Image result for preserve privacy

निजता के अधिकार को लेकर दुनिया भर के लोकतंत्र में ज़बरदस्त बहस छिड़ी हुई है। संचार क्रान्ति से जुड़ी उन्नत तकनीकों ने इस बहस को ख़ासा तूल दिया है। क्योंकि इसी वजह से निजता में दुर्भाग्यपूर्ण खलल पड़ा है। आज दरवाज़ा खटखटाये बग़ैर हुक़ूमत हमारे घरों में घुस सकती है। तकनीक ने ऐसे घुसपैठिये को शक्तिशाली बना दिया है। स्मार्ट टीवी हमारी चौकसी कर रहा है। इन्हीं वजहों से हुक़ूमत और एक आदमी के बीच का रिश्ता काफ़ी बदल चुका है। अब हमारे घर हमारे लिए भी अभेद्य क़िले जैसे नहीं रह गये हैं। इसीलिए निजता के संरक्षण की अहमियत बहुत बढ़ गयी है।

सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की संविधान पीठ के सामने विचारनीय है कि आख़िर निजता का अधिकार है क्या? इसे किस सीमा पर संरक्षित होना चाहिए? पहले बात निजता के अधिकार की। ये उस स्वतंत्रता का अंग है, जिसे संविधान में मूल अधिकार की तरह मान्यता प्राप्त है। निजता के बग़ैर व्यक्तिगत स्वतंत्रता अधूरी है। निजता ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता का निचोड़ है। इसके बावजूद इसे अलग से मान्यता दिये जाने की ज़रूरत है। निजता की सबसे आसान परिभाषा है ‘मुझे अकेला छोड़ दो!’ देश और समाज के आगे निजता ही हमें एकांकी बनाती है। यहाँ एकांकी का मतलब है, मेरी वो निजी बातें जो किसी और से साझा नहीं हो।

मुझे ये हक़ तो होना ही चाहिए कि मैं अपने विचारों को अकेले में ज़ाहिर कर सकूँ। यदि हुक़ूमत मेरी रज़ामन्दी के बग़ैर इन विचारों तक पहुँच जाए तो निश्चित रूप से वो मेरी निजता और स्वतंत्रता में दख़ल होगा। मुझे ये आज़ादी होनी ही चाहिए कि मैं अपने घर में बैठकर जो चाहे खा सकूँ। जब सरकार इसमें दख़ल डालने लगेगी तो न सिर्फ़ मेरी स्वतंत्रता का हनन होगा बल्कि मेरी निजता भी मिट जाएगी। जब तक शासन के लिए अनिवार्य न हो तब तक उसे ये क्यों जानना चाहिए कि मैं कहाँ घूम रहा हूँ? ये भी मेरी निजता के ख़िलाफ़ है। इसीलिए जब तक निजता को मेरे मूल अधिकार के रूप में संवैधानिक नहीं बनाया जाता, तब तक इसके उल्लंघन का दायरा तय नहीं होगा। अलबत्ता, इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि बुनियादी हक़ का दर्ज़ा मिलने के बावजूद निजता का अधिकार निरंकुश नहीं हो सकता। इसे हमेशा वैधानिक और देश हित में ही होना चाहिए। मेरा निजी व्यवहार किसी क़ानून के ख़िलाफ़ नहीं जा सकता। इसीलिए निजता की आड़ में हमारी ग़ैरक़ानूनी हरक़तें नज़रअन्दाज़ नहीं की जा सकतीं। लेकिन वाज़िब देशहित के बावजूद हुक़ूमत को निजता में किसी भी सीमा तक दख़ल देने की इजाज़त भी नहीं दी जा सकती।

सरकारी दख़ल की हरेक दशा के पीछे क़ानूनी वैधता का होना ज़रूरी है। ये दख़लंदाज़ी के दायरे के अनुपात में ही होनी चाहिए। इसका निर्धारण अलग-अलग मामले से जुड़ी चुनौती के मुताबिक़ तय होना चाहिए। निजता में खलल के लिए सरकार को निर्धारित प्रक्रिया को अपनाये जाने का भरोसा दिलाना पड़ेगा। जनता को भी ये समझना होगा कि संचार राजमार्ग पर वो स्वेच्छा से जिन निजी सूचनाओं को मित्रों के लिए साझा करती है, वो उन सभी अनजान लोगों और यहाँ तक कि हुक़ूमत के पास भी पहुँच सकती है, जो उसे कमज़ोर बना सकते हैं। लिहाज़ा, निजता के दो आयाम हैं। पहला, व्यक्ति और शासन के बीच और दूसरा, व्यक्ति और ग़ैर-शासन के बीच। हमें दोनों से अलग-अलग ढंग से निपटना होगा। पहले का नाता संवैधानिक प्रभाव से है तो दूसरे का सम्बन्ध गोपनीयता से है।

निजता का नाता जब शासन से होगा तो उसके दायरे में वही सूचनाएँ हो सकती हैं, जो हमें क़ानूनन सरकार से साझा करनी पड़ती हैं। लेकिन जब सरकार इन्हें साझा करना चाहे तो उसकी निश्चित वजह होनी ही चाहिए। मिसाल के तौर पर, पासपोर्ट में दी गयी जानकारी का ताल्लुक किसी नागरिक की विदेश यात्रा के बुनियादी अधिकार से जुड़ी हुई। लेकिन यदि उस जानकारी को सरकार या उसकी कोई भी संस्था किसी भी अन्य मक़सद से इस्तेमाल करती है तो ये बाक़ायदा निजता में दख़ल का मामला कहलाएगा। इसी तरह, कोई नागरिक अपने बारे में जो सूचनाएँ सरकारी अस्पतालों में देता है, उसकी इजाज़त के बग़ैर गोपनीय जानकारियों का अन्यत्र इस्तेमाल वर्जित होना ही चाहिए।

रही बात ग़ैर-सरकारी संस्थाओं के साथ सूचनाएँ साझा करने की तो इसे कोई भी नागरिक अपने अनुभवों को साझा करने के लिए उपलब्ध करवाता है। इसे भी उतना गोपनीय तो रखा ही जाना चाहिए, जितना मुमकिन है। ऐसी ग़ैर-सरकारी संस्थाओं के बारे में भी नागरिकों को आगाह किया जाना चाहिए कि उनकी सूचनाओं के साझा होने की कितनी सम्भावना है और वो कहाँ तक गोपनीय रह सकती हैं?

निजता के अधिकार के संरक्षण के लिए हुक़ूमत को ऐसा पुख़्ता तंत्र बनाना चाहिए जिसे क़ानूनी वैधता हासिल हो। साथ ही ये व्यवस्था भी होनी चाहिए कि गोपनीयता भंग होने की दशा का क़ानूनन क्या अंज़ाम होगा? कुलमिलाकर, निजी सूचनाओं की गोपनीयता को ठोस क़ानूनी ताने-बाने के ज़रिये सुनिश्चित किया ही जाना चाहिए। लेकिन ये तभी सम्भव होगा जब हमारा जनतंत्र, उदार लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण के प्रति कटिबद्ध हो!

(साभार: डीएनएइंडिया डॉट कॉम। लेखक पूर्व केन्द्रीय मंत्री, राज्यसभा सदस्य और काँग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं।)

ताज खबर और न्यजू अपडेट के लिए डॉउनलोड, करें WeForNews App

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Most Popular

To Top