Kapil Sibal
ओपिनियन

तबाह होती लोकतांत्रिक संस्थाएँ

भारत को अभी निष्पक्ष मीडिया, स्वतंत्र न्यायपालिका, प्रमाणिक जाँच एजेंसियाँ, ईमानदार सरकारी अफ़सरों के अलावा एक ऐसे अर्थतंत्र की बेहद ज़रूरत है जिसे पुख़्ता बैंकिंग आधार की गति मिले।

File Photo Kapil Sibal Pic Source Indianexpress

लोकतंत्र को परिभाषित करना आसान नहीं। इसके अंग ही एक-दूसरे की ताक़त हैं। किसी परिपक्व और उदार लोकतंत्र की सेहत इन्हीं अंगों की कुशलता से तय होती है। मसलन, अक्टूबर 1951 और मार्च 1952 के दरम्यान हुए पहले आम चुनाव ने ही भारतीय लोकतंत्र की ऐसी शानदार बुनियाद बना दी थी, जिसने चुनावों को लोकतंत्र का पर्व और शान्तिपूर्वक सत्ता-हस्तांतरण का ज़रिया बना दिया। हरेक चुनाव के सम्पन्न होने के बाद हमारे लोकतंत्र में गर्व का एक पन्ना जुड़ जाता है। इसके बावजूद, आज़ादी के 69 साल बाद भी हमारे लिए ये समझना बहुत ज़रूरी है कि भारत को चलाने वाली प्रमुख संस्थाओं की दशा कितनी सन्तोषजनक है?

पहली बात। भारत को ऐसा मीडिया चाहिए जो निडर होकर जनसरोकार से जुड़ी चुनौतियों पर प्रहार कर सके। लेकिन अफ़सोस कि आज चन्द अपवादों को छोड़ हमारा पूरा मीडिया ही सरकार और सत्ता का ‘चीयर-लीडर’ (पैसे लेकर जश्न मनाने वाले भाँड) बन चुका है। हमें याद रखना चाहिए कि दमदार चौथे खम्भे या मीडिया के बग़ैर, लोकतंत्र में कोई आकर्षण नहीं सकता।

दूसरी बात। हम सभी लोग एक ऐसी स्वतंत्र न्यायपालिका की अपेक्षा रखते हैं जिसे भ्रष्ट न किया जा सके। लेकिन लोग महसूस कर रहे है कि न्यायपालिका के कई स्तर ऐसे नहीं रहे। इसके लिए सिर्फ़ वहाँ तैनात लोगों की गुणवत्ता ही नहीं बल्कि वो हालात भी ज़िम्मेदार हैं, जिसमें वो काम करते हैं। सर्वोच्च स्तर पर भी व्यापक चिन्तन से लिये गये फ़ैसलों की जगह हड़बड़ी में दिये जा रहे आदेशों ने ले ली है। न्यायपालिका की दुर्दशा पर सुप्रीम कोर्ट के कई सेवानिवृत्त जज गहरी चिन्ता जता चुके हैं।

तीसरी बात। हमारी जाँच एजेंसी में विश्वसनीय होना ही चाहिए। क़ाबिल और निष्ठावान कर्मचारियों के बग़ैर इन्हें भरोसेमन्द नहीं बनाया जा सकता। लेकिन फ़िलहाल हमारी जाँच एजेंसियों से ये अनिवार्य तत्व नदारद हैं। जब भी हमारी जाँच एजेंसियाँ यू-टर्न लेकर पलटी मारती हैं, तब निश्चित रूप से उनका पतन होता है। इसकी सबसे शर्मनाक मिसाल है 2008 का मालेगाँव बम धमाका केस। 2011 में इस मामले को राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को सौंपा गया। इसने 2016 में एक पूरक आरोपपत्र दाख़िल करके कहा कि महाराष्ट्र एटीएस की ओर से दायर 4,528 पेज़ वाले पिछले आरोपपत्र के दर्ज़ छह प्रमुख अभियुक्तों के ख़िलाफ़ मुक़दमा नहीं चलाया जा सकता। बिल्कुल उल्टा मुड़ने की ऐसे दशा के पीछे क्या तर्क हो सकता है? जाँच एजेंसी के ऐसे रवैये से वो भरोसेमन्द कैसे रह सकता है?

कथित भ्रष्टाचार की आड़ में जाँच एजेंसियाँ सरकार से साँठगाँठ करके विपक्ष के नेताओं को निशाना बना रही हैं और सत्ता पक्ष से जुड़े लोगों का संरक्षण कर रही हैं। व्यापमं घोटाले के सिलसिले में तमाम छात्र और अध्यापक जेल में हैं, जबकि नामजद राजनेताओं के ख़िलाफ़ कोई जाँच नहीं की जा रही है। इसी तरह से छत्तीसगढ़ में जनवितरण प्रणाली में हुए घोटाले में लिप्त लोगों की कोई जाँच नहीं हो रही।

दूसरी ओर, कुछ ग़ैर-सरकारी संगठनों को परेशान करने के लिए कई जाँच एजेंसियों ने ज़ोरदार तत्परता दिखायी है। लोगों की प्रतिष्ठा पर दाग़ लगाने के लिए जाँच एजेंसियाँ तरह-तरह का झूठ फ़ैला रही हैं। ताज़ा मामला उन पत्रकारों और टीवी चैनलों से जुड़ा है जिनके बारे में सरकार को ये लगता है कि उन्होंने कभी उसके लिए मुश्किलें पैदा की थीं।

चौथी बात। हमारे नौकरशाह लगातार रीढ़विहीन और चापलूस होते जा रहे हैं। उनके दिमाग़ को कुन्द कर दिया गया है। सत्ता तंत्र ने उन्हें अपनी कठपुतली बना लिया है। उन्हें सिर्फ़ अपने आकाओं और अपने निजी स्वार्थों की परवाह है। ऐसे रवैये ने नौकरशाही की छवि को बर्बाद कर दिया है। ईमानदार अफ़सर, फ़ैसले लेने में हिचकते हैं क्योंकि अदालतें भी जनहित में लिये गये उनके फ़ैसलों के लिए उनके ख़िलाफ़ मुकदमा चलाने की बातें करती हैं। ये आश्चर्यजनक किन्तु सत्य है कि अफ़सरों के बचाव में कोई आगे नहीं आता।

पाँचवी बात। आर्थिक प्रगति के लिए मज़बूत बैंकिंग तंत्र का होना बहुत ज़रूरी है। लेकिन हमारे बैंकों का 17 फ़ीसदी क़र्ज़ डूबा हुआ है। रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने 11 अगस्त 2014 को कहा था, “कुटिल राजनेताओं को ऐसे व्यापारियों की ज़रूरत होती है, जो उन्हें पैसे दे सकें। जबकि कुटिल व्यापारियों को ऐसे कुटिल राजनेताओं की ज़रूरत होती है, जो जनता के संसाधनों को सस्ते में हड़प सकें।” ये बयान ही सारा कहानी बता दे रहा है।

आगा-पीछा सोचे बग़ैर हमारे बैंक जो क़र्ज़ा बाँटते हैं, उसकी क़ीमत आख़िरकार जनता को भी चुकानी पड़ती है। 2014-15 में हमारे बैंकों का कुल एनपीए यानी डूबी हुई सम्पत्ति क़रीब 2.67 खरब थी। लेकिन तब से अभी तक हालात सुधरे नहीं हैं। बीते दिसम्बर तक हमारे बैंकों का एनपीए 6.06 अरब रुपये पर जा पहुँचा। मौजूदा सरकार ने इस महामारी से निपटने के लिए ‘बैड बैंक’ बनाने की बात है ताकि बैंकों की बैलेंसशीट से डूबे क़र्ज़ों की सफ़ाई हो सके। इस योजना को यदि ठीक से लागू किया जाए तो फ़ायदा होगा।

हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएँ चेतावनी दी हैं। लेकिन हमारे मंत्रियों की दशा दयनीय है। उन्हें बात-बात पर प्रधानमंत्री कार्यालय से मंज़ूरी लेनी पड़ती है। मंत्रियों के सचिव उनकी अनदेखी करके सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय से निर्देश लेते हैं। मौजूदा दौर में क़ानून बनाने से सम्बन्धित विधायी कार्यों की स्थापित परम्परा का भी पतन हो गया है। हम देख चुके हैं कि राज्यसभा की चर्चाओं से बचने के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय विधेयकों को ‘मनी-बिल’ का दर्ज़ा देकर संसदीय परम्परा को चोट पहुँचायी जा रही है। चुनाव आयोग भी देश की एक बेहद अहम संस्था है। लेकिन वो भी सिसक रही है। ये सारा आलम बेहद चिन्ताजनक है। हम आराम की सोच नहीं सकते। अभी लम्बा सफ़र बाक़ी है।

लेखक: काँग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं।

(Credit: This Aricle is published on Hindustantimes Dated 18/07/2017)

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