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पुलिस और सेना, सिर्फ़ तब बर्बर नहीं होती जब ‘ऊपर’ से हुक़्म होता है!

IT Cell की बदौलत तरह-तरह के झूठ, अफ़वाह और विरोधियों के चरित्र-हनन का सहारा लेकर बीजेपी ने 2014 में सबको धूल चटा दी। तब तक उसका IT Cell अभेद्य दुर्ग की तरह अपराजेय बन चुका था। 2015 में आम आदमी पार्टी ने भी बीजेपी के आज़माये हुए इसी नुस्ख़े को और सफलता से अपनाया।

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Police and Students Jamia

नये नागरिकता क़ानून का उग्र विरोध असम से शुरू भले ही हुआ, लेकिन अब ये तक़रीबन देशव्यापी है। विरोध स्वरूप सड़कों पर उतरने वाले नागरिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सरकारी तंत्र की सारी अपीलें भी बेअसर साबित हैं। विरोध की आग के रोज़ाना किसी न किसी नये इलाके में फैलने की ख़बरें हैं। विरोधियों को कुचलने के लिए पुलिस की बर्बरता, सरकारी सम्पत्तियों की तबाही, तरह-तरह की अफ़वाहों का फ़ैलना, जनजीवन का अस्त-व्यस्त होना, मृतकों और घायलों की संख्या का बढ़ना, विपक्षी पार्टियों का आक्रोशित होना और सत्ता पक्ष की ओर से विरोधियों पर सियासी रोटियाँ सेंकने का आरोप लगाना — ये सभी बातें हमेशा होती रही हैं। हालाँकि, अब ज़माना बदल चुका है।

अब यदि आपको ये जानना है कि देश के किसी इलाके के हालात कैसे हैं तो इसका बेहद आसान ‘बैरोमीटर’ है कि यदि वहाँ मोबाइल और इंटरनेट बैन हुआ है या नहीं? यदि नहीं हुआ तो हालात काबू में हैं, यदि हुआ है तो स्थिति चिन्ताजनक और गम्भीर है। यदि लैंडलाइन का सम्पर्क भी ख़त्म है और लोगों की आवाजाही पर मनाही है या फिर कड़ा अंकुश है तो समझिए कि माहौल बेहद ख़तरनाक मुक़ाम पर है। पुलिस या सेना की बर्बरता अपने चरम पर है, मानवाधिकारों का वजूद ख़त्म है, प्रभावित इलाके के नागरिकों को बुनियादी सुविधाओं के लाले पड़े हैं।

Representative image: Police lathi charge Credit: YouTube screengrab

सरकारी तंत्र का हरेक बयान हमेशा लीपा-पोती भरा ही होता है। इसके रवैये में इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता कि सरकार किसकी है, सत्ता में कौन है? पुलिस या सेना को जब ‘ऊपर’ से हुक़्म मिलता है कि ‘विरोध को कुचल दो’ तो वो ‘हिंसा’ का इन्तज़ाम करती है। ऐसे तत्वों को विरोधियों के बीच घुसेड़ा जाता है जो हिंसा के हालात पैदा करें कि ‘पुलिस अपनी पे आ जाए’। पुलिस का अपनी पर आना ही बर्बरता है। वो विरोधियों को दंगाई, ज़िहादी, नक्सली, माओवादी जैसा बताएगी और उनका क़त्ल करके लाश को नदी या नहर में बहा देने से भी गुरेज़ नहीं करेगी। एनकाउन्टर तो उसके लिए चुटकियों का खेल है।

यदि ‘ऊपरी हुक़्म’ संयम दिखाने का है तो दर्ज़नों बसों-वाहनों-दुकानों और घरों के फूँके जाने के बावजूद किसी की भी मौत की ख़बर नहीं आएगी। इसीलिए कभी जहाँ महज धारा-144 वाली निषेधाज्ञा से ही बात बन जाती है, वहीं कभी कर्फ़्यू और सेना के फ़्लैग मार्च से भी बात नहीं बनती। अयोध्या विवाद का फ़ैसला आया तो निषेधाज्ञा से ही बात बन गयी। लेकिन 2016 के जाट आरक्षण आन्दोलन के वक़्त सेना का फ़्लैग मार्च भी हरियाणा की व्यापक तबाही को नहीं रोक सका। अभी 5 दिसम्बर 2019 को संसद के सामने ‘रेप और हत्या’ का विरोध कर रही इकलौती युवती पर बर्बरता दिखायी गयी। जबकि इसी संसद से फर्लांग भर दूर नार्थ ब्लॉग के सामने, 1996 में पत्रकारों को प्रदर्शन करने दिया गया।

केन्द्रीय गृह मंत्रालय यानी नार्थ ब्लॉक के सामने प्रदर्शन का वो इकलौता मौका था। तब सरकार या पुलिस ने बर्बरता नहीं दिखायी। उस अप्रत्याशित प्रदर्शन की अगुवाई अपने दौर के मशहूर सम्पादक सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने की थी और इसमें बीएसपी नेता कांशीराम के उस रवैये के ख़िलाफ़ विरोध जताया गया था, जिसमें उन्होंने रिपोर्टर आशुतोष को थप्पर मारा था। 2012 के निर्भया कांड के बाद विजय चौक और राजपथ जैसे अति-संवेदनशील और सुरक्षित इलाकों पर भी प्रदर्शन हुए, लेकिन पुलिस को बर्बरता दिखाने का हुक़्म नहीं था। अलबत्ता, ये वही दिल्ली पुलिस थी जिसने जून-2011 में रामदेव को सलवारी बाबा बनने के लिए मज़बूर कर दिया था।

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Demonstrators during a protest at Vijay Chowk, following the gangrape of a para-medical student in a moving bus, in New Delhi, December, 2012. (Sonu Mehta / HT File )

इसी पृष्ठभूमि में नागरिकों के लिए ये समझना बेहद ज़रूरी है कि आख़िर, मोबाइल या इंटरनेट बैन की नौबत क्यों आती है? दरअसल, बीजेपी या संघ परिवार का संचार-तंत्र हमेशा से बेजोड़ रहा है। कोई भी, कभी भी उनके आसपास तक नहीं फटक पाया। सोशल मीडिया और मोबाइल की मौजूदा पहुँच की बात तो छोड़िए, 1995 में देश में ‘टेली-डेन्सिटी’ भी बेहद मामूली सी थी, लेकिन तब 21 सितम्बर को गणेश चतुर्थी को ऐसी अफ़वाह फैली कि सारी दुनिया में गणेश जी प्रतिमाएँ दूध पीने लगी थीं। संचार-तंत्र की वो अद्भुत मिसाल थी। वहाँ से संघ-बीजेपी में जो आत्मविश्वास पनपा वो साल 2011-12 तक आते-आते अपने चरम पर जा पहुँचा। अब तक बीजेपी के IT Cell ने सारा मोर्चा सम्भाल लिया था।

WhatsApp University और सोशल मीडिया से कैसे-कैसे चमत्कार हो सकते हैं, इसे अमेरिका ने सारी दुनिया को उस वक़्त दिखाया, जब अनोखे प्रचार-तंत्र का फ़ायदा उठाकर जनवरी 2009 में बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बने। बीजेपी ने उस प्रयोग से न सिर्फ़ सबसे अच्छा सबक सीखा, बल्कि इसमें महारत भी हासिल की। अपने IT Cell की बदौलत तरह-तरह के झूठ, अफ़वाह और विरोधियों के चरित्र-हनन का सहारा लेकर बीजेपी ने 2014 में सबको धूल चटा दी। तब तक उसका IT Cell अभेद्य दुर्ग की तरह अपराजेय बन चुका था। 2015 में आम आदमी पार्टी ने भी बीजेपी के आज़माये हुए इसी नुस्ख़े को और सफलता से अपनाया।

Anna-Movement-Kiran-Bedi-Anna-Hazarey-Kejriwal-and-Sisodia
Anna Movement: Kiran Bedi, Anna Hazarey, Arvind Kejriwal and Manish Sisodia-
March 30, 2012

इसके बाद, राजनीति और राजकरण या गवरनेंस की रंगत ऐसी बदली कि इंटरनेट और मोबाइल बहुत बड़े हथियार बन गये। अब सत्ता में बैठे नेता और मंत्री अलग-अलग तरह की बातें फ़ैलाते हैं, तो अफ़सरों का हथकंडा कुछ और होता है। देखते ही देखते आईटी सेल का मुख्य काम भी ‘हिन्दू-मुस्लिम नैरिटव’ को हवा देना बन गया। इसी ने देश में ऐसी फ़िज़ा बनायी कि जो सरकार के साथ नहीं है, वो देशद्रोही है। अनुच्छेद-370 को ख़त्म करने के बाद कश्मीर में लोकतंत्र बर्ख़ास्त है। राज्य के बड़े-बड़े नेता अब भी जेलों में हैं। महीनों तक वहाँ इंटरनेट, मोबाइल और फ़ोन इसलिए ठप रहे क्योंकि सरकार नहीं चाहती है कि उसके नागरिक ही अपने नागरिकों के हाल-चाल की हक़ीक़त जानें। इसे दमन तो कहा जा सकता है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ऐसे दमनकारी हथकंडों का इस्तेमाल करने वाली बीजेपी कोई पहली और एकलौती पार्टी है। हमेशा से सत्ताधारी पार्टियों ने ऐसे ही तेवर अपनाये हैं। पुलिस और सेना हमेशा से बर्बर ही रही है। कोई अपवाद नहीं है।

अभी नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर बने हालात में सिर्फ़ इतना फ़र्क नज़र आया है कि बीजेपी का आईटी सेल और उसके तमाम छोटे-बड़े नेता और मंत्री तब तक साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए काम करते हैं, जब तक कि उन्हें सामने से भी माकूल जवाब ना मिलने लगे। हिंसा या विरोध प्रभावित इलाकों में जब ये जवाब ज़्यादा दमदार साबित होने लगते हैं तो क़ानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए विरोधियों के संचार-तंत्र को निष्क्रिय कर दिया जाता है। ऐसा कभी नहीं हुआ कि अफ़वाह फ़ैलाने की तिकड़मों को किसी एक पक्ष ने ही आज़माया हो। सरकारें और पुलिस भी ख़ूब झूठ फ़ैलाती रही हैं। अलबत्ता, हरेक मौक़े के लक्ष्य अलग-अलग ज़रूर होते हैं।

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Jamia Milia Students Anti CAB Protest at Delhi Jamia Nagar Area.

मसलन, दिल्ली में गरमाये विरोध का ताना-बाना यहाँ के आगामी विधानसभा चुनाव से जुड़ा है। IT Cell की मंशा है कि जामिया और जेएनयू के छात्रों के विरोध को मुसलमानों के विरोध की तरह पेश किया जाए। ऐसा करने से यदि हिन्दुओं का ध्रुवीकरण हो गया तो शायद, बीजेपी की दिल्ली में लाज़ बच जाए, वर्ना ज़मीनी स्तर पर हवा उसके ख़िलाफ़ है। हाल का चुनावी सर्वे भी इसकी पुष्टि करता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि यही फ़ार्मूला देश के अन्य इलाकों में भी लागू हो। मिसाल के तौर पर, दिल्ली में जामिया और ओखला के इलाकों में तो इंटरनेट बैन होगा, लेकिन बंगाल और असम में ये किसी छोटे इलाके तक सीमित नहीं रहेगा। अलीगढ़ और हैदराबाद में अपेक्षाकृत बड़ा इलाका प्रभावित होता है तो लखनऊ का छोटा क्षेत्र।

हालाँकि, इसी नियम के तहत, कश्मीर के इंटरनेट बैन को सबसे व्यापक व्यापक बनाया जाता है। लेकिन 2016 और 2018 में पश्चिम बंगाल का माल्दा साम्प्रदायिक आग में सुलगता रहता है और वहाँ इंटरनेट पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगता, क्योंकि तब IT Cell जैसी सामग्री फैला रहा था, उससे बीजेपी को बंगाल के चुनाव में फ़ायदा मिलने की उम्मीद दिख रही थी। ज़ाहिर है, यदि माहौल बीजेपी या सरकार के ख़िलाफ़ होगा तो इंटरनेट का बैन होना तय है। अलबत्ता, ये भी सही है कि किसी भी विरोध के हिंसक होने से सत्तारूढ़ पार्टी को ही फ़ायदा होता है क्योंकि हिंसा से आन्दोलन की गरिमा गिरने लगती है, उसकी शुचिता भंग होती है। आन्दोलनकारियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती ख़ुद को हिंसा से दूर रखने और किसी के उकसावे में नहीं आने की होनी ही चाहिए। वर्ना, सारी मेहनत पर पानी फिरते देर नहीं लगती।

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यदि देश में ‘समानान्तर सरकार’ चल रही है तो क्या भारत में गृह युद्ध छिड़ चुका है?

आश्चर्य की बात तो यह भी है कि सरकार को नाख़ुश कर रहे 19 हाईकोर्ट का क्षेत्राधिकार तक़रीबन 90 फ़ीसदी आबादी से जुड़ा हुआ है। क्या यह माना जाए कि कोरोना संकट के आगे देश का सारा संवैधानिक ढाँचा चरमरा चुका है। हालात पूरी तरह से हाथ से निकल चुके हैं। सरकारों ने जनता को उसकी क़िस्मत के हवाले कर दिया है।

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Parliament

कोरोना संकट की आड़ में जैसे श्रम क़ानूनों को लुगदी बनाया गया, क्या वैसा ही सलूक अब न्यायपालिका के साथ भी होना चाहिए? क्योंकि बक़ौल सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता, देश के 19 हाईकोर्ट्स के ज़रिये ‘कुछ लोग समानान्तर सरकार’ चला रहे हैं। ज़ाहिर है, ‘इन लोगों’ की जजों के साथ मिलीभगत भी होगी ही। वर्ना, देश के दूसरे नम्बर के सर्वोच्च विधि अधिकारी सॉलिसीटर जनरल की मति तो नहीं ही मारी गयी होगी कि वो न्यायपालिका के सबसे बड़े ‘प्रतीक और मन्दिर’ सुप्रीम कोर्ट में ‘समानान्तर सरकार’ के वजूद में आ जाने की दुहाई दें।

सॉलिसीटर जनरल कोई राजनेता तो होता नहीं। उनका तो काम ही है कि न्यायपालिका के सामने सरकार का पक्ष रखना, सरकार का बचाव करना भले ही इसके लिए उन्हें झूठी दलीलें तक क्यों ना गढ़नी पड़ें। तुषार मेहता कोई इकलौते नहीं हैं। अतीत में भी सभी विधि अधिकारियों ने ऐसे ही किरदार निभाये हैं। लेकिन पहले कभी देश में लोकतांत्रिक सरकारें होने के बावजूद ‘समानान्तर सरकार’ चलने की नौबत नहीं आयी। ये सही भी पहले कभी कोरोना संकट भी नहीं आया। हालाँकि, हैज़ा, प्लेग, चेचक जैसी महामारियाँ पहले भी आती रही हैं। लिहाज़ा, अब यदि वाक़ई में सॉलिसीटर जनरल सही फ़रमा रहे हैं कि देश में ‘समानान्तर सरकार’ चल रही है तो निश्चित रूप से मानना पड़ेगा कि देश में सर्वोच्च किस्म का संवैधानिक संकट खड़ा हो चुका है।

समानान्तर सरकार की नौबत कैसे आयी?

क्या संवैधानिक सरकारों के रहते हुए ‘समानान्तर सरकार’ का चलना ये बताता है कि देश में अघोषित गृह युद्ध की दशा पैदा हो चुकी है? यदि हाँ, तो ये सबसे गम्भीर स्थिति है। इसीलिए ये सवाल भी लाज़िमी है कि देश में लोकसभा के अस्तित्व में रहते हुए, ‘वैधानिक’ सरकारों के रहते हुए, अनुशासित सेनाओं और परमार्थ की ख़ातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर पुलिस तथा ‘वफ़ादार’ नौकरशाही के रहते हुए, परम राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और परम देश भक्त राजनीतिक दल भारतीय सत्ता पार्टी (BJP) की अपार बहुमत वाली मोदी सरकार के रहते हुए भी ‘समानान्तर सरकार’ चलने की नौबत कैसे आ गयी?

यदि ‘समानान्तर सरकार’ की नौबत इसलिए आयी कि न्यायपालिका उच्चशृंखल होकर अपनी लक्ष्मण रेखाओं को लाँघ रही है तो क्या देश की ख़ातिर न्यायपालिका को भंग करने का वक़्त नहीं आ गया है? आख़िर, न्यायपालिका देश से बढ़कर तो नहीं हो सकती और सरकार से बढ़कर देश का हितैषी और कौन हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट में तुषार मेहता बहैसियत ‘सरकार’ ही तो बोल रहे थे। गनीमत है कि उन्होंने बहुत संयम दिखाते हुए सुप्रीम कोर्ट से हाईकोर्ट्स पर नकेल कसने की गुहार नहीं लगायी। ज़ाहिर है, सरकार बहुत सब्र से पेश आ रही है। इसीलिए ‘समानान्तर सरकार’ चलाने वालों को फ़िलहाल, देशद्रोही भी नहीं बताया जा रहा। लेकिन कौन जाने कि पानी कब सिर से ऊपर चला जाए।

देश के 25 में से 19 हाईकोर्ट बने बाग़ी?

130 करोड़ भारतवासियों को ये कौन समझाएगा कि संविधान ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट्स को नागरिकों के मूल अधिकारों का संरक्षक बनाया है? कोरोना संकट को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी दर्ज़नों फ़रियादें पहुँचीं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के हरेक दावे को ब्रह्म सत्य माना। ऐसे में हाईकोर्ट्स की ये ज़ुर्रत कैसे हो सकती कि वो सरकारों को तरह-तरह की हिदायतें दें और यहाँ तक कि ख़ुद अस्पतालों का दौरा करके वहाँ की दुर्दशा का जायज़ा लेने की धमकियाँ दें? दिलचस्प तो ये भी है कि ‘समानान्तर सरकार’ चलाने वाले कोई एकाध जज या हाईकोर्ट नहीं है, जिन्हें अपवाद समझकर नज़रअन्दाज़ किया जा सके। बल्कि देश के 25 में से 19 हाईकोर्ट्स सरकारों को प्रति बाग़ी तेवर दिखा चुके हैं।

अभी तक कोरोना संकट से पनपे हालात को देखते हुए जिन हाईकोर्ट्स ने जनहित याचिकाओं की सुनवाई की है, वो हैं: इलाहाबाद, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, केरल, आन्ध्र प्रदेश, बॉम्बे, कोलकाता, दिल्ली, पटना, उड़ीसा, सिक्किम, मणिपुर, मेघालय, तेलंगाना, गुवाहाटी, मद्रास, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश। इनमें से पटना, दिल्ली, आन्ध्र प्रदेश और बॉम्बे हाईकोर्ट ने तो इतनी हिम्मत दिखा दी कि वो हालात का स्वतः संज्ञान (sue motto) लेकर सरकारों से जबाब-तलब करने लगे, उन्हें फ़टकार लगाने लगे और सख़्त हिदायतें देने लगे।

गुजरात हाईकोर्ट ने हद्द पार की?

गुजरात हाईकोर्ट ने तो हद्द ही कर दी। इसके जजों ने तो अद्भुत गुजरात मॉडल की बखियाँ उधेड़नी शुरू कर दी, उसमें पतीला लगाना शुरू कर दिया। कभी अहमदाबाद के सिविल अस्तपाल को कालकोठरी बता दिया तो कभी ग़रीब मरीजों की देखभाल, अस्पतालों में वेंटिलेटर की कमी, डॉक्टरों और हेल्थ वर्कर्स के लिए सुरक्षा को लेकर विजय रूपाणी सरकार के कामकाज़ पर सवालिया निशान लगाये। इसकी जेबी परदीवाला और जस्टिस इलेश जे वोहरा वाली खंडपीठ ने सिविल अस्पताल पर छापा मारने तक की धमकी दे डाली।

कोरोना संकट को लेकर दिन-रात अपनी पीठ ख़ुद ठोंकने में जुटी मोदी सरकार के लिए हाईकोर्ट के ऐसा रवैया नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त तो होना ही था। लिहाज़ा, चीफ़ जस्टिस विक्रम नाथ ने सरकार के ज़ख़्मों पर मरहम लगाते हुए ‘कोरोना क्राइसिस के जुड़े मामलों’ की सुनवाई कर रही परदीवाला-वोहरा खंडपीठ को ही भंग कर दिया। बेचारे, ऐसा नहीं करते तो क्या उनके सुप्रीम कोर्ट पहुँचने का दरवाज़ा हमेशा-हमेशा के लिए बन्द नहीं हो जाता? इसी तरह, तेलंगाना हाईकोर्ट में जस्टिस आर एस चौहान और बी विजयसेन रेड्डी की खंडपीठ ने तो केसीआर सरकार पर संक्रमितों की संख्या को छिपाने को लेकर फटकार लगा दी और अस्पतालों को आदेश दे दिया कि वो शवों का पोस्टमार्टम किये बग़ैर उन्हें अस्पतालों से बाहर नहीं होने दें।

क्या संवैधानिक ढाँचा चरमरा गया?

मोदी सरकार ने वही किया या करवाया जो उसके स्वभाव में है। लेकिन ताज़्ज़ुब की बात तो ये है कि अचानक हमारी हाईकोर्ट और उसके जज इतने दुस्साहसी कैसे होने लगे कि वो ‘सरकार’ को नाख़ुश करने वाले आदेश देने लगें। आश्चर्य की बात तो ये भी है कि सरकार को नाकुश कर रहे 19 हाईकोर्ट्स का क्षेत्राधिकार तक़रीबन 90 फ़ीसदी आबादी से जुड़ा हुआ है। क्या ये माना जाए कि कोरोना संकट के आगे देश का सारा संवैधानिक ढाँचा चरमरा चुका है। हालात पूरी तरह से हाथ से निकल चुके हैं। सरकारों ने जनता को उसकी किस्मत के हवाले कर दिया है।

हाईकोर्ट्स के तेवरों से सरकार के लिए दूसरा ख़तरनाक सन्देश ये उभरा है कि इसके जजों में अब दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस एस मुरलीधर के वाक़ये का कोई ख़ौफ़ नहीं रह गया है। अभी महज तीन महीने पहले, फरवरी 2020 में जस्टिस मुरलीधर को दिल्ली के साम्प्रदायिक दंगों को लेकर सख़्ती दिखाने की सज़ा रातों-रात उनका तबादला करके दी गयी थी। शायद, उन्होंने बीजेपी के नेताओं के भड़काऊ बयानों पर दिल्ली पुलिस और सरकार को फटकार लगाकर उस ‘लक्ष्मण रेखा’ को पार कर दिया था, जिसने आगे चलकर ‘समानान्तर सरकार’ जैसे संवैधानिक संकट का रूप ले लिया।

रेलमंत्री के दावों की हक़ीकत

28 मई को रेलमंत्री पीयूष गोयल ये बताते हुए ख़ासे प्रसन्न थे कि “कोरोना आपदा में रेलवे की श्रमिक स्पेशल ट्रेनों ने अभी तक 50 लाख से अधिक कामगारों को सुविधाजनक व सुरक्षित तरीके से उनके गृहराज्य पहुंचाया है। इसके साथ ही रेलवे अब तक 84 लाख से अधिक निशुल्क भोजन व 1.25 करोड़ पानी की बोतल भी वितरित कर चुकी है।” इस बयान के भारी भरकम आँकड़े यदि आपको सुखद लगें तो ज़रा इसका विश्लेषण करके देखिए।

जब मुफ़्त भोजन वाले 84 लाख पैकेट को 50 लाख कामग़ारों को दिया गया होगा तो हरेक कामग़ार के हिस्से में दो पैकेट भी नहीं आये। 16 लाख कामग़ार ऐसे ज़रूर रहे होंगे जिन्हें दूसरा पैकेट मिलने से पहले ही पैकेट ख़त्म हो चुके होंगे। इसी तरह, 1.25 करोड़ पानी की बोतल का हिसाब भी प्रति कामग़ार सवा दो बोतल ही बैठता है। अब ज़रा सोचिए कि सवा दो बोतल पानी और एक-डेढ़ पैकेज खाने के साथ मौजूदा गर्मी के मौसम ट्रेन का जनरल क्लास के डिब्बे में 2-4 दिन का औसतन सफ़र करने वाले कामग़ारों पर क्या-क्या बीतती होगी? ज़रा सोचिए कि क्या कोई ईमानदारी से रेलमंत्री की वाहवाही कर सकता है?

इसी तरह, आप चाहें तो रेलमंत्री के अन्य ट्वीट्स को देखकर भी अपना सिर धुन सकते हैं। मसलन, मुज़फ़्फ़रपुर में रेलवे स्टेशन पर अपनी माँ का कफ़न खींचकर उसे जगा रहे नन्हें बच्चे वाली वारदात के बारे में पीयूष गोयल बताते हैं कि “हमें संवेदना रखनी चाहिये, जो वीडियो वॉयरल हुआ उसकी पूरी छानबीन हुई, मृतक के रिश्तेदारों ने लिखित में बयान दे कर बताया कि वह पहले से बीमार थी, और उसके कारण उनकी मृत्यु हुई।” उनका अगला दावा देखिए, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि यात्रा के दौरान किसी कारणवश किसी का देहांत हो गया, लेकिन इसमें खाना नही मिला, या पानी नही मिला, ऐसी कोई स्थिति नही थी।”

श्रमिक स्पेशल ट्रेनें या लेबर रूम?

इसी वक़्त रेल मंत्री ये भी बताते हैं कि “30 से अधिक बच्चे श्रमिक ट्रेनों में पैदा हुए हैं।” अब ये आप है कि आप चाहें तो गर्व करें कि श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की गुणवत्ता इतनी उम्दा थी कि उसमें सफ़र कर रही गर्भवती महिलाओं ने उसे किसी अस्पताल के ‘लेबर रूम’ जैसा समझ लिया। या फिर आप ये भी मान सकते हैं कि इन जच्चाओं की दशा सफ़र के दौरान इतनी बिगड़ गयी कि वो चलती ट्रेन में प्रसव पीड़ा झेलती रहीं। इसी सिलसिले में एक के एक करके ट्वीट किये गये एक अन्य ट्वीट में रेलमंत्री बताते हैं कि “राज्य सरकारों की जिम्मेदारी तय की गयी थी, केंद्र ने पैसा भी दिया था, महिलाओं के खाते में पैसा भी भेजा, मुफ्त में अनाज भी दिया। जिन राज्यों ने अच्छे से जिम्मेदारी का पालन किया वहां कोई समस्या नही आई।”

अब ज़रा पीयूष गोयल के एक और ट्वीट पर ग़ौर फ़रमायें। “PM @NarendraModi जी का ये विज़न था , उन्होंने ये समझा कि देश में अगर संक्रमण रोकने के लिये वॉयरस की चैन नही तोड़ते, और स्वास्थ्य सेवाओं को बढाने का समय नही मिलता तो कितना गंभीर संकट देश के ऊपर आ सकता था। उन्होंने बहुत सूझबूझ से ये Lock Down घोषित किया।”

इस तरह, मोदी सरकार के चहेते वरिष्ठ मंत्री ने ये साफ़ कर दिया कि मोदीजी के सूझबूझ भरे लॉकडाउन के ज़रिये वॉयरस की चेन तोड़ी गयी, स्वास्थ्य सेवाएँ बढ़ायी गयीं, श्रमिकों को पूरी सुख-सुविधा के साथ उनके घरों तक भेजा गया। इसके बाद भी यदि किसी का कोई ग़िला-शिकवा है तो उसके लिए राज्य ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि जिन एनडीए शासित राज्यों ने अपनी ज़िम्मेदारी निभायी वहाँ कोई समस्या नहीं आयी। इसके बावजूद, देश के 19 हाईकोर्ट्स यदि किसी निहित राजनीतिक स्वार्थ की वजह से ‘समानान्तर सरकार’ चलाने पर आमादा हैं तो सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसीटर जनरल ऐसे ‘गुस्ताख़’ हाईकोर्ट्स के साथ क्या नरमी से पेश आएँगे?

Mukesh Kumar Singh मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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बेशक़, प्रधानमंत्री की सहमति से ही हो रही है श्रम क़ानूनों की ‘हत्या’!

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Migrant Worker labour laws

ऐसे वक़्त में जब कोरोना संक्रमण से पैदा हुई चुनौतियाँ बेक़ाबू ही बनी हुई हैं, तभी हमारी राज्य सरकारों में एक नया संक्रमण बेहद तेज़ी से अपने पैर पसार रहा है। बीते पाँच दिनों में छह राज्यों ने 40 से ज़्यादा केन्द्रीय श्रम क़ानूनों को अपने प्रदेशों में तीन साल के लिए निलम्बित करने का असंवैधानिक और मज़दूर विरोधी फ़ैसला ले लिया।

पहले से ही तक़रीबन बेजान पड़े इन श्रम क़ानूनों को ताक़ पर रखने के संक्रमण की शुरुआत 5 मई को मध्य प्रदेश से हुई। दो दिन बाद इस संक्रमण ने उत्तर प्रदेश और गुजरात को अपनी चपेट में ले लिया। फिर 10 मई को ओडिशा, महाराष्ट्र और गोवा की सरकारों ने भी पूँजीपतियों की मदद के नाम पर मज़दूरों के शोषण के लिए सारे रास्ते खोलने का ऐलान कर दिया। यही रफ़्तार रही तो इस मज़दूर विरोधी संक्रमण को राष्ट्रव्यापी बनने में देर नहीं लगेगी।

कोरोना संकट के दौरान मोदी सरकार ने एक से बढ़कर एक ग़रीब विरोधी और अदूरदर्शी फ़ैसले लिये। लॉकडाउन की आड़ में ग़रीबों पर ऐसे सितम हुए जो भारत में पहले कभी देखे या सुने नहीं गये। दिल दहलाने वाला सबसे बड़ा सितम तो ये रहा कि ग़रीबों की न सिर्फ़ रोज़ी-रोटी छिनी बल्कि जब वो सिर पर कफ़न बाँधकर बड़े-बड़े शहरों से अपने गाँवों को लौटने के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल ही सड़क नापने लगे तब उन पर पुलिसिया डंडे बरसाये गये। अब मुट्ठी भर ग़रीबों के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाने की रस्म अदायगी भी इसीलिए हुई है, ताकि इनकी देखा-देखी विदेश में फँसे सम्पन्न लोगों को विमानों और जहाज़ों से देश में वापस लाया जा सके।

ट्रेनों के अनिश्चितकालीन इन्तज़ार से जिन ग़रीबों का ऐतबार उठ चुका था, उन्हें सड़कों-हज़ारों किलोमीटर लम्बी सड़कों को पैदल भी नहीं नापने दिया जा रहा। जबकि सम्पन्न वर्ग के बच्चों के लिए कोटा बसें भेजीं गयी, स्पेशल ट्रेन चली, हरिद्वार में फँसे गुजरातियों को बसों में भरकर उनके घर पहुँचाया गया तो नांदेड़ में फँसे सिख श्रद्धालुओं को कोरोना के साथ पंजाब पहुँचाया गया। दूसरी ओर, चिलचिलाती धूप में भूखे-प्यासे सड़क नाप रहे ग़रीबों ने तो अपने मुँह पर मॉस्क या रुमाल या गमछा भी बाँध रखा है और वो सोशल डिस्टेंसिंग भी बरत रहे हैं।

जो प्रधानमंत्री ग़रीबों को रोना रोता रहा हो, जो ग़रीबों की सरकार होने और उनका मसीहा होने का जुमला बेचता रहा हो, उसकी नाक के नीचे बदनसीब ग़रीबों को सड़कों तो क्या रेल की पटरियों पर बिछे कंक्रीट पर भी नहीं चलने दिया जा रहा। ऐसा लग रहा है जैसे मोदी सरकार, ग़रीबों और मज़दूरों को जीते-जी मार डालने की किसी ख़ुफ़िया नीति पर काम कर रही है। एक हज़ार दिनों के लिए श्रम क़ानूनों का ख़ात्मा भी इसी साज़िश का हिस्सा है। वैसे भी भारत में ‘मज़दूरों के अधिकार’ सिर्फ़ क़ानून की किताबों तक ही सीमित थे, लेकिन अब कोरोना की आड़ में इन्हें किताबों से भी हटाया जा रहा है।

लॉकडाउन से पहले 130 करोड़ की भारतीय आबादी में क़रीब 31 करोड़ कामग़ार थे। इसमें से 92 फ़ीसदी असंगठित क्षेत्र से जुड़े थे। ये असंगठित सिर्फ़ इसीलिए कहलाये, क्योंकि इन्हें किताबी श्रम क़ानूनों ने कभी संरक्षण नहीं दिया। कुल कामगारों में से अब तक क़रीब 12 करोड़ लोग बेरोज़गार हो चुके हैं। दिहाड़ी मज़दूरों की तो कभी कोई पूछ रही ही नहीं, वेतन भोगी मज़दूरों को भी अप्रैल की तनख़्वाह नहीं मिली। बंगलुरू की अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के मुताबिक, 90 फ़ीसदी मज़दूरों को उनके नियोक्ता यानी इम्पलायरों ने बक़ाया मज़दूरी नहीं दी।

हमारी सामन्ती संस्कृति और इसी पर खड़े पूँजीवादी तंत्र ने देखते ही देखते ‘मज़दूरों के अधिकारों’ और ‘ट्रेड यूनियन’ का ऐसा चरित्र-हनन किया जैसा अभी राहुल गाँधी और नेहरू का हो रहा है। पूँजीवादी मीडिया और समाज में सामाजिक सुरक्षाओं से सबसे ज़्यादा लाभान्वित सरकारी कर्मचारियों के तबक़े ने ‘ट्रेड यूनियन्स’ के प्रति ऐसी नफ़रत फैलायी कि आज सरकारों ने चुटकी बजाकर ‘मज़दूरों के अधिकारों’ को ख़त्म करने की हिम्मत दिखा दी। यही वजह है कि देश में ‘न्यूनतम मज़दूरी’ अब भी एक ख़्वाब ही है। बीते दशकों में ठेका प्रथा का ऐसे विस्तार हुआ, जैसा अभी तक कोरोना का भी नहीं हुआ।

ये आलम किसी से छिपा नहीं है कि मज़दूरों को उनके अधिकार सरकारी श्रम विभाग तो छोड़िए, अदालतें में नहीं दिला रही हैं। मज़दूरों के हक़ों के मामले हमारी अदालतों में दशकों तक इंसाफ़ का मुँह ही देखते रहते हैं। इसीलिए व्यवहारिक तौर पर देश के श्रम क़ानूनों दिखावटी या शो-पीस बने हुए मुद्दत हो गयी, हालाँकि ये मज़दूरों के सैकड़ों बरस के संघर्ष के बाद अस्तित्व में आये थे। अभी जिन क़ानूनों को ख़त्म किया गया है उनमें से कई तो आज़ादी से भी कहीं ज़्यादा पुराने हैं। जैसे 1883 का Factories Act, जिसने काम के लिए आठ घंटे की सीमा बनायी, बाल श्रम को निषेध बनाया, महिलाओं को रात की ड्यूटी पर नहीं लगाने का नियम बनाया। इसी तरह 1926 में बने Trade Union Act को संविधान में अनुच्छेद 19(1)(c) के रूप में मौलिक अधिकार की ताक़त से जोड़ा गया।

1936 के Payment of Wages Act से मज़दूरों को हर महीने वेतन पाने का हक़ मिला। कुछ श्रम क़ानून तो ऐसे हैं जो संविधान से भी पहले के हैं। जैसे 1947 का Industrial Dispute Act, 1948 का Minimum Wage Act. दिलचस्प बात ये भी है कि जिन उद्यमियों को ख़ुश करने के लिए अभी श्रम क़ानूनों की हत्या की गयी है, उनके बारे में कभी कोई ऐसा प्रमाणिक अध्ययन या शोध सामने नहीं आया कि इनकी वजह से ही भारतीय उद्योग पिछड़ा हुआ है। अलबत्ता, ये सही है कि इन क़ानूनों से जो इंस्पेक्टर राज पैदा होता था, उससे सरकारी भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता था। लिहाज़ा, ज़रूरत भ्रष्टाचारी तंत्र को सुधारने की थी, लेकिन इसकी जगह सरकारों ने उन क़ानूनों को सफ़ाया कर दिया जो मज़दूरों को झूठी दिलासा दिलाते रहते थे।

ये किससे छिपा है कि देश में सरकारें पूँजीपतियों की मुट्ठी में ही रही हैं। इसीलिए धन्ना सेठों को कर्ज़ के ज़रिये बैंकों को लूटने की छूट हर दौर में मिलती रही है। ये बात अलग है कि मोदी राज में ये काम बेहद बड़े और व्यापक पैमाने पर हो रहा है। इसीलिए सिर्फ़ इसी तबके ने ‘अच्छे दिन’ का पूरा मज़ा लूटा है। आगे भी इसी की लूट को आसान बनाया जा रहा है। दिलचस्प बात ये भी है कि राज्यों ने चुटकी बजाकर जिस ढंग से अध्यादेश जारी करके केन्द्रीय श्रम क़ानूनों को निलम्बित करने का रास्ता थामा है, उसे संसद ने बरसों-बरस की मशक्कत और अनुभव से तैयार किया था। इसीलिए, राज्यों का फ़ैसला एकतरफ़ा नहीं हो सकता। उनके अध्यादेश को केन्द्र सरकार की रज़ामन्दी की बदौलत राष्ट्रपति की मंज़ूरी भी चाहिए।

इतना तो साफ़ दिख रहा है कि बग़ैर सोचे-समझे, बिना पर्याप्त तैयारी के नोटबन्दी और लॉकडाउन जैसे कड़े फ़ैसले लेने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘मज़दूरों के अधिकारों’ और ‘ट्रेड यूनियन’ को ख़त्म करने के लिए बाक़ायदा अपनी सहमति दी होगी, वर्ना शिवराज सिंह चौहान, योगी आदित्य नाथ, विजय रूपाणी और प्रमोद सावंत जैसों की हिम्मत नहीं हो सकती थी कि वो अपनी मर्ज़ी से इतना बड़ा फ़ैसला ले लें। नवीन पटनायक भी बीजेपी की बी-टीम वाले नेता ही हैं। लेकिन ये बात समझ से परे है कि काँग्रेस और एनसीपी की बैसाखियों पर सवार उद्धव ठाकरे को बीजेपी जैसी मूर्खता करने की क्या पड़ी थी? इन्हें तो बहुत जल्द ही पछताना पड़ेगा।

मौजूदा राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द में इतनी हिम्मत नहीं हो सकती कि वो छह राज्य सरकारों के असंवैधानिक अध्यादेश पर दस्तख़त करने से मना कर दें। क्योंकि देश ने उनकी स्वामि-भक्ति की शानदार लीला को 22 और 23 नवम्बर 2019 की उस ऐतिहासिक रात को देख लिया था, जब उन्होंने रातों-रात महाराष्ट्र से राष्ट्रपति शासन हटाने की अनुमति दे दी थी, ताकि सुबह 7 बजे राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी चटपट देवेन्द्र फड़नवीस की ताजपोशी करवा सकें। पेशे से वकील रह चुके राष्ट्रपति कोविन्द की संवैधानिक समझ को जनता ने उस वक़्त भी देखा था जब उन्होंने विवादास्पद नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) पर दस्तख़त किये थे।

वैसे जिन कोविन्द साहब से अभी श्रम क़ानूनों की परोक्ष रूप से हत्या करवायी जाएगी, उन्होंने ही 8 अगस्त 2019 को उस Code on Wages, 2019 पर दस्तख़त किये थे, जिसे मोदी सरकार ने अपने उद्यमी दोस्तों को ख़ुश करने के लिए श्रम सुधारों का नाम देकर संसद से पारित करवाया था। इस नये क़ानून की नौटंकी से भी कभी किसी का भला नहीं हुआ क्योंकि इसे लागू करने के लिए नियम (Rules) बनाने की सरकार को फ़ुर्सत ही नहीं थी। लिहाज़ा, कोविन्द के अब तक के अनुभव को देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि वो 2013 वाले एपीजे अब्दुल कलाम की तरह मनमोहन सिंह सरकार को Office of Profit Bill को या 1987 वाले ज्ञानी जैल सिंह की तरह राजीव गाँधी सरकार को Indian Post Office Bill पुनर्विचार के लिए लौटा भी सकते हैं।

फ़िलहाल, ‘मोदी है तो मुमकिन है’ वाला दौर है। इसमें सरकार हर उस काम को अवश्य करती है, जिसकी ज़बरदस्त आलोचना हो रही हो। मोदी जी किसी की नहीं सुनते। तानाशाह की तरह जो जी में आता है, वही करते हैं। उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े भारतीय मज़दूर संघ (BMS) ने श्रम क़ानूनों की हत्या को अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के उन सिद्धान्तों या conventions का सरासर उल्लंघन बताया है, जिन पर भारत ने भी दस्तख़त किये हैं। BMS अध्यक्ष शाजी नारायण का कहना है कि ‘श्रम क़ानूनों को ख़त्म किये जाने से ऐसी परिस्थितियाँ पैदा होंगी, जहाँ क़ानून के राज का नामोनिशान ही नहीं रहेगा।’

भारत ने अब तक ILO के 39 conventions पर दस्तख़त किये हैं। इसके आठ बुनियादी conventions को ही श्रम क़ानूनों में अपनाया गया है। मज़दूरों के हक़ का क़त्ल करने से दुनिया भर में भारत की ऐसी बेइज़्ज़ती होगी कि इसका प्रतिकूल असर उस काल्पनिक विदेशी निवेश पर भी पड़ेगा जिसकी उम्मीद में तमाम ऐतिहासिक मूर्खताएँ की जा रही हैं। इसीलिए ये साक्षात अन्धेर है। शर्मनाक है। पाग़लपन है। इससे सिर्फ़ इतना साबित हो रहा है कि कोरोना संकट के आगे हमारी सरकारें बदहवास हो चुकी हैं, अपनी सुध-बुध गवाँ चुकी हैं। इनकी मति मारी गयी है। इन पर सत्ता का ऐसा नशा सवार है कि इन्हें उचित-अनुचित का भी होश नहीं। ज़ाहिर है कि मोदीजी के सामने क़ानून के राज और संविधान की औक़ात ही क्या है!

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ओपिनियन

क्या काँग्रेस के लिए टर्निंग प्वाइंट बनेगी ग़रीबों का रेल-भाड़ा भरने की पेशकश?

राजनीति में हवा का रुख़ पलटने में ज़्यादा देर नहीं लगती। इसीलिए सभी राजनेता हर बात का राजनीतिकरण करने का मौक़ा ढूँढते रहते हैं। यह हवा जिसके ख़िलाफ़ होती है, वो हमेशा ‘इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए’ की दुहाई देता रहता है। पहले से ही अर्थव्यवस्था ख़राब हालत में थी। लॉकडाउन ने बचे-खुचे को भी ध्वस्त कर दिया। ग़रीबों पर ऐसी मार पहले कभी नहीं पड़ी। इसीलिए रेल-भाड़े की पेशकश कांग्रेस के लिए टर्निंग प्वाइंट बन सकती है।

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Sonia Gandhi Congress Prez

कोरोना संकट के दौरान परदेस में फँसे और पाई-पाई को मोहताज़ ग़रीब और प्रवासी मज़दूरों के लिए कांग्रेस की ओर से मदद का हाथ बढ़ाने की पेशकश से बीजेपी ख़ेमा सकपका गया। बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने तो अपनी ही सरकार की नीति पर ज़ोरदार हमला किया है। बीजेपी की लद्दाख इकाई के अध्यक्ष ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया तो इसके कई अन्य विधायक भी तमाम अव्यवस्था को लेकर अपनी ही सरकारों और उसके ज़िला प्रशासन को आड़े हाथ लेते रहे। उधर, सैकड़ों किलोमीटर सड़क को पैदल नापते हुए परदेस से अपने गाँवों की ओर बढ़ रहे ग़रीब प्रवासी मज़दूरों की ख़बरें आने और तसवीरों के वायरल होने का सिलसिला जारी है। ऐसे माहौल में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने ज़बरदस्त मास्टर स्ट्रोक लगाया है।

सोनिया का हमला

सोनिया गाँधी ने एलान किया कि परदेस में फँसे प्रवासियों को उनके गृह राज्यों तक भेजने का रेल भाड़ा यदि केन्द्र सरकार और रेलवे नहीं भर सकते तो कांग्रेस उनका ख़र्च उठाएगी। उनका बयान है कि श्रमिक और कामगार राष्ट्र-निर्माण के दूत हैं। जब हम विदेश में फँसे भारतीयों को हवाई जहाज से निशुल्क वापस लाने को अपना कर्तव्य समझते हैं तो ग़रीबों पर यही नियम लागू क्यों नहीं हो रहा? जब हम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के लिए अहमदाबाद के हुए आयोजन पर सरकारी खजाने से 100 करोड़ रुपये ख़र्च कर सकते हैं, जब प्रधानमंत्री के कोरोना फंड में रेल मंत्रालय 151 करोड़ रुपये दान दे सकता है, तो फिर तरक्की के ग़रीब ध्वज-वाहकों को आपदा की इस घड़ी में निशुल्क रेल यात्रा की सुविधा क्यों नहीं मिल सकती?

रेल-भाड़े की पेशकश

सोनिया गाँधी सिर्फ़ बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने कहा कि 24 मार्च को सिर्फ़ चार घंटे के नोटिस पर लगाये गये लॉकडाउन के कारण करोड़ों कामगार अपने घरों तक वापस लौटने से वंचित हो गये। 1947 के बँटवारे के बाद देश ने पहली बार ऐसे दिल दहलाने वाले मंजर देखे। हज़ारों प्रवासी कामगार सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर जाने के लिए मजबूर हो गये।

इन मज़दूरों के पास न राशन, न पैसा, न दवाई, न साधन, लेकिन जान पर खेलकर अपने गाँव पहुँचने की इनकी अद्भुत लगन देखकर भी केन्द्र सरकार को तरस नहीं आया। कांग्रेस पार्टी ने तय किया कि उसकी हरेक प्रदेश इकाई प्रवासी मज़दूरों के रेल-भाड़े का ख़र्च उठाएगी।

क्या है बेलछी नरसंहार?

इसे आज़ाद भारत में बिहार का पहला जातीय नरसंहार माना जाता है। मौजूदा नालन्दा ज़िले के बेलछी गाँव में 27 मई 1977 को 11 दलित खेतिहर मज़दूर ज़िन्दा जला दिये गये। गाँव का दबंग महावीर महतो और उसके गुर्गे बंदूक की नोंक पर मृतकों को उनके घरों से घसीटकर खुले मैदान में ले गये वहाँ उन्हें बाँधकर, आसपास से लकड़ियाँ और घास-फूस जमा करके ज़िन्दा जला दिया गया। महावीर महतो के सिर पर स्थानीय निर्दलीय विधायक इन्द्रदेव चौधरी का हाथ रहता था। उसने गाँव की सार्वजनिक सम्पत्ति और तालाब पर अवैध क़ब्ज़ा कर रखा था तथा अक्सर अन्य जातियों के लोगों को सताता था। उन्हीं दिनों दुसाध जाति का एक खेतीहर सिंघवा अपनी ससुराल बेलछी आया। उसने महावीर के ज़ुल्म के विरुद्ध गाँववालों को संगठित किया। यही विरोध बर्बर नरसंहार में बदल गया।

बेलछी से इंदिरा की वापसी

बेलछी काँड से दो महीने पहले, 24 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने थे। आपातकाल के बाद हुए चुनाव में इंदिरा गाँधी को जनता पार्टी से क़रारी हार मिली थी। वह सियासी सदमे में थीं। तभी बेलछी नरसंहार की ख़बर आयी। मौक़े की नज़ाकत भाँप इंदिरा गाँधी, विमान से दिल्ली से पटना, फिर कार से बिहार शरीफ पहुँच गयीं। अब उन्हें कच्ची सड़क से 25 किलोमीटर दूर बेलछी गाँव पहुँचना था। स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो ने सोनिया गाँधी की जीवनी ‘द रेड साड़ी’ में इस प्रसंग के बारे में इन्दिरा गाँधी के हवाले से लिखा:

“उस दिन तेज़ बारिश हो रही थी। बेलछी के रास्ते पर कीचड़-पानी की वजह से जीप का चलना मुश्किल था। सबने कहा कि ट्रैक्टर ही आगे जा सकता है। मैं सहयोगियों के साथ ट्रैक्टर पर चढ़ी। ट्रैक्टर भी कुछ दूर जाकर कीचड़ में फँस गया। मौसम और रास्ते को देख सहयोगियों ने वापस लौटने की राय भी दी। लेकिन मुझे तो धुन सवार थी कि हर हाल में बेलछी पहुँचना है। पीड़ित दलित परिवार से मिलना है। इसीलिए मैंने साथियों से कहा, जो लौटना चाहते हैं, लौट जाएँ। मैं तो बेलछी जाऊँगी ही। हालाँकि, मैं जानती थी कि कोई नहीं लौटेगा।”

इंदिरा गाँधी ने आगे बताया कि “कीचड़-पानी के बीच हम आगे बढ़ते रहे। शाम हो चली थी। आगे एक बरसाती नदी थी। इसे पार करने का उपाय नहीं था। तभी गाँव के मंदिर के हाथी ‘मोती’ का पता चला। लेकिन उस पर बैठने का हौदा नहीं था। मैंने कहा, चलेगा। हाथी पर कंबल-चादर बिछाकर बैठने की जगह बनायी गयी। आगे महावत बैठा। उसके बाद मैं और मेरे पीछे प्रतिभा पाटिल बैठीं। प्रतिभा डर से काँप रही थीं। उन्होंने मेरी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ रखा था। हाथी जब नदी के बीच पहुँचा तो पानी उसके पेट तक पहुँच गया। नदी पार होने तक अंधेरा घिर आया। बिजली कड़क रही थी। ये सब देख थोड़ी घबराहट भी हुई। लेकिन फिर मैं बेलछी के पीड़ित परिवारों के बारे में सोचने लगी। ख़ैर, जब बेलछी पहुँची तो रात हो चुकी थी। पीड़ित परिवारों से मिली। मेरे पहुँचने पर गाँववालों को लगा जैसे कोई देवदूत आ गया हो। मेरे कपड़े भीग चुके थे। उन्होंने मुझे पहनने के लिए सूखी साड़ी दी। खाने के लिए मिठाइयाँ दीं। फिर कहने लगे, आपके ख़िलाफ़ वोट किया, इसके लिए क्षमा कर दीजिए।”

बेलछी के बाद

पाँच दिन बाद इंदिरा गाँधी बेलछी से दिल्ली लौटीं। अब तक उनका बेलछी दौरा अन्तरराष्ट्रीय सुर्ख़ियाँ बटोर चुका था। ढाई महीने पहले जनता की ज़बरदस्त नाराज़गी झेल चुकी इंदिरा गाँधी के जज़्बे की अब ख़ूब तारीफ़ हो रही थी।

तब हाथी पर सवार होकर बेलछी जा रही इंदिरा गाँधी की तसवीर और इससे जुड़ी कहानी कहाँ नहीं छपी! इसी यादगार मोड़ पर राजनीति और लोकप्रियता में इंदिरा गाँधी की ऐसी वापसी हुई कि 1980 में हुए मध्यावधि चुनाव से वो बहुमत के साथ सत्ता में वापस लौटीं और मृत्यु तक प्रधानमंत्री रहीं।

ज़ाहिर है, राजनीति में हवा का रुख़ पलटने में ज़्यादा देर नहीं लगती। इसीलिए सभी राजनेता हर बात का राजनीतिकरण करने का मौक़ा ढूँढते रहते हैं। यह हवा जिसके ख़िलाफ़ होती है, वो हमेशा ‘इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए’ की दुहाई देता रहता है। यही वजह है कि ग़रीब प्रवासियों का रेल-भाड़ा भरने की कांग्रेस की पेशकश सोनिया गाँधी का मास्टर स्ट्रोक है। कोरोना संकट से पहले भी देश की आर्थिक दशा बहुत ख़राब थी। लॉकडाउन ने बचे-खुचे को भी ध्वस्त कर दिया। ग़रीबों पर ऐसी मार पहले कभी नहीं पड़ी। इसीलिए रेल-भाड़े की पेशकश कांग्रेस के लिए टर्निंग प्वाइंट बन सकती है। हालाँकि, चुनाव अभी बहुत दूर हैं और जनता की याददाश्त अच्छी नहीं होती।

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