाता? क्या तब मामला अदालत के विचाराधीन नहीं था? क्या तब अदालत के फ़ैसले का इन्तज़ार करने की ज़रूरत नहीं थी? क्या तब सुप्रीम कोर्ट से वादा नहीं किया गया था कि कार सेवा की आड़ में बाबरी मस्जिद और विवादित क्षेत्र को कोई नुक़सान नहीं पहुँचाया जाएगा तथा वहाँ यथास्थिति को क़ायम रखा जाएगा? क्या तब ‘संविधान की गरिमा को सर्वोपरि’ रखने का वादा नहीं किया गया था?

• कोर्ट का सम्मान करने की दुहाई देने वाले ‘तथाकथित हिन्दू पक्ष’ यानी भगवा ख़ानदान के किसी भी सियासी या धार्मिक नेता ने, क्या कभी ये कहा कि अदालत का जो भी फ़ैसला होगा वो उन्हें मंज़ूर होगा और उसे वो सिर-माथे पर रखेंगे? उल्टा, अदालत का सम्मान करने का ढोंग रचने वाले दर्जनों भगवा नेता सैकड़ों बार ये कह चुके हैं कि कोर्ट का फ़ैसला यदि उनके हक़ में नहीं आया तो वो उसे हर्ग़िज़ नहीं मानेंगे!

• लिहाज़ा, यदि सुप्रीम कोर्ट को ये अन्देशा हो कि उसका फ़ैसला लागू होने की कोई गारंटी नहीं है तो फिर वो फ़ैसला करे ही क्यों? क्यों हड़बड़ी दिखाये? क्यों अपनी इज़्ज़त दाँव पर लगाये? क्या सुप्रीम कोर्ट को अपनी लाज बचाने का हक़ नहीं हो सकता! इसीलिए यदि आफ़त को सामने खड़ा देख, सुप्रीम कोर्ट ने लम्बी तारीख़ दे दी तो ग़लत क्या किया! यदि अदालत आगे भी लम्बी-लम्बी तारीख़ें देकर मामले को लम्बा ही खींचती रहे तो भी उसे क्या सिर्फ़ इसी आधार पर ग़लत ठहराया जाना चाहिए कि ‘सुप्रीम कोर्ट का काम है फ़ैसला सुनाना!’ तो क्या पक्षकारों का काम ये नहीं है कि वो फ़ैसले को मानें!

ज़रा सोचिए कि यदि किसी झगड़े के दौरान कोई आपसे कहे कि “मेरे मोहल्ले में आओ, तो तुम्हारी बोटी-बोटी कर दूँगा।” और आप अगले दिन बग़ैर मुनासिब तैयारियों के उसके मोहल्ले में जा पहुँचे और उससे अपने टुकड़े-टुकड़े करवा लिये तो क्या कोई आपको समझदार, होशियार, होनहार, पराक्रमी, वीर, बहादुर वग़ैरह कहेगा! यदि नहीं तो क्या यही दुविधा सुप्रीम कोर्ट के सामने नहीं होगी! अलबत्ता, सुप्रीम कोर्ट की ये लाचारी ज़रूर है कि वो अयोध्या विवाद के पक्षकारों से ऐसे आश्वासन की शर्त नहीं रख सकता कि वो हर हाल में उसके फ़ैसले का सम्मान करेंगे और उसे लागू करवाएँगे! सुप्रीम कोर्ट, अपने फ़ैसले का अनादर करने वालों को दंडित तो कर सकता है, लेकिन उनसे इस तरह का कोई हलफ़नामा नहीं ले सकता।

• जो लोग सुप्रीम कोर्ट को बेहद शक्तिशाली मानना चाहते हैं, उन्हें भी कान खोलकर सुन लेना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट की लाज ख़तरे में है। उसकी इज़्ज़त लूटने के लिए दुष्कर्मियों का एक जत्था घात लगाये बैठा है। तभी तो चुनावों से ऐन पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत जहाँ मोदी सरकार से क़ानून बनाकर मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने की माँग करते हैं, वहीं ‘सबरीमाला महिला प्रवेश’ की आड़ में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, सुप्रीम कोर्ट का नाम लिये बग़ैर उसे ललकारते हैं कि ‘कोर्ट को ऐसा फ़ैसला नहीं देना चाहिए, जिसे लागू नहीं कर जा सके!’ इसका मतलब ये हुआ कि कोर्ट ये हर्ग़िज़ नहीं देखे कि इंसाफ़ क्या है? बल्कि ये देखे कि क्या वो इंसाफ़ को लागू करवा पाएगा!

• यदि कोर्ट को ज़रा भी सन्देह हो कि उसका फ़ैसला लागू नहीं हो पाएगा तो क्या उसे जानबूझकर इंसाफ़ की ख़ातिर अग्नि-कुंड में कूद जाना चाहिए? अयोध्या विवाद से जुड़ा मुस्लिम पक्ष हमेशा से कहता रहा है कि उसे कोर्ट का आदेश मंज़ूर होगा। लेकिन यही हिम्मत हिन्दू पक्ष ने कभी नहीं दिखायी। ऐसा क्यों है? हिन्दू पक्ष की दलीलें क्या हैं? पहला, फ़ैसला हमारे पक्ष में होगा तभी मानेंगे! दूसरा, राम का जन्म वहीं हुआ था जहाँ वो कह रहे हैं, क्योंकि ये उनकी आस्था है! तीसरा, अदालतें आस्था के सवाल को कैसे हल कर सकती हैं?

• हिन्दू पक्ष की ‘आस्था’ से सुप्रीम कोर्ट कन्नी काट चुका है। वो कह चुका है कि उसका आस्था से कोई वास्ता नहीं है। उसे तो सिर्फ़ विवादित ज़मीन का मालिकाना हक़ तय करना है? ज़मीन का मालिक तो कोई एक ही होगा। तीनों पक्षकार बराबर के मालिक नहीं हो सकते। यही सहज तर्क, इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले की सबसे कमज़ोर कड़ी बना। हाईकोर्ट ने जिस ढंग से विवादित ज़मीन के तीन बराबर हिस्से करने का फ़ैसला सुनाया था वो कमोबेश ऐसा था जैसे एक पिता की ज़मीन का बँटवारा उसके तीन बेटों के बीच बराबर-बराबर कर दिया जाए। जबकि सारे झगड़े का असली सवाल तो ये है कि ज़मीन का मालिक कौन है?

• ये समझना बेहद दिलचस्प है कि अयोध्या का झगड़ा ज़मीन के वारिस का नहीं, बल्कि उसके मालिक का है! तीन पक्षकार हैं। एक मुस्लिम और दो हिन्दू। मुस्लिम पक्ष कहता है कि कोर्ट तय कर दे कि मालिक कौन है? हिन्दू पक्षों का कहना है कि कोर्ट ने यदि हमें मालिक बताया तब तो हम उसका फ़ैसला मानेंगे! वर्ना, यदि कोर्ट में हिम्मत है तो अपना फ़ैसला लागू करवाकर दिखा दे! ऐसे में बेचारा कोर्ट करे भी तो करे क्या!

• संघ प्रमुख मोहन भागवत को भी हिन्दुओं को उल्लू ही बनाना है। वर्ना, उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि यदि मोदी सरकार को राम मन्दिर के लिए अध्यादेश लाना होता तो ये काम जून 2014 में ही क्यों नहीं हो जाता? संसद के संयुक्त सत्र में बहुमत की ताक़त तो मोदी सरकार के पास चार साल से है। वक़्त रहते क़ानून बनाया होता तो क्या अब तक भव्य मन्दिर बनकर तैयार नहीं हो गया होता? लेकिन सबको पता है कि संघ-बीजेपी की निष्ठा राम मन्दिर को बनवाने में नहीं बल्कि इसे सियासी तौर पर भुनाने में है, इसे लेकर धार्मिक उन्माद फ़ैलाने में है, हिन्दुओं के धैर्य को भड़काने में है!

• दरअसल, संघ-बीजेपी की ये दृढ़ धारणा है कि हिन्दू मूर्ख हैं। इन्हें हिन्दुत्व के नाम पर मूर्ख बनाकर वोट बटोरो और मौज़ करो! तीन तलाक़ की ड्रामेबाज़ी भी इसीलिए है, लव-जिहाद, गाय-गोबर-बीफ़ भी इसीलिए! देश में 80 फ़ीसदी हिन्दू हैं लेकिन उनके लिए 20 फ़ीसदी मुसलमान ख़तरा हैं, क्योंकि संघियों की ओर से हिन्दुओं को यही घुट्टी पिलायी जाएगी, तभी तो हिन्दू डरेगी और संघ-बीजेपी उनकी रक्षा करेगा!

• सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हिन्दुओं से ‘धर्म के लिए बलिदान देने को तैयार रहने’ का आह्वान किया है!’ मतलब साफ़ है, जैसे किसान आर्थिक दुर्दशा से तंग आकर आत्महत्या कर लेते हैं, वैसे ही राम मन्दिर को ‘वहीं’ बनाने के लिए अबकी बार कारसेवा नहीं होगी, बल्कि राम भक्तों को आत्म-बलिदान देते हुए ख़ुदकुशी का सिलसिला चालू करना होगा! वर्ना, बलिदान का क्या कोई और तरीक़ा भी हो सकता है?

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

ओपिनियन

बसपा-सपा गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं : शीला दीक्षित

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sheila dikshit-min

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कहना है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं मिल रहे हैं, लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस के परिणाम चौंकाने वाले होंगे।

शीला दीक्षित ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, “उनको एक साथ आने दीजिए। वे मिलते और जुदा होते रहे हैं और फिर साथ आ रहे हैं। मेरा अभिप्राय यह है कि उनमें स्थिरता नहीं है और वे स्थायित्व के संकेत नहीं दे रहे हैं। अब आगे देखते हैं।”

तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं दीक्षित (80) सपा और बसपा गठबंधन को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रही थीं। सपा और बसपा ने कांग्रेस को महागठबंधन से अलग रखते हुए प्रदेश में 80 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए एक गठबंधन किया है। दीक्षित को 10 जनवरी को दिल्ली कांग्रेस की कमान सौंपी गई।

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने से पहले शीला दीक्षित को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था। दीक्षित ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीद क्षीण पड़ गई है।

दीक्षित की टिप्पणी से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेता चुनाव अभियान के दौरान सपा और बसपा को निशाना बनाएंगे, जबकि उनका सीधा मुकाबला सत्ताधारी पार्टी भाजपा से होगा।

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है, लेकिन पार्टी ने भाजपा को शिकस्त देने वाले सेक्यूलर दलों के लिए दरवाजा खुला रखा है।

उत्तर प्रदेश में पार्टी नेता उम्मीदवारों को बता सकते हैं कि कांग्रेस ही नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से बाहर कर सकती है और भाजपा को शिकस्त दे सकती है।

कांग्रेस इस बात पर बल देंगे कि इस चुनाव के नतीजों से प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि देश का प्रधानमंत्री चुना जाएगा।

लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो ही सीटें बचा पाई थीं, जबकि उससे पहले 2009 में पार्टी ने 21 सीटों पर जीत हासिल की थी, जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) दूसरी बार केंद्र की सत्ता को बरकार रख पाई थी।

दीक्षित ने कहा कि उनसे कहा जाएगा तो वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी, लेकिन वह दिल्ली पर अपना अधिक ध्यान केंद्रित करेंगी क्योंकि उनको यहां काफी काम करना है।

उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी को कांग्रेस द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करने का अनुमोदन किया।

उन्होंने कहा, “पार्टी को इस पर फैसला लेने दीजिए। हम चाहते हैं और खासतौर से मैं चाहती हूंं और हमारे बीच अधिकांश लोग चाहते हैं। लेकिन इस पर पूरी पार्टी द्वारा फैसला लिया जाएगा।”

गैर-भाजपा दलों में प्रधानमंत्री का पद विवादास्पद मसला है। राहुल गांधी ने खुद भी कहा कि इसका फैसला चुनाव के बाद लिया जाएगा और पहला काम नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित करना है।

संपूर्ण भारत में महागठबंधन की संभावना पर पूछे जाने पर दीक्षित ने कहा कि लोग इस दिशा में प्रयासरत हैं, लेकिन इस पर अभी पूरी सहमति नहीं बन पाई है।

विपक्षी दलों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में गठबंधन की संभावना कम है, लेकिन भाजपा को शिकस्त देने के लिए राज्य विशेष में गठबंधन होगा।

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ओपिनियन

मोदी राज में लुप्त हुआ संसदीय संवाद

संसद में सार्थक चर्चा नहीं हो रही। प्रक्रिया और परम्परा दम तोड़ चुकी है। नौकरशाही भी दमघोटू हाल में है। लोकतंत्र की लौ फड़फड़ा रही है।

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Parliament of India
Indian Parliament Picture

देश पर विश्वास के संकट छाया है। संसद रूपी लोकतांत्रिक संस्था का तेज़ी से पतन हो रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच होने वाला सार्थक संवाद नदारद है। विपक्ष का गला घोंटकर सियासी लाभ उठाने के क़ानून बनाये जा रहे हैं। विधेयकों को उन संसदीय समितियों की समीक्षा से बचाया जा रहा है, जो प्रस्तावित क़ानून को कारगर बनाने के लिए सभी पक्षों की राय को समायोजन करती हैं। झूठी वाहवाही बटोरने के लिए मंत्रीगण ग़लत आँकड़ों को परोसते हैं, क्योंकि उन्हें विशेषाधिकार हनन की परवाह नहीं है। अभी जो मंत्री संसद में गतिरोध से आहत होने की दलीलें देते हैं, वहीं जब विपक्ष में थे तो उनकी दलील होती थी कि गतिरोध भी संसदीय रणनीति का हिस्सा है। सरकार हमारे विरोध को भले ही ढोंग बताये, हमें श्रेय नहीं दे, लेकिन हम वही कर रहे हैं, जो हमारा दायित्व है। सरकार के ऐसे रवैये की वजह से ही संसद पर जनता का भरोसा न्यूनतम स्तर पर जा पहुँचा है।

वो दिन लद गये जब जजों के पास मुक़दमों के लिए इत्मिनान भरा वक़्त होता था। मुक़दमों का अम्बार है। न्यायतंत्र चरमरा चुका है। लेकिन कसूर जजों का नहीं है। न्यायालयों की गरिमा तार-तार हो चुकी है। अदालतों को बाहरी दख़ल से सुरक्षित होना चाहिए। लेकिन पूर्व प्रधान न्यायाधीश जैसे उच्च पद पर बैठे व्यक्ति पर ही ‘मास्टर ऑफ़ रोस्टर’ के अधिकार के दुरुपयोग का आरोप लगा। लेकिन कोई सच्चाई की तह तक नहीं जाना चाहता। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार उसके चार वरिष्ठतम जजों को अपने अन्तःकरण की आवाज़ का ख़ुलासा प्रेस कॉन्फ़्रेंस में करना पड़ा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र ख़तरे में है। अदालतों के बाहर घड़ल्ले से ऐसी हरक़तें हो रही हैं, जिससे न्यायिक फ़ैसलों को प्रभावित किया जा सके। न्यायिक फ़ैसलों में समानता वाली परम्परा को अनोखे तर्कों के सहारे ध्वस्त किया जा रहा है।

अदालतें बेहद उदारता से सील-बन्द लिफ़ाफ़ों में मिली सरकारी दलीलें स्वीकार कर रही हैं, ताकि दूसरे पक्ष उसे चुनौती भी नहीं दे सकें। ऐसी बोझिल प्रक्रिया से न्यायिक आदेश का प्रभावित होना लाज़िमी है। घपलों-घोटालों से जुड़े काग़ज़ातों पर कोर्ट ग़ौर तक नहीं कर रही। जज लोया मामले की कार्यवाही, राफ़ेल सौदे में जाँच को नकारना और सीबीआई निदेशक के तबादले से जुड़े प्रसंगों से साफ़ है कि देश को झकझोरने वाले मुद्दों के प्रति न्याय-तंत्र का रवैया भी सवालों के घेरे में है। दुहाई तो क़ानून की दी जाती है, लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मोर्चे पर सारे वादे पीछे छूट जाते हैं। अलग-अलग बेंच में संवैधानिक पीठ के जजों के फ़ैसले भी बदल जाते हैं। इसीलिए जनता के बढ़ते मोहभंग के प्रति न्यायपालिका को ख़ासतौर पर सचेत रहने की ज़रूरत है।

संसद में हासिल पूर्ण बहुमत का सही इस्तेमाल जटिल जनसमस्याओं को लोकतांत्रिक ढंग से निपटाने के लिए होना चाहिए। लेकिन ये तभी मुमकिन है, जब सबको साथ लेकर चलने की भावना से काम किया जाए। सरकार को सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का ज़रिया बनना चाहिए, लेकिन वो मतभेद के स्वरों को दबाने में जुटी हुई है। इन सन्दर्भों में देखें तो हमारी संस्थाओं पर भारी संकट गहराया हुआ है, कुछेक तो बन्धक बन चुकी हैं। कई संस्थाएँ तो सिर्फ़ आपने आकाओं की जी-हुज़ूरी कर रही हैं। सीबीआई, ईडी, एनआईए और सीबीडीटी यानी केन्द्रीय जाँच ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी और केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड जैसी संस्थाओं से जुड़ा ताज़ा घटनाक्रम इन्हीं बातों का साबित करता है। ये संस्थाएँ आज क़ानून को सर्वोपरि बनाये रखने के लिए काम नहीं कर रहीं, बल्कि वो अक्सर इसे तबाह करती नज़र आती हैं। इसीलिए संस्थाओं में कलह बढ़ रहा है। वो शर्मसार हो रही हैं। जो पतन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है, उसे निकाल बाहर किया जा रहा है। जिनका काम क़ानून को सर्वोपरि बनाना है, वो बौने साबित हो रहे हैं। यदि जाँच एजेंसियाँ दाग़दार होंगी तो अदालती फ़ैसले भी वैसे ही होंगे। पक्षपात और दुर्भावनापूर्ण जाँच से अन्याय और आक्रोश पैदा होता है। तब जनता सड़कों पर उतरने के लिए मज़बूर होती है।

नौकरशाही का दम घुट रहा है। निष्कलंक निष्ठा वाले अफ़सरों का सताया जा रहा है। क्योंकि उनके पुराने बॉस मौजूदा सत्ता की आँखों में खटक रहे हैं। इसने कार्यपालिका में उदासी भरी थकान भर दी है। चहेते अफ़सर अपने आकाओं के इशारों पर नाच रहे हैं। बाक़ी उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। प्रशासन इसी का नतीज़ा भुगत रहा है, योजनाओं में देरी हो रही है और आर्थिक विकास सुस्त पड़ा हुआ है। विकास दर में शिथिलता की वजह से स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे उन दो बुनियादी क्षेत्रों के लिए संसाधन नहीं जुटा पा रही, जो सामाजिक बदलाव के सबसे अहम तत्व हैं। हमने देखा है कि भ्रष्टाचार के आरोपी अफ़सरों का गुस्सा कैसे मासूम लोगों पर फूट रहा है! ऐसे वातावरण की वजह से अफ़सरों का सारा ज़ोर सत्ता के प्रति वफ़ादार रहने का बन जाता है, जबकि उनसे भय और पक्षपात से मुक्त रहकर काम करना चाहिए।

संचार क्रान्ति ने नये तरह के दमन को बढ़ाया है। झूठ और अफ़वाह के ज़रिये लोगों के दिमाग़ में ज़हर भरा जा रहा है। ख़ासकर, इलेक्ट्रानिक मीडिया और काफ़ी हद्द तक प्रिंट मीडिया भी उन उद्योगों की मुट्ठी में है, जो अर्थव्यवस्था में भारी दबदबा रखते हैं। बड़े-बड़े मीडिया मालिक, सरकार की मदद से अपने कॉरपोरेट को चमकाने के लिए पत्रकारीय उसूलों से समझौता कर रहे हैं। मीडिया के ऐसे समझौते से लोकतंत्र का पतन निश्चित है।

चौतरफ़ा संकट वाले मौजूदा माहौल में उम्मीद की किरण सिर्फ़ यही है कि 2019 में भारत की जनता इसे पहचाने और इससे लोहा ले। सिर्फ़ जनता ही लोकतंत्र को बचा सकती है। वो चुनौतियों से कैसे निपटेगी, ये तो वक़्त ही बताएगा। लेकिन यदि वो नहीं चेती तो लोकतंत्र की फड़फड़ाती लौ को असहिष्णुता की तेज़ हवाएँ बुझा देंगी।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)

(साभार:इंडियन एक्सप्रेस)

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तसलीमा नसरीन ने ‘बेशरम’ के हिंदी संस्करण का विमोचन किया

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taslima nasreen

नई दिल्ली, 12 जनवरी | बांग्लादेशी लेखिका और महिला अधिकार कार्यकर्ता तसलीमा नसरीन ने शनिवार को यहां नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में विवादास्पद ‘लज्जा’ उपन्यास की उत्तर कथा ‘बेशरम’ का विमोचन किया। उपन्यास ‘बेशरम’ का लोकार्पण राजकमल प्रकाशन के स्टाल जलसाघर में हुआ। इस मौके पर लेखिका अल्पना मिश्रा, हिमांशु बाजपेयी एवं राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी मौजूद थे।

इस उपन्यास का बांग्ला भाषा से हिंदी में अनुवाद उत्पल बैनर्जी द्वारा किया गया है।

उपन्यास ‘लज्जा’ में हिन्दुओं को बांग्लादेश से कैसे सांप्रदायिक दंगों के कारण देश छोड़ना पड़ा, इसकी कहानी थी। वहीं ‘बेशरम’ उपन्यास के पात्र सुरंजन और माया, जो बांग्लादेश छोड़ने के बाद हिंदुस्तान आए और उन लोगों ने कैसे पराये देश में अपने जीवन यापन के लिए संघर्ष किया, उनकी कहानी है।

नसरीन ने कहा, “यह कोई राजनीतिक कहानी नहीं बल्कि एक सामाजिक कहानी है, जो उनकी जिंदगी, परिवार और संबंधों के बारे में है। मैं खुद को इस उपन्यास में देखती हूं क्योंकि किताब को लिखते वक्त मैं कोलकाता में रह रही थी।”

निर्वासन के बारे में अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए तसलीमा ने माना कि जो लोग उस समय बांग्लादेश छोड़ कर भारत आए थे अगर वे चाहें तो वापस अपने देश जा सकते हैं लेकिन उनके पास वह मौका नहीं है।

उन्होंने कहा, ” ‘लज्जा’ लिखने के बाद मुझे बांग्लादेशी सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया। यहां आने वाले लोगों की तुलना में मेरी पीड़ा में अंतर है।”

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श्रीनगर की मस्जिद में लहराया ISIS का झंडा

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