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राम मन्दिर: अब संघ की साज़िश सुप्रीम कोर्ट को डराकर जनता को उल्लू बनाने की है!

दरअसल संघियों की बौखलाहट राम मन्दिर के लिए नहीं बल्कि हिन्दू वोट के लिए है। चुनाव सामने हैं। संघ को उस निकम्मी मोदी सरकार के लिए वोट जुटाना है, जो बीते साढ़े चार सालों में तक़रीबन हरेक मोर्चे पर विफल रही है,

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Bhaiyyaji Joshi
RSS General Secretary Bhaiyyaji Joshi

संघियों की ताज़ा धमकी है कि यदि मोदी सरकार ने फ़ौरन अध्यादेश लाकर राम मन्दिर निर्माण का रास्ता साफ़ नहीं किया तो वो आन्दोलन करेगी! हालाँकि, संघ ने ये नहीं कहा कि आन्दोलन, हिंसक भी होगा! लेकिन संघ के इतिहास को देखते हुए अहिंसक आन्दोलन की कल्पना बेमानी होगी! मन्दिर के नाम पर संघ फिर से हिंसा की तैयारी करेगा और उन्माद फैलाएगा कि राम भक्त इसलिए बेक़ाबू भीड़ बन गये क्योंकि सुप्रीम कोर्ट जानबूझकर अयोध्या विवाद को अनिश्चितकाल के लिए टाल रहा है, फ़ैसला सुनाने से कन्नी काट रहा है और मन्दिर निर्माण में अड़ंगा लगा रहा है।

दरअसल संघियों की बौखलाहट राम मन्दिर के लिए नहीं बल्कि हिन्दू वोट के लिए है। चुनाव सामने हैं। संघ को उस निकम्मी मोदी सरकार के लिए वोट जुटाना है, जो बीते साढ़े चार सालों में तक़रीबन हरेक मोर्चे पर विफल रही है, जिसके कामकाज़ और तौर-तरीक़ों को लेकर आम जनमानस में भारी नाराज़गी है। आलम इतना बिगड़ चुका है कि मोदी सरकार की हरेक तारीफ़ में छिपे झूठ से जनता का गुस्सा और भड़क रहा है। संघ-बीजेपी को सत्ता हाथ से जाती दिख रही है। ऐसे में राम मन्दिर की आड़ में होने वाले धार्मिक ध्रुवीकरण को उम्मीद की आख़िरी किरण माना गया है।

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संघ को पता है कि विकास लापता है। अर्थव्यवस्था बेहद ख़राब दौर में है। बैंक तबाह हैं। उद्योग-कारोबार बदहाल हैं। रोज़गार के अवसर नदारद हैं। किसान बेहाल हैं। बचायी गयी बेटियाँ अपने नसीब को कोस रही हैं। सीबीआई अपने पतन से शर्मिन्दा है। राफ़ेल घोटाले की वजह से मोदी सरकार के लिए दलदल बनकर तैयार हो चुका है। अब सम्भलने का वक़्त भी नहीं बचा। लिहाज़, राम मन्दिर को आख़िरी हथियार के रूप में आज़माने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है। इसीलिए आन्दोलन की बात छेड़ी गयी है। संघ के सहकार्यवाह भैय्याजी जोशी के शब्द हैं, लेकिन इसे हरेक संघी का समर्थन हासिल है। अब तो अब कार्यक्रम का ऐलान होना है।

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दिक्कत सिर्फ़ इतनी है कि राम भक्तों के आन्दोलन से न तो मोदी सरकार पर कोई असर पड़ेगा और ना ही मन्दिर निर्माण का रास्ता खुलेगा! तो फिर होगा क्या? होगा ये कि भक्तों को उल्लू बनाया जाएगा कि तुम सरकार की चौतरफ़ा नामाकियों को नज़रअन्दाज़ करो और बीजेपी को ही जिताओ क्योंकि मन्दिर बनने के लिए बीजेपी का सत्ता में होना ज़रूरी है। उधर, सरकार और बीजेपी की ओर से औपचारिक तौर पर दोहराया जाएगा कि ‘बीजेपी, मन्दिर निर्माण के लिए संकल्पबद्ध है और आज भी 1989 में हुए पार्टी के पालनपुर अधिवेशन के मुताबिक़ संवैधानिक तरीक़े से राम मन्दिर बनाने की पक्षधर है।’

साफ़ है कि मसला ‘संवैधानिक तरीक़े’ का है। लेकिन संघ-बीजेपी का कोई भी छोटा-बड़ा नेता देश को संवैधानिक तरीक़े की हक़ीक़त के बारे में कभी कुछ नहीं बताता! ऐसा क्यों है? संविधान के मुताबिक़, यदि कोई मामला अदालत के विचाराधीन है तो सरकार या संसद उसे क़ानून बनाकर ख़त्म नहीं कर सकती। अयोध्या विवाद में 1994 से सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति का आदेश दे रखा है। सरकार यदि ज़बरन क़ानून बनाकर यथास्थिति को बदलती है, तो ये अदालत के काम में दख़ल माना जाएगा। इसी आधार पर अदालत क़ानून को ख़ारिज़ कर देगी क्योंकि उसे भी अपने ‘यथास्थिति’ वाले आदेश की रक्षा करनी होगी। अदालत भी उन सवालों का समाधान किये बग़ैर ‘यथास्थिति’ ख़त्म नहीं कर सकती, जिनकी वजह से ‘यथास्थिति’ का रास्ता थामा गया था!

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इसका मतलब ये हुआ कि आन्दोलनकारी चाहे जितने उग्र तेवर दिखा लें, चाहे जितनी हिंसा कर लें, लेकिन सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट की ‘यथास्थिति’ को बदलने का कोई रास्ता नहीं है। यही वजह है कि जिस पूर्व चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा के बारे में संघियों ने ख़ूब प्रचार किया कि वो रिटायरमेंट से पहले अयोध्या विवाद पर फ़ैसला सुनाना चाहते हैं। मुमकिन है कि ये सच भी हो, लेकिन ‘यथास्थिति’ की ताक़त के आगे जस्टिस दीपक मिश्रा के हाथ भी बँधे ही रहे। वो भी सिर्फ़ इतना ही तय कर सके कि अयोध्या विवाद को सुप्रीम कोर्ट सिर्फ़ ज़मीन के मालिकाना हक़ यानी ‘टाइटल सूट’ की तरह ही देखेगा।

‘टाइटल सूट’ एक साधारण मुक़दमा होता है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि ‘टाइटल सूट’ को त्वरित सुनवाई के लायक नहीं माना जा सकता। लिहाज़ा, इसकी प्राथमिकता सुप्रीम कोर्ट में लम्बित अन्य मुक़दमों के हिसाब से ही तय होगी। संघ-बीजेपी और मन्दिरवादियों ने सुप्रीम कोर्ट के इस सहज रवैये को राजनीति से जोड़ दिया। क्योंकि ये उनकी आस्था है कि राम का जन्म अयोध्या में उसी स्थान पर हुआ था, जहाँ बाबरी मस्जिद थी। वो चाहते हैं कि अदालत भी इसी आस्था को स्वीकार करे। जबकि सुप्रीम कोर्ट 1994 से अभी तक हमेशा दोहराती है कि वो आस्था के सवाल को तय नहीं कर सकती। उसे तो सिर्फ़ इतना तय करना है कि विवादित ज़मीन का मालिक कौन है?

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लगे हाथ संघियों के कुछ और स्वाँग को भी समझते चलें। जैसे, अभी ये बात उछाली गयी है कि यदि बीजेपी, एक निजी विधेयक के रूप में क़ानून को संसद में पेश करे तो क्या काँग्रेस, वामपन्थी तथा अन्य सेक्यूलर पार्टियाँ इसका समर्थन करेंगी? यहाँ दो बाते हैं। पहली, कोई भी राजनीतिक दल अयोध्या में राम मन्दिर बनाने का विरोधी नहीं है। विरोध तो सिर्फ़ इतना है कि विवादित ज़मीन पर ज़बरन मन्दिर नहीं बनाया जा सकता। दूसरी बात ये है कि विधेयक, निजी हो या सरकारी, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। क्योंकि दोनों को ही ‘यथास्थिति’ को भंग करना पड़ेगा और ऐसा करना असंवैधानिक होगा। तकनीकी तौर पर असंवैधानिकता के आधार पर ही सदन के पीठासीन अधिकारी को प्रस्तावित विधेयक को पेश करने की अनुमति तक नहीं दे सकते, उसका पारित होना तो बाद की बात है।

अब सवाल ये है कि सरकार की ओर से जनता या राम भक्तों को इन पेंचीदा बातों को लेकर जागरूक क्यों नहीं किया जाता? क्योंकि फिर जनता ये समझ जाएगी कि आस्था के नाम पर विवादित ज़मीन पर मन्दिर बनवाना मुमकिन नहीं है। अब यदि ये मुमकिन ही नहीं है तो संघ-बीजेपी को राम मन्दिर के नाम पर वोट माँगने का क्या हक़ हो सकता है? क्या शिवसेना-बीजेपी के अलावा अन्य पार्टियों में हिन्दू नहीं हैं? क्या इन हिन्दुओं को राम मन्दिर बनाने से ऐतराज़ है? जी नहीं! राम मन्दिर बनाने से किसी भी ऐतराज नहीं है। आपत्ति है तो सिर्फ़ इतनी कि ज़बरन किसी ज़मीन को जन्मभूमि बता देना ग़लत है। ज़बरन मस्जिद को ढहा देना ग़लत है, असंवैधानिक है, अपराध है।

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यदि सुप्रीम कोर्ट ये कह दे कि विवादित ज़मीन पर मुसलमानों का मालिकाना हक़ नहीं है तो बनाइए भव्य राम मन्दिर, कौन रोकता है! लेकिन यदि ज़मीन मुसलिम पक्ष की पायी गयी तो फिर ज़बरन वहीं मन्दिर बनाने की बात करने वालों ने सुप्रीम कोर्ट को पसोपेश में डाल रखा है। क्योंकि हिन्दू पक्ष ने कभी ये नहीं कहा कि यदि फ़ैसला उनके ख़िलाफ़ रहा तो भी वो उसे मानेंगे। जब तक मन्दिरवादियों की ओर से ऐसे बयान नहीं आएँगे, तब तक सुप्रीम कोर्ट अपने फ़ैसले को ज़्यादा से ज़्यादा टालना चाहेगा, क्योंकि उसे भी अपने लाज बचानी है। यदि उसका आदेश भी नहीं माना गया तो संविधान और लोकतंत्र कैसे बचेगा!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

ओपिनियन

बसपा-सपा गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं : शीला दीक्षित

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sheila dikshit-min

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कहना है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं मिल रहे हैं, लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस के परिणाम चौंकाने वाले होंगे।

शीला दीक्षित ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, “उनको एक साथ आने दीजिए। वे मिलते और जुदा होते रहे हैं और फिर साथ आ रहे हैं। मेरा अभिप्राय यह है कि उनमें स्थिरता नहीं है और वे स्थायित्व के संकेत नहीं दे रहे हैं। अब आगे देखते हैं।”

तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं दीक्षित (80) सपा और बसपा गठबंधन को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रही थीं। सपा और बसपा ने कांग्रेस को महागठबंधन से अलग रखते हुए प्रदेश में 80 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए एक गठबंधन किया है। दीक्षित को 10 जनवरी को दिल्ली कांग्रेस की कमान सौंपी गई।

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने से पहले शीला दीक्षित को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था। दीक्षित ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीद क्षीण पड़ गई है।

दीक्षित की टिप्पणी से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेता चुनाव अभियान के दौरान सपा और बसपा को निशाना बनाएंगे, जबकि उनका सीधा मुकाबला सत्ताधारी पार्टी भाजपा से होगा।

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है, लेकिन पार्टी ने भाजपा को शिकस्त देने वाले सेक्यूलर दलों के लिए दरवाजा खुला रखा है।

उत्तर प्रदेश में पार्टी नेता उम्मीदवारों को बता सकते हैं कि कांग्रेस ही नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से बाहर कर सकती है और भाजपा को शिकस्त दे सकती है।

कांग्रेस इस बात पर बल देंगे कि इस चुनाव के नतीजों से प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि देश का प्रधानमंत्री चुना जाएगा।

लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो ही सीटें बचा पाई थीं, जबकि उससे पहले 2009 में पार्टी ने 21 सीटों पर जीत हासिल की थी, जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) दूसरी बार केंद्र की सत्ता को बरकार रख पाई थी।

दीक्षित ने कहा कि उनसे कहा जाएगा तो वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी, लेकिन वह दिल्ली पर अपना अधिक ध्यान केंद्रित करेंगी क्योंकि उनको यहां काफी काम करना है।

उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी को कांग्रेस द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करने का अनुमोदन किया।

उन्होंने कहा, “पार्टी को इस पर फैसला लेने दीजिए। हम चाहते हैं और खासतौर से मैं चाहती हूंं और हमारे बीच अधिकांश लोग चाहते हैं। लेकिन इस पर पूरी पार्टी द्वारा फैसला लिया जाएगा।”

गैर-भाजपा दलों में प्रधानमंत्री का पद विवादास्पद मसला है। राहुल गांधी ने खुद भी कहा कि इसका फैसला चुनाव के बाद लिया जाएगा और पहला काम नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित करना है।

संपूर्ण भारत में महागठबंधन की संभावना पर पूछे जाने पर दीक्षित ने कहा कि लोग इस दिशा में प्रयासरत हैं, लेकिन इस पर अभी पूरी सहमति नहीं बन पाई है।

विपक्षी दलों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में गठबंधन की संभावना कम है, लेकिन भाजपा को शिकस्त देने के लिए राज्य विशेष में गठबंधन होगा।

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ओपिनियन

मोदी राज में लुप्त हुआ संसदीय संवाद

संसद में सार्थक चर्चा नहीं हो रही। प्रक्रिया और परम्परा दम तोड़ चुकी है। नौकरशाही भी दमघोटू हाल में है। लोकतंत्र की लौ फड़फड़ा रही है।

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Parliament of India
Indian Parliament Picture

देश पर विश्वास के संकट छाया है। संसद रूपी लोकतांत्रिक संस्था का तेज़ी से पतन हो रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच होने वाला सार्थक संवाद नदारद है। विपक्ष का गला घोंटकर सियासी लाभ उठाने के क़ानून बनाये जा रहे हैं। विधेयकों को उन संसदीय समितियों की समीक्षा से बचाया जा रहा है, जो प्रस्तावित क़ानून को कारगर बनाने के लिए सभी पक्षों की राय को समायोजन करती हैं। झूठी वाहवाही बटोरने के लिए मंत्रीगण ग़लत आँकड़ों को परोसते हैं, क्योंकि उन्हें विशेषाधिकार हनन की परवाह नहीं है। अभी जो मंत्री संसद में गतिरोध से आहत होने की दलीलें देते हैं, वहीं जब विपक्ष में थे तो उनकी दलील होती थी कि गतिरोध भी संसदीय रणनीति का हिस्सा है। सरकार हमारे विरोध को भले ही ढोंग बताये, हमें श्रेय नहीं दे, लेकिन हम वही कर रहे हैं, जो हमारा दायित्व है। सरकार के ऐसे रवैये की वजह से ही संसद पर जनता का भरोसा न्यूनतम स्तर पर जा पहुँचा है।

वो दिन लद गये जब जजों के पास मुक़दमों के लिए इत्मिनान भरा वक़्त होता था। मुक़दमों का अम्बार है। न्यायतंत्र चरमरा चुका है। लेकिन कसूर जजों का नहीं है। न्यायालयों की गरिमा तार-तार हो चुकी है। अदालतों को बाहरी दख़ल से सुरक्षित होना चाहिए। लेकिन पूर्व प्रधान न्यायाधीश जैसे उच्च पद पर बैठे व्यक्ति पर ही ‘मास्टर ऑफ़ रोस्टर’ के अधिकार के दुरुपयोग का आरोप लगा। लेकिन कोई सच्चाई की तह तक नहीं जाना चाहता। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार उसके चार वरिष्ठतम जजों को अपने अन्तःकरण की आवाज़ का ख़ुलासा प्रेस कॉन्फ़्रेंस में करना पड़ा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र ख़तरे में है। अदालतों के बाहर घड़ल्ले से ऐसी हरक़तें हो रही हैं, जिससे न्यायिक फ़ैसलों को प्रभावित किया जा सके। न्यायिक फ़ैसलों में समानता वाली परम्परा को अनोखे तर्कों के सहारे ध्वस्त किया जा रहा है।

अदालतें बेहद उदारता से सील-बन्द लिफ़ाफ़ों में मिली सरकारी दलीलें स्वीकार कर रही हैं, ताकि दूसरे पक्ष उसे चुनौती भी नहीं दे सकें। ऐसी बोझिल प्रक्रिया से न्यायिक आदेश का प्रभावित होना लाज़िमी है। घपलों-घोटालों से जुड़े काग़ज़ातों पर कोर्ट ग़ौर तक नहीं कर रही। जज लोया मामले की कार्यवाही, राफ़ेल सौदे में जाँच को नकारना और सीबीआई निदेशक के तबादले से जुड़े प्रसंगों से साफ़ है कि देश को झकझोरने वाले मुद्दों के प्रति न्याय-तंत्र का रवैया भी सवालों के घेरे में है। दुहाई तो क़ानून की दी जाती है, लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मोर्चे पर सारे वादे पीछे छूट जाते हैं। अलग-अलग बेंच में संवैधानिक पीठ के जजों के फ़ैसले भी बदल जाते हैं। इसीलिए जनता के बढ़ते मोहभंग के प्रति न्यायपालिका को ख़ासतौर पर सचेत रहने की ज़रूरत है।

संसद में हासिल पूर्ण बहुमत का सही इस्तेमाल जटिल जनसमस्याओं को लोकतांत्रिक ढंग से निपटाने के लिए होना चाहिए। लेकिन ये तभी मुमकिन है, जब सबको साथ लेकर चलने की भावना से काम किया जाए। सरकार को सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का ज़रिया बनना चाहिए, लेकिन वो मतभेद के स्वरों को दबाने में जुटी हुई है। इन सन्दर्भों में देखें तो हमारी संस्थाओं पर भारी संकट गहराया हुआ है, कुछेक तो बन्धक बन चुकी हैं। कई संस्थाएँ तो सिर्फ़ आपने आकाओं की जी-हुज़ूरी कर रही हैं। सीबीआई, ईडी, एनआईए और सीबीडीटी यानी केन्द्रीय जाँच ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी और केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड जैसी संस्थाओं से जुड़ा ताज़ा घटनाक्रम इन्हीं बातों का साबित करता है। ये संस्थाएँ आज क़ानून को सर्वोपरि बनाये रखने के लिए काम नहीं कर रहीं, बल्कि वो अक्सर इसे तबाह करती नज़र आती हैं। इसीलिए संस्थाओं में कलह बढ़ रहा है। वो शर्मसार हो रही हैं। जो पतन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है, उसे निकाल बाहर किया जा रहा है। जिनका काम क़ानून को सर्वोपरि बनाना है, वो बौने साबित हो रहे हैं। यदि जाँच एजेंसियाँ दाग़दार होंगी तो अदालती फ़ैसले भी वैसे ही होंगे। पक्षपात और दुर्भावनापूर्ण जाँच से अन्याय और आक्रोश पैदा होता है। तब जनता सड़कों पर उतरने के लिए मज़बूर होती है।

नौकरशाही का दम घुट रहा है। निष्कलंक निष्ठा वाले अफ़सरों का सताया जा रहा है। क्योंकि उनके पुराने बॉस मौजूदा सत्ता की आँखों में खटक रहे हैं। इसने कार्यपालिका में उदासी भरी थकान भर दी है। चहेते अफ़सर अपने आकाओं के इशारों पर नाच रहे हैं। बाक़ी उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। प्रशासन इसी का नतीज़ा भुगत रहा है, योजनाओं में देरी हो रही है और आर्थिक विकास सुस्त पड़ा हुआ है। विकास दर में शिथिलता की वजह से स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे उन दो बुनियादी क्षेत्रों के लिए संसाधन नहीं जुटा पा रही, जो सामाजिक बदलाव के सबसे अहम तत्व हैं। हमने देखा है कि भ्रष्टाचार के आरोपी अफ़सरों का गुस्सा कैसे मासूम लोगों पर फूट रहा है! ऐसे वातावरण की वजह से अफ़सरों का सारा ज़ोर सत्ता के प्रति वफ़ादार रहने का बन जाता है, जबकि उनसे भय और पक्षपात से मुक्त रहकर काम करना चाहिए।

संचार क्रान्ति ने नये तरह के दमन को बढ़ाया है। झूठ और अफ़वाह के ज़रिये लोगों के दिमाग़ में ज़हर भरा जा रहा है। ख़ासकर, इलेक्ट्रानिक मीडिया और काफ़ी हद्द तक प्रिंट मीडिया भी उन उद्योगों की मुट्ठी में है, जो अर्थव्यवस्था में भारी दबदबा रखते हैं। बड़े-बड़े मीडिया मालिक, सरकार की मदद से अपने कॉरपोरेट को चमकाने के लिए पत्रकारीय उसूलों से समझौता कर रहे हैं। मीडिया के ऐसे समझौते से लोकतंत्र का पतन निश्चित है।

चौतरफ़ा संकट वाले मौजूदा माहौल में उम्मीद की किरण सिर्फ़ यही है कि 2019 में भारत की जनता इसे पहचाने और इससे लोहा ले। सिर्फ़ जनता ही लोकतंत्र को बचा सकती है। वो चुनौतियों से कैसे निपटेगी, ये तो वक़्त ही बताएगा। लेकिन यदि वो नहीं चेती तो लोकतंत्र की फड़फड़ाती लौ को असहिष्णुता की तेज़ हवाएँ बुझा देंगी।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)

(साभार:इंडियन एक्सप्रेस)

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तसलीमा नसरीन ने ‘बेशरम’ के हिंदी संस्करण का विमोचन किया

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taslima nasreen

नई दिल्ली, 12 जनवरी | बांग्लादेशी लेखिका और महिला अधिकार कार्यकर्ता तसलीमा नसरीन ने शनिवार को यहां नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में विवादास्पद ‘लज्जा’ उपन्यास की उत्तर कथा ‘बेशरम’ का विमोचन किया। उपन्यास ‘बेशरम’ का लोकार्पण राजकमल प्रकाशन के स्टाल जलसाघर में हुआ। इस मौके पर लेखिका अल्पना मिश्रा, हिमांशु बाजपेयी एवं राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी मौजूद थे।

इस उपन्यास का बांग्ला भाषा से हिंदी में अनुवाद उत्पल बैनर्जी द्वारा किया गया है।

उपन्यास ‘लज्जा’ में हिन्दुओं को बांग्लादेश से कैसे सांप्रदायिक दंगों के कारण देश छोड़ना पड़ा, इसकी कहानी थी। वहीं ‘बेशरम’ उपन्यास के पात्र सुरंजन और माया, जो बांग्लादेश छोड़ने के बाद हिंदुस्तान आए और उन लोगों ने कैसे पराये देश में अपने जीवन यापन के लिए संघर्ष किया, उनकी कहानी है।

नसरीन ने कहा, “यह कोई राजनीतिक कहानी नहीं बल्कि एक सामाजिक कहानी है, जो उनकी जिंदगी, परिवार और संबंधों के बारे में है। मैं खुद को इस उपन्यास में देखती हूं क्योंकि किताब को लिखते वक्त मैं कोलकाता में रह रही थी।”

निर्वासन के बारे में अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए तसलीमा ने माना कि जो लोग उस समय बांग्लादेश छोड़ कर भारत आए थे अगर वे चाहें तो वापस अपने देश जा सकते हैं लेकिन उनके पास वह मौका नहीं है।

उन्होंने कहा, ” ‘लज्जा’ लिखने के बाद मुझे बांग्लादेशी सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया। यहां आने वाले लोगों की तुलना में मेरी पीड़ा में अंतर है।”

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