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राम मन्दिर: अब संघ की साज़िश सुप्रीम कोर्ट को डराकर जनता को उल्लू बनाने की है!

दरअसल संघियों की बौखलाहट राम मन्दिर के लिए नहीं बल्कि हिन्दू वोट के लिए है। चुनाव सामने हैं। संघ को उस निकम्मी मोदी सरकार के लिए वोट जुटाना है, जो बीते साढ़े चार सालों में तक़रीबन हरेक मोर्चे पर विफल रही है,

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Bhaiyyaji Joshi
RSS General Secretary Bhaiyyaji Joshi

संघियों की ताज़ा धमकी है कि यदि मोदी सरकार ने फ़ौरन अध्यादेश लाकर राम मन्दिर निर्माण का रास्ता साफ़ नहीं किया तो वो आन्दोलन करेगी! हालाँकि, संघ ने ये नहीं कहा कि आन्दोलन, हिंसक भी होगा! लेकिन संघ के इतिहास को देखते हुए अहिंसक आन्दोलन की कल्पना बेमानी होगी! मन्दिर के नाम पर संघ फिर से हिंसा की तैयारी करेगा और उन्माद फैलाएगा कि राम भक्त इसलिए बेक़ाबू भीड़ बन गये क्योंकि सुप्रीम कोर्ट जानबूझकर अयोध्या विवाद को अनिश्चितकाल के लिए टाल रहा है, फ़ैसला सुनाने से कन्नी काट रहा है और मन्दिर निर्माण में अड़ंगा लगा रहा है।

दरअसल संघियों की बौखलाहट राम मन्दिर के लिए नहीं बल्कि हिन्दू वोट के लिए है। चुनाव सामने हैं। संघ को उस निकम्मी मोदी सरकार के लिए वोट जुटाना है, जो बीते साढ़े चार सालों में तक़रीबन हरेक मोर्चे पर विफल रही है, जिसके कामकाज़ और तौर-तरीक़ों को लेकर आम जनमानस में भारी नाराज़गी है। आलम इतना बिगड़ चुका है कि मोदी सरकार की हरेक तारीफ़ में छिपे झूठ से जनता का गुस्सा और भड़क रहा है। संघ-बीजेपी को सत्ता हाथ से जाती दिख रही है। ऐसे में राम मन्दिर की आड़ में होने वाले धार्मिक ध्रुवीकरण को उम्मीद की आख़िरी किरण माना गया है।

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संघ को पता है कि विकास लापता है। अर्थव्यवस्था बेहद ख़राब दौर में है। बैंक तबाह हैं। उद्योग-कारोबार बदहाल हैं। रोज़गार के अवसर नदारद हैं। किसान बेहाल हैं। बचायी गयी बेटियाँ अपने नसीब को कोस रही हैं। सीबीआई अपने पतन से शर्मिन्दा है। राफ़ेल घोटाले की वजह से मोदी सरकार के लिए दलदल बनकर तैयार हो चुका है। अब सम्भलने का वक़्त भी नहीं बचा। लिहाज़, राम मन्दिर को आख़िरी हथियार के रूप में आज़माने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है। इसीलिए आन्दोलन की बात छेड़ी गयी है। संघ के सहकार्यवाह भैय्याजी जोशी के शब्द हैं, लेकिन इसे हरेक संघी का समर्थन हासिल है। अब तो अब कार्यक्रम का ऐलान होना है।

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दिक्कत सिर्फ़ इतनी है कि राम भक्तों के आन्दोलन से न तो मोदी सरकार पर कोई असर पड़ेगा और ना ही मन्दिर निर्माण का रास्ता खुलेगा! तो फिर होगा क्या? होगा ये कि भक्तों को उल्लू बनाया जाएगा कि तुम सरकार की चौतरफ़ा नामाकियों को नज़रअन्दाज़ करो और बीजेपी को ही जिताओ क्योंकि मन्दिर बनने के लिए बीजेपी का सत्ता में होना ज़रूरी है। उधर, सरकार और बीजेपी की ओर से औपचारिक तौर पर दोहराया जाएगा कि ‘बीजेपी, मन्दिर निर्माण के लिए संकल्पबद्ध है और आज भी 1989 में हुए पार्टी के पालनपुर अधिवेशन के मुताबिक़ संवैधानिक तरीक़े से राम मन्दिर बनाने की पक्षधर है।’

साफ़ है कि मसला ‘संवैधानिक तरीक़े’ का है। लेकिन संघ-बीजेपी का कोई भी छोटा-बड़ा नेता देश को संवैधानिक तरीक़े की हक़ीक़त के बारे में कभी कुछ नहीं बताता! ऐसा क्यों है? संविधान के मुताबिक़, यदि कोई मामला अदालत के विचाराधीन है तो सरकार या संसद उसे क़ानून बनाकर ख़त्म नहीं कर सकती। अयोध्या विवाद में 1994 से सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति का आदेश दे रखा है। सरकार यदि ज़बरन क़ानून बनाकर यथास्थिति को बदलती है, तो ये अदालत के काम में दख़ल माना जाएगा। इसी आधार पर अदालत क़ानून को ख़ारिज़ कर देगी क्योंकि उसे भी अपने ‘यथास्थिति’ वाले आदेश की रक्षा करनी होगी। अदालत भी उन सवालों का समाधान किये बग़ैर ‘यथास्थिति’ ख़त्म नहीं कर सकती, जिनकी वजह से ‘यथास्थिति’ का रास्ता थामा गया था!

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इसका मतलब ये हुआ कि आन्दोलनकारी चाहे जितने उग्र तेवर दिखा लें, चाहे जितनी हिंसा कर लें, लेकिन सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट की ‘यथास्थिति’ को बदलने का कोई रास्ता नहीं है। यही वजह है कि जिस पूर्व चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा के बारे में संघियों ने ख़ूब प्रचार किया कि वो रिटायरमेंट से पहले अयोध्या विवाद पर फ़ैसला सुनाना चाहते हैं। मुमकिन है कि ये सच भी हो, लेकिन ‘यथास्थिति’ की ताक़त के आगे जस्टिस दीपक मिश्रा के हाथ भी बँधे ही रहे। वो भी सिर्फ़ इतना ही तय कर सके कि अयोध्या विवाद को सुप्रीम कोर्ट सिर्फ़ ज़मीन के मालिकाना हक़ यानी ‘टाइटल सूट’ की तरह ही देखेगा।

‘टाइटल सूट’ एक साधारण मुक़दमा होता है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि ‘टाइटल सूट’ को त्वरित सुनवाई के लायक नहीं माना जा सकता। लिहाज़ा, इसकी प्राथमिकता सुप्रीम कोर्ट में लम्बित अन्य मुक़दमों के हिसाब से ही तय होगी। संघ-बीजेपी और मन्दिरवादियों ने सुप्रीम कोर्ट के इस सहज रवैये को राजनीति से जोड़ दिया। क्योंकि ये उनकी आस्था है कि राम का जन्म अयोध्या में उसी स्थान पर हुआ था, जहाँ बाबरी मस्जिद थी। वो चाहते हैं कि अदालत भी इसी आस्था को स्वीकार करे। जबकि सुप्रीम कोर्ट 1994 से अभी तक हमेशा दोहराती है कि वो आस्था के सवाल को तय नहीं कर सकती। उसे तो सिर्फ़ इतना तय करना है कि विवादित ज़मीन का मालिक कौन है?

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लगे हाथ संघियों के कुछ और स्वाँग को भी समझते चलें। जैसे, अभी ये बात उछाली गयी है कि यदि बीजेपी, एक निजी विधेयक के रूप में क़ानून को संसद में पेश करे तो क्या काँग्रेस, वामपन्थी तथा अन्य सेक्यूलर पार्टियाँ इसका समर्थन करेंगी? यहाँ दो बाते हैं। पहली, कोई भी राजनीतिक दल अयोध्या में राम मन्दिर बनाने का विरोधी नहीं है। विरोध तो सिर्फ़ इतना है कि विवादित ज़मीन पर ज़बरन मन्दिर नहीं बनाया जा सकता। दूसरी बात ये है कि विधेयक, निजी हो या सरकारी, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। क्योंकि दोनों को ही ‘यथास्थिति’ को भंग करना पड़ेगा और ऐसा करना असंवैधानिक होगा। तकनीकी तौर पर असंवैधानिकता के आधार पर ही सदन के पीठासीन अधिकारी को प्रस्तावित विधेयक को पेश करने की अनुमति तक नहीं दे सकते, उसका पारित होना तो बाद की बात है।

अब सवाल ये है कि सरकार की ओर से जनता या राम भक्तों को इन पेंचीदा बातों को लेकर जागरूक क्यों नहीं किया जाता? क्योंकि फिर जनता ये समझ जाएगी कि आस्था के नाम पर विवादित ज़मीन पर मन्दिर बनवाना मुमकिन नहीं है। अब यदि ये मुमकिन ही नहीं है तो संघ-बीजेपी को राम मन्दिर के नाम पर वोट माँगने का क्या हक़ हो सकता है? क्या शिवसेना-बीजेपी के अलावा अन्य पार्टियों में हिन्दू नहीं हैं? क्या इन हिन्दुओं को राम मन्दिर बनाने से ऐतराज़ है? जी नहीं! राम मन्दिर बनाने से किसी भी ऐतराज नहीं है। आपत्ति है तो सिर्फ़ इतनी कि ज़बरन किसी ज़मीन को जन्मभूमि बता देना ग़लत है। ज़बरन मस्जिद को ढहा देना ग़लत है, असंवैधानिक है, अपराध है।

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यदि सुप्रीम कोर्ट ये कह दे कि विवादित ज़मीन पर मुसलमानों का मालिकाना हक़ नहीं है तो बनाइए भव्य राम मन्दिर, कौन रोकता है! लेकिन यदि ज़मीन मुसलिम पक्ष की पायी गयी तो फिर ज़बरन वहीं मन्दिर बनाने की बात करने वालों ने सुप्रीम कोर्ट को पसोपेश में डाल रखा है। क्योंकि हिन्दू पक्ष ने कभी ये नहीं कहा कि यदि फ़ैसला उनके ख़िलाफ़ रहा तो भी वो उसे मानेंगे। जब तक मन्दिरवादियों की ओर से ऐसे बयान नहीं आएँगे, तब तक सुप्रीम कोर्ट अपने फ़ैसले को ज़्यादा से ज़्यादा टालना चाहेगा, क्योंकि उसे भी अपने लाज बचानी है। यदि उसका आदेश भी नहीं माना गया तो संविधान और लोकतंत्र कैसे बचेगा!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

चुनाव

मप्र में शिवराज के दांव पर कांग्रेस ने फेंका जाल

कांग्रेस का वचनपत्र मध्यप्रदेश की समृद्धि का नया इतिहास लिखेगा। यह विकास के साथ-साथ प्रदेश के हर नागरिक, चाहे वह किसान हो, युवा हो, गरीब मजदूर हो, महिला हो, इससे सभी वर्गो की तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा।

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Shivraj-Ajay

भोपाल, 10 नवंबर | मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के ‘किसानपुत्र’, ‘महिला हितैषी’ और ‘युवाओं के हमदर्द’ होने के दांव पर कांग्रेस ने ‘वचनपत्र’ के जरिए ऐसा जाल फेंका है, जो शिवराज की बीते डेढ़ दशक में बनी छवि पर चादर डालता दिख रहा है।

शिवराज की अगुवाई में भाजपा तीसरा विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही है। पिछले दो चुनावों में शिवराज की जीत में किसानों और महिलाओं की बड़ी भूमिका रही है। लाडली लक्ष्मी योजना और किसानों के लिए बनी योजनाओं ने शिवराज के सिर जीत का सेहरा बांधा था। शिवराज और भाजपा इस बार भी जीतने की रणनीति में व्यस्त है, मगर इसी बीच शनिवार को कांग्रेस ने ऐसा ‘वचनपत्र’ जारी किया, जिसमें सरकार बनने पर किसानों, युवाओं और महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव लाने के वादे किए गए हैं।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक साजी थॉमस कहते हैं कि शिवराज बीते डेढ़ दशक में राज्य में खुद को किसानपुत्र, महिलाओं का भाई, लड़कियों का मामा और युवाओं के आदर्श के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। कांग्रेस ने अपने वचनपत्र में उन्हीं वर्गो के जीवन को बदलने का वादा किया है, जो शिवराज के निशाने पर और उनका सबसे बड़ा वोट बैंक रहा है। कांग्रेस के वादे पर यह वर्ग कितना भरोसा करता है, यह तो समय ही बताएगा।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा, “कांग्रेस का वचनपत्र मध्यप्रदेश की समृद्धि का नया इतिहास लिखेगा। यह विकास के साथ-साथ प्रदेश के हर नागरिक, चाहे वह किसान हो, युवा हो, गरीब मजदूर हो, महिला हो, इससे सभी वर्गो की तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा।”

वहीं कांग्रेस के वचनपत्र पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चुटकी लेते हुए कहा कि कांग्रेस वचन तो देती है, मगर उसे पूरा कभी नहीं करती। इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाने का वचन दिया था, मगर गरीबी नहीं हटी। राजीव गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था, मगर गरीबी की जगह गरीब ही हटा दिए।

सच तो यह है कि भाजपा किसानों की आय दोगुनी करने और उन्हें फसल का उचित दाम दिलाने के वादे करती रही, मगर सरकार की ये कोशिशें जमीनी स्तर पर रंग नहीं ला पाईं। बीते दो साल में किसानों के कई आंदोलनों ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया है।

वहीं उद्योगों की स्थापना के बावजूद पर्याप्त संख्या में युवाओं को रोजगार नहीं मिला, साथ ही महिला असुरक्षा की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर कांग्रेस ने वचनपत्र तैयार किया है, और सभी वर्गो से वादे किए हैं कि उनके कल्याण की योजनाएं तो बनेंगी ही, साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य के हालात में बदलाव आाएगा।

बहरहाल, कांग्रेस का वचनपत्र तो आ गया है, अब भाजपा का घोषणापत्र आने वाला है। अब देखना होगा कि भाजपा की क्या रणनीति होती है और वह कांग्रेस के वादों का किस तरह जवाब देती है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने तो मीडिया के सामने कह दिया है कि भाजपा संकल्पपत्र बनाती है, जो महज ‘जुमलापत्र’ बनकर रह जाता है।

–आईएएनएस

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ब्लॉग

व्यंग्य – जन-गण नामकरण आन्दोलन: मुसलमान मंत्री बदलें नाम, अब ‘पक्षीफल’ कहलाएगा अंडा

भगवा ख़ानदान का इरादा है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ को राम मन्दिर आन्दोलन से भी बड़ा और विश्वव्यापी बनाया जाएगा! हिन्दुत्व के नायकों का मानना है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ के आगे बढ़ने से मुसलमानों में गुस्सा पैदा होगा। यदि इस गुस्से को और भड़का दिया जाए तो जहाँ-तहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़क जाएगी।

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Politicians Cartoon

अभी-अभी केन्द्रीय कैबिनेट की एक आपात और बेहद ख़ुफ़िया बैठक हुई है! इसमें पहली बार संघ, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के शीर्ष पदाधिकारी भी शामिल हुए! महामहिम चौकीदार महोदय ने सर्वोच्च स्तर की इस रणनीतिक मंत्रणा में अपने मंत्रियों को पीछे बैठाया और हिन्दू हित के संरक्षक महापुरुषों को अगली पंक्ति में बैठाया गया! बैठक में कई क्रान्तिकारी फ़ैसले लिये गये, लेकिन ये भी तय हुआ कि इनका औपचारिक ऐलान नहीं होगा! लिहाज़ा, सोशल मीडिया पर प्रकाशित इस पोस्ट को आप बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ मान सकते हैं!

सरकार ने तय किया है कि अब देश में ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ चलाया जाएगा! चुनाव आचार संहिता को देखते हुए अभी इस आन्दोलन का ऐलान नहीं किया जाएगा, लेकिन भगवा ख़ानदान का इरादा है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ को राम मन्दिर आन्दोलन से भी बड़ा और विश्वव्यापी बनाया जाएगा! हिन्दुत्व के नायकों का मानना है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ के आगे बढ़ने से मुसलमानों में गुस्सा पैदा होगा। यदि इस गुस्से को और भड़का दिया जाए तो जहाँ-तहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़क जाएगी। और, ऐसा होते ही जहाँ मुसलमानों का क़त्लेआम शुरू हो जाएगा, वहीं हिन्दुओं के ध्रुवीकरण इतना ज़ोर पकड़ लेगा, जैसे जंगल की बेक़ाबू आग!

भगवा ख़ानदान का यक़ीन है कि यदि उसकी ये रणनीति परवान चढ़ गयी तो न सिर्फ़ आगामी विधानसभा चुनावों में बीजेपी को ऐतिहासिक कामयाबी मिलेगी, बल्कि 2019 के आम चुनाव में भी पार्टी कम से कम 350 सीटें जीतने में सफल होगी! कैबिनेट की विशेष बैठक में ये भी तय हुआ कि भगवा ख़ानदान के जुड़े लोग बड़े पैमाने पर शहरों, जगहों और भवनों के नाम बदलने की माँग करने वाले बयान देने पर ज़ोर दें। ताकि मीडिया में उन्हें भरपूर सुर्ख़ियाँ मिलती रहें। इसका सबसे बड़ा फ़ायदा ये होगा कि जनता का ध्यान राफ़ेल और नोटबन्दी जैसे विश्वस्तरीय घोटालों से हट जाएगा और वो मूर्खों की तरह से इस झाँसे में फँस जाएगी कि मोदी का कोई विकल्प नहीं है! मोदी अजेय है!

  1. मुसलमान मंत्री बदले नाम

भगवा ख़ानदान के आग्रह पर ढोंगी सरकार ने तय किया है कि देश भर में बीजेपी की सरकारों में जो भी इक्का-दुक्का मुसलमान मंत्री हैं, उनके नाम फ़ौरन बदले जाएँ! वर्ना, इन मुसलमानों को मंत्री पद गँवाना होगा!

  1. ‘पक्षीफल’ कहलाएगा अंडा

भगवान ख़ानदान ने तय किया है कि अब अंडे को ‘पक्षीफल’ कहा जाएगा! इस फल से न सिर्फ़ मन्दिरों में भगवान का भोग लगाया जा सकेगा, बल्कि व्रत-उपवास में इसे फलाहार के रूप में इस्तेमाल करना होगा!

  1. वीर सावरकर पक्षीपालक योजना

वीर सावरकर पक्षीपालक योजना की आत्मा को मेक इन इंडिया की आत्मा से जोड़ा जाएगा। भगवा ख़ानदान को यक़ीन है कि आत्माओं के मिलन वाली इस क्रान्तिकारी नीति से पक्षीफलों की माँग में ज़बरदस्त उछाल आएगा और पक्षीपालकों के रूप में कम से कम 10 करोड़ युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर खुलेंगे। इसे वीर सावरकर पक्षीपालक योजना कहा जाएगा। प्रधानमंत्री फ़सल बीमा की सुविधा भी आरक्षण की तरह इस अद्भुत योजना के तहत में पहले दस साल तक मुफ़्त मिलेगी और भविष्य में भी इसे आरक्षण की ही तरह दस-दस वर्षों के लिए बढ़ाया जा सकेगा।

  1. दीनदयाल पकौड़ा योजना

वीर सावरकर पक्षीपालक योजना में उन लोगों को वरीयता मिलेगी जो अपने ‘भक्त होने का आधार कार्ड’ दिखा सकें और जो ‘दीनदयाल पकौड़ा योजना’ के लाभार्थी नहीं हो! ग़ौरतलब है कि प्रधानमंत्री पकौड़ा रोज़गार योजना का भी नया नामकरण कर दिया गया है! उसे अब ‘दीनदयाल पकौड़ा योजना’ कहा जाएगा!

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ओपिनियन

अंतिम सांस तक कांग्रेसी, मगर बेटे का साथ दूंगा : सत्यव्रत चतुर्वेदी

सत्यव्रत चतुर्वेदी के पिता बाबूराम चतुर्वेदी और मां विद्यावती चतुर्वेदी कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में रही हैं। दोनों ने आजादी की लड़ाई लड़ी, इंदिरा गांधी के काफी नजदीक रहे।

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Satyavrat Chaturvedi

छतरपुर, 9 नवंबर | कांग्रेस के पूर्व प्रवक्ता और पूर्व राज्यसभा सदस्य सत्यव्रत चतुर्वेदी के बेटे नितिन बंटी चतुर्वेदी ने बगावत कर समाजवादी पार्टी का दामन थामकर छतरपुर जिले के राजनगर विधानसभा क्षेत्र से नामांकनपत्र भरा है। चतुर्वेदी का कहना है कि वे अंतिम सांस तक कांग्रेसी हैं, मगर एक पिता के तौर पर बेटे का हर संभव साथ देंगे, क्योंकि छुपकर राजनीति करना उनकी आदत में नहीं है।

नितिन बंटी चतुर्वेदी राजनगर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के दावेदार थे, मगर कांग्रेस ने अंतिम समय में उसका टिकट काट दिया। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के कहने पर नितिन ने सपा का दामन थामकर चुनाव लड़ने का फैसला लिया।

सत्यव्रत चतुर्वेदी ने आईएएनएस से खास बातचीत में कहा, “नितिन बालिग है, उसे अपने फैसले करने का हक है, पिछले दो चुनाव से वह कांग्रेस से टिकट मांग रहा था, पार्टी ने हर बार अगले चुनाव का भरोसा दिलाया, मगर इस बार फिर वही हुआ। पार्टी ने टिकट नहीं दिया, इन स्थितियों में बंटी ने सपा से चुनाव लड़ने का फैसला लिया, यह उसका व्यक्तिगत फैसला है। मैं तो अंतिम सांस तक कांग्रेसी रहूंगा। हां, पिता के नाते बंटी का साथ दूंगा। छुपकर कहने और राजनीति करना आदत में नहीं है, जो करना है वह कहकर करता हूं, छुपाता नहीं हूं।”

चतुर्वेदी से जब पूछा गया कि बेटा सपा से चुनाव लड़ रहा है, पार्टी आप पर कार्रवाई कर सकती है, तो उनका जवाब था, “मैं कांग्रेस में जन्मा हूं, कांग्रेसी रक्त मेरी नसों में प्रवाहित होता है, दिल में कांग्रेस है, पार्टी को फैसले लेने का अधिकार है, मगर मेरे दिल से कोई कांग्रेस को नहीं निकाल सकता। अंतिम सांस भी कांग्रेस के लिए होगी।”

सत्यव्रत चतुर्वेदी के पिता बाबूराम चतुर्वेदी और मां विद्यावती चतुर्वेदी कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में रही हैं। दोनों ने आजादी की लड़ाई लड़ी, इंदिरा गांधी के काफी नजदीक रहे। बाबूराम चतुर्वेदी राज्य सरकार में मंत्री रहे और विद्यावती कई बार सांसद का चुनाव जीतीं। बुंदेलखंड में उनकी हैसियत दूसरी इंदिरा गांधी के तौर पर रही है।

चतुर्वेदी के समकालीन नेताओं में शामिल दिग्विजय सिंह, कांतिलाल भूरिया, सुभाष यादव आदि ऐसे नेता हैं, जिनके परिवार में एक और एक से ज्यादा सदस्यों को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया है, मगर चतुर्वेदी के बेटे को पार्टी ने टिकट देना उचित नहीं समझा। इसी के चलते उनके बेटे बंटी ने बगावत कर दी।

अन्य नेताओं के परिजनों को टिकट दिए जाने के सवाल पर चतुर्वेदी का कहना है, “इस सवाल का जवाब तो मैं नहीं दे सकता, यह जवाब तो पार्टी के बड़े नेता और टिकटों का वितरण करने वाले ही दे सकते हैं, जहां तक बात मेरी है, मन में तो मेरे भी सवाल आता है कि आखिर ऐसा हुआ क्यों।”

कांग्रेस में टिकट वितरण की कवायद छह माह पहले ही शुरू करने का ऐलान कर दिया गया था, जगह जगह पर्यवेक्षक भेजे गए, सर्वे का दौर चला, नेताओं की टीमों ने डेरा डाला और वादा किया गया कि न तो पैराशूट वाले नेता चुनाव मैदान में उतारे जाएंगे और न ही बीते चुनावों में भारी मतों से हारे उम्मीदवारों को मौका दिया जाएगा। मगर उम्मीदवारों की सूचियां इन सारे दावे और वादे की पोल खोलने के लिए काफी है।

चतुर्वेदी भी इस बात से हैरान हैं कि जो व्यक्ति पिछला चुनाव 38 और 40 हजार से हारा, उसे उम्मीदवार बना दिया गया। आखिर किसने और कैसा सर्वे किया, यह वे समझ नहीं पा रहे हैं। अब तो चुनाव के बाद ही पार्टी को इन हालात की समीक्षा करनी चाहिए, आखिर किसने किस तरह का खेल ख्ेाला।

–आईएएनएस

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