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मेरठ में ‘ध्रुवीकरण’ पर टिकी है सियासी दलों की आस

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मेरठ, 5 अप्रैल | क्रांतिधरा कही जाने वाली मेरठ की धरती पर इस बार का लोकसभा चुनाव का मुकबला बहुत दिलचस्प रहने वाला है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को जीत की हैट्रिक बचाए रखने की चुनौती है तो सपा-बसपा गठबंधन को भी अपनी साख बचानी है। इसलिए पार्टियों ने जातिगत हिसाब से छांटकर प्रत्याशी उतारे हैं।

भाजपा ने अपने पुराने उम्मीदवार पर दांव खेला है। कांग्रेस ने भी अग्रवाल समाज के व्यक्ति पर भरोसा जताया है, लेकिन असली मुद्दे गायब हैं और पार्टियां ध्रुवीकरण के प्रयास में जुटी हैं।

भाजपा ने सांसद राजेंद्र अग्रवाल को प्रत्याशी बनाया गया है, जबकि सपा-बसपा गठबंधन के उम्मीदवार हाजी याकूब कुरैशी हैं। कांग्रेस ने बाबू बनारसी दास के बेटे हरेंद्र अग्रवाल, शिवपाल की पार्टी प्रसपा ने नासिर अली और शिवसेना ने आर.पी. अग्रवाल पर भरोसा जताया है।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अवनीश त्यागी के मुताबिक, इस बार सभी राजनीतिक दल ध्रुवीकरण के प्रयास में हैं। पिछली बार के सांसद से स्थानीय लोग नाराज जरूर हैं, लेकिन एक धड़ा मोदी के नाम पर वोट करने को तैयार है। चुनाव इस बार यहां मोदी विरोध और मोदी के समर्थन पर है।

उन्होंने कहा कि राजेंद्र अग्रवाल वैश्य, ब्राह्मण, त्यागी ठाकुर, गुर्जर, अतिपिछड़ों आदि के सहारे चुनावी मैदान में हैं, तो हाजी याकूब कुरैशी मुस्लिम तथा अनुसूचित जाति के साहरे मैदान मारने की फिराक में हैं। उधर, हरेंद्र अग्रवाल की भी वैश्य, अति पिछड़ों, मुस्लिमों आदि पर नजर है। सभी जातियों पर प्रत्याशियों के अपने-अपने दावे हैं।

उन्होंने बताया कि गन्ना बकाया विषय पर सिर्फ बयानबाजी हो रही है। आवारा पशुओं की समस्या के बजाय यहां पशु चोरी की समस्या हैं। हलांकि योगी सरकार आने के बाद इसमें कुछ कमी आई है, फिर भी किसानों को अपने पशुओं को बचाने के लिए चौकन्ना रहना पड़ता है। महिला छेड़छाड़ का बड़ा मुद्दा है, जिसमें कुछ प्रतिशत की कमी आई है, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

त्यागी और गुर्जर बिरादरी पूरी तरह से मोदी के नाम पर एकजुट है तो मुस्लिम और दलित वर्ग गठबंधन के साथ है और उन्हें यह दर्शाने में भी कोई संकोच नहीं।

मेरठ में कुल पांच विधानसभा क्षेत्र हैं। मेरठ शहर सपा के पास है। इसके अलावा बाकी चारो विधानसभाओं में भाजपा के विधायक हैं।

2014 में सभी पांच विधानसभाओं से भाजपा के राजेंद्र अग्रवाल को लगभग एक लाख वोट मिला था, जिसमें मुस्लिम को छोड़कर सारी जातियों ने इन पर भरोसा किया था। दलित वर्ग में जाटव को छोड़कर बाकी अन्य लोगों ने भी इन्हें वोट दिया था। इस बार यह थोड़ा कठिन है। मेरठ की कैंट विधानसभा में तो भाजपा को अच्छे मर्जिन से वोट मिलता आ रहा है। अन्य विधानसभा क्षेत्रों का रुख इस बार कुछ अलग है।

मेरठ कैंट के सामाजिक कार्यकर्ता रामकुमार ने बताया कि इस बार यहां हाईकोर्ट बेंच, स्मार्ट सिटी, जाम, कूड़ा प्रबंधन, कानून-व्यवस्था, अपराध नियंत्रण, गन्ना बकाया भुगतान जैसे अहम मुद्दे चुनावी हैं।

किठौर गांव के किसान धनीराम की मानें तो डेढ़ गुना लागत बढ़ाने की सिर्फ बातें हो रही हैं। अभी तक इसमें कुछ हासिल नहीं हुआ है। असौड़ा के मोहम्मद हनीफ कहते हैं कि पिछले चुनाव को ध्रुवीकरण की चटनी चटाई गई थी। लेकिन इस बार खेल कुछ अलग ही रहने वाला है। रमेश जाटव कहते हैं कि किसी के लिए यहां राह आसान नहीं है।

मुंडाली के सलीम कहते हैं कि चुनाव इस बात पर टिका है कि दलित और मुस्लिम समाज में कितना गठजोड़ होता है, लेकिन बेवजह का तीन तलाक मुद्दा छेड़ दिया गया है।

अमिता शर्मा कहती हैं कि कानून व्यवस्था हर चुनाव में मुद्दा रहता है, जो सीधा महिलाओं से जुड़ा है। इसमें ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है।

मेरठ के मोहम्मद अतहर कहते हैं की भाजपा हर बार की तरह यहां पर सम्प्रदायिकता का जहर घोल रही है। लेकिन इस बार उसका ध्रुवीकरण का कार्ड चलने वाला नहीं है।

भाजपा की ओर लोकसभा क्षेत्र में केंद्र और प्रदेश सरकार द्वारा हजारों करोड़ रुपये के विकास कार्य कराने का दावा किया जा रहा है। दिल्ली- मेरठ एक्सप्रेस-वे, दिल्ली से हापुड़, मेरठ से बुलंदशहर तक का राष्ट्रीय राजमार्ग, हाईस्पीड ट्रेन शुरुआत कराना, क्षेत्रीय हवाई सेवा, अकाशवाणी केंद्र निर्माण जैसे कई कार्य भाजपा सरकार में हुए हैं। पात्रों को सरकार की योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ दिलाया गया।

सांसद जिला कार्यालय पर लोगों की समस्याएं सुन रहे थे। उन्होंने कहा कि दिल्ली- मेरठ एक्सप्रेस-वे, दिल्ली से हापुड़, मेरठ से बुलंदशहर तक का राष्ट्रीय राजमार्ग क्षेत्र के लिए वरदान साबित होगा। उन्होंने कहा कि जनता की समस्याओं का गंभीरतापूर्वक समाधान किया जाएगा।

मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट पर 2़ 25 लाख वैश्य वोटर हैं। ठाकुर 60 हजार, ब्राह्मण डेढ़ लाख, जाट एक लाख, गुर्जर 90 हजार, मुस्लिम साढ़े पांच लाख, दलित तीन लाख, पंजाबी 50 हजार, पिछड़े व अन्य करीब चार लाख वोटर हैं।

यहां पर कुल मतदाताओं की संख्या 18 लाख 94 हजार 144 है। पुरुषों की संख्या 10 लाख 21 हजार 485 हैं। महिला मतदाता 8 लाख 50 हजार 525 हैं।

By : विवेक त्रिपाठी

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हेमंत की ‘बदलाव यात्रा’ ने बदली झारखंड की सत्ता और सियासत

हेमंत सोरेन ने ‘बदलाव यात्रा’ की शुरुआत संथाल परगना के साहिबगंज से की थी और इसका समापन रांची में हुआ। इस यात्रा के दौरान उन्होंने पूरे झारखंड के सुदूर इलाकों का दौरान किया और लोगों की समस्याएं सुनीं और उसके समाधान का वादा किया।

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Jharkhand CM oath-taking ceremony

रांची। झारखंड की राजनीति में एक सौम्य और साधारण चेहरा माने जाने वाले हेमंत को भले ही राजनीति विरासत में मिली है, परंतु अपने पिता शिबू सोरेन की छांव से खुद को बाहर निकाल कर उन्होंने अपने संघर्ष के बल दोबारा राज्य की सत्ता हासिल की है।

हेमंत ने चुनाव पूर्व अपने सहयोगियों के साथ सीट बंटवारे में उदारता दिखाई और सहयोगियों को खुश रखा। उन्होंने अपनी टीम को लेकर संघर्ष किया और झामुमो को उस जगह पहुंचाया, जहां पहुंचना कठिन-सा लगने लगा था। विधानसभा चुनाव में झामुमो सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। उन्होंने सहयोगियों के साथ ऐसा समन्वय बनाया कि सभी ने एक-दूसरे को सहयोग किया और गठबंधन बहुमत के आंकड़े से काफी आगे निकल गया।

हेमंत ने राजनीति का ककहरा अपने पिता शिबू सोरेन से सीखा है और राजनीति में उनका आगमन बड़े भाई दुर्गा सोरेन के आकस्मिक निधन के बाद हुआ। लेकिन जब उन्होंने राजनीति में कदम रखा तो इस मजबूती के साथ कि आज वह दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बन पाए हैं। हमेशा जनता के बीच रहना उनकी राजनीति का अहम हिस्सा रहा है और उसी के परिणामस्वरूप वह आगे बढ़ते चले गए। पारिवारिक और सामाजिक व्यक्ति की पहचान के साथ 2019 के विधानसभा चुनाव में हेमंत ने नई रणनीति बनाई और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की रघुवर दास सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया।

हेमंत ने अपने आज के अभियान की शुरुआत सितंबर, 2018 से ही कर दी थी। लोकसभा चुनाव से पहले जो अभियान झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने शुरू किया था, उसे ‘संघर्ष यात्रा’ का नाम दिया था। इसके तहत वह राज्य के सभी 263 प्रखंडों में पहुंचे और वहां जाकर सभाएं की। उन्होंने कार्यकर्ताओं में जोश भरा और युवाओं को पार्टी से जोड़ा।

इस दौरान झारखंड के लिए शहीद हुए आदिवासियों को उन्होंने सम्मानित भी किया। इसी दौरान उन्होंने अपनी एक 12 सदस्यीय टीम बनाई, जिसने बड़े पैमाने पर डिजिटल प्रचार अभियान चलाया।

लातेहार से झामुमो के नवनिर्वाचित विधायक वैद्यनाथ राम कहते हैं, “हेमंत को प्रारंभ से ही सादगी पसंद है। वह वन-टू-वन लोगों से मिलते हैं और उनकी समस्याओं को सुनकर उनके समाधान की कोशिश करते हैं। इससे लोगों में विश्वास पैदा होता है।”

झामुमो के संगठन से जुड़े एक नेता का कहना हैं, “संघर्ष यात्रा की समाप्ति के बाद हेमंत ‘बदलाव यात्रा’ पर निकल गए और उन्होंने लोगों से सत्ता बदलने की अपील की। इस दौरान उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को एकजुट रखा। पार्टी में ‘वन मैन’ की रणनीति के तहत सोरेन ने जमकर मेहनत की और सहयोगी दलों के साथ जुड़ाव बनाए रखा।”

हेमंत सोरेन ने ‘बदलाव यात्रा’ की शुरुआत संथाल परगना के साहिबगंज से की थी और इसका समापन रांची में हुआ। इस यात्रा के दौरान उन्होंने पूरे झारखंड के सुदूर इलाकों का दौरान किया और लोगों की समस्याएं सुनीं और उसके समाधान का वादा किया। लोगों की समस्याओं, उनके समाधान के मुद्दों को उन्होंने घोषणा-पत्र में शामिल किया।

इसका परिणाम यह हुआ कि संथाल परगना के आदिवासी बहुल सीटों तक सीमित मानी जाने वाली पार्टी राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में पहुंच गई। झामुमो का जनाधार बढ़ा, और पहली बार लातेहार और गढ़वा विधानसभा में झामुमो के उम्मीदवारों की जीत हुई।

सोरेन ने अपने अभियान को आधुनिक बनाने के लिए एक प्रोफेशनल टीम को सोशल मीडिया के लिए उतारा। झामुमो के कार्यकर्ताओं को इसके लिए प्रशिक्षण दिलाया और सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया। दूसरी ओर, सुदूर क्षेत्रों में पहुंचने के लिए उन्होंने साइकिल को साधन बनाया, जिस पर सवार होकर कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव लोगों से मुलाकात की और झामुमो का संदेश पहुंचाया।

हेमंत की इस कुशल रणनीति का परिणाम रहा कि भाजपा का ‘अबकी बार 65 पार’ का नारा धरा का धरा रह गया और झामुमो, राजद और कांग्रेस गठबंधन बहुमत का आंकड़ा पार कर सत्ता पर काबिज हो गया।

अब हेमंत के सामने झारखंड के लोगों से किए वादे निभाने की चुनौती है। देखने वाली बात होगी कि हेमंत अपने वादों को निभाने को लेकर कितना खरा उतर पाते हैं।

BY: मनोज पाठक

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पुलिस और सेना, सिर्फ़ तब बर्बर नहीं होती जब ‘ऊपर’ से हुक़्म होता है!

IT Cell की बदौलत तरह-तरह के झूठ, अफ़वाह और विरोधियों के चरित्र-हनन का सहारा लेकर बीजेपी ने 2014 में सबको धूल चटा दी। तब तक उसका IT Cell अभेद्य दुर्ग की तरह अपराजेय बन चुका था। 2015 में आम आदमी पार्टी ने भी बीजेपी के आज़माये हुए इसी नुस्ख़े को और सफलता से अपनाया।

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Police and Students Jamia

नये नागरिकता क़ानून का उग्र विरोध असम से शुरू भले ही हुआ, लेकिन अब ये तक़रीबन देशव्यापी है। विरोध स्वरूप सड़कों पर उतरने वाले नागरिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सरकारी तंत्र की सारी अपीलें भी बेअसर साबित हैं। विरोध की आग के रोज़ाना किसी न किसी नये इलाके में फैलने की ख़बरें हैं। विरोधियों को कुचलने के लिए पुलिस की बर्बरता, सरकारी सम्पत्तियों की तबाही, तरह-तरह की अफ़वाहों का फ़ैलना, जनजीवन का अस्त-व्यस्त होना, मृतकों और घायलों की संख्या का बढ़ना, विपक्षी पार्टियों का आक्रोशित होना और सत्ता पक्ष की ओर से विरोधियों पर सियासी रोटियाँ सेंकने का आरोप लगाना — ये सभी बातें हमेशा होती रही हैं। हालाँकि, अब ज़माना बदल चुका है।

अब यदि आपको ये जानना है कि देश के किसी इलाके के हालात कैसे हैं तो इसका बेहद आसान ‘बैरोमीटर’ है कि यदि वहाँ मोबाइल और इंटरनेट बैन हुआ है या नहीं? यदि नहीं हुआ तो हालात काबू में हैं, यदि हुआ है तो स्थिति चिन्ताजनक और गम्भीर है। यदि लैंडलाइन का सम्पर्क भी ख़त्म है और लोगों की आवाजाही पर मनाही है या फिर कड़ा अंकुश है तो समझिए कि माहौल बेहद ख़तरनाक मुक़ाम पर है। पुलिस या सेना की बर्बरता अपने चरम पर है, मानवाधिकारों का वजूद ख़त्म है, प्रभावित इलाके के नागरिकों को बुनियादी सुविधाओं के लाले पड़े हैं।

Representative image: Police lathi charge Credit: YouTube screengrab

सरकारी तंत्र का हरेक बयान हमेशा लीपा-पोती भरा ही होता है। इसके रवैये में इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता कि सरकार किसकी है, सत्ता में कौन है? पुलिस या सेना को जब ‘ऊपर’ से हुक़्म मिलता है कि ‘विरोध को कुचल दो’ तो वो ‘हिंसा’ का इन्तज़ाम करती है। ऐसे तत्वों को विरोधियों के बीच घुसेड़ा जाता है जो हिंसा के हालात पैदा करें कि ‘पुलिस अपनी पे आ जाए’। पुलिस का अपनी पर आना ही बर्बरता है। वो विरोधियों को दंगाई, ज़िहादी, नक्सली, माओवादी जैसा बताएगी और उनका क़त्ल करके लाश को नदी या नहर में बहा देने से भी गुरेज़ नहीं करेगी। एनकाउन्टर तो उसके लिए चुटकियों का खेल है।

यदि ‘ऊपरी हुक़्म’ संयम दिखाने का है तो दर्ज़नों बसों-वाहनों-दुकानों और घरों के फूँके जाने के बावजूद किसी की भी मौत की ख़बर नहीं आएगी। इसीलिए कभी जहाँ महज धारा-144 वाली निषेधाज्ञा से ही बात बन जाती है, वहीं कभी कर्फ़्यू और सेना के फ़्लैग मार्च से भी बात नहीं बनती। अयोध्या विवाद का फ़ैसला आया तो निषेधाज्ञा से ही बात बन गयी। लेकिन 2016 के जाट आरक्षण आन्दोलन के वक़्त सेना का फ़्लैग मार्च भी हरियाणा की व्यापक तबाही को नहीं रोक सका। अभी 5 दिसम्बर 2019 को संसद के सामने ‘रेप और हत्या’ का विरोध कर रही इकलौती युवती पर बर्बरता दिखायी गयी। जबकि इसी संसद से फर्लांग भर दूर नार्थ ब्लॉग के सामने, 1996 में पत्रकारों को प्रदर्शन करने दिया गया।

केन्द्रीय गृह मंत्रालय यानी नार्थ ब्लॉक के सामने प्रदर्शन का वो इकलौता मौका था। तब सरकार या पुलिस ने बर्बरता नहीं दिखायी। उस अप्रत्याशित प्रदर्शन की अगुवाई अपने दौर के मशहूर सम्पादक सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने की थी और इसमें बीएसपी नेता कांशीराम के उस रवैये के ख़िलाफ़ विरोध जताया गया था, जिसमें उन्होंने रिपोर्टर आशुतोष को थप्पर मारा था। 2012 के निर्भया कांड के बाद विजय चौक और राजपथ जैसे अति-संवेदनशील और सुरक्षित इलाकों पर भी प्रदर्शन हुए, लेकिन पुलिस को बर्बरता दिखाने का हुक़्म नहीं था। अलबत्ता, ये वही दिल्ली पुलिस थी जिसने जून-2011 में रामदेव को सलवारी बाबा बनने के लिए मज़बूर कर दिया था।

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Demonstrators during a protest at Vijay Chowk, following the gangrape of a para-medical student in a moving bus, in New Delhi, December, 2012. (Sonu Mehta / HT File )

इसी पृष्ठभूमि में नागरिकों के लिए ये समझना बेहद ज़रूरी है कि आख़िर, मोबाइल या इंटरनेट बैन की नौबत क्यों आती है? दरअसल, बीजेपी या संघ परिवार का संचार-तंत्र हमेशा से बेजोड़ रहा है। कोई भी, कभी भी उनके आसपास तक नहीं फटक पाया। सोशल मीडिया और मोबाइल की मौजूदा पहुँच की बात तो छोड़िए, 1995 में देश में ‘टेली-डेन्सिटी’ भी बेहद मामूली सी थी, लेकिन तब 21 सितम्बर को गणेश चतुर्थी को ऐसी अफ़वाह फैली कि सारी दुनिया में गणेश जी प्रतिमाएँ दूध पीने लगी थीं। संचार-तंत्र की वो अद्भुत मिसाल थी। वहाँ से संघ-बीजेपी में जो आत्मविश्वास पनपा वो साल 2011-12 तक आते-आते अपने चरम पर जा पहुँचा। अब तक बीजेपी के IT Cell ने सारा मोर्चा सम्भाल लिया था।

WhatsApp University और सोशल मीडिया से कैसे-कैसे चमत्कार हो सकते हैं, इसे अमेरिका ने सारी दुनिया को उस वक़्त दिखाया, जब अनोखे प्रचार-तंत्र का फ़ायदा उठाकर जनवरी 2009 में बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बने। बीजेपी ने उस प्रयोग से न सिर्फ़ सबसे अच्छा सबक सीखा, बल्कि इसमें महारत भी हासिल की। अपने IT Cell की बदौलत तरह-तरह के झूठ, अफ़वाह और विरोधियों के चरित्र-हनन का सहारा लेकर बीजेपी ने 2014 में सबको धूल चटा दी। तब तक उसका IT Cell अभेद्य दुर्ग की तरह अपराजेय बन चुका था। 2015 में आम आदमी पार्टी ने भी बीजेपी के आज़माये हुए इसी नुस्ख़े को और सफलता से अपनाया।

Anna-Movement-Kiran-Bedi-Anna-Hazarey-Kejriwal-and-Sisodia
Anna Movement: Kiran Bedi, Anna Hazarey, Arvind Kejriwal and Manish Sisodia-
March 30, 2012

इसके बाद, राजनीति और राजकरण या गवरनेंस की रंगत ऐसी बदली कि इंटरनेट और मोबाइल बहुत बड़े हथियार बन गये। अब सत्ता में बैठे नेता और मंत्री अलग-अलग तरह की बातें फ़ैलाते हैं, तो अफ़सरों का हथकंडा कुछ और होता है। देखते ही देखते आईटी सेल का मुख्य काम भी ‘हिन्दू-मुस्लिम नैरिटव’ को हवा देना बन गया। इसी ने देश में ऐसी फ़िज़ा बनायी कि जो सरकार के साथ नहीं है, वो देशद्रोही है। अनुच्छेद-370 को ख़त्म करने के बाद कश्मीर में लोकतंत्र बर्ख़ास्त है। राज्य के बड़े-बड़े नेता अब भी जेलों में हैं। महीनों तक वहाँ इंटरनेट, मोबाइल और फ़ोन इसलिए ठप रहे क्योंकि सरकार नहीं चाहती है कि उसके नागरिक ही अपने नागरिकों के हाल-चाल की हक़ीक़त जानें। इसे दमन तो कहा जा सकता है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ऐसे दमनकारी हथकंडों का इस्तेमाल करने वाली बीजेपी कोई पहली और एकलौती पार्टी है। हमेशा से सत्ताधारी पार्टियों ने ऐसे ही तेवर अपनाये हैं। पुलिस और सेना हमेशा से बर्बर ही रही है। कोई अपवाद नहीं है।

अभी नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर बने हालात में सिर्फ़ इतना फ़र्क नज़र आया है कि बीजेपी का आईटी सेल और उसके तमाम छोटे-बड़े नेता और मंत्री तब तक साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए काम करते हैं, जब तक कि उन्हें सामने से भी माकूल जवाब ना मिलने लगे। हिंसा या विरोध प्रभावित इलाकों में जब ये जवाब ज़्यादा दमदार साबित होने लगते हैं तो क़ानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए विरोधियों के संचार-तंत्र को निष्क्रिय कर दिया जाता है। ऐसा कभी नहीं हुआ कि अफ़वाह फ़ैलाने की तिकड़मों को किसी एक पक्ष ने ही आज़माया हो। सरकारें और पुलिस भी ख़ूब झूठ फ़ैलाती रही हैं। अलबत्ता, हरेक मौक़े के लक्ष्य अलग-अलग ज़रूर होते हैं।

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Jamia Milia Students Anti CAB Protest at Delhi Jamia Nagar Area.

मसलन, दिल्ली में गरमाये विरोध का ताना-बाना यहाँ के आगामी विधानसभा चुनाव से जुड़ा है। IT Cell की मंशा है कि जामिया और जेएनयू के छात्रों के विरोध को मुसलमानों के विरोध की तरह पेश किया जाए। ऐसा करने से यदि हिन्दुओं का ध्रुवीकरण हो गया तो शायद, बीजेपी की दिल्ली में लाज़ बच जाए, वर्ना ज़मीनी स्तर पर हवा उसके ख़िलाफ़ है। हाल का चुनावी सर्वे भी इसकी पुष्टि करता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि यही फ़ार्मूला देश के अन्य इलाकों में भी लागू हो। मिसाल के तौर पर, दिल्ली में जामिया और ओखला के इलाकों में तो इंटरनेट बैन होगा, लेकिन बंगाल और असम में ये किसी छोटे इलाके तक सीमित नहीं रहेगा। अलीगढ़ और हैदराबाद में अपेक्षाकृत बड़ा इलाका प्रभावित होता है तो लखनऊ का छोटा क्षेत्र।

हालाँकि, इसी नियम के तहत, कश्मीर के इंटरनेट बैन को सबसे व्यापक व्यापक बनाया जाता है। लेकिन 2016 और 2018 में पश्चिम बंगाल का माल्दा साम्प्रदायिक आग में सुलगता रहता है और वहाँ इंटरनेट पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगता, क्योंकि तब IT Cell जैसी सामग्री फैला रहा था, उससे बीजेपी को बंगाल के चुनाव में फ़ायदा मिलने की उम्मीद दिख रही थी। ज़ाहिर है, यदि माहौल बीजेपी या सरकार के ख़िलाफ़ होगा तो इंटरनेट का बैन होना तय है। अलबत्ता, ये भी सही है कि किसी भी विरोध के हिंसक होने से सत्तारूढ़ पार्टी को ही फ़ायदा होता है क्योंकि हिंसा से आन्दोलन की गरिमा गिरने लगती है, उसकी शुचिता भंग होती है। आन्दोलनकारियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती ख़ुद को हिंसा से दूर रखने और किसी के उकसावे में नहीं आने की होनी ही चाहिए। वर्ना, सारी मेहनत पर पानी फिरते देर नहीं लगती।

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क्या शिवसेना कुर्सी के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद छोड़ देगी?

शिवसेना को अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपने दो परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों एनसीपी और कांग्रेस का समर्थन लेना पड़ेगा। ऐसे में यहां अब सवाल यह उठता है कि हिंदू हृदय सम्राट बाल ठाकरे की शिवसेना उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे की अनुवाई में सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़ देगी और सेकुलर शब्द को ‘छद्म’ कहने वाली शिवसेना सेकुलर रास्ता अख्तियार करेगी?

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uddhav thackeray Shiv Sena

मुंबई, 10 नवंबर | महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और शिवसेना के बीच 1980 के दशक के अंत से शुरू हुए रोमांस का शिवसेना की हठधर्मिता के चलते करीब-करीब अंत हो गया है। भाजपा ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को रविवार शाम बता दिया कि महागठबंधन के प्रमुख सहयोगी शिवसेना के गठबंधन धर्म निभाने से इनकार करने के कारण वह राज्य में सरकार बनाने की स्थिति में फिलहाल नहीं है। इसके साथ ही भाजपा नेताओं ने शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के संभावित गठबंधन को शुभकामनाएं दी।

भाजपा के सरकार बनाने से असमर्थता जताने के तुरंत बाद शिवसेना प्रवक्ता संजय राऊत ने कहा कि अगर उद्धव ठाकरे बोले हैं कि महाराष्ट्र का अगला मुख्यमंत्री शिवसेना का होगा तो मुख्यमंत्री शिवसेना का ही होगा। यानी भाजपा के सरकार बनाने से इनकार करने के बाद शिवसेना के लिए अपना मुख्यमंत्री बनाने का स्वर्णिम मौका है। लेकिन उसके पास केवल 56 विधायक हैं। यानी सरकार बनाने के लिए जरूरी 88 विधायक एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन के होंगे।

इसका मतलब शिवसेना को अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपने दो परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों एनसीपी और कांग्रेस का समर्थन लेना पड़ेगा। ऐसे में यहां अब सवाल यह उठता है कि हिंदू हृदय सम्राट बाल ठाकरे की शिवसेना उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे की अनुवाई में सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़ देगी और सेकुलर शब्द को ‘छद्म’ कहने वाली शिवसेना सेकुलर रास्ता अख्तियार करेगी? अगर शिवसेना सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़कर ‘सेकुलर शिवसेना’ में ट्रांसफॉर्म होगी तो यह महाराष्ट्र की राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव होगा।

राम जन्मभूमि आंदोलन शुरू होने के बाद शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने कट्टर हिदुत्व का रास्ता अपना लिया था। बाल ठाकरे तो यहां तक दावा करते रहे कि अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को शिवसेना कार्यकर्ताओं ने ही ढहाया। इसके बाद से ही शिवसेना देश में हिंदुत्व का प्रतिनिधि दल रहा है। हिंदुत्व के मुद्दे पर शिवसेना कई मामलों में भारतीय जनता पार्टी से भी ज्यादा आक्रामक रही है। इसीलिए हिंदू उनके नाम के आगे ‘हिंदू हृदय सम्राट’ का अलंकरण लगाने लगे।

ठाकरे के बाद शिवसेना की कमान संभालने वाले उद्धव भी कट्टर हिंदुत्व के रास्ते पर ही चलते रहे हैं। वह भाजपा पर राम मंदिर निर्माण की राह में आई बाधाओं को जानबूझकर दूर न करने का भी आरोप लगाते रहे हैं। इतना ही नहीं उद्धव ने अपने बेटे के साथ अयोध्या में राम मंदिर निर्माण पर जोर देने के लिए पिछले वर्ष अयोध्या का दौरा किया था। उनके उस दौरे को खूब हाइप भी मिला, क्योंकि ठाकरे परिवार का कोई सदस्य पहली बार महाराष्ट्र के बाहर निकला था।

यह संयोग ही है कि जब अयोध्या विवाद का सैद्धांतिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने हल कर दिया और रामलला के विवादित स्थल को हिंदुओं को राम मंदिर बनाने के लिए सौंप दिया, ठीक उसी समय शिवसेना उस मुकाम पर पहुंच गई जब उसे कट्टर हिंदुत्व या महाराष्ट्र में अपना मुख्यमंत्री दोनों में से एक का चयन करना है। एनसीपी-कांग्रेस के साथ सरकार बनाने पर निश्चित तौर पर शिवसेना को कट्टर हिंदुत्व का मार्ग छोड़ना पड़ेगा। शिवसेना को अब अपने उस नारे को भी छोड़ना पड़ेगा, जिसमें वह अयोध्या के बाद काशी और मथुरा की बात करती रही है।

अगर 2014 के महाराष्ट्र चुनाव प्रचार के दौरान उद्धव ठाकरे के भाषण को फिर से सुनें तो यह साफ हो जाएगा कि उनके मन में भाजपा और भाजपा नेताओं के खिलाफ बहुत अधिक विष भरा है, जिसे वह जब भी मौका मिलेगा, उगल देंगे। इसीलिए जब इस बार विधानसभा चुनाव में भाजपा पिछली बार की 23 की तुलना में 40 सीट पिछड़ गई तो उद्धव को 2014 के चुनाव और उसके बाद छोटे भाई का दर्जा स्वीकार करने के अपमान का बदला लेने का मौका मिल गया।

शिवसेना दरअसल, 2014 के बाद से ही मौका तलाश रही थी। चूंकि भाजपा बहुत मजबूत स्थिति में पहुंच गई थी, लिहाजा, वह वेट एंड वॉच के मोड में रही। मौके की तलाश में ही 2014 में छोटे भाई ‘भाजपा’ को 127 सीट से अधिक देने को तैयार न होने वाली शिवसेना 2019 में 144 के बजाय 124 सीट पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गई।

शिवसेना जानती थी कि भाजपा के साथ गठबंधन बनाकर लड़ने पर ही वह विधानसभा में सम्मानजनक सीटें हासिल कर सकती है। उसके सामने 2014 का उदाहरण था, जब चुनाव में पूरी ताकत लगाने के बावजूद शिवसेना 63 सीटों से आगे नहीं बढ़ पाई, जबकि भाजपा उसके लगभग दोगुना यानी 122 सीटें जीतने में सफल रही। शायद इसीलिए फिफ्टी-फिफ्टी फॉर्मूले की बात करने वाले उद्धव और संजय राऊत 124 सीटें मिलने पर चुप रहे।

दरअसल, शिवसेना नेता जानते थे कि कांग्रेस-एनसीपी का गठबंधन हो गया है, लिहाजा, उसके लिए भाजपा के साथ लड़ना लाभदायक होगा। अन्यथा वह बहुत ज्यादा घाटे में जा सकती है। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान, जब नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे नेता बोल रहे थे कि इस बार चुनाव देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में लड़ा जा रहा है और वही अगले पांच साल मुख्यमंत्री रहेंगे, तब भी पिता-पुत्र ने खामोश रहने में अपना हित समझा।

24 अक्टूबर का दिन उद्धव ठाकरे और संजय राऊत के लिए बदला लेने का दिन था। चुनाव परिणाम में भाजपा की 18 सीटें कम होने से दोनों नेता अचानक से फिफ्टी-फिफ्टी फॉर्मूले का राग आलापने लगे और ढाई-ढाई साल का मुख्यमंत्री और सरकार में बराबर मंत्रालय की मांग करने लगे। वह जानते थे कि भाजपा पिछली बार की तरह मजबूत पोजिशन में नहीं है, वह शिवसेना के समर्थन के बिना सरकार नहीं बना सकती। अचानक से शिवसेना की बारगेनिंग पावर बहुत बढ़ गई।

महाराष्ट्र में भगवा गठबंधन में ‘बड़ा भाई’ बनने की हसरत पाले उद्धव ठाकरे की नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थी। इसीलिए मुंबई की वरली सीट से आदित्य ठाकरे चुनाव मैदान में उतरे और विधायक चुने गए। उद्धव ठाकरे बार-बार हवाला दे रहे हैं कि उन्होंने अपने पिता और शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे को वचन दिया है कि महाराष्ट्र में एक न एक दिन शिवसैनिक को मुख्यमंत्री बनाकर ही रहेंगे।

दरअसल, 1988-89 में जब प्रमोद महाजन और बाल ठाकरे ने भाजपा और शिवसेना के बीच गठबंधन का फैसला किया, तब भाजपा का राज्य में कोई खास जनाधार नहीं था। उस समय शिवसेना बड़े भाई और भाजपा छोटे भाई के किरदार में थी। 1995 में जब भगवा गठबंधन की सरकार बनी तब शिवसेना के मनोहर जोशी मुख्यमंत्री और भाजपा के गोपीनाथ मुंडे उपमुख्यमंत्री बने थे। यह सिलसिला 2014 के लोकसभा चुनाव तक जारी रहा, लेकिन 2014 के विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा बड़े भाई के किरदार में आ गई। इस अदला-बदली को उद्धव मन से कभी स्वीकार नहीं कर सके। अब भाजपा से बदला लेने का मौका मिला तो अवसर क्यों चूकते।

यानी पहले मराठी मानुस, फिर कट्टर हिंदुत्व की राह पर चलने वाली शिवसेना अब एनसीपी और कांग्रेस के साथ धर्मनिरपेक्ष हो जाएगी!

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