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स्वास्थ्य

कीटनाशी रसायनों से नहीं होता कैंसर का खतरा : शोध

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फसलों पर कीटनाशक रसायनों का इस्तेमाल किए जाने से उपभोक्ताओं को कैंसर का कोई खतरा नहीं होता है। यह बात एक हालिया शोध से प्रकाश में आई है।

गुजरात के वापी शहर स्थित जय रिसर्च फाउंडेशन (जेआरएफ) ने अपने एक शोध में वापी में कहा है कि कैंसर का कीटनाशक से कोई संबंध नहीं हैं। कीटनाशक और अन्य रसायनों पर तीन दशक से अधिक समय से रिसर्च कर रही जय रिसर्च फाउंडेशन (जेआरएफ) के निदेशक डॉ. अभय देशपांडे ने कीटनाशक से कैंसर होने के मिथक को महज भ्रांति बताया।

उन्होंने कहा, “अगर कीटनाशक की वजह से कैंसर होता तो सरकार कब का इस पर प्रतिबंध लगा चुकी होती। कैंसर ले लिए कई कारक जिम्मेदार हैं जिनमें हम इंसानों की बदलती जीवनशैली बहुत बड़ा कारक बन रही है।”

डॉ. देशपांडे ने कहा, “कीटनाशक दवाइयां विभिन्न प्रकार के कीट पतंगों और फंगस से फसल की सुरक्षा कर उत्पादन बढ़ाने में कारगर साबित हुई हैं। खाद्यान्नों उपलब्धता बढ़ने से आज हमारे देश की वर्तमान औसत जीवन प्रत्याशा उम्र 69 वर्ष के आसपास है जो 60 के दशक में करीब 42 वर्ष के आसपास थी।”

डॉ. देशपांडे ने बताया कि एक कीटनाशक के मॉलिक्यूल को लैब से खेत तक आने में करीब 9 से 12 साल का वक्त लग जाता है जिसमें करीब 5000 करोड़ रुपये तक का निवेश होता है। एक कीटनाशक के असर को पानी में मौजूद काई (एलगी) से लेकर पशुओं के तीन पीढ़ी तक अध्ययन किया जाता है अगर इनमें से किसी भी प्राणी पर इसका विपरीत असर दिखता है तो कीटनाशक को स्वीकृति नहीं मिलती।

उन्होंने कहा कि कीटनाशक को सभी प्रकार के वातावरण में परखा जाता है और सभी में सुरक्षित साबित होने के बाद ही इसे स्वीकृति मिलती है। इसके बाद इसे देश और विदेश के कई स्वीकृत एजेंसियों द्वारा टेस्ट किया जाता है फिर इनके इस्तेमाल की अनुमति दी जाती है। भारत मे कीटनाशकों को सेंट्रल इंसेक्टिसाइड बोर्ड एंड रेजिस्ट्रेशन कमिटी द्वारा अनुमति प्रदान की जाती है।

–आईएएनएस

स्वास्थ्य

स्वस्थ जीवनशैली के लिए ‘डीटॉक्सीफिकेशन’ कारगार

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स्वस्थ जीवनशैली प्राप्त करने के लिए डीटॉक्सीफिकेशन एक अच्छा विकल्प है। यह शरीर का वजन घटाने में, उपवास के दौरान अंगों को आराम पहुंचाने, रक्त संचार सुधारने में और पसीना व मूत्र के माध्यम से शरीर से दूषित पदार्थो को बाहर करने में मदद करता है तथा शरीर को स्वस्थ पोषण प्रदान करता है।

डीटॉक्सीफिकेशन के दौरान कुछ बातों को ध्यान में रखना अत्यधिक जरूरी है। केवल विशेषज्ञ की मदद से डीटॉक्सीफिकेशन करें। अपने आहार में केवल हर्बल (प्राकृतिक) पदार्थो को ही शामिल करें, क्योंकि इसका साइड इफेक्ट नहीं होता।

आयुर्वेदिक परामर्श लें और प्राकृतिक उपचार अपनाएं। व्यायाम सबसे जरूरी चीज है। केवल पोषण विशेषज्ञ द्वारा आपके शरीर के हिसाब से बताए गए आहार का ही सेवन करें। 

इन अच्छी आदतों को अपनाने से आपके शरीर को हमेशा ऊर्जावान रहने में मदद मिलेगी, ताकि आप उत्साह के साथ अपने काम का आनंद ले सकें। हीलयोरबॉडी एक ऐसा मंच है जो आपको अपने शरीर की मांग को समझने और ऊर्जा प्राप्त करने और स्वस्थ जीवन जीने के लिए प्राकृतिक उपचार प्रदान करने में मदद करेगा।

अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि करीब 43 फीसदी कार्यबल सप्ताह के ज्यादातर दिनों में थकान महसूस करते हैं। इन आंकड़ों को देखकर पता लगता है कि लोगों की कितनी बड़ी संख्या है जिन्हें अपनी जीवनशैली का मूल्यांकन करने की जरूरत है। 

कई लोगों के मन में यह धारणा होती है कि रोजाना एक निश्चित व्यवस्था का अनुसरण करने से शरीर डीटॉक्सीफाई होता है और ऊर्जा वापस आती है। लेकिन यह गलत भी हो सकता है। इसलिए आपको समझने की जरूरत है कि आपके शरीर पर कौन सा तरीका सबसे अच्छी तरह कारगर होगा। 

ज्यादातर मामलों में एक स्वस्थ जीवनशैली प्राप्त करने के लिए डीटॉक्सीफिकेशन एक अच्छा विकल्प है। यह शरीर का वजन घटाने में, उपवास के दौरान अंगों को आराम पहुंचाने, रक्त संचार सुधारने में और पसीना व मूत्र के माध्यम से शरीर से दूषित पदार्थो को बाहर करने में मदद करता है तथा शरीर को स्वस्थ पोषण प्रदान करता है। 

ब्रिटिश डायटिक एसोसिएशन लि. की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि डीटॉक्सीफिकेशन हमेशा सफल नहीं होगा। इस अध्ययन के निष्कर्षो से पता चलता है कि ज्यादा डीटोक्स केवल गुर्दे का होता है और उसका केवल अल्पकालिक लाभ होता है।

इसमें बताया गया है कि डीटोक्स के दौरान लिए जाने वाले आहार को बाजार में केवल जानवरों पर परीक्षण कर बेचा जा रहा है और उसका किसी प्रकार का रैंडमाइज कंट्रोल्ड परीक्षण नहीं किया जाता। इसलिए किसी भी डीटॉक्स कार्यक्रम को अपनाने से पहले इसकी प्रभावकारिता को जांच लेनी चाहिए। 

हालांकि लोग स्वस्थ जीवनशैली के साथ डीटोक्सीफिकेशन के लिए अगर किसी डाइट को अपनाते हैं तो हमेशा विशेषज्ञ की सिफारिश के बाद ही किसी डाइट को अपनाना चाहिए। किसी प्रकार के ड्रग या अल्कोहल के माध्यम से डीटॉक्सीफिकेशन करना कुछ मामलों में खतरनाक भी हो सकता है। इससे लोगों को खूब पसीना आना, उल्टी आना, दस्त लगना, मतली, कंपकंपी और व्यग्रता जैसे दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। 

–आईएएनएस

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स्वास्थ्य

पेट की अतिरिक्त चर्बी मस्तिष्क को पहुंचा सकती है नुकसान

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चिकित्सकों का कहना है कि पेट की अतिरिक्त चर्बी आपके मस्तिष्क में ग्रे मैटर की मात्रा को कम कर सकती है और अतिरिक्त वजन मस्तिष्क के विशिष्ट क्षेत्रों में सिकुड़न से जुड़ा होता है।

इसके साथ ही मोटापे के रोगियों में हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और डिस्लिपिडेमिया का भी खतरा बढ़ जाता है। हार्टकेयर फाउंडेशन (एचसीएफआई) के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा, “सामान्य वजन का मोटापा हमारे देश में एक नई महामारी है।

इसका एक प्रमुख कारण आज की जीवनशैली है। ऑन-द-गो और तेज-रफ्तार जीवन का मतलब है कि लोग नाश्ते को छोड़ देते हैं और बाकी पूरा दिन अस्वास्थ्यकर, क्विक फिक्स रिफाइंड कार्ब्स वाला भोजन खाते हैं। पेट के चारों ओर एक इंच अतिरिक्त वसा हृदय रोग की संभावना को 1.5 गुना बढ़ा सकती है।”

उन्होंने कहा, “पुरुषों में 90 सेमी और महिलाओं में 80 सेंटीमीटर से अधिक का उदर रोग एक संकेत है कि व्यक्ति भविष्य में दिल के दौरे की चपेट में आ सकता है। पुरुषों में 20 वर्ष की आयु के बाद और महिलाओं में 18 वर्ष की आयु के बाद पांच किलोग्राम से अधिक वजन नहीं बढ़ना चाहिए।

50 साल की आयु के बाद किसी के वजन की निगरानी करना और उसे उचित रूप से कम करना भी अनिवार्य है।”डॉ. अग्रवाल ने कहा, “एक बार जब किसी व्यक्ति का कद बढ़ना बंद हो जाता है, तो उसके अंगों का बढ़ना बंद हो जाता है और केवल मांसपेशियां ही एक हद तक निर्माण कर पाती हैं।

वसा का जमाव एकमात्र कारण है जो उस चरण के बाद शरीर के वजन को बढ़ाता है।”उन्होंने कहा, “जो लोग मोटे हैं, उन्हें परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट के सेवन को सीमित करने का लक्ष्य रखना चाहिए क्योंकि वे रक्त शर्करा के स्तर और इंसुलिन के उत्पादन को बढ़ाते हैं।

इंसुलिन प्रतिरोध वाले लोगों में, इस वृद्धि से आगे वजन बढ़ सकता है। इसके अलावा, हर दिन लगभग 30 से 45 मिनट शारीरिक गतिविधि करने का लक्ष्य रखें, सप्ताह में पांच बार।”

डॉ. अग्रवाल ने कुछ सुझाव देते हुए कहा, “हर दिन व्यायाम करें और स्वस्थ आहार का सेवन करें, सभी सात रंगों और छह स्वादों का मिश्रण भोजन में शामिल करें।

किसी भी रूप में रिफाइंड चीनी का सेवन न करें, क्योंकि यह रक्त प्रवाह में अधिक आसानी से अवशोषित हो सकती है और आगे की जटिलताओं का कारण बन सकती है। ध्यान और योग जैसी गतिविधियों के माध्यम से तनाव को कम करें।”

उन्होंने कहा, “प्रतिदिन एक खाद्य पदार्थ छोड़ें ताकि खाद्य प्रतिजन या फूड एंटीजेनिसिटी का ध्यान रखा जा सके। अगर आप गेहूं के प्रति संवेदनशील हैं तो आपको गेहूं पेट यानी व्हीट बैली की समस्या हो सकती है और आपको अपने भोजन की थाली से गेहूं को हटाना पड़ सकता है।”

— आईएएनएस

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स्वास्थ्य

‘देश में 30 फीसदी बढ़ सकता है दूध उत्पादन’

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भारत दूध उत्पादन में अग्रणी देशों में शुमार है। यह तब है जब मैस्टाइटिस बीमारी की वजह से दूध उत्पादन पर खासा असर पड़ता है और अगर इस बीमारी पर लगाम लग जाए तो देश में 30 फीसदी दूध उत्पादन बढ़ जाएगा और किसानों की आय भी 30 से 35 फीसदी बढ़ जाएगी।

मूफार्म के संस्थापक परम सिंह ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “औसतन 1000 पशुओं की जांच में 600 में मस्टाइटिस की समस्या देखी जाती है और इस समस्या को दूर कर देश में दूध उत्पादन में 30 फीसदी की वृद्धि हो सकती है।”

स्तन में आई सूजन को मस्टाइटिस या स्थानीय भाषा में थनैला कहा जाता है। इसकी वजह से डेयरी किसानों को 30 से 50 फीसदी तक दूध उत्पादन का नुकसान उठाना पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक इससे डेयरी उद्योग को लगभग 52.6 करोड़ डॉलर का नुकसान होता है।

भारत में दूध उत्पादन का औसत महज तीन लीटर प्रति पशु है, जबकि यही औसत ऑस्ट्रेलिया में 16 और इजरायल में 36 लीटर प्रति पशु है।

प्रति पशु दूध उत्पादन में भारत को अग्रणी बनाने की दिशा में काम कर रहे मूफार्म के संस्थापक परम सिंह ने कहा, “क्लिनिकल मस्टाइटिस के बारे में किसानों को पता ही नहीं होता।

पांच लीटर दूध देने वाली गाय या भैंस जब तीन लीटर दूध देने लगती है तो किसान समझते हैं कि यह मौसम में बदलाव या किसी अन्य कारण से हो रहा है। जबकि इसकी वजह मस्टाइटिस हो सकती है और इसे थोड़ी सजगता से दूर किया जा सकता है।”

उन्होंने कहा, “मस्टाइटिस डेयरी पशुओं में पाया जाने वाला घातक संक्रमण है, जो इन पशुओं की स्तन ग्रंथियों को प्रभावित करता है। यह संक्रामक बैक्टीरिया के कारण होता है, जिसकी वजह से दूध का उत्पादन घट जाता है।

मवेशी के दूध की मात्रा और गुणवत्ता कम हो जाती है, कभी-कभी इसके कारण पशु की मृत्यु तक हो सकती है।”सिंह ने कहा, “एक अनुमान के अनुसार, भारत में मस्टाइटिस के कारण डेयरी उद्योग को लगभग 52.6 करोड़ डॉलर का नुकसान होता है।

मास्टाइटिस एक बड़ी समस्या है, लेकिन इस पर नियंत्रण संभव है। भारतीय डेयरी किसानों में जागरूकता की कमी है। वे मवेशियों की देखभाल के लिए आज भी सदियों पुरानी प्रथाओं का इस्तेमाल करते हैं।”

उन्होंने कहा, “डेयरी किसानों को मवेशियों के स्वास्थ्य के बारे में जागरूक कर इन खामियों को दूर किया जा सकता है। हमने उनकी दशा सुधारने और डेयरी सेक्टर से जुड़ी समस्याओं के हल के लिए मॉडल को टेक्नोलॉजी से जोड़ दिया है और इसे एप से कनेक्ट कर दिया है।

अब इस टेक्नोलॉजी से जु़ड़े किसान को अपने हर पशु के बारे में अद्यतन जानकारी मिलती रहेगी।”उन्होंने कहा कि मूफार्म किसानों को मोबाइल एप्लीकेशन के माध्यम से सहायता देती है तथा प्रशिक्षण सत्रों एवं जागरूकता शिविरों के माध्यम से लास्ट माईल कनेक्टिविटी सुनिश्चित करती है।

उन्होंने कहा, “यह टेक्नोलॉजी और एक्सटेंशन का अनूठा मॉडल है, जिसमें डेयरी किसानों को अपने मोबाइल एप पर नियमित रूप से एलर्ट मिलते हैं, समय समय पर मवेशी के दूध की जांच कर मस्टाइटिस की पहचान की जाती है, डेयरी विशेषज्ञों द्वारा किसानों को प्रशिक्षण दिया जाता है।

इन सभी गतिविधियों का संचालन ग्रामीण स्तर के उद्यमी करते हैं, जिन्हें किसानों को डेयरी प्रथाओं पर शिक्षित करने के लिए मूफार्म एप्लीकेशन के बारे में प्रशिक्षण दिया जाता है।”

परम सिंह ने कहा, “आपको जानकर हैरानी होगी कि जब हमारे कार्यकर्ता ने राजपुरा, पंजाब में डेयरी विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में मस्टाइटिस जांच की, 65 फीसदी मवेशियों में इसके परिणाम पॉजिटिव आए।

यानी संक्रमित मवेशी के कारण किसान की मासिक आय में 4,600 रुपये का नुकसान हो रहा था।”उन्होंने कहा कि मूफार्म 2020 तक भारत के दो लाख डेयरी किसानों को प्रशिक्षित करेगी, और पशु पोषण जैसे क्षेत्रों में किसानों का कौशल बढ़ाने में मदद करेगी।

आईएएनएस

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