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राजनीति

कर्नाटक में बोले राहुल- बिना परीक्षा के लागू किया गया GST, कांग्रेस लाएगी सुधार

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Rahul Gandhi
राहुल गांधी

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर निशाना साधा है। राहुल ने व्यापारियों को भरोसा दिलाया कि कांग्रेस अगर 2019 में सत्ता में वापसी करती है, तो बेहद जटिल जीएसटी कानून में सुधार करेंगे।

उन्होंने कहा कि अभी जीएसटी दरें बेहद ऊंची हैं। हम टैक्स स्लैब को नीचे लाएंगे। राहुल ने इसके साथ ही आरोप लगाया कि नोटबंदी भी रिजर्व बैंक (आरबीआई) नहीं, बल्कि आरएसएस का फैसला था।

राहुल गांधी ने मोदी सरकार और आरएसएस पर एक बार फिर हमला बोला है। राहुल ने आरोप लगाया कि यह सरकार आरएसएस चला रही है और उसने हर मंत्रालय और विभाग में अपने लोग बिठा रखा है।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले चार दिनों की अपनी यात्रा के आखिरी चरण में राहुल ने बिजनेस लीडर्स और प्रोफेसनल्स से बातचीत में कहा कि आरएसएस सरकार चल रही है। उसने अपने लोग हर जगह बिठा रखे हैं। यहां तक मंत्रालयों में सचिव की नियुक्ति भी आरएसएस ही करती है।

राहुल ने आरोप लगाया कि नीति आयोग तक में आरएसएस के लोग हैं। उन्होंने कहा कि ये संस्थान किसी पार्टी या विचारधारा से जुड़ी नहीं होतीं, लेकिन आरएसएस सभी जगह अपने लोग प्लांट कर रखे हैं। भारत की विदेश नीति की भी इस कारण दुर्गती हुई है। चीन हमारे सभी पड़ोसी सार्क देशों पर धाक जमा चुका है और भारत अलग-थलग पड़ चुका है।

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राजनीति

पूर्व बीजेपी नेता मानवेंद्र सिंह कांग्रेस में शामिल

सिंह ने बीते 22 सितंबर को बाड़मेर में रैली कर बीजेपी छोड़ने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि ‘कमल का फूल, हमारी भूल’ रही।

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Manvendra Singh

पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र सिंह बुधवार को कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। शामिल होने के बाद मानवेंद्र सिंह ने कहा कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी से मैने सुबह मुलाकात की और उन्होंने मेरा पार्टी में स्वागत किया। मुझे उम्मीद है की मेरे समर्थक मेरा हमेशा समर्थन करेंगे।

बाड़मेर जिले की शिव विधानसभा सीट से विधायक मानवेंद्र सिंह ने बीते 22 सितंबर को बाड़मेर में रैली कर बीजेपी छोड़ने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि ‘कमल का फूल, हमारी भूल’ रही। वहीं उनकी पत्नी चित्रा सिंह ने सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया था।

गौरतलब है कि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने जसवंत सिंह को टिकट नहीं दिया था। इससे उनको निर्दलीय ही चुनाव लड़ना पड़ा था। उस चुनाव में जसवंत सिंह हार गए थे। उसी समय से जसवंत सिंह का परिवार बीजेपी से खासा नाराज है।

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ब्लॉग

गोवा में एक बार फिर राजनीति का सबसे घिनौना चेहरा सामने है!

बीजेपी को पता है कि जैसे लक्ष्मी की कृपा बदौलत उसने चौथी बार मनोहर पर्रिकर को गोवा का मुख्यमंत्री बनाया था, वैसे ही लक्ष्मी की कृपा से पर्रिकर सरकार को जीवनदान भी दिया जा सकता है। लक्ष्मी की इसी कृपा ने बीजेपी को नरभक्षी बना दिया है!

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Modi Shah

आमतौर पर राजनीति को सम्भावनाओं का खेल कहा जाता है। कभी जोड़-तोड़ और मौकापरस्ती, राजनीति का सहज-धर्म हुआ करता था। लेकिन मोदी राज में राजनीति का बेहद चेहरा वीभत्स हो चुका है। अब राजनीति जोड़-तोड़ से बहुत आगे निकलकर ख़रीद-फ़रोख़्त के गोरखधन्धे में तब्दील हो चुकी है। क्योंकि अब भारतीय राजनीति में नैतिकता, मूल्य, सिद्धान्त, विचारधारा और लोकलाज़ जैसे बुनियादी तत्व नदारद हो चुके हैं। लोकतंत्र की सेहत के लिए ये बेहद घातक दौर है। मार्च 2017 के बाद से, गोवा इसी दलदल में फँसा हुआ है।

अब गोवा में काँग्रेस के दो और विधायक दयानन्द सोपते और सुभाष शिरोडकर अपनी राजनीतिक निष्ठा का सौदा करके बीजेपी के ख़ेमे में जा पहुँचे हैं। इनसे पहले, विश्वजीत राणे ने भी काँग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतने के फ़ौरन बाद इसलिए पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया था, ताकि राज्य की 40 में से 13 सीटें जीतने वाली बीजेपी, सरकार बना सके, सत्ता हथिया सके! तब भी, बीजेपी के धन-बल ने काँग्रेस को मिले जनादेश को पटखनी दी थी, और अब भी, विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त का गोरखधन्धा इसलिए आसानी से परवान चढ़ गया, क्योंकि बीजेपी को किसी भी क़ीमत पर गोवा में अपनी सरकार बचानी है।

बीजेपी को पता है कि जैसे लक्ष्मी की कृपा बदौलत उसने चौथी बार मनोहर पर्रिकर को गोवा का मुख्यमंत्री बनाया था, वैसे ही लक्ष्मी की कृपा से पर्रिकर सरकार को जीवनदान भी दिया जा सकता है। लक्ष्मी की इसी कृपा ने बीजेपी को नरभक्षी बना दिया है! उसके मुँह में विधायकों का ख़ून लग चुका है! सिर्फ़ गोवा में ही नहीं बल्कि पूर्वोत्तर के कई राज्यों में भी। इसीलिए, फरवरी से गम्भीर रूप से बीमार चल रहे मनोहर पर्रिकर की जगह न तो पार्टी ने नया मुख्यमंत्री चुना, ना काँग्रेस की माँग के मुताबिक उसकी सरकार बनवायी और ना ही विधानसभा में शक्ति-परीक्षण होने दिया, क्योंकि बीजेपी को अच्छी तरह से पता है कि विधानसभा के शक्ति परीक्षण में उसकी सरकार गिर जाती।

दरअसल, फरवरी 2017 में हुए गोवा के विधानसभा चुनाव में काँग्रेस 40 में से 17 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी। बीजेपी को 13 सीटें मिली थीं। तीन-तीन सीटें क्षेत्रीय दलों, महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी और गोवा फ़ारवर्ड को मिली। एक सीट एनसीपी के ख़ाते में गयी और तीन निर्दलीयों ने मैदान मारा। इसके बाद विधायकों के ख़रीद-फ़रोख़्त की मंडी सजी। इसमें काँग्रेस अपना दमख़म दिखाने में विफल रही। उसे एनसीपी के स्वाभाविक समर्थन का यक़ीन था, तो गोवा फ़ॉरवर्ड ने भी समर्थन का भरोसा दिलाया था। लेकिन काँग्रेस ने सौदा पटाने में देर कर दी। वो ज़बरदस्त गुटबाज़ी की वजह से अपने विधायक दल का नेता यानी मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी वक़्त रहते नहीं चुन सकी। इसीलिए राज्यपाल मृदुला सिन्हा के पास जाकर सरकार बनाने का दावा पेश करने में भी देरी हुई।

उधर, बीजेपी ने इस मौके का भरपूर फ़ायदा उठाया। उसने विधायकों की बोली लगाने की ज़िम्मा नितिन गडकरी को सौंपा, जिन्होंने दनादन एनसीपी, निर्दलीयों और गोवा फ़ॉरवर्ड के विधायक और ‘फ़िक्सर’ विजय सरदेसाई से सौदा पटा लिया। इतना ही नहीं, काँग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री रहे प्रताप सिंह राणे के बेटे और काँग्रेस के टिकट पर निर्वाचित विश्वजीत राणे की पारिवारिक निष्ठा का भी सौदा कर लिया। राणे ने तो शक्ति परीक्षण से पहले ही काँग्रेस से इस्तीफ़ा दे दिया। सौदेबाज़ी कितनी जानदार रही होगी, इसका जायज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस वक़्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी फ़्राँस में राफ़ेल सौदा करने गये थे और रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर गोवा में सब्ज़ी ख़रीद रहे थे, इसकी तस्वीर विजय सरदेसाई ने ही सोशल मीडिया पर डाली थी!

ख़ैर, पर्रिकर और गडकरी की थैलियों ने भरपूर रंग दिखाया। फ़्लोर टेस्ट में पर्रिकर सरकार को 24 वोट मिले। जबकि काँग्रेस 16 सीटों पर आ गयी। इसी वक़्त विश्वजीत राणे की सीट खाली हो गयी तथा बीजेपी ख़ेमे की संख्या 23 हो गयी और सदन की संख्या 39 हो गयी। पर्रिकर सरकार में गोवा फ़ॉरवर्ड के तीनों विधायक समेत आठ विधायक मंत्री बने। तब पर्दे के पीछे से विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त वाली मंडी का सारा इन्तज़ाम संवैधानिक अम्पायर और राज्यपाल मृदुला सिन्हा के हवाले था। उन्होंने अपनी पार्टी के इशारे पर कम सीटें जीतने वाली बीजेपी की सरकार बनवा दी। सबसे बड़े दल काँग्रेस को मौक़ा देने की परम्पराओं की धज़्ज़ियाँ उड़ा दी गयीं। लेकिन इसी दिन के लिए ही तो रीढ़-विहीन और लोकलाज़-रहित मृदुला सिन्हा को राज्यपाल बनाया था!

वक़्त का पहिया घूमा। ईश्वर ने बेईमानी से सत्ता हथियाने वाले पर्रिकर को उनके कर्मों का फल देने की ठानी। मुख्यमंत्री बनने के साल भर के भीतर ही, यानी फरवरी 2018 आते-आते, 62 वर्षीय पर्रिकर को पैंक्रियाज यानी पित्ताशय के कैंसर ने जकड़ लिया। इसी वक़्त, पर्रिकर के तीन और मंत्रियों की सेहत धोखा देने लगी। आलम ये हुआ कि जुलाई 2018 में विधानसभा के मॉनसून सत्र के वक़्त बिजली मंत्री पांडुरंग मडकैकर, शहरी विकास मंत्री फ़्रॉन्सिस डिसूज़ा और परिवहन मंत्री रामकृष्ण उर्फ़ सुदिन धवालिकर, सदन में मौजूद रहने की दशा में नहीं थे। पांडुरंग, ब्रेन-स्ट्रोक से जूझ रहे हैं तो डिसूज़ा भी कैंसर पीड़ित हैं। पर्रिकर की तरह इनकी सेहत भी तेज़ी से जबाब दे रही है। इसीलिए, सितम्बर में बीजेपी में नया मुख्यमंत्री ढूँढ़ने को लेकर ख़ासी सरगर्मी रही। लेकिन कोई उपयुक्त चेहरा नहीं मिला।

अब बीजेपी को साफ़ दिख रहा था कि उसकी सरकार अल्पमत में आ चुकी है। इसीलिए काँग्रेस की माँग के मुताबिक़, राज्यपाल मृदुला सिन्हा न तो शक्ति-परीक्षण के लिए राज़ी हुईं और ना ही राष्ट्रपति शासन के लिए। वैसे, मृदुला सिन्हा कोई इकलौती राज्यपाल नहीं हैं, जिन्हें बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का ही हुक़्म बजाना पड़ता है। आलम ये है कि यदि उन्होंने अपने दिमाग़ का इस्तेमाल कर लिया तो उन्हें भी मार्गदर्शक मंडल में ठेल दिया जाएगा! मृदुला ऐसी कोई अकेली राज्यपाल नहीं हैं। हरेक का यही हाल है। पूरे कुएँ में ही भाँग घुली पड़ी है!

यहाँ, बहस हो सकती है कि क्या काँग्रेस के ज़माने में ऐसा नहीं होता था? क्या तब राज्यपाल, केन्द्र सरकार के एजेंट नहीं हुआ करते थे? बेशक़, हुआ करते थे। लेकिन संविधान की धज़्ज़ियाँ उड़ाने और सत्ता के अहंकार में नंगा-नाच करने की ऐसी प्रवृत्ति तब नहीं थी। पर्दे के पीछे सब होता था, लेकिन मोदी राज जैसा ख़ुल्लमख़ुल्ला और ‘डंके की चोट पर’ वाली माहौल काँग्रेसियों की फ़ितरत में नहीं था। इसीलिए तब जो लोग काँग्रेस को पतित, भ्रष्ट और बेईमान होने का सर्टिफ़िकेट देते हुए अपने चाल-चरित्र-चेहरे की दुहाई देते फ़िरते थे, क्या वो भी सत्ता की ख़ातिर इतने पतित हो जाएँगे कि बेचारी ‘भारत से मुक्त हो चुकी काँग्रेस’ को भी शर्म आ जाए!

बहरहाल, अब काँग्रेस के दो और विधायकों के ‘बिक जाने’ के बाद भी गोवा विधानसभा में चार सीटें खाली हैं। काँग्रेस की तीन और बीजेपी की एक। अब सदन में बीजेपी के 12 विधायक हैं, तो काँग्रेस की संख्या 14 पर जा पहुँची है। बीजेपी को 10 विधायकों का समर्थन हासिल है। लेकिन मुख्यमंत्री समेत चार मंत्रियों का वोट अधरझूल में है। चार में से तीन बीजेपी के हैं तो सुदिन धवालिकर, महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के नेता हैं। इस तरह, आशंका है कि कहीं शक्ति परीक्षण के वक़्त सत्ता पक्ष का दायरा 18 पर ही ना अटक जाए!

ऐसे में यदि काँग्रेस के दो विधायक नहीं बिकते तो 38 लोगों के सदन में 20 की आँकड़ा हासिल करना मुश्किल हो जाता। लिहाज़ा, बीजेपी के शूरमाओं ने साम-दाम-भेद-दंड का नुस्ख़ा अपनाकर विधानसभा की प्रभावी संख्या को ही घटा दिया और काँग्रेस के दो विधायक ख़रीद लिये! भगवा ख़ेमा अभी एकाध और शिकार की फ़िराक़ में है! ताकि आँकड़े आरामदायक बन सकें और बीजेपी ताल ठोंककर कह सके कि काँग्रेस से अपना घर तो सम्भलता नहीं, गोवा क्या सम्भालेंगे! विपक्ष में बैठी पार्टी के पास वैसे भी अपने विधायकों को लालच से बचाने के लिए बहुत कम विकल्प होते हैं। राजनीति का यही सबसे घिनौना चेहरा है! गोवा में ऐसा पहले भी होता रहा है।

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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राजनीति

गोवा कांग्रेस के दो विधायक बीजेपी में शामिल

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गोवा कांग्रेस के दो विधायक बीजेपी में शामिल। (फाइल फोटो)

गोवा में कांग्रेस के दो विधायक भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल हो गये। विधायक दयानंद सोप्ते और सुभाष शिरोडकर ने दिल्‍ली पहुंचकर बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह से मुलाकात कर पार्टी की सदस्‍यता ग्रहण की। इससे पहले दोनों ने कांग्रेस की सदस्‍यता सेे इस्‍तीफा दिया।

गोवा विधानसभा अध्यक्ष प्रमोद सावंत ने कहा, ‘मुझे कांग्रेस के दो विधायकों दयानंद सोपते और सुभाष शिरोडकर का इस्तीफा मिला है। उन्होंने स्वीकार किया है कि वह किसी दबाव में नहीं बल्कि अपनी इच्छा से ऐसा कर रहे हैं। मैंने इस्तीफे मंजूर कर लिए हैं। प्रक्रिया पूरी हो गई है। विधानसभा सदस्यों को इसकी कॉपी भेज दी जाएंगी।’

सावंत ने बताया, ‘दोनों विधायकों के इस्‍तीफे के बाद अब गोवा विधानसभा 38 सदस्‍यीय हो गई है। जिसमें कांग्रेस और बीजेपी के 14-14 विधायक हैं। इसके अलावा गोवा फॉवर्ड पार्टी के 3, एमजीपी के भी 3, एनसीपी का एक और 3 निर्दलीय शामिल हैं। हमने चुनाव आयोग को इस बावत सूचना भेज दी है।’

बता दें पर्रिकर सरकार को अभी भी 23 विधायकों का समर्थन हासिल है।

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