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स्पीकर और राज्यपाल की भी लक्ष्मण रेखा तय हो

लोकतंत्र को विनाश से बचाने के लिए हमें आमसहमति बनाकर क़ानून को बदलना होगा

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वो चाहे अपनी मर्ज़ी से चलें या एक-दूसरे से तालमेल बिठाकर, लेकिन स्पीकर और राज्यपाल किसी राज्य सरकार की तक़दीर बदल सकते हैं। राज्यपाल के पास तो ये अधिकार है कि वो किसी की भी सरकार को बनवा दे और फिर उसे बहुमत साबित करने के लिए पर्याप्त वक़्त भी दे दे। राज्यपाल का विवेकाधिकार तो उन्हें, या तो सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए बुलाने की छूट दे देता है या फिर वो उस धड़े की भी सरकार बनवा सकते हैं जिन्होंने चुनाव के बाद चटपट गठबन्धन बना लिया हो। फिर चाहे इसके लिए पूरी उदारता से धन या अन्य उपकारों का सहारा लिया गया हो। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि स्पीकर और राज्यपाल अपनी नियुक्ति के बाद भी अपनी पार्टी के हितों को साधने के लिए ही काम करते हैं। यही वजह है कि इन अहम संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों में जनता का भरोसा, बेहद मामूली सा ही होता है। इस तरह, राजनीतिक मक़सद के लिए संवैधानिक मूल्यों की बलि चढ़ा दी जाती है।

संविधान की जिस दसवीं अनुसूची को दलबदल की रोकथाम के लिए बनाया गया था, उसी की बदौलत अब दलबदलुओं की हिफ़ाज़त की जाती है। स्पीकर यानी विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका उस वक़्त बेहद अहम और नाज़ुक होती है जब दलबदल के पीछे या तो नयी सरकार को बनवाना होता है और फिर पुरानी सरकार को जीवनदान देकर उसे लम्बी उम्र देने की कोशिश की जाती है।

उदाहरणार्थ

तमिलनाडु में, स्पीकर उस वक़्त मुख्यमंत्री के लिए ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं, जब दसवीं अनुसूची के मुताबिक़ उन्हें दलबदल से सम्बन्धित याचिका पर फ़ैसला करना होता है। मार्च 2017 में मौजूदा उप मुख्यमंत्री और अन्नाद्रमुक पार्टी के 10 अन्य विधायकों की सदस्यता को रद्द करने के लिए स्पीकर को अर्ज़ी दी गयी, क्योंकि इन सभी ने फरवरी 2017 में हुए शक्ति परीक्षण के दौरान पार्टी व्हिप (परमादेश) का उल्लंघन किया था। मज़े की बात तो ये भी है कि इस अर्ज़ी पर आज तक स्पीकर ने व्हिप का उल्लंघन करने वाले विधायकों को नोटिस देकर उनसे अपना पक्ष रखने के लिए जबाब-तलब तक नहीं किया। लेकिन दूसरी ओर, जब 22 अगस्त 2017 को टीटीवी दिनाकरन गुट ने राज्यपाल को चिट्ठी लिखी कि उनका मुख्यमंत्री में विश्वास नहीं है, तो इस मामले में उसी स्पीकर ने असामान्य तत्परता दिखाते हुए दो दिन में ही 19 विधायकों को नोटिस जारी करके चटपट का फ़ैसला सुना दिया। स्पीकर ने सरकार के चीफ़ व्हिप की इस दलील को सही पाया कि विधायकों के रुख़ से साफ़ है कि उन्होंने पार्टी से नाता तोड़ लिया है। स्पीकर ने 18 विधायकों को तीन सप्ताह के भीतर अयोग्य घोषित कर दिया। क्योंकि फ़ैसला सुनाने से पहले एक विधायक वापस मुख्यमंत्री का समर्थक बन गया था। ये फ़ैसला भी तब आनन-फ़ानन में दिया गया, जब विपक्षी डीएमके ने हाईकोर्ट से गुहार लगायी कि वो शक्ति परीक्षण का आदेश दे। इसके बावजूद कई हफ़्तों तक दिनाकरन के अविश्वास प्रस्ताव पर सदन में मत-विभाजन नहीं हुआ। क्योंकि राज्यपाल ने शक्ति परीक्षण का आदेश नहीं दिया और अल्पमत की सरकार चलती रही।

स्पीकर संविधान के मुक़ाबले अपनी पार्टी और सरकार के प्रति ज़्यादा वफ़ादार थे। पहले मामले में कार्रवाई ही नहीं करना और दूसरे में 18 विधायकों को अयोग्य घोषित कर देने वाले, दोनों फ़ैसलों को हाईकोर्ट में चुनौती दी गयी। लेकिन दुर्भाग्यवश अदालत ने भी अपेक्षित बुद्धिमत्ता नहीं दिखायी। ये एक ऐसी मिसाल है, जिसमें न तो स्पीकर ने अपने कर्त्तव्य को निभाया, ना ही हाईकोर्ट ने ही स्पीकर को अयोग्यता वाली याचिकाओं पर जल्दी फ़ैसला लेने का निर्देश दिया। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने ये तय करने के लिए एक संविधान पीठ बना रखी है कि क्या हाईकोर्ट को ये अधिकार है कि वो स्पीकर को परमादेश (मैनडामस) दे सकता है? इस मामले की आड़ में हाईकोर्ट ने कहा कि वो संविधान पीठ के फ़ैसले का इन्तजार करेगा। इस आधार पर तो स्पीकर को भी उन याचिकाओं पर फ़ैसला देने से मना कर देना चाहिए था। लेकिन मज़े की बात ये भी रही कि जब दिनाकरन गुट के 18 विधायकों को अयोग्य ठहराने की बारी आयी तब हाईकोर्ट ने यही रुख़ क्यों नहीं दिखाया? यदि अदालत ने विधायकों को अयोग्य ठहराये जाने के फ़ैसले को रद्द कर दिया होता तो सरकार गिर भी सकती थी।

आन्ध्र प्रदेश में वाईएसआर काँग्रेस के 67 विधायकों में से 21 ने दलबदल कर लिया। इससे मुख्यमंत्री चन्द्र बाबू नायडु की स्थिति अभेद्य बन जाती। दलबदल करने वालों में कुछ कैबिनेट मंत्री भी थे। लेकिन स्पीकर ने दलबदलुओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं की और उनकी याचिका लम्बित ही रहीं। इसकी वजह को समझना मुश्किल नहीं है। यहाँ तक कि हाईकोर्ट भी ये कहकर मामले की सुनवाई से मुकर गया कि उसके पास 3.25 लाख मुक़कमें लम्बित हैं। ऐसे में हर मामले को नये मुक़दमें की तरह नहीं देखा जा सकता।

तेलंगाना में, तेलगू देशम पार्टी के 15 में से 12 विधायकों ने तेलंगाना राष्ट्र समिति का दमन थाम लिया। पहले टीडीपी के 8 विधायकों ने दलबदल किया, फिर 4 और उनके साथ हो लिये। विधायकों को अयोग्य घोषित करने की याचिका दायर हुई, लेकिन यथास्थिति बनी रही। आगे चलकर टीडीपी के बाक़ी बचे 3 विधायकों ने भी दलबदल कर लिया। दूसरी ओर, विधानसभा में काँग्रेस विधायक दल की संख्या भी 21 से घटकर 12 हो गयी लेकिन किसी भी दलबदलु की सदस्यता नहीं गयी, क्योंकि स्पीकर की महिमा अपरम्पार है!

स्पीकर के पक्षपात रवैये की पुरानी मिसालें भी हैं। 1997 में असंशोधित दसवीं अनुसूची के मुताबिक़, समाजवादी पार्टी ने बीएसपी के एक-तिहाई विधायकों से दलबदल करवा जनबसपा नाम की नयी पार्टी बनवा दी। उस प्रसंग ने दलबदल को वैधता दी। लेकिन जब तक इसे चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुनाया, तब तक विधानसभा की मियाद ख़त्म हो गयी। ऐसी ही दशा कई और राज्यों में भी होती रही है।

मज़ाक बने दिशानिर्देश

राज्यपालों ने भी ख़ुद को बेदाग़ नहीं बनाया। उन्होंने उस पार्टी के हितों के लिए सारी मर्यादाएँ तोड़ दीं, जिसने उन्हें नियुक्त किया था। इसीलिए पहले सरकारिया आयोग और फिर पुँछी आयोग ने स्पष्ट दिशानिर्देशों की सिफ़ारिश की जिसके मुताबिक़, चुनाव के बाद किसी राज्यपाल को कैसे काम करना चाहिए। लेकिन हम बार-बार देख रहे हैं कि राज्यपाल उन दिशानिर्देशों की अनदेखी करते हैं। अदालती फ़ैसलों में वक़्त लगता है, जबकि उसी वक़्त संवैधानिक मर्यादाओं की धज़्ज़ियाँ उड़ाकर राज्यपाल की ओर से लोकतंत्र का मज़ाक बनाया जाता है। अदालत के हरेक फ़ैसले के बाद राज्यपाल उसकी अनदेखी करते हैं। ताज़ा प्रसंग कर्नाटक का है, तो इससे पहले हम गोवा, मणिपुर और मेघालय में भी देख चुके हैं कि राज्यपाल कैसे राजनीतिक हित को साधने के लिए पक्षपात करते हैं। पहले भी, अरूणाचल प्रदेश के मामले में राज्यपाल के आचरण को सुप्रीम कोर्ट असंवैधानिक ठहरा चुका है। इसी तरह, उत्तराखंड के मामले में ही हाईकोर्ट ने राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश को ख़ारिज़ कर चुका है।

पहले भी राज्यपालों के संवैधानिक फ़ैसलों पर अदालतों ने तीख़ी टिप्पणियाँ की हैं। एसआर बोम्मई केस (1994) समेत कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों की बर्ख़ास्तगी को अवैध ठहराया है और राज्यपालों को केन्द्र सरकार का ऐजेंट बनकर काम नहीं करने की सिफ़ारिश की है। लेकिन फिर भी, तरह-तरह के अपवादों का पैदा होना जारी है।

इसीलिए अब ये बेहद ज़रूरी हो चुका है कि दसवीं अनुसूची और दलबदल के मामले में स्पीकर के कार्यक्षेत्र में सुधार किया जाए। इसके लिए संविधान में संशोधन बेहद ज़रूरी है। ताकि राज्यपालों के विवेकाधिकार और स्पीकर की मनमर्ज़ी के दायरे पर लग़ाम कसी जा सके। इन्हें लोकतंत्र और संविधान की भावना के अनुरूप ढाला जा सके। इसके लिए सरकार को आगे आकर आम सहमति बनानी चाहिए, ताकि लोकतंत्र को विनाश से बचाया जा सके। ये लोहे के चने चबाने जैसा है!
(साभार: द हिन्दू)

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नीरव तभी फ़ुर्र हुआ, जब नरेन्द्र ने चाहा…!

नरेन्द्र ने नीरव के भारत से फ़ुर्र होने से पहले उसे वो अद्भुत और पौराणिक कवच-कुंडल से भी सुसज्जित किया, जिसे महाभारत काल में सूर्य ने अपने पुत्र कर्ण को दिया था। और, जिसे देवराज इन्द्र ने अपने पुत्र अर्जुन की रक्षा के लिए ब्राह्मण का स्वांग रचकर कर्ण से दान में माँग लिया था।

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यदि आपको अब भी सन्देह है कि नरेन्द्र मोदी और नीरव मोदी में साँठगाँठ थी या नहीं? जो ज़रा इंटरपोल के ताज़ा ख़ुलासे का मतलब समझ लीजिए। इंटरपोल यानी दुनिया भर के पुलिस विभागों का सामूहिक संगठन। इसने बताया है कि जब पंजाब नैशनल बैंक से 13,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा लूटकर नीरव भाई फ़ुर्र हो गया, तब भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने तेज़ी से और कड़ा फ़ैसला लेकर उसके भारतीय पासपोर्ट का रद्द करने का ऐलान कर दिया। वैसे भी मोदी राज के 48 महीनों में इतने शानदार-शानदार ऐलान हुए हैं, जितना बीते दशकों के सभी ऐलानों को मिलाकर भी नहीं हो पाया!

अब जल्द ही आपको रेडियो पर एक बच्ची की आवाज़ में ये सरकारी विज्ञापन सुनायी देगा कि मोदी जी ने नीरव मोदी को भगाकर वैसे ही बहुत अच्छा काम किया है कि जैसे स्कूलों में शौचालय बने। 48 महीने पहले क्या किसी स्कूल में शौचालय था? संस्कृति मंत्रालय को ये पता लगाने का काम पुरातत्व विभाग को फ़ौरन सौंप देना चाहिए! इसी तरह, कौन नहीं जानता कि उज्ज्वला योजना के तहत ग़रीबों को रसोई गैस के पौने चार करोड़ कनेक्शन बाँटे गये। मोदी राज के इसी प्रयास की बदौलत तो आज देश के 80 फ़ीसदी घरों तक रसोई गैस पहुँच पायी है।

48 महीने में ही देश के हर गाँव में बिजली पहुँचा दी गयी। अब वो रेडियो वाली लड़की तो ये बताने से रही कि मोदी के सत्ता में आने से पहले भारत के 6 लाख से ज़्यादा गाँवों में से 97 फ़ीसदी तक में बिजली पहुँच चुकी थी। इनके नसीब में तो सिर्फ़ 18 हज़ार गाँवों की किस्मत बदलना ही लिखा था। यदि ये नेहरू की जगह प्रधानमंत्री बने होते तो पक्का 26 जनवरी 1950 से पहले भारत का हरेक गाँव बिजली से गुलज़ार होता। प्रथम पंचवर्षीय योजना में ही सभी बेघरों को पक्का मकान दे दिया गया होता। ये मोदी राज के महान ऐलानों का ही प्रताप है कि कल तक जो लोग खाद के लिए लाठियाँ खाते थे, इसकी काली-बाज़ारी झेलते थे, वही अब गोरक्षक और हिन्दू हितों के रहबर बनकर मुसलमानों को ख़ुदागंज पहुँचाते हैं। ये भी 48 महीने की ऐसी शानदार उपलब्धि है, जैसी पिछले दशकों में कभी देखी-सुनी नहीं गयी।

ख़ैर, वापस लौटते हैं, भारत माता के ज़िगर के टुकड़ों नरेन्द्र और नीरव मोदी की ओर। जब से नीरव और उसका मामा मेहुल अपने परिवार और सम्पत्ति समेत भारत से फ़ुर्र हुए हैं, तभी से भक्तों को यक़ीन हो गया कि नरेन्द्र मोदी के रूप में देश को कितना नायाब और अद्भुत चौकीदार मिला है! इतिहास में शायद ही पहले कभी ऐसा हुआ हो किसी चौकीदार की पैनी निग़ाहों के सामने से कोई बैंक को लूटकर निकल जाए और उसे हवा तक ना लगे! कहावत है, ‘दाई से क्या पेट छिपाना!’ जब ईमानदारी के मसीहा के रूप में ‘दाई’ की निग़ाहें जनता की पाई-पाई की हिफ़ाज़त कर रही हो तो सिर्फ़ वही भ्रष्टाचारी बच सकता है, जिसे वो बचाना चाहे! नरेन्द्र मोदी का मतलब ही है, ‘जाको राखे साईयाँ मार सके ना कोय!’ वर्ना, क्या कोई ये कल्पना भी कर सकता कि नरेन्द्र से ज़्यादा शातिर नीरव रहा होगा। हर्ग़िज़ नहीं। लिहाज़ा, नीरव तभी फ़ुर्र हो सका, जब नरेन्द्र ने चाहा!

ये नरेन्द्र की ही चाहत थी कि नीरव के पासपोर्ट को रद्द करने का ऐलान तो विदेश मंत्रालय कर दे। लेकिन वास्तव में पासपोर्ट रद्द नहीं किया जाय। वक़्त आने पर नरेन्द्र मोदी या अमित शाह का ये बयान भी आपकी कानों में गूँज सकता है कि नीरव का पासपोर्ट रद्द नहीं किया गया क्योंकि कश्मीर समस्या के लिए नेहरू ज़िम्मेदार है। ज़रा सोचिए कि यदि वास्तव में ‘मोदी-रत्न’ नीरव भाई का पासपोर्ट रद्द हुआ होता तो उस बेचारे को एक देश से दूसरे देश में जाने-आने में कितनी दिक्कत होती! इसीलिए विदेश मंत्रालय से कहा गया कि वो गाना गाता रहे कि उसने नीरव का पासपोर्ट 24 फरवरी को रद्द कर दिया।

यदि वास्तव में पासपोर्ट रद्द हो जाता तो भारत के सम्मानित नागरिक के रूप में नीरव मोदी, मार्च में ही तीन महाद्वीपों; अमेरिका, यूरोप (लन्दन) और एशिया (हाँगकाँग) की परिक्रमा कैसे कर पाता! विश्व-गुरु की ये अनोखी सन्तान, तीनों महाद्वीपों में दस्तक देकर वहाँ की माटी को कैसे पवित्र कर पाती! इसीलिए जगत के कल्याणकर्ता नीरव मोदी को लन्दन में स्थायी अतिथि बनाने या फिर उसे इंग्लैंड की नागरिकता दिलवाने के लिए भी माननीय ‘मोटा भाई’ ने अपना पूरा आशीर्वाद उड़ेल दिया। करूणानिधान नरेन्द्र भाई ने ऐसा ही कल्याण ललित मोदी और विजय माल्या जैसे भारत माता के सच्चे सपूतों के लिए भी किया था। दरअसल, मोदी जी से अमीरों और लुटेरों की तकलीफ़ें देखी नहीं जातीं! उनका मानना है कि विश्व-शान्ति के लिए जितना ज़रूरी विश्व-भ्रमण है, उतनी ही ज़रूरी धर्म की रखा करना भी है। कौन नहीं जानता है कि नीरव-मेहुल-माल्या-ललित जैसी विभूतियों ने ही तो सनातनियों की धर्म-ध्वजा थाम रखी है!

तभी तो नरेन्द्र ने नीरव के भारत से फ़ुर्र होने से पहले उसे वो अद्भुत और पौराणिक कवच-कुंडल से भी सुसज्जित किया, जिसे महाभारत काल में सूर्य ने अपने पुत्र कर्ण को दिया था। और, जिसे देवराज इन्द्र ने अपने पुत्र अर्जुन की रक्षा के लिए ब्राह्मण का स्वांग रचकर कर्ण से दान में माँग लिया था। हालाँकि, निश्चित रूप से वो दान की आड़ में छलपूर्वक हड़पने जैसा ही काम था। तब भी इन्द्र के छल को कर्ण ने बख़ूबी भाँप लिया था। फिर भी वो दान देने से पीछे नहीं हटे और इतिहास में ‘दानवीर कर्ण’ के नाम से अमर हो गये। हिन्दुओं के देवताओं में इन्द्र के टक्कर का छलिया कोई और नहीं हुआ। उसी ने छलपूर्वक देवी अहिल्या का सतीत्व नष्ट किया। राम के उद्धार करने के बाद से वही देवी अहिल्या आज भारत माता के रूप में ‘शस्य, श्यामलां, मातरम्’ के रूप में विद्यमान है। जबकि पौराणिक देवराज इन्द्र ही अब कलियुग में नर रूपी इन्द्र यानी नरेन्द्र है। 2014 से इसी नर रूपी देवता के प्रति भक्तों की अलौकिक आसक्ति से आर्यावर्त धन्य हो रहा है!

ग़नीमत है कि 2019 में ये विलक्षण नक्षत्र, इतिहास के काले पन्नों में दफ़्न हो जाएगा! आमीन!

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शिगूफ़ा ही साबित होगी ‘नौकरशाही में सीधी भर्ती!’

इस फ़ैसले से संघियों ने एक ही तीर से कई निशाना साधा है। पहला, नौकरशाही को उसकी औक़ात दिखाना। दूसरा, पिछले दरवाज़े से आरक्षण को मिटाना। तीसरा, अपने अधकचरे और दिग्भ्रमित चहेतों को निहाल करना। लेकिन बदकिस्मती से संघियों को किसी भी मक़सद में सफलता नहीं मिल सकती।

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यदि आपका मक़सद ही असली मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने का हो, तो आपके आये-दिन नये-नये शिगूफ़ों को फेंकने के अलावा और कोई रास्ता नहीं हो सकता! यदि आप सिरे से नाक़ाबिल हों, यदि आपकी तमाम नीतियाँ महज ढोल का पोल हों, तो आपकी लम्बी-लम्बी छोड़ने और तरह-तरह की नौटंकियों से जनता को बरग़लाने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं हो सकता! दुनिया के सबसे बड़े ढपोरशंखी और सबसे महँगे चौकीदार को ये ब्रह्म सत्य अच्छी तरह से पता है। इसीलिए शिगूफ़ेबाज़ी, जुमलेबाज़ी और नौटंकीबाज़ी के क्षेत्र में उन्हें कोई चुनौती नहीं मिल सकती। बीते चार साल के दौरान नरेन्द्र मोदी की ऐसी उपलब्धियों में रही-सही कसर की भरपाई अन्ध-भक्तों की भगवा मंडली बख़ूबी की है। शिगूफ़ेबाज़ी वाले मोदी की धारावाहिक की ताज़ा कड़ी नौकरशाही में संयुक्त सचिव जैसे उच्च स्तर पर सीधी भर्ती करने का फ़ैसला है।

इस फ़ैसले से संघियों ने एक ही तीर से कई निशाना साधा है। पहला, नौकरशाही को उसकी औक़ात दिखाना। दूसरा, पिछले दरवाज़े से आरक्षण को मिटाना। तीसरा, अपने अधकचरे और दिग्भ्रमित चहेतों को निहाल करना। लेकिन बदकिस्मती से संघियों को किसी भी मक़सद में सफलता नहीं मिल सकती। उल्टा, 2019 के चुनावों में नौकरशाही इन्हें इनकी औक़ात दिखा देगी। क्योंकि, बेताज बादशाह के रूप में देश का सबसे अधिक अहित करने वाली नौकरशाहों की जमात को कभी ये बात हज़म नहीं हो सकती कि कोई उनकी हस्ती को कमतर बनाकर निकल ले!

भारत की नौकरशाही बुनियादी तौर पर सामन्तवादी है। अँग्रेज़ों के जाने के बाद भी इसने उनकी हरेक बुराई को क़ायम रखा। हमारी नौकरशाही देश का सबसे संगठित शोषणकर्ता है। नेताओं को तो फिर भी जनता पाँच साल में बदल सकती है, लेकिन अफ़सर तो ज़िन्दगी भर के लिए सरकार के दामाद बनकर जीने का पट्टा लिखाकर नौकरी में आते हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता किसी भी काम में अड़ंगा लगाने और उसे लटकाने की होती है। सही लोगों को परेशान करने और ग़लत लोगों को सारे सुख देने में इन्हें महारत हासिल होती है। क्योंकि ऐसा करके ही भ्रष्टाचारी बने रहते हैं। ये देश के सबसे शिक्षित, होशियार और ख़ुदगर्ज़ लोगों का सबसे छोटा समुदाय है। इनके भाईचारे जैसी मिसाल मिलना मुश्किल है। हरेक अफ़सर एक-दूसरे को यूँ ही नहीं बचाता रहता है!

हमारे सिविल सरवेंट्स को अपने ही कॉडर का प्रमोटी अफ़सर तो विजातीय लगता है। उसे ये दोयम दर्जे का तथा निकृष्ट प्राणी मानते हैं। आईएएस तो ख़ुद को भारतीय अवतार सर्विस का सदस्य मानते हैं। इन्हें सिखाया जाता है कि भारत में काबलियत के इकलौते ठेकेदार सिर्फ़ यही हैं। इनकी ये दृढ़ धारणा होती है कि ये सर्वज्ञ हैं! हर विधा के विशेषज्ञ हैं! हरेक विभाग या मंत्रालय का कर्णधार बनने की नैसर्गिक प्रतिभा सिर्फ़ इन्हीं में है। लिहाज़ा, सभी तरह के शीर्ष पदों का दावेदार इनके अलावा और कोई नहीं हो सकता। अब मोदी सरकार ने नौकरशाहों के ऐसे ही अभेद्य क़िले में सेंधमारी की नीति अपनाने का फ़ैसला किया है। लेकिन गाँठ बाँध लीजिए कि महज दस लोगों की संयुक्त सचिव के स्तर पर सीधी भर्ती से सरकार का कोई भला नहीं होगा।

नौकरशाही इस प्रयोग को कभी सफल नहीं होने देगी। बाहर से नियुक्त होने वालों पर राजनीतिक पसन्द का ठप्पा लगाया जाना स्वाभाविक है। ऐसे लोगों को घाघ नौकरशाह अपने विजिलेंस, ऑडिट, छापा, हनी-ट्रैप वग़ैरह से डराएँगे और फँसवाएँगे। क्योंकि यदि मोदी सरकार का ये प्रयोग विफल नहीं हुआ तो कालान्तर में इसी हथकंडे से नौकरशाही की सारी तरस्वीर बदली जा सकती है। सीनियॉरिटी को अपना सबसे बड़ा सुरक्षा कवच और हथियार समझने वाले अफ़सर ये कैसे बर्दाश्त करेंगे कि निजी, कॉरपोरेट, विदेश या तकनीकी संस्थाओं से विशेषज्ञता हासिल करने वाले लोगों के मातहत वो काम कर लेंगे।

लैटरल इंट्री या ‘तिर्यक भर्ती’ वाला ये तरीक़ा इसलिए भी फ़ेल होगा क्योंकि ये नियुक्ति स्थायी नहीं बल्कि अल्पकालिक होगी। इसकी मियाद को तीन से पाँच साल तक रखने का प्रस्ताव है। सरकारी बाबू तो उन लोगों को भी महत्वहीन मानते हैं जो अन्य विभागों से डेपुटेशन या प्रतिनियुक्ति पर आते हैं। ऐसे में उन्हें कौन पूछेगा जो हमेशा इस मुग़ालते में ही रहेंगे कि वो सरकारी गधे नहीं, बल्कि उम्दा नस्ल वाले अरबी घोड़े हैं। घोड़ों का लाया जाएगा, दौड़ने के लिए। लेकिन उन्हें सरकारी ढर्रे और नियम-क़ायदों के जाल में उलझाकर रखा जाएगा। ताकि वो ठीक से दौड़ ही ना सकें। वैसे यदि कोई घोड़ा, खूँटा तोड़कर दौड़ने में कामयाब भी हो गया तो उसे आगे खड़ी गधों की फ़ौज घेर लेगी। इससे थोड़े वक़्त बाद ही घोड़े की सारी तेज़ी ग़ायब हो जाएगी।

अगला तकनीकी मुद्दा आरक्षण को लेकर फँसेगा। प्रस्तावित नियुक्तियों पर कोटे का कोई असर नहीं होगा। ये निश्चित रूप से संविधान के ख़िलाफ़ होगा। लिहाज़ा, देर-सबेर ऐसी नियुक्ति को या तो अदालत में चुनौती दी जाएगी या फिर समाज में ये प्रचार किया जाएगा कि मोदी सरकार पिछले दरवाज़े से आरक्षण को प्रभावहीन बना रही है। आज संयुक्त सचिव जैसे पदों पर चहेतों की सीधी भर्ती हो रही है, तो कल बाकी पर क्यों नहीं होगी! सरकार लाख सफ़ाई देगी, लेकिन आरक्षण के लाभार्थियों को उसकी बात पर यक़ीन नहीं होगा। दूसरी ओर, आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों से नफ़रत करने वालों के बीच फ़ैलाया जाएगा कि देखो-देखो, मोदी जी ने कैसे आरक्षण को ख़त्म करना शुरू कर दिया है! सवर्ण हिन्दू इससे ख़ुश हो जाएँगे। इसका सियासी फ़ायदा हो सकता है तो नुक़सान भी! लिहाज़ा, राजनीतिक तौर पर ये सौदा बेहद ख़तरनाक साबित हो सकता है।

उधर, वो लोग भी भारी दुविधा में रहेंगे तो ऐसे पदों पर नियुक्ति पाना चाहेंगे। क्योंकि सरकारी ताम-झाम, गाड़ी-बंगला, नौकर-चाकर, फ़ोन, मुफ़्त यात्रा वगैरह तो उन्हें मिल जाएँगे, लेकिन सरकारी की कार्यशैली उन्हें कभी रास नहीं आएगी। यूपीएससी के ज़रिये नियुक्ति पाने वाले अफ़सर जहाँ ज़िन्दगी भर पेंशन और मुफ़्त मेडिकल सुविधा वग़ैरह के हक़दार होते हैं, वहीं तिर्यक भर्ती वाले अल्पकालिक अफ़सरों को ये सुख नहीं मिलेगा। उनका सरकारी वेतन-भत्ता भी कॉरपोरेट की बराबरी शायद ही कर पाये। कुलमिलाकर, बाहर से आने वाले को शायद ही कुछ ऐसा मिले जिससे उन्हें लगे कि नेताओं और बड़े अफ़सरों की जी-हुज़ूरी वाली भूमिका में आने का उनका फ़ैसला सही था!

सरकारी ढर्रे में भी क़ाबलियत की अहमियत होती है। लेकिन बेहद कम। सरकार का सिर बहुत भारी और बड़ा होता है। वहाँ फ़ैसले लेने और उसे लागू करने का अपना ही ढर्रा होता है। वहाँ हज़ार रुपये का काम करवाने की प्रक्रिया भी वैसी ही होती है, जैसे अरबों-ख़बरों के मामले में होता है। अफ़सरों का सारा कौशल काग़ज़ का पेट भरने में नज़र आता है, लक्ष्य को यथाशीघ्र हासिल करना उनकी मानसिकता में ही नहीं होता। वहाँ का तो सूक्ति वाक्य ही होता है, ‘आज करे सो कल कर, कल करे सो परसो। इतनी जल्दी क्या है जब उम्र पड़ी हो बरसों!’ सरकारी तंत्र में ज़्यादातर लोग भ्रष्ट और बेईमान हैं। धीरे-धीरे वो सबको अपने जैसा ही समझने लगते हैं। जो उनके जैसा नहीं होता, उसे भी वो अपने जैसा बना डालते हैं।

सरकारी लोगों की महिमा हमेशा अपरम्पार रहती है। उनकी सेहत पर इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि सरकार को कितना घाटा या फ़ायदा हो रहा है! जबकि ग़ैर-सरकारी क्षेत्र के लोगों को हमेशा नफ़ा-नुक़सान का ख़्याल रखना होता है। यही ग़ैर-सरकारी क्षेत्र में रोज़गार और तरक्की की सबसे बड़ी और पहली शर्त होती है। इसके बावजूद, कई बार राजनीति में विशेषज्ञता वाले लोगों को बाहर से लाया जाता रहा है। लेकिन वो तभी सरकारी भँवर में टिक पाते हैं, जब उनके सिर पर देश की कुछ बड़ा कर दिखाने की चाहत सवार हो। कई बार सियासी जमात में बैठे लोग उन्हें देशहित और जनहित में अपना योगदान करने के लिए प्रेरित करने में सफल हो जाते हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ऐसे ही व्यक्तियों में अग्रणी हैं, जो राजनीति में विशुद्ध रूप से जनसेवा के इरादे से आये। इसी तरह आधार के जनक नन्दन निलेकणी भी जब केन्द्रीय मंत्री बनाये गये तब वो अपने आप में बेहद सम्पन्न थे। यही हाल सैप पेत्रोदा का भी रहा है। लेकिन इन लोगों की बराबरी उन दर्जन भर पूर्व नौकरशाहों से नहीं हो सकती, जो फ़िलहाल मोदी में मंत्री पद या अन्य शीर्ष स्थानों पर मौजूद हैं। मोदी राज में उन पूर्व नौकरशाहों की पौ-बारह है, जो सत्ता सुख लेने के लिए अपनी सियासी विचारधारा को परवान चढ़ाने के लिए सरकार में विराजमान हुए। इन्हीं की देखा-देखी संघ के विचारों से प्रेरित लोगों को अन्य क्षेत्रों से लाकर उन्हें सरकार के काम में लगाने का मंसूबा ही ‘तिर्यक भर्ती नीति’ का असली उद्देश्य है। लेकिन उपरोक्त जलिटताओं की वजह से ये प्रयोग कभी सफल नहीं हो सकता। देख लीजिएगा।

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FIFA World Cup : 11 शहरो में स्थित 12 स्टेडियमों में होंगे 64 मुकाबले

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FIFA World Cup 2018

नई दिल्ली, 12 जून | फीफा विश्व कप-2018 में बड़ी टीमों के बीच खेले जाने वाले मुकाबले जितने खास होते हैं उतने ही खास होते हैं वो स्टेडियम, जिनमें ये मुकाबले खेले जाते हैं।

रूस में 14 जून से शुरू हो रहे फीफा विश्व कप के मैच 11 शहरों के 12 स्टेडियमों में खेले जाएंगे और ये 12 स्टेडियम अपने आप में ही खास हैं।

इन 12 स्टेडियमों में फीफा विश्व कप में 64 मैच खेले जाने हैं। इसमें सबसे खास है लुज्निकी स्टेडियम, जिसमें फीफा विश्व कप का पहला और फाइनल मैच खेला जाएगा।

1. लुज्निकी स्टेडियम :

1956 में निर्मित हुआ यह स्टेडियम रूस की राजधानी मॉस्को में मोस्कवा नदी के किनारे स्थित है। पहले इसका नाम सेंट्रल लेनिन था। 450 दिन में बनकर तैयार हुआ यह स्टेडियम 1980 मॉस्को ओलम्पिक खेलों का मुख्य केंद्र था। 1990 में इसका पुन: निर्माण किया गया और इसके बाद इसका नाम लुज्निकी रखा गया।

इसमें 1999 में यूईएफए फाइनल और 2008 में चैम्पियंस लीग फाइनल मैच हुआ और ऐसे में यह स्टेडियम कई यादें संजोए बैठा है। 2018 में मरम्मत के दौरान इसके स्टैंडों को दो टायरों में विभाजित किया गया। इसमें ग्रुप मैचों के अलावा, नॉकआउट, सेमीफाइनल-2 और फाइनल मैच खेला जाएगा।

2. स्पार्ताक स्टेडियम :

मॉस्को शहर में ही स्थित 2014 में निर्मित स्पार्ताक स्टेडियम में 43,298 प्रशंसक एक समय पर बैठ सकते हैं। यह स्पार्ताक मॉस्को क्लब का घरेलू मैदान है। चेनमेल से सजा हुआ यह स्टेडियम बाहर से स्पार्ताक क्लब के लाल और सफेद रंग से रंगा हुआ है। हालांकि, इन रंगों को स्टेडियम में खेलने वाली टीमों के मुताबिक बदला भी जा सकता है। इसमें ग्रुप मैचों के अलावा, नॉकआउट का मैच भी खेला जाएगा।

3. निजनी नोवगोरोड स्टेडियम :

नीले रंग में रंगा यह गोलाकार स्टेडियम निजनी नोवगोरोड शहर में स्थित है। वोल्गा क्षेत्र में प्रकृति से प्रेरित इस स्टेडियम एक समय पर 45,331 एक साथ लाइव मैच देख सकते हैं। यह हवा और पानी अस्तित्व को दर्शाता है। 2015 में इसका निर्माण हुआ था। इसमें ग्रुप स्तर के अलावा, अंतिम-16 दौर के साथ क्वार्टर फाइनल-1 का मैच भी खेला जाएगा।

4. मोडरेविया एरीना :

नारंगी, सफेद और लाल रंग से सजा सरांस्क में स्थित मोडरेविया एरीना स्टेडियम का मैदान 2010 में खराब हो गया था। फंड में कमी के कारण इसके निर्माण में देरी हुई और इसीलिए, यह 2017 के अंत तक पूरी तरह से बनकर तैयार नहीं हो पाया था। इसमें अभी 45,000 प्रशंसकों के बैठने की क्षमता है, लेकिन फीफा विश्व कप के बाद इसके अपर टायर को हटा दिया जाएगा। ऐसे में कुल 28,000 लोग ही इसमें बैठ पाएंगे। इसमें केवल ग्रुप स्तर के मैच होंगे।

5. कजान एरीना :

कजान शहर में स्थित इस स्टेडियम का निर्माण वास्तुकारों ने किया है, जिन्होंने वेम्ब्ले और एमिरात स्टेडियमों का निर्माण किया। जुलाई, 2013 में बनकर तैयार हुए इस स्टेडियम में 44,779 दर्शक बैठ सकते हैं। यह स्थानीय लोगों की संस्कृति को दर्शाता है। इसमें ग्रुप स्तर के साथ-साथ अंतिम-16 दौर और क्वार्टर फाइनल-2 के मैच खेले जाएंगे।

6. समारान एरीना (कॉसमोस):

समारा शहर के प्रसिद्ध एयरोस्पेस क्षेत्र को प्रतिबिंबित करने के लिए इस स्टेडियम को अंतरिक्ष यान के रूपरंग में बनाया गया है। विश्व कप के समापन के बाद इसका नाम बदलकर कॉसमोस एरीना रखा जाएगा। ग्रुप मैचों के अलावा, इसमें नॉकआउट और चौथा क्वार्टर फाइनल मैच खेला जाएगा।

7. एकातेरीना स्टेडियम :

रूस के चौथे सबसे बड़े शहर एकातेरिनबर्ग में स्थित यह स्टेडियम को 1953 में बनाया गया था। इसके बाद, 2007 और 2011 में इसका पुन:निर्माण किया गया। 35,000 लोग इसमें एक समय पर बैठकर लाइव मैच देख सकते हैं। विश्व कप के बाद इसकी 12,000 अस्थायी सीटों को हटा दिया जाएगा, जिसके बाद इसमें केवल 23,000 लोग ही बैठ पाएंगे। इसमें ग्रुप मैच ही खेले जाएंगे।

8. सेंट पीटर्सबर्ग स्टेडियम :

साल 2007 में इसके मैदान को तोड़कर फिर से नया बनाया गया था, जो 2009 में तैयार होना था। हालांकि, कई बार देरी होने के बाद यह 2017 में बनकर तैयार हुआ। 68,134 सीटों वाला नीले रंग में ढका यह स्टेडियम विश्व के तकनीकी रूप से उन्नत बेहतरीन स्टेडियमों में से एक है। ग्रुप के अलावा, इसमें फीफा नॉकआउट और सेमीफाइनल-1 का मैच खेला जाएगा।

9. कालिनिग्रेड स्टेडियम :

बाल्टिक सागर के पास स्थित कालिनिग्रेड शहर का यह स्टेडियम बायर्न म्यूनिख क्लब के एलियांज एरीना के डिजाइन पर आधारित है। 35,000 सीटों वाला यह स्टेडियम फीफा विश्व कप के ग्रुप स्तर के मैच आयोजित करेगा। इस टूर्नामेंट के बाद स्टेडियम की 10,000 सीटों को हटा दिया जाएगा।

10. वोल्गोग्राड स्टेडियम :

वोल्गा नदी के पास वोल्गोग्राड शहर में स्थित 45,568 सीटों वाला यह स्टेडियम की छत का निर्माण साइकिल के पहियों के डिजाइन की तरह किया गया है। यह छोठे शंकु के उल्टे आकार पर आधारित होकर बनाया गया है। इसमें विश्व कप के ग्रुप स्तर के मैच होंगे और इसके बाद यह रोटोर वोल्गोग्राड का घरेलू मैदान बन जाएगा।

11. रोस्तोव एरीना :

रोस्तोव-ऑना-डॉन शहर में स्थित इस स्टेडियम का निर्माण 2013 में शुरु हुआ था, जिसमें देरी होती गई और 2018 के शुरुआत में बनकर तैयार हुआ। इसमें 45,145 लोग बैठ सकते हैं। ग्रुप स्तर के साथ इसमें नॉकआउट का एक मैच खेला जाएगा।

12. फिश्ट स्टेडियम :

सोचि शहर का यह स्टेडियम की छत दो भागों में बटी है, जो बर्फीले पहाड़ों के आकार को दर्शाती है। इसका नाम माउंट फिश्ट पहाड़ी के नाम पर रखा गया है। इसमें फीफा विश्व कप के ग्रुप मैचों के अलावा, नॉकआउट और तीसरा क्वार्टर फाइनल मैच खेला जाएगा। 47,700 लोग एक साथ बैठक लाइव मैच का आनंद ले सकते हैं।

–आईएएनएस

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