Connect with us
Kapil Sibal Kapil Sibal

ओपिनियन

तबाह होती लोकतांत्रिक संस्थाएँ

भारत को अभी निष्पक्ष मीडिया, स्वतंत्र न्यायपालिका, प्रमाणिक जाँच एजेंसियाँ, ईमानदार सरकारी अफ़सरों के अलावा एक ऐसे अर्थतंत्र की बेहद ज़रूरत है जिसे पुख़्ता बैंकिंग आधार की गति मिले।

File Photo Kapil Sibal Pic Source Indianexpress

Published

on

लोकतंत्र को परिभाषित करना आसान नहीं। इसके अंग ही एक-दूसरे की ताक़त हैं। किसी परिपक्व और उदार लोकतंत्र की सेहत इन्हीं अंगों की कुशलता से तय होती है। मसलन, अक्टूबर 1951 और मार्च 1952 के दरम्यान हुए पहले आम चुनाव ने ही भारतीय लोकतंत्र की ऐसी शानदार बुनियाद बना दी थी, जिसने चुनावों को लोकतंत्र का पर्व और शान्तिपूर्वक सत्ता-हस्तांतरण का ज़रिया बना दिया। हरेक चुनाव के सम्पन्न होने के बाद हमारे लोकतंत्र में गर्व का एक पन्ना जुड़ जाता है। इसके बावजूद, आज़ादी के 69 साल बाद भी हमारे लिए ये समझना बहुत ज़रूरी है कि भारत को चलाने वाली प्रमुख संस्थाओं की दशा कितनी सन्तोषजनक है?

पहली बात। भारत को ऐसा मीडिया चाहिए जो निडर होकर जनसरोकार से जुड़ी चुनौतियों पर प्रहार कर सके। लेकिन अफ़सोस कि आज चन्द अपवादों को छोड़ हमारा पूरा मीडिया ही सरकार और सत्ता का ‘चीयर-लीडर’ (पैसे लेकर जश्न मनाने वाले भाँड) बन चुका है। हमें याद रखना चाहिए कि दमदार चौथे खम्भे या मीडिया के बग़ैर, लोकतंत्र में कोई आकर्षण नहीं सकता।

दूसरी बात। हम सभी लोग एक ऐसी स्वतंत्र न्यायपालिका की अपेक्षा रखते हैं जिसे भ्रष्ट न किया जा सके। लेकिन लोग महसूस कर रहे है कि न्यायपालिका के कई स्तर ऐसे नहीं रहे। इसके लिए सिर्फ़ वहाँ तैनात लोगों की गुणवत्ता ही नहीं बल्कि वो हालात भी ज़िम्मेदार हैं, जिसमें वो काम करते हैं। सर्वोच्च स्तर पर भी व्यापक चिन्तन से लिये गये फ़ैसलों की जगह हड़बड़ी में दिये जा रहे आदेशों ने ले ली है। न्यायपालिका की दुर्दशा पर सुप्रीम कोर्ट के कई सेवानिवृत्त जज गहरी चिन्ता जता चुके हैं।

तीसरी बात। हमारी जाँच एजेंसी में विश्वसनीय होना ही चाहिए। क़ाबिल और निष्ठावान कर्मचारियों के बग़ैर इन्हें भरोसेमन्द नहीं बनाया जा सकता। लेकिन फ़िलहाल हमारी जाँच एजेंसियों से ये अनिवार्य तत्व नदारद हैं। जब भी हमारी जाँच एजेंसियाँ यू-टर्न लेकर पलटी मारती हैं, तब निश्चित रूप से उनका पतन होता है। इसकी सबसे शर्मनाक मिसाल है 2008 का मालेगाँव बम धमाका केस। 2011 में इस मामले को राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को सौंपा गया। इसने 2016 में एक पूरक आरोपपत्र दाख़िल करके कहा कि महाराष्ट्र एटीएस की ओर से दायर 4,528 पेज़ वाले पिछले आरोपपत्र के दर्ज़ छह प्रमुख अभियुक्तों के ख़िलाफ़ मुक़दमा नहीं चलाया जा सकता। बिल्कुल उल्टा मुड़ने की ऐसे दशा के पीछे क्या तर्क हो सकता है? जाँच एजेंसी के ऐसे रवैये से वो भरोसेमन्द कैसे रह सकता है?

कथित भ्रष्टाचार की आड़ में जाँच एजेंसियाँ सरकार से साँठगाँठ करके विपक्ष के नेताओं को निशाना बना रही हैं और सत्ता पक्ष से जुड़े लोगों का संरक्षण कर रही हैं। व्यापमं घोटाले के सिलसिले में तमाम छात्र और अध्यापक जेल में हैं, जबकि नामजद राजनेताओं के ख़िलाफ़ कोई जाँच नहीं की जा रही है। इसी तरह से छत्तीसगढ़ में जनवितरण प्रणाली में हुए घोटाले में लिप्त लोगों की कोई जाँच नहीं हो रही।

दूसरी ओर, कुछ ग़ैर-सरकारी संगठनों को परेशान करने के लिए कई जाँच एजेंसियों ने ज़ोरदार तत्परता दिखायी है। लोगों की प्रतिष्ठा पर दाग़ लगाने के लिए जाँच एजेंसियाँ तरह-तरह का झूठ फ़ैला रही हैं। ताज़ा मामला उन पत्रकारों और टीवी चैनलों से जुड़ा है जिनके बारे में सरकार को ये लगता है कि उन्होंने कभी उसके लिए मुश्किलें पैदा की थीं।

चौथी बात। हमारे नौकरशाह लगातार रीढ़विहीन और चापलूस होते जा रहे हैं। उनके दिमाग़ को कुन्द कर दिया गया है। सत्ता तंत्र ने उन्हें अपनी कठपुतली बना लिया है। उन्हें सिर्फ़ अपने आकाओं और अपने निजी स्वार्थों की परवाह है। ऐसे रवैये ने नौकरशाही की छवि को बर्बाद कर दिया है। ईमानदार अफ़सर, फ़ैसले लेने में हिचकते हैं क्योंकि अदालतें भी जनहित में लिये गये उनके फ़ैसलों के लिए उनके ख़िलाफ़ मुकदमा चलाने की बातें करती हैं। ये आश्चर्यजनक किन्तु सत्य है कि अफ़सरों के बचाव में कोई आगे नहीं आता।

पाँचवी बात। आर्थिक प्रगति के लिए मज़बूत बैंकिंग तंत्र का होना बहुत ज़रूरी है। लेकिन हमारे बैंकों का 17 फ़ीसदी क़र्ज़ डूबा हुआ है। रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने 11 अगस्त 2014 को कहा था, “कुटिल राजनेताओं को ऐसे व्यापारियों की ज़रूरत होती है, जो उन्हें पैसे दे सकें। जबकि कुटिल व्यापारियों को ऐसे कुटिल राजनेताओं की ज़रूरत होती है, जो जनता के संसाधनों को सस्ते में हड़प सकें।” ये बयान ही सारा कहानी बता दे रहा है।

आगा-पीछा सोचे बग़ैर हमारे बैंक जो क़र्ज़ा बाँटते हैं, उसकी क़ीमत आख़िरकार जनता को भी चुकानी पड़ती है। 2014-15 में हमारे बैंकों का कुल एनपीए यानी डूबी हुई सम्पत्ति क़रीब 2.67 खरब थी। लेकिन तब से अभी तक हालात सुधरे नहीं हैं। बीते दिसम्बर तक हमारे बैंकों का एनपीए 6.06 अरब रुपये पर जा पहुँचा। मौजूदा सरकार ने इस महामारी से निपटने के लिए ‘बैड बैंक’ बनाने की बात है ताकि बैंकों की बैलेंसशीट से डूबे क़र्ज़ों की सफ़ाई हो सके। इस योजना को यदि ठीक से लागू किया जाए तो फ़ायदा होगा।

हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएँ चेतावनी दी हैं। लेकिन हमारे मंत्रियों की दशा दयनीय है। उन्हें बात-बात पर प्रधानमंत्री कार्यालय से मंज़ूरी लेनी पड़ती है। मंत्रियों के सचिव उनकी अनदेखी करके सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय से निर्देश लेते हैं। मौजूदा दौर में क़ानून बनाने से सम्बन्धित विधायी कार्यों की स्थापित परम्परा का भी पतन हो गया है। हम देख चुके हैं कि राज्यसभा की चर्चाओं से बचने के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय विधेयकों को ‘मनी-बिल’ का दर्ज़ा देकर संसदीय परम्परा को चोट पहुँचायी जा रही है। चुनाव आयोग भी देश की एक बेहद अहम संस्था है। लेकिन वो भी सिसक रही है। ये सारा आलम बेहद चिन्ताजनक है। हम आराम की सोच नहीं सकते। अभी लम्बा सफ़र बाक़ी है।

लेखक: काँग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं।

(Credit: This Aricle is published on Hindustantimes Dated 18/07/2017)

For all the latest Opinion News, download WeForNews App

ओपिनियन

हज 2018 होगा महंगा, मगर सब्सिडी की समाप्ति वजह नहीं

केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मंगलवार को इस साल से हज सब्सिडी की समाप्ति की घोषणा की थी।

Published

on

haj-2018

हज 2018 की यात्रा पिछले साल के मुकाबले ज्यादा महंगी रहने वाली है। लेकिन इसकी वजह सरकार द्वारा मंगलवार को सब्सिडी समाप्त करने की घोषणा नहीं है।

इसके पीछे का कारण हज के दौरान सऊदी अरब में होने वाला खर्च है, जिसमें रहना, परिवहन, खाना और दूसरी चीजें शामिल हैं। यहां ध्यान दिलाने वाली बात यह है कि सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी इन खर्चो का वहन नहीं करती और साथ ही वह हवाई सफर में भी सीमित है।

भारतीय हज समिति (एचसीआई) के अध्यक्ष महबूब अली कैसर ने आईएएनएस को बताया कि कीमतों पर नियंत्रण के लिए सऊदी प्रशासन से सौदेबाजी करना कठिन था, लेकिन इस साल स्थानीय कारक हज की यात्रा में खर्चा बढ़ा सकते हैं।

2017 में एचसीआई हज के लिए साधारण आवास (अजीजिया) के साथ दो लाख रुपये और डीलक्स आवास (ग्रीन) के साथ 234,000 रुपये वसूलता था। डीलक्स आवास (ग्रीन) मक्का में हरम के समीप है।

कैसर ने कहा, “पिछले साल से सऊदी अरब में बिजली का शुल्क तीन गुना बढ़ गया है। इसके साथ ही पेट्रोल की कीमतें भी दोगुनी हो चुकी हैं। आवास की कीमतें भी बढ़ रही हैं। ये सभी कारक इस साल हज में आने वाली कुल लागत को बढ़ा सकते हैं।”

उन्होंने कहा कि इस वक्त हज 2018 में प्रत्येक श्रद्धालु पर आने वाली अंतिम लागत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

उन्होंने कहा, “ऐसा मानना बेमानी होगी कि बिजली की कीमतों में तीन गुना और पेट्रोल की कीमतों में दोगुनी वृद्धि हो जाने पर हर बार सऊदी अरब में सभी चीजों की कीमतें समान रहेंगी। दूसरा, सऊदी के लोग सौदेबाजी करने वालों को गाली देते हैं और हमें उनसे हर रियाल के लिए वास्तव में बहुत सौदेबाजी करनी पड़ी।”

कैसर ने कहा, “तब भी, हम अपना सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास कर रहे हैं और उनसे बहुत सौदेबाजी कर रहे हैं, ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि कीमतें जबरदस्त रूप से न बढ़ें।”

केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मंगलवार को इस साल से हज सब्सिडी की समाप्ति की घोषणा की थी।

कैसर ने कहा कि एचसीआई को पता था कि ऐसा होने वाला है और इसके लिए हम मानसिक रूप से तैयार थे।

उन्होंने कहा, “किसी भी हालत में सब्सिडी को वापस लेने का फैसला मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद और बेंगलुरू जैसे बड़े शहरों के हवाई किराए को प्रभावित नहीं करेगा, लेकिन श्रीनगर, गया जैसे छोटी जगहों से किराया बढ़ सकता है। लेकिन इन राज्यों के लोग जहां किराया कम है, जैसे मुंबई, दिल्ली और अहमदाबाद जाकर उड़ानें पकड़ सकते हैं।”

हालांकि आने वाले वर्षो में हज की लागत कम होने के आसार हैं, क्योंकि भारत सरकार पहले से ही जेद्दाह जाने वाले समुद्री रास्ते को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम कर रही है।

नकवी ने कहा कि सरकार ने इस बाबत पहले से ही इस दिशा में सक्रिय कदम उठाए हैं और एक बार लागू होने के बाद किराये में जबरदस्त गिरावट आएगी।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि हज सब्सिडी की शुरुआत 1980 (जब आजाद एचसीआई के सदस्य थे) के दशक में हुई थी, जब हज यात्रियों को ढोने वाली जहाजें पुरानी होने लगी थीं।

आजाद ने कहा, “बजट की कमी के कारण सरकार ने नई जहाजों की खरीद पर पैसा नहीं खर्च किया था। इस लिए श्रद्धालुओं को जेद्दाह ले जाने के लिए उड़ानें शुरू करने का फैसला किया गया था। लेकिन हवाई सफर जहाज के किराए से चार गुना महंगा था। इसलिए सरकार ने उस लागत का वहन करने के लिए सब्सिडी का भुगतान करना शुरू किया था।”

समुद्री रास्ते को 1995 में बंद कर दिया गया था।

Continue Reading

ओपिनियन

मोदी विरोधी चेहरा के रूप में उभरीं ‘दीदी’

देश की सभी संस्थाओं पर हमले हो रहे हैं। यह एक खतरनाक खेल है। प्रधानमंत्री कालिदास की तरह व्यवहार कर रहे हैं, वह जिस शाखा पर बैठे हैं उसी को काटने की कोशिश कर रहे हैं।

Published

on

mamata-modi

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जिन्हें उनके समर्थक ‘दीदी’ कहते हैं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विरोधी अपनी लय को बरकरार रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर साल भर हमलावर रहीं। उन्होंने अपने भाषणों व सोशल मीडिया पर लेखों व व्यंग्य के जरिए मोदी सरकार पर कड़े हमले किए और उनकी सरकार का केंद्र से कई मुद्दों पर संघर्ष जारी रहा।

पौराणिक कथाओं से लेकर प्राचीन भारतीय इतिहास तक तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी मोदी पर सभी तरह के हमलावर रहीं, जबकि पश्चिम बंगाल में भाजपा का वोट शेयर विभिन्न उपचुनावों व स्थानीय निकाय के चुनावों में बढ़ना जारी रहा।

भाजपा ने जिस तरह से तृणमूल के विकल्प के तौर पर उभरने का प्रयास किया, ममता ने इसके उलट राष्ट्रीय तौर पर खुद को हिंदुत्व समूह के प्रमुख विरोधी के तौर पर पेश किया।

ममता ने क्षेत्रीय नेताओं के साथ मिलकर संघ परिवार का विरोध किया और अपने फैसलों व कार्रवाई से केंद्र के कामकाज पर दबाव बनाया व अपना हित साधा।

उन्होंने मोदी की प्रमुख नीतियों जैसे नोटबंदी व वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लेकर उन पर निशाना साधा, जबकि आर्थिक वृद्धि में गिरावट, अहिष्णुता, गोमांस प्रतिबंध व गोरक्षकों जैसे ज्वलंत मुद्दों से फायदा उठाने की कोशिश की।

हालांकि, वह मोदी पर जोरदार हमलों की वजह से सुर्खियों में रहीं।

ममता ने एक मौके पर मोदी की तुलना संस्कृत के महान कवि व नाटककार कालिदास से की थी। हालांकि उन्होंने तुलना उस कालिदास से की थी, जिसे कभी महान मूर्ख समझा जाता था। कहानी का संदर्भ यह था कि राजकुमारी विद्योत्तमा के लिए जब महामूर्ख की तलाश की जा रही थी तो देखा गया कि एक युवक बुद्धिमत्ता की कमी की वजह से जिस डाल पर बैठा था, उसी को काट रहा था। वह युवक कालिदास था, जो विद्योत्तमा के साथ विवाह के बाद बुद्धिमान बना।

ममता बनर्जी ने अपनी टिप्पणी में कहा, “देश की सभी संस्थाओं पर हमले हो रहे हैं। यह एक खतरनाक खेल है। प्रधानमंत्री कालिदास की तरह व्यवहार कर रहे हैं, वह जिस शाखा पर बैठे हैं उसी को काटने की कोशिश कर रहे हैं।”

ममता ने अपने एक अन्य आक्रामक भाषण में मोदी व रामायण महाकाव्य के दैत्य राजा रावण की तुलना की।

मोदी के 56 इंच के सीने की टिप्पणी का जिक्र करते हुए ममता ने कहा, “वह दावा करते हैं कि उनका सीना व कंधा चौड़ा है। रावण के कंधे भी चौड़े थे और उसके दस सिर थे।”

बंकुरा जिले में एक सार्वजनिक सभा में ममता बनर्जी ने मोदी पर फिर से हमला किया और मोदी सरकार को ‘गूंगा व बहरा’ बताया।

उन्होंने कहा, “वह पहले खुद को चायवाला कहते थे। अब वह करोड़पति पेटीएम वाला बन चुके हैं।”

ममता बनर्जी ने नोटबंदी को ‘शर्मनाक’ बताया और ट्विटर पर मोदी के इस फैसले को ‘एक तानाशाह की दृष्टिहीन, उद्देश्यहीन व दिशाहीन फैसला’ बताकर खारिज किया था।

ममता बनर्जी ने लोकतांत्रिक प्रदर्शन के हर तरीके को अपनाया। उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का दरवाजा भी खटखटाया था और उनसे देश की अव्यवस्था को बचाने का आग्रह किया था।

ममता ने मोदी से इतर भाजपा के दूसरे नेताओं- लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह व अरुण जेटली के नेतृत्व को स्वीकार करने की बात कही।

जीएसटी को समर्थन देते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि मोदी सरकार ने इस नई प्रणाली को ‘विनाशकारी रूप से जल्दबाजी’ में एक जुलाई से लागू कर दिया। उन्होंने केंद्र के इस कदम को ‘एक अन्य बड़ी भूल’ बताया।

हालांकि, ममता बनर्जी ने ‘संयुक्त नेतृत्व’ के जरिए मोदी को चुनौती देने पर जोर दिया। लेकिन एक मीडिया कॉन्क्लेव में बीते महीने उन्होंने संकेत दिया कि वह 2019 में सभी विपक्षी दलों को भाजपा के खिलाफ एक मंच पर लाने में कोई भूमिका निभाने नहीं जा रही हैं, कोई ऐसा साझा मंच बनेगा तो उसका समर्थन जरूर करेंगी।

By : शीर्षेदु पंत

–आईएएनएस

Continue Reading

ओपिनियन

ज़रा सोचिए कि क्या भारत के 69 फ़ीसदी सेक्युलर ख़ुद को हरामी बताये जाने से ख़ुश होंगे!

हेगड़े, उस धूर्त भगवा रणनीति को हवा देना चाहते हैं, जिसके तहत कर्नाटक के मन्दबुद्धि और अशिक्षित हिन्दुओं में ये ज़हर भरा जा सके कि ‘तख़्त बदल देंगे, ताज बदल देंगे, कर्नाटक जीते तो संविधान बदल देंगे!’

Published

on

ananth-kumar-hegde

ये किसी से छिपा नहीं है कि संघियों को और ख़ासकर मोदी सरकार तथा बीजेपी के नेताओं को ‘बदज़ुबानी’ का कितना प्रचंड संक्रमण है! 2014 के बाद से तो इस भगवा संक्रमण ने दमघोटू महामारी का रूप ले लिया! इससे भी ज़्यादा ताज़्ज़ुब की बात तो ये रहा कि शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठे हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ख़ुद इस ‘बदज़ुबानी’ वाली महामारी के सबसे गम्भीर मरीज़ हैं। इसीलिए मोदी की ज़ुबान आये दिन लपलपाती रहती है। उनके रोग का लक्षण चुनाव सभाओं में इतना उग्र रूप धारण कर लेता है कि उन्हें पहचानना तक मुश्किल हो जाता है। लेकिन अक्सर चुनाव के बाद मोदी की ‘बदज़ुबानी’ वाली महामारी का ज्वार कुछ अरसे के लिए शान्त भी पड़ने लगता है।

मोदी की एक और विशेषता है! उन्हें विरोधियों के बयान को तोड़-मरोड़कर पेश करने और अपने सहयोगियों के नितान्त मूर्खतापूर्ण बयान की अनदेखी करने में भी महारथ हासिल है। वैसे भी गिरगिट की तरह रंग बदलने में नेताओं की पूरी कूँ पूरी बिरादरी का ही कोई जबाब नहीं होता, लेकिन प्रधानमंत्री के पद पर आरूढ़ नरेन्द्र मोदी में जैसा गिरगिटिया कौशल है, वैसे बीते 70 सालों में पहले कभी किसी और प्रधानमंत्री में नहीं नज़र आया। मोदी की ये ऐसी अद्भुत पहचान है। इसका ज़िक्र उस दौर में भी होता रहेगा, जब मोदी कहीं के नहीं होंगे! दरअसल, इतिहास ने हमेशा प्रमुख हस्तियों को उनके ऐसे कामों के लिए याद रखा है, जिसने जनमानस पर अच्छी या ख़राब, लेकिन गहरी छाप छोड़ी हो। इस लिहाज़ से मोदी काल को इतिहास, ‘बदज़ुबानी युग’ के रूप में ही याद रखेगा, क्योंकि नीयतख़ोर नेताओं को ये संसार उनके कुकर्मों के लिए ही याद रखता है।

गुजरात के चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने मनमोहन सिंह और अन्य काँग्रेसियों को पाकिस्तान परस्त राष्ट्रद्रोही या देश का दुःखचिन्तक करार दिया। मोदी ने यहाँ तक कहा कि काँग्रेस, गुजरात को जीतने के लिए और अहमद पटेल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए सीमापार पाकिस्तान के साथ मिलकर साज़िश कर रही है।

इससे पहले मोदी ने मणिशंकर अय्यर के बयान को बड़ी चतुराई से तोड़-मरोड़कर पेश किया। ‘नीच’ आचरण, ‘नीच’ सोच, ‘नीच’ विचार, ‘नीच’ नज़रिया जैसी बातों को मोदी ने ‘नीच’ जाति में बदल दिया। इसीलिए जब मनमोहन सिंह और हामिद अंसारी जैसे शीर्ष संवैधानिक पदों पर रहे नेताओं के लिए अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल पर नरेन्द्र मोदी ने माफ़ी नहीं माँगी तो संसद के मौजूदा सत्र का पहिया जाम होने लगा।

संसद में अपनी छीछालेदर करवाने के बावजूद प्रधानमंत्री ने अपने मूर्खतापूर्ण बयान पर शर्मिन्दगी नहीं ज़ाहिर की, बल्कि अपनी पार्टी की ओर से सिर्फ़ ये बयान दिलाना मुनासिब समझा कि बीजेपी, मनमोहन सिंह और हामिद अंसारी के संसदीय योगदान का आदर करती है। हालाँकि, ये कहना अनावश्यक है कि मनमोहन सिंह के लिए ‘देहाती औरत’, ‘रेनकोट पहनकर नहाने वाला’, ‘मौन-मोहन’ वग़ैरह कैसी-कैसी बातें कह चुके नरेन्द्र मोदी के ज़ुबान की लपलपाहट यहीं ख़त्म नहीं होने वाली! इसीलिए मनमोहन सिंह को पाकिस्तान परस्त बताने के बाद तो काँग्रेस ने मोदी को ललकार दिया कि वो राष्ट्रविरोधियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करके ख़ुद राष्ट्रविरोधी आचरण कर रही है। उधर, मोदी का भी कहना रहा है कि काँग्रेसियों ने उन्हें ख़ून का सौदागर, चायवाला, ‘नीच’ वगैरह क्या-क्या नहीं कहा!

कह तो मोदी भी सही रहे हैं। भारतीय राजनीति ने तमाम स्तरहीन बयान देखे हैं, कोई भी पार्टी इस ‘बदज़ुबानी’ वाली महामारी से अछूती नहीं है। लेकिन अनाप-शनाप बोलने वालों की जितनी तादाद बीजेपी में है और वो जितनी ज़हरीली बातें करते हैं, उसे देश की कोई भी अन्य पार्टी टक्कर नहीं दे सकती! लेकिन ‘मैं अच्छा और तुम ख़राब’ करते-करते अब तो मोदी सरकार के मंत्रियों ने उस संविधान की ही धज़्ज़ियाँ उड़ाना शुरू कर दिया, जिसकी शपथ लेकर वो मंत्री बने हैं। केन्द्रीय कौशल विकास राज्‍यमंत्री अनन्त कुमार हेगड़े ने तो यहाँ तक कह दिया कि बीजेपी संविधान से ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को ही उखाड़ फेंकेगी।

दरअसल, अगला चुनाव कर्नाटक विधानसभा का है। हेगड़े, कर्नाटक से ही आते हैं। वहाँ बीजेपी को हिन्दुओं के उन्मादी ध्रुवीकरण से बहुत बड़ा आसरा है। इसीलिए हेगड़े ने उन लोगों के तन-बदन में आग लगाने की सोची, जो संघियों के हिन्दुत्व को हमेशा से सिरे से ख़ारिज़ करते रहे हैं। तभी तो हेगड़े ने कहा कि “अगर आप कहते हैं कि मैं एक मुस्लिम, ईसाई, लिंगायत, ब्राह्मण या हिन्दू हूँ तो ऐसे में हम अपने धर्म और जाति से जुड़े होने पर गर्व महसूस करते हैं। लेकिन ये सेक्युलर कौन लोग हैं? इनका कोई माई-बाप नहीं होता। जो लोग ख़ुद को सेक्युलर कहते हैं, वो नहीं जानते कि उनका ख़ून क्या है? हाँ, संविधान ये अधिकार देता है कि हम ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष कहें, लेकिन संविधान में कई बार संशोधन हो चुके हैं। हम भी उसमें संशोधन करेंगे। हम सत्ता में इसीलिए आये हैं।”

हेगड़े, उस धूर्त भगवा रणनीति को हवा देना चाहते हैं, जिसके तहत कर्नाटक के मन्दबुद्धि और अशिक्षित हिन्दुओं में ये ज़हर भरा जा सके कि ‘तख़्त बदल देंगे, ताज बदल देंगे, कर्नाटक जीते तो संविधान बदल देंगे!’ वैसे तो संघियों का सेक्युलरों से बैर उतना ही पुराना है, जितना पुराना ख़ुद संघ है। लेकिन संविधान की शपथ लेकर मंत्री बनने वाले किसी भी धूर्त को संविधान का अनादर करके पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं हो सकता। ऐसे मंत्री को मूर्ख नहीं तो फिर और क्या कहेंगे जिसे इतना भी पता नहीं कि बीजेपी को चाहे जितना बड़ा बहुमत मिल जाए, वो तो क्या, कोई भी दूसरी पार्टी संविधान के मूल ढाँचे को चाहकर भी नहीं बदल सकती।

संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक ‘धर्मनिरपेक्ष’ देश कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट कई बार स्थापित कर चुका है कि ‘धर्मनिरपेक्षता’, भारतीय संविधान की बुनियादी अवधारणा है और कोई भी संशोधन, संविधान की मूल भावना को नहीं बदल सकता। इसीलिए जब संसद में विपक्ष ने हेगड़े को अपने बयान के लिए माफ़ी माँगने या फिर उन्हें मंत्री पद से हटाने की माँग गरमायी तो ‘संविधान बदलने के लिए सत्ता में आयी बीजेपी’ का ख़म ठोंकने वाले अनन्त हेगड़े को थूककर चाटना पड़ा। उन्होंने कथित सफ़ाई भी दी कि “मैं सिर्फ़ यह कहना चाहता हूँ कि मोदी जी और हमारी सरकार देश के संविधान और बाबा साहेब के आदर्शों को लेकर प्रतिबद्ध है।”

हेगड़े के बयान को लेकर सोशल मीडिया पर कोहराम मचना ही था। मचा भी। क्योंकि भारतवर्ष में आज भी बहुसंख्यक लोग सेक्युलर हैं। उन्हें सेक्युलर होने पर गर्व है। ये वो लोग नहीं हैं जो किसी राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ता हों। अब यदि मोदी सरकार का कोई मंत्री इन सेक्युलरों की वल्दियत पर सवाल उठाकर उन्हें हरामी बताना चाहेगा तो इसे कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है!

वैसे नेताओं की ‘बदज़ुबानी’ भी एक क्रमागत प्रक्रिया से ही विकसित होती है। याद है ना कि केन्द्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि ‘मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देते तो उन्हें टिकट क्यों दें!’ लेकिन इससे एक क़दम आगे बढ़कर मध्य प्रदेश के सहकारिता राज्यमंत्री विश्वास सारंग ने बोल दिया कि ‘भाजपा को वोट न देने वाला पाकिस्तानी है!’ अब ज़रा सोचिए कि सार्वजनिक जीवन में क़मीनेपन की क्या सीमा होनी चाहिए? क्या 2014 में बीजेपी को वोट नहीं देने वाले 69 फ़ीसदी लोग पाकिस्तानी हैं? फिर राष्ट्रीयता का सर्टिफ़िकेट जारी करने का अधिकार आख़िरकार संघियों को मिल कहाँ से गया?

सबसे बड़ा और विचारनीय प्रश्न यही है। भारत को बचाना है तो ऐसी मानसिकता को उखाड़ फेंकना होगा, जिसमें सेक्युलर लोगों को हरामी और बीजेपी को वोट नहीं देने वालों को पाकिस्तानी कहने वालों की ज़ुबान बन्द की जा सके! वर्ना, ‘बदज़ुबानी’ का सिलसिला थमने वाला नहीं है और यही प्रवृत्ति हमें व्यापक हिंसा और अराजकता की ओर ढकेले बिना नहीं मानेगी!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनका निजी विचार है)

Continue Reading
Advertisement
padmavati
राष्ट्रीय4 mins ago

‘पद्मावत’ पर करणी सेना की धमकी, कहा- रिलीज के दिन लगेगा देशभर में कर्फ्यू

shyam-benegal
राष्ट्रीय9 mins ago

‘पद्मावत’ पर आए SC के फैसले पर बोले श्याम बेनेगल, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जीत है

supreme-court
राष्ट्रीय12 mins ago

‘न्यायाधीश विवाद’ पर मीडिया रिपोर्टिग पर प्रतिबंध से इनकार

terrorist
राष्ट्रीय15 mins ago

झारखंड : सुरक्षा बलों ने नक्सली को मार गिराया

accident
शहर44 mins ago

ट्रक ने स्कूली वैन को मारी टक्कर, 16 बच्चे घायल

jammu and kashmir
राजनीति48 mins ago

सदन के भीतर ही BJP विधायकों ने निर्दलीय MLA को पीटा, देखें वीडियो

राष्ट्रीय54 mins ago

पहली बार एक की जगह दो अगल-अलग मंत्रालयों ने एक ही पद पर तैनात कर दिए दो अफसर

sanjay sharma
शहर1 hour ago

शर्मनाक: रायपुर में पत्नी को क्यों ले जानी पड़ी ठेले पर पति की लाश…

राष्ट्रीय1 hour ago

मुंबई हमले में मां-बाप को खोने वाले मोशे से मिले नेतन्याहू

haj-2018
ओपिनियन1 hour ago

हज 2018 होगा महंगा, मगर सब्सिडी की समाप्ति वजह नहीं

narottam patel
राजनीति3 weeks ago

रूपाणी कैबिनेट में दरार के आसार! नितिन पटेल के समर्थन में उतरे बीजेपी नेता नरोत्‍तम पटेल

lalu yadav
राजनीति2 weeks ago

चारा घोटाला: लालू को साढ़े तीन साल की सजा

Vinod Rai CAG
ब्लॉग4 weeks ago

संघ के 92 साल के इतिहास में विनोद राय की टक्कर का फ़रेबी और कोई नहीं हुआ!

sports
खेल1 week ago

केपटाउन टेस्‍ट: गेंदबाजों की मेहनत पर बल्‍लेबाजों ने फेरा पानी, 72 रनों से हारी टीम इंडिया

Congress party
ब्लॉग3 weeks ago

काँग्रेसियों की अग्निपरीक्षा! इन्हें ही एक बार फिर देश को आज़ाद करवाना होगा

atal bihari vajpai
ज़रा हटके3 weeks ago

आजीवन क्यों कुंवारे रह गए अटल बिहारी बाजपेयी?

ananth-kumar-hegde
ओपिनियन3 weeks ago

ज़रा सोचिए कि क्या भारत के 69 फ़ीसदी सेक्युलर ख़ुद को हरामी बताये जाने से ख़ुश होंगे!

hardik-nitin
राजनीति3 weeks ago

नितिन पटेल की नाराजगी पर हार्दिक की चुटकी, कहा- ’10 एमएलए लेकर आओ, मनमाफिक पद पाओ’

Modi Manmohan Sonia
ओपिनियन4 weeks ago

2G मामले में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले से सुप्रीम कोर्ट और विपक्ष दोनों ग़लत साबित हुए!

rape case
ओपिनियन4 weeks ago

2017 In Retrospect : दुष्कर्म के 5 चर्चित मामलों ने खोली महिला सुरक्षा की पोल

jammu and kashmir
राजनीति48 mins ago

सदन के भीतर ही BJP विधायकों ने निर्दलीय MLA को पीटा, देखें वीडियो

tapssi
मनोरंजन2 hours ago

तापसी पन्नू की फिल्म ‘दिल जंगली’ का ट्रेलर रिलीज…

sitaraman
राष्ट्रीय1 day ago

सुखोई-30 लड़ाकू विमान में उड़ान भरने वाली देश की पहली महिला रक्षा मंत्री बनीं निर्मला सीतारमण

bjp leader
शहर1 day ago

बीजेपी नेता ने अधिकारी को जड़ा थप्पड़, देखें वीडियो…

shivraj singh chouhan
राजनीति2 days ago

शिवराज सिंह ने किसको जड़ा थप्पड़? देखें वीडियो…

अंतरराष्ट्रीय4 days ago

PoK में पाक सरकार के खिलाफ प्रदर्शन, सड़कों पर उतरे व्यापारी

Supreme Court Judges
राष्ट्रीय6 days ago

पहली बार SC के जज आए सामने, कहा- ‘हम नहीं बोले तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा’

gadkari
राजनीति1 week ago

नौसेना पर बरसे गडकरी, कहा- ‘दक्षिणी मुंबई में नहीं दूंगा एक इंच जमीन’

mumbai-
शहर1 week ago

मुंबई के हुक्काबार में जमकर तोड़फोड़

helicopter
शहर1 week ago

आर्मी-डे परेड की रिहर्सल के दौरान 3 जवान घायल…देखें वीडियो

Most Popular