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क्यों राज्यसभा का बहुमत अब भी नरेन्द्र मोदी की मुट्ठी से बाहर ही रहेगा…!

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नरेन्द्र मोदी को ये कसक रहेगी ही कि 2019 तक भी राज्यसभा का बहुमत उनसे दूर ही रहेगा। हालाँकि, ताज़ा नतीज़ों से बीजेपी की राज्यसभा में 10 सीटें बढ़ जाएँगी। एक सीट इसी जुलाई में और बाक़ी नौ अगले साल अप्रैल में। इसके अलावा मई 2018 में एनडीए की झोली में झारखंड से भी 2 और सीटें आ जाएँगी। इस तरह, 2019 के लोकसभा चुनाव तक एनडीए की ताक़त ज़्यादा से ज़्यादा 82 सांसदों तक ही पहुँच पाएगी। जबकि विरोधी यूपीए के खेमे में तब भी 87 सांसद रहेंगे।

किसी भी पार्टी या नेता को अपार बहुमत से पैदा होने वाले अहंकार और निरंकुशता से बचाने के लिए की संविधान निर्माताओं ने राज्यसभा को शानदार विशेषताओं वाला उच्च और स्थायी सदन बनाया है। ऐसा भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विशेषता क्षेत्राधिकार (Separation of Power) के सिद्धान्त की वजह से है जिससे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की स्वतंत्रता तय हुई है। ये बातें इसलिए भी समझना बहुत ज़रूरी है क्योंकि देश में बड़े पैमाने पर ये दुष्प्रचार फैलाया जाता रहा है कि लोकसभा में बहुमत के बावजूद मोदी सरकार के हाथ बँधे हुए हैं क्योंकि राज्यसभा उसकी मुट्ठी में नहीं है। दरअसल, राज्यसभा का चरित्र ही ऐसा है कि 2014 से लेकर 2019 तक होने वाले सभी विधानसभा चुनावों को भी यदि बीजेपी जीतती रहती तो भी मोदी सरकार के मौजूदा कार्यकाल के दौरान राज्यसभा कभी उसकी गिरफ़्त में नहीं आ पाता।

इस साल, जुलाई और अगस्त में राज्यसभा की 10 सीटें खाली होंगी। इसमें से बंगाल की 6 (तृणमूल-5, सीपीएम-1), गोवा की 1 (काँग्रेस) और गुजरात की 3 (बीजेपी-2, काँग्रेस-1) सीटें हैं। लेकिन बीजेपी को सिर्फ़ गोवा की सीट का फ़ायदा होगा। बंगाल और गुजरात यथावत रहेंगे। अगले साल जनवरी 2018 में काँग्रेसी खेमे वाली दिल्ली की 3 सीटें खाली होंगी, जो आम आदमी पार्टी को मिलेंगी। फरवरी 2018 में खाली होने वाली सिक्किम की इकलौती सीट बीजेपी की सहयोगी सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के पास ही रहेगी।

अगस्त 2018 में राज्यसभा की 58 सीटें खाली होंगी। इसमें से मनोनयन वाली 3 सीटों को छोड़कर 55 पर चुनाव होगा। इसमें उत्तर प्रदेश की 10 और उत्तराखंड की 1 सीट होगी। इनमें से अभी सपा-6, बीएसपी और काँग्रेस 2-2 और बीजेपी के पास 1 सीट है। लेकिन 11 मार्च को दिखी मोदी लहर की वजह से इन 11 में से 10 सीटें (गोवा-1, उत्तराखंड-1, यूपी-8) बीजेपी की हो जाएँगी। इस तरह उसे 9 सीटों का फ़ायदा होगा, क्योंकि एक सीट उसके पास पहले से ही थी।

बाक़ी 44 सीटों में से गुजरात, कर्नाटक और हिमाचल की 9 सीटें ऐसी हैं जो अभी बीजेपी के पास हैं। लिहाज़ा, इन राज्यों के आगामी चुनाव से भी बीजेपी की राज्यसभा में ताक़त बढ़ नहीं सकती। अन्य 35 सीटों (बिहार और महाराष्ट्र 6-6, मध्य प्रदेश और बंगाल 5-5, तेलंगाना, राजस्थान और आन्ध्र प्रदेश 3-3, ओड़ीशा की 2, छत्तीसगढ़ और हरियाणा की 1-1) पर मौजूदा पार्टियाँ यथावत रहेंगी। अलबत्ता, मई 2018 में झारखंड से खाली होने वाली 2 सीटें बीजेपी की झोली में जाएँगी। जबकि जुलाई में खाली होने वाली केरल की 3 सीटों में से कोई भी बीजेपी नहीं जीत सकेगी।

कुलमिलाकर, मोदी सरकार के बाक़ी बचे कार्यकाल में एनडीए को राज्यसभा में ज़्यादा से ज़्यादा 12 सीटों का इज़ाफ़ा होगा। जबकि काँग्रेस को 4 (गोवा, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड की 1-1), समाजवादी पार्टी को 5 और बीएसपी को 2 सीटों का नुकसान होगा। फ़िलहाल काँग्रेस और साथी दलों के कुल 96 (काँग्रेस-60, एसपी-19, जेडीयू-10, डीएमके-4, आरजेडी-3) सांसद हैं। जबकि एनडीए के खेमे की तादाद 70 (बीजेपी-56, टीडीपी-6, अकाली दल-3, शिवसेना-3) है, जो साल 2019 तक ज़्यादा से ज़्यादा 82 तक ही पहुँच सकती है। ये संख्या तब भी बहुमत से दूर ही रहेगी।

राज्यसभा का मुख्य संवैधानिक दायित्व है कि वो लोकसभा में बहुमत पाकर या जुटाकर बैठी सरकार को इतराने या तानाशाही करने से रोक सके। रोक-टोक का सारा फ़ार्मूला ही राज्यसभा की विशेषता और गरिमा को सुनिश्चित करता है। सत्ता पक्ष को भी राज्यसभा में बहुमत पाने और बनाने के लिए काफ़ी मशक्कत और इन्तज़ार करना पड़ता है। राज्यसभा में सत्तापक्ष का बहुमत तभी होगा, जब ज़्यादातर और बड़े राज्यों में उसकी सरकारें होंगी और वो भी लम्बे अरसे से!

ज़रा इसे एक उदाहरण से भी समझते चलें। दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल के पास 67 विधायक हैं। लेकिन राज्यसभा में उनका कोई सदस्य नहीं है। हालाँकि, राज्यसभा में दिल्ली की तीन सीटें हैं। तीनों काँग्रेस के पास हैं। तीनों का कार्यकाल 27 जनवरी 2018 तक है। यानी, राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के सदस्य इसके बाद ही होंगे। और, जो भी बनेंगे वो जनवरी 2024 तक राज्यसभा में रहेंगे। भले ही इस दौरान दिल्ली में किसी और पार्टी की सरकार आ जाए। इसी वजह से यदि किसी राज्य में किसी पार्टी की लुटिया डूब जाती है तो भी राज्यसभा में फ़ौरन उसका असर ख़त्म नहीं होता। दूसरी तरफ, कोई पार्टी अगर विधानसभा चुनाव में सरताज भी बन जाए तो फ़ौरन उसका दख़ल राज्यसभा में बढ़ नहीं सकता। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि राज्यसभा में किसी पार्टी का दबदबा न तो आनन-फानन में बनता है और न बिगड़ता है। यही वजह है कि लोकसभा में सत्ता बदलने के बावजूद मौजूदा सरकार वहाँ अल्पमत में है और पाँच साल तक उसे अल्पमत ही झेलना होगा।

राज्यसभा को तमाम खूबियों से संवारने वाले संविधान निर्माताओं ने इस शंका का निवारण कर रखा है कि कहीं राज्यसभा में विपक्ष की धौंस सरकार के लिए बेड़ियाँ न बन जाएँ। कोई अराजकता न पैदा हो इसीलिए राज्यसभा पर भी नकेल कसने का इन्तज़ाम है। ताक़ि किसी वजह से अगर सरकार, राज्यसभा में पैदा हो रहे गतिरोध से नहीं उबर सके, तो भी उसे लाचार नहीं होना पड़े। राज्यसभा की बाधाओं को दूर करने के लिए सरकार के पास दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाकर साझा बहुमत से काम को आगे बढ़ाने का विकल्प दिया गया है। ये विकल्प कई बार इस्तेमाल भी हो चुके हैं। राज्यसभा की एक और अहम विशेषता ये है कि वहाँ पेश होने वाले विधेयक अमर होते हैं। जबकि लोकसभा में पेश हुआ विधेयक इसके भंग होते ही मर जाता है। उसे दोबारा पेश करके पुनर्जीवित करना पड़ता है। महिला आरक्षण विधेयक आज भी राज्यसभा में लम्बित है।

बीजेपी की वेदना यही है कि लोकसभा का भारी बहुमत जहाँ उसे निरंकुश बनाता है, वहीं राज्यसभा का अल्पमत उनकी सरकार पर अंकुश लगाता है। उसे ये अंकुश राजनीतिक अड़ंगेबाज़ी लग सकती है। संविधान निर्माताओं को भी इसका आभास था। इसीलिए उन्होंने सरकार से सबको साथ लेकर चलने का कौशल दिखाने की अपेक्षा रखी है।

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