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मोदी राज की सबसे ग़ैर-मामूली घटना है ‘रेपिस्ट समर्थक मंत्री बनो’ योजना…!

अभी तो संघ प्रमुख मोहन भागवत की ओर से तो ये यक्ष-प्रश्न उछाला ही नहीं गया है कि काँग्रेस के ज़माने में कितने बलात्कार और हत्याएँ होती थीं! राहुल गाँधी पहले अपनी चार पीढ़ियों के राज में हुए रेप का ब्यौरा दें, फिर उनके कैंडल-मार्च को गम्भीरता से लेने पर विचार किया जा सकता है!

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Deputy CM Kavinder Gupta

‘कठुआ रेप एंड मर्डर मामूली घटना है!’ और ‘इतने बड़े देश में कठुआ और उन्नाव जैसी घटनाएँ होती रहती हैं! इसे लेकर बात का बतंगड़ नहीं बनाना चाहिए!’ ये दोनों बयान बीजेपी के दो वरिष्ठ नेताओं के हैं। ‘मामूली घटना’ बताने वाले कविन्द्र गुप्ता को जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री का ताज मिला है तो ‘बतंगड़’ सिद्धान्त के प्रतिपादक और परम विद्वान सन्तोष गंगवार, मोदी सरकार में राज्यमंत्री के आसान पर शोभायमान हैं!

यदि इतना पढ़कर आप क्रोधित हो रहे हों, जो ज़रा ये भी जान लीजिए कि इन दोनों और लाखों भक्तों के गुरु घंटाल श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी उर्फ़ प्रधानमंत्री सेवक उर्फ़ माननीय चौकीदार महाशय उर्फ़ ज़नाब नसीबवाला साहब का तो मानना है कि ‘कठुआ रेप को लेकर आरोप-प्रत्यारोप नहीं होना चाहिए!’ जन्म-जन्मान्तर से ‘आरोप-प्रत्यारोप’ से बचते आये मितभाषी मोदी तो कठुआ रेप एंड मर्डर से इस क़दर सदमे में जा डूबे थे कि भारत में प्रवास के दौरान उसके मुँह से रविशंकर प्रसाद की शैली में ‘कड़ी भर्त्सना’ का बोल तक नहीं फूट सका!

वो तो भला हो मोदी जी की विदेश यात्रा का, जिसमें साफ़ और ताज़ा हवा के सेवन के बाद उनकी सुध-बुध वापस लौट पायी। तब कहीं जाकर लन्दन में वो बोल पाये कि ‘एक बेटी के साथ अत्याचार कैसे सहन कर सकते हैं! मैंने लाल क़िले से कहा था कि बेटियों से सवाल करने वाले बेटों से सवाल क्यों नहीं करते? बेटी के साथ जघन्य अपराध करने वाला भी तो, किसी का बेटा ही होता है!’

अब देश की आदत तो रही ही नहीं कि वो अपने नेता की किसी पते की बात पर ग़ौर करे और द्रवित हो। क्योंकि जब रात-दिन जुमलों की फेंका-फेंकी ही होती रहेगी तो काम की बात को पकड़ना, हर किसी के लिए मुश्किल ही होता जाएगा। बहरहाल, जनता ने जब अपने लफ़्फ़ाज़ चौकीदार की बातें नहीं सुनी तो उसने उस लाल क़िले की ही पहचान बदल देने का फ़ैसला ले लिया जहाँ से उसने जनता को अपनी आँखें खोलने का सन्देश दिया था। लाल क़िले को अब डालमिया समूह के हवाले करने के पीछे की सबसे बड़ी वजह यही है।

इससे पहले अत्यन्त बहादुरी दिखाते हुए 56 इंची वाले के चेलों ने अध्यादेश लाकर उस POSCO क़ानून को बदल दिया, जिसका कठुआ कांड पर कोई असर नहीं पड़ सकता। क्योंकि आपराधिक दंड विधान के मुताबिक़, किसी भी अपराध की सज़ा को किसी भी पिछली तारीख़ से प्रभावी नहीं किया जा सकता। ज़ाहिर है कि जब अगली ‘मामूली घटना’ यानी किसी मासूम के साथ रेप होगा तो नये अध्यादेश के मुताबिक़, मुक़दमा चलाया जाएगा, वो भी तब यदि रेपिस्टों के समर्थन में संघियों ने तिरंगा चमकाकर रैलियाँ नहीं निकाली तो…!

बाक़ी, यदि रेप में ‘आरोप-प्रत्यारोप’ और ‘बतंगड़’ बनाने की गुँजाइश हुई तो आसाराम और गुरमीत राम रहीम फ़ार्मूले का इस्तेमाल किया जाएगा! वो भी तभी जब विजय रुपाणी वाले नारद जी, त्रिपुरा के परम प्रतापी मुख्यमंत्री बिप्लव देब के कान में ज्ञान-मंत्र फूँकेंगे कि इंटरनेट से पता चला है कि महाभारत काल में राजकुमारी द्रौपदी का जब भरे राज दरबार चीरहरण हो सकता है तो देश की आम महिलाओं की बिसात ही क्या है!

अभी तो संघ प्रमुख मोहन भागवत की ओर से तो ये यक्ष-प्रश्न उछाला ही नहीं गया है कि काँग्रेस के ज़माने में कितने बलात्कार और हत्याएँ होती थीं! राहुल गाँधी पहले अपनी चार पीढ़ियों के राज में हुए रेप का ब्यौरा दें, फिर उनके कैंडल-मार्च को गम्भीरता से लेने पर विचार किया जा सकता है! इतना ही नहीं, ममता बनर्जी भी पहले ये साफ़ करें कि पश्चिम बंगाल में होने वाले रेप की रोकथाम में वो सफल क्यों नहीं हुई?

जब तक इन सवालों का जबाब देश के सामने नहीं होगा, तब तक पेट्रोल-डीज़ल का दाम कुलाँचे भरता रहेगा, नोटबन्दी में बन्द हुए 1000/500 के नोट गिने ही जाते रहेंगे, ‘विकास’ नज़रबन्द ही रहेगा, कालाधन भूमिगत ही रहेगा, दलितों पर अत्याचार जारी रहेंगे, बेरोज़गारों की फौज़ बढ़ती रहेगी, जजों की रहस्यमय मौत होती रहेगी, नीरव-चोकसी-माल्या-ललित देश को लूटकर फ़ुर्र होते रहेंगे, सुप्रीम कोर्ट के जज ख़तरे में फँसे लोकतंत्र को बचाने की दुहाई देते रहेंगे, अविश्वास प्रस्ताव की गरिमा तार-तार होती रहेगी, चीन और पाकिस्तान के साथ बग़ैर एजेंडा वाली शिखर बैठकें होती रहेंगी! जनता के ख़ून-पसीने की कमाई पर सैर-सपाटा होता रहेगा! अर्थव्यवस्था, आईसीयू में कोमा में पड़ी रहेगी! क्योंकि ये सब तो रेप से कहीं अधिक ‘मामूली’ हैं!

एक बात और गाँठ बाँध लीजिए कि जम्मू-कश्मीर के नवनियुक्त उपमुख्यमंत्री को शपथ लेते ही कठुआ रेप एंड मर्डर कांड के ‘मामूली’ होने का दिव्य ज्ञान यूँ ही नहीं प्राप्त हो गया! ऐसा मोदी राज की चमत्कारी ‘रेपिस्ट समर्थक मंत्री बनो’ योजना के सफल क्रियान्वयन की वजह से ही हो पाया है!

दरअसल, बीजेपी बुनियादी तौर पर एक चमत्कारी पार्टी रही है। लेकिन मोदी राज में तो तक़रीबन रोज़ाना ही कोई न चमत्कार होता है! बीजेपी का ताज़ा चमत्कार ये है कि रेपिस्टों के समर्थन में तिरंगा चमकाओ, रैली निकालो और मंत्री पद पाओ!

तभी तो जम्मू-कश्मीर की महबूबा मुफ़्ती सरकार में बीजेपी के कोटे से मंत्री बनाये गये लोगों में वो विधायक भी शामिल है जिसने कठुआ रेप और हत्याकांड के आरोपियों के समर्थन में ज़ोरदार प्रदर्शन किया था।

जम्मू-कश्मीर सरकार तो पूरी की पूरी चमत्कारों से भरी पड़ी है। सबसे बड़ा और बुनियादी चमत्कार तो वहाँ का गठबन्धन है। एक ओर उत्कट राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी जिसकी नीति है, रेपिस्टों का समर्थन तो दूसरी तरफ़ है पीडीपी, जो अलगाववादियों का समर्थन करके गौरवान्वित होती रही है!

ऐसे चमत्कार को ही शास्त्रों में ‘एक ही घाट पर शेर और बकरी के पानी पीने’ की उपमा दी गयी है! ऐसा चमत्कार सिर्फ़ इसलिए मुमकिन हो पाता है कि बीजेपी हो या पीडीपी, दोनों का एजेंडा साफ़ है कि उसूल सिर्फ़ विरोधियों के लिए होने चाहिए, हमें तो हर हाल में सत्ता चाहिए!

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

ओपिनियन

राहुल गांधी कर सकते हैं मप्र में मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा : कमलनाथ

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kamal nath

नई दिल्ली, 7 मई | मध्यप्रदेश कांग्रेस के नए अध्यक्ष कमलनाथ का कहना कि पार्टी में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करने की परंपरा नहीं है। मगर, जरूरत पड़ी तो पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर सकते हैं।

कमलनाथ ने कहा कि मध्यप्रदेश के लोग शिवराज सिंह चौहान की सरकार की ‘ठगी’ से नाराज हैं और कांग्रेस ने इस साल के आखिर में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव में उन्हें हराने के लिए कमर कस ली है।

उन्होंने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “बेशक, समय कम है मगर मुझे पक्का विश्वास है कि मैं गांव स्तर पर पार्टी के संगठन को मजबूत बनाने में सक्षम साबित होऊंगा। यह मुकाबला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की संगठन-शक्ति व पैसे की ताकत के साथ है।”

कांग्रेस के 71 वर्षीय वरिष्ठ नेता और छिंदवाड़ा से सांसद कमलनाथ नौ बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। उन्होंने कहा कि आगामी चुनाव के मद्देनजर पार्टी की प्रदेश इकाई में बदलाव संबंधी फैसला बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था। लेकिन वह अब बीती बातों पर नुक्ताचीनी नहीं करना चाहते कि इस संबंध में फैसला पहले क्यों नहीं लिया गया।

पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ को 26 अप्रैल को मध्यप्रदेश कांग्रेस की प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने कहा कि उनका कोई गुट नहीं है और पार्टी के सभी नेताओं से उनके अच्छे रिश्ते हैं।

कमलनाथ की बातों से जाहिर होता है कि विधानसभा चुनाव में खुद उतरने को लेकर उन्होंने अपना विकल्प खुला रखा है। उन्होंने कहा, “मैं 40 साल से चुनाव लड़ता आ रहा हूं। बतौर सांसद मेरा सेवाकाल सबसे लंबा रहा है।”

जब पूछा गया कि क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया विधानसभा चुनाव मैदान में उतरेंगे तो उन्होंने कहा, “मुझे नहीं मालूम।”

मध्यप्रदेश में कांग्रेस द्वारा मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं किए जाने और सिंधिया को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख नियुक्त कर संतुलन कायम किए जाने के संबंध में पूछे गए सवालों पर कमलनाथ ने कहा, “मध्यप्रदेश एक बड़ा राज्य है और यहां कोई एक शख्स चुनाव नहीं जीत सकता। आपको कई चेहरों की जरूरत होती है। यही कारण है कि पार्टी ने ऐसा फैसला लिया है।”

जब पूछा गया कि क्या वह चाहेंगे कि पार्टी मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करे तो उन्होंने कहा कि हर राज्य के लिए अगल रणनीति होती है।

कमलनाथ ने कहा, “कभी-कभी यह जरूरी होता है, जबकि कभी इसकी जरूरत नहीं होती। क्या भाजपा ने उत्तर प्रदेश में किसी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया था? क्या उन्होंने उत्तराखंड में किसी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया? उनका कभी कोई मुख्यमंत्री उम्मीदवार (चुनाव से पूर्व) नहीं था। इसलिए यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है।”

कमलनाथ ने इससे पहले अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि पार्टी को हर राज्य में बताना चाहिए कि वहां उसका नेता कौन है। इसका जिक्र करने पर उन्होंने कहा, “अगर जरूरत महसूस होगी तो कांग्रेस अध्यक्ष किसी के नाम की घोषणा करेंगे।”

कमलनाथ ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख के तौर पर उनकी प्राथमिकता पार्टी को गांव स्तर पर मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा, “चुनाव बहुत मायने में स्थानीय बन गया है और हमें यह समझना होगा।”

कांग्रेस को मध्यप्रदेश में पिछले तीन विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा है। कमलनाथ का आरोप है कि भाजपा पूर्व में किए अपने वादों को पूरा करने में विफल रही है।

पार्टी के प्रदेश प्रमुख के तौर पर अपनी नियुक्ति के संबंध मे कमलनाथ ने कहा, “मेरे सभी से अच्छे रिश्ते हैं। इसलिए मेरे लिए पार्टी में एकता लाना कोई चुनौती नहीं है। मैं भाग्यशाली हूं कि इसकी कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि पार्टी में पहले से ही एकता है।” उन्होंने पार्टी में सिंधिया के साथ किसी भी प्रकार के मतभेद से इनकार किया।

कमलनाथ ने कहा कि उनका मुकाबला अभी वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज से है।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

अंबेडकर ने नहीं सीखा था अन्याय के आगे झुकना

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Bhim-Rao-Ambedkar

कबीरपंथी परिवार में जन्मे डॉ. भीमराव अंबेडकर अपनी 127वीं जयंती के मौके पर भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितना संविधान के निर्माण के बाद और दलितों के संघर्ष के दौरान थे। दलितों और पिछड़ों को वोट बैंक समझने वाले सभी दल आज अंबेडकर को अपना मार्गदर्शक और प्रेरणा पुंज कहते नहीं अघाते हैं।

अंबेडकर के नाम पर कसमें खाई जाती हैं, आंदोलन किए जाते हैं और यह संदेश देने की पुरजोर कोशिशें की जाती हैं कि दलितों का सबसे बड़ा सिपहसालार कौन है। लेकिन यह भी हकीकत है कि राजनीति के मौजूदा बदले हुए तेवर में अगर वाकई कोई पीछे छूटता जा रहा है तो वह है सिर्फ और सिर्फ भीमराव अंबेडकर।

विलक्षण प्रतिभा के धनी भीमराव बेहद निर्भीक थे। वे न चुनौतियों से डरते थे, न झुकते थे। लड़ाकू और हठी अंबेडकर ने अन्याय के आगे झुकना तो जैसे सीखा ही न था।

14 अप्रैल, 1891 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के केंद्रीय प्रांत (मध्य प्रदेश) के इंदौर के पास महू नगर की छावनी में एक महार परिवार में माता-पिता की 14वीं संतान के रूप में जन्मे भीमराव के पिता की मृत्यु बालपन में ही हो गई थी। 1897 में बॉम्बे के एलफिन्सटोन हाईस्कूल में पहले अस्पृश्य के रूप में दाखिला लेकर 1907 में मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। पढ़ाई के दौरान ही 15 साल की उम्र में 1906 में 9 साल की रमाबाई से इनकी शादी हुई।

अंबेडकर ने अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र में डिग्री हासिल की। हिंदू धर्म में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव और छुआछूत से दुखी होकर उन्होंने इसके खिलाफ संघर्ष भी किया, लेकिन विशेष सफलता न मिलने पर इस धर्म को ही त्याग दिया। 14 अक्टूबर, 1956 को उन्होंने लाखों दलितों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। यह क्रम निरंतर जारी है।

कहा जाता है कि दलित मुद्दों पर अंबेडकर के गांधीजी से मतभेद रहे हैं। पत्रिका ‘हरिजन’ के 18 जुलाई, 1936 के अंक में अंबेडकर के ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ की समीक्षा में गांधीजी ने जोर दिया था कि हर किसी को अपना पैतृक पेशा जरूर मानना चाहिए, जिससे अधिकार ही नहीं, कर्तव्यों का भी बोध हो। यह सच्चाई है कि ब्रिटिश शासन के डेढ़ सौ वर्षों में भी अछूतों पर होने वाले जुल्म में कोई कमी नहीं आई थी, जिससे अंबेडकर आहत थे।

लेकिन धुन के पक्के अंबेडकर ने गोलमेज कॉन्फ्रें स में जो तर्क रखे, वो इतने ठोस और अधिकारपूर्ण थे कि ब्रिटिश सरकार तक को उनके सामने झुकना पड़ा और 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मैक्डोनल्ड ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के लिए एक तात्कालिक योजना की घोषणा की जिसे कम्युनल अवार्ड के नाम से जाना गया। इस अवार्ड में अछूत कहे जाने वाले समाज को दोहरा अधिकार मिला। पहला यह कि वे सुनिश्चित सीटों की आरक्षित व्यवस्था में अलग चुनकर जाएंगे और दूसरे में दो वोटों का अधिकार मिला। एक वोट आरक्षित सीट के लिए और दूसरा वोट अनारक्षित सीट के लिए। इसके बाद बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का कद समाज में काफी ऊंचा हो गया।

उनकी अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग का गांधीजी ने पुरजोर विरोध कर एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। उनकी दलील थी कि इससे हिंदू समाज बिखर जाएगा, लेकिन जब अंबेडकर जीत गए तो गांधीजी ने पूना पैक्ट (समझौता) पर दस्तखत के लिए उन्हें मजबूर कर दिया और आमरण अनशन पर चले गए।

गांधीजी की बिगड़ती तबीयत और उससे बढ़ते दबाव के चलते अंबेडकर 24 सितंबर, 1932 की शाम येरवदा जेल पहुंचे, जहां पर दोनों के बीच समझौता हुआ। इसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। समझौते के तहत डॉ. अंबेडकर ने दलितों को कम्युनल अवार्ड में मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार को छोड़ने की घोषणा की, लेकिन इसी में 78 आरक्षित सीटों को बढ़ाकर 148 करवाया। साथ ही अस्पृश्य लोगों के लिए हर प्रांत में शिक्षा अनुदान के लिए पर्याप्त रकम की व्यवस्था के साथ नौकरियों में बिना किसी भेदभाव के दलित वर्ग के लोगों की भर्ती को सुनिश्चित कराया।

उन्हें हालांकि इसके क्रियान्वयन की चिंता थी, तभी तो 25 सितंबर 1932 को बंबई में सवर्ण हिंदुओं की बहुत बड़ी सभा में अंबेडकर ने कहा, “हमारी एक ही चिंता है, क्या हिंदुओं की भावी पीढ़ियां इस समझौते का अनुपालन करेंगी?” इस पर सभी सवर्ण हिंदुओं ने एक स्वर में कहा था कि करेंगे।

डॉ. अंबेडकर ने यह भी कहा था, “हम देखते हैं कि दुर्भाग्यवश हिंदू संप्रदाय एक संघटित समूह नहीं है, बल्कि विभिन्न संप्रदायों का फेडरेशन है। मैं आशा और विश्वास करता हूं कि आप अपनी तरफ से इस अभिलेख को पवित्र मानेंगे तथा सम्मानजनक भावना से काम करेंगे।”

लेकिन आज जो हो रहा है, क्या इसी भाव से हो रहा है? कहीं अंबेडकर के नाम पर जोड़-तोड़ की कोशिशें तो कहीं इस कोशिश पर ऐतराज की नई राजनीति शुरू हो गई है। यह सच है कि दलितों के शोषण और अत्याचार का एक सदियों पुराना और लंबा सिलसिला है जो अब भी किसी न किसी रूप में बरकरार है।

गुलाम भारत में अंबेडकर के राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष ने दलितों को जहां राह दिखाई, वहीं आजाद भारत में दलितों के सम्मानजनक स्थान के लिए मार्ग भी प्रशस्त किया। लेकिन लगता नहीं कि आत्मसम्मान और गरिमा की लड़ाई में दलित समुदाय अब भी अकेला है। अंबेडकर का उपयोग सभी दल करना चाहते हैं।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्कूल में पढ़ते समय भीम की प्रतिभा और लगन को देखकर महादेव अंबेडकर नामक ब्राह्मण अध्यापक अपने बेहद प्रिय इस छात्र को दोपहर की छुट्टी के समय अपने भोजन से चावल, दाल, रोटी देते थे। यह अत्यधिक स्नेह ही था जो भीमराव का उपनाम सकपाल घराने के अंबेवाडी गांव के चलते अंबेवाडेकर से बदलकर अपना ब्राह्मण उपनाम अंबेडकर कर दिया, बल्कि स्कूल के रजिस्टर तक में बदल डाला।

इस तरह दलित भीम के नाम के साथ ब्राह्मण अंबेडकर का नाम सदैव के लिए जुड़ गया, लेकिन राजनीति की फितरत देखिए कि भीमराव अंबेडकर के नाम पर राजनीति थमने का नाम नहीं ले रही है, जबकि उनका स्थान शुरू से ही राजनीति से कहीं ऊपर था, है और रहेगा।

By : ऋतुपर्ण दवे

–आईएएनएस

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ओपिनियन

विफल होते क़ानूनों की वजह से ख़तरे में लोकतंत्र

बीते चार सालों में हमारे संवैधानिक लोकतंत्र की दो अहम विशेषताओं का पतन हुआ है। पहला, क़ानून के सर्वोपरि होने की धारणा पर हमले हुए हैं। दूसरा, क़ानूनी प्रक्रिया का सियासी मक़सद के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है।

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Kapil Sibal

संवैधानिक लोकतंत्र के दो अनिवार्य अंग हैं। पहला, इंसान नहीं, बल्कि क़ानून सर्वोपरि है। दूसरा, हरेक निर्वाचित प्रतिनिधि की सम्प्रभुता उन संस्थाओं की हैसियत से ऊपर है जो चुनाव से स्थापित नहीं होते। संवैधानिक लोकतंत्र में क़ानून का दर्ज़ा सबसे ऊपर है। यही संविधान की बुनियादी धारणा है। विधायिका किसी क़ानून के ज़रिये इसमें कटौती नहीं कर सकती। यदि विधायिका कभी ऐसा करे भी तो अदालतें ये सुनिश्चित करती हैं कि क़ानून ही सर्वोपरि है। निर्वाचित संस्थाएँ, संविधान के दायरे में ही अपना काम करती हैं और संविधान के मुताबिक़ ही समय-समय पर जनता के प्रति उनकी जबाबदेही तय होती है।

बीते चार सालों में हमारे संवैधानिक लोकतंत्र की दो अहम विशेषताओं का पतन हुआ है। पहला, क़ानून के सर्वोपरि होने की धारणा पर हमले हुए हैं। दूसरा, क़ानूनी प्रक्रिया का सियासी मक़सद के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है। स्थापित प्रक्रिया को दरकिनार किया जा रहा है। जनप्रतिनिधि ही एजेंडा की आवाज़ बन रहे हैं और उन मूल्यों को तहस-नहस कर रहे हैं जो लोकतंत्र की बुनियाद हैं। हमारे कुछ जनप्रतिनिधि और एक ख़ास विचारधारा के लोग न सिर्फ़ हिंसा को उकसाते हैं, बल्कि कई बार उसका हिस्सा भी बनते हैं। संवैधानिक अधिकारों का गला घोटा जाता है। अभिव्यक्ति की आज़ादी इसका शिकार बनती है। लोकतांत्रिक संस्थाएँ अपाहिज़ हो रही हैं।

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने 131 मुक़दमों को वापस लेने का ऐलान किया। ये मामले हत्या और हत्या का प्रयास जैसे संगीन अपराधों से जुड़े थे। ये प्रसंग इस बात की मिसाल है कि कुछ लोग क़ानून से भी ऊपर हो सकते हैं। बेशक़, किसी मुक़दमें को लेकर यदि सरकारी वकील को तथ्यों के आधार पर ये लगे कि उसे वापस लेना ही उचित होगा तो अदालत की मंज़ूरी से मुकदमा वापस लिया जा सकता है। लेकिन राजनीतिक मक़सद से, एक ही झटके में 131 मुकदमों को वापस ले लेने का फ़ैसले की कल्पना भी लोकतंत्र में नहीं की जा सकती। हत्या या इसकी कोशिश की वजह तो राजनीतिक हो सकती है, लेकिन हत्या का होना राजनीतिक नहीं हो सकता।

सरकार में बैठे लोगों पर संगीन अपराधों के आरोप हों और अभियोजन की आँखों के सामने ही उसे रफ़ा-दफ़ा कर दिया जाए तो हालात को बेहद चिन्ताजनक समझिए। अभियुक्त नामी-गिरामी लोग हैं। सत्ता से उनकी नज़दीकी को नकारा नहीं जा सकता। मौजूदा दौर में जाँच एजेंसियों के दुरुपयोग करके राजनीतिक विरोधियों को भी निशाना बनाया जा रहा है। एक के बाद एक गवाहों का अपने बयान से मुकर जाना भी क़ानून के राज के लिए बेहद चिन्ताजनक है। जाँच एजेंसियों के सरकारी एजेंट बन जाने से सच का दमन हो रहा है। इसीलिए ज़रूरी है कि संगीन अपराधों के मामलों को सत्ता के नशे से दूर ही रखा जाए और दुर्भावनापूर्ण मुकदमें ठोंककर क़ानूनी प्रक्रिया का दमन नहीं हो।

क़ानूनी प्रक्रिया का पक्षपातपूर्ण हो जाना भी बेहद चिन्ताजनक है। दिन-दहाड़े होने वाले अपराधों की यदि प्रमाणिक जाँच नहीं होगी या जाँच में प्रभावशाली अभियुक्तों को बचाया जाएगा तो क़ानून के राज की गरिमा कैसे बचेगी? सरेआम बर्बरतापूर्वक हुई दलितों की पिटाई, घुड़सवारी करने की वजह से दलित की हत्या कर देना, धार्मिक जुलूसों के ज़रिये हिंसा फैलाना और इसमें पुलिस के शामिल होने पर क़ानून की क्या औक़ात रह जाएगी! हाल ही में हमने देखा कि पश्चिम बंगाल के आसनसोल में एक केन्द्रीय मंत्री ने दिन-दहाड़े लोगों को चमड़ी उधेड़ लेने की धमकी दी। ये बताता है कि देश में क़ानून के राज की धारणा कितनी तबाह हो चुकी है!

बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के अलावा कई स्थानों पर फैली हिंसा को अभी-अभी हमने क़रीब से देखा है। उत्तर प्रदेश में सारे नियम-क़ायदों को ताक़ पर रखकर पुलिस ऐसे मुठभेड़ों को अंज़ाम दे रही है, जिससे पता चलता है कि सरकार पर सत्ता का नशा किस क़दर सवार है और वो क़ानून को कितनी अहमियत दे रही है! ये नज़ारा उस सरज़मीं का है जो अपनी सहिष्णुता और आध्यात्म के लिए जाना जाता है। तानाशाही का उल्लंघन करने के लिए डाँडी मार्च का आयोजन किया गया था। लेकिन अभी तो सरकार ही तानाशाह बनकर रोज़ाना संविधान का उल्लंघन कर रही है।

जब क़ानून ही दमन का ज़रिया बन जाता है तो इसकी प्रतिष्ठा गिरती है। जाँच एजेंसियाँ जब कठोर क़ानूनों का दुरुपयोग करती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे किसी राजा के हाथों में तलवार हो! ऐसे दुरुपयोग से आप किसी की भी प्रतिष्ठा को तार-तार कर सकते हैं। बीते चार वर्षों ने हमने ऐसे दुरुपयोग बहुत व्यापक स्तर पर देखे हैं। क़ानून का उद्देश्य है, इंसाफ़ करना। लेकिन इसे तो नाइंसाफ़ी का हथकंडा बना दिया गया है। क़ानून का दुरुपयोग होने की वजह से तमाम लोकतांत्रिक संस्थाएँ लाचार हो जाती हैं। यही वजह है कि हाल ही में कई न्यायिक आदेशों ने अभियोजन पक्ष को दुर्भावनापूर्ण पाकर उसके आरोपों को ख़ारिज़ कर दिया है।

ज़रा सोचिए कि यदि झूठे और दुर्भावनापूर्ण आरोपों की वजह से एक व्यक्ति को 8-10 साल जेल में काटने पड़ें, इसकी उसकी ज़िन्दगी तबाह हो जाए, तब उसे हुए नुकसान की भरपाई कैसे होगी? हुक़ूमत तो इसका ख़ामियाज़ा भरती नहीं! इसीलिए ज़रूरी है कि हमारा लोकतंत्र अपने नागरिकों को क़ानून के दुरुपयोग से होने वाले ज़ुल्म से बचाए।

एक और पहलू भी चिन्ताजनक है। क़ानून सर्वोपरि है। न्यायपालिका इसकी पहरेदार है। लेकिन दुर्भाग्यवश आज न्यायपालिका की प्रक्रिया और उसकी सुचिता पर सरेआम सवाल उठाये जा रहे हैं। न्यायपालिका को भी सामूहिक रूप से ये सुनिश्चित करना होगा कि कोई उसे शक़ की नज़र से न देखे। यदि ऐसा नहीं होगा तो हमारा लोकतंत्र विफल हो जाएगा। इसीलिए न्यायपालिका ने भी कई बार अपनी गम्भीर चिन्ताएँ ज़ाहिर की हैं। इसके बावजूद, सुधारवादी उपाय होते नहीं दिख रहे। जब सत्तासीन लोग न्यायपालिका की स्वतंत्रता के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे, तब ये मानकर चलिए कि हमारा संविधान और उसकी व्यवस्थाएँ ख़तरे में हैं। बक़ौल लार्ड डेनिंग, ‘आप चाहे जितने बड़े हों, क़ानून आपसे भी ऊपर है।’ न्यायपालिका को इसी सिद्धान्त के मुताबिक़, निर्भय और निर्भीक होकर अपना काम करना चाहिए। लेकिन हमारे लोकतंत्र में कुछ लोगों ने ये धारणा पाल ली है कि वो क़ानून से भी ऊपर हैं। ऐसे में क़ानून को ही उनकी ग़लतफ़हमी दूर करनी होगी।

हमें उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि मौजूदा दौर से भी हमारा लोकतंत्र परिपक्व ही होगा। इतिहास में यही दर्ज होगा। एक नागरिक के तौर पर जब तक हम अपने लोकतंत्र को विफल नहीं कर देंगे, तब तक लोकतंत्र भी हमें विफल नहीं होने देगा। क़ानून को उन्हें बौना बनाना होगा जो हमारे लोकतंत्र की बुनियाद पर हमले कर रहे हैं।

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस। लेखक, वरिष्ठ काँग्रेस नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं।)

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कांग्रेस कर्नाटक में 115-120 सीटें जीतेगी : अहमद पटेल

Supreme_Court_of_India
ब्लॉग4 weeks ago

ज़रा देखिए तो कि न्यायपालिका के पतन की दुहाई कौन दे रहा है!

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लाइफस्टाइल4 weeks ago

झड़ते बालों के लिए इस्‍तेमाल कीजिए ये घरेलू नुस्‍खा…

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ब्लॉग2 weeks ago

मोदी-लहर का कच्चा चिट्ठा

Deputy CM Kavinder Gupta
ओपिनियन4 weeks ago

मोदी राज की सबसे ग़ैर-मामूली घटना है ‘रेपिस्ट समर्थक मंत्री बनो’ योजना…!

tejashwi
राजनीति1 week ago

तेजस्वी बोले, ‘राज्यपाल मुझे भी दें सरकार बनाने का मौका’

राष्ट्रीय5 days ago

दिल्ली से विशाखापट्टनम जा रही आंध्र प्रदेश एक्‍सप्रेस के 4 कोच में लगी आग

thug_ranjha
मनोरंजन5 days ago

‘ठग रांझा’ दुनियाभर में सबसे अधिक देखा गया भारतीय वीडियो

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राष्ट्रीय1 week ago

कर्नाटक के नाटक से आहत यशवन्त सिन्हा, राष्ट्रपति भवन के बाहर धरने पर बैठे

kapil sibal
राजनीति2 weeks ago

कर्नाटक चुनाव: बीजेपी प्रत्‍याशी श्रीमुलु की उम्‍मीदवारी रद्द करने की कांग्रेस ने EC से की मांग

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राजनीति3 weeks ago

जिन्ना और श्यामा प्रसाद के ज़रिये संजय सिंह का बीजेपी पर करारा हमला

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मनोरंजन4 weeks ago

सोना महापात्रा को छोटे कपड़ों में सूफी गाना गाने पर मिली धमकी

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मनोरंजन1 month ago

करीना की फिल्म ‘वीरे दी वेडिंग’ का ट्रेलर लॉन्च

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शहर1 month ago

एयर इंडिया के प्लेन में उड़ान के दौरान गिरी खिड़की

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खेल1 month ago

आईपीएल-11: गेल के शतक से पंजाब ने दर्ज की तीसरी जीत

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नेहा कक्कड़ ने बॉयफ्रेंड हिमांश कोहली को बनाया ‘हमसफर’, देखें वीडियो

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