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Viral सच

ख़ुद जायसी ने ‘पद्मावत’ के अन्त में लिखा है कि पद्मावती का कथानक काल्पनिक है!

बाजीराव मस्तानी, जोधा अकबर और पद्मावती जैसे ऐतिहासिक पात्रों में मामला हिन्दू और मुसलमान के बीच हुए इश्क़ की नाटकीयता का है। छद्म हिन्दूवादियों को यही बात हज़म नहीं होती!

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फ़िल्म ‘पद्मावती’ को लेकर मचे बवाल के तमाम रोचक आयाम हैं। क्या रानी पद्मावती वास्तव में कोई ऐतिहासिक पात्र है? क्या उन्हें महिमामंडित किया गया? फ़िल्मकारों को ‘ऐतिहासिक पात्रों’ पर आधारित फ़िल्म बनाने के लिए किस सीमा तक जाने की छूट मिलनी चाहिए? कलाकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी की लक्ष्मण-रेखा कैसे तय हो? क्या महज ‘डिस्क्लेमर’ की आड़ में ऐतिहासिक और सामाजिक धारणाओं से छेड़छाड़ के लिए निरंकुशता हासिल की जा सकती है? और, क्या वक़्त आ गया है कि देश और समाज इन मुद्दों पर ठोस नीति तय करे, ताकि भविष्य में ऐसे बवालों की पुनरावृत्ति नहीं हो।

उत्तर प्रदेश के रायबरेली ज़िले के जायस क़स्बे में जन्मे मलिक मोहम्मद जायसी (1490-1558) की साहित्यिक रचना ‘पद्मावत’ को अद्भुत माना गया है। मध्यकालीन हिन्दुस्तानी साहित्य में ‘पद्मावत’ का प्रमुख स्थान है। जायसी की ये कृति ऐतिहासिक पात्रों पर आधारित ज़रूर है, लेकिन इसे प्रमाणिक इतिहास का दर्ज़ा हासिल नहीं है। कमोबेश, वैसे ही जैसे राजपूत शासक पृथ्वीराज चौहान की शान में लिखी गयी चन्द्रबरदाई की रचना ‘पृथ्वीराज रासो’ को भी ऐतिहासिक दस्तावेज़ की तरह नहीं माना गया। क्योंकि चन्द्रबरदाई तो बाक़ायदा पृथ्वीराज चौहान का दरबारी था। वो एक कवि या साहित्यकार ज़रूर थे, लेकिन इतिहासकार नहीं। दरबारी होने के नाते उन्होंने अपने आक़ा की शान में बहुत सारी ऐसी बातें लिखीं, जिन्हें इतिहासकारों ने अतिश्योक्तिपूर्ण माना। इसी तरह से फ़िल्म मुग़ल-ए-आज़म में शहजादा सलीम और अनारकली की कहानी भी पूरी तरह से काल्पनिक रही है।

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सूफ़ी कवि मलिक मोहम्मद जायसी

इसी तरह, हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल के प्रतिनिधि और सूफ़ी कवि मलिक मोहम्मद जायसी की रचना ‘पद्मावत’ को 1550 में लिखा गया। जायसी को इसे पूरा करने में दस साल लगे। वो अकबर (1556-1605) का काल था। जबकि ‘पद्मावत’ में वर्णित नायक अलाउद्दीन ख़िलज़ी (1296-1316) का दौर क़रीब ढाई सौ साल पहले का था। उस ज़माने में इतना लम्बा वक़्त कई युगों जैसा रहा होगा। इसीलिए ये माना गया कि जायसी ने ‘पद्मावत’ में अपने पात्रों का चित्रण सिर्फ़ जनश्रुतियों और अपनी कल्पना शक्ति के आधार पर किया। उनके पास चश्मदीदों का कोई बयान नहीं हो सकता। 1909 में प्रकाशित इम्पीरियल गज़ट ऑफ इन्डिया के मुताबिक़, ख़ुद जायसी ने क़रीब एक दशक की अवधि में लिखे गये अपने महाकाव्य के अन्त में लिखा था कि ‘पद्मावत’ महज एक दृष्टान्त (Fictional) कथा यानी काल्पनिक है।

इसमें कोई शक़ नहीं कि मलिक मोहम्मद जायसी के जन्म से पहले और बाद में भी चित्तौड़ की रानी पद्मावती का चरित्र और व्यक्तित्व, लोक इतिहास और लोक काव्य का अहम हिस्सा रहा है। इसी वजह से कालान्तर में पद्मावती को हिन्दू अस्मिता के प्रतीक के रूप में स्थापित किया गया। जब-जब हिन्दूवादियों को मुसलमानों के प्रति नफ़रत और धार्मिक उन्माद फ़ैलाने के लिए ज्वलनशील सामग्री की ज़रूरत पड़ी, तब-तब मलिक मोहम्मद जायसी की रचना ‘पद्मावत’ को बहुत आसानी से प्रमाणिक इतिहास के रूप में पेश करके मौक़े को भुनाया गया। ये रवैया इतना प्रबल था कि आगे चलकर लोगों ने पेशेवर इतिहासकारों के उन तथ्यों पर भी यक़ीन नहीं किया, जो ये साबित करते हैं कि पद्मावती नाम की कोई रानी वास्तव में कभी थी ही नहीं। वो सिर्फ़ एक काल्पनिक पात्र है। हालाँकि, कालान्तर में ऐसे इतिहासकार भी पनप गये जिन्होंने पद्मावती की कहानी और उसके महिमा मंडन को सही माना।

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ऐतिहासिक पात्रों को केन्द्र में रखकर तमाम प्रसिद्ध फ़िल्में बनी हैं। जैसे मुग़ल-ए-आज़म, जहाँआरा, ताजमहल वग़ैरह। इनमें से हरेक में ऐतिहासिक तथ्यों और सच्चाई को तोड़ा-मरोड़ा गया है। फ़िल्मी ग्लैमर और ताम-झाम का तड़का लगाया गया है। सभी फ़िल्मों ने बढ़िया कमाई भी की। फ़िल्म निर्माण से जुड़ी तमाम विधाओं के लिए दाद भी बटोरी। इन्हीं फ़िल्मों के सफल फ़िल्मांकन की वजह से आम लोगों में ये धारणा घर कर गयी कि इनका कथानक ही असली इतिहास है। इसके बावजूद कभी कोई बवाल नहीं खड़ा हुआ क्योंकि इन फ़िल्मों के पात्र मुसलमान थे। जबकि बाजीराव मस्तानी, जोधा अकबर और पद्मावती जैसे ऐतिहासिक पात्रों में मामला हिन्दू और मुसलमान के बीच हुए इश्क़ की नाटकीयता का है। छद्म हिन्दूवादियों को यही बात हज़म नहीं होती!

धर्मान्ध कट्टरवादियों को हिन्दू परेश रावल की ‘ओ माई गॉड’ तो किसी तरह बर्दाश्त हो जाती है, लेकिन मुसलमान आमिर ख़ान की ‘पीके’ से उनकी धार्मिक भावनाएँ डगमगाने लगती हैं! फिर कहा जाता है कि ‘है हिम्मत तो अन्य धर्मों के प्रतीकों का मज़ाक उड़ाकर दिखाओ।’ देखते ही देखते सारा मुद्दा सच या झूठ, पाखंड या कटाक्ष से हटकर ‘हिम्मत’ में जा अटकता है। क्योंकि ‘हिम्मत’ से सियासत को गरमाया जा सकता है। ऐसी सियासत चमकाने के लिए दिन-रात जो धार्मिक घृणा फैलानी पड़ती है, उस चिन्तन पर गंगा-जमुनी तहज़ीब का सन्देश देती फ़िल्में पानी फ़ेर देती हैं।

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धार्मिक घृणा की वजह से ही फ़िल्म देखने के बाद दर्शक उसके पात्रों को इंसानी जज़्बातों के पैमाने के रूप में देखने-समझने के बजाय हिन्दू-मुसलमान के रूप में बाँटकर देखने लगता है। जबकि सबको अच्छी तरह से पता होता है कि फ़िल्म की कहानी काल्पनिक है। एक-एक दृश्य पूर्व निर्धारित और पूर्व संयोजित है। सारे संवाद मनगढ़न्त हैं। फिर भी मन्दबुद्धि लोग फ़िल्म से इस क़दर प्रभावित हो जाते हैं कि उसे ही अक्षरशः सच, प्रमाणिक और ऐतिहासिक समझने लगते हैं। कट्टरवादी हिन्दुओं को पर्दे पर दिखाये जाने वाले ऐतिहासिक क़िरदारों की ऐसी हरक़तें बर्दाश्त नहीं होतीं, जिसमें किसी भी तरह से कोई मुसलमान पात्र हिन्दुओं के मुक़ाबले मज़बूत या प्रभावशाली नज़र आये। शायद, यही वजह थी कि किसी ज़माने में तमाम मुसलमान कलाकार, हिन्दू नामों के साथ रुपहले पर्दे पर पेश किये गये।

साफ़ है कि कट्टरवादी, कभी ये अहसास नहीं होने देना चाहते कि जिस दौर में विदेशी मुसलिम आक्रमणकारियों ने हिन्दुस्तान पर राज किया, उस दौर में कभी भी हिन्दू और मुसलमान, प्यार-मोहब्बत और भाईचारे से भी रहा करते होंगे! दरअसल, जैसे कट्टरवादी मुसलमान अपनी उन्नत नस्ल को मुसलिम शासकों के दौर से जोड़कर देखते हैं, वैसे ही संघी विचारधारा और छत्रछाया में पलने-बढ़ने वाला कट्टरवादी हिन्दू अपनी नस्ल को उम्दा साबित करने के लिए तरह-तरह के झूठ की आड़ लेता है। दोनों ही समुदाय के ऐसे लोग बुनियादी तौर पर अशिक्षित और मन्दबुद्धि वाले हैं। इनके पास सच्चाई को जानने-समझने की न तो अकल है और न ही ख़्वाहिश। इसीलिए दोनों क़ौमों को उनका नेतृत्व उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा करता है!

अब सवाल ये है कि कोई फ़िल्मकार यदि डॉक्युमेंटरी (वृतचित्र) बनाये और उसके माध्यम से किसी हस्ती का इतिहास दुनिया को बताना चाहे तो शायद कट्टरवादी एक बार को बर्दाश्त भी कर लें। लेकिन यही काम यदि व्यावसायिक फ़ीचर फ़िल्म से किया जाएगा तो किसी न किसी तरह का बवाल मचना तय है। दरअसल, तमाम झूठी छवियों में जीने वाले भारतीय समाज में मौजूद कट्टरवादी मूर्खों का तबक़ा ये बर्दाश्त नहीं कर पाता कि रुपहले पर्दे पर उसकी छवि को कमतर करके उकेरा जाए। उसे गोबर पर लगा चाँदी का वर्क पसन्द है, उसे टाट पर लगा मलमल का पैबन्द पसन्द है, लेकिन दुनिया को उसकी पुरातन सच्चाई बतायी जाए, ये उसे गवारा नहीं! लिहाज़ा, यदि समाज को घृणा, हिंसा और टकराव से बचाना है तो सिर्फ़ सेंसर बोर्ड के भरोसे रहने से बात नहीं बनने वाली।

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फ़िल्मकार ये सुनिश्चित करें कि वो महज ‘डिस्केल्मर’ (इस फ़िल्म के सभी पात्र काल्पनिक है। इनका किसी सच्ची घटना से कोई सम्बन्ध होना महज इत्तेफ़ाक़ है।) के भरोसे इतिहास या धार्मिक कहानियों पर आधारित पात्रों वाली प्रस्तुतियों से भारतीय समाज को आलोकित नहीं कर सकते। ‘नो वन किल्ड जेसिका’ या ‘पिंक’ जैसी बोल्ड फ़िल्में तो भारत में बन सकती हैं, लेकिन देवराज इन्द्र ने कैसे गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या का सतीत्व छीना था, उसे दर्शाने वाली फ़िल्मों से कट्टरवादी दर्शक आहत हो जाएँगे! क्योंकि भारतीयों की नज़र में पद्मावती का जौहर और सीरिया के अलेप्पो में बीसियों औरतों का बलात्कार से बचने के लिए ख़ुदकुशी कर लेना अलग-अलग बातें हैं! कट्टरवादियों को दोनों मिसालों में नारियों की अस्मिता पर एक जैसा ख़तरा नहीं दिखायी देता!

‘ब्लैक’ जैसी फ़िल्म बनाने वाले संजय लीला भंसाली जैसे फ़िल्मकार भी ‘देवदास’ की सादगी को भुनाने से बाज़ नहीं आते, तो पद्मावती की ऐतिहासिकता वो कैसे बख़्श देंगे! ये लोग एक ओर रुपहले परदे पर व्यक्ति पूजा की कहानियाँ गढ़कर समाज के अन्धविश्वास का दोहन करते हैं और इससे चाँदी काटते हैं तो दूसरी ओर प्रगतिशीलता का जामा ओढ़कर ऑस्कर जीतने की कामना रखते हैं। यही लोग करणी सेना जैसों के पालनहार भी हैं और यही उनसे पिटकर या तरह-तरह की धमकियाँ आमंत्रित करके सुर्खियाँ भी बटोरते हैं!

Viral सच

‘हे मूर्खज्ञ, इतना तो मोदी भी अपने बारे में नहीं जानते, जितना आपका दावा है!’

क्या आपने कभी सोचा है कि मोदी की तारीफ़ और विरोधियों के चरित्रहनन के मक़सद से लिखे गये ऐसे भ्रामक सन्देशों को कौन लिखवा और फैला रहा है? ये करतूत मोदी के ट्रोल्स की है। जिन्होंने बाक़ायदा तनख्वाहें देकर पाला-पोसा जा रहा है।

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1925 में जब से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्म हुआ, तभी से वो जिस जन्मजात विकृति से पीड़ित है उसका नाम है ‘झूठ और अफ़वाह के ज़रिये साम्प्रदायिक उन्माद फ़ैलाना, 18 फ़ीसदी मुसलमानों को 80 फ़ीसदी हिन्दुओं के अस्तित्व के ख़तरा बताना और येन-केन-प्रकारेण सत्ता पाने के लिए अपने विरोधियों का मनगढ़न्त चरित्रहनन करना। ये संघियों का स्थायी और अनुवांशिक स्वभाव रहा है। विज्ञान की भाषा में इसे ही डीएनए कहते हैं। आज़ादी से पहले जहाँ काँग्रेस की अगुवाई में चल रहे स्वतंत्रता आन्दोलन में पलीता लगाना संघ का सबसे बड़ा मक़सद था, क्योंकि ऐसा करने के लिए ही उन्हें अँग्रेज़ों ने पाला-पोसा था।

लेकिन आज़ादी के बाद जब चुनाव दर चुनाव भारत की जनता संघियों को नकारती रही तो उन्होंने झूठ की बदौलत विरोधियों का चरित्र-हनन करने को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। इसी उद्देश्य के तहत संघियों का नेहरू-गाँधी परिवार और काँग्रेस का चरित्र-हनन करने का सिलसिला लगातार जारी है। मज़े की बात ये है कि संघियों को जब-जब लगता है कि उनकी और बीजेपी की प्रतिष्ठा गिर रही है, तब-तब उनके ट्रोल्स सोशल मीडिया और ख़ासकर WhatsApp पर झूठ की सप्लाई बढ़ा देते हैं। अभी-अभी ताज़ा चुनावों में मुँह की खाने के बाद संघी ट्रोल्स ने निम्न मैसेज़ को वायरल कर दिया है। आपकी जानकारी के लिए हम उस मैसेज़ को पहले तो हूबहू यहाँ कॉपी-पेस्ट कर रहे हैं। और आगे इसकी पूरी सच्चाई भी बता रहे हैं। ताकि आपको बरगलाना नहीं जा सके।

WhatsApp पर फैलाया जा रहा झूठ

जब आप फुर्सत मे हों तब पढ़ लीजियेगा, किंतु पढ़ना धैर्य और शांति से, फिर निष्कर्ष निकलना! मोदी जी को हिंदू और मुसलमान दोनों हटाना चाहते हैं, किंतु दोनों के बीच अंतर देखिये:

हिन्दू पेट्रोल का दाम देख रहा है और मुसलमान रोहिंग्या मुसलमान को! हिन्दू जीएसटी से रूठे हैं और कांग्रेस को लाना चाहते हैं और मुसलमान भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाना चाहते हैं, इसलिए कांग्रेस को लाना चाहते हैं! कारण जो भी हो उद्देश्य सबका एक ही है! भारत में बहुत से लोग हैं, जो भ्रष्ट नेताओं की बातों में आकर नरेन्द्र मोदी का विरोध करते हैं! अच्छा है, लोकतंत्र है विरोध करें या समर्थन ये तो आपका अपना हक है, पर मोदी का विरोध करके आप समर्थन किसका कर रहे हैं, ये बडा गंभीर सवाल है, इसलिए निर्णय भी गंभीरता पूर्वक ही होना चाहिये! क्या मुलायम, लालू, मायावती, सोनिया, राहुल, केजरीवाल, ममता बनर्जी, वामपंथी ये सब नरेन्द्र मोदी से बेहतर हैं या इनका रिकॉर्ड बेहतर है?

क्या नरेन्द्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्रीकाल की तुलना मे ममता बनर्जी, अखिलेश आदि का कार्यकाल बेहतर नजर आता है? तुलना करनी है तो गुजरात के किसी छोटे शहर मे जाकर एक नजर मार लीजिये और फिर इन अन्य राज्यों की राजधानी का भ्रमण कीजिये! राजनीति मे प्रवेश के समय लालू और मुलायम, दोनों के घर की स्थिति ऎसी थी कि इनके पास साइकिल और लालटेन खरीदने तक के पैसे नहीं थे, जाति के नाम पर चलने वाले ये नेता आज अरबपति हैं, रामगोपाल चार्टर्ड प्लेन में घूमता है, तो शिवपाल ऑडी मे, कहां से आया इतना अकूत धन, क्या ये लोग नरेन्द्र मोदी से बेहतर हैं?

सोनिया जी के बेटा-बेटी और दामाद आज सभी अरबपति है, क्या ये नरेन्द्र मोदी से बेहतर हैं? क्या 35 साल बंगाल में राज करने वाले वामपंथी, नरेन्द्र मोदी से बेहतर हैं? पांच साल केजरीवाल ने विज्ञापन चलाकर दिल्ली के लोगों को चूना लगाया, WIFI, CCTV, 150 कॉलेज, 500 स्कूल, क्या ये कुकुरमुत्ता नरेंद्र मोदी से बेहतर है? जब मायावती राजनीती करने निकली थी और काशीराम की साथी थी, तब उसके घर में दिया जलाने का धन नहीं था, साईकल से प्रचार करती थी, आज उसका सैंडल भी प्लेन से आता है, उसके भाई के पास 497 कंपनियां हैं, क्या ये नरेंद्र मोदी से बेहतर है? मोदी का विरोध करने वालों, विरोध करो, पर समर्थन किसका करना है ये तो तय करो कोई बेहतर विकल्प हो तो बताना, थोड़ा देश का भी सोचो, कितना बर्बाद करवाना है, कितना लूटवाना है? बाहर निकलो जातियो के बंधनों से इसे उबारकर ये लूटेरे हमे ही लूटते हैं!

मुझे नहीं मालूम कि मैं मोदी को क्यों पसंद करता हूं, लेकिन मेरे पास कांग्रेस, सपा, बसपा, आप को नापसंद करने के बहुत कारण हैं! मुझे नहीं मालूम कि अच्छे दिन आयेंगे या नहीं, पर मोदी जी के अतिरिक्त और कोई राजनेता दूर दूर तक दिखाई नहीं देता जो भारत के अच्छे दिनों के लिए तन और मन से प्रयत्न करता हो! मुझे ये भी नहीं मालूम कि मोदी जी भारत को हिन्दू राष्ट्र बना पायेंगे या नहीं, लेकिन ये पूरा यकीन हैं कि वो पूरी संजीदगी और गंभीरता से भारत माता को पुनः विश्वगुरु का दर्जा दिलवाने हेतु प्रयासरत हैं! मुझे फर्क नहीं पड़ता कि मोदी जी के पास इतिहास की जानकारी है या नही, पर मुझे पक्का यकीन है कि उनके पास भविष्य की पूरी तैयारी है।

मोदी का गुणगान करते उपरोक्त प्रसंग की सच्चाई

क्या आपने कभी सोचा है कि मोदी की तारीफ़ और विरोधियों के चरित्रहनन के मक़सद से लिखे गये ऐसे भ्रामक सन्देशों को कौन लिखवा और फैला रहा है? ये करतूत मोदी के ट्रोल्स की है। जिन्होंने बाक़ायदा तनख्वाहें देकर पाला-पोसा जा रहा है। देश में हज़ारों युवाओं को इसी काम के लिए तैनात किया गया है। सही मायने में इन लोगों से बड़ा भारत का दुश्मन और कोई नहीं है! इनसे बहुत सावधान रहने की ज़रूरत है! अब उपरोक्त WhatsApp मैसेज़ को ही देखिए, ये पूरा का पूरा सन्देश जनता में ये भ्रम फैलाने के लिए है कि हर मोर्चे पर पूरी तरह से विफल रहे नरेन्द्र मोदी को सत्ता में रखना देश की मज़बूरी है। क्योंकि और कोई विकल्प नहीं है। इसे अँग्रेज़ी में TINA (There is no alternative) फ़ैक्टर यानी ‘विकल्प-हीनता का भ्रम फ़ैलाने की रणनीति’ कहते हैं! WhatsApp के ज़रिये फैलाये जाने वाले ऐसे सन्देश पूर्णतः मनगढ़न्त होते हैं। इसीलिए इन्हें लिखने और फ़ारवर्ड करने वालों का लोगों को पता तक नहीं चलता।

दरअसल, ऐसे मैसेज़ सिर्फ़ उन मन्दबुद्धि हिन्दुओं को बरगलाने के लिए गढ़े जाते हैं, जिनके पास सच्चाई को जानने-परखने की न तो अक्ल है और ना क़ाबलियत और ना ही फ़ुर्सत! उल्टा, ऐसे लोगों का बौद्धिक स्तर इतना अविकसित होता है कि वो न सिर्फ़ हरेक लिखित बात को सच समझते हैं, बल्कि बार-बार उन तक पहुँचने वाले लिखित झूठ पर भी यक़ीन कर लेते हैं। राजनीति में होने वाले दुष्प्रचार के लिहाज़ से देखे तो अब ऐसे झूठ को फैलाना ही बीजेपी और मोदी राज के लिए आख़िरी सहारा है! क्योंकि जनता ने अब तय कर लिया है कि तरह-तरह का झूठ फैलाकर सत्ता हथियाने वाले मोदी राज ने चार साल में ही देश को गर्त में पहुँचा दिया। लिहाज़ा, इसे 2019 में उखाड़ फेंका जाएगा! बहरहाल, फ़िलहाल तो आपको ये समझना है कि उपरोक्त मैसेज़ में सच क्या है और झूठ क्या?

मैसेज़ में लिखा है कि ‘मुसलमान भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाना चाहते हैं, इसलिए कांग्रेस को लाना चाहते हैं!’ काँग्रेस ने आज़ादी के बाद 55 साल तक सरकार चलायी। इस दौरान कौन सा इस्लामी राष्ट्र बना? उल्टा, आज़ादी के बाद पहले नेहरू ने पुर्तगाल से छीनकर गोवा को और फ्राँस से लेकर पुडुचेरी को भारत में मिलाया, तो इन्दिरा गाँधी ने पाकिस्तान के दो टुकड़े करके बाँग्लादेश की स्थापना करवायी। आज़ादी की लड़ाई में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले काँग्रेसियों ने कभी कन्धार जाकर आतंकवादियों को रिहा करने का काम नहीं किया। पाकिस्तान की आतंकवादी हरक़तों को हमेशा मुँहतोड़ जबाब दिया लेकिन कभी सर्ज़िकल हमले को फ़र्ज़ी ढोल नहीं पीटा। काँग्रेस के राज में सेना के बेहद अहम ठिकानों या संसद पर वैसे हमले कभी नहीं हुए जैसा इतिहास बीजेपी के राज में बना है।

भ्रामक मैसेज़ में आपसे पूछा जा रहा है कि ‘मोदी का विरोध करके आप समर्थन किसका कर रहे हैं?’ और ‘क्या मुलायम, लालू, मायावती, सोनिया, राहुल, केजरीवाल, ममता बनर्जी, वामपंथी ये सब नरेन्द्र मोदी से बेहतर हैं या इनका रिकॉर्ड बेहतर है?’ अब ज़रा सोचिए कि क्या लेखक ने आपको बताया है कि कैसे मोदी का रिकॉर्ड बेहतर है? आपसे कहा जाता है कि गुजरात को देखो। जबकि लिखने वाले ने ख़ुद कभी गुजरात को नहीं देखा है, न उसके गाँवों को, ना वहाँ के शहरों को ना ही वहाँ की बदहाली के सरकारी आँकड़ों को! आपसे तो बस कहा जा रहा है कि गुजरात स्वर्ग जैसा ख़ुशहाल बन चुका है! लिहाज़ा, आप यक़ीन कर लें। अरे भाई, यदि ऐसा ही है तो चार साल में बीजेपी शासित अन्य राज्यों को भी तो लघु-स्वर्ग बन जाना चाहिए था। ज़रा ऐसे किसी लघु-स्वर्ग का नाम भी ले लेते! वैसे यदि गुजरात ऐसा ही ख़ुशहाल हो चुका था जो जनता ने क्यों बीजेपी की मिट्टी पलीद कर दी? साफ़ है कि झूठ को पकड़ें!

लोकतंत्र में विरोधियों के लिए किस तरह की भाषा इस्तेमाल करने चाहिए? संस्कारी संघी इसे नहीं जानते हैं। वो विरोधियों को कुकुरमुत्ता, पप्पू वगैरह कहकर में वीरता प्रदर्शित करते हैं। वो भूल जाते हैं कि कुकुरमुत्ता ने डायनासोर का भ्रम पाले बैठे लोगों को उस अखाड़े में नेस्तनाबूद किया था, जहाँ उनके पास सात सांसद थे और चार नगर निगम! इसी तरह, जिसे आप पप्पू बताते हैं, वो आपसे बड़ी और गौरवशाली अतीत वाली पार्टी का मुखिया है। आपसे ज़्यादा शिक्षित है। आपसे ज़्यादा सभ्य और शालीन है। उसे भी उसकी पार्टी के लोगों ने वैसे ही अपना अध्यक्ष चुना है, जैसे आपकी और अन्य पार्टियों में अध्यक्ष चुने जाते हैं।

याद रखिए, देश की किसी भी पार्टी में उसके सदस्य अपने अध्यक्ष का प्रत्यक्ष-निर्वाचन (Direct Election) नहीं करते। बीजेपी में भी मुट्ठीभर लोगों ने तय किया कि उनका अध्यक्ष कौन होगा? अमित शाह हों, या नीतिन गडकरी, या राजनाथ सिंह, या लाल कृष्ण आडवाणी, या कुशाभाऊ ठाकरे, या जना कृष्णमूर्ति, या मुरली मनोहर जोशी, या बंगारू लक्ष्मण, या वेंकैया नायडू, या अटल बिहारी वाजपेयी, किसी को भी बीजेपी के सदस्यों ने वोट देकर नहीं चुना। इसी तरह, काँग्रेस ने भी राहुल गाँधी को जन्म लेते ही अपना अध्यक्ष नहीं बना लिया। न ही सोनिया, ना राजीव और ना ही इन्दिरा गाँधी ने पार्टी का क़मान वैसे पायी जैसे राजवाड़ों की रीत थी।

मैसेज़ की सबसे शानदार बात तो ये है कि इसके लेखक को ही ये नहीं पता कि वो ‘मोदी को क्यों पसंद करता’ है! उसके पास मोदी की उपलब्धियों को बताने के लिए कुछ नहीं है, लेकिन उसका मनगढ़न्त झूठ देखिए कि उसे ‘मोदी जी के अतिरिक्त और कोई राजनेता दूर दूर तक दिखाई नहीं देता!’ अरे, ये निपट धूर्त तो मोतियाबिन्द से पीड़ित निकला! और, इसे जनता का मार्गदर्शन करने का काम दिया गया है! अलबत्ता, मैसेज़ के लेखक को ये ज़रूर पता है कि मोदी जी अच्छे दिनों की बात करके देश का सत्यानाश करने का ‘प्रयत्न’ करने में कोई क़सर नहीं छोड़ रहे! जिस दिन मोदी अपने लक्ष्य का पा लेंगे, उस दिन भारत ‘हिन्दू राष्ट्र’ और ‘विश्व-गुरु’ बन जाएगा, क्योंकि उसके आराध्य मोदी जी के पास ‘इतिहास की जानकारी’ हो या ना हो, लेकिन ‘भविष्य की पूरी तैयारी’ है!

कुलमिलाकर, उपरोक्त WhatsApp मैसेज़ के लेखक के लिए ये लिखना मुफ़ीद होगा कि ‘हे मूर्खज्ञ, इतना तो मोदी भी अपने बारे में नहीं जानते, जितना आपका दावा है!’

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संघी ट्रोल ये झूठ क्यों फैला रहे हैं कि नेहरू ने अपनी बीमार पत्नी का ख़्याल नहीं रखा?

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nehru kamla

1925 से ही झूठ और अफ़वाह फ़ैलाना संघियों का स्थायी स्वभाव रहा है। आज़ादी से पहले जहाँ काँग्रेस की अगुवाई में चल रहे स्वतंत्रता आन्दोलन में पलीता लगाना संघ का मक़सद था, वहीं आज़ादी के बाद जब चुनाव दर चुनाव भारत की जनता संघियों को नकारती रही तो उन्होंने झूठ की बदौलत विरोधियों का चरित्र-हनन करने को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। इसी उद्देश्य के तहत जवाहर लाल नेहरू को लेकर असंख्य झूठ गढ़े और फैलाये गये। फिर भी जनता को संघियों पर यक़ीन नहीं हुआ। गाँधी के हत्यारों की जमात को जनता ने हमेशा हाशिये पर ही रखा। आगे चलकर चरित्र-हनन के दायरे में इन्दिरा, राजीव, सोनिया और राहुल जैसे गाँधी-नेहरू परिवार के हरेक सदस्य को खींच लिया गया।

मज़े की बात ये है कि संघियों को जब-जब लगता है कि उनकी प्रतिष्ठा गिर रही है, तब-तब उनके ट्रोल्स सोशल मीडिया और ख़ासकर WhatsApp पर झूठ की सप्लाई बढ़ा देते हैं। अभी चुनावी माहौल में गुजरात के ट्रोल्स ने निम्न मैसेज़ को वायरल कर दिया है। आपकी जानकारी के लिए हम उस मैसेज़ को हूबहू यहाँ कॉपी-पेस्ट कर रहे हैं। साथ ही पूरे प्रसंग की सच्चाई भी बता रहे हैं। ताकि नयी पीढ़ी को बरगलाना मुमकिन नहीं हो सके।

WhatsApp पर फैलाया जा रहा झूठ

जवाहर लाल नेहरु ने अपनी पत्नी के साथ जो किया वो इतना भयावह था की जान कर आप नेहरु से नफरत करने लगेंगे..

टीवी चैनेल पर कांग्रेस पार्टी के नेताओ के द्वारा अक्सर ये आरोप लगते हुए सुना जाता है की प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी पत्नी को छोड़ दिया. लेकिन क्या आप को यह पता है जवाहर लाल नेहरु ने अपनी पत्नी के साथ क्या किया?

जवाहरलाल नेहरु की पत्नी कमला नेहरु को टीबी हो गया था.. उस जमाने में टीबी की दहशत ठीक ऐसा ही थी जैसे आज एड्स की है.. क्योंकि तब टीबी का इलाज नही था और इन्सान तिल तिल तडप तडप कर पूरी तरह गलकर हड्डी का ढांचा बनकर मरता था… और कोई भी टीबी मरीज के पास भी नहीं जाता था क्योंकि टीबी सांस से फैलती थी… लोग मरीजोंको पहाड़ी इलाके में बने टीबी सेनिटोरियम में भर्ती कर देते थे..

नेहरु ने अपनी पत्नी को युगोस्लाविया [आज चेक रिपब्लिक] के प्राग शहर में दुसरे इन्सान के साथ सेनिटोरियम में भर्ती कर दिया..

कमला नेहरु पुरे दस सालो तक अकेले टीबी सेनिटोरियम में पल पल मौत का इंतजार करती रही.. लेकिन नेहरु दिल्ली में एडविना बेंटन के साथ इश्क करते थे.. सबसे शर्मनाक बात तो ये है की इस दौरान नेहरु कई बार ब्रिटेन गये लेकिन एक बार भी उन्होंने प्राग जाकर अपनी धर्मपत्नी का हालचाल नही लिया.

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को जब पता चला तब वो प्राग गये.. और डाक्टरों से और अच्छे इलाज के बारे में बातचीत की.. प्राग के डाक्टरों ने बोला की स्विट्जरलैंड के बुसान शहर में एक आधुनिक टीबी होस्पिटल है जहाँ इनका अच्छा इलाज हो सकता है..

तुरंत ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने उस जमाने में 70 हजार रूपये इकट्ठे किये और उन्हें विमान से स्विटजरलैंड के बुसान शहर में होस्पिटल में भर्ती किया..

लेकिन कमला नेहरु असल में मन से बेहद टूट चुकी थी.. उन्हें इस बात का दुःख था की उनका पति उनके पास पिछले दस सालो से हाल चाल लेने तक नही आया और गैर लोग उनकी देखभाल कर रहे है..दो महीनों तक बुसान में भर्ती रहने के बाद 28 February 1936 को बुसान में ही कमला नेहरु की मौत हो गयी..

उनके मौत के दस दिन पहले ही नेताजी सुभाषचन्द्र ने नेहरु को तार भेजकर तुरंत बुसान आने को कहा था.. लेकिन नेहरु नही आये.. फिर नेहरु को उनकी पत्नी की मौत की खबर भेजी गयी.. फिर भी नेहरु अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार में भी नही आये..

अंत में स्विटजरलैंड के बुसान शहर में ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने नेहरु की पत्नी कमला नेहरु का अंतिम संस्कार करवाया. जिस व्यक्ति ने अपनी पत्नी के साथ ऐसा व्यवहार किया उसे हम चाचा नेहरू कहते हैं।

यह मेसेज इतना फैलाओ की मोदी मजबुर हो जावे और चाचा की पदवी निकाल ली जावे.

कमला नेहरू के उपरोक्त प्रसंग की सच्चाई

1. ये व्याख्या ही पूरी तरह से भ्रष्ट है कि नेहरू के नक्शे-क़दम पर चलकर नरेन्द्र मोदी ने अपनी पत्नी जशोदाबेन को लावारिस छोड़ दिया! पहला सवाल ये है कि क्या जशोदाबेन भी लाइलाज़ और जानलेवा तपेदिक (टीबी) से पीड़ित थीं कि मोदी ने उनके साथ सात-फेरों की लाज़ नहीं निभायी? यदि नहीं, तो ये तुलना वैसी ही है जैसे किसी Reptile या Insect की तुलना Mammal से की जाए? ऐसा सिर्फ़ लोगों को मूर्ख बनाने के लिए ही किया जा सकता है। लिहाज़ा, ये समझना बहुत ज़रूरी है कि आपको कौन मूर्ख बना रहा है और क्यों? ऐसा करके वो क्या हासिल करना चाहता है?

2. जवाहर लाल नेहरू और उनकी पत्नी कमला नेहरू का वैवाहिक जीवन बेहद सुखमय था। कमला अपने पति जवाहर और बेटी इन्दिरा के लिए बहुत बड़ी प्रेरणा स्रोत थीं। अपने पूरे परिवार की तरह कमला भी आज़ादी के परवानों में शुमार थीं। बीमार होने से पहले तक कमला नेहरू ने स्वतंत्रता आन्दोलन में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। कमला के तमाम क्रियाकलाप सबूतों के साथ मौजूद हैं। लेकिन वो आपको कभी नहीं बताया जाएगा। क्योंकि संघी ट्रोल्स का मक़सद नेहरू ख़ानदान का चरित्रहनन करना है, जो तरह-तरह के झूठ फैलाने के सिवाय किसी और तरीके से नहीं हो सकता!

3. पोस्ट में लिखी ये बात सही है कि उस ज़माने में टीबी को लेकर जो दहशत थी, वैसी तो आज एड्स को लेकर भी नहीं है। क्योंकि टीबी का संक्रमण हवा में फैलता है। लेकिन एड्स के मामले में ऐसा नहीं है। इसीलिए तब टीबी के मरीज़ों को एकान्त में रखा जाता था। गाँवों में तो लोग अपने घरों से दूर अलग कमरा या झोपड़ी बनाकर मरीज़ को रखकर उसकी यथासम्भव सेवा करते थे। तब अमीर हो या ग़रीब, टीबी के हरेक मरीज़ को जीर्णहीन बनने तक अपनी मौत का इन्तज़ार ही करना पड़ता था। हालाँकि, सम्पन्न होने की वजह से मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरू ने कमला नेहरू का यथासम्भव इलाज़ करवाया था।

4. कमला नेहरू का जन्म 1 अगस्त 1899 को हुआ। 17 साल की उम्र में 8 फरवरी 1916 को जवाहर लाल से उनकी शादी हुई। 19 नवम्बर 1917 को इन्दिरा प्रियदर्शिनी का जन्म हुआ। इसके सात साल बाद अक्टूबर 1924 में कमला नेहरू ने एक पुत्र को भी जन्म दिया। लेकिन वो हफ़्ते भर में ही चल बसा। अपने सास-ससुर और पति की तरह कमला भी स्वतंत्रता सेनानी थीं। उन्होंने 1921 के असहयोग आन्दोलन में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। इलाहाबाद में महिलाओं के कई दस्ते बनाकर विदेशी कपड़ों और शराब की होली जलाये जाने की मुहिम का नेतृत्व किया। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान जवाहर लाल नौ बार जेल गये। असहयोग आन्दोलन के वक़्त जब अँग्रेज़ों ने देशद्रोहपूर्ण भाषण देने के लिए उन्हें जेल में डाल दिया तो कमला नेहरू ने पति की जगह उनका भाषण पढ़ा। इसी वजह से जल्द ही अँग्रेज़ों को कमला नेहरू भी बेहद ख़तरनाक लगने लगीं। इसीलिए, उन्हें अपनी सास स्वरूपरानी और सरोजिनी नायडू के साथ दो बार जेल जाना पड़ा।

5. 1934 के आख़िरी महीनों में कमला नेहरू की सेहत अक्सर ख़राब रहने लगी। तब उनकी देखरेख के लिए इलाहाबाद के स्वराज भवन में एक डिस्पेंसरी बनवायी गयी। इसमें ही स्वतंत्रता आन्दोलन के घायलों का उपचार भी होने लगा। लेकिन 1935 के शुरुआती महीनों में जब ये पता चला कि कमला को टीबी हो गया है, तब उन्हें नैनीताल के भोवाली सैनिटोरियम में भेज दिया गया। वहाँ कमला 10 मार्च से 15 मई 1935 तक रहीं। उस वक़्त जवाहर लाल नेहरू, अलमोड़ा जेल में बन्द थे। भोवाली में जब कमला की सेहत कुछ सुधरी तब उन्हें वहीं से स्विटज़रलैंड भेजा गया। जहाँ से 1935 में वो कुछ स्वस्थ होकर भारत लौटीं भी। लेकिन थोड़े समय में ही उनकी तबीयत फिर से बिगड़ गयी तो उन्हें वापस स्विटज़रलैंड ले जाया गया। वहीं, कमला ने 28 फरवरी 1936 को अन्तिम साँस ली।

6. इससे पहले, कमला की बिगड़ी सेहत के आधार पर जवाहर लाल नेहरू को जेल से पैरोल मिला तो वो अक्टूबर 1935 में कमला से मिलने स्विटज़रलैंड भी गये थे। मृत्यु के बाद कमला को स्विटज़रलैंड में ही दफ़्नाना पड़ा, क्योंकि टीबी संक्रमण के वजह से न तो उनके शव को भारत लाना सम्भव था और न ही वहाँ उनका दाह-संस्कार करने की अनुमति थी।

7. कमला के निधन के बाद उनकी याद में महात्मा गाँधी ने स्वराज भवन की डिस्पेंसरी को एक बड़े अस्पताल में तब्दील करवा दिया। वही कमला नेहरू अस्पताल आज भी इलाहाबाद का एक बहुत बड़ा महिला अस्पताल है, जिसे सरकार नहीं बल्कि ट्रस्ट चलाता है। कमला की बीमारी के वक़्त नेहरू परिवार पर आज़ादी के आन्दोलन का जुनून इस क़दर सवार था कि ख़ुद नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ‘मैंने उसकी बहुत अनदेखी की! उसकी मौत से मैं तबाह हो चुका था! कई महीने तक मैं शोक में डूबा रहा!’ ज़रा सोचिए कि ये शब्द अफ़सोस या पश्चाताप के हैं या बिगड़े दाम्पत्य के प्रतीक? लेकिन नेहरू का चरित्रहनन करने वाले इसे कभी नहीं समझ पाएँगे!

8. संघियों के घृणित पोस्ट में लिखे गये ‘प्राग, बुसान, 70 हज़ार रुपये इक्कठा करना और एडविना से इश्क़’ की कहानी भी कपोल-कल्पना है। कमला कभी प्राग़ के किसी टीबी सैनिटोरियम में भर्ती नहीं रहीं। न ही सुभाष चन्द्र बोस ने उन्हें प्राग से स्विटज़रलैंड भिजवाने जैसा कोई काम किया। हाँ, ये सही है कि जब काँग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू जेल में थे तो बोस ने वियना (आस्ट्रिया) की यात्रा की थी। वहीं से वो स्विटज़रलैंड के बडेनवीलर में टीबी सैनिटोरियम में भर्ती कमला नेहरू को देखने भी गये थे। उन्होंने ही जवाहर को तार भेजकर उनके अन्तिम दिनों में होने की इत्तेला भी दी थी। उसी तार के आधार पर नेहरू को जेल से पैरोल मिला। लेकिन जवाहर और इन्दिरा के बडेनवीलर पहुँचने से पहले कमला ने दम तोड़ दिया। इस दौरान सुभाष चन्द्र बोस वहीं रुके रहे, क्योंकि उनकी जवाहर लाल नेहरू से शानदार दोस्ती थी। सुभाष ने ही कमला के अन्तिम संस्कार का सारा इन्तज़ाम भी सम्भाला था।

9. नेहरू और बोस के रिश्ते इतने प्रगाढ़ थे कि ख़ुद नेहरू ने 1937 में अपने बाद सुभाष को ही काँग्रेस का अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव रखा था। इसका महात्मा गाँधी ने भी समर्थन किया था। कमला के निधन के बाद, सुभाष के विदेश से लौटते ही मई 1936 में अँग्रेज़ों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया था। सुभाष चन्द्र बोस की मौत आज़ादी से दो साल पहले 18 अगस्त 1945 को ताइवान में हुए एक विमान हादसे में हुई। लेकिन संघियों ने हमेशा उनकी मौत को लेकर ख़ूब दुष्प्रचार किया। अफ़वाह फैलायी गयी कि नेहरू ने सुभाष को मरवा दिया। बोस की मौत को लेकर कई जाँच आयोग भी बने। इस बीच भी संघी झूठ फैलाते रहे कि सुभाष की मौत से जुड़ी ‘फ़ाइलों’ में ऐसी गोपनीय बातें हैं जिससे नेहरू-गाँधी परिवार और काँग्रेस शर्मसार हो सकती है, इसलिए उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जाता!

10. सुभाष की बदौलत नेहरू का चरित्र-हनन करने वाले इस सच्चाई को बिल्कुल भुला देते हैं कि नेहरू और बोस, दोनों ही काँग्रेस के समाजवादी खेमे के नेता थे। उनके बीच कोई निजी मतभेद नहीं था। अलबत्ता, सुभाषचन्द्र बोस की ‘सैन्यवादी प्रवृत्ति’ को गाँधी और नेहरू जैसे उनके अनुयायी उचित नहीं मानते थे। नेहरू और बोस के बीच परस्पर सम्मान ऐसा था कि सुभाष चन्द्र बोस ने जब आज़ाद हिन्द फ़ौज बनायी तो उसके एक ब्रिगेड का नाम ‘नेहरू’ रखा गया! यहाँ तक कि गाँधीजी को भी ‘राष्ट्रपिता’ का सम्बोधन देने वाले नेताजी ही थे!

11. नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद, संघियों ने एक बार फिर से अपनी चरित्र-हनन की रणनीति को ख़ूब हवा दी। वो जहाँ-तहाँ सरदार पटेल, आम्बेडकर, सुभाष चन्द्र बोस जैसे नेताओं से अपनी और संघ परिवार की वैचारिक नज़दीकियाँ दिखाने का भ्रम फैलाने लगे। जबकि इसमें लेस-मात्र भी सच नहीं है। इस बात के असंख्य सबूत मौजूद हैं कि काँग्रेस के ये सभी महान नेता संघियों को बुरी तरह से नापसन्द करते थे, जो महात्मा गाँधी की हत्या के बाद काफ़ी बढ़ चुकी थी। मोदी राज में ‘बोस फ़ाइल्स’ का ख़ूब हल्ला मचाया गया। तब जनवरी 2016 में बोस से जुड़ी कई गोपनीय फ़ाइलें सार्वजनिक भी गयीं। लेकिन इससे जो तथ्य सामने आये, उससे तो भगवा ख़ानदान के हाथ से तोते ही उड़ गये। दशकों से संघियों की ओर फैलाये जा रहे दुष्प्रचार पर भी पानी फिर गया।

12. इन्हीं ‘बोस फ़ाइल्स’ से पहली बार पता चला कि जवाहर लाल नेहरू ने वियना में रह रही सुभाष चन्द्र बोस की बेटी अनिता बोस को हर महीने आर्थिक मदद भिजवाने की व्यवस्था की थी। इसके लिए 23 मई 1954 को ‘अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी’ (एआईसीसी) ने नेताजी की बेटी अनिता बोस के लिए 2 लाख रुपये की पूँजी से एक ट्रस्ट बनाया। नेहरू और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिधान चन्द्र रॉय, इसके ट्रस्टी थे। ट्रस्ट के ज़रिये अनिता बोस को हर महीने 500 रुपये की आर्थिक मदद दी जाती थी। 23 मई 1954 को नेहरू की ओर से हस्ताक्षरित एक दस्तावेज़ के अनुसार, “डॉ. बी. सी. राय और मैंने आज वियना में सुभाष चन्द्र बोस की बच्ची के लिए एक ट्रस्ट डीड पर हस्ताक्षर किये हैं। दस्तावेज़ों को सुरक्षित रखने के लिए मैंने उनकी मूल प्रति एआईसीसी को दे दी है।”

13. 1954 से लेकर 1964 तक तक अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी की ओर से अनिता बोस को सालाना 6,000 रुपये की मदद भेजी जाती रही। इसे 1965 में अनिता की शादी के बाद बन्द कर दिया गया। यहाँ ये समझना भी बहुत ज़रूरी है कि उस ज़माने में 500 रुपये महीना अपने आप में ख़ासी बड़ी रक़म थी, क्योंकि इतना वेतन तो बड़े-बड़े अफ़सरों का भी नहीं होता था! इस प्रसंग का एक दिलचस्प पहलू ये भी रहा कि जवाहर लाल नेहरू ने कभी अपनी नेक़-दिली का ढिंढ़ोरा नहीं पीटा। यहाँ तक कि इन्दिरा, राजीव, सोनिया और राहुल वग़ैरह ने भी कभी इन जानकारियों का सियासी लाभ बटोरने की कोशिश नहीं की। एक ओर ये ऐतिहासिक तथ्य हैं और दूसरी ओर है संघियों की जगज़ाहिर बदनीयत!

आख़िर में मेरी बात

संघियों के झूठ से भरा उपरोक्त पोस्ट जब मेरे पास आया तो मैंने उसे मेरे पास फ़ारवर्ड करने वाले व्यक्ति को पूरी सच्चाई लिखकर भेजी। वो भी इस आग्रह के साथ कि वो भी मेरे जबाव को उन लोगों को फ़ारवर्ड कर दें, जो झूठ के फ़ैक्ट्री के मुफ़्त के सेल्समैन बन जाते हैं। इस तरह यदि उन सभी लोगों तक सच्चाई पहुँच जाएगी जिनके दिमाग़ में लगातार झूठ का ज़हर भरा जा रहा है, तो आने वाले पीढ़ियाँ ग़ुमराह होने से बच जाएँगी और संघियों को मंसूबों पर पानी फिर जाएगा।

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Viral सच

‘शुभ्रक’ घोड़े का वायरल सच

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Shubhrak Ghora

संघियों को जब-जब लगता है कि उनकी प्रतिष्ठा गिर रही है, तब-तब उनके ट्रोल्स सोशल मीडिया और ख़ासकर WhatsApp पर झूठ की सप्लाई बढ़ा देते हैं। फिर संघी ट्रोल्स इसी झूठ को वायरल करते है। इसका मक़सद बग़ैर सामने आये जनता के दिमाग़ में ज़हर भरना होता है। आपकी जानकारी के लिए हम ऐसे ही एक और मैसेज़ को हूबहू यहाँ कॉपी-पेस्ट कर रहे हैं। साथ ही पूरे प्रसंग की सच्चाई भी बता रहे हैं। ताकि नयी पीढ़ी को बरगलाना मुमकिन नहीं हो सके।

WhatsApp पर फैलाया जा रहा झूठ

कुतुबुद्दीन ऐबक घोड़े से गिर कर मरा, यह तो सब जानते हैं, लेकिन कैसे?

यह आज हम आपको बताएंगे..

वो वीर महाराणा प्रताप जी का ‘चेतक’ सबको याद है,

लेकिन ‘शुभ्रक’ नहीं!

तो मित्रो आज सुनिए कहानी ‘शुभ्रक’ की…..

सूअर कुतुबुद्दीन ऐबक ने राजपूताना में जम कर कहर बरपाया, और उदयपुर के ‘राजकुंवर कर्णसिंह’ को बंदी बनाकर लाहौर ले गया।

कुंवर का ‘शुभ्रक’ नामक एक स्वामिभक्त घोड़ा था,

जो कुतुबुद्दीन को पसंद आ गया और वो उसे भी साथ ले गया।

एक दिन कैद से भागने के प्रयास में कुँवर सा को सजा-ए-मौत सुनाई गई.. और सजा देने के लिए ‘जन्नत बाग’ में लाया गया। यह तय हुआ कि राजकुंवर का सिर काटकर उससे ‘पोलो’ (उस समय उस खेल का नाम और खेलने का तरीका कुछ और ही था) खेला जाएगा…

कुतुबुद्दीन ख़ुद कुँवर सा के ही घोड़े ‘शुभ्रक’ पर सवार होकर अपनी खिलाड़ी टोली के साथ ‘जन्नत बाग’ में आया।

‘शुभ्रक’ ने जैसे ही कैदी अवस्था में राजकुंवर को देखा, उसकी आंखों से आंसू टपकने लगे। जैसे ही सिर कलम करने के लिए कुँवर सा की जंजीरों को खोला गया, तो ‘शुभ्रक’ से रहा नहीं गया.. उसने उछलकर कुतुबुद्दीन को घोड़े से गिरा दिया और उसकी छाती पर अपने मजबूत पैरों से कई वार किए, जिससे कुतुबुद्दीन के प्राण पखेरू उड़ गए! इस्लामिक सैनिक अचंभित होकर देखते रह गए…

मौके का फायदा उठाकर कुंवर सा सैनिकों से छूटे और ‘शुभ्रक’ पर सवार हो गए। ‘शुभ्रक’ ने हवा से बाजी लगा दी.. लाहौर से उदयपुर बिना रुके दौडा और उदयपुर में महल के सामने आकर ही रुका!

राजकुंवर घोड़े से उतरे और अपने प्रिय अश्व को पुचकारने के लिए हाथ बढ़ाया, तो पाया कि वह तो प्रतिमा बना खडा था.. उसमें प्राण नहीं बचे थे।

सिर पर हाथ रखते ही ‘शुभ्रक’ का निष्प्राण शरीर लुढक गया..

भारत के इतिहास में यह तथ्य कहीं नहीं पढ़ाया जाता क्योंकि वामपंथी और मुल्लापरस्त लेखक अपने नाजायज बाप की ऐसी दुर्गति वाली मौत बताने से हिचकिचाते हैं! जबकि फारसी की कई प्राचीन पुस्तकों में कुतुबुद्दीन की मौत इसी तरह लिखी बताई गई है।

नमन स्वामीभक्त ‘शुभ्रक’ को..

‘शुभ्रक’ घोड़े के उपरोक्त प्रसंग की सच्चाई

सच्चाई ये है कि क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ लाहौर के शासक मोहम्मद गोरी का ग़ुलाम था। मोहम्मद गोरी की मौत के बाद क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ ने ख़ुद को लाहौर का शासक घोषित कर दिया। 24 जून 1206 को लाहौर में उसकी ताजपोशी हुई। दिल्ली के प्रसिद्ध चिश्ती सन्त शेख क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी से अगाध प्रेम होने की वजह से क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ ने अपनी राजधानी को लाहौर से दिल्ली लाने का फ़ैसला किया। इससे दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई। लेकिन ग़ुलाम क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ सिर्फ़ चार साल तक ही दिल्ली का शासक रहा। उसने बख़्तियार काकी की याद में क़ुतुब मीनार का निर्माण शुरू करवाया। लेकिन इसे पूरा उसके ग़ुलाम इल्तुतमिश ने करवाया।

1210 में लाहौर में चौगान (पोलो) खेलते वक़्त क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ की घोड़े से गिरने की वजह से मौत हो गयी। उसे लाहौर में ही दफ़्नाया गया। क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ की मौत के बाद उसके बेटे ‘आरामशाह’ को शासक घोषित किया गया। लेकिन इल्तुतमिश ने उसे बन्दी बना लिया और ख़ुद शासक बन गया। इल्तुतमिश भी ग़ुलाम था। उसे क़ुतुबुद्दीन ने 1197 में अन्हिलवाड के युद्ध के दौरान ख़रीदा था। एक ग़ुलाम के बाद दूसरे ग़ुलाम के शासक बनने की वजह से दिल्ली सल्तनत का वो दौर ग़ुलाम वंश कहलाया। आगे चलकर ग़ुलामों को हराकर ख़िलज़ियों ने अपना राजवंश स्थापित किया।

क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ के शासनकाल के समय मेवाड़ के राजा मन्थन सिंह (1191–1211) थे। जबकि रण सिंह (कर्ण सिंह-1) का कार्यकाल 1158 से 1168 तक रहा। इन दोनों के दरम्यान क्षेम सिंह, सामन्त सिंह और कुमार सिंह भी मेवाड़ के शासक रहे। मेवाड़ में राणा राजवंश में कर्ण सिंह-2 का शासनकाल 1620 से 1628 तक था। यानी, ये राजा तो क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ का समकालीन हो नहीं सकता क्योंकि दोनों के बीच 400 साल का फ़ासला है।

अब यदि ये मान भी लिया जाए कि कर्ण सिंह-1 के पास कोई ‘शुभ्रक’ नाम का घोड़ा था और जिसकी स्वामी भक्ति बेजोड़ थी तो भी उस कर्ण सिंह प्रथम की सामना कभी क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ से नहीं हो सकता। क्योंकि दोनों के शासन काल में 32 साल का अन्तर था। लिहाज़ा, शुभ्रक नामक घोड़े की सारी वीरगाथा महज़ एक कपोल-कल्पना है। वैसे भी घोड़े की उम्र 20-25 साल ही होती है।

दरअसल, हिन्दू शासकों की सच्ची या काल्पनिक कहानियों को हमेशा आलोचनात्मक नज़रिये से देखिए, क्योंकि हिन्दुओं की वीरता का किस्सा चाहे जितने गाया जाए, लेकिन इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता है कि वो दौर ‘वीर भोग्य वसुन्धरा’ का था। ये सर्वविदित है कि हिन्दू शासकों ने कभी संगठित होकर विदेशी हमलावरों का मुक़ाबला नहीं किया। वो तो हमेशा आपस में ही लड़ते रहे। इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि उस दौर में कोई भी अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए नहीं लड़ता था। सैनिक अपने राजा की शान में उसके प्रति स्वामी-भक्ति दिखाने के लिए लड़ते थे। जबकि राजा अपना राजपाट बचाने या फैलाने के लिए लड़ता था। प्रजा के लिए कोई जीते-हारे इससे कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता था! इसीलिए उस दौर में प्रजा का कोई विद्रोह नहीं होता था।

अँग्रेज़ों के आने से पहले तक भारतवर्ष नाम की कोई राजनीतिक सत्ता नहीं थी। भारतीय उपमहाद्वीप का भौगोलिक इलाका ज़रूर था। इसे ही हिन्दूस्तान और भारतवर्ष कहा जाता था। हिन्दूस्तान को 1935 के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट के मुताबिक, आधिकारिक रूप से ‘इंडिया’ कहा गया। यही इंडिया, हिन्दूस्तान और भारतवर्ष का पर्यायवाची बना। सदियों तक भारत, पृथ्वी के इस इलाका का वैसा ही नाम था, जैसे अफ़ीका एक महाद्वीप है। जिसमें हमेशा से कई देश या कबीले या संस्कृतियाँ पलती-बढ़ती रही हैं। उसी तरह से भारतवर्ष हमेशा अलग-अलग रजवाड़ों, रियासतों, मनसबों और प्रान्तों में बँटा रहा।

अब लगे हाथ, ‘भारत माता’ और ‘वन्दे मातरम्’ की ऐतिहासिकता को भी जान लीजिए। ‘भारत माता’ का नामकरण, पहली बार, 1873 में मंचित किरन चन्द्र बनर्जी के बाँग्ला नाटक से हुआ। इससे प्रेरित होकर ही 1882 में बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने ‘आनन्द मठ’ नामक बाँग्ला उपन्यास लिखा। इस उपन्यास में ‘वन्दे मातरम्’ नामक कविता संस्कृत में लिखी गयी। कालान्तर में स्वतंत्रता आन्दोलन को नयी बुलन्दियों पर पहुँचाने में काँग्रेस पार्टी के लिए ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम्’ जैसे नारों ने अहम भूमिका निभायी। ‘जय हिन्द’ नामक सम्बोधन का जन्म तो आज़ादी के बाद हुआ।

आख़िर में, संघी ट्रोल्स को ये भी जान लेना चाहिए कि भारत के इतिहास में काल्पनिक तथ्य नहीं पढ़ाये जाते। क्योंकि इतिहासकार वामपन्थी या मुल्लापरस्त नहीं हो सकता। इतिहास-लेखन एक वैज्ञानिक विधा है और कोई भी इसे मनमाफ़िक तरीक़े से नहीं लिख सकता!

(यदि आप चाहते हैं कि आपके दोस्त या परिचित आपको लगातार मूर्ख बनाकर हाँकते नहीं रहें तो कृपया इस सन्देश को उन लोगों को ज़रूर भेजें जो आपके सामने झूठ परोसते हैं।)

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