Connect with us

ब्लॉग

मुसलिम महिला-हित नहीं बल्कि सियासी खेल की एक और मिसाल है तीन तलाक़ बिल

प्रस्तावित तीन तलाक विधेयक, सियासी मौक़ापरस्ती की एक और मिसाल है, जिसका मक़सद सिर्फ़ चुनावी फ़ायदा उठाना है।

Published

on

Kapil Sibal

लोकसभा में 28 दिसम्बर को आसानी से पारित हुआ तीन तलाक़ यानी मुसलिम महिला (निक़ाह संरक्षण) विधेयक अभी राज्यसभा के विचाराधीन है। इस विधेयक ने बीजेपी की दुर्भावना के बेनक़ाब कर दिया है, क्योंकि इसे हड़बड़ी में और गहराई से सोच-विचारकर नहीं लाया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

तीन तलाक़ को लेकर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने तीन अलग-अलग फ़ैसले दिये। जस्टिस आर एफ नरीमन और जस्टिस यू यू ललित का फ़ैसला था कि तलाक़-ए-बिद्दत यानी एक ही बार में ‘तलाक़-तलाक़-तलाक़’ कहने की प्रथा, मनमानीपूर्ण है। उन्होंने इसे असंवैधानिक और निरर्थक क़रार दिया। जस्टिस जे एस खेहर और जस्टिस अब्दुल नज़ीर की राय थी कि तीन तलाक़ की प्रथा 1400 साल से जारी है, ये मुसलमानों की इस्लाम में आस्था का अभिन्न हिस्सा है। लिहाज़ा, इसे मूल अधिकारों के ख़िलाफ़ मानकर ख़ारिज़ नहीं किया जा सकता। हालाँकि, इन दोनों न्यायमूर्तियों का ये भी फ़ैसला था कि दुनिया के तमाम इस्लामी देशों में ‘तीन तलाक़’ को घिनौना मानते हुए इसे ग़ैरक़ानूनी ठहराया। सुप्रीम कोर्ट में मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड की दलील भी ऐसी ही थी। उसने भी ‘तीन तलाक़’ को ग़ैरमुनासिब और ख़त्म किये जाने लायक रिवाज़ बताया था।

इसी फ़ैसले के मुताबिक़, सुप्रीम कोर्ट ने छह महीने के लिए ‘तीन तलाक़’ को अवैध घोषित कर दिया। और, ये भी कहा कि यदि सरकार तीन तलाक़ को लेकर कोई क़ानून बनाती है तो नये क़ानून के लागू होने तक अदालत का ये फ़ैसला जारी रहेगा। इसी फ़ैसले में जस्टिस कुरियन जोसेफ़ का नज़रिया जस्टिस नरीमन और जस्टिस ललित से बिल्कुल अलग था। जस्टिस कुरियन का फ़ैसला था कि मुसलिम पर्सनल लॉ के तीन तलाक़ से जुड़े प्रावधान को मनमानीभरा और असंवैधानिक कहकर ख़त्म नहीं किया जा सकता। हालाँकि, ‘तीन तलाक़’ का रिवाज़ इसलिए भी पाप है क्योंकि क़ुरआन में इसका कोई ज़िक्र नहीं है। इसीलिए इसे पर्सनल लॉ का दर्जा नहीं दिया जा सकता। ये रुख़ जस्टिस खेहर और जस्टिस नज़ीर के नज़रिये से बिल्कुल उल्टा है। कुलमिलाकर, इसका मतलब ये हुआ कि पाँच में से तीन जजों ने ‘तीन तलाक़’ के रिवाज़ को अलग-अलग वज़हों से निरर्थक और ग़ैरमुनासिब क़रार दिया। साफ़ है कि ‘तीन तलाक़’ को लेकर मोदी सरकार ने जो विधेयक संसद में पेश किया है, उसमें जस्टिस खेहर और जस्टिस नज़ीर के फ़ैसलों के उस हिस्से को ही नया क़ानून बनाने की बुनियाद के रूप में देखा गया है, जो अपने-आप में ही अल्पमत का नज़रिया है।

क्या कहता है कि ‘तीन तलाक़’ विधेयक?

विधेयक की तीन ख़ासियत है। (1) ‘तीन तलाक़’ या किसी भी तरह से दिया गया फ़ौरी तलाक़ को मुक़म्मल नहीं माना जा सकता। लिहाज़ा, ये व्यर्थ है, निरर्थक है। (2) ‘तीन तलाक़’ का ऐलान करने वाले शौहर की क़रतूत को फौज़दारी ग़ुनाह या ज़ुर्म या अपराध समझा जाएगा। (3) ये क़सूर, संज्ञेय अपराध माना जाएगा और इसके आरोपी को पुलिस से जमानत नहीं मिल पाएगी। साफ़ है कि सरकार ने विधेयक को बनाते वक़्त इस बात को नज़रअन्दाज़ कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट तो पहले ही ‘तीन तलाक़’ को व्यर्थ और निरर्थक घोषित कर चुका है। लिहाज़ा, यदि संसद में मोदी सरकार मौजूदा ‘तीन तलाक़’ विधेयक को पेश नहीं करती तो भी ‘तीन तलाक़’ का रिवाज़ ग़ैरक़ानूनी, व्यर्थ और निरर्थक ही बना रहता! साफ़ है कि ‘तीन तलाक़’ को ग़ैरवाज़िब ठहराने के लिहाज़ से सरकार जो क़ानून बनाना चाहती है वो तो पहले से ही मौजूद है। कोई ये बताने वाला नहीं है कि फिर नये क़ानून की ज़रूरत क्या है? दरअसल, प्रस्तावित विधेयक का एकमात्र मक़सद ‘तीन तलाक़’ को फौज़दारी ग़ुनाह के दायरे में लाना है!

विवाद क्या है?

सुप्रीम कोर्ट के तीनों फ़ैसलों में ये कहीं भी, किसी भी रूप में नहीं लिखा है कि ‘तीन तलाक़’ अपने-आप में एक फौज़दारी गुनाह है। इसीलिए मौजूदा विधेयक से सरकार की मंशा पर शक़ पैदा होता है कि उसका निशाना मुसलिम मर्दों पर है। इस्लाम में निक़ाहनामा एक दीवानी क़रार है। लेकिन प्रस्तावित क़ानून के ज़रिये दीवानी क़रार को तोड़ने की ज़ुर्रत करने वाले को फौज़दारी मुज़रिम या अपराधी माना जाएगा।

प्रस्तावित विधेयक में ये भी कहीं नहीं लिखा है कि शौहर के ज़ुर्म के ख़िलाफ़ सिर्फ़ पत्नी ही शिकायत दर्ज करवा सकती है। बल्कि, क़ानून तो ऐसा बनाया जा रहा है कि मियाँ-बीवी के अलावा, कोई तीसरा शख़्स भी पुलिस में ये शिकायत दर्ज करवा सकता है कि फलाँ आदमी ने अपनी बीवी को ‘तीन तलाक़’ कहकर क़ानून तोड़ा है। लिहाज़ा, पुलिस उसे तुरन्त गिरफ़्तार कर सकती है। ग़ैर-ज़मानती आरोप होने की वजह से शौहर को अदालतों से ही ज़मानत मिल पाएगी। इसके कई प्रभाव होंगे। (1) मुमकिन है कि ‘तीन तलाक़’ बोलने के बावजूद कोई पत्नी, पुलिस में शिकायत नहीं दर्ज करवाना चाहे, क्योंकि वास्तव में तो उसका निक़ाह बाक़ायदा क़ायम है और यदि शिकायत करने की वजह से उसके शौहर को जेल जाना पड़ा तो इससे उसे कई और मुश्किलें झेलनी पड़ेगी। मुमकिन है कि शौहर के जेल जाने से उसका परिवार भी बुरी तरह से प्रभावित हो। (2) यदि किसी ने दुर्भावनापूर्वक झूठी शिकायत ही कर दी तो भी शौहर को जेल जाना पड़ सकता है। (3) समझ से परे है कि जब शौहर की ओर से बोला या लिखा गया ‘तीन तलाक़’ अपने-आप में ही ग़ैरक़ानूनी, व्यर्थ और निरर्थक है तो फिर उसे जेल भेजे जाने की क्या ज़रूरत है?

यही नहीं, प्रस्तावित ‘तीन तलाक़’ विधेयक यदि क़ानून बन जाए तो उस निक़ाह को लेकर भी पेंचीदा सवाल खड़े होंगे जो बाक़ायदा जायज़ बना हुआ है। यानी, जहाँ तलाक़ ही नहीं हुआ वहाँ भी ये सवाल खड़े होंगे कि शौहर के जेल जाने की सूरत में बीवी किससे गुज़ारा-भत्ता पाने की हक़दार होगी? उसका गुज़ारा कैसे होगा? नाबालिग सन्तानों का अभिवावक किसे माना जाएगा? हालाँकि, गुज़ारा भत्ता और बच्चों से जुड़े अधिकारों की बातें सिर्फ़ तभी होती हैं, जबकि मामला तलाक़ की कार्यवाही का हो और शौहर अपने पूर्व परिवार का ख़र्चा उठाने से मुकर रहा हो। लेकिन ‘तीन तलाक़’ विधेयक को लिए तो ऐसा कोई मामला हो ही नहीं सकता, क्योंकि ‘तीन तलाक़’ बोलने या लिखकर देने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के मुताबिक़, निक़ाह को ख़त्म माना ही नहीं जा सकता।

सरकार की बदनीयत

सरकार का दावा है कि वो प्रस्तावित विधेयक का मज़हब से कोई वास्ता नहीं है। वो तो सिर्फ़ लैंगिक समानता या औरत-मर्द की बराबरी की ख़ातिर नया क़ानून बनाना चाहती है। यदि सच्चाई यही है तो सरकार उन हिन्दू महिलाओं के लिए आँसू क्यों नहीं बहाती जिन्हें ज़बरन उनके घरों से निकाल बाहर किया जाता है और जो इंसाफ़ पाने के लिए अदालतों में एड़ी-चोटी कर करती रहती हैं? हिन्दू महिलाओं को अदालतों से इंसाफ़ पाने में सालों लगते हैं और इस दौरान उन्हें कोई मदद नहीं मिलती। यही तर्क अन्य धर्मों की उन महिलाओं के लिए भी पूरी तरह से सही है जिन्हें उनके पति ने छोड़ दिया है। लिहाज़ा, लैंगिक समानता की दुहाई देने वाले अलग-अलग धर्मों की महिलाओं के बीच फ़र्क़ कैसे कर सकते हैं!

कुलमिलाकर, प्रस्तावित तीन तलाक विधेयक, सियासी मौक़ापरस्ती की एक और मिसाल है, जिसका मक़सद सिर्फ़ चुनावी फ़ायदा उठाना है। ये अपने-आप में एक और ‘जुमला’ है। इसीलिए सरकार के उन हथकंडों की पोल खोलना ज़रूरी है, जो उन परिवारों को तोड़ना चाहती है, जहाँ शादी के क़ायम रहने के बावजूद शौहर को जेल में रहना पड़े।

 

(आभार: द हिन्दू। लेखक, वरिष्ठ काँग्रेस नेता, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वकील हैं।)

ब्लॉग

कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया

कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।

Published

on

india-kashmir-protest

कश्मीर समस्या अब तक इसलिए नहीं सुलझ पाई, क्योंकि हमने इसे हमेशा जमीन के एक टुकड़े की तरह देखा है। हमने कश्मीरियों को कभी भारत का नागरिक माना ही नहीं। दोनों देशों ने कश्मीर को अपने ‘अहं’ का सवाल बना लिया है। आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता, उसकी पैन इस्लामिज्म में कोई दिलचस्पी नहीं है। वह रोजगार और शांति से जीना चाहता है। यह कहना है ‘कश्मीरनामा’ के लेखक अशोक कुमार पांडेय का।

कश्मीर की नब्ज समझने वाले लेखक कहते हैं कि कश्मीरी लोगों को लेकर हमारे अंदर मोहब्बत नहीं, संशय बना हुआ है। वह कहते हैं, “कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया है। मेरा मानना है कि यदि कश्मीर को अपना मानना है, तो वहां के लोगों की परेशानियों को अपनी परेशानियां समझना होगा। जैसे देखिए, अभी कश्मीर का एक लड़का शताब्दी एक्सप्रेस में बिना टिकट यात्रा करते पाया गया और उसे आतंकवादी और पता नहीं क्या-क्या कह दिया गया, यह सोच खत्म करने की जरूरत है।”

अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘कश्मीरनामा’ कश्मीर के भारत में विलय और उसकी परिस्थितियों को बयां करती है। वह कहते हैं, “जब मैं कश्मीर का अध्ययन कर रहा था, तो कश्मीर का मतलब मेरे लिए सिर्फ एक जगह नहीं थी, बल्कि वहां के लोग थे। पिछले कुछ दशकों में कश्मीर का मामला सुलझने की बजाय और उलझ गया है।”

वह कहते हैं कि कश्मीर के लोग परेशान हैं कि उनसे जो वादे किए गए थे, उन्हें निभाया नहीं गया। सारी समस्याओं की जड़ यही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों कश्मीर पर अपना हक जताना चाहते हैं। पांडेय कहते हैं, “अगर आप कानूनी रूप से देखें, तो कश्मीर और हिंदुस्तान के बीच संधि हुई थी, तो इस लिहाज से कश्मीर पर भारत का हक बनता है। लेकिन पाकिस्तान इसे अलग तरह से परिभाषित करता है। दोनों देशों ने इसे अपने अहं का सवाल बना लिया है।”

उन्होंने कहा, “इन सभी उलझनों के बीच में पैन इस्लामिज्म ने प्रवेश किया। पैन इस्लामिज्म के बाद यह पूरा मूवमेंट ही बदल गया। सच्चाई यह है कि आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता। पैन इस्लामिज्म में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। वह चैन की जिंदगी गुजर-बसर करना चाहता है। वह चाहता है कि कश्मीर में तैनात सुरक्षाबलों की संख्या में घटाई जाए। नौकरियां दी जाएं और वह हिंदुस्तान में शांति से रह सके।”

अशोक पांडेय की इस किताब का आज प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले में औपचारिक लोकार्पण हुआ। किताब के बारे में वह कहते हैं, “इस किताब को पूरा करने में उन्हें चार साल लगे। इनमें से दो साल शोध कार्यो में, जबकि दो साल लेखन में लगे। इस दौरान मैंने 125 किताबों की मदद ली, जिसमें आठ से नौ शोधग्रंथ भी हैं। इस सिलसिले में चार बार कश्मीर जाना हुआ।”

उन्होंने कहा, “यह शोधकार्य था। इसलिए जरूरी था दस्तावेज इकट्ठा करना। इसे लेकर मैंने श्रीनगर विश्वविद्यालय, जम्मू और कश्मीर के शोपियां और कई गांवों की खाक छानी। इंटरनेट से भी काफी मदद ली। कुछ ऐसे लोगों से भी मिला, जो पहले आतंकवादी थे लेकिन अब मुख्यधारा में शामिल हो गए हैं।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर की एक समस्या यह भी है कि यहां कभी जनमत संग्रह नहीं हो पाया और इसके लिए हिंदुस्तान अकेला जिम्मेदार नहीं है, पाकिस्तान भी उतना ही जिम्मेदार है। हमने कश्मीर की समस्या को हिंदू-मुसलमान समस्या में तब्दील कर दिया है। दूसरी बात है कि कश्मीर लोग सिर्फ घूमने जाते हैं। यह सिर्फ पर्यटन तक सिमट गया है, कश्मीरियों से कोई संवाद नहीं है। दोनों के बीच में संवाद बेहद जरूरी है। मैंने किताब के अंत में यही बात लिखी है कि यदि कश्मीर के स्कूली बच्चे अन्य राज्यों में जाएं और वहां के छात्र यहां आएं तो संवाद की स्थिति बेहतर हो सकती है।”

वह कहते हैं, “कश्मीर में जिस तरह का माहौल है, उस पर लेबल चिपकाना बहुत गलत है। हम किसी को देशद्रोही या देशभक्त नहीं कह सकते। कश्मीर के साथ दिक्कत यही है कि वहां उद्योग-कारखाने नहीं हैं, लोगों के पास नौकरियां नहीं हैं, कहीं विकास नहीं है और ऊपर से कश्मीरियों का अपमान अलग से। मेरे लिए विकास का सीधा मतलब है कि लोगों को रोजगार मिले। लोगों को पढ़ने का मौका मिले।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर के मसले पर सभी सरकारों ने कोई न कोई गलती की है। इंदिरा गांधी की अपनी गलतियां थीं, राजीव गांधी की अपनी और वाजपेयी जी के समय में कुछ काम जरूर हुआ, लेकिन वो कहीं पहुंच नहीं पाया। उसके बाद की सरकार की अपनी गलतियां और इस सरकार की अपनी गलतियां हैं। दिक्कत यही है कि कश्मीर को हमने कभी अपना नहीं समझा। हम सिर्फ यह मान बैठे हैं कि यह एक ऐसा इलाका है, जिस पर हमें कब्जा रखना है। इस मानसिकता को खत्म करना होगा। “

वह कहते हैं कि देश में हर जगह बवाल हो रहा है, हरियाणा में आरक्षण को लेकर कितनी हिंसा हुई। बिहार में जमकर बवाल हुआ। दलितों को छोटी सी बातों पर उन्हें मार दिया जाता है, खाप पंचायतों की करनी किसी से छिपी हुई न हीं है, लेकिन वे देशविरोधी नहीं कहलाते। वहीं, जब बात कश्मीर की आती है तो बलवा करने वाले को फौरन देशद्रोही बता दिया जाता है। हम कश्मीर को गैर मानकर चलते हैं। वे नाराज हैं और अपनी बात कहते हैं तो समझा जाता है कि वे पाकिस्तान का समर्थन कर रहे हैं। यही मानसिकता उन्हें एक दिन पाकिस्तान के पक्ष में धकेल देगी।

पांडेय कहते हैं, “नरेंद्र मोदी जब गुजरात में भाजपा के महासचिव थे तो उन्होंने कहा था कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए तीन ‘डी’ सूत्र जरूरी है- डेवलपमेंट, डेमोक्रेसी और डायलॉग और जब ये तीनों असफल रहें तो चौथे डी ‘डिफेंस’ का प्रयोग करना चाहिए, लेकिन दिक्कत यह है कि कश्मीर में अक्सर चौथा डी पहले प्रयोग में लाया जाता है। अगर पहले तीनों डी का सही तरीके से उपयोग किया जाए, थोड़ा धीरज रखा जाए, सेना को नियंत्रण में रखा जाए और लोगों का विश्वास जीता जाए तो एक दशक में ही कश्मीर में काफी हद तक आतंकवाद खत्म हो जाएगा।”

वह आगे कहते हैं, “कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।”

By : रीतू तोमर

Continue Reading

ब्लॉग

‘स्लोगन बाबा’ ने गंगा प्रेमियों को भी ठगा : राजेंद्र सिंह

गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।

Published

on

Ganga Polluton

लगभग पौने चार वर्षो में केंद्र सरकार गंगा नदी की अविरलता और इसे प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कोई सार्थक काम कर पाने में नाकाम रही। इससे गंगा प्रेमी नाराज हैं। दुनिया में ‘जलपुरुष’ के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह का तो यहां तक कहना है कि ‘स्लोगन बाबा (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) ने गंगा प्रेमियों को भी ठगने में कसर नहीं छोड़ी है।’

स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह ने आईएएनएस से फोन पर चर्चा के दौरान कहा, “वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जब केंद्र में नई सरकार आई थी, तो इस बात की आस बंधी थी कि गंगा नदी का रूप व स्वरूप बदलेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने कहा था- ‘गंगा मां ने मुझे बुलाया है।’ उनकी इस बात पर प्रो. जी.डी. गुप्ता, नदी प्रेमी और संत समाज शांत होकर बैठ गया था, बीते पौने चार साल के कार्यकाल को देखें तो पता चलता है कि केंद्र सरकार ने अपने उन वादों को ही भुला दिया है, जो चुनाव के दौरान किए गए थे, अब तो सरकार गंगा माई का नाम ही नहीं लेती।”

Image result for स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह

Waterman India Rajendra Singh

बीते पौने चार वर्ष तक गंगा प्रेमियों के किसी तरह की आवाज न उठाने के सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “सभी गंगा प्रेमियों को इस बात का भरोसा था कि नई सरकार वही करेगी, जो उसने चुनाव से पहले कहा था। मगर वैसा कुछ नहीं हुआ। तीन साल तक इंतजार किया, अब गंगा प्रेमियों में बेचैनी है, क्योंकि जो वादा किया गया था, उसके ठीक उलट हो रहा है।”

उन्होंने कहा, “गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।”

‘जलपुरुष’ ने याद दिलाया कि वर्तमान सरकार ने नोटीफिकेशन कर गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया था, मगर गंगा को वैसा सम्मान नहीं मिला, जैसा प्रोटोकॉल के तहत मिलना चाहिए था। गंगा को वही सम्मान दिया जाए, जो राष्ट्रंीय ध्वज को दिया जाता है।

सरकार आखिर गंगा की अविरलता के लिए काम क्यों नहीं कर रही? इस सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “उन्हें लगता है कि गंगा माई की सफाई में कोई कमाई नहीं हो सकती, इसलिए उस काम को किया ही न जाए। ऐसा सरकार से जुड़े लोगों ने सोचा। छोटे-छोटे काम भी अपने दल से जुड़े लोगों को ही दिया गया है।”

Related image

अपनी मांगों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “रिवर और सीवर को अलग-अलग किया जाए, हिमालय से गंगासागर तक गंगा को साफ किया जाए, गंगा के दोनों ओर की जमीन का संरक्षण हो, न कि विकास के नाम पर उद्योगपतियों को सौंपने की साजिश रची जाए।”

राजेंद्र सिंह का आरोप है, “कुछ पाखंडी गुरुओं ने नदियों की जमीन पर पौधरोपण करने के नाम पर सरकारों से जमीन और पैसे पाने के लिए सहमतिपत्र तैयार किए हैं। यह संकट पुराने संकट से बड़ा है, क्योंकि इसमें किसानी की जमीन बड़े औद्योगिक घरानों को दिलाने का षड्यंत्र नजर आता है। इस षड्यंत्र के बारे में भी गंगा के किसानों को बताना जरूरी है। इस सब संकटों के समाधान के लिए गंगा प्रेमी एक साथ बैठकर चर्चा करने की तैयारी में हैं।”

Continue Reading

ब्लॉग

लोकतांत्रिक देश में पार्टियां प्राइवेट लिमिटेड!

Published

on

Indian Politics

इसमें कोई शक नहीं कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, जिस पर गर्व भी है। सच्चाई भी है कि सरकार केंद्र या राज्य कहीं भी हो, पार्टियों के अंदर का लोकतंत्र दूर-दूर तक गायब है। विडंबना, कुटिलता या एकाधिकारवादी प्रवृत्ति, कुछ भी कहें, भारत में शुरू से ही राजनीतिक पार्टियां व्यक्ति के आसरे या प्रभाव से ही प्रभावित रही हैं।

फिलहाल ‘आप’ में भी इसी बात को लेकर घमासान मचा है, तो नया क्या है? रिवाज सरीखे तमाम पार्टियां ‘आम’ आदमी से ‘खास’ बन जाती हैं। गर्व कीजिए कि सरकारें तो लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई होती हैं! ऐसे में ‘आप’ पर ही तोहमत क्यों?

दरअसल, राजनीति शह-मात का खेल है। नकेल जिसके हाथ है, पार्टी उसके नाम है। पुराने दौर से अब तक कमोवेश यही सिलसिला जारी है। ऐसी विविधता दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, यानी भारत में ही दिखती है। खुश होइए कि लोकतंत्र जिंदाबाद है।

अहम यह कि पार्टियों के भीतर लोकतंत्र रहा ही कब? गांधीजी ने कांग्रेस के लिए देशभर में सदस्य बनाए। जिले तक को तवज्जो दी। सम्मेलनों में अध्यक्ष चुनने की शुरुआत हुई। लेकिन तब भी गांधीजी की पसंद खास होती थी। वर्ष 1937 को देखिए, पहला चर्चित चुनाव हुआ, तब सरदार पटेल संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष थे, लेकिन उम्मीदवारों का चयन पूरी तरह से केंद्रीकृत रहा। कुछ लोकतंत्र बचा रहा, जिसे बाद में इंदिराजी ने खत्म कर दिया। अब अमूमन सारी पार्टियां यही व्यवहार कर रही हैं। एक-एक सीट आलाकमान से तय होती है।

प्रदेश, जिला, नगर, यहां तक कि वार्ड की अहमियत नकारा है। सुप्रीमो पद्धति जन्मी और पार्टियां एक तरह से प्राइवेट लिमिटेड बनती चली गईं। राजनैतिक अनुभव या समाजसेवा से इतर फिल्मी स्टारों ने भी बहती गंगा में गोते लगाए। दर्जनों स्टार देखते-देखते बड़े नेता बन गए, वहीं कई मुख्यमंत्री तक हुए। भला रिटायर्ड या इस्तीफा दिए नौकरशाह या सैन्य अधिकारी क्यों पीछे रहते? भारत की राजनीति सरकारी पदों की अहमियत को भुनाने का मौका जो देती है।

अभी तो आम आदमी पार्टी की बात है, धारा का रुख देख भ्रष्टाचार विरोधी गोते लगाए गए। समाज-सेवक से लेकर नौकरशाह, कवि से लेकर पत्रकार, सभी ने बहती बयार को समझा और एक आंदोलन उपजाया। भारतीय इतिहास में जितनी तेजी से इस पार्टी ने झंडा गाड़ा, यकीनन जात-पात, अगड़े-पिछड़े और फिल्मी लोकप्रियता के नाम की राजनीति भी पीछे हो गई।

आम आदमी की पार्टी कहां से चली और धीरे-धीरे कहां पहुंच गई, सबको दिख रहा है। जब बारी लोकतंत्र में आहूति देने की आई, तो उच्च सदन के खास यजमान एकाएक अवतरित हुए! कहने की जरूरत नहीं कि लोकतंत्र में मतदाता केवल एक वोट बनकर रह गया है, जिसकी अहमियत चंद सेकेंड में बटन दबाने से ज्यादा कुछ नहीं। बाद में उसकी क्या पूछ परख है, खुली किताब है।

दूसरी पार्टियां ‘आप’ के घमासान पर विलाप करें या प्रलाप, लेकिन जब बात उनकी होती है तो लोकतंत्र की दुहाई देते नहीं अघाते। पार्टी कुछ नहीं होती, होते हैं उनको चलाने वाले ही बलशाली और महारथी।

अब मोदी-शाह के कमल की बहार हो, राहुल की कांग्रेस का हाथ हो, केजरीवाल के आप की झाड़ू, अखिलेश-मुलायम की साइकिल, मायावती का हाथी, ममता के दो फूल, लालू का लालटेन, उद्धव का तीर कमान, राज ठाकरे का रेल इंजन, अभिनेत्री जयललिता के बाद पनीर सेल्वम-पलनीस्वामी की दो पत्तियां, करुणानिधि का उगता सूरज, शरद पवार की घड़ी, बीजू जनता दल का शंख, कभी जॉर्ज फर्नांडीज तो अब नीतीश के जद (यू) का तीर, अभिनेता एनटी रामाराव के बाद चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी की साइिकल। हाल-फिलहाल रजनीकांत की दहाड़। इनके अलावा देश में न जाने कितने क्षत्रप और उनकी पार्टियां हैं, सच्चाई सबको पता है।

दलों का दलदल हो या हमाम, बस नजर का पर्दा ही है, जिसमें सब कुछ दिखकर भी कुछ नहीं दिखता। यही भारतीय लोकतंत्र है। अब इसे खूबी कहें या दाग, पार्टी तो चलाते हैं केवल सरताज। ऐसे में आम आदमी की क्या हैसियत? जो अंदर है, वह बाहर दिखता जरूर है। अब इस पर चीत्कार करें या आर्तनाद, कोई फर्क नहीं पड़ता।

कहने को कुछ भी कह लें, लेकिन हकीकत यही है कि कम से कम भारतीय राजनीति की यही सुंदरता है, उसका कलेवर हाड़-मांस का तो नहीं, कांच का भी नहीं, लेकिन फिर भी इतना कुछ पारदर्शी है कि सब कुछ दिखता है। इसे मत-मतांतर का फेर, सपनों की सौदागीरी, शब्दों की बाजीगरी कुछ भी कह लें।

लेकिन जानते, देखते और समझते हुए भी दलदल में हर बार हमारा वोट गोता खाकर रह जाता है और हम कहते हैं कि ‘अबकी बार हमारी सरकार।’ इतना कहना ही क्या कम है? तो आइए, एक बार फिर से कहें ‘लोकतंत्र जिंदाबाद’।

By : ऋतुपर्ण दवे

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

Continue Reading
Advertisement
राष्ट्रीय8 mins ago

बाड़मेर पहुंचे PM, ऑयल रिफाइनरी का करेंगे शुभारंभ

loya
राष्ट्रीय12 mins ago

जस्टिस लोया केस: कोर्ट ने कहा- महाराष्ट्र सरकार याचिकाकर्ताओं को दें सभी दस्‍तावेज

Sidharth-Malhotra-wefornews
मनोरंजन18 mins ago

लड़कियों के मामले में बेहद शर्मीले हैं सिद्धार्थ मल्होत्रा

Emraan Hashmi
मनोरंजन23 mins ago

‘चीट इंडिया’ मेरे करियर का ऐतिहासिक किरदार होगा : इमरान हाशमी

PAK Bus
राष्ट्रीय24 mins ago

सीमा पर बढ़ते तनाव के बीच भारत-पाक के बीच चलने वाली बस सेवा रोकी गई

NetanyahuInIndia
राष्ट्रीय36 mins ago

इजरायली PM ने पत्नी संग किया ताज का दीदार

supreme-court
राष्ट्रीय38 mins ago

सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार को लगाई फटकार, कहा- प्रेम विवाह मामले में खाप पंचायतों के हस्तक्षेप पर लगाए रोक

virat kohli1
खेल44 mins ago

सेंचुरियन में सेंचुरी लगाकर कोहली ने किया कमाल, मैरिज रिंग को चूमकर अनुष्का को दिया गिफ्ट

मनोरंजन59 mins ago

पद्मावत के गाने पर बच्‍चे कर रहे थे डांस, करणी सेना ने स्कूल में की तोड़फोड़

Google Drive,-
टेक59 mins ago

अब गूगल ड्राइव में करें ट्रकॉलर कांटैक्स को बैकअप, रिस्टोर

narottam patel
राजनीति2 weeks ago

रूपाणी कैबिनेट में दरार के आसार! नितिन पटेल के समर्थन में उतरे बीजेपी नेता नरोत्‍तम पटेल

lalu yadav
राजनीति1 week ago

चारा घोटाला: लालू को साढ़े तीन साल की सजा

Vinod Rai CAG
ब्लॉग4 weeks ago

संघ के 92 साल के इतिहास में विनोद राय की टक्कर का फ़रेबी और कोई नहीं हुआ!

sports
खेल1 week ago

केपटाउन टेस्‍ट: गेंदबाजों की मेहनत पर बल्‍लेबाजों ने फेरा पानी, 72 रनों से हारी टीम इंडिया

Congress party
ब्लॉग3 weeks ago

काँग्रेसियों की अग्निपरीक्षा! इन्हें ही एक बार फिर देश को आज़ाद करवाना होगा

hardik-nitin
राजनीति2 weeks ago

नितिन पटेल की नाराजगी पर हार्दिक की चुटकी, कहा- ’10 एमएलए लेकर आओ, मनमाफिक पद पाओ’

atal bihari vajpai
ज़रा हटके3 weeks ago

आजीवन क्यों कुंवारे रह गए अटल बिहारी बाजपेयी?

ananth-kumar-hegde
ओपिनियन3 weeks ago

ज़रा सोचिए कि क्या भारत के 69 फ़ीसदी सेक्युलर ख़ुद को हरामी बताये जाने से ख़ुश होंगे!

Modi Manmohan Sonia
ओपिनियन3 weeks ago

2G मामले में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले से सुप्रीम कोर्ट और विपक्ष दोनों ग़लत साबित हुए!

rape case
ओपिनियन4 weeks ago

2017 In Retrospect : दुष्कर्म के 5 चर्चित मामलों ने खोली महिला सुरक्षा की पोल

अंतरराष्ट्रीय2 days ago

PoK में पाक सरकार के खिलाफ प्रदर्शन, सड़कों पर उतरे व्यापारी

Supreme Court Judges
राष्ट्रीय4 days ago

पहली बार SC के जज आए सामने, कहा- ‘हम नहीं बोले तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा’

gadkari
राजनीति5 days ago

नौसेना पर बरसे गडकरी, कहा- ‘दक्षिणी मुंबई में नहीं दूंगा एक इंच जमीन’

mumbai-
शहर5 days ago

मुंबई के हुक्काबार में जमकर तोड़फोड़

helicopter
शहर5 days ago

आर्मी-डे परेड की रिहर्सल के दौरान 3 जवान घायल…देखें वीडियो

Ashwini-Kumar-Chopra
राजनीति6 days ago

भाजपा सांसद का बयान- 2019 में जिताओगे तो 2014 के वादे पूरे करूंगा, देखिए वीडियो

iligaters
अन्य6 days ago

ठंड का कहर: मगरमच्छ बन गया बर्फ…देखें वीडियो

bjp mla
राजनीति1 week ago

बीजेपी विधायक ने खुद को बताया ‘महागुंडा’, देखें वीडियो…

Dinesh Sharma
राजनीति1 week ago

वोट मांगने गए बीजेपी प्रत्याशी को जनता ने पहनाई जूतों की माला

us
राष्ट्रीय1 week ago

जाधव मामले पर ‘चप्पल चोर पाकिस्तान’ टैग के साथ अमेरिका में प्रदर्शन

Most Popular