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साड़ी पहन इतिहास रचने वाली शीतल का लक्ष्य अंतरिक्ष

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Shital Rane-Mahajan

थाईलैंड में साड़ी पहनकर 13,000 फीट की ऊंचाई से स्काइडाइविंग करने वाली पहली भारतीय महिला शीतल राणे महाजन भारत सरकार से गुहार लगाकर कहती हैं कि सरकार देश में स्काइडाइविंग को खेल का दर्जा देने में अब देर न करे।

महाराष्ट्र की नौवारी साड़ी पहनकर इतिहास रच चुकीं शीतल का अगला पड़ाव अंतरिक्ष और एवरेस्ट है। वह कहती हैं कि अब मैं अंतरिक्ष और एवरेस्ट से स्काइडाइविंग कर देश का नाम रोशन करना चाहती हूं।

शीतल महिलाओं में स्काइडाइविंग को लेकर जागरूकता फैलाने के मकसद से अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर नौवारी साड़ी में ही स्काइडाइविग करने की इच्छा रखती हैं।

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शीतल ने बैंकॉक से आईएएनएस के साथ साक्षात्कार में अपनी इस उपलब्धि के बारे में कहा, “मैं देश के लिए कुछ अलग करना चाहती थी। मैंने स्काइडाइविंग में 17 राष्ट्रीय रिकॉर्ड और छह विश्व रिकॉर्ड बनाए हैं। मैं स्काइडाइविंग में होने वाली प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के साथ वैश्विक मंच पर भारतीय महिलाओं का परचम लहराना चाहती हूं। मेरा सपना है, मैं दुनिया को बताऊं कि यदि भारतीय महिलाओं को मौका मिले तो वह कुछ भी कर सकती हैं।”

शीतल (35) अपने शुरुआती सफर से रू-ब-रू कराते हुए कहती हैं, “मैंने अपनी पहली स्काइडाइविंग बिना किसी प्रशिक्षण के उत्तरी ध्रुव में की थी, उस वक्त तापमान माइनस 38 डिग्री सेल्सियम था। मैं उत्तरी ध्रुव में बिना किसी प्रशिक्षण के स्काइडाइविंग करने वाली पहली महिला बनी। इसके बाद अंटार्कटिका में स्काइडाइविंग की। मेरे नाम छह विश्व रिकॉर्ड है।”

यह पूछने पर कि साड़ी पहनकर स्काइडाइविंग करने का ख्याल कैसे आया? वह कहती हैं, “मैं मराठी मुलगी हूं। पुणे के लिए, मराठी लोगों के लिए भी कुछ करना चाहती थी। जनवरी के पहले सप्ताह में जब मराठी सप्ताह शुरू हुआ, तब मैंने साड़ी में स्काइडाइविंग करने के बारे में सोचा। सामान्य साड़ियों में जंप करना आसान नहीं होता, इसलिए मैंने नौवारी साड़ी में ऐसा करने का फैसला किया। वजह यह कि इसमें दोनों तरफ प्लेट होती हैं। हालांकि, नौवारी साड़ी में जंप करना जोखिम भरा भी है। साड़ी का पल्लू कभी भी निकलकर पैराशूट में फंस सकता है, लेकिन मैंने सावधानी बरती। साड़ी को पिनअप करने के साथ इसे टेप से भी चिपकाया। इसके बाद 13,000 फीट की ऊंचाई से जंप किया।”

कई अनोखे कीर्तिमान स्थापित कर चुकीं शीतल खुद को लंबी रेस का घोड़ा बताते हुए कहती हैं, “मैं अंतरिक्ष और एवरेस्ट से स्काइडाइविंग करना चाहती हूं। स्काइडाइविंग वल्र्ड चैंपियनशिप 2018 में भारत का प्रतिनिधित्व करने की इच्छा है, लेकिन इसके लिए पहले भारत सरकार को देश में स्काइडाइविंग को खेल का दर्जा देना होगा। सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिलती। मुझे प्रायोजकों की सख्त जरूरत है, क्योंकि हर साल मैं अपनी जेब से चार से पांच लाख रुपये खर्च करती हूं।”

वह कहती हैं, “स्काइडाइविंग को देश में खेल के तौर पर मान्यता नहीं है। मैं चाहती हूं कि भारत सरकार को इसे मान्यता देनी चाहिए। जिस तरह से क्रिकेट का आईपीएल और विश्वकप होता है, ठीक वैसे ही स्काइडाइविंग के भी मैच और विश्वकप होते हैं। भारत में इसे लेकर जानकारी और दिलचस्पी दोनों का अभाव है।”

यूं तो सरकार ने शीतल को उनकी उपलब्धियों के लिए 2011 में देश के चौथे सर्वोच्च सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया है, लेकिन शीतल इतने से खुश नहीं हैं। वह कहती हैं, “मैंने 2017 में सभी सात महाद्वीपों में स्काइडाइविंग कर विश्व रिकॉर्ड बनाया। मैं ऐसा करने वाली पहली महिला हूं, लेकिन सरकार से सराहना का एक शब्द सुनने को नहीं मिला। बुरा लगता है कि पूरी दुनिया आपको सराह रही है, लेकिन आपकी सरकार चुप्पी साधे बैठी है।”

शीतल ने महिला दिवस के लिए अलग तरह की योजना बनाई है। वह इन योजनाओं से वाकिफ कराते हुए कहती हैं, “यदि सरकार मंजूरी दे तो मैं महिला दिवस पर इसी साड़ी में पुणे में स्काइडाइविंग करना चाहूंगी। मैं महिला सांसदों सहित देशभर की महिलाओं को इसका गवाह बनने के लिए आमंत्रित करना चाहूंगी।”

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शीतल कहती हैं, “स्काइडाइविंग नेशनल क्लब ने वल्र्ड गोल्ड मेडल के लिए मेरे नाम की अनुशंसा की थी, लेकिन मेरा नामांकन यह कहकर खारिज कर दिया गया कि मुझे सात महाद्वीपों पर स्काइडाइविंग पूरा करने में 10 साल लगे। हालांकि, मेरे बेहतरीन प्रदर्शन को देखते हुए मुझे एक साल में छह महाद्वीपों पर स्काइडाइविंग करने को कहा गया। इस वजह से मैंने 19 फरवरी, 2016 को इस सफर की शुरुआत की और दक्षिण अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, अंटार्कटिका, यूरोप, आस्ट्रेलिया और अब एशिया में इस चैलेंज को पूरा किया। मैंने 10 फरवरी 2017 को इन महाद्वीपों पर स्काइडाइविंग का चैलेंज पूरा किया।”

शीतल सरकार के अलावा मीडिया के काम करने के रवैए पर सवाल उठाते हुए कहती हैं, “मीडिया को जिम्मेदार ढंग से काम करना चाहिए। यदि कोई भी शख्स किसी भी खेल या अन्य विधा में किसी भी तरह का कीर्तिमान स्थापित कर रहा है, तो मीडिया को उसे तवज्जो देनी चाहिए, तभी बाकियों को भी प्रेरणा मिलेगी। मैंने नौवारी साड़ी पहनकर स्काइडाइविंग की, तो मीडिया को यह दिलचस्प लगा, वरना तो सब ढाक के तीन पात ही थे।”

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नई नौकरियां नहीं पैदा हुई, देश में बढ़ी बेरोजगारी दर

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

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unemployment in India

नई दिल्ली/बेंगलुरू, 16 अक्टूबर | अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र की एक हालिया रिपोर्ट में बेरोजगारी दर के 20 वर्षो में सबसे अधिक होने की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने भारत में बेरोजगारी दर के बढ़ने की वजह नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना और शिक्षित युवाओं के तेजी से श्रमबल में शामिल होने को बताया है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है।”

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

अमित बसोले ने कहा, “देश में बढ़ती बेरोजगारी के पीछे दो कारक हैं, पहला 2013 से 2015 के बीच नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना क्योंकि कुल कार्यबल (नौकरियों में लगे लोगों की संख्या) बढ़ने की बजाय घट गया है। दूसरा कारक यह है कि श्रम बल में प्रवेश करने वाले अधिक शिक्षित युवा, जो उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी, जो पिछले 20 वर्षो में सबसे ज्यादा देखी गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में वृद्धि नहीं हुई है। अध्ययन के मुताबिक, जीडीपी में 10 फीसदी की वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में एक प्रतिशत से भी कम की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में बढ़ती बेरोजगारी को भारत के लिए एक नई समस्या बताया गया है।

इन हालात से निपटने के लिए क्या सरकार ने पर्याप्त कदम उठाए हैं, इस पर अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने बताया, “इन हालात पर सरकार के प्रदर्शन का मूल्यांकन करना थोड़ा मुश्किल है, विशेष रूप से 2015 के बाद क्योंकि उसके बाद से सरकार ने समग्र रोजगार की स्थिति पर कोई डेटा जारी नहीं किया है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग द इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) जैसे निजी स्रोतों के उपलब्ध डेटा से पता चलता है कि नौकरियों का सृजन कमजोर ही बना रहेगा। सीएमआईई डेटा यह भी इंगित करता है कि नोटबंदी के परिणामस्वरूप नौकरियों में कमी आई है, सरकार ने इस पर भी कोई डेटा जारी नहीं किया है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2018 की रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में अंडर एंप्लॉयमेंट और कम मजदूरी की भी समस्या हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त और युवाओं में बेरोजगारी 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है। बेरोजगारी पूरे देश में हैं, लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देश के उत्तरी राज्य हैं।

अमित बसोले ने यह भी कहा कि भारत के नौकरी बाजार की प्रकृति बदल गई है क्योंकि बाजार में अब अधिक शिक्षित लोग आ चुके हैं, वह उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं। उन्होंने कहा, “पिछले दशक में श्रम बाजार बदल गया है, विभिन्न डिग्रियों के अनुरूप रोजगार पैदा नहीं हुए हैं।”

हालात को सामान्य बनाने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाने चाहिए, इस सवाल पर रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने आईएएनएस को बताया, “यह हालात को सामान्य बनाने का सवाल नहीं है। इसके बजाय, हमें एक उचित राष्ट्रीय रोजगार नीति विकसित करने की आवश्यकता है, जो केंद्र द्वारा आर्थिक नीति बनाने में नौकरियों का सृजन करेगी।”

–आईएएनएस

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देश में 92 फीसदी महिलाओं की तनख्वाह 10 हजार से भी कम

मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।

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Picture Credit : Quartz

नई दिल्ली, 17 अक्टूबर | देश में एक तरफ जहां महिला सशक्तिकरण का बड़ा जोरो-शोरो से ढिंढोरा पीटा जाता है, वहीं एक विश्वविद्यालय की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कामकाजी 92 प्रतिशत महिलाओं को प्रति माह 10,000 रुपये से भी कम की तनख्वाह मिलती है। इस मामले में पुरुष थोड़ा बेहतर स्थिति में हैं। लेकिन हैरत की बात यह है कि 82 प्रतिशत पुरुषों को भी 10,000 रुपये प्रति माह से कम की तनख्वाह मिलती है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र ने श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधार पर स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें उन्होंने देश में कामकाजी पुरुषों और महिलाओं पर आंकड़े तैयार किए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर 67 प्रतिशत परिवारों की मासिक आमदनी 10,000 रुपये थी जबकि सातवें केंद्रीय वेतन आयोग (सीपीसी) द्वारा अनुशंसित न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये प्रति माह है। इससे साफ होता है कि भारत में एक बड़े तबके को मजदूरी के रूप में उचित भुगतान नहीं मिल रहा है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है। यह आंकड़े पूरे भारत के हैं।”

उन्होंने कहा, “मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुताबिक, चिंता की बात यह है कि विनिर्माण क्षेत्र में भी 90 प्रतिशत उद्योग मजदूरों को न्यूनतम वेतन से नीचे मजदूरी का भुगतान करते हैं। असंगठित क्षेत्र की हालत और भी ज्यादा खराब है। अध्ययन के मुताबिक, तीन दशकों में संगठित क्षेत्र की उत्पादक कंपनियों में श्रमिकों की उत्पादकता छह प्रतिशत तक बढ़ी है, जबकि उनके वेतन में मात्र 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

क्या आप मानते हैं कि शिक्षित युवाओं के लिए वर्तमान हालात काफी खराब हो चुके हैं, जिस पर सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने कहा, “आज की स्थिति निश्चित रूप से काफी खराब है, खासकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में। हमें उन कॉलेजों से बाहर आने वाले बड़ी संख्या में शिक्षित युवाओं का बेहतर उपयोग करने की आवश्यकता है।”

इस स्थिति को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है, के सवाल पर उन्होंने आईएएनएस को बताया, “स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं, जैसे अगर सरकार सीधे गांवों व छोटे शहरों में रोजगार पैदा करे, इसके साथ ही बेहतर बुनियादी ढांचे (बिजली, सड़कों) उपलब्ध कराएं और युवाओं को कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध को सुनिश्चित करें, जिससे कुछ हद तक हालात सुधर सकते हैं।”

श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) के मुताबिक, 2015-16 के दौरान, भारत की बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी जबकि 2013-14 में यह 4.9 फीसदी थी। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि बेरोजगारी दर शहरी क्षेत्रों (4.9 फीसदी) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों (5.1 फीसदी) नें मामूली रूप से अधिक है।

अध्ययन के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाओं के बीच बेरोजगारी दर अधिक है। राष्ट्रीय स्तर पर महिला बेरोजगारी दर जहां 8.7 प्रतिशत है वहीं पुरुषों के बीच यह दर चार प्रतिशत है। काम में लगे हुए व्यक्तियों में से अधिकांश व्यक्ति स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं। राष्ट्र स्तर पर 46.6 प्रतिशत श्रमिकों स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं, इसके बाद 32.8 प्रतिशत सामयिक मजदूर हैं।

अध्ययन के मुताबिक, भारत में केवल 17 प्रतिशत व्यक्ति वेतन पर कार्य करते हैं और शेष 3.7 प्रतिशत संविदा कर्मी हैं।

–आईएएनएस

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गोवा में एक बार फिर राजनीति का सबसे घिनौना चेहरा सामने है!

बीजेपी को पता है कि जैसे लक्ष्मी की कृपा बदौलत उसने चौथी बार मनोहर पर्रिकर को गोवा का मुख्यमंत्री बनाया था, वैसे ही लक्ष्मी की कृपा से पर्रिकर सरकार को जीवनदान भी दिया जा सकता है। लक्ष्मी की इसी कृपा ने बीजेपी को नरभक्षी बना दिया है!

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Modi Shah

आमतौर पर राजनीति को सम्भावनाओं का खेल कहा जाता है। कभी जोड़-तोड़ और मौकापरस्ती, राजनीति का सहज-धर्म हुआ करता था। लेकिन मोदी राज में राजनीति का बेहद चेहरा वीभत्स हो चुका है। अब राजनीति जोड़-तोड़ से बहुत आगे निकलकर ख़रीद-फ़रोख़्त के गोरखधन्धे में तब्दील हो चुकी है। क्योंकि अब भारतीय राजनीति में नैतिकता, मूल्य, सिद्धान्त, विचारधारा और लोकलाज़ जैसे बुनियादी तत्व नदारद हो चुके हैं। लोकतंत्र की सेहत के लिए ये बेहद घातक दौर है। मार्च 2017 के बाद से, गोवा इसी दलदल में फँसा हुआ है।

अब गोवा में काँग्रेस के दो और विधायक दयानन्द सोपते और सुभाष शिरोडकर अपनी राजनीतिक निष्ठा का सौदा करके बीजेपी के ख़ेमे में जा पहुँचे हैं। इनसे पहले, विश्वजीत राणे ने भी काँग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतने के फ़ौरन बाद इसलिए पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया था, ताकि राज्य की 40 में से 13 सीटें जीतने वाली बीजेपी, सरकार बना सके, सत्ता हथिया सके! तब भी, बीजेपी के धन-बल ने काँग्रेस को मिले जनादेश को पटखनी दी थी, और अब भी, विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त का गोरखधन्धा इसलिए आसानी से परवान चढ़ गया, क्योंकि बीजेपी को किसी भी क़ीमत पर गोवा में अपनी सरकार बचानी है।

बीजेपी को पता है कि जैसे लक्ष्मी की कृपा बदौलत उसने चौथी बार मनोहर पर्रिकर को गोवा का मुख्यमंत्री बनाया था, वैसे ही लक्ष्मी की कृपा से पर्रिकर सरकार को जीवनदान भी दिया जा सकता है। लक्ष्मी की इसी कृपा ने बीजेपी को नरभक्षी बना दिया है! उसके मुँह में विधायकों का ख़ून लग चुका है! सिर्फ़ गोवा में ही नहीं बल्कि पूर्वोत्तर के कई राज्यों में भी। इसीलिए, फरवरी से गम्भीर रूप से बीमार चल रहे मनोहर पर्रिकर की जगह न तो पार्टी ने नया मुख्यमंत्री चुना, ना काँग्रेस की माँग के मुताबिक उसकी सरकार बनवायी और ना ही विधानसभा में शक्ति-परीक्षण होने दिया, क्योंकि बीजेपी को अच्छी तरह से पता है कि विधानसभा के शक्ति परीक्षण में उसकी सरकार गिर जाती।

दरअसल, फरवरी 2017 में हुए गोवा के विधानसभा चुनाव में काँग्रेस 40 में से 17 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी। बीजेपी को 13 सीटें मिली थीं। तीन-तीन सीटें क्षेत्रीय दलों, महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी और गोवा फ़ारवर्ड को मिली। एक सीट एनसीपी के ख़ाते में गयी और तीन निर्दलीयों ने मैदान मारा। इसके बाद विधायकों के ख़रीद-फ़रोख़्त की मंडी सजी। इसमें काँग्रेस अपना दमख़म दिखाने में विफल रही। उसे एनसीपी के स्वाभाविक समर्थन का यक़ीन था, तो गोवा फ़ॉरवर्ड ने भी समर्थन का भरोसा दिलाया था। लेकिन काँग्रेस ने सौदा पटाने में देर कर दी। वो ज़बरदस्त गुटबाज़ी की वजह से अपने विधायक दल का नेता यानी मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी वक़्त रहते नहीं चुन सकी। इसीलिए राज्यपाल मृदुला सिन्हा के पास जाकर सरकार बनाने का दावा पेश करने में भी देरी हुई।

उधर, बीजेपी ने इस मौके का भरपूर फ़ायदा उठाया। उसने विधायकों की बोली लगाने की ज़िम्मा नितिन गडकरी को सौंपा, जिन्होंने दनादन एनसीपी, निर्दलीयों और गोवा फ़ॉरवर्ड के विधायक और ‘फ़िक्सर’ विजय सरदेसाई से सौदा पटा लिया। इतना ही नहीं, काँग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री रहे प्रताप सिंह राणे के बेटे और काँग्रेस के टिकट पर निर्वाचित विश्वजीत राणे की पारिवारिक निष्ठा का भी सौदा कर लिया। राणे ने तो शक्ति परीक्षण से पहले ही काँग्रेस से इस्तीफ़ा दे दिया। सौदेबाज़ी कितनी जानदार रही होगी, इसका जायज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस वक़्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी फ़्राँस में राफ़ेल सौदा करने गये थे और रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर गोवा में सब्ज़ी ख़रीद रहे थे, इसकी तस्वीर विजय सरदेसाई ने ही सोशल मीडिया पर डाली थी!

ख़ैर, पर्रिकर और गडकरी की थैलियों ने भरपूर रंग दिखाया। फ़्लोर टेस्ट में पर्रिकर सरकार को 24 वोट मिले। जबकि काँग्रेस 16 सीटों पर आ गयी। इसी वक़्त विश्वजीत राणे की सीट खाली हो गयी तथा बीजेपी ख़ेमे की संख्या 23 हो गयी और सदन की संख्या 39 हो गयी। पर्रिकर सरकार में गोवा फ़ॉरवर्ड के तीनों विधायक समेत आठ विधायक मंत्री बने। तब पर्दे के पीछे से विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त वाली मंडी का सारा इन्तज़ाम संवैधानिक अम्पायर और राज्यपाल मृदुला सिन्हा के हवाले था। उन्होंने अपनी पार्टी के इशारे पर कम सीटें जीतने वाली बीजेपी की सरकार बनवा दी। सबसे बड़े दल काँग्रेस को मौक़ा देने की परम्पराओं की धज़्ज़ियाँ उड़ा दी गयीं। लेकिन इसी दिन के लिए ही तो रीढ़-विहीन और लोकलाज़-रहित मृदुला सिन्हा को राज्यपाल बनाया था!

वक़्त का पहिया घूमा। ईश्वर ने बेईमानी से सत्ता हथियाने वाले पर्रिकर को उनके कर्मों का फल देने की ठानी। मुख्यमंत्री बनने के साल भर के भीतर ही, यानी फरवरी 2018 आते-आते, 62 वर्षीय पर्रिकर को पैंक्रियाज यानी पित्ताशय के कैंसर ने जकड़ लिया। इसी वक़्त, पर्रिकर के तीन और मंत्रियों की सेहत धोखा देने लगी। आलम ये हुआ कि जुलाई 2018 में विधानसभा के मॉनसून सत्र के वक़्त बिजली मंत्री पांडुरंग मडकैकर, शहरी विकास मंत्री फ़्रॉन्सिस डिसूज़ा और परिवहन मंत्री रामकृष्ण उर्फ़ सुदिन धवालिकर, सदन में मौजूद रहने की दशा में नहीं थे। पांडुरंग, ब्रेन-स्ट्रोक से जूझ रहे हैं तो डिसूज़ा भी कैंसर पीड़ित हैं। पर्रिकर की तरह इनकी सेहत भी तेज़ी से जबाब दे रही है। इसीलिए, सितम्बर में बीजेपी में नया मुख्यमंत्री ढूँढ़ने को लेकर ख़ासी सरगर्मी रही। लेकिन कोई उपयुक्त चेहरा नहीं मिला।

अब बीजेपी को साफ़ दिख रहा था कि उसकी सरकार अल्पमत में आ चुकी है। इसीलिए काँग्रेस की माँग के मुताबिक़, राज्यपाल मृदुला सिन्हा न तो शक्ति-परीक्षण के लिए राज़ी हुईं और ना ही राष्ट्रपति शासन के लिए। वैसे, मृदुला सिन्हा कोई इकलौती राज्यपाल नहीं हैं, जिन्हें बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का ही हुक़्म बजाना पड़ता है। आलम ये है कि यदि उन्होंने अपने दिमाग़ का इस्तेमाल कर लिया तो उन्हें भी मार्गदर्शक मंडल में ठेल दिया जाएगा! मृदुला ऐसी कोई अकेली राज्यपाल नहीं हैं। हरेक का यही हाल है। पूरे कुएँ में ही भाँग घुली पड़ी है!

यहाँ, बहस हो सकती है कि क्या काँग्रेस के ज़माने में ऐसा नहीं होता था? क्या तब राज्यपाल, केन्द्र सरकार के एजेंट नहीं हुआ करते थे? बेशक़, हुआ करते थे। लेकिन संविधान की धज़्ज़ियाँ उड़ाने और सत्ता के अहंकार में नंगा-नाच करने की ऐसी प्रवृत्ति तब नहीं थी। पर्दे के पीछे सब होता था, लेकिन मोदी राज जैसा ख़ुल्लमख़ुल्ला और ‘डंके की चोट पर’ वाली माहौल काँग्रेसियों की फ़ितरत में नहीं था। इसीलिए तब जो लोग काँग्रेस को पतित, भ्रष्ट और बेईमान होने का सर्टिफ़िकेट देते हुए अपने चाल-चरित्र-चेहरे की दुहाई देते फ़िरते थे, क्या वो भी सत्ता की ख़ातिर इतने पतित हो जाएँगे कि बेचारी ‘भारत से मुक्त हो चुकी काँग्रेस’ को भी शर्म आ जाए!

बहरहाल, अब काँग्रेस के दो और विधायकों के ‘बिक जाने’ के बाद भी गोवा विधानसभा में चार सीटें खाली हैं। काँग्रेस की तीन और बीजेपी की एक। अब सदन में बीजेपी के 12 विधायक हैं, तो काँग्रेस की संख्या 14 पर जा पहुँची है। बीजेपी को 10 विधायकों का समर्थन हासिल है। लेकिन मुख्यमंत्री समेत चार मंत्रियों का वोट अधरझूल में है। चार में से तीन बीजेपी के हैं तो सुदिन धवालिकर, महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के नेता हैं। इस तरह, आशंका है कि कहीं शक्ति परीक्षण के वक़्त सत्ता पक्ष का दायरा 18 पर ही ना अटक जाए!

ऐसे में यदि काँग्रेस के दो विधायक नहीं बिकते तो 38 लोगों के सदन में 20 की आँकड़ा हासिल करना मुश्किल हो जाता। लिहाज़ा, बीजेपी के शूरमाओं ने साम-दाम-भेद-दंड का नुस्ख़ा अपनाकर विधानसभा की प्रभावी संख्या को ही घटा दिया और काँग्रेस के दो विधायक ख़रीद लिये! भगवा ख़ेमा अभी एकाध और शिकार की फ़िराक़ में है! ताकि आँकड़े आरामदायक बन सकें और बीजेपी ताल ठोंककर कह सके कि काँग्रेस से अपना घर तो सम्भलता नहीं, गोवा क्या सम्भालेंगे! विपक्ष में बैठी पार्टी के पास वैसे भी अपने विधायकों को लालच से बचाने के लिए बहुत कम विकल्प होते हैं। राजनीति का यही सबसे घिनौना चेहरा है! गोवा में ऐसा पहले भी होता रहा है।

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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