प्रदूषण की वजह से एनसीआर में उम्र 6 साल घटी | WeForNewsHindi | Latest, News Update, -Top Story
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स्वास्थ्य

प्रदूषण की वजह से एनसीआर में उम्र 6 साल घटी

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नई दिल्ली, 5 नवंबर| राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में रहने वाले लोगों की जिंदगी खतरनाक वायु प्रदूषण की वजह से लगभग छह साल कम हो चुकी है। अगर एनसीआर में डब्लूएचओ मानकों को लागू किया जा सका तो लोग नौ साल तक अधिक जीवित रहेंगे। राष्ट्रीय राजधानी में वायु प्रदूषण अब तक के सर्वोच्च स्तर पर है। मौसम की स्थिति तेजी से बिगड़ती जा रही है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के अनुसार, जहरीली वायु के संपर्क में आने पर फेफड़े, रक्त, संवहनी तंत्र, मस्तिष्क, हृदय और यहां तक कि प्रजनन प्रणाली भी प्रभावित हो सकती है।

एक अध्ययन के अनुसार, वायु प्रदूषण के कारण पूरे देश में पांच लाख अकाल मौतें हो चुकी हैं।

आईएमए के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा, “दिल्ली की आबोहवा पिछले कुछ दिनों से बहुत ही खराब बनी हुई है। शहर में वायु की गुणवत्ता विशेष रूप से सुबह-सुबह अधिक खराब होती है, जब प्रदूषण बहुत अधिक होता है। हालांकि, यह अस्थमा या हृदय संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए तो घातक है ही, स्वस्थ व्यक्तियों को भी इससे पूरा खतरा है। बुजुर्ग लोग और बच्चे भी उच्च जोखिम वाली श्रेणी में आते हैं।”

डॉ. अग्रवाल ने कहा, “हाल ही के एक अध्ययन के मुताबिक, एनसीआर में रहने वाले लोगों की जिंदगी खतरनाक वायु प्रदूषण की वजह से लगभग छह साल कम हो चुकी है। अगर एनसीआर में डब्लूएचओ मानकों को लागू किया जा सका तो लोग नौ साल तक अधिक जीवित रहेंगे।”

उन्होंने कहा, “आईएमए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष को इस महीने प्रस्तावित अर्ध-मैराथन को तत्काल रद्द या स्थगित करने के लिए लिखने जा रहा है। यह ईवेंट तब तक नहीं होनी चाहिए, जब तक कि हवा की गुणवत्ता में महत्वपूर्ण सुधार न हो जाए।”

पीएम 2.5 के प्रदूषण का मतलब है कि छोटे खतरनाक कण फेफड़ों में प्रवेश करके हानि पहुंचा सकते हैं। इससे क्रोनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिसऑर्डर जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं और फेफड़ों के कामकाज में बाधा पड़ सकती है। आईएमए ने इस तरह के हालात में मैराथन दौड़ कराने के खिलाफ सख्त हिदायत जारी की है। ऐसा करने से फेफड़ों में दो चम्मच तक विषैली राख जमा हो सकती है।

आईएमए अध्यक्ष ने कहा कि दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स (एयूआई) पिछले कुछ दिनों में अत्यंत खराब से खतरनाक की श्रेणी में जा पहुंचा है। शहर के कई हिस्सों में, वायु प्रदूषण का स्तर 300 के खतरे के निशान को भी पार कर गया है।

डॉ. अग्रवाल ने कहा, “दिल्ली में प्रदूषण के वर्तमान स्तर पर गर्भ में पल रहे शिशु भी प्रभावित हो सकते हैं। एक सामान्य वयस्क आराम करते समय प्रति मिनट छह लीटर वायु श्वास में लेता है, जबकि शारीरिक गतिविधि के दौरान यह मात्रा 20 लीटर बढ़ जाती है। वर्तमान में प्रदूषण के खतरनाक स्तर को देखते हुए, यह केवल फेफड़ों में विषाक्त पदार्थो की मात्रा में वृद्धि ही करेगा। यद्यपि हरेक को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि व्यायाम वाला स्थान सड़कों, निर्माण स्थलों और धुआं छोड़ने वाले उद्योगों से कम से कम 200 मीटर दूर हो। हालांकि, यह भी साफ हवा की गारंटी नहीं है।”

वायु प्रदूषण से पड़ने वाला असर :

* विषाक्त कण रक्त वाहिनियों की दीवारों से गुजरते हैं और रक्त के प्रवाह को प्रभावित करते हैं। वे थ्रांबोसिस का कारण बन सकते हैं।

* विषाक्त पदार्थो से रक्त वाहिकाओं का व्यास कम हो सकता है। इस स्थिति में उच्च रक्तचाप भी हो सकता है।

* विषाक्त वायु के कारण स्ट्रोक हो सकता है।

* हवा में विषाक्त पदार्थो के मिले होने से हृदय की क्रिया प्रणाली प्रभावित हो सकती है और हृदय की रिदम बिगड़ सकती है।

* विषाक्त हवा में श्वास लेने से महिलाओं को गर्भपात हो सकता है। भ्रूण के विकास की समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

* समय से पहले ही बच्चे का जन्म हो सकता है और जन्म के समय बच्चे का वजन भी कम हो सकता है।

–आईएएनएस

स्वास्थ्य

गर्मी के मौसम के साथ क्या करोनावायरस में कमी आएगी?

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नई दिल्ली, नोवेल कोरोनावायरस पर नियंत्रण के लिए विश्व समुदाय प्रभावी समाधान खोजने में जुटा हुआ है। इसके साथ ही विभिन्न राजनेताओं व चिकित्सकों व शोधकर्ताओं ने उम्मीद जताई है कि गर्मी आने के साथ वायरस के प्रभाव में कमी आएगी।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस महीने की शुरुआत में कहा था कि कोरोनावायरस अप्रैल में खत्म हो जाएगा। उन्होंने इसके पीछ तर्क दिया कि गर्मी में इस तरह के वायरस मर जाते हैं।

ट्रंप अकेले नेता नहीं हैं जिन्होंने गर्मियों में सुधार की उम्मीद जताई है। ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री मैट हैंकॉक ने भी कहा है कि वायरस का गर्मी में प्रसार कम होगा।

फोर्टिस अस्पताल के डिपार्टमेंट ऑफ पल्मोनोलॉजी एंड स्लीप डिसऑर्डर के निदेशक व प्रमुख विकास मौर्या ने आईएएनएस से कहा, “नोवेल कोरोनोवायरस एक जंगली जानवर से आया है। संक्रामक है, जो सर्दियों में होता है और श्वास से जुड़ा है।

हमें एक वर्ष में कम से कम दो बार एक वायरल संक्रमण होता है। अंतर यह है कि कोरोनावायरस का यह स्ट्रेन एक प्रतिरोधी स्ट्रेन है। उम्मीद है कि गर्मियों तक स्ट्रेन में कमी आएगी।”

नोवेल कोरोनावायरस से अब तक चीन में 2,400 से ज्यादा लोग मर चुके हैं। यह अब दो दर्जन ज्यादा देशों में फैल चुका है। इसकी वजह से कई अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कार्यक्रम रद्द हो चुके हैं। इसका पर्यटन पर भी बुरा प्रभाव पड़ा है। साथ ही चीन पर प्रतिबंध की वजह अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों पर असर पड़ रहा है।

–आईएएनएस

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स्वास्थ्य

‘कोरोना वायरस संक्रमण के इलाज में पारंपरिक दवाइयों का बेहतर असर’

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बीजिंग: नए कोरोना वायरस संक्रमण की रोकथाम और रोगियों के इलाज में चीन की पारंपरिक दवाइयों की महत्वपूर्ण भूमिका साबित हुई है।

राष्ट्रीय पारंपरिक दवाई प्रबंधन विभाग के अनुसार कुल 60 हजार रोगियों के इलाज में चीनी पारंपरिक दवाइयों का प्रयोग किया गया है और इसका बेहतरीन नतीजा नजर आया है।

चीनी विज्ञान व तकनीक मंत्रालय के उप मंत्री शू नान पींग के अनुसार नए कोरोना वायरस संक्रमण के रोगियों के इलाज में चीनी पारंपरिक दवाइयों का सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुआ है। अब नए कोरोना वायरस संक्रमण इलाज योजना में पारंपरिक दवा भी शामिल की गई है।

वुहान शहर में किए गए नैदानिक अनुसंधान के मुताबिक पारंपरिक दवाइयों के प्रयोग से हल्के रूप से ग्रस्त रोगियों का इलाज समय और भर्ती समय एक से दो दिनों तक कम हुआ है और इन रोगियों की इलाज दर में 33 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई।

चीनी पारंपरिक चिकित्सा के प्रशासन विभाग के उप प्रधान यू यैन हूंग ने कहा कि पारंपरिक चिकित्सा के प्रयोग से हल्के रोगियों की स्थितियों में स्पष्ट सुधार आया है और गंभीर रोगियों के इलाज में उनकी स्थिति और गंभीर होने से बची है। पारंपरिक चिकित्सा और आधुनिक मेडिसन के संयुक्त प्रयोग से नए कोरोना वायरस संक्रमण रोगियों के इलाज में संतोषजनक प्रभाव मिला है।

चीनी राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग और पारंपरिक चीनी चिकित्सा ब्यूरो ने संयुक्त रूप से पारंपरिक दवाइयों से बने डिटॉक्स सूप की सिफारिश की थी। गत 17 फरवरी तक देश के 10 राज्यों के 57 अस्पतालों में कुल 701 रोगियों के इलाज में इस दवा का प्रयोग किया गया और अधिकांश रोगियों की स्थितियों में संतोषजनक परिणाम नजर आया है।

(साभार–चाइना रेडियो इंटरनेशनल, पेइचिंग)

–आईएएनएस

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लाइफस्टाइल

क्या आप अच्छी और पूरी नींद नहीं ले पा रहे?

नींद संबंधी बीमारियों में से सबसे ज्यादा लोगों में पाई जाने वाली बीमारी है इंसोमेनिया। आइए, एक नजर डालते हैं ऐसी कई बीमारियों पर-

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Sleep-Nap

नई दिल्ली: रात के दौरान अच्छी नींद स्वस्थ शरीर के लिए बहुत आवश्यक है। अगर आप पूरी नींद नहीं ले पाते हैं या गलत समय पर सोते हैं या फिर टुकड़ों में नींद पूरी करते हैं तो इससे आपको निंद्रा विकार की समस्या हो सकती है, जिससे नींद के समय में कमी हो सकती है।

अगर आप सात से नौ घंटे की अच्छी नींद लेते हैं तो न केवल आपके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है बल्कि ब्लड प्रेशर, हार्मोन भी ठीक रहता है।

मुलुंद स्थित फोर्टिस हॉस्पिटल की सलाहकार न्यूरोलॉजिस्टडॉ. रीमा चौधरी कहती हैं, “नींद संबंधी विकार कई तरह के हालातों के प्रभाव के कारण होते हैं, जो नियमित रूप आने वाली अच्छी नींद को प्रभावित करते हैं। यह आजकल एक आम समस्या है, जो साधारण सिरदर्द और दिन भर के तनाव से जुड़ी रहती है। जब कोई मरीज सिरदर्द की समस्या से जूझता है तो वह भी एक सामान्य न्यूरोलॉजिकल विकार है, जो 60-70 प्रतिशत तक नींद में खलल से संबंधित है।”

नींद संबंधी बीमारियों में से सबसे ज्यादा लोगों में पाई जाने वाली बीमारी है इंसोमेनिया। आइए, एक नजर डालते हैं ऐसी कई बीमारियों पर-

  1. स्लीप एपनोया : यह नींद से जुड़ा एक गंभीर विकार है, जिसमें खून में ऑक्सीजन की कमी से सांस लेने में परेशानी होती है। इसमें अचानक से सांस रुक जाती है और फिर एकाएक आने लगती है। इससे मस्तिष्क और शरीर के अन्य हिस्सों में ऑक्सीजन का प्रवाह प्रभावित होता है, जिससे अच्छी नींद लेने में समस्या आती है। खर्राटे लेना, घरघराहट और उठने पर मुंह का सूखा होना इसके सामान्य लक्षण हैं।
  2. रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम : इस विकार में मरीज अक्सर अपने पैरों को हिलाता रहता है। वे जब भी सोने जाते हैं तो उन्हें पैरों में जलन महसूस होती है जिससे उन्हें अच्छी नींद लेने में परेशानी होती है।
  3. स्लिप पैरालिसिस : स्लीप पैरालिसिस एक विकार है जहां एक व्यक्ति जागने और सोते समय हिलने या बोलने में असमर्थ होता है। मरीजों को एक निश्चित दबाव और तत्काल भय का अनुभव होता है, कई बार इससे पीड़ित लोग सचेतन में होते हैं, लेकिन फिर भी वे हिलने-डुलने में असमर्थ होते हैं।
  4. सर्कैडियन रिदम डिसऑर्डर : इस बीमारी में मरीजों का इंटरनल बायोलॉजिकल क्लॉक बाहरी समय के साथ समन्वय नहीं बिठा पाता है। इसमें सोने के समय को लेकर मरीज की दिमागी घड़ी कुछ घंटे पीछे चल रही होती है। जो लोग नाइट सिफ्ट करते हैं, उनके साथ ऐसा अक्सर होता है।
  5. इंसोमेनिया सामान्यत: इस तरह के अनिद्रा विकार में मरीजों को नींद आने और नियमित तौर पर पूरी नींद लेने में परेशानी होती है। ऐसे में पूरे दिन उनमें ऊर्जा की कमी नजर आती है।

अच्छी और पूरी नींद लेने के टिप्स :

  • बिस्तर पर जाने का एक समय निश्चित कर लें और उसे बनाए रखें।
  • शाम और रात के समय कॉफी के सेवन से बचें।
  • टीवी, कंप्यूटर या मोबाइल पर समय बिताना कम करें, खासकर सोने से पहले।
  • प्रतिदिन नियमित रूप से व्यायाम करें।
  • रात को नींद आने में दिक्कत होती है तो दोपहर या बीच-बीच में नींद लेने से बचें।
  • बिस्तर पर जाने से पहले गर्म पानी से नहाएं। इससे आप रिलैक्स महसूस करेंगे और नींद भी अच्छी आएगी।

–आईएएनएस

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