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ख़ुद जायसी ने ‘पद्मावत’ के अन्त में लिखा है कि पद्मावती का कथानक काल्पनिक है!

बाजीराव मस्तानी, जोधा अकबर और पद्मावती जैसे ऐतिहासिक पात्रों में मामला हिन्दू और मुसलमान के बीच हुए इश्क़ की नाटकीयता का है। छद्म हिन्दूवादियों को यही बात हज़म नहीं होती!

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फ़िल्म ‘पद्मावती’ को लेकर मचे बवाल के तमाम रोचक आयाम हैं। क्या रानी पद्मावती वास्तव में कोई ऐतिहासिक पात्र है? क्या उन्हें महिमामंडित किया गया? फ़िल्मकारों को ‘ऐतिहासिक पात्रों’ पर आधारित फ़िल्म बनाने के लिए किस सीमा तक जाने की छूट मिलनी चाहिए? कलाकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी की लक्ष्मण-रेखा कैसे तय हो? क्या महज ‘डिस्क्लेमर’ की आड़ में ऐतिहासिक और सामाजिक धारणाओं से छेड़छाड़ के लिए निरंकुशता हासिल की जा सकती है? और, क्या वक़्त आ गया है कि देश और समाज इन मुद्दों पर ठोस नीति तय करे, ताकि भविष्य में ऐसे बवालों की पुनरावृत्ति नहीं हो।

उत्तर प्रदेश के रायबरेली ज़िले के जायस क़स्बे में जन्मे मलिक मोहम्मद जायसी (1490-1558) की साहित्यिक रचना ‘पद्मावत’ को अद्भुत माना गया है। मध्यकालीन हिन्दुस्तानी साहित्य में ‘पद्मावत’ का प्रमुख स्थान है। जायसी की ये कृति ऐतिहासिक पात्रों पर आधारित ज़रूर है, लेकिन इसे प्रमाणिक इतिहास का दर्ज़ा हासिल नहीं है। कमोबेश, वैसे ही जैसे राजपूत शासक पृथ्वीराज चौहान की शान में लिखी गयी चन्द्रबरदाई की रचना ‘पृथ्वीराज रासो’ को भी ऐतिहासिक दस्तावेज़ की तरह नहीं माना गया। क्योंकि चन्द्रबरदाई तो बाक़ायदा पृथ्वीराज चौहान का दरबारी था। वो एक कवि या साहित्यकार ज़रूर थे, लेकिन इतिहासकार नहीं। दरबारी होने के नाते उन्होंने अपने आक़ा की शान में बहुत सारी ऐसी बातें लिखीं, जिन्हें इतिहासकारों ने अतिश्योक्तिपूर्ण माना। इसी तरह से फ़िल्म मुग़ल-ए-आज़म में शहजादा सलीम और अनारकली की कहानी भी पूरी तरह से काल्पनिक रही है।

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सूफ़ी कवि मलिक मोहम्मद जायसी

इसी तरह, हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल के प्रतिनिधि और सूफ़ी कवि मलिक मोहम्मद जायसी की रचना ‘पद्मावत’ को 1550 में लिखा गया। जायसी को इसे पूरा करने में दस साल लगे। वो अकबर (1556-1605) का काल था। जबकि ‘पद्मावत’ में वर्णित नायक अलाउद्दीन ख़िलज़ी (1296-1316) का दौर क़रीब ढाई सौ साल पहले का था। उस ज़माने में इतना लम्बा वक़्त कई युगों जैसा रहा होगा। इसीलिए ये माना गया कि जायसी ने ‘पद्मावत’ में अपने पात्रों का चित्रण सिर्फ़ जनश्रुतियों और अपनी कल्पना शक्ति के आधार पर किया। उनके पास चश्मदीदों का कोई बयान नहीं हो सकता। 1909 में प्रकाशित इम्पीरियल गज़ट ऑफ इन्डिया के मुताबिक़, ख़ुद जायसी ने क़रीब एक दशक की अवधि में लिखे गये अपने महाकाव्य के अन्त में लिखा था कि ‘पद्मावत’ महज एक दृष्टान्त (Fictional) कथा यानी काल्पनिक है।

इसमें कोई शक़ नहीं कि मलिक मोहम्मद जायसी के जन्म से पहले और बाद में भी चित्तौड़ की रानी पद्मावती का चरित्र और व्यक्तित्व, लोक इतिहास और लोक काव्य का अहम हिस्सा रहा है। इसी वजह से कालान्तर में पद्मावती को हिन्दू अस्मिता के प्रतीक के रूप में स्थापित किया गया। जब-जब हिन्दूवादियों को मुसलमानों के प्रति नफ़रत और धार्मिक उन्माद फ़ैलाने के लिए ज्वलनशील सामग्री की ज़रूरत पड़ी, तब-तब मलिक मोहम्मद जायसी की रचना ‘पद्मावत’ को बहुत आसानी से प्रमाणिक इतिहास के रूप में पेश करके मौक़े को भुनाया गया। ये रवैया इतना प्रबल था कि आगे चलकर लोगों ने पेशेवर इतिहासकारों के उन तथ्यों पर भी यक़ीन नहीं किया, जो ये साबित करते हैं कि पद्मावती नाम की कोई रानी वास्तव में कभी थी ही नहीं। वो सिर्फ़ एक काल्पनिक पात्र है। हालाँकि, कालान्तर में ऐसे इतिहासकार भी पनप गये जिन्होंने पद्मावती की कहानी और उसके महिमा मंडन को सही माना।

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ऐतिहासिक पात्रों को केन्द्र में रखकर तमाम प्रसिद्ध फ़िल्में बनी हैं। जैसे मुग़ल-ए-आज़म, जहाँआरा, ताजमहल वग़ैरह। इनमें से हरेक में ऐतिहासिक तथ्यों और सच्चाई को तोड़ा-मरोड़ा गया है। फ़िल्मी ग्लैमर और ताम-झाम का तड़का लगाया गया है। सभी फ़िल्मों ने बढ़िया कमाई भी की। फ़िल्म निर्माण से जुड़ी तमाम विधाओं के लिए दाद भी बटोरी। इन्हीं फ़िल्मों के सफल फ़िल्मांकन की वजह से आम लोगों में ये धारणा घर कर गयी कि इनका कथानक ही असली इतिहास है। इसके बावजूद कभी कोई बवाल नहीं खड़ा हुआ क्योंकि इन फ़िल्मों के पात्र मुसलमान थे। जबकि बाजीराव मस्तानी, जोधा अकबर और पद्मावती जैसे ऐतिहासिक पात्रों में मामला हिन्दू और मुसलमान के बीच हुए इश्क़ की नाटकीयता का है। छद्म हिन्दूवादियों को यही बात हज़म नहीं होती!

धर्मान्ध कट्टरवादियों को हिन्दू परेश रावल की ‘ओ माई गॉड’ तो किसी तरह बर्दाश्त हो जाती है, लेकिन मुसलमान आमिर ख़ान की ‘पीके’ से उनकी धार्मिक भावनाएँ डगमगाने लगती हैं! फिर कहा जाता है कि ‘है हिम्मत तो अन्य धर्मों के प्रतीकों का मज़ाक उड़ाकर दिखाओ।’ देखते ही देखते सारा मुद्दा सच या झूठ, पाखंड या कटाक्ष से हटकर ‘हिम्मत’ में जा अटकता है। क्योंकि ‘हिम्मत’ से सियासत को गरमाया जा सकता है। ऐसी सियासत चमकाने के लिए दिन-रात जो धार्मिक घृणा फैलानी पड़ती है, उस चिन्तन पर गंगा-जमुनी तहज़ीब का सन्देश देती फ़िल्में पानी फ़ेर देती हैं।

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धार्मिक घृणा की वजह से ही फ़िल्म देखने के बाद दर्शक उसके पात्रों को इंसानी जज़्बातों के पैमाने के रूप में देखने-समझने के बजाय हिन्दू-मुसलमान के रूप में बाँटकर देखने लगता है। जबकि सबको अच्छी तरह से पता होता है कि फ़िल्म की कहानी काल्पनिक है। एक-एक दृश्य पूर्व निर्धारित और पूर्व संयोजित है। सारे संवाद मनगढ़न्त हैं। फिर भी मन्दबुद्धि लोग फ़िल्म से इस क़दर प्रभावित हो जाते हैं कि उसे ही अक्षरशः सच, प्रमाणिक और ऐतिहासिक समझने लगते हैं। कट्टरवादी हिन्दुओं को पर्दे पर दिखाये जाने वाले ऐतिहासिक क़िरदारों की ऐसी हरक़तें बर्दाश्त नहीं होतीं, जिसमें किसी भी तरह से कोई मुसलमान पात्र हिन्दुओं के मुक़ाबले मज़बूत या प्रभावशाली नज़र आये। शायद, यही वजह थी कि किसी ज़माने में तमाम मुसलमान कलाकार, हिन्दू नामों के साथ रुपहले पर्दे पर पेश किये गये।

साफ़ है कि कट्टरवादी, कभी ये अहसास नहीं होने देना चाहते कि जिस दौर में विदेशी मुसलिम आक्रमणकारियों ने हिन्दुस्तान पर राज किया, उस दौर में कभी भी हिन्दू और मुसलमान, प्यार-मोहब्बत और भाईचारे से भी रहा करते होंगे! दरअसल, जैसे कट्टरवादी मुसलमान अपनी उन्नत नस्ल को मुसलिम शासकों के दौर से जोड़कर देखते हैं, वैसे ही संघी विचारधारा और छत्रछाया में पलने-बढ़ने वाला कट्टरवादी हिन्दू अपनी नस्ल को उम्दा साबित करने के लिए तरह-तरह के झूठ की आड़ लेता है। दोनों ही समुदाय के ऐसे लोग बुनियादी तौर पर अशिक्षित और मन्दबुद्धि वाले हैं। इनके पास सच्चाई को जानने-समझने की न तो अकल है और न ही ख़्वाहिश। इसीलिए दोनों क़ौमों को उनका नेतृत्व उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा करता है!

अब सवाल ये है कि कोई फ़िल्मकार यदि डॉक्युमेंटरी (वृतचित्र) बनाये और उसके माध्यम से किसी हस्ती का इतिहास दुनिया को बताना चाहे तो शायद कट्टरवादी एक बार को बर्दाश्त भी कर लें। लेकिन यही काम यदि व्यावसायिक फ़ीचर फ़िल्म से किया जाएगा तो किसी न किसी तरह का बवाल मचना तय है। दरअसल, तमाम झूठी छवियों में जीने वाले भारतीय समाज में मौजूद कट्टरवादी मूर्खों का तबक़ा ये बर्दाश्त नहीं कर पाता कि रुपहले पर्दे पर उसकी छवि को कमतर करके उकेरा जाए। उसे गोबर पर लगा चाँदी का वर्क पसन्द है, उसे टाट पर लगा मलमल का पैबन्द पसन्द है, लेकिन दुनिया को उसकी पुरातन सच्चाई बतायी जाए, ये उसे गवारा नहीं! लिहाज़ा, यदि समाज को घृणा, हिंसा और टकराव से बचाना है तो सिर्फ़ सेंसर बोर्ड के भरोसे रहने से बात नहीं बनने वाली।

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फ़िल्मकार ये सुनिश्चित करें कि वो महज ‘डिस्केल्मर’ (इस फ़िल्म के सभी पात्र काल्पनिक है। इनका किसी सच्ची घटना से कोई सम्बन्ध होना महज इत्तेफ़ाक़ है।) के भरोसे इतिहास या धार्मिक कहानियों पर आधारित पात्रों वाली प्रस्तुतियों से भारतीय समाज को आलोकित नहीं कर सकते। ‘नो वन किल्ड जेसिका’ या ‘पिंक’ जैसी बोल्ड फ़िल्में तो भारत में बन सकती हैं, लेकिन देवराज इन्द्र ने कैसे गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या का सतीत्व छीना था, उसे दर्शाने वाली फ़िल्मों से कट्टरवादी दर्शक आहत हो जाएँगे! क्योंकि भारतीयों की नज़र में पद्मावती का जौहर और सीरिया के अलेप्पो में बीसियों औरतों का बलात्कार से बचने के लिए ख़ुदकुशी कर लेना अलग-अलग बातें हैं! कट्टरवादियों को दोनों मिसालों में नारियों की अस्मिता पर एक जैसा ख़तरा नहीं दिखायी देता!

‘ब्लैक’ जैसी फ़िल्म बनाने वाले संजय लीला भंसाली जैसे फ़िल्मकार भी ‘देवदास’ की सादगी को भुनाने से बाज़ नहीं आते, तो पद्मावती की ऐतिहासिकता वो कैसे बख़्श देंगे! ये लोग एक ओर रुपहले परदे पर व्यक्ति पूजा की कहानियाँ गढ़कर समाज के अन्धविश्वास का दोहन करते हैं और इससे चाँदी काटते हैं तो दूसरी ओर प्रगतिशीलता का जामा ओढ़कर ऑस्कर जीतने की कामना रखते हैं। यही लोग करणी सेना जैसों के पालनहार भी हैं और यही उनसे पिटकर या तरह-तरह की धमकियाँ आमंत्रित करके सुर्खियाँ भी बटोरते हैं!

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जहां 40 की उम्र में आता है बुढ़ापा

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बीजापुर छत्तीसगढ़, 9 जनवरी । ‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून..’ रहीम की ये पंक्ति पानी की महत्ता को दर्शा रही है कि यदि पानी नहीं रहेगा तो कुछ भी नहीं रहेगा, लेकिन जब पानी अमृत के बजाय जहर बन जाए तो पूरा जीवन अपंगता की ओर बढ़ चलता है। यह कोई कहानी नहीं बल्कि हकीकत है।

बीजापुर जिला मुख्यालय से तकरीबन 60 किमी दूर भोपालपटनम में स्थित छत्तीसगढ़ का एक ऐसा गांव जहां पर युवा 25 वर्ष की आयु में ही लाठी लेकर चलने को मजबूर हो जाते हैं और 40 साल के पड़ाव में प्रकृति के नियम के विपरित बुढ़े होने लग जाते हैं। यहां 40 फीसदी लोग उम्र से पहले ही या तो लाठी के सहारे चलने लगते हैं या तो बुढ़े हो जाते हैं। इसकी वजह कोई शारीरिक दोष नहीं, बल्कि यहां के भूगर्भ में ठहरा पानी हैए जो इनके लिए अमृत नहीं, बल्कि जहर साबित हो रहा है।

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Health Issue in India

यहां के हैंडपंपों और कुओं से निकलने वाले पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण पूरा का पूरा गांव समय से पहले ही अपंगता के साथ-साथ लगातार मौत की ओर बढ़ रहा है। शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं होने के कारण मजबूरन आज भी यहां के लोग फलोराइड युक्त पानी पीने को मजबूर हैं, बावजूद शासन-प्रशासन मौत की ओर बढ़ रहे इस गांव और ग्रामीणों की ना तो सुध ले रहा है ना ही इस खतरनाक हालात से बचने के लिए कोई कार्ययोजना तैयार करता नजर आ रहा है, जबकि इस गांव में आठ वर्ष के उम्र से लेकर 40 वर्ष तक का हर तीसरे व्यक्ति में कुबड़पन, दांतों में सड़न, पीलापन और बुढ़ापा नजर आता है।

प्रशासन ने यहां तक सड़क तो बना दी, पर विडंबना तो देखिए कि सड़क बनाने वाले प्रशासन की नजर इन पीड़ितों पर अब तक नहीं पड़ पाई।

यहां के सेवानिवृत्त शिक्षक तामड़ी नागैया, जनप्रतिनिधि नीलम गणपत और फलोराइड युक्त पानी से पीड़ित तामड़ी गोपाल का कहना है कि गांव में पांच नलकूप और चार कुएं हैं, इनमें से सभी नलकूपों और कुओं में फलोराइड युक्त पानी निकलता है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने सभी नलकूपों को सील कर दिया था लेकिन गांव के लोग अब भी दो नलकूपों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

उनका कहना है कि हर व्यक्ति शहर से खरीदकर पानी नहीं ला सकता है, इसलिए यही पानी पीने में इस्तेमाल होता है। यही नहीं, बल्कि गर्मी के दिनों में कुछ लोग तीन किमी दूर इंद्रावती नदी से पानी लाकर उबालकर पीते हैं।

इनमें से तामड़ी नागैया का कहना है कि यह समस्या पिछले तीस सालों से ज्यादा बढ़ी हैए क्योंकि तीस साल पहले तक यहां के लोग कुएं का पानी पीने के लिए उपयोग किया करते थे, मगर जब से नलकूपों का खनन किया गया तब से यह समस्या विराट रूप लेने लगा और अब स्थिति ऐसी है कि गांव की 40 फीसदी आबादी 25 वर्ष की उम्र में लाठी के सहारे चलनेए कुबड़पन को ढोने और 40 वर्ष की अवस्था में ही बुढ़े होकर जीवन जीने को मजबूर है। यहां पर लगभग 60 फीसदी लोगों के दांत पीले होकर सड़ने लगे हैं।

बताया जा रहा है कि यह पूरा गांव भू गर्भ में स्थित चट्टान पर बसा हुआ है और यही वजह है कि पानी में फलोराइड की मात्रा अधिक है और इस भू गर्भ से निकलने वाला पानी यहां के ग्रामीणों के लिए जहर बना हुआ है।

जानकार बताते हैं कि वन पार्ट पर मिलियन यानि पीपीएम तक फलोराइड की मौजूदगी इस्तेमाल करने लायक हैए जबकि पीपीएम को मार्जिनल सेप माना गया है। डेढ़ पीएम से अधिक फलोराइड की मौजूदगी को खतरनाक माना गया है और गेर्रागुड़ा में डेढ़ से दो पीपीएम तक इसकी मौजूदगी का पता चला है और लोगों पर इसका खतरनाक असर साफ नजर आ रहा है।

इस समस्या से निजात पाने के लिए एक साल पहले पीएचई विभाग ने इस गांव में एक ओवरहेड टैंक का निर्माण कर गांव के हर मकान तक पाइप लाइन विस्तार के साथ नल कनेक्शन भी दे रखा है, मगर प्रशासन की लापरवाही के चलते आज र्पयत तक पाइप लाइन के सहारे घरों में मौजूद नल कनेक्शनों में शुद्ध पेयजल की सप्लाई करने में प्रशासन और विभाग असफल रहा है। परिणामस्वरूप गांव के संपन्न लोग किसी तरह भोपालपटनम स्थित वाटर प्लांट से शुद्ध पेयजल खरीदकर पीने में उपयोग तो कर लेते हैं, मगर गरीब तबके के लोग अब भी फलोराइड युक्त पानी पीकर जवानी में ही बुढ़ापे को समय से पहले पाने को मजबूर हैं।

इस मामले में सीएमएचओ डॉ. बी.आर. पुजारी का कहना है कि ग्रामीणों की शिकायत के बाद गांव में कैम्प लगाकर लोगों का इलाज किया गया था और कुछ लोगों को बीजापुर भी बुलाया गया था। चूंकि इस गांव के पानी में फलोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण हड्डियों में टेड़ापन, कुबड़पन और दांतों में पीलेपन के साथ सड़न की समस्या आती है, जिसका इलाज सिर्फ शुद्ध पेयजल से ही हो पाएगा। शिकायत के बाद गांव के अधिकांश हैंडपंपों को सील करवा दिया गया था।

फलोराइड समस्या के निदान के लिए पीएचई की ओर से निर्मित वाटर ओवरहेड टैंक से पेयजल आपूर्ति ना होने की बात पर कार्यपालन अभियंता जगदीश कुमार का कहना है कि विभाग की ओर से टैंक के निर्माण बाद पंचायत को हैंडओवर किया जा चुका है। पेयजल आपूर्ति शुरू करने की जिम्मेदारी अब पंचायत की है, फिर भी अगर पानी की सप्लाई नहीं की जा रही है तो विभाग इसे अवश्य संज्ञान में लेगा।

–आईएएनएस

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ज्यादातर पाकिस्तानी नहीं जानते इंटरनेट क्या है : सर्वेक्षण

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Internet

इस्लामाबाद, 12 नवंबर | पाकिस्तान में 15 साल से लेकर 65 साल की उम्र के 69 फीसदी लोगों को नहीं मालूम है कि इंटरनेट क्या होता है। यह बात सूचना-संचार प्रौद्योगिकी है(आईसीटी) आधारित एक सर्वेक्षण में प्रकाश में आई है। श्रीलंका के थिंक टैंक लाइर्नी एशिया द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट सोमवार को डॉन में प्रकाशित हुई है। रिपोर्ट पाकिस्तान के 2,000 लोगों के सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गई है।

सर्वेक्षक थिंक टैंक ने दावा किया है कि नमूने की प्रक्रिया के तहत राष्ट्रीय स्तर पर 15 साल से 65 साल की उम्र की 98 फीसदी आबादी के प्रतिनिधित्व सुनिश्चित की गई है।

लाइनर एशिया की सीईओ हेलनी गलपाया ने कहा, “पाकिस्तान दूरसंचार प्राधिकरण (पीटीए) की वेबसाइट में 15.2 करोड़ सक्रिय सेल्युलर फोन धारक हैं। चाहे वे आदमी हो या औरत, गरीब हो या अमीर लेकिन वे नहीं एप्स का उपयोग करना नहीं जानते हैं।”

–आईएएनएस

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Viral सच

ज़हर उगलने वाले 13 सेकेंड के इस वीडियो को क्या आपने देखा!

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जैसे शरीर के तपने का मतलब बुख़ार होता है, वैसे ही जब फेंकू ख़ानदान Fake News/Views/Video पर उतर आये तो समझ लीजिए कि अपने पतन की आहट सुनकर वो बदहवासी में झूठ तथा अफ़वाह की उल्टियाँ कर रहा है! क्योंकि झूठ किसी को हज़म नहीं होता, भक्तों का पाचन-तंत्र भी इसे हज़म नहीं कर पाता है! लिहाज़ा, भक्तों को भी उल्टी-दस्त यानी डीहाइड्रेशन की तकलीफ़ होना स्वाभाविक है! इसीलिए जैसे ही संघ परिवार के चहेते संगठनों के सर्वेक्षणों ने बताना शुरू किया कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी बुरी तरह से हारने जा रही है, वैसे ही एक ओर तो नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के भाषणों की दिशा पूरी ताक़त से काँग्रेस और राहुल गाँधी के चरित्रहनन की ओर घूम जाती है, वहीं दूसरी ओर, संघियों का अफ़वाह प्रसार तंत्र भी सक्रिय हो जाता है, ताकि समाज में वोट बैंक की सियासत को कोसते हुए ‘हिन्दू-मुसलमान’ करके हिन्दुओं को हिन्दू के नाम पर लामबन्द किया जा सके!

मोदी-शाह के दहकते हुए भाषण तो आपको बन्धक/दलाल न्यूज़ चैनल सारा दिन सुनाते ही रहते हैं! पहले भाषण का लाइव और फिर स्टोरी तथा डिबेट/बहस के रूप में! हालाँकि, इनकी गुणवत्ता को दर्शक/श्रोता/पाठक भी जल्द ही पहचान लेते हैं। इनके सही या ग़लत होने को लेकर अपनी राय भी बनाते हैं। लेकिन इसी के साथ ग़ुमनाम संघियों की ओर से WhatsApp University के ज़रिये हिन्दुओं को मूर्ख बनाकर, उन्हें मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काने का शरारती खेल चालू हो जाता है! ऐसा ही एक घिनौना खेल मेरे हाथ लग गया। मेरे किसी परिचित ने मुझे 13 सेकेंड का एक वीडियो और उसके साथ निम्न टिप्पणी भी भेजी।

“कैसे सौप दे कोंग्रेस को

ये वतन हिन्दुस्तान का,

हमने देखा है तुम्हारी रेली मैं झंडा पकिस्तान का!!

ये विडिओ जरुर देखे”

इस संदेश के वर्तनी दोष की अनदेखी करके आप वीडियो देखने लगेंगे। फिर अपना सिर धुन लेंगे। आपके नथुने फूलने लगेंगे। आपके होंठ अपशब्दों को बुदबुदाने लगेंगे। फिर आप फ़ौरन काँग्रेस को कोसने लगेंगे। उन्हें देश-विरोधी, ग़द्दार और पाकिस्तान परस्त मानने लगेंगे। काँग्रेस के प्रति आपके मन में नफ़रत पैदा होगी। लेकिन अब ज़रा इस वीडियो को बार-बार देखिए। स्लो मोशन यानी धीमी रफ़्तार में भी देखिए, जैसे क्रिकेट मैच में थर्ड अम्पायर देखते हैं! क्योंकि यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो फ़ौरन इस वीडियो को अपने तमाम परिचितों और ख़ासकर उन लोगों को फ़ारवर्ड नहीं करेंगे जो या तो भक्त नहीं हैं या फिर काँग्रेसी हैं!

आप दोनों में से किसी भी विकल्प को चुने, तो भी उन अनाम और ग़ुमनाम ताक़तों का मक़सद पूरा हो जाता है, जिनके झूठ और दुष्प्रचार के लिए ऐसे वीडियो वायरल करवाये जाते हैं। इस काम के लिए संघ-बीजेपी ने देश भर में कम से कम 20 हज़ार लोगों को बाक़ायदा वेतन वाली नौकरी पर लगा रखा है! सोशल मीडिया की भाषा में इन बेहूदा कार्यकर्ताओं/स्वयंसेवकों को ट्रोल या भक्त कहा जाता है। इन्हें बाक़ायदा गुरिल्ला युद्ध-शैली के क्रान्तिकारियों या विषकन्याओं की तरह प्रशिक्षित किया जाता है।

संघी गुरुकुल या शाखाओं में प्रशिक्षित और संस्कारित ऐसे निपट ‘मूर्ख देशभक्तों’ यानी ट्रोल्स की बदौलत ही 2014 में बीजेपी सत्ता में आयी और अब भगवा ख़ेमे को लगता है कि यही देवदूत और ईवीएम में हेराफ़ेरी ही उसे संकट से उबार पाएगी! लेकिन बकरे की माँ कब तक ख़ैर मना पायी है! राक्षसी वृत्ति जब अति कर देती है, तो उसका पतन होता ही है। यही हाल मोदी सरकार का 2019 में होने वाला है। तभी तो इस वीडियो के बारे में आपको ये नहीं बताया जाता कि ये कहाँ का नज़ारा है? कब का नज़ारा है? क्या आयोजन था? कौन आयोजक था? यदि वीडियो आपत्तिजनक है तो पुलिस-प्रशासन, सरकार-क़ानून ने क्या कोई कार्रवाई की या नहीं? आपको कोई ये भी क्यों नहीं बताया कि जब मामला इतना गम्भीर है, तो इस वीडियो को भक्त चैनलों पर क्यों नहीं दिखाया गया? वहाँ इसे लेकर तलवारें क्यों नहीं भाँजी गयीं?

बहरहाल, मैं इन सवालों में नहीं उलझा। क्योंकि मुझे इन सभी का सही जबाब मालूम है। इसीलिए मैंने अपने उस परिचित को पाकिस्तान के झंडे की तस्वीर के साथ सन्देश भेजा कि “संघियों के झूठ ने हिन्दुओं से उनकी प्रगतिशीलता और बुद्धि-विवेक को छीनकर उन्हें मूर्खों में तब्दील कर दिया है। जैसे हर पीली चीज़ सोना नहीं होती वैसे ही हर हरा झंडा और चाँद-तारा पाकिस्तानी नहीं होता! अब ज़रा पाकिस्तान के झंडे को ग़ौर से देखिए। इसमें बायीं तरफ़ सफ़ेद पट्टी भी है। जबकि आपको गुमराह करने वाले झंडे में ये नहीं है! अब आप चाहें तो अपने पाप का प्रायश्चित करते हुए मेरे इस जबाब को वापस उस महामूर्ख को भेज सकते हैं, जिसने आपको ये वीडियो भ्रष्ट टिप्पणी के साथ भेजा है।”

पता नहीं मेरे उस परिचित ने ऐसी किया या नहीं, लेकिन यदि इतना ज़रा दिमाग़ अन्य लोग भी लगाने लगें तो इस वीडियो को फ़ैलाने वालों का मक़सद पूरा नहीं हो सकता। सोशल मीडिया के ज़रिये ज़हर उगलगर हिन्दुओं को उल्लू बनाकर अपना सियासी उल्लू सीधा करने वालों के मंसूबे पूरे नहीं होते! तब टेलिकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद को सोशल मीडिया में जबाबजेही की बातें करते हुए सड़क पर डंडा पटकने का मौक़ा कैसे मिलता? फ़ेसबुक, ट्वीटर और व्हाट्सअप को धमकाने की नौटंकी करके सुर्ख़ियाँ कैसे बटोरी जाती? सूचना-प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर को भी मीडिया संस्थानों के कार्यक्रमों में फ़ेक न्यूज़ पर चिन्ता जताने का मौका कैसे मिलता? दरअसल, संघियों की रणनीति ही यही है कि ‘स्वयंसेवकों से उपद्रव करवाओ और नेताओं से बोलो कि प्रवचन देकर जनता को ग़ुमराह करते रहे!’

हम देख चुके हैं कि दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) को लेकर कैसे झूठ फ़ैलाया गया कि वहाँ देश तोड़ने वाले अर्बन नक्सल तैयार होते हैं। ‘हमें चाहिए आज़ादी’ वाले नारे को जेएनयू में कैसे राष्ट्रविरोधी बनाया गया? इसे सबने क़रीब से देखा। जिन को क़सूरवार बताया गया, उन्हें अदालत में दोषी नहीं साबित किया गया, बल्कि इनकी सुनवाई करने जा रही अदालतों को बलवा-स्थल में बदलने का ज़िम्मा उन्हीं लोगों ने अपने हाथों में ले लिया जो संविधान की शपथ लेकर संवैधानिक पदों पर बैठे हैं। दूसरी ओर, जेएनयू में कबाड़ बन चुके टैंक को खड़ा करके छात्रों में देश भक्ति भरने का ढोंग किया गया।

फ़ेक न्यूज़ की समस्या का समाधान बहुत मुश्किल नहीं है। डिज़ीटल या साइबर जगत में डाटा की वही भूमिका है जो हमारे शरीर में ख़ून की है। इसीलिए डाटा का स्रोत ग़ुमनाम नहीं रह सकता। कम्प्यूटर की भाषा में जिसे आईपी नम्बर या इंटरनेट प्रोटोकॉल करते हैं, उससे किसी भी साइबर सामग्री के निर्माता तक पहुँचा जा सकता है, क्योंकि किसी भी डिज़ीटल उपकरण का अनोखा आईपी नम्बर होता है। ये नम्बर फ़र्ज़ी नहीं हो सकता। भले ही हैकर्स इस नम्बर के साथ कोई भी फ़र्ज़ीवाड़ा कर लें, लेकिन फ़र्ज़ी नम्बर भी डिज़ीटल की परिभाषा में फ़र्ज़ी नहीं हो सकता।

आईपी नम्बर की तह में जाकर ही आईटी विशेषज्ञ उन लोगों तक पहुँचते हैं, जहाँ वो पहुँचना चाहते हैं। कौन नहीं जानता कि हमारे देश की पुलिस जब अपराधी तक पहुँचना चाहती है तो कुछेक अपवादों को छोड़कर ज़रूर पहुँचती है। इसीलिए ये सवाल उठना लाज़िमी है कि यदि मोदी के ख़िलाफ़ अपशब्द लिखने वालों को पकड़ा जा सकता है तो राहुल के ख़िलाफ़ झूठ फ़ैलाने वालों को क्यों नहीं पकड़ा जाता? इसकी वजह ये है कि हरेक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के पास अपने हरेक उपभोक्ता का ब्यौरा होता है। इसी ब्यौरा को यदि हरेक सन्देश के साथ चिपकाने की शर्त अनिवार्य कर दी जाए तो फ़ेक न्यूज़ गढ़ने और उसे फ़ैलाने वालों के गिरेबान तक पहुँचा जा सकता है।

सोशल मीडिया कम्पनियों को सिर्फ़ किसी सन्देश को भेजने वाले की पहचान ज़ाहिर करने का टूल सार्वजनिक करना है। आगे का काम क़ानून और उसकी एजेंसियों का है। लेकिन गोपनीयता या इंस्क्रिप्शन के नाम पर अपराधियों को छिपाकर रखा जाता है। अब ज़रा सोचिए कि साइबर अपराधियों को छिपाकर रखने से कौन फ़ायदे में है!

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