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क्यों राज्यसभा का बहुमत अब भी नरेन्द्र मोदी की मुट्ठी से बाहर ही रहेगा…!

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नरेन्द्र मोदी को ये कसक रहेगी ही कि 2019 तक भी राज्यसभा का बहुमत उनसे दूर ही रहेगा। हालाँकि, ताज़ा नतीज़ों से बीजेपी की राज्यसभा में 10 सीटें बढ़ जाएँगी। एक सीट इसी जुलाई में और बाक़ी नौ अगले साल अप्रैल में। इसके अलावा मई 2018 में एनडीए की झोली में झारखंड से भी 2 और सीटें आ जाएँगी। इस तरह, 2019 के लोकसभा चुनाव तक एनडीए की ताक़त ज़्यादा से ज़्यादा 82 सांसदों तक ही पहुँच पाएगी। जबकि विरोधी यूपीए के खेमे में तब भी 87 सांसद रहेंगे।

किसी भी पार्टी या नेता को अपार बहुमत से पैदा होने वाले अहंकार और निरंकुशता से बचाने के लिए की संविधान निर्माताओं ने राज्यसभा को शानदार विशेषताओं वाला उच्च और स्थायी सदन बनाया है। ऐसा भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विशेषता क्षेत्राधिकार (Separation of Power) के सिद्धान्त की वजह से है जिससे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की स्वतंत्रता तय हुई है। ये बातें इसलिए भी समझना बहुत ज़रूरी है क्योंकि देश में बड़े पैमाने पर ये दुष्प्रचार फैलाया जाता रहा है कि लोकसभा में बहुमत के बावजूद मोदी सरकार के हाथ बँधे हुए हैं क्योंकि राज्यसभा उसकी मुट्ठी में नहीं है। दरअसल, राज्यसभा का चरित्र ही ऐसा है कि 2014 से लेकर 2019 तक होने वाले सभी विधानसभा चुनावों को भी यदि बीजेपी जीतती रहती तो भी मोदी सरकार के मौजूदा कार्यकाल के दौरान राज्यसभा कभी उसकी गिरफ़्त में नहीं आ पाता।

इस साल, जुलाई और अगस्त में राज्यसभा की 10 सीटें खाली होंगी। इसमें से बंगाल की 6 (तृणमूल-5, सीपीएम-1), गोवा की 1 (काँग्रेस) और गुजरात की 3 (बीजेपी-2, काँग्रेस-1) सीटें हैं। लेकिन बीजेपी को सिर्फ़ गोवा की सीट का फ़ायदा होगा। बंगाल और गुजरात यथावत रहेंगे। अगले साल जनवरी 2018 में काँग्रेसी खेमे वाली दिल्ली की 3 सीटें खाली होंगी, जो आम आदमी पार्टी को मिलेंगी। फरवरी 2018 में खाली होने वाली सिक्किम की इकलौती सीट बीजेपी की सहयोगी सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के पास ही रहेगी।

अगस्त 2018 में राज्यसभा की 58 सीटें खाली होंगी। इसमें से मनोनयन वाली 3 सीटों को छोड़कर 55 पर चुनाव होगा। इसमें उत्तर प्रदेश की 10 और उत्तराखंड की 1 सीट होगी। इनमें से अभी सपा-6, बीएसपी और काँग्रेस 2-2 और बीजेपी के पास 1 सीट है। लेकिन 11 मार्च को दिखी मोदी लहर की वजह से इन 11 में से 10 सीटें (गोवा-1, उत्तराखंड-1, यूपी-8) बीजेपी की हो जाएँगी। इस तरह उसे 9 सीटों का फ़ायदा होगा, क्योंकि एक सीट उसके पास पहले से ही थी।

बाक़ी 44 सीटों में से गुजरात, कर्नाटक और हिमाचल की 9 सीटें ऐसी हैं जो अभी बीजेपी के पास हैं। लिहाज़ा, इन राज्यों के आगामी चुनाव से भी बीजेपी की राज्यसभा में ताक़त बढ़ नहीं सकती। अन्य 35 सीटों (बिहार और महाराष्ट्र 6-6, मध्य प्रदेश और बंगाल 5-5, तेलंगाना, राजस्थान और आन्ध्र प्रदेश 3-3, ओड़ीशा की 2, छत्तीसगढ़ और हरियाणा की 1-1) पर मौजूदा पार्टियाँ यथावत रहेंगी। अलबत्ता, मई 2018 में झारखंड से खाली होने वाली 2 सीटें बीजेपी की झोली में जाएँगी। जबकि जुलाई में खाली होने वाली केरल की 3 सीटों में से कोई भी बीजेपी नहीं जीत सकेगी।

कुलमिलाकर, मोदी सरकार के बाक़ी बचे कार्यकाल में एनडीए को राज्यसभा में ज़्यादा से ज़्यादा 12 सीटों का इज़ाफ़ा होगा। जबकि काँग्रेस को 4 (गोवा, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड की 1-1), समाजवादी पार्टी को 5 और बीएसपी को 2 सीटों का नुकसान होगा। फ़िलहाल काँग्रेस और साथी दलों के कुल 96 (काँग्रेस-60, एसपी-19, जेडीयू-10, डीएमके-4, आरजेडी-3) सांसद हैं। जबकि एनडीए के खेमे की तादाद 70 (बीजेपी-56, टीडीपी-6, अकाली दल-3, शिवसेना-3) है, जो साल 2019 तक ज़्यादा से ज़्यादा 82 तक ही पहुँच सकती है। ये संख्या तब भी बहुमत से दूर ही रहेगी।

राज्यसभा का मुख्य संवैधानिक दायित्व है कि वो लोकसभा में बहुमत पाकर या जुटाकर बैठी सरकार को इतराने या तानाशाही करने से रोक सके। रोक-टोक का सारा फ़ार्मूला ही राज्यसभा की विशेषता और गरिमा को सुनिश्चित करता है। सत्ता पक्ष को भी राज्यसभा में बहुमत पाने और बनाने के लिए काफ़ी मशक्कत और इन्तज़ार करना पड़ता है। राज्यसभा में सत्तापक्ष का बहुमत तभी होगा, जब ज़्यादातर और बड़े राज्यों में उसकी सरकारें होंगी और वो भी लम्बे अरसे से!

ज़रा इसे एक उदाहरण से भी समझते चलें। दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल के पास 67 विधायक हैं। लेकिन राज्यसभा में उनका कोई सदस्य नहीं है। हालाँकि, राज्यसभा में दिल्ली की तीन सीटें हैं। तीनों काँग्रेस के पास हैं। तीनों का कार्यकाल 27 जनवरी 2018 तक है। यानी, राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के सदस्य इसके बाद ही होंगे। और, जो भी बनेंगे वो जनवरी 2024 तक राज्यसभा में रहेंगे। भले ही इस दौरान दिल्ली में किसी और पार्टी की सरकार आ जाए। इसी वजह से यदि किसी राज्य में किसी पार्टी की लुटिया डूब जाती है तो भी राज्यसभा में फ़ौरन उसका असर ख़त्म नहीं होता। दूसरी तरफ, कोई पार्टी अगर विधानसभा चुनाव में सरताज भी बन जाए तो फ़ौरन उसका दख़ल राज्यसभा में बढ़ नहीं सकता। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि राज्यसभा में किसी पार्टी का दबदबा न तो आनन-फानन में बनता है और न बिगड़ता है। यही वजह है कि लोकसभा में सत्ता बदलने के बावजूद मौजूदा सरकार वहाँ अल्पमत में है और पाँच साल तक उसे अल्पमत ही झेलना होगा।

राज्यसभा को तमाम खूबियों से संवारने वाले संविधान निर्माताओं ने इस शंका का निवारण कर रखा है कि कहीं राज्यसभा में विपक्ष की धौंस सरकार के लिए बेड़ियाँ न बन जाएँ। कोई अराजकता न पैदा हो इसीलिए राज्यसभा पर भी नकेल कसने का इन्तज़ाम है। ताक़ि किसी वजह से अगर सरकार, राज्यसभा में पैदा हो रहे गतिरोध से नहीं उबर सके, तो भी उसे लाचार नहीं होना पड़े। राज्यसभा की बाधाओं को दूर करने के लिए सरकार के पास दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाकर साझा बहुमत से काम को आगे बढ़ाने का विकल्प दिया गया है। ये विकल्प कई बार इस्तेमाल भी हो चुके हैं। राज्यसभा की एक और अहम विशेषता ये है कि वहाँ पेश होने वाले विधेयक अमर होते हैं। जबकि लोकसभा में पेश हुआ विधेयक इसके भंग होते ही मर जाता है। उसे दोबारा पेश करके पुनर्जीवित करना पड़ता है। महिला आरक्षण विधेयक आज भी राज्यसभा में लम्बित है।

बीजेपी की वेदना यही है कि लोकसभा का भारी बहुमत जहाँ उसे निरंकुश बनाता है, वहीं राज्यसभा का अल्पमत उनकी सरकार पर अंकुश लगाता है। उसे ये अंकुश राजनीतिक अड़ंगेबाज़ी लग सकती है। संविधान निर्माताओं को भी इसका आभास था। इसीलिए उन्होंने सरकार से सबको साथ लेकर चलने का कौशल दिखाने की अपेक्षा रखी है।

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कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया

कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।

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कश्मीर समस्या अब तक इसलिए नहीं सुलझ पाई, क्योंकि हमने इसे हमेशा जमीन के एक टुकड़े की तरह देखा है। हमने कश्मीरियों को कभी भारत का नागरिक माना ही नहीं। दोनों देशों ने कश्मीर को अपने ‘अहं’ का सवाल बना लिया है। आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता, उसकी पैन इस्लामिज्म में कोई दिलचस्पी नहीं है। वह रोजगार और शांति से जीना चाहता है। यह कहना है ‘कश्मीरनामा’ के लेखक अशोक कुमार पांडेय का।

कश्मीर की नब्ज समझने वाले लेखक कहते हैं कि कश्मीरी लोगों को लेकर हमारे अंदर मोहब्बत नहीं, संशय बना हुआ है। वह कहते हैं, “कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया है। मेरा मानना है कि यदि कश्मीर को अपना मानना है, तो वहां के लोगों की परेशानियों को अपनी परेशानियां समझना होगा। जैसे देखिए, अभी कश्मीर का एक लड़का शताब्दी एक्सप्रेस में बिना टिकट यात्रा करते पाया गया और उसे आतंकवादी और पता नहीं क्या-क्या कह दिया गया, यह सोच खत्म करने की जरूरत है।”

अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘कश्मीरनामा’ कश्मीर के भारत में विलय और उसकी परिस्थितियों को बयां करती है। वह कहते हैं, “जब मैं कश्मीर का अध्ययन कर रहा था, तो कश्मीर का मतलब मेरे लिए सिर्फ एक जगह नहीं थी, बल्कि वहां के लोग थे। पिछले कुछ दशकों में कश्मीर का मामला सुलझने की बजाय और उलझ गया है।”

वह कहते हैं कि कश्मीर के लोग परेशान हैं कि उनसे जो वादे किए गए थे, उन्हें निभाया नहीं गया। सारी समस्याओं की जड़ यही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों कश्मीर पर अपना हक जताना चाहते हैं। पांडेय कहते हैं, “अगर आप कानूनी रूप से देखें, तो कश्मीर और हिंदुस्तान के बीच संधि हुई थी, तो इस लिहाज से कश्मीर पर भारत का हक बनता है। लेकिन पाकिस्तान इसे अलग तरह से परिभाषित करता है। दोनों देशों ने इसे अपने अहं का सवाल बना लिया है।”

उन्होंने कहा, “इन सभी उलझनों के बीच में पैन इस्लामिज्म ने प्रवेश किया। पैन इस्लामिज्म के बाद यह पूरा मूवमेंट ही बदल गया। सच्चाई यह है कि आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता। पैन इस्लामिज्म में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। वह चैन की जिंदगी गुजर-बसर करना चाहता है। वह चाहता है कि कश्मीर में तैनात सुरक्षाबलों की संख्या में घटाई जाए। नौकरियां दी जाएं और वह हिंदुस्तान में शांति से रह सके।”

अशोक पांडेय की इस किताब का आज प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले में औपचारिक लोकार्पण हुआ। किताब के बारे में वह कहते हैं, “इस किताब को पूरा करने में उन्हें चार साल लगे। इनमें से दो साल शोध कार्यो में, जबकि दो साल लेखन में लगे। इस दौरान मैंने 125 किताबों की मदद ली, जिसमें आठ से नौ शोधग्रंथ भी हैं। इस सिलसिले में चार बार कश्मीर जाना हुआ।”

उन्होंने कहा, “यह शोधकार्य था। इसलिए जरूरी था दस्तावेज इकट्ठा करना। इसे लेकर मैंने श्रीनगर विश्वविद्यालय, जम्मू और कश्मीर के शोपियां और कई गांवों की खाक छानी। इंटरनेट से भी काफी मदद ली। कुछ ऐसे लोगों से भी मिला, जो पहले आतंकवादी थे लेकिन अब मुख्यधारा में शामिल हो गए हैं।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर की एक समस्या यह भी है कि यहां कभी जनमत संग्रह नहीं हो पाया और इसके लिए हिंदुस्तान अकेला जिम्मेदार नहीं है, पाकिस्तान भी उतना ही जिम्मेदार है। हमने कश्मीर की समस्या को हिंदू-मुसलमान समस्या में तब्दील कर दिया है। दूसरी बात है कि कश्मीर लोग सिर्फ घूमने जाते हैं। यह सिर्फ पर्यटन तक सिमट गया है, कश्मीरियों से कोई संवाद नहीं है। दोनों के बीच में संवाद बेहद जरूरी है। मैंने किताब के अंत में यही बात लिखी है कि यदि कश्मीर के स्कूली बच्चे अन्य राज्यों में जाएं और वहां के छात्र यहां आएं तो संवाद की स्थिति बेहतर हो सकती है।”

वह कहते हैं, “कश्मीर में जिस तरह का माहौल है, उस पर लेबल चिपकाना बहुत गलत है। हम किसी को देशद्रोही या देशभक्त नहीं कह सकते। कश्मीर के साथ दिक्कत यही है कि वहां उद्योग-कारखाने नहीं हैं, लोगों के पास नौकरियां नहीं हैं, कहीं विकास नहीं है और ऊपर से कश्मीरियों का अपमान अलग से। मेरे लिए विकास का सीधा मतलब है कि लोगों को रोजगार मिले। लोगों को पढ़ने का मौका मिले।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर के मसले पर सभी सरकारों ने कोई न कोई गलती की है। इंदिरा गांधी की अपनी गलतियां थीं, राजीव गांधी की अपनी और वाजपेयी जी के समय में कुछ काम जरूर हुआ, लेकिन वो कहीं पहुंच नहीं पाया। उसके बाद की सरकार की अपनी गलतियां और इस सरकार की अपनी गलतियां हैं। दिक्कत यही है कि कश्मीर को हमने कभी अपना नहीं समझा। हम सिर्फ यह मान बैठे हैं कि यह एक ऐसा इलाका है, जिस पर हमें कब्जा रखना है। इस मानसिकता को खत्म करना होगा। “

वह कहते हैं कि देश में हर जगह बवाल हो रहा है, हरियाणा में आरक्षण को लेकर कितनी हिंसा हुई। बिहार में जमकर बवाल हुआ। दलितों को छोटी सी बातों पर उन्हें मार दिया जाता है, खाप पंचायतों की करनी किसी से छिपी हुई न हीं है, लेकिन वे देशविरोधी नहीं कहलाते। वहीं, जब बात कश्मीर की आती है तो बलवा करने वाले को फौरन देशद्रोही बता दिया जाता है। हम कश्मीर को गैर मानकर चलते हैं। वे नाराज हैं और अपनी बात कहते हैं तो समझा जाता है कि वे पाकिस्तान का समर्थन कर रहे हैं। यही मानसिकता उन्हें एक दिन पाकिस्तान के पक्ष में धकेल देगी।

पांडेय कहते हैं, “नरेंद्र मोदी जब गुजरात में भाजपा के महासचिव थे तो उन्होंने कहा था कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए तीन ‘डी’ सूत्र जरूरी है- डेवलपमेंट, डेमोक्रेसी और डायलॉग और जब ये तीनों असफल रहें तो चौथे डी ‘डिफेंस’ का प्रयोग करना चाहिए, लेकिन दिक्कत यह है कि कश्मीर में अक्सर चौथा डी पहले प्रयोग में लाया जाता है। अगर पहले तीनों डी का सही तरीके से उपयोग किया जाए, थोड़ा धीरज रखा जाए, सेना को नियंत्रण में रखा जाए और लोगों का विश्वास जीता जाए तो एक दशक में ही कश्मीर में काफी हद तक आतंकवाद खत्म हो जाएगा।”

वह आगे कहते हैं, “कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।”

By : रीतू तोमर

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‘स्लोगन बाबा’ ने गंगा प्रेमियों को भी ठगा : राजेंद्र सिंह

गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।

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लगभग पौने चार वर्षो में केंद्र सरकार गंगा नदी की अविरलता और इसे प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कोई सार्थक काम कर पाने में नाकाम रही। इससे गंगा प्रेमी नाराज हैं। दुनिया में ‘जलपुरुष’ के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह का तो यहां तक कहना है कि ‘स्लोगन बाबा (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) ने गंगा प्रेमियों को भी ठगने में कसर नहीं छोड़ी है।’

स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह ने आईएएनएस से फोन पर चर्चा के दौरान कहा, “वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जब केंद्र में नई सरकार आई थी, तो इस बात की आस बंधी थी कि गंगा नदी का रूप व स्वरूप बदलेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने कहा था- ‘गंगा मां ने मुझे बुलाया है।’ उनकी इस बात पर प्रो. जी.डी. गुप्ता, नदी प्रेमी और संत समाज शांत होकर बैठ गया था, बीते पौने चार साल के कार्यकाल को देखें तो पता चलता है कि केंद्र सरकार ने अपने उन वादों को ही भुला दिया है, जो चुनाव के दौरान किए गए थे, अब तो सरकार गंगा माई का नाम ही नहीं लेती।”

Image result for स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह

Waterman India Rajendra Singh

बीते पौने चार वर्ष तक गंगा प्रेमियों के किसी तरह की आवाज न उठाने के सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “सभी गंगा प्रेमियों को इस बात का भरोसा था कि नई सरकार वही करेगी, जो उसने चुनाव से पहले कहा था। मगर वैसा कुछ नहीं हुआ। तीन साल तक इंतजार किया, अब गंगा प्रेमियों में बेचैनी है, क्योंकि जो वादा किया गया था, उसके ठीक उलट हो रहा है।”

उन्होंने कहा, “गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।”

‘जलपुरुष’ ने याद दिलाया कि वर्तमान सरकार ने नोटीफिकेशन कर गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया था, मगर गंगा को वैसा सम्मान नहीं मिला, जैसा प्रोटोकॉल के तहत मिलना चाहिए था। गंगा को वही सम्मान दिया जाए, जो राष्ट्रंीय ध्वज को दिया जाता है।

सरकार आखिर गंगा की अविरलता के लिए काम क्यों नहीं कर रही? इस सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “उन्हें लगता है कि गंगा माई की सफाई में कोई कमाई नहीं हो सकती, इसलिए उस काम को किया ही न जाए। ऐसा सरकार से जुड़े लोगों ने सोचा। छोटे-छोटे काम भी अपने दल से जुड़े लोगों को ही दिया गया है।”

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अपनी मांगों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “रिवर और सीवर को अलग-अलग किया जाए, हिमालय से गंगासागर तक गंगा को साफ किया जाए, गंगा के दोनों ओर की जमीन का संरक्षण हो, न कि विकास के नाम पर उद्योगपतियों को सौंपने की साजिश रची जाए।”

राजेंद्र सिंह का आरोप है, “कुछ पाखंडी गुरुओं ने नदियों की जमीन पर पौधरोपण करने के नाम पर सरकारों से जमीन और पैसे पाने के लिए सहमतिपत्र तैयार किए हैं। यह संकट पुराने संकट से बड़ा है, क्योंकि इसमें किसानी की जमीन बड़े औद्योगिक घरानों को दिलाने का षड्यंत्र नजर आता है। इस षड्यंत्र के बारे में भी गंगा के किसानों को बताना जरूरी है। इस सब संकटों के समाधान के लिए गंगा प्रेमी एक साथ बैठकर चर्चा करने की तैयारी में हैं।”

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लोकतांत्रिक देश में पार्टियां प्राइवेट लिमिटेड!

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Indian Politics

इसमें कोई शक नहीं कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, जिस पर गर्व भी है। सच्चाई भी है कि सरकार केंद्र या राज्य कहीं भी हो, पार्टियों के अंदर का लोकतंत्र दूर-दूर तक गायब है। विडंबना, कुटिलता या एकाधिकारवादी प्रवृत्ति, कुछ भी कहें, भारत में शुरू से ही राजनीतिक पार्टियां व्यक्ति के आसरे या प्रभाव से ही प्रभावित रही हैं।

फिलहाल ‘आप’ में भी इसी बात को लेकर घमासान मचा है, तो नया क्या है? रिवाज सरीखे तमाम पार्टियां ‘आम’ आदमी से ‘खास’ बन जाती हैं। गर्व कीजिए कि सरकारें तो लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई होती हैं! ऐसे में ‘आप’ पर ही तोहमत क्यों?

दरअसल, राजनीति शह-मात का खेल है। नकेल जिसके हाथ है, पार्टी उसके नाम है। पुराने दौर से अब तक कमोवेश यही सिलसिला जारी है। ऐसी विविधता दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, यानी भारत में ही दिखती है। खुश होइए कि लोकतंत्र जिंदाबाद है।

अहम यह कि पार्टियों के भीतर लोकतंत्र रहा ही कब? गांधीजी ने कांग्रेस के लिए देशभर में सदस्य बनाए। जिले तक को तवज्जो दी। सम्मेलनों में अध्यक्ष चुनने की शुरुआत हुई। लेकिन तब भी गांधीजी की पसंद खास होती थी। वर्ष 1937 को देखिए, पहला चर्चित चुनाव हुआ, तब सरदार पटेल संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष थे, लेकिन उम्मीदवारों का चयन पूरी तरह से केंद्रीकृत रहा। कुछ लोकतंत्र बचा रहा, जिसे बाद में इंदिराजी ने खत्म कर दिया। अब अमूमन सारी पार्टियां यही व्यवहार कर रही हैं। एक-एक सीट आलाकमान से तय होती है।

प्रदेश, जिला, नगर, यहां तक कि वार्ड की अहमियत नकारा है। सुप्रीमो पद्धति जन्मी और पार्टियां एक तरह से प्राइवेट लिमिटेड बनती चली गईं। राजनैतिक अनुभव या समाजसेवा से इतर फिल्मी स्टारों ने भी बहती गंगा में गोते लगाए। दर्जनों स्टार देखते-देखते बड़े नेता बन गए, वहीं कई मुख्यमंत्री तक हुए। भला रिटायर्ड या इस्तीफा दिए नौकरशाह या सैन्य अधिकारी क्यों पीछे रहते? भारत की राजनीति सरकारी पदों की अहमियत को भुनाने का मौका जो देती है।

अभी तो आम आदमी पार्टी की बात है, धारा का रुख देख भ्रष्टाचार विरोधी गोते लगाए गए। समाज-सेवक से लेकर नौकरशाह, कवि से लेकर पत्रकार, सभी ने बहती बयार को समझा और एक आंदोलन उपजाया। भारतीय इतिहास में जितनी तेजी से इस पार्टी ने झंडा गाड़ा, यकीनन जात-पात, अगड़े-पिछड़े और फिल्मी लोकप्रियता के नाम की राजनीति भी पीछे हो गई।

आम आदमी की पार्टी कहां से चली और धीरे-धीरे कहां पहुंच गई, सबको दिख रहा है। जब बारी लोकतंत्र में आहूति देने की आई, तो उच्च सदन के खास यजमान एकाएक अवतरित हुए! कहने की जरूरत नहीं कि लोकतंत्र में मतदाता केवल एक वोट बनकर रह गया है, जिसकी अहमियत चंद सेकेंड में बटन दबाने से ज्यादा कुछ नहीं। बाद में उसकी क्या पूछ परख है, खुली किताब है।

दूसरी पार्टियां ‘आप’ के घमासान पर विलाप करें या प्रलाप, लेकिन जब बात उनकी होती है तो लोकतंत्र की दुहाई देते नहीं अघाते। पार्टी कुछ नहीं होती, होते हैं उनको चलाने वाले ही बलशाली और महारथी।

अब मोदी-शाह के कमल की बहार हो, राहुल की कांग्रेस का हाथ हो, केजरीवाल के आप की झाड़ू, अखिलेश-मुलायम की साइकिल, मायावती का हाथी, ममता के दो फूल, लालू का लालटेन, उद्धव का तीर कमान, राज ठाकरे का रेल इंजन, अभिनेत्री जयललिता के बाद पनीर सेल्वम-पलनीस्वामी की दो पत्तियां, करुणानिधि का उगता सूरज, शरद पवार की घड़ी, बीजू जनता दल का शंख, कभी जॉर्ज फर्नांडीज तो अब नीतीश के जद (यू) का तीर, अभिनेता एनटी रामाराव के बाद चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी की साइिकल। हाल-फिलहाल रजनीकांत की दहाड़। इनके अलावा देश में न जाने कितने क्षत्रप और उनकी पार्टियां हैं, सच्चाई सबको पता है।

दलों का दलदल हो या हमाम, बस नजर का पर्दा ही है, जिसमें सब कुछ दिखकर भी कुछ नहीं दिखता। यही भारतीय लोकतंत्र है। अब इसे खूबी कहें या दाग, पार्टी तो चलाते हैं केवल सरताज। ऐसे में आम आदमी की क्या हैसियत? जो अंदर है, वह बाहर दिखता जरूर है। अब इस पर चीत्कार करें या आर्तनाद, कोई फर्क नहीं पड़ता।

कहने को कुछ भी कह लें, लेकिन हकीकत यही है कि कम से कम भारतीय राजनीति की यही सुंदरता है, उसका कलेवर हाड़-मांस का तो नहीं, कांच का भी नहीं, लेकिन फिर भी इतना कुछ पारदर्शी है कि सब कुछ दिखता है। इसे मत-मतांतर का फेर, सपनों की सौदागीरी, शब्दों की बाजीगरी कुछ भी कह लें।

लेकिन जानते, देखते और समझते हुए भी दलदल में हर बार हमारा वोट गोता खाकर रह जाता है और हम कहते हैं कि ‘अबकी बार हमारी सरकार।’ इतना कहना ही क्या कम है? तो आइए, एक बार फिर से कहें ‘लोकतंत्र जिंदाबाद’।

By : ऋतुपर्ण दवे

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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