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लोगों ने 3 महीनों में व्हाट्सएप पर बिताए 85 अरब घंटे

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सैन फ्रांसिस्को, 21 अगस्त | सोशल मीडिया प्लेटफार्म व्हाट्सएप के संबंध में एक रोचक जानकारी सामने आई है। एक रपट से पता चला है कि लोगों ने बीते तीन महीनों में फेसबुक के स्वामित्व वाले व्हाट्सएप पर 85 अरब घंटे समय बिताया। फोर्ब्स की सोमवार को रपट के अनुसार, अमेरिका स्थित एप विश्लेषक कंपनी एप्पटोपिया की ओर से जारी आंकड़े में बताया गया है कि बीते तीन महीनों में लोगों ने व्हाट्सएप पर अपने 85 अरब घंटे खर्च किए। इस एप को दुनिया भर में 1.5 अरब प्रयोगकर्ता इस्तेमाल करते हैं।

इसी प्रकार, प्रयोगकर्ताओं ने इस दौरान इसकी स्वामित्व वाली कंपनी, फेसबुक पर 30 अरब घंटे का समय बिताया।

एप्पटोपिया के प्रवक्ता एडम ब्लैकर ने कहा, “यह स्पष्ट है कि व्हाट्सएप पसंद किया जाने वाला वैश्विक मैसेजिंग एप है।”

दुनियाभर में प्रयोगकर्ता जिन 10 एप पर सबसे ज्यादा समय बिताते हैं, उनमें व्हाट्सएप, वीचैट, फेसबुक, मैसेंजर, पेंडोरा, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, ट्विटर, गूगल मैप्स और स्पॉटीफाई प्रमुख हैं।

–आईएएनएस

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जहां 40 की उम्र में आता है बुढ़ापा

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बीजापुर छत्तीसगढ़, 9 जनवरी । ‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून..’ रहीम की ये पंक्ति पानी की महत्ता को दर्शा रही है कि यदि पानी नहीं रहेगा तो कुछ भी नहीं रहेगा, लेकिन जब पानी अमृत के बजाय जहर बन जाए तो पूरा जीवन अपंगता की ओर बढ़ चलता है। यह कोई कहानी नहीं बल्कि हकीकत है।

बीजापुर जिला मुख्यालय से तकरीबन 60 किमी दूर भोपालपटनम में स्थित छत्तीसगढ़ का एक ऐसा गांव जहां पर युवा 25 वर्ष की आयु में ही लाठी लेकर चलने को मजबूर हो जाते हैं और 40 साल के पड़ाव में प्रकृति के नियम के विपरित बुढ़े होने लग जाते हैं। यहां 40 फीसदी लोग उम्र से पहले ही या तो लाठी के सहारे चलने लगते हैं या तो बुढ़े हो जाते हैं। इसकी वजह कोई शारीरिक दोष नहीं, बल्कि यहां के भूगर्भ में ठहरा पानी हैए जो इनके लिए अमृत नहीं, बल्कि जहर साबित हो रहा है।

health Issue
Health Issue in India

यहां के हैंडपंपों और कुओं से निकलने वाले पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण पूरा का पूरा गांव समय से पहले ही अपंगता के साथ-साथ लगातार मौत की ओर बढ़ रहा है। शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं होने के कारण मजबूरन आज भी यहां के लोग फलोराइड युक्त पानी पीने को मजबूर हैं, बावजूद शासन-प्रशासन मौत की ओर बढ़ रहे इस गांव और ग्रामीणों की ना तो सुध ले रहा है ना ही इस खतरनाक हालात से बचने के लिए कोई कार्ययोजना तैयार करता नजर आ रहा है, जबकि इस गांव में आठ वर्ष के उम्र से लेकर 40 वर्ष तक का हर तीसरे व्यक्ति में कुबड़पन, दांतों में सड़न, पीलापन और बुढ़ापा नजर आता है।

प्रशासन ने यहां तक सड़क तो बना दी, पर विडंबना तो देखिए कि सड़क बनाने वाले प्रशासन की नजर इन पीड़ितों पर अब तक नहीं पड़ पाई।

यहां के सेवानिवृत्त शिक्षक तामड़ी नागैया, जनप्रतिनिधि नीलम गणपत और फलोराइड युक्त पानी से पीड़ित तामड़ी गोपाल का कहना है कि गांव में पांच नलकूप और चार कुएं हैं, इनमें से सभी नलकूपों और कुओं में फलोराइड युक्त पानी निकलता है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने सभी नलकूपों को सील कर दिया था लेकिन गांव के लोग अब भी दो नलकूपों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

उनका कहना है कि हर व्यक्ति शहर से खरीदकर पानी नहीं ला सकता है, इसलिए यही पानी पीने में इस्तेमाल होता है। यही नहीं, बल्कि गर्मी के दिनों में कुछ लोग तीन किमी दूर इंद्रावती नदी से पानी लाकर उबालकर पीते हैं।

इनमें से तामड़ी नागैया का कहना है कि यह समस्या पिछले तीस सालों से ज्यादा बढ़ी हैए क्योंकि तीस साल पहले तक यहां के लोग कुएं का पानी पीने के लिए उपयोग किया करते थे, मगर जब से नलकूपों का खनन किया गया तब से यह समस्या विराट रूप लेने लगा और अब स्थिति ऐसी है कि गांव की 40 फीसदी आबादी 25 वर्ष की उम्र में लाठी के सहारे चलनेए कुबड़पन को ढोने और 40 वर्ष की अवस्था में ही बुढ़े होकर जीवन जीने को मजबूर है। यहां पर लगभग 60 फीसदी लोगों के दांत पीले होकर सड़ने लगे हैं।

बताया जा रहा है कि यह पूरा गांव भू गर्भ में स्थित चट्टान पर बसा हुआ है और यही वजह है कि पानी में फलोराइड की मात्रा अधिक है और इस भू गर्भ से निकलने वाला पानी यहां के ग्रामीणों के लिए जहर बना हुआ है।

जानकार बताते हैं कि वन पार्ट पर मिलियन यानि पीपीएम तक फलोराइड की मौजूदगी इस्तेमाल करने लायक हैए जबकि पीपीएम को मार्जिनल सेप माना गया है। डेढ़ पीएम से अधिक फलोराइड की मौजूदगी को खतरनाक माना गया है और गेर्रागुड़ा में डेढ़ से दो पीपीएम तक इसकी मौजूदगी का पता चला है और लोगों पर इसका खतरनाक असर साफ नजर आ रहा है।

इस समस्या से निजात पाने के लिए एक साल पहले पीएचई विभाग ने इस गांव में एक ओवरहेड टैंक का निर्माण कर गांव के हर मकान तक पाइप लाइन विस्तार के साथ नल कनेक्शन भी दे रखा है, मगर प्रशासन की लापरवाही के चलते आज र्पयत तक पाइप लाइन के सहारे घरों में मौजूद नल कनेक्शनों में शुद्ध पेयजल की सप्लाई करने में प्रशासन और विभाग असफल रहा है। परिणामस्वरूप गांव के संपन्न लोग किसी तरह भोपालपटनम स्थित वाटर प्लांट से शुद्ध पेयजल खरीदकर पीने में उपयोग तो कर लेते हैं, मगर गरीब तबके के लोग अब भी फलोराइड युक्त पानी पीकर जवानी में ही बुढ़ापे को समय से पहले पाने को मजबूर हैं।

इस मामले में सीएमएचओ डॉ. बी.आर. पुजारी का कहना है कि ग्रामीणों की शिकायत के बाद गांव में कैम्प लगाकर लोगों का इलाज किया गया था और कुछ लोगों को बीजापुर भी बुलाया गया था। चूंकि इस गांव के पानी में फलोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण हड्डियों में टेड़ापन, कुबड़पन और दांतों में पीलेपन के साथ सड़न की समस्या आती है, जिसका इलाज सिर्फ शुद्ध पेयजल से ही हो पाएगा। शिकायत के बाद गांव के अधिकांश हैंडपंपों को सील करवा दिया गया था।

फलोराइड समस्या के निदान के लिए पीएचई की ओर से निर्मित वाटर ओवरहेड टैंक से पेयजल आपूर्ति ना होने की बात पर कार्यपालन अभियंता जगदीश कुमार का कहना है कि विभाग की ओर से टैंक के निर्माण बाद पंचायत को हैंडओवर किया जा चुका है। पेयजल आपूर्ति शुरू करने की जिम्मेदारी अब पंचायत की है, फिर भी अगर पानी की सप्लाई नहीं की जा रही है तो विभाग इसे अवश्य संज्ञान में लेगा।

–आईएएनएस

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ज्यादातर पाकिस्तानी नहीं जानते इंटरनेट क्या है : सर्वेक्षण

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Internet

इस्लामाबाद, 12 नवंबर | पाकिस्तान में 15 साल से लेकर 65 साल की उम्र के 69 फीसदी लोगों को नहीं मालूम है कि इंटरनेट क्या होता है। यह बात सूचना-संचार प्रौद्योगिकी है(आईसीटी) आधारित एक सर्वेक्षण में प्रकाश में आई है। श्रीलंका के थिंक टैंक लाइर्नी एशिया द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट सोमवार को डॉन में प्रकाशित हुई है। रिपोर्ट पाकिस्तान के 2,000 लोगों के सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गई है।

सर्वेक्षक थिंक टैंक ने दावा किया है कि नमूने की प्रक्रिया के तहत राष्ट्रीय स्तर पर 15 साल से 65 साल की उम्र की 98 फीसदी आबादी के प्रतिनिधित्व सुनिश्चित की गई है।

लाइनर एशिया की सीईओ हेलनी गलपाया ने कहा, “पाकिस्तान दूरसंचार प्राधिकरण (पीटीए) की वेबसाइट में 15.2 करोड़ सक्रिय सेल्युलर फोन धारक हैं। चाहे वे आदमी हो या औरत, गरीब हो या अमीर लेकिन वे नहीं एप्स का उपयोग करना नहीं जानते हैं।”

–आईएएनएस

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ज़हर उगलने वाले 13 सेकेंड के इस वीडियो को क्या आपने देखा!

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Flag Pakistan

जैसे शरीर के तपने का मतलब बुख़ार होता है, वैसे ही जब फेंकू ख़ानदान Fake News/Views/Video पर उतर आये तो समझ लीजिए कि अपने पतन की आहट सुनकर वो बदहवासी में झूठ तथा अफ़वाह की उल्टियाँ कर रहा है! क्योंकि झूठ किसी को हज़म नहीं होता, भक्तों का पाचन-तंत्र भी इसे हज़म नहीं कर पाता है! लिहाज़ा, भक्तों को भी उल्टी-दस्त यानी डीहाइड्रेशन की तकलीफ़ होना स्वाभाविक है! इसीलिए जैसे ही संघ परिवार के चहेते संगठनों के सर्वेक्षणों ने बताना शुरू किया कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी बुरी तरह से हारने जा रही है, वैसे ही एक ओर तो नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के भाषणों की दिशा पूरी ताक़त से काँग्रेस और राहुल गाँधी के चरित्रहनन की ओर घूम जाती है, वहीं दूसरी ओर, संघियों का अफ़वाह प्रसार तंत्र भी सक्रिय हो जाता है, ताकि समाज में वोट बैंक की सियासत को कोसते हुए ‘हिन्दू-मुसलमान’ करके हिन्दुओं को हिन्दू के नाम पर लामबन्द किया जा सके!

मोदी-शाह के दहकते हुए भाषण तो आपको बन्धक/दलाल न्यूज़ चैनल सारा दिन सुनाते ही रहते हैं! पहले भाषण का लाइव और फिर स्टोरी तथा डिबेट/बहस के रूप में! हालाँकि, इनकी गुणवत्ता को दर्शक/श्रोता/पाठक भी जल्द ही पहचान लेते हैं। इनके सही या ग़लत होने को लेकर अपनी राय भी बनाते हैं। लेकिन इसी के साथ ग़ुमनाम संघियों की ओर से WhatsApp University के ज़रिये हिन्दुओं को मूर्ख बनाकर, उन्हें मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काने का शरारती खेल चालू हो जाता है! ऐसा ही एक घिनौना खेल मेरे हाथ लग गया। मेरे किसी परिचित ने मुझे 13 सेकेंड का एक वीडियो और उसके साथ निम्न टिप्पणी भी भेजी।

“कैसे सौप दे कोंग्रेस को

ये वतन हिन्दुस्तान का,

हमने देखा है तुम्हारी रेली मैं झंडा पकिस्तान का!!

ये विडिओ जरुर देखे”

इस संदेश के वर्तनी दोष की अनदेखी करके आप वीडियो देखने लगेंगे। फिर अपना सिर धुन लेंगे। आपके नथुने फूलने लगेंगे। आपके होंठ अपशब्दों को बुदबुदाने लगेंगे। फिर आप फ़ौरन काँग्रेस को कोसने लगेंगे। उन्हें देश-विरोधी, ग़द्दार और पाकिस्तान परस्त मानने लगेंगे। काँग्रेस के प्रति आपके मन में नफ़रत पैदा होगी। लेकिन अब ज़रा इस वीडियो को बार-बार देखिए। स्लो मोशन यानी धीमी रफ़्तार में भी देखिए, जैसे क्रिकेट मैच में थर्ड अम्पायर देखते हैं! क्योंकि यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो फ़ौरन इस वीडियो को अपने तमाम परिचितों और ख़ासकर उन लोगों को फ़ारवर्ड नहीं करेंगे जो या तो भक्त नहीं हैं या फिर काँग्रेसी हैं!

आप दोनों में से किसी भी विकल्प को चुने, तो भी उन अनाम और ग़ुमनाम ताक़तों का मक़सद पूरा हो जाता है, जिनके झूठ और दुष्प्रचार के लिए ऐसे वीडियो वायरल करवाये जाते हैं। इस काम के लिए संघ-बीजेपी ने देश भर में कम से कम 20 हज़ार लोगों को बाक़ायदा वेतन वाली नौकरी पर लगा रखा है! सोशल मीडिया की भाषा में इन बेहूदा कार्यकर्ताओं/स्वयंसेवकों को ट्रोल या भक्त कहा जाता है। इन्हें बाक़ायदा गुरिल्ला युद्ध-शैली के क्रान्तिकारियों या विषकन्याओं की तरह प्रशिक्षित किया जाता है।

संघी गुरुकुल या शाखाओं में प्रशिक्षित और संस्कारित ऐसे निपट ‘मूर्ख देशभक्तों’ यानी ट्रोल्स की बदौलत ही 2014 में बीजेपी सत्ता में आयी और अब भगवा ख़ेमे को लगता है कि यही देवदूत और ईवीएम में हेराफ़ेरी ही उसे संकट से उबार पाएगी! लेकिन बकरे की माँ कब तक ख़ैर मना पायी है! राक्षसी वृत्ति जब अति कर देती है, तो उसका पतन होता ही है। यही हाल मोदी सरकार का 2019 में होने वाला है। तभी तो इस वीडियो के बारे में आपको ये नहीं बताया जाता कि ये कहाँ का नज़ारा है? कब का नज़ारा है? क्या आयोजन था? कौन आयोजक था? यदि वीडियो आपत्तिजनक है तो पुलिस-प्रशासन, सरकार-क़ानून ने क्या कोई कार्रवाई की या नहीं? आपको कोई ये भी क्यों नहीं बताया कि जब मामला इतना गम्भीर है, तो इस वीडियो को भक्त चैनलों पर क्यों नहीं दिखाया गया? वहाँ इसे लेकर तलवारें क्यों नहीं भाँजी गयीं?

बहरहाल, मैं इन सवालों में नहीं उलझा। क्योंकि मुझे इन सभी का सही जबाब मालूम है। इसीलिए मैंने अपने उस परिचित को पाकिस्तान के झंडे की तस्वीर के साथ सन्देश भेजा कि “संघियों के झूठ ने हिन्दुओं से उनकी प्रगतिशीलता और बुद्धि-विवेक को छीनकर उन्हें मूर्खों में तब्दील कर दिया है। जैसे हर पीली चीज़ सोना नहीं होती वैसे ही हर हरा झंडा और चाँद-तारा पाकिस्तानी नहीं होता! अब ज़रा पाकिस्तान के झंडे को ग़ौर से देखिए। इसमें बायीं तरफ़ सफ़ेद पट्टी भी है। जबकि आपको गुमराह करने वाले झंडे में ये नहीं है! अब आप चाहें तो अपने पाप का प्रायश्चित करते हुए मेरे इस जबाब को वापस उस महामूर्ख को भेज सकते हैं, जिसने आपको ये वीडियो भ्रष्ट टिप्पणी के साथ भेजा है।”

पता नहीं मेरे उस परिचित ने ऐसी किया या नहीं, लेकिन यदि इतना ज़रा दिमाग़ अन्य लोग भी लगाने लगें तो इस वीडियो को फ़ैलाने वालों का मक़सद पूरा नहीं हो सकता। सोशल मीडिया के ज़रिये ज़हर उगलगर हिन्दुओं को उल्लू बनाकर अपना सियासी उल्लू सीधा करने वालों के मंसूबे पूरे नहीं होते! तब टेलिकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद को सोशल मीडिया में जबाबजेही की बातें करते हुए सड़क पर डंडा पटकने का मौक़ा कैसे मिलता? फ़ेसबुक, ट्वीटर और व्हाट्सअप को धमकाने की नौटंकी करके सुर्ख़ियाँ कैसे बटोरी जाती? सूचना-प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर को भी मीडिया संस्थानों के कार्यक्रमों में फ़ेक न्यूज़ पर चिन्ता जताने का मौका कैसे मिलता? दरअसल, संघियों की रणनीति ही यही है कि ‘स्वयंसेवकों से उपद्रव करवाओ और नेताओं से बोलो कि प्रवचन देकर जनता को ग़ुमराह करते रहे!’

हम देख चुके हैं कि दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) को लेकर कैसे झूठ फ़ैलाया गया कि वहाँ देश तोड़ने वाले अर्बन नक्सल तैयार होते हैं। ‘हमें चाहिए आज़ादी’ वाले नारे को जेएनयू में कैसे राष्ट्रविरोधी बनाया गया? इसे सबने क़रीब से देखा। जिन को क़सूरवार बताया गया, उन्हें अदालत में दोषी नहीं साबित किया गया, बल्कि इनकी सुनवाई करने जा रही अदालतों को बलवा-स्थल में बदलने का ज़िम्मा उन्हीं लोगों ने अपने हाथों में ले लिया जो संविधान की शपथ लेकर संवैधानिक पदों पर बैठे हैं। दूसरी ओर, जेएनयू में कबाड़ बन चुके टैंक को खड़ा करके छात्रों में देश भक्ति भरने का ढोंग किया गया।

फ़ेक न्यूज़ की समस्या का समाधान बहुत मुश्किल नहीं है। डिज़ीटल या साइबर जगत में डाटा की वही भूमिका है जो हमारे शरीर में ख़ून की है। इसीलिए डाटा का स्रोत ग़ुमनाम नहीं रह सकता। कम्प्यूटर की भाषा में जिसे आईपी नम्बर या इंटरनेट प्रोटोकॉल करते हैं, उससे किसी भी साइबर सामग्री के निर्माता तक पहुँचा जा सकता है, क्योंकि किसी भी डिज़ीटल उपकरण का अनोखा आईपी नम्बर होता है। ये नम्बर फ़र्ज़ी नहीं हो सकता। भले ही हैकर्स इस नम्बर के साथ कोई भी फ़र्ज़ीवाड़ा कर लें, लेकिन फ़र्ज़ी नम्बर भी डिज़ीटल की परिभाषा में फ़र्ज़ी नहीं हो सकता।

आईपी नम्बर की तह में जाकर ही आईटी विशेषज्ञ उन लोगों तक पहुँचते हैं, जहाँ वो पहुँचना चाहते हैं। कौन नहीं जानता कि हमारे देश की पुलिस जब अपराधी तक पहुँचना चाहती है तो कुछेक अपवादों को छोड़कर ज़रूर पहुँचती है। इसीलिए ये सवाल उठना लाज़िमी है कि यदि मोदी के ख़िलाफ़ अपशब्द लिखने वालों को पकड़ा जा सकता है तो राहुल के ख़िलाफ़ झूठ फ़ैलाने वालों को क्यों नहीं पकड़ा जाता? इसकी वजह ये है कि हरेक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के पास अपने हरेक उपभोक्ता का ब्यौरा होता है। इसी ब्यौरा को यदि हरेक सन्देश के साथ चिपकाने की शर्त अनिवार्य कर दी जाए तो फ़ेक न्यूज़ गढ़ने और उसे फ़ैलाने वालों के गिरेबान तक पहुँचा जा सकता है।

सोशल मीडिया कम्पनियों को सिर्फ़ किसी सन्देश को भेजने वाले की पहचान ज़ाहिर करने का टूल सार्वजनिक करना है। आगे का काम क़ानून और उसकी एजेंसियों का है। लेकिन गोपनीयता या इंस्क्रिप्शन के नाम पर अपराधियों को छिपाकर रखा जाता है। अब ज़रा सोचिए कि साइबर अपराधियों को छिपाकर रखने से कौन फ़ायदे में है!

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