राम मन्दिर: अब संघ की साज़िश सुप्रीम कोर्ट को डराकर जनता को उल्लू बनाने की है! | WeForNewsHindi | Latest, News Update, -Top Story
Connect with us

ब्लॉग

राम मन्दिर: अब संघ की साज़िश सुप्रीम कोर्ट को डराकर जनता को उल्लू बनाने की है!

दरअसल संघियों की बौखलाहट राम मन्दिर के लिए नहीं बल्कि हिन्दू वोट के लिए है। चुनाव सामने हैं। संघ को उस निकम्मी मोदी सरकार के लिए वोट जुटाना है, जो बीते साढ़े चार सालों में तक़रीबन हरेक मोर्चे पर विफल रही है,

Published

on

Bhaiyyaji Joshi
RSS General Secretary Bhaiyyaji Joshi

संघियों की ताज़ा धमकी है कि यदि मोदी सरकार ने फ़ौरन अध्यादेश लाकर राम मन्दिर निर्माण का रास्ता साफ़ नहीं किया तो वो आन्दोलन करेगी! हालाँकि, संघ ने ये नहीं कहा कि आन्दोलन, हिंसक भी होगा! लेकिन संघ के इतिहास को देखते हुए अहिंसक आन्दोलन की कल्पना बेमानी होगी! मन्दिर के नाम पर संघ फिर से हिंसा की तैयारी करेगा और उन्माद फैलाएगा कि राम भक्त इसलिए बेक़ाबू भीड़ बन गये क्योंकि सुप्रीम कोर्ट जानबूझकर अयोध्या विवाद को अनिश्चितकाल के लिए टाल रहा है, फ़ैसला सुनाने से कन्नी काट रहा है और मन्दिर निर्माण में अड़ंगा लगा रहा है।

दरअसल संघियों की बौखलाहट राम मन्दिर के लिए नहीं बल्कि हिन्दू वोट के लिए है। चुनाव सामने हैं। संघ को उस निकम्मी मोदी सरकार के लिए वोट जुटाना है, जो बीते साढ़े चार सालों में तक़रीबन हरेक मोर्चे पर विफल रही है, जिसके कामकाज़ और तौर-तरीक़ों को लेकर आम जनमानस में भारी नाराज़गी है। आलम इतना बिगड़ चुका है कि मोदी सरकार की हरेक तारीफ़ में छिपे झूठ से जनता का गुस्सा और भड़क रहा है। संघ-बीजेपी को सत्ता हाथ से जाती दिख रही है। ऐसे में राम मन्दिर की आड़ में होने वाले धार्मिक ध्रुवीकरण को उम्मीद की आख़िरी किरण माना गया है।

ये भी पढ़ें : ‘विकास’ के डैडी की आत्मकथा के काले पन्ने

संघ को पता है कि विकास लापता है। अर्थव्यवस्था बेहद ख़राब दौर में है। बैंक तबाह हैं। उद्योग-कारोबार बदहाल हैं। रोज़गार के अवसर नदारद हैं। किसान बेहाल हैं। बचायी गयी बेटियाँ अपने नसीब को कोस रही हैं। सीबीआई अपने पतन से शर्मिन्दा है। राफ़ेल घोटाले की वजह से मोदी सरकार के लिए दलदल बनकर तैयार हो चुका है। अब सम्भलने का वक़्त भी नहीं बचा। लिहाज़, राम मन्दिर को आख़िरी हथियार के रूप में आज़माने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है। इसीलिए आन्दोलन की बात छेड़ी गयी है। संघ के सहकार्यवाह भैय्याजी जोशी के शब्द हैं, लेकिन इसे हरेक संघी का समर्थन हासिल है। अब तो अब कार्यक्रम का ऐलान होना है।

ये भी पढ़ें :  मोदी सरकार की औक़ात नहीं कि वो क़ानून बनाकर अयोध्या विवाद ख़त्म कर दे!

दिक्कत सिर्फ़ इतनी है कि राम भक्तों के आन्दोलन से न तो मोदी सरकार पर कोई असर पड़ेगा और ना ही मन्दिर निर्माण का रास्ता खुलेगा! तो फिर होगा क्या? होगा ये कि भक्तों को उल्लू बनाया जाएगा कि तुम सरकार की चौतरफ़ा नामाकियों को नज़रअन्दाज़ करो और बीजेपी को ही जिताओ क्योंकि मन्दिर बनने के लिए बीजेपी का सत्ता में होना ज़रूरी है। उधर, सरकार और बीजेपी की ओर से औपचारिक तौर पर दोहराया जाएगा कि ‘बीजेपी, मन्दिर निर्माण के लिए संकल्पबद्ध है और आज भी 1989 में हुए पार्टी के पालनपुर अधिवेशन के मुताबिक़ संवैधानिक तरीक़े से राम मन्दिर बनाने की पक्षधर है।’

साफ़ है कि मसला ‘संवैधानिक तरीक़े’ का है। लेकिन संघ-बीजेपी का कोई भी छोटा-बड़ा नेता देश को संवैधानिक तरीक़े की हक़ीक़त के बारे में कभी कुछ नहीं बताता! ऐसा क्यों है? संविधान के मुताबिक़, यदि कोई मामला अदालत के विचाराधीन है तो सरकार या संसद उसे क़ानून बनाकर ख़त्म नहीं कर सकती। अयोध्या विवाद में 1994 से सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति का आदेश दे रखा है। सरकार यदि ज़बरन क़ानून बनाकर यथास्थिति को बदलती है, तो ये अदालत के काम में दख़ल माना जाएगा। इसी आधार पर अदालत क़ानून को ख़ारिज़ कर देगी क्योंकि उसे भी अपने ‘यथास्थिति’ वाले आदेश की रक्षा करनी होगी। अदालत भी उन सवालों का समाधान किये बग़ैर ‘यथास्थिति’ ख़त्म नहीं कर सकती, जिनकी वजह से ‘यथास्थिति’ का रास्ता थामा गया था!

ये भी पढ़ें :  राम मन्दिर: क़ानून मंत्री का ढोंग, हिन्दुओं का धैर्य और कोर्ट की लाज

इसका मतलब ये हुआ कि आन्दोलनकारी चाहे जितने उग्र तेवर दिखा लें, चाहे जितनी हिंसा कर लें, लेकिन सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट की ‘यथास्थिति’ को बदलने का कोई रास्ता नहीं है। यही वजह है कि जिस पूर्व चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा के बारे में संघियों ने ख़ूब प्रचार किया कि वो रिटायरमेंट से पहले अयोध्या विवाद पर फ़ैसला सुनाना चाहते हैं। मुमकिन है कि ये सच भी हो, लेकिन ‘यथास्थिति’ की ताक़त के आगे जस्टिस दीपक मिश्रा के हाथ भी बँधे ही रहे। वो भी सिर्फ़ इतना ही तय कर सके कि अयोध्या विवाद को सुप्रीम कोर्ट सिर्फ़ ज़मीन के मालिकाना हक़ यानी ‘टाइटल सूट’ की तरह ही देखेगा।

‘टाइटल सूट’ एक साधारण मुक़दमा होता है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि ‘टाइटल सूट’ को त्वरित सुनवाई के लायक नहीं माना जा सकता। लिहाज़ा, इसकी प्राथमिकता सुप्रीम कोर्ट में लम्बित अन्य मुक़दमों के हिसाब से ही तय होगी। संघ-बीजेपी और मन्दिरवादियों ने सुप्रीम कोर्ट के इस सहज रवैये को राजनीति से जोड़ दिया। क्योंकि ये उनकी आस्था है कि राम का जन्म अयोध्या में उसी स्थान पर हुआ था, जहाँ बाबरी मस्जिद थी। वो चाहते हैं कि अदालत भी इसी आस्था को स्वीकार करे। जबकि सुप्रीम कोर्ट 1994 से अभी तक हमेशा दोहराती है कि वो आस्था के सवाल को तय नहीं कर सकती। उसे तो सिर्फ़ इतना तय करना है कि विवादित ज़मीन का मालिक कौन है?

ये भी पढ़ें : अयोध्या विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने सुलझाया कम और उलझाया ज़्यादा!

लगे हाथ संघियों के कुछ और स्वाँग को भी समझते चलें। जैसे, अभी ये बात उछाली गयी है कि यदि बीजेपी, एक निजी विधेयक के रूप में क़ानून को संसद में पेश करे तो क्या काँग्रेस, वामपन्थी तथा अन्य सेक्यूलर पार्टियाँ इसका समर्थन करेंगी? यहाँ दो बाते हैं। पहली, कोई भी राजनीतिक दल अयोध्या में राम मन्दिर बनाने का विरोधी नहीं है। विरोध तो सिर्फ़ इतना है कि विवादित ज़मीन पर ज़बरन मन्दिर नहीं बनाया जा सकता। दूसरी बात ये है कि विधेयक, निजी हो या सरकारी, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। क्योंकि दोनों को ही ‘यथास्थिति’ को भंग करना पड़ेगा और ऐसा करना असंवैधानिक होगा। तकनीकी तौर पर असंवैधानिकता के आधार पर ही सदन के पीठासीन अधिकारी को प्रस्तावित विधेयक को पेश करने की अनुमति तक नहीं दे सकते, उसका पारित होना तो बाद की बात है।

अब सवाल ये है कि सरकार की ओर से जनता या राम भक्तों को इन पेंचीदा बातों को लेकर जागरूक क्यों नहीं किया जाता? क्योंकि फिर जनता ये समझ जाएगी कि आस्था के नाम पर विवादित ज़मीन पर मन्दिर बनवाना मुमकिन नहीं है। अब यदि ये मुमकिन ही नहीं है तो संघ-बीजेपी को राम मन्दिर के नाम पर वोट माँगने का क्या हक़ हो सकता है? क्या शिवसेना-बीजेपी के अलावा अन्य पार्टियों में हिन्दू नहीं हैं? क्या इन हिन्दुओं को राम मन्दिर बनाने से ऐतराज़ है? जी नहीं! राम मन्दिर बनाने से किसी भी ऐतराज नहीं है। आपत्ति है तो सिर्फ़ इतनी कि ज़बरन किसी ज़मीन को जन्मभूमि बता देना ग़लत है। ज़बरन मस्जिद को ढहा देना ग़लत है, असंवैधानिक है, अपराध है।

ये भी पढ़ें :  मोदी नहीं चाहते कि चुनाव तक जनता किसी भी सच को जाने!

यदि सुप्रीम कोर्ट ये कह दे कि विवादित ज़मीन पर मुसलमानों का मालिकाना हक़ नहीं है तो बनाइए भव्य राम मन्दिर, कौन रोकता है! लेकिन यदि ज़मीन मुसलिम पक्ष की पायी गयी तो फिर ज़बरन वहीं मन्दिर बनाने की बात करने वालों ने सुप्रीम कोर्ट को पसोपेश में डाल रखा है। क्योंकि हिन्दू पक्ष ने कभी ये नहीं कहा कि यदि फ़ैसला उनके ख़िलाफ़ रहा तो भी वो उसे मानेंगे। जब तक मन्दिरवादियों की ओर से ऐसे बयान नहीं आएँगे, तब तक सुप्रीम कोर्ट अपने फ़ैसले को ज़्यादा से ज़्यादा टालना चाहेगा, क्योंकि उसे भी अपने लाज बचानी है। यदि उसका आदेश भी नहीं माना गया तो संविधान और लोकतंत्र कैसे बचेगा!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

ब्लॉग

सेना ने माना, आईएलएंडएफएस बांड में फंसा एजीआईएफ का पैसा

Published

on

By

Indian Army insurance ILFS bonds

नई दिल्ली, 18 मार्च | भारतीय सेना जो पहले यह मानने को तैयार नहीं थी कि उनके कल्याण की निधि का पैसा आईएनएंडएफएस के विषैले बांड में फंस गया है, जबकि आईएनएस इस बात को बार-बार दोहराता रहा, लेकिन अब वह स्वीकार करती है कि भारत की एकमात्र निष्पक्ष न्यूज वायर का विश्लेषण सही है।

सेना के पीआरओ ने आखिरकार सवालों का जबाव देते हुए कहा कि आर्मी ग्रुप इंश्योरेंस फंड (एजीआईएफ) के काफी सख्त निवेश नियम हैं। देश के अत्यंत सम्मानित व प्रख्यात वित्तीय शख्सियतों की सलाह पर निवेश किया जाता है। इससे पहले सेना के पीआरओ लेफ्टिनेंट कर्नल मोहित वैष्णव मसले को उलझाते रहे और जवाब नहीं दिए थे। सेना का हालिया बयान आईएएनएस के तथ्यों के साथ इस प्रकार है :

एजीआईएफ का वर्षो से रिटर्न निर्धारित जोखिम लाभ सांचे में काफी बेहतर रहा। आईएएनएस ने इसपर कभी संदेह नहीं किया।

एजीआईएफ को 200 से कोई एनपीए नहीं रहा। इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आईएनएंडएफएस) ट्रिपल ‘ए’ रेटेड कंपनी थी और जब एजीआईएफ का निवेश हुआ उस समय उसे केंद्र व राज्य सरकारों दोनों की मदद मिली थी। कंपनी अगस्त 2018 में अचानक चूक के कारण ट्रिपल ‘ए’ से नीचे आ गई।

आईएएलएंडएफएस के 91,000 करोड़ के कर्ज में बैंकों का 63 फीसदी, म्यूचुअल फंड का तीन फीसदी से ज्यादा और बीमा कंपनियों, ईपीएफ वे पेंशन निधि का पांच फीसदी से ज्यादा फंस गया है।

बैंक/एएमसी/पेंशन निधि के मुकाबले एजीआईएफ की रकम अत्यल्प (0.5 फीसदी से कम) है। (सारा कुछ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है और आईएएनएस का कहना है कि विषैले आईएलएंडएफएस बांड में एजीआईएफ की 210 करोड़ रुपये की रकम फंस गई है।)

Continue Reading

ब्लॉग

राफ़ेल सौदे में सीएजी ने उड़ाई पारदर्शिता की धज़्ज़ियाँ

राफ़ेल रिपोर्ट में सीएजी ने अपनी प्रतिष्ठा गँवाई, इसने जितने सवालों के जबाब दिये उसके ज़्यादा तो प्रश्न खड़े किये

Published

on

Rafale deal scam

राफ़ेल विमानों की ख़रीदारी के लिए भारत और फ़्राँस के बीच हुए सौदे को अन्तर-सरकारी क़रार (आईजीए) कहा गया। आईजीए के इस नामकरण को समझना बहुत मुश्किल है। ख़ासकर, उस घटनाक्रम को देखते हुए जो 10 अप्रैल 2015 से पहले का रहा है। इस दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फ़्राँसिसी कम्पनी डसॉल्ट से 36 विमान ख़रीदने के फ़ैसले का ऐलान किया था।

यूपीए सरकार ने ग्लोबल टेंडर के ज़रिये दो विमानों के चुना था। पहला, डसॉल्ट कम्पनी का राफ़ेल और दूसरा, चार यूरोपीय देशों में बनने वाला यूरोफ़ाईटर टाइफून। टेंडर में राफ़ेल का दाम कम था। तब यूपीए ने 126 राफ़ेल विमानों की ख़रीदारी के लिए सौदेबाज़ी शुरू की।

ये क़रार दो सरकारों के बीच होने वाला जी-टू-जी समझौता नहीं था। क्योंकि ग्लोबल टेंडर को इस ढाँचे में नहीं रखा जा सकता। यही वजह है कि यूपीए सरकार ने जब रूस या अमेरिका से रक्षा उपकरणों की ख़रीदारी की तभी जी-टू-जी क़रार किये गये। यूपीए ने डसॉल्ट से जिस सौदे की बातचीत की थी, उसके तहत 18 विमानों का निर्माण सीधे डसॉल्ट को करना था और बाक़ी 108 का निर्माण हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को करना था और डलॉल्ट को इसकी तकनीक मुहैया करवानी थी।

मार्च 2015 में डसॉल्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि एचएएल के साथ हो रहा समझौता 95 फ़ीसदी पूरा हो चुका है और बाक़ी भी जल्द ही पूरा हो जाएगा। लेकिन प्रधानमंत्री ने उस समझौते को ख़त्म कर दिया और उसकी जगह डसॉल्ट से सीधे 36 विमान ख़रीदने का सौदा किया। इस समझौते से एचएएल को बाहर कर दिया गया। साफ़ है कि अब भी राफ़ेल विमानों की आपूर्ति का ज़िम्मा डसॉल्ट पर ही है, फ़्राँसिसी सरकार पर नहीं। इसके बावजूद, नये सौदे को ‘सरकार से सरकार के बीच’ (जी-टू-जी) नहीं, बल्कि ‘अन्तर-सरकारी क़रार’ (आईजीए) कहा जा रहा है।

नये सौदे की आड़

प्रधानमंत्री की घोषणा का अंज़ाम ये हुआ कि पुराने समझौते से जुड़ी वो सारे शर्ते ख़त्म हो गयीं जिनका ताल्लुक राफ़ेल के दाम से था और जिसे इसे रक्षा ख़रीद प्रक्रिया यानी डिफ़ेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसिज़र्स (डीपीपी) के तहत तय किया गया था। दूसरे शब्दों में, अब पुराना क़रार ख़त्म हो गया और उसकी जगह 36 विमानों की पूरी तरह से नयी डील (सौदे) ने ले ली। 2015 में फ़्राँस की धरती पर किये गये प्रधानमंत्री के ऐलान से भारत सरकार पशोपेश में फँस गयी, क्योंकि ये प्रधानमंत्री का एकतरफ़ा फ़ैसला था। अब आगे की बातचीत का दारोमदार सीधे-सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) पर आ गया।

नये सौदे की शर्तों पर बातचीत करने का जो रास्ता प्रधानमंत्री कार्यालय ने चुना वो रक्षा ख़रीद प्रक्रिया (डीपीपी) और रक्षा ख़रीद परिषद (डिफ़ेंस एक्वीज़ीशन काउन्सिल – डीएसी) के दायरे से बाहर था। क्योंकि रक्षा ख़रीद के लिए सौदेबाज़ी करने का काम डीपीपी को करना होता है। ये उसी का क्षेत्राधिकार है। इसीलिए राफ़ेल की फ़ाइल में रक्षा मंत्रालय के अफ़सरों की टिप्पणी ने प्रधानमंत्री कार्यालय पर सीधा-सीधा आक्षेप किया। दस्तावेज़ों से साबित हो गया कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने सौदेबाज़ी में रक्षा मंत्रालय की रसूख़ को गिरा दिया। दिलचस्प ये भी रहा कि नये सौदे में दो नयी बातें हुईं। पहला, एक ऑफ़सेट पार्टनर का जुड़ना और दूसरा, हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के हाथों से 108 विमानों के निर्माण की शर्ते का ख़त्म होना।

नया क़रार ‘अन्तर-सरकारी’ (आईजीए) नहीं है। क्योंकि डसॉल्ट एक निजी कम्पनी है। ये फ़्रेंच सरकार की भी कम्पनी नहीं है। इसीलिए फ़्रेंच सरकार ने 36 विमानों की सप्लाई की गारंटी लेने वाली शर्त से अपना पल्ला झाड़ लिया। फिर सप्लायर होने के नाते डसॉल्ट को गोपनीयता और कमीशन की शर्तों से छुटकारा दिलाने के लिए ज़ुर्माने और भ्रष्टाचार से जुड़े प्रावधानों को हटाया गया। ये काम प्रधानमंत्री कार्यालय की शह के बग़ैर कैसे मुमकिन हुआ? इसकी क्या वजह रही और ऐसा किससे कहने से हुआ? इन सवालों का कोई जबाब नहीं मिला।

रक्षा ख़रीद परिषद (डीएसी) को दरकिनार करने के लिए ऐसी शर्तें तैयार की गयीं जिससे प्रधानमंत्री और फ़्रेंच सरकार के लिए मुश्किलें पैदा नहीं हों। गारंटी की जगह उस ‘लेटर ऑफ़ कम्फर्ट’ (सहुलियत पत्र) ने ले ली जिसका कोई क़ानूनी प्रभाव नहीं होता। यहाँ तक कि फ़्रेंच सरकार ने डसॉस्ट को भुगतान करने के लिए अपने ‘स्क्रू खाते’ की सुविधा भी नहीं दी। शायद इसीलिए, क्योंकि फ़्रेंच सरकार इस सौदे की किसी भी ज़िम्मेदारी लेने से बचना चाहती थी। स्क्रू खाते के ज़रिये फ़्रेंच सरकार को ये सुनिश्चित करना होता कि डसॉल्ट ने अपनी शर्तों को निभाया, तभी उसे भुगतान हुआ।

ख़ामियों भरी रिपोर्ट

सीएजी ने कई तरह से देश को गच्चा दिया। पहला, इसकी रिपोर्ट 36 विमानों के दाम तक सीमित रही। इसका कहना है कि यूपीए के दौर वाले क़रार के मुक़ाबले नया सौदा 2.86% सस्ता है। लेकिन इस नतीज़े पर पहुँचने से पहले सीएजी ने सभी तथ्यों का ख़ुलासा नहीं किया। कहना मुश्किल है कि सीएजी ऐसा कैसे कर सकता है! दूसरा, सीएजी ने ये नहीं बताया कि प्रधानमंत्री ने किस आधार पर 36 विमानों की सीधी ख़रीदारी का साहसिक फ़ैसला लिया। तीसरा, सीएजी रिपोर्ट ने 2013 से लागू रक्षा ख़रीद प्रक्रिया (डीपीपी) को दरकिनार किये जाने के प्रति अपने नज़रें पूरी तरह से फेर लीं।

चौथा, सीएजी रिपोर्ट में इस तथ्य के प्रति भी उदासीनता दिखायी गयी है कि भारत की सौदेबाज़ी टीम ने एक ऐतराज़ ज़ाहिर किया है और उसे ठुकराने या ख़ारिज़ करने के लिए क्या दलीलें हैं। पाँचवाँ, सीएजी रिपोर्ट ने ये भी साफ़ नहीं किया कि नये क़रार के मसौदे से भ्रष्टाचार-विरोधी प्रावधान ग़ायब क्यों हैं। छठा, सीएजी रिपोर्ट ये तो बताती है कि गारंटी नहीं मिलने का कोई वित्तीय नुकसान नहीं होगा, लेकिन रिपोर्ट ये साफ़ नहीं करती कि गारंटी का प्रावधान क्यों नहीं है।

सबसे आश्चर्यजनक तो ये रहा कि सीएजी ने राफ़ेल के चयन के लिए यूपीए की आलोचना की, लेकिन उसी विमान को जब प्रधानमंत्री ने चुनने का फ़ैसला किया तो सीएजी की बोलती बन्द थी। इतना ही नहीं, राफ़ेल विमानों की संख्या को 126 से घटाकर 36 करने को लेकर भी जो उद्देश्य बताया गया वो ये कि भारतीय वायुसेना में विमानों की भारी कमी है जिसे यथाशीघ्र पूरा करना ज़रूरी था। लेकिन जब यूपीए के सौदे की तुलना मोदी सरकार के क़रार से की गयी तो पता चला कि नये सौदे में सिर्फ़ एक महीने की बचत होगी।

साफ़ है कि मौके की नज़ाक़त को देखते सीएजी अपनी अपेक्षाओं पर ख़रा नहीं उतरा। उसने अपने दायरे से बाहर जाकर सरकार की सुरक्षा करने का रास्ता चुना। अब तो सीएजी की प्रतिष्ठा को भी सुरक्षित करना होगा।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)
(साभार: TheHindu)

Continue Reading

ब्लॉग

सरकार और मीडिया ही बने लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक

लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन का सबसे बड़ा सबूत है, ग़लत जानकारियों को ही विश्वसनीय बनाकर पेश करना

Published

on

Modi on TV

ज़माना बदल गया। हमारा राष्ट्रीय संवाद अब पक्ष-विपक्ष का नहीं रहा, बल्कि दोस्तों और दुश्मनों का हो चुका है। चर्चा और बहस की गुंज़ाइश नहीं रही। आज जो सरकार या उसके बैठे लोगों के विरोध में हो, उसे देशद्रोही कहा जाता है। ऐसा माहौल बना दिया गया है कि पाकिस्तान से सम्बन्धित सरकार के हरेक क़दम का समर्थन करना ज़रूरी है। यदि विपक्ष ऐसे सवाल पूछता है, जिन्हें पूछा ही जाना चाहिए तो उस पर राष्ट्रविरोधी होने का आरोप मढ़ दिया जाता है। फ़ेसबुक औऱ ट्वीटर जैसे सोशल मीडिया के माध्यमों पर भी यदि कोई सरकार की आलोचना करता है तो उसके ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा ठोंक दिया जाता है।

लोकसभा के चुनाव सामने पाकर जन-संवाद को इतना हानिकारक बना दिया गया है कि बात बर्दाश्त से बाहर हो गयी है। प्रधानमंत्री कुछ भी बोलें लेकिन उनके गुणगान के लिए इलेक्ट्रानिक मीडिया ने चीयरलीडर्स या भाँडों की भूमिका थाम ली है। जब ‘द हिन्दू’ अख़बार ने बोफ़ोर्स ख़ुलासा किया था, तब विपक्ष ने राजीव गाँधी से सवाल पूछे थे। लेकिन जब उसी ‘द हिन्दू’ ने राफ़ेल सौदे का भाँडाफोड़ किया तो सरकार ने ‘द हिन्दू’ को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। विपक्ष के सवालों को ऐसे पेश किया गया जिनसे सुरक्षा बल कमज़ोर पड़ जाएँगे।

मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर आतंकी हमला हुआ था, तब मुठभेड़ के दौरान ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुम्बई पहुँचकर केन्द्र सरकार को नकारा होने और राष्ट्रीय सुरक्षा में नाकाम रहने का तमग़ा दे दिया। लेकिन जब पुलवामा हमला हुआ तो सरकार ने उन्हीं लोगों पर सवाल दाग़ने शुरू कर दिये जो उससे सवाल पूछ रहे थे। लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी की यादाश्त बहुत कमज़ोर है। मोदी उस वक़्त देश की सरकार के समर्थन में नहीं खड़े जब मुम्बई में आतंकी तबाही मचा रहे थे। शायद, उन्हें उस वक़्त अपनी कथनी और करनी में राष्ट्रभक्ति की छटा दिखायी दे रही थी।

ऐसी वारदातों के सामने मीडिया का दोहरा चरित्र बेनक़ाब हो गया है, क्योंकि अब उसके पास प्रधानमंत्री के दोमुँही बातों को उजागर करने का वक़्त नहीं है। ये मिसाल है कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएँ अब कहाँ से कहाँ पहुँच चुकी हैं। 2014 से पहले पहले प्रेस और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (यूपीए) की क़दम-क़दम पर चीड़फाड़ की। आज वही लोग इस सरकार के लिए भाँड या चीयरलीडर्स बन गये हैं। हालाँकि, ये बात मीडिया का सभी वर्गों पर लागू नहीं होती है। आज विपक्षी नेताओं के तक़रीबन सारे बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है। आज सरकार के हर क़दम को राष्ट्रभक्ति बताकर उसका स्तुतिगान किया जाता है। प्रधानमंत्री और इस सरकार के हरेक मंत्री के बयान को अक्षरशः सत्य बनाकर पेश किया जाता है। उन आँकड़ों को लेकर कोई सवाल नहीं पूछे जाते जिन्हें राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे (एनएसएसओ) जारी करता है। कोई सरकार से ये नहीं पूछ रहा कि वो किस आधार पर बालाकोट में 300-400 आतंकियों के सफ़ाये का दावा कर रही है। पत्रकारों और टीवी के एंकरों में प्रधानमंत्री को उनकी हैसियत से बड़े से बड़ा करके दिखाने की होड़ मची हुई है।

कई योजनाओं के नाम बदलकर उनकी उपलब्धियों के बारे में सरकार जो आँकड़े पेश करती है, कोई उसकी सच्चाई को जाँचने वाला नहीं है। जो लोग सच्चाई को सामने रखते हैं उनके साथ दक्षिण-पन्थी भक्तों की टोली ग़ाली-गलौज़ करती है। विपक्ष के नेताओं को फ़र्ज़ी बयान को जोड़कर उन्हें वायरल करवाया जाता है, ताकि उनका चरित्र-हनन किया जा सके। लेकिन दूसरी ओर, फ़ेसबुक और ट्वीटर के अफ़सरों को बुलाकर सरकार तलाड़ती है कि वो उसके क़रीबियों के चुनिन्दा पोस्ट को क्यों हटा रही है। सरकार को उन फ़ेक-पोस्ट की परवाह नहीं है, जिनमें विपक्षियों को निशाना बनाया जाता है। भ्रष्ट जानकारियों को आज विश्वसनीय सूचनाएँ बनाकर पेश किया जाता है। हर तरफ़ से ये झूठ फ़ैलाया जा रहा है कि मोदी सरकार ने भारत की दिशा ही बदल दी है।

अख़बारों में प्रधानमंत्री के विज्ञापन भरे पड़े हैं। इन पर जनता का पैसा बहाया जा रहा है, लेकिन कोई सवाल उठाने वाला नहीं है। मुट्ठीभर सम्पादकों ने सरकार को आड़े हाथों लेने का साहस दिखाया है। वो बधाई के पात्र हैं। लेकिन लोकतंत्र के चौथे खम्भे का ज़्यादातर हिस्सा सरकार की जाग़ीर बन चुका है। मीडिया की साख़ इतनी गिर चुकी है कि समाज के बहुत बड़े तबक़े ने टेलीविज़न देखना बन्द कर दिया है, क्योंकि अब वो इसे ख़बरें देने वाले माध्यम के रूप में नहीं पाते हैं। हर शाम को कुछ चैनलों पर कुछ ख़ास लोगों की साउंड बाइट सर्कस करते नज़र आती है। इनके ज़रिये समाज में ज़हर परोसा जाता है। ये लोकतंत्र का अराजक चेहरा है, जो सिर्फ़ झूठ और दुष्प्रचार के भरोसे क़ायम है।

यदि सरकार और चौथा खम्भा यानी मीडिया, एक ही चट्टा-बट्टा बन चुके हैं तो लोकतंत्र भारी ख़तरे में है। इसीलिए बहुत महत्वपूर्ण है कि वो लोग आगे आयें जो अपनी बातों को प्रभावी तरह से रखना जानते हैं। यदि ऐसे लोग मुखर नहीं होंगे तो झूठ और अफ़वाह को कौन चुनौती देगा। सच को कौन सामने लाएगा। हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को संविधान से जो ज़िम्मेदारियाँ मिली हैं, उसे लेकर उन्हें सरकार के प्रति नहीं बल्कि देश के प्रति जबाबदेह होना चाहिए। उन्हें सरकार की रखैल बनने के बजाय अपने विवेक के काम लेना चाहिए। चाहे केन्द्रीय हो या प्रादेशिक, जाँच एजेंसियों को चाहिए कि वो डर और पक्षपात के बग़ैर क़सूरवार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करें। लेकिन ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जाँच एजेंसियाँ चुन-चुनकर उन लोगों को निशाना बना रही हैं, जो सरकार के विरोधी हैं, जबकि उन लोगों को नज़रअन्दाज़ किया जाता है जो या तो सरकार के क़रीबी हैं और फिर उसका हिस्सा हैं। न्यायपालिका को भी ये समझना होगा कि यदि वो बेक़सूर लोगों के हक़ में नहीं खड़ी होती तो उसे निष्पक्ष नहीं माना जा सकता।

ख़ुशहाली और अच्छे दिन के लिए शान्ति, सद्भाव और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा ज़रूरी है। ऐसा लगता है कि आज हम ऐसे अन्यायपूर्ण भारत में रह रहे हैं, जहाँ कमज़ोर तबकों के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ सपने हैं। मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर चारों ओर नाउम्मीदी नज़र आती है।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)
(साभार: द टेलिग्राफ)

Continue Reading
Advertisement
Farooq Abdullah
चुनाव6 mins ago

जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस-एनसी गठबंधन, श्रीनगर से फारूक अब्दुल्ला लड़ेंगे चुनाव

Daati Maharaj
राष्ट्रीय8 mins ago

सीबीआई ने दी दाती महाराज को अग्रिम जमानत पर चुनौती

Earthquake-min
अंतरराष्ट्रीय1 hour ago

तुर्की में 5.5 तीव्रता का भूकंप

Nirav Modi
अंतरराष्ट्रीय1 hour ago

नीरव मोदी लंदन में गिरफ्तार

Arvind Kejriwal
राजनीति1 hour ago

अगर आप चाहते हैं आपके बच्चे चौकीदार बनें तो मोदी को वोट दें : केजरीवाल

priyanka-gandhi
राजनीति2 hours ago

वाराणसी के अस्सी घाट से बोलीं प्रियंका- ‘बीजेपी के राज में रोजगार खत्म’

anil kapoor
मनोरंजन3 hours ago

‘टोटल धमाल’ की सफलता से खुश हैं अनिल कपूर

Holi song
मनोरंजन3 hours ago

Holi 2019: इन गानों के बिना अधूरी हैं होली…

Pramod Sawant
राजनीति3 hours ago

गोवा सीएम प्रमोद सावंत ने साबित किया बहुमत

loc firing-min
राष्ट्रीय4 hours ago

नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी में घायल नागरिक की मौत

green coconut
स्वास्थ्य3 weeks ago

गर्मियों में नारियल पानी पीने से होते हैं ये फायदे

chili-
स्वास्थ्य4 weeks ago

हरी मिर्च खाने के 7 फायदे

sugarcanejuice
लाइफस्टाइल3 weeks ago

गर्मियों में गन्ने का रस पीने से होते है ये 5 फायदे…

pulwama terror attack
ब्लॉग4 weeks ago

जवानों के लिए खूनी साबित हुआ फरवरी 2019

ILFS and Postal Insurance Bond
ब्लॉग3 weeks ago

IL&FS बांड से 47 लाख डाक जीवन बीमा प्रभावित

Bharatiya Tribal Party
ब्लॉग4 weeks ago

अलग भील प्रदेश की मांग को लेकर राजस्थान में मुहिम तेज

Momo
लाइफस्टाइल4 weeks ago

मोमोज खाने से आपकी सेहत को होते है ये नुकसान

egg-
स्वास्थ्य4 weeks ago

रोज एक अंडा खाने से होते हैं ये फायदे….

indian air force
ब्लॉग3 weeks ago

ऑपरेशन बालाकोट में ग़लत ‘सूत्रों’ के भरोसे ही रहा भारतीय मीडिया

Chana
स्वास्थ्य7 hours ago

क्या आपको पता है काले चने खाने से होते हैं ये फायदे…

Most Popular