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मोदी-लहर का कच्चा चिट्ठा

2018 में ही बीजेपी को मोदी-लहर की सबसे बड़ी अग्नि-परीक्षा अभी बाक़ी है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले इसी साल मोदी-लहर को सबसे बड़ी चुनौती उस राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में झेलनी है, जहाँ अभी वो सत्ता में है। इन राज्यों में मोदी-लहर का ज़बरदस्त मुक़ाबला सत्ता-विरोधी लहर से होना है।

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narendra modi wave in india

ये सच है कि 2014 में केन्द्र में सत्ता पाने के बाद बीजेपी का प्रदर्शन लगातार बेहतर होता गया है। ये भी सच है कि मोदी युग में काँग्रेस को एक के बाद एक करके कई राज्यों की सत्ता से बाहर होना पड़ा है। लेकिन याद रखिए कि बीजेपी की सारी की सारी कमाई नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की बदौलत नहीं है। मोदी-शाह के राष्ट्रीय पटल पर आने से पहले भी देश के 31 राज्यों में से 14 में बीजेपी या उसके सहयोगी दल की सरकारें थीं। अब 22 राज्यों में भगवा परचम ज़रूर लहरा रहा है, लेकिन मोदी-शाह का प्रदर्शन भी वैसा चमचदार नहीं है, जैसा भक्तों की ओर से फैलाये जाने वाले झूठ के ज़रिये पेश किया जाता है। मिसाल के तौर पर मोदी-लहर को ही लीजिए। नरेन्द्र मोदी सरकार के कामकाज की तरह मोदी-लहर की भी जैसी डुगडुगी बजायी जाती है, वैसी वो कतई नहीं है।

जो लोग मोदी-लहर का गुणगान करते हैं वो भूल जाते हैं कि ये लहर जिस साल चलती है, उसके अगले साल नहीं चलती! मसलन…

2014 में मोदी-लहर थी तो बीजेपी ने लोकसभा के अलावा महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा और झारखंड पर क़ब्ज़ा जमाया।

2015 में मोदी-लहर नहीं थी! तभी तो बीजेपी को दिल्ली और बिहार में हार का मुँह देखना पड़ा!

2016 में मोदी-लहर बेहद मामूली थी। बीजेपी सिर्फ़ असम जीत सकी। जबकि पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में उसे हार झेलनी पड़ी।

2017 में मोदी-लहर वापस लौटी। हिमाचल, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में बीजेपी ने तख़्ता पटल किया। गोवा और मणिपुर में उसके तिकड़म और ख़रीद-फ़रोख़्त सफल रही। लेकिन पंजाब में उसे झटका लगा, जबकि गुजरात में उसने बड़ी मुश्किल से अपनी लाज़ बचायी।

2018 में मोदी-लहर की रंगत धूप-छाँव जैसी हो गयी। कर्नाटक में जैसी मोदी-लहर चली उसने बीजेपी को सत्ता के पाले से पहले ही पटक दिया। त्रिपुरा और नगालैंड में आंशिक लहर रही। जबकि मेघालय में गोवा और मणिपुर की ख़रीद-फ़रोख़्त वाली तिकड़म को ही दोहराया गया।

2018 में ही बीजेपी को मोदी-लहर की सबसे बड़ी अग्नि-परीक्षा अभी बाक़ी है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले इसी साल मोदी-लहर को सबसे बड़ी चुनौती उस राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में झेलनी है, जहाँ अभी वो सत्ता में है। इन राज्यों में मोदी-लहर का ज़बरदस्त मुक़ाबला सत्ता-विरोधी लहर से होना है। इन तीनों बीजेपी शासित राज्यों के अलावा मोदी-लहर की जाँच उत्तर-पूर्व के छोटे से राज्य मिज़ोरम में भी होगी!

••• सबसे दिलचस्प बात ये है कि जिस ‘मोदी-लहर’ या ‘मोदी का करिश्मा’ या ‘मोदी का जादू’ पर भक्त मंडली इतराती फिरती है, उसने 2014 में ही अपना दम तोड़ना शुरू कर दिया था! तथाकथित मोदी-लहर की बदौलत लोकसभा की 282 सीटें जीतने वाली बीजेपी, 2014 से अब तक हुई 23 संसदीय सीटों के उपचुनाव में सिर्फ़ 4 सीटों पर ही अपनी जीत को बरक़रार रख सकी। ये सीटें हैं – वडोदरा, शाहडोल, लखीमपुर (असम) और बीड। दूसरी ओर, काँग्रेस मुक्त भारत का नारा देने वाली बीजेपी को 2014 से लेकर अभी तक अपनी 7 जीती हुई सीटों से हाथ धोना पड़ा है। इनमें से रतलाम, अमृतसर, गुरदासपुर, अजमेर और अलवर की सीटें जहाँ काँग्रेस ने जीतीं। वहीं फूलपुर और गोरखपुर की सीटों को उस समाजवादी पार्टी ने बीजेपी से छीना है, जो काँग्रेस का मित्र-दल है। माना जा रहा है कि विपक्ष का साझा उम्मीदवार ही, 28 मई को कैराना सीट को भी, मोदी-लहर को आठवीं चपत देने वाला है।

उपरोक्त तथ्यों से साफ़ है कि 2014 वाली मोदी-लहर 2015 में नदारद थी, 2016 में इसकी औक़ात मामूली हवा जैसी ही थी, क्योंकि असम में 15 साल से चल रही काँग्रेस के तरूण गोगोई की सरकार के ख़िलाफ़ सत्ता विरोधी लहर को सियासी जगत में बेहद स्वाभाविक माना गया। 2017 वाली मोदी-लहर का ज़ायक़ा ऐसा रहा मानो दाल में कंकड़ों की भरमार रही हो। सत्ता हथियाने के लिए होने वाली तिकड़म, विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त की नीति, ईवीएम पर लगे सवालिया निशान तथा चुनाव आयोग का पक्षपातपूर्ण रवैये को भी बाक़ायदा दाल के कंकड़ों की तरह देखा जा सकता है। 2018 की पहली छमाही के दौरान यदि मोदी-लहर की वापसी नहीं हो पायी तो फ़िलहाल, ऐसे कोई आसार नहीं दिखते कि साल की दूसरी छमाही में कोई बीजेपी को बीते हुए दिन लौटा पाएगा!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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बिहार : समस्तीपुर में डेयरी संयंत्र, भोजपुर में पशु आहार कारखाना लगेंगे

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dairy products

मोतिहारी, 19 जनवरी | बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने यहां शनिवार को कहा कि अगले वित्तीय वर्ष 2019-20 में बिहार राज्य दुग्ध सहकारी संघ लिमिटेड (कम्फेड) द्वारा समस्तीपुर में पांच लाख लीटर प्रतिदिन क्षमता के डेयरी संयंत्र और भोजपुर के बिहिया में 300 मीट्रिक टन प्रतिदिन उत्पादन क्षमता के पशु आहार कारखाने लगाए जाएंगे। पूर्वी चंपारण जिले के मठबनवारी में 11 महीने के रिकार्ड समय में बन कर तैयार मदर डेयरी के प्रति दिन एक लाख लीटर क्षमता के दूध प्रसंस्करण संयंत्र का शनिवार को उद्घाटन करने के बाद बिहार के उपमुख्यमंत्री ने कहा कि इस संयंत्र द्वारा मार्च से 1250 गांवों के 50 हजार किसानों से प्रतिदिन 2 लाख लीटर दूध का संग्रह किया जा सकेगा।

उन्होंने कहा कि अब सुधा व मदर डेयरी, दोनों मिलकर किसानों से दूध खरीदेगी।

मोदी ने कहा, “वर्तमान वित्तीय वर्ष में सुपौल में एक लाख लीटर क्षमता का डेयरी संयंत्र, समस्तीपुर व हाजीपुर में 30-30 मीट्रिक टन के दूध पाउडर संयंत्र, पटना व नालंदा में 20-20 हजार किलो दैनिक क्षमता के आइसक्रीम प्लांट स्थापित किए जाने के साथ ही पटना में पूर्व से स्थापित 100 मीट्रिक टन क्षमता के पशु आहार फैक्ट्री को 150 मीट्रिक टन में विस्तारित और 150 मीट्रिक टन की नई इकाई स्थापित की गई है।”

डेयरी स्थापित करने वाले किसानों को सरकार द्वारा 50 प्रतिशत तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को 66 प्रतिशत अनुदान दिए जाने का दावा करते हुए उन्होंने कहा कि किसानों की आमदनी केवल धान, गेहूं की खेती करने से दोगुनी नहीं होगी, बल्कि इसके लिए समग्र रूप से वानिकी, डेयरी, मछली और मुर्गी पालन को अपनाना होगा।

उन्होंने कहा कि फिलहाल बिहार में प्रतिदिन 18 लाख किलो दूध का संग्रह व 14 लाख लीटर की मार्केटिंग सुधा डेयरी द्वारा की जा रही है।

इस मौके पर केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह, बिहार सरकार में मंत्री प्रमोद कुमार, राणा रणधीर सिंह समेत कई अधिकारी और नेता मौजूद थे।

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मुकेश अंबानी ने ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ अभियान का आह्वान किया

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mukesh ambani

गांधीनगर, 18 जनवरी | औपनिवेशीकरण के खिलाफ महात्मा गांधी के अभियान को याद करते हुए रिलायंस इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक मुकेश अंबानी ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करने की गुजारिश की और कहा कि भारतीय डेटा भारतीयों के ‘स्वामित्व और नियंत्रण’ में होने चाहिए। उन्होंने यहां वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट 2019 में कहा, “हम अपने राष्ट्रपिता को उनकी 150वीं जयंती के वर्ष में श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। गांधी जी ने राजनीतिक औपनिवेशीकरण के खिलाफ आन्दोलन चलाया था.. आज हम सब मिलकर डेटा औपनिवेशीकरण के खिलाफ नया अभियान शुरू कर रहे हैं।” इस समिट का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था।

अंबानी ने कहा कि डेटा नई दुनिया में ‘नया तेल और धन’ है। उन्होंने कहा कि भारत के डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण भारतीय लोगों के हाथ में ही होना चाहिए और कॉर्पोरेट्स द्वारा नहीं किया जाना चाहिए, खासतौर से वैश्विक कॉर्पोरेशंस द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “माननीय प्रधानमंत्री, मैं आश्वस्त हूं कि आप अपने डिजिटल इंडिया मिशन के प्रमुख लक्ष्यों में इसे भी शामिल करेंगे।”

उन्होंने कहा, “भारत को इस डेटा संचालित क्रांति में सफल होने के लिए, हमें भारतीय डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण वापस भारत भेजना होगा.. दूसरे शब्दों में भारतीय संपत्ति वापस लौटानी होगी। भारतीय डेटा को भरतीयों द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए, न कि वैश्विक कॉर्पोरेट्स द्वारा। डेटा का नियंत्रण हमें अपने हाथों में लेने के लिए अभियान चलाने की आवश्यकता है।”

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अक्टूबर में कहा था कि सभी डिजिटल भुगतान कंपनियों जैसे गूगल प्ले, वाट्सएप और अन्य को अपने भारतीय कारोबार का डेटा स्थानीय तौर पर स्टोर करना चाहिए।

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ओपिनियन

बसपा-सपा गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं : शीला दीक्षित

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sheila dikshit-min

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कहना है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं मिल रहे हैं, लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस के परिणाम चौंकाने वाले होंगे।

शीला दीक्षित ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, “उनको एक साथ आने दीजिए। वे मिलते और जुदा होते रहे हैं और फिर साथ आ रहे हैं। मेरा अभिप्राय यह है कि उनमें स्थिरता नहीं है और वे स्थायित्व के संकेत नहीं दे रहे हैं। अब आगे देखते हैं।”

तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं दीक्षित (80) सपा और बसपा गठबंधन को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रही थीं। सपा और बसपा ने कांग्रेस को महागठबंधन से अलग रखते हुए प्रदेश में 80 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए एक गठबंधन किया है। दीक्षित को 10 जनवरी को दिल्ली कांग्रेस की कमान सौंपी गई।

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने से पहले शीला दीक्षित को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था। दीक्षित ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीद क्षीण पड़ गई है।

दीक्षित की टिप्पणी से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेता चुनाव अभियान के दौरान सपा और बसपा को निशाना बनाएंगे, जबकि उनका सीधा मुकाबला सत्ताधारी पार्टी भाजपा से होगा।

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है, लेकिन पार्टी ने भाजपा को शिकस्त देने वाले सेक्यूलर दलों के लिए दरवाजा खुला रखा है।

उत्तर प्रदेश में पार्टी नेता उम्मीदवारों को बता सकते हैं कि कांग्रेस ही नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से बाहर कर सकती है और भाजपा को शिकस्त दे सकती है।

कांग्रेस इस बात पर बल देंगे कि इस चुनाव के नतीजों से प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि देश का प्रधानमंत्री चुना जाएगा।

लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो ही सीटें बचा पाई थीं, जबकि उससे पहले 2009 में पार्टी ने 21 सीटों पर जीत हासिल की थी, जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) दूसरी बार केंद्र की सत्ता को बरकार रख पाई थी।

दीक्षित ने कहा कि उनसे कहा जाएगा तो वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी, लेकिन वह दिल्ली पर अपना अधिक ध्यान केंद्रित करेंगी क्योंकि उनको यहां काफी काम करना है।

उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी को कांग्रेस द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करने का अनुमोदन किया।

उन्होंने कहा, “पार्टी को इस पर फैसला लेने दीजिए। हम चाहते हैं और खासतौर से मैं चाहती हूंं और हमारे बीच अधिकांश लोग चाहते हैं। लेकिन इस पर पूरी पार्टी द्वारा फैसला लिया जाएगा।”

गैर-भाजपा दलों में प्रधानमंत्री का पद विवादास्पद मसला है। राहुल गांधी ने खुद भी कहा कि इसका फैसला चुनाव के बाद लिया जाएगा और पहला काम नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित करना है।

संपूर्ण भारत में महागठबंधन की संभावना पर पूछे जाने पर दीक्षित ने कहा कि लोग इस दिशा में प्रयासरत हैं, लेकिन इस पर अभी पूरी सहमति नहीं बन पाई है।

विपक्षी दलों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में गठबंधन की संभावना कम है, लेकिन भाजपा को शिकस्त देने के लिए राज्य विशेष में गठबंधन होगा।

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