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ग़लत निकली प्रणब की निजी पसन्द

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प्रणब मुखर्जी, राजनीति के परम तत्व को हासिल कर चुके हैं। विडम्बना है कि उनके क़द के राजनेता की भी दिमाग़ की बत्ती गुल हो सकती है। उन्हें संघ के मंच पर जाने की रज़ामन्दी देने से पहले ख़ूब मन्थन करना चाहिए था। वो काँग्रेस की ऐतिहासिकता, उसके आदर्शों और उसकी चुनौतियों से ख़ूब वाक़िफ हैं। प्रणब बाबू बख़ूबी जानते हैं कि जिन मूल्यों और सिद्धान्तों के पीछे काँग्रेस हमेशा बेहद मजबूती से खड़ी रही, संघ से हमेशा उन्हें नफ़रत ही मिलती रही है।

संघ जिस तरह के धार्मिक उन्माद का प्रचार करता है वो हिन्दुत्व के बुनियादी तत्वों से कोसों दूर है। संघ हमेशा से प्रतिशोध के उस प्रारूप का हिमायती है जो हमारी सभ्यता और इतिहास के शानदार पहलुओं के ख़िलाफ़ है। इसी वजह से संघ वैसी असहिष्णुता को बढ़ावा देता है, जैसा हम 2014 के बाद से पूरे देश में देख रहे हैं। आज दो विचारधाराएँ परस्तर समानान्तर रूप से मौजूद हैं। एक जो संविधान सम्मत है, तो दूसरा, जो संविधान से घृणा करता है। एक जो लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने का हिमायती है, तो दूसरा, जो इन मूल्यों की बधिया उधेड़ने पर आमादा रहता है। एक का मानना है कि राष्ट्रवाद और देशभक्ति का ताल्लुक हमारी नागरिकता है, जबकि दूसरे को लगता है कि इसकी उग्र और उदंडतापूर्ण नुमाइश ज़रूरी है। इसीलिए ‘भारत माता की जय’ नहीं बोलने वालों को थप्पड़ लगाया जाता है। संघ इसे मौन-स्वीकृति देता है। जो सरकार की पाकिस्तान-नीति की आलोचना करे या जो कश्मीर में सेना के पैलेट्स की वजह से युवाओं की आँखों को छीनने की विरोधी है, उसे राष्ट्रविरोधी कहा जाएगा। हमारी देशभक्ति और राष्ट्रीयता तभी साबित होगी, जब हम बहुसंख्यक समुदाय से होंगे।

बहुसंख्यकवाद की संस्कृति उस मानसिकता के प्रतिकूल है, जिसका हम जैसे शान्ति-प्रिय नागरिक प्रतिनिधित्व करते हैं। संघ की विचारधारा का प्रजनन केशव बलिराम हेडगेवार के दर्शन से हुआ है। संघ की महत्वाकाँक्षा सिर्फ़ सत्ता प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। संघ तो ऐसा भारत बनाना चाहता है जो हिन्दू गर्व की उन गाथाओं से बना हो, जिसका वर्चस्व सदियों तक छिन्न-भिन्न होता रहा। इसका उदाहरण है, मतान्ध लोगों की ओर से मासूमों को हिंसा का शिकार बनाना। आज बीजेपी नहीं, बल्कि संघ, भारत की नियति तय कर रहा है। ये वाजपेयी युग से बिल्कुल उलट है। बहुसंख्यकवाद की मौजूदा संस्कृति अपने विरोधियों की आवाज़ का गला घोंटने की हिमायती है! ये हिंसा का उत्सव मनाती है! उसे दंड-मुक्त रखना चाहती है! ये तय करती है कि हम क्या खायें और क्या पहनें! ये तय करती है कि हमारे काम-धन्धे कैसे हों और हम उसे कैसे अंज़ाम दें! ये तय करती है कि हम कहाँ शादी-ब्याह कर सकते हैं और कहाँ नहीं! ये तय करती है कि हमारी कलात्मक अभिव्यक्ति कैसी होनी चाहिए! हमारे इतिहास का नायक और खलनायक किसे होना चाहिए! इसे तय करने के लिए किसी विद्वता की ज़रूरत नहीं है।

ये संस्कृति चाहती है कि बच्चों की पाठ्य पुस्तकों में उसके बहुसंख्यवाद को ही प्रमुखता मिले ताकि बच्चे भी वैसा ही सोचें जैसा ये चाहते हैं! ये लोग विश्वविद्यालयों को टकराव की ऐसी प्रयोगशाला बनाना चाहते हैं, जिसमें प्रतिगामी विचारों का कोई स्थान नहीं हो। इन्हीं उद्देश्यों को हासिल करना संघ का राष्ट्रीय एजेंडा है। इसके लिए ही सरकार को संचालित करने वाले तंत्र के हरेक स्तर पर संघ के प्रचारक तैनात किये जाते हैं। फिर इनके माध्यम से ही संचार के सारे चैनल या तौर-तरीकों पर नियंत्रण किया जाता है। इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए संघ की ओर से तरह-तरह की अफ़वाह और उत्तेजनात्मक बातों को फैलाया जाता है। उन्माद का ऐसा माहौल बनाया जाता है, जिसमें जो भी संघ से असहमत हो, उसे उसका दुश्मन बताया जाता है। बहुसंख्यकवाद से जुड़ी घृणा को फैलाने के लिए जिन अफ़वाहों की ज़रूरत होती है, उसके लिए सोशल मीडिया के भ्रष्ट और पतित मंच का इस्तेमाल किया जाता है।

लाठी का इस्तेमाल आत्मरक्षा के हथियार के रूप में नहीं होता। हम देखते रहे हैं कि कैसे लाठियों का इस्तेमाल मासूमों को अपाहिज़ बनाने में किया जाता है। एक स्थिर दिमाग़ से उपजे विचारों और लाठीचार्ज के अंज़ाम के बीच हमेशा विरोधाभास होता है। अनुशासन के नाम पर बने एक ठस दिमाग़ से ही असहनशील और तानाशाही संस्कृति बनती है। प्रणब मुखर्जी को ऐसे लोगों के बीच देखना निश्चित रूप से अद्भुत है। वो निश्चित तौर पर संघ के नेतृत्व को किसी मुद्दे पर सहमत करने के लिए तो नहीं ही गये थे। ना ही उनका सम्बोधन किसी संवाद का मौका हो सकता था। इसी तरह से संघ को भारत के बहुसांस्कृतिक अतीत, इसकी उदारता और राष्ट्रवाद तथा देशभक्ति का उपदेश देने के लिए भी मुखर्जी, नागपुर नहीं ही गये होंगे। क्योंकि संघ के लिए इन उपदेशों का वही मतलब है जैसे किसी बतख की पीठ पर पानी डालना! तो फिर वो आख़िर वहाँ क्यों गये? प्रणब बाबू के लिए नागपुर जाकर अपने कृतित्व पर मोहर लगवाने जैसी कोई वजह भी नहीं हो सकती। उनके जैसे लम्बे सार्वजनिक जीवन में शायद ही कुछ ऐसा हो, जिसे कहने के लिए उन्हें उन लोगों के बीच जाना ज़रूरी लगा हो, जिनकी ज़िन्दगी का मक़सद ही भारत की विरासत को ध्वस्त करना हो।

मैं ये भी नहीं मान सकता कि प्रणब मुखर्जी के संघ के मंच पर होने की वजह से प्रगति-विरोधी ताक़तों के उस मंसूबे को वैधता मिली होगी, जो भारत को भगवा रंग में रंगना चाहता है। इसीलिए काँग्रेस को अनावश्यक रूप से चिन्तित होने की ज़रूरत नहीं है। प्रणब बाबू वहाँ काँग्रेस के प्रतिनिधि बनकर नहीं गये थे। यदि ऐसा होता तो उन्होंने उन लोगों को अहमियत क्यों दी होती, जो काँग्रेस अध्यक्ष के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाकर उन्हें दंडित करना चाहते हैं! मेरी राय में प्रणब मुखर्जी ने नागपुर जाकर संघ को बताया कि भारत की मुख्यधारा की राजनीति आज भी किन मूल्यों और सिद्धान्तों के साथ मजबूती से खड़ी है! अलबत्ता, मुख्यधारा की राजनीति को उलझन में डाले बग़ैर भी वो इस काम को कर सकते थे। ये उनकी पसन्द थी। लेकिन ये ग़लत थी। भगवा ध्वज को उनकी ओर से मिले सम्मान और हेडगेवार को भारत का महान सपूत बताना, ये दो ऐसी बातें हैं जो संघ को आनन्दित करती रहेंगी। इससे ‘सपनों का भारत’ यानी ‘आइडिया ऑफ़ इंडिया’ को आघात लगता रहेगा। लेकिन यही वो वक़्त है जब काँग्रेस को भारत की मुख्यधारा की राजनीति के प्रति अडिग रहना होगा। काँग्रेस की निष्ठा ऐसी घटनाओं से नहीं बदल सकती।

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस)

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बिहार : समस्तीपुर में डेयरी संयंत्र, भोजपुर में पशु आहार कारखाना लगेंगे

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dairy products

मोतिहारी, 19 जनवरी | बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने यहां शनिवार को कहा कि अगले वित्तीय वर्ष 2019-20 में बिहार राज्य दुग्ध सहकारी संघ लिमिटेड (कम्फेड) द्वारा समस्तीपुर में पांच लाख लीटर प्रतिदिन क्षमता के डेयरी संयंत्र और भोजपुर के बिहिया में 300 मीट्रिक टन प्रतिदिन उत्पादन क्षमता के पशु आहार कारखाने लगाए जाएंगे। पूर्वी चंपारण जिले के मठबनवारी में 11 महीने के रिकार्ड समय में बन कर तैयार मदर डेयरी के प्रति दिन एक लाख लीटर क्षमता के दूध प्रसंस्करण संयंत्र का शनिवार को उद्घाटन करने के बाद बिहार के उपमुख्यमंत्री ने कहा कि इस संयंत्र द्वारा मार्च से 1250 गांवों के 50 हजार किसानों से प्रतिदिन 2 लाख लीटर दूध का संग्रह किया जा सकेगा।

उन्होंने कहा कि अब सुधा व मदर डेयरी, दोनों मिलकर किसानों से दूध खरीदेगी।

मोदी ने कहा, “वर्तमान वित्तीय वर्ष में सुपौल में एक लाख लीटर क्षमता का डेयरी संयंत्र, समस्तीपुर व हाजीपुर में 30-30 मीट्रिक टन के दूध पाउडर संयंत्र, पटना व नालंदा में 20-20 हजार किलो दैनिक क्षमता के आइसक्रीम प्लांट स्थापित किए जाने के साथ ही पटना में पूर्व से स्थापित 100 मीट्रिक टन क्षमता के पशु आहार फैक्ट्री को 150 मीट्रिक टन में विस्तारित और 150 मीट्रिक टन की नई इकाई स्थापित की गई है।”

डेयरी स्थापित करने वाले किसानों को सरकार द्वारा 50 प्रतिशत तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को 66 प्रतिशत अनुदान दिए जाने का दावा करते हुए उन्होंने कहा कि किसानों की आमदनी केवल धान, गेहूं की खेती करने से दोगुनी नहीं होगी, बल्कि इसके लिए समग्र रूप से वानिकी, डेयरी, मछली और मुर्गी पालन को अपनाना होगा।

उन्होंने कहा कि फिलहाल बिहार में प्रतिदिन 18 लाख किलो दूध का संग्रह व 14 लाख लीटर की मार्केटिंग सुधा डेयरी द्वारा की जा रही है।

इस मौके पर केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह, बिहार सरकार में मंत्री प्रमोद कुमार, राणा रणधीर सिंह समेत कई अधिकारी और नेता मौजूद थे।

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मुकेश अंबानी ने ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ अभियान का आह्वान किया

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mukesh ambani

गांधीनगर, 18 जनवरी | औपनिवेशीकरण के खिलाफ महात्मा गांधी के अभियान को याद करते हुए रिलायंस इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक मुकेश अंबानी ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करने की गुजारिश की और कहा कि भारतीय डेटा भारतीयों के ‘स्वामित्व और नियंत्रण’ में होने चाहिए। उन्होंने यहां वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट 2019 में कहा, “हम अपने राष्ट्रपिता को उनकी 150वीं जयंती के वर्ष में श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। गांधी जी ने राजनीतिक औपनिवेशीकरण के खिलाफ आन्दोलन चलाया था.. आज हम सब मिलकर डेटा औपनिवेशीकरण के खिलाफ नया अभियान शुरू कर रहे हैं।” इस समिट का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था।

अंबानी ने कहा कि डेटा नई दुनिया में ‘नया तेल और धन’ है। उन्होंने कहा कि भारत के डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण भारतीय लोगों के हाथ में ही होना चाहिए और कॉर्पोरेट्स द्वारा नहीं किया जाना चाहिए, खासतौर से वैश्विक कॉर्पोरेशंस द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “माननीय प्रधानमंत्री, मैं आश्वस्त हूं कि आप अपने डिजिटल इंडिया मिशन के प्रमुख लक्ष्यों में इसे भी शामिल करेंगे।”

उन्होंने कहा, “भारत को इस डेटा संचालित क्रांति में सफल होने के लिए, हमें भारतीय डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण वापस भारत भेजना होगा.. दूसरे शब्दों में भारतीय संपत्ति वापस लौटानी होगी। भारतीय डेटा को भरतीयों द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए, न कि वैश्विक कॉर्पोरेट्स द्वारा। डेटा का नियंत्रण हमें अपने हाथों में लेने के लिए अभियान चलाने की आवश्यकता है।”

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अक्टूबर में कहा था कि सभी डिजिटल भुगतान कंपनियों जैसे गूगल प्ले, वाट्सएप और अन्य को अपने भारतीय कारोबार का डेटा स्थानीय तौर पर स्टोर करना चाहिए।

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ओपिनियन

बसपा-सपा गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं : शीला दीक्षित

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sheila dikshit-min

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कहना है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं मिल रहे हैं, लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस के परिणाम चौंकाने वाले होंगे।

शीला दीक्षित ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, “उनको एक साथ आने दीजिए। वे मिलते और जुदा होते रहे हैं और फिर साथ आ रहे हैं। मेरा अभिप्राय यह है कि उनमें स्थिरता नहीं है और वे स्थायित्व के संकेत नहीं दे रहे हैं। अब आगे देखते हैं।”

तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं दीक्षित (80) सपा और बसपा गठबंधन को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रही थीं। सपा और बसपा ने कांग्रेस को महागठबंधन से अलग रखते हुए प्रदेश में 80 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए एक गठबंधन किया है। दीक्षित को 10 जनवरी को दिल्ली कांग्रेस की कमान सौंपी गई।

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने से पहले शीला दीक्षित को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था। दीक्षित ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीद क्षीण पड़ गई है।

दीक्षित की टिप्पणी से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेता चुनाव अभियान के दौरान सपा और बसपा को निशाना बनाएंगे, जबकि उनका सीधा मुकाबला सत्ताधारी पार्टी भाजपा से होगा।

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है, लेकिन पार्टी ने भाजपा को शिकस्त देने वाले सेक्यूलर दलों के लिए दरवाजा खुला रखा है।

उत्तर प्रदेश में पार्टी नेता उम्मीदवारों को बता सकते हैं कि कांग्रेस ही नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से बाहर कर सकती है और भाजपा को शिकस्त दे सकती है।

कांग्रेस इस बात पर बल देंगे कि इस चुनाव के नतीजों से प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि देश का प्रधानमंत्री चुना जाएगा।

लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो ही सीटें बचा पाई थीं, जबकि उससे पहले 2009 में पार्टी ने 21 सीटों पर जीत हासिल की थी, जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) दूसरी बार केंद्र की सत्ता को बरकार रख पाई थी।

दीक्षित ने कहा कि उनसे कहा जाएगा तो वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी, लेकिन वह दिल्ली पर अपना अधिक ध्यान केंद्रित करेंगी क्योंकि उनको यहां काफी काम करना है।

उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी को कांग्रेस द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करने का अनुमोदन किया।

उन्होंने कहा, “पार्टी को इस पर फैसला लेने दीजिए। हम चाहते हैं और खासतौर से मैं चाहती हूंं और हमारे बीच अधिकांश लोग चाहते हैं। लेकिन इस पर पूरी पार्टी द्वारा फैसला लिया जाएगा।”

गैर-भाजपा दलों में प्रधानमंत्री का पद विवादास्पद मसला है। राहुल गांधी ने खुद भी कहा कि इसका फैसला चुनाव के बाद लिया जाएगा और पहला काम नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित करना है।

संपूर्ण भारत में महागठबंधन की संभावना पर पूछे जाने पर दीक्षित ने कहा कि लोग इस दिशा में प्रयासरत हैं, लेकिन इस पर अभी पूरी सहमति नहीं बन पाई है।

विपक्षी दलों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में गठबंधन की संभावना कम है, लेकिन भाजपा को शिकस्त देने के लिए राज्य विशेष में गठबंधन होगा।

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