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Viral सच

ख़ुद जायसी ने ‘पद्मावत’ के अन्त में लिखा है कि पद्मावती का कथानक काल्पनिक है!

बाजीराव मस्तानी, जोधा अकबर और पद्मावती जैसे ऐतिहासिक पात्रों में मामला हिन्दू और मुसलमान के बीच हुए इश्क़ की नाटकीयता का है। छद्म हिन्दूवादियों को यही बात हज़म नहीं होती!

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फ़िल्म ‘पद्मावती’ को लेकर मचे बवाल के तमाम रोचक आयाम हैं। क्या रानी पद्मावती वास्तव में कोई ऐतिहासिक पात्र है? क्या उन्हें महिमामंडित किया गया? फ़िल्मकारों को ‘ऐतिहासिक पात्रों’ पर आधारित फ़िल्म बनाने के लिए किस सीमा तक जाने की छूट मिलनी चाहिए? कलाकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी की लक्ष्मण-रेखा कैसे तय हो? क्या महज ‘डिस्क्लेमर’ की आड़ में ऐतिहासिक और सामाजिक धारणाओं से छेड़छाड़ के लिए निरंकुशता हासिल की जा सकती है? और, क्या वक़्त आ गया है कि देश और समाज इन मुद्दों पर ठोस नीति तय करे, ताकि भविष्य में ऐसे बवालों की पुनरावृत्ति नहीं हो।

उत्तर प्रदेश के रायबरेली ज़िले के जायस क़स्बे में जन्मे मलिक मोहम्मद जायसी (1490-1558) की साहित्यिक रचना ‘पद्मावत’ को अद्भुत माना गया है। मध्यकालीन हिन्दुस्तानी साहित्य में ‘पद्मावत’ का प्रमुख स्थान है। जायसी की ये कृति ऐतिहासिक पात्रों पर आधारित ज़रूर है, लेकिन इसे प्रमाणिक इतिहास का दर्ज़ा हासिल नहीं है। कमोबेश, वैसे ही जैसे राजपूत शासक पृथ्वीराज चौहान की शान में लिखी गयी चन्द्रबरदाई की रचना ‘पृथ्वीराज रासो’ को भी ऐतिहासिक दस्तावेज़ की तरह नहीं माना गया। क्योंकि चन्द्रबरदाई तो बाक़ायदा पृथ्वीराज चौहान का दरबारी था। वो एक कवि या साहित्यकार ज़रूर थे, लेकिन इतिहासकार नहीं। दरबारी होने के नाते उन्होंने अपने आक़ा की शान में बहुत सारी ऐसी बातें लिखीं, जिन्हें इतिहासकारों ने अतिश्योक्तिपूर्ण माना। इसी तरह से फ़िल्म मुग़ल-ए-आज़म में शहजादा सलीम और अनारकली की कहानी भी पूरी तरह से काल्पनिक रही है।

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सूफ़ी कवि मलिक मोहम्मद जायसी

इसी तरह, हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल के प्रतिनिधि और सूफ़ी कवि मलिक मोहम्मद जायसी की रचना ‘पद्मावत’ को 1550 में लिखा गया। जायसी को इसे पूरा करने में दस साल लगे। वो अकबर (1556-1605) का काल था। जबकि ‘पद्मावत’ में वर्णित नायक अलाउद्दीन ख़िलज़ी (1296-1316) का दौर क़रीब ढाई सौ साल पहले का था। उस ज़माने में इतना लम्बा वक़्त कई युगों जैसा रहा होगा। इसीलिए ये माना गया कि जायसी ने ‘पद्मावत’ में अपने पात्रों का चित्रण सिर्फ़ जनश्रुतियों और अपनी कल्पना शक्ति के आधार पर किया। उनके पास चश्मदीदों का कोई बयान नहीं हो सकता। 1909 में प्रकाशित इम्पीरियल गज़ट ऑफ इन्डिया के मुताबिक़, ख़ुद जायसी ने क़रीब एक दशक की अवधि में लिखे गये अपने महाकाव्य के अन्त में लिखा था कि ‘पद्मावत’ महज एक दृष्टान्त (Fictional) कथा यानी काल्पनिक है।

इसमें कोई शक़ नहीं कि मलिक मोहम्मद जायसी के जन्म से पहले और बाद में भी चित्तौड़ की रानी पद्मावती का चरित्र और व्यक्तित्व, लोक इतिहास और लोक काव्य का अहम हिस्सा रहा है। इसी वजह से कालान्तर में पद्मावती को हिन्दू अस्मिता के प्रतीक के रूप में स्थापित किया गया। जब-जब हिन्दूवादियों को मुसलमानों के प्रति नफ़रत और धार्मिक उन्माद फ़ैलाने के लिए ज्वलनशील सामग्री की ज़रूरत पड़ी, तब-तब मलिक मोहम्मद जायसी की रचना ‘पद्मावत’ को बहुत आसानी से प्रमाणिक इतिहास के रूप में पेश करके मौक़े को भुनाया गया। ये रवैया इतना प्रबल था कि आगे चलकर लोगों ने पेशेवर इतिहासकारों के उन तथ्यों पर भी यक़ीन नहीं किया, जो ये साबित करते हैं कि पद्मावती नाम की कोई रानी वास्तव में कभी थी ही नहीं। वो सिर्फ़ एक काल्पनिक पात्र है। हालाँकि, कालान्तर में ऐसे इतिहासकार भी पनप गये जिन्होंने पद्मावती की कहानी और उसके महिमा मंडन को सही माना।

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ऐतिहासिक पात्रों को केन्द्र में रखकर तमाम प्रसिद्ध फ़िल्में बनी हैं। जैसे मुग़ल-ए-आज़म, जहाँआरा, ताजमहल वग़ैरह। इनमें से हरेक में ऐतिहासिक तथ्यों और सच्चाई को तोड़ा-मरोड़ा गया है। फ़िल्मी ग्लैमर और ताम-झाम का तड़का लगाया गया है। सभी फ़िल्मों ने बढ़िया कमाई भी की। फ़िल्म निर्माण से जुड़ी तमाम विधाओं के लिए दाद भी बटोरी। इन्हीं फ़िल्मों के सफल फ़िल्मांकन की वजह से आम लोगों में ये धारणा घर कर गयी कि इनका कथानक ही असली इतिहास है। इसके बावजूद कभी कोई बवाल नहीं खड़ा हुआ क्योंकि इन फ़िल्मों के पात्र मुसलमान थे। जबकि बाजीराव मस्तानी, जोधा अकबर और पद्मावती जैसे ऐतिहासिक पात्रों में मामला हिन्दू और मुसलमान के बीच हुए इश्क़ की नाटकीयता का है। छद्म हिन्दूवादियों को यही बात हज़म नहीं होती!

धर्मान्ध कट्टरवादियों को हिन्दू परेश रावल की ‘ओ माई गॉड’ तो किसी तरह बर्दाश्त हो जाती है, लेकिन मुसलमान आमिर ख़ान की ‘पीके’ से उनकी धार्मिक भावनाएँ डगमगाने लगती हैं! फिर कहा जाता है कि ‘है हिम्मत तो अन्य धर्मों के प्रतीकों का मज़ाक उड़ाकर दिखाओ।’ देखते ही देखते सारा मुद्दा सच या झूठ, पाखंड या कटाक्ष से हटकर ‘हिम्मत’ में जा अटकता है। क्योंकि ‘हिम्मत’ से सियासत को गरमाया जा सकता है। ऐसी सियासत चमकाने के लिए दिन-रात जो धार्मिक घृणा फैलानी पड़ती है, उस चिन्तन पर गंगा-जमुनी तहज़ीब का सन्देश देती फ़िल्में पानी फ़ेर देती हैं।

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धार्मिक घृणा की वजह से ही फ़िल्म देखने के बाद दर्शक उसके पात्रों को इंसानी जज़्बातों के पैमाने के रूप में देखने-समझने के बजाय हिन्दू-मुसलमान के रूप में बाँटकर देखने लगता है। जबकि सबको अच्छी तरह से पता होता है कि फ़िल्म की कहानी काल्पनिक है। एक-एक दृश्य पूर्व निर्धारित और पूर्व संयोजित है। सारे संवाद मनगढ़न्त हैं। फिर भी मन्दबुद्धि लोग फ़िल्म से इस क़दर प्रभावित हो जाते हैं कि उसे ही अक्षरशः सच, प्रमाणिक और ऐतिहासिक समझने लगते हैं। कट्टरवादी हिन्दुओं को पर्दे पर दिखाये जाने वाले ऐतिहासिक क़िरदारों की ऐसी हरक़तें बर्दाश्त नहीं होतीं, जिसमें किसी भी तरह से कोई मुसलमान पात्र हिन्दुओं के मुक़ाबले मज़बूत या प्रभावशाली नज़र आये। शायद, यही वजह थी कि किसी ज़माने में तमाम मुसलमान कलाकार, हिन्दू नामों के साथ रुपहले पर्दे पर पेश किये गये।

साफ़ है कि कट्टरवादी, कभी ये अहसास नहीं होने देना चाहते कि जिस दौर में विदेशी मुसलिम आक्रमणकारियों ने हिन्दुस्तान पर राज किया, उस दौर में कभी भी हिन्दू और मुसलमान, प्यार-मोहब्बत और भाईचारे से भी रहा करते होंगे! दरअसल, जैसे कट्टरवादी मुसलमान अपनी उन्नत नस्ल को मुसलिम शासकों के दौर से जोड़कर देखते हैं, वैसे ही संघी विचारधारा और छत्रछाया में पलने-बढ़ने वाला कट्टरवादी हिन्दू अपनी नस्ल को उम्दा साबित करने के लिए तरह-तरह के झूठ की आड़ लेता है। दोनों ही समुदाय के ऐसे लोग बुनियादी तौर पर अशिक्षित और मन्दबुद्धि वाले हैं। इनके पास सच्चाई को जानने-समझने की न तो अकल है और न ही ख़्वाहिश। इसीलिए दोनों क़ौमों को उनका नेतृत्व उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा करता है!

अब सवाल ये है कि कोई फ़िल्मकार यदि डॉक्युमेंटरी (वृतचित्र) बनाये और उसके माध्यम से किसी हस्ती का इतिहास दुनिया को बताना चाहे तो शायद कट्टरवादी एक बार को बर्दाश्त भी कर लें। लेकिन यही काम यदि व्यावसायिक फ़ीचर फ़िल्म से किया जाएगा तो किसी न किसी तरह का बवाल मचना तय है। दरअसल, तमाम झूठी छवियों में जीने वाले भारतीय समाज में मौजूद कट्टरवादी मूर्खों का तबक़ा ये बर्दाश्त नहीं कर पाता कि रुपहले पर्दे पर उसकी छवि को कमतर करके उकेरा जाए। उसे गोबर पर लगा चाँदी का वर्क पसन्द है, उसे टाट पर लगा मलमल का पैबन्द पसन्द है, लेकिन दुनिया को उसकी पुरातन सच्चाई बतायी जाए, ये उसे गवारा नहीं! लिहाज़ा, यदि समाज को घृणा, हिंसा और टकराव से बचाना है तो सिर्फ़ सेंसर बोर्ड के भरोसे रहने से बात नहीं बनने वाली।

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फ़िल्मकार ये सुनिश्चित करें कि वो महज ‘डिस्केल्मर’ (इस फ़िल्म के सभी पात्र काल्पनिक है। इनका किसी सच्ची घटना से कोई सम्बन्ध होना महज इत्तेफ़ाक़ है।) के भरोसे इतिहास या धार्मिक कहानियों पर आधारित पात्रों वाली प्रस्तुतियों से भारतीय समाज को आलोकित नहीं कर सकते। ‘नो वन किल्ड जेसिका’ या ‘पिंक’ जैसी बोल्ड फ़िल्में तो भारत में बन सकती हैं, लेकिन देवराज इन्द्र ने कैसे गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या का सतीत्व छीना था, उसे दर्शाने वाली फ़िल्मों से कट्टरवादी दर्शक आहत हो जाएँगे! क्योंकि भारतीयों की नज़र में पद्मावती का जौहर और सीरिया के अलेप्पो में बीसियों औरतों का बलात्कार से बचने के लिए ख़ुदकुशी कर लेना अलग-अलग बातें हैं! कट्टरवादियों को दोनों मिसालों में नारियों की अस्मिता पर एक जैसा ख़तरा नहीं दिखायी देता!

‘ब्लैक’ जैसी फ़िल्म बनाने वाले संजय लीला भंसाली जैसे फ़िल्मकार भी ‘देवदास’ की सादगी को भुनाने से बाज़ नहीं आते, तो पद्मावती की ऐतिहासिकता वो कैसे बख़्श देंगे! ये लोग एक ओर रुपहले परदे पर व्यक्ति पूजा की कहानियाँ गढ़कर समाज के अन्धविश्वास का दोहन करते हैं और इससे चाँदी काटते हैं तो दूसरी ओर प्रगतिशीलता का जामा ओढ़कर ऑस्कर जीतने की कामना रखते हैं। यही लोग करणी सेना जैसों के पालनहार भी हैं और यही उनसे पिटकर या तरह-तरह की धमकियाँ आमंत्रित करके सुर्खियाँ भी बटोरते हैं!

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लड़कियों की तुलना में लड़कों का यौन उत्पीड़न ज्यादा!

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Child Sexual Abuse in India

नई दिल्ली, 6 अगस्त | देश में अक्सर जब बात बच्चों से यौन उत्पीड़न के मामलों की आती है तो दिमाग में लड़कियों के साथ होने वाली यौन उत्पीड़न की घटनाएं आंखों के सामने उमड़ने लगती हैं, लेकिन इसका एक पहलू कहीं अंधकार में छिप सा गया है। महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की 2007 की रिपोर्ट दर्शाती है कि देश में 53.22 फीसदी बच्चों को यौन शोषण के एक या अधिक रूपों का सामना करना पड़ा, जिसमें से 52.94 फीसदी लड़के इन यौन उत्पीड़न की घटनाओं का शिकार हुए।

चेंज डॉट ओआरजी के माध्यम से बाल यौन उत्पीड़न के मामले को उठाने वाली याचिकाकर्ता, फिल्म निर्माता और लेखक इंसिया दरीवाला ने मुंबई से फोन पर आईएएनएस को बताया, “सबसे बड़ी समस्या है कि इस तरह के मामले कभी सामने आती ही नहीं क्योंकि हमारे समाज में बाल यौन उत्पीड़न को लेकर जो मानसिकता है उसके कारण बहुत से मामले दर्ज ही नहीं होते और होते भी हैं तो मेरी नजर में बहुत ही कम ऐसा होता है। इस तरह के मामले सामने आने पर समाज की पहली प्रतिक्रिया होती है कि लड़कों के साथ तो कभी यौन शोषण हो नहीं सकता, क्योंकि वे पुरुष हैं और पुरुषों के साथ कभी यौन उत्पीड़न नहीं होता।”

उन्होंने कहा, “समाज का जो यह नजरिया है लड़कों को देखने का ठीक नहीं है क्योंकि पुरुष बनने से पहले वह लड़के और बच्चे ही होते हैं। बच्चों की यह जो श्रेणी है काफी दोषपूर्ण है इसमें कोई लड़का-लड़की का भेद नहीं होता। लड़कों का जो शोषण हो रहा है अधिकतर पुरुषों द्वारा ही हो रहा है। मेरे हिसाब से यह काफी नजरअंदाज कर दी जाने वाली सच्चाई है और मैं पहले भी कई बार बोल चुकी हूं हम जो बच्चों व महिलाओं पर यह यौन हिंसा हमारे समाज में देख रहे हैं, कहीं न कहीं हम उसकी जड़ को नहीं पकड़ पा रहे हैं।”

लड़कों के साथ यौन उत्पीड़न होने पर बताने में कतराने की वजह के सवाल पर फिल्मनिर्माता ने कहा, “दरअसल जब समाज में किसी लड़की के साथ यौन उत्पीड़न की घटना होती है तो समाज की पहली प्रतिक्रिया हमदर्दी की होती है, उन्हें बचाने के लिए सपोर्ट सिस्टम होता है लेकिन अगर कोई लड़का अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामले को लेकर बोलता भी है तो पहले लोग उसपर हंसेंगे, उसका मजाक उड़ाएंगे व मानेंगे भी नहीं और उसकी बातों का विश्वास नहीं करेंगे, कहेंगे तुम झूठ बोल रहे हो यह तो हो नहीं सकता। हंसी और मजाक बनाए जाने के कारण लड़कों को आगे आने से डर लगता है इसलिए समाज बाल यौन उत्पीड़न में एक अहम भूमिका निभा रहा है।”

उन्होंने बताया, “पिछले एक साल में जब से मैंने अपना अभियान और लोगों से बात करना शुरू किया है तब से काफी चीजें हुई हैं। इसलिए मैं सरकार की शुक्रगुजार हूं कि कम से कम वह इस ओर ध्यान दे रहे हैं। आज सामान्य कानूनों को निष्पक्ष बनाने की प्रक्रिया चल रही है, इसकी शुरुआत पॉस्को कानून से हुई और अब धारा 377, पुरुषों के दुष्कर्म कानून को भी देखा जा रहा है। अब अखिरकार हम लोग लिंग समानता की बात कर सकते हैं, जिससे वास्तव में समानता आएगी। लिंग समानता का मतलब यह नहीं है कि वह एक लिंग को ध्यान में रखकर सारे कानून बनाए, यह सिर्फ महिलाओं की बात नहीं है। पुरुष और महिलाओं को समान रूप से सुरक्षा मिलनी चाहिए।”

लेखक इंसिया दरीवाल ने कहा, “देखिए पॉस्को कानून निष्पक्ष है लेकिन जब आप लड़कों के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में दंड के प्रावधान को देखते हैं तो वह धारा 377 के तहत दिया जाता था। जैसे पहले अगर दो पुरुषों के बीच सहमति से हुआ तो भी धारा 377 के तहत दोनों लोगों को सजा मिलती थी और नहीं हुआ तो भी दोनों को इसी धारा के तहत सजा दी जाती थी। इसमें पीड़ित को भी सजा मिलने का खतरा था, हालांकि अब चीजों में सुधार हुआ है और इसपर अब काफी चर्चा हो रही है और समाज में भी बदलाव आ रहा है।”

महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी से मिले समर्थन पर उन्होंने कहा, “उन्होंने मेरे काम की सराहना की है और कहा कि यह काम काफी जरूरी है। मैंने उनसे एक स्टडी की मांग की थी, जिसमें यह देखना था कि बाल यौन उत्पीड़न की हमारे समाज में कितनी प्रबलता है और इसके जो प्रभाव हैं वह बच्चों और पुरुषों पर क्या हैं, इसमें यौन प्रभाव, उनके संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ता है, उनके मानसिकता और शारिरिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता यह सब शामिल है। इस स्टडी के निष्कर्षो से मुझे मापदंड तैयार करने हैं और उन मापदंड़ों को मैं इसलिए तैयार करना चाहती हूं क्योंकि जब तक हम जड़ की जांच नहीं करेंगे तब तक नहीं पता चलेगा कि यह क्यों हो रहा है।”

बाल यौन उत्पीड़न मामलों में समाज की गलती के सवाल पर इंसिया ने कहा, “समाज कौन है हम लोग, इसलिए मानसिकता बदलना बहुत जरूरी है क्योंकि अगर हम लोग मानसिकता नहीं बदल पाए तो कानून कितने भी सख्त हो जाए तो उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। जब भी कोई घटना होती है तो हम सरकार, कानून और वकीलों को दोषी ठहराते हैं लेकिन हमें कहीं न कहीं खुद को भी देखना चाहिए क्योंकि हमारे समाज में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग भूमिका तैयार कर दी गई है, जिसे उन्हें निभाना पड़ता है, इसे बदलने की जरूरत है।”

भारत सरकार ने लिंग निष्पक्ष कानून बनाने के मद्दनेजर लड़कों के साथ होने वाले यौन शोषण को मौजूदा यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा (पॉस्को) अधिनियम में संशोधनों को मंजूरी दे दी है जिसे कैबिनेट के पास मंजूरी के लिए भेजा जाना बाकी है।

–आईएएनएस

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अपहरण के आरोपी सबसे अधिक सांसद-विधायक भाजपा से

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नई दिल्ली, 30 जुलाई | भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कम से कम 16 सांसदों और विधायकों के खिलाफ अपहरण से संबंधित आपराधिक मामले दर्ज हैं। यह भारत में किसी भी राजनीतिक दल से सबसे ज्यादा है। मौजूदा 4,867 सांसदों और विधायकों द्वारा दाखिल हलफनामों के एक विश्लेषण से यह खुलासा हुआ है। चुनाव एवं राजनीतिक सुधारों के लिए काम करने वाली एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स द्वारा सोमवार को यह निष्कर्ष जारी किया गया।

निष्कर्ष में कहा गया है कि 770 सांसदों और 4,086 विधायकों के हलफनामों से यह खुलासा हुआ कि 1,024 या कुछ 21 फीसदी देश के सांसदों-विधायकों ने यह घोषित किया है कि उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

इसमें से 64 ने अपने खिलाफ अपहरण से संबंधित मामलों की घोषणा की है। इसमें से 17 विभिन्न राजनीतक दलों से ताल्लुक रखते हैं, जबकि चार निर्दलीय हैं।

भाजपा इस सूची में शीर्ष पर है। जबकि कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) दोनों दूसरे स्थान पर हैं। दोनों के छह-छह सदस्य इस सूची में शामिल हैं।

एडीआर के मुताबिक, सूची में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के पांच, बीजू जनता दल (बीजद) और द्रमुक के चार-चार, समाजवादी पार्टी (सपा), तेदेपा के तीन-तीन, तृणमूल कांग्रेस, माकपा, और शिवसेना के दो-दो सदस्य शामिल हैं।

साथ ही इस सूची में लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा), जद (यू), टीआरएस और उत्तर प्रदेश की निषाद पार्टी के एक-एक सदस्य का नाम भी शामिल है।

अपहरण से संबंधित आरोपों की घोषणा करने वाले विधायकों में बिहार व उत्तर प्रदेश से नौ-नौ, महाराष्ट्र के आठ, पश्चिम बंगाल के छह, ओडिशा व तमिलनाडु से चार-चार, आंध्र प्रदेश, गुजरात व राजस्थान से तीन-तीन, और छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, पंजाब व तेलंगाना से एक-एक सदस्य शामिल हैं।

–आईएएनएस

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ये सरासर झूठ है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने फ़्राँस को पछाड़ दिया है!

यदि भारत की जीडीपी एक दशक में दोगुनी हो गयी और वो कौन-कौन से देश हैं, जिनकी जीडीपी इसी दौरान भारत की जीडीपी से पहले दोगुनी हुई है?

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Indian economy

भारत का भक्त-मीडिया आपको ये तो बताता है कि हम अब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में छठे स्थान पर आ चुके हैं और अब फ़्राँस से आगे हैं। लेकिन वो आपको ये नहीं बताता कि भारतीयों के मुक़ाबले फ़्राँसिसियों की प्रति व्यक्ति आय 20 गुना ज़्यादा है। आपको ये भी नहीं बताया जाता कि फ़्राँस की आबादी से ज़्यादा लोग भारत में आज भी ग़रीबी रेखा से नीचे हैं। राजा का बाजा बन चुका भारतीय मीडिया आपको ये भी नहीं समझता कि कैसे मोदी सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास-दर का हिसाब रखने वाले फ़ार्मूले को ही बदल दिया, जिसकी वजह से मनमोहन सरकार के मुक़ाबले अभी दर्ज होने वाली विकास-दर में दो फ़ीसदी का इज़ाफ़ा अपने आप आ जाता है।

भारतीय मीडिया अपने आप बेईमान नहीं हो गया। मोदी राज में एक बड़ी साज़िश के तहत मीडिया संस्थानों को हिदायत दी गयी कि वो ख़बरों को ऐसे तोड़-मरोड़कर पेश करें, जिससे जनता के सामने हमेशा सरकार की उपलब्धियों की झूठी तस्वीरें ही पहुँचती रहें। वर्ना, हरेक पेशेवर पत्रकार और उसके मीडिया संस्थान को अच्छी तरह पता है कि भारत का फ़्राँस से आगे निकलना सिर्फ़ एक आँकड़ा है। आँकड़ों की तुलनात्मक व्याख्या के बग़ैर वो सिर्फ़ अंक हैं और कुछ नहीं! किसी देश की अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का मतलब है कि उसकी आबादी की ख़ुशहाली का बढ़ना। ख़ुशहाली को नापने के कई पैमाने हैं। लेकिन सबसे आसान है प्रति व्यक्ति आय। दूसरा पैमाना है कि शिक्षा-स्वास्थ्य-सड़क-पानी-बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं का स्तर और इस पर होने वाला ख़र्च।

अब ज़रा ये सोचिए कि क्या आप उस व्यक्ति को ज़्यादा धनवान मानेंगे जिसके पास ज़्यादा ज़मीन हो या फिर उसे जिसके पास ज़्यादा उपजाऊ ज़मीन हो? हो सकता है कि किसी के पास सौ बीघा ज़मीन हो, लेकिन वो बंजर हो। जबकि किसी के पास दस बीघा ही हो और वो खेतीहर हो। अब यदि आप अंक के आधार पर सोचेंगे तो ज़ाहिर है कि आप सौ को दस के मुक़ाबले दस गुना बड़ा ही मानेंगे। ऐसा ही बड़क्पन विश्व बैंक की ओर से जारी सालाना, सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का है। ये आँकड़ा कहता है कि साल 2017 में भारत की जीडीपी 2597 अरब डॉलर हो गयी, जबकि फ़्राँस की जीडीपी 2582 अरब डॉलर दर्ज की गयी। ये आँकड़ा ऊपर दिये गये उदाहरण के मुताबिक़, सकल या कुल ज़मीन जैसा है।

विश्व बैंक के आँकड़े के आधार पर ये हर्ग़िज़ नहीं कहा जा सकता कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। क्योंकि फ़्राँस के 6.04 करोड़ लोगों की उत्पादकता की तुलना यदि भारत 134 करोड़ की आबादी की उत्पादकता से की जाएगी तो हम उसके मुक़ाबले बेहद बौने साबित होंगे। इसीलिए, लोगों की ख़ुशहाली जानने के लिए प्रति व्यक्ति आय को आधार माना जाता है। फ़्राँसिसियों की सालाना प्रति व्यक्ति आय जहाँ 38,477 डॉलर है, वहीं भारत के मामले में ये सिर्फ़ 1,940 डॉलर ही बैठती है। इसका मतलब ये हुआ कि एक आम फ़्राँसिसी नागरिक के मुक़ाबले एक आम भारतीय 20 गुना ग़रीब है।

लगे हाथ ग़रीबी को भी समझते चलें। वर्ल्ड पावर्टी क्लॉक और ब्रूकिंग्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अब भी भारत में 7 करोड़ लोग बेहद ग़रीबी में जी रहे हैं। भारत अब दुनिया में सबसे ज़्यादा ग़रीबों की आबादी वाला देश नहीं रहा। क्योंकि नाइजीरिया में बेहद ग़रीब लोगों की आबादी 8.7 करोड़ है। ग़रीबों की संख्या की तुलना करने वक़्त भी ये ग़ौर करना ज़रूरी होगा कि बीते दशकों में देश की कुल आबादी में बेहद ग़रीबों की संख्या और उनका अनुपात क्या रहा है? क्या मोदी राज में ग़रीब घटे हैं? कुल आबादी में ग़रीबों का अनुपात कम हुआ है? क्या ये संख्या और अनुपात मोदी राज से पहले की सरकारों के मुक़ाबले बेहतर हुआ है या बदतर? याद रखिये कि संख्या का महत्व बेहद मामूली है। असली आँकड़ा तो अनुपात का है। यदि अनुपात सुधर रहा है, तभी हम बेहतर हो रहे हैं। वर्ना, नहीं।

इसी तरह, विश्व बैंक की रिपोर्ट की आड़ में भक्त-मीडिया हमें बता रहा है कि नोटबन्दी और जीएसटी से भारतीय अर्थव्यवस्था में तेज़ी आयी है। और, बीते दशक में भारत की जीडीपी दोगुनी हो गयी है। जबकि सच्चाई ये है कि मोदी सरकार यही झूठ तो फैलाना चाहती है। सवाल है कि ये तेज़ी क्या होती है? तेज़ एक तुलनात्मक दशा है। सजातीय की तो तुलना हो सकती है, लेकिन विजातीय की नहीं। मिसाल के तौर पर, साइकिल और बाइक की रफ़्तार की तुलना नहीं हो सकती, हाथी और घोड़े की ताक़त की तुलना नहीं हो सकती, स्त्री और पुरुष की तुलना नहीं हो सकती। लिहाज़ा, जब हम विकास-दर की तेज़ी पर ग़ौर करें, तब ये देखना ज़रूरी होगा कि सम्बन्धित अर्थव्यवस्था का आकार कितना बड़ा है। चीन की अर्थव्यवस्था भारत से छह गुना बड़ी है। वास्तविक मात्रा के लिहाज़ से उनका आकार का 6 फ़ीसदी हमारे आकार के 36 फ़ीसदी के बराबर होगा।

हम देख चुके हैं कि नोटबन्दी अपने हरेक मक़सद में विफल साबित हुई है। इससे काले धन की कोई रोकथाम नहीं हो सकी। उल्टा, सारा काला धन सरकार की मिली-भगत से सफ़ेद होकर बैंकों में जा पहुँचा। आतंकवाद और नक्सलवाद पर भी नोटबन्दी ने कोई प्रभाव नहीं डाला। कैश-लेस यानी डिज़ीटाइज़ेशन के मोर्चे पर भी कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ। दूसरी ओर, नोटबन्दी का भारी-भरकम ख़र्च अर्थव्यवस्था पर पड़ा। करोड़ों लोगों का काम-धन्धा चौपट हो गया। रोज़गार-व्यापार पर ऐसा असर पड़ा कि अभी तक हालात सामान्य नहीं हो पाया है। इसी तरह, जीएसटी को भी जिस तरह से लागू किया गया, उसने महँगाई तथा जनता की मुश्किलों को बढ़ाया ही।

इस तरह, बीते एक दशक में भारत की जीडीपी के दोगुना होने की बातों को भी गहराई से समझना बेहद ज़रूरी है। दस साल की उपलब्धि में से मोदी राज के चार साल की औसत विकास-दर की तुलना मनमोहन सिंह सरकार के छह सालों की औसत विकास-दर से करने पर पता चलेगा कि मौजूदा चार साल के मुक़ाबले उससे पहले के छह साल बेहद उम्दा थे। मनमोहन सरकार में औसत विकास-दर 8.5 फ़ीसदी रही, जबकि मोदी राज में यही औसत 6.5 फ़ीसदी का रहा है। इससे दशक का औसत 7.7 फ़ीसदी बैठेगा। अब ज़रा सोचिए कि जो ख़ुद को तेज़ बता रहे हैं क्या वो अपने से पहले वालों के मुक़ाबले 1.2 अंक या 18 फ़ीसदी धीमे नहीं है!

इसी धीमेपन का दूसरे पहलू को भी हमें समझना होगा कि यदि भारत की जीडीपी एक दशक में दोगुनी हो गयी और वो कौन-कौन से देश हैं, जिनकी जीडीपी इसी दौरान भारत की जीडीपी से पहले दोगुनी हुई है? ऐसी तुलना के बग़ैर कोई कैसे कह सकता है कि हमारी उपलब्धि औरों से बेहतर है। विकास-दर की तुलना करते समय ये देखना भी ज़रूरी है कि अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं में महँगाई और मुद्रास्फीति का दशा क्या रही है? क्योंकि जिन देशों में महँगाई नियंत्रण में है, वहाँ ब्याज़-दरें बहुत कम हैं। उनकी मुद्रा की क्रय-शक्ति जहाँ दस साल पहले जितनी ही है, वहीं हमारे रुपये की औक़ात कहीं ज़्यादा कम हो चुकी है। लिहाज़ा, मुमकिन है कि हम रुपये ज़्यादा कमाने लगें, लेकिन ज़रूरी नहीं कि ज़्यादा रुपयों से हमारी ख़ुशहाली भी बढ़ी ही होगी। इसीलिए, हमें आँकड़ों की बाज़ीगरी को समझना आना चाहिए।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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सेंसेक्स में 188 अंकों की गिरावट

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संघ का अद्भुत शोध: बीफ़ का सेवन जारी रहने तक होती रहेगी लिंचिंग!

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शिवराज से ‘अनशनकारी किसान की मौत’ का जवाब मांगेगा बुंदेलखंड

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70 साल में पहली बार किसी प्रधानमंत्री के शब्द संसद की कार्रवाई से हटाये गये

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योगी सरकार कांवड़ियों पर मेहरबान, हेलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा

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आयुष शर्मा की फिल्म ‘लवरात्र‍ि’ का ट्रेलर रिलीज

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