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स्पीकर और राज्यपाल की भी लक्ष्मण रेखा तय हो

लोकतंत्र को विनाश से बचाने के लिए हमें आमसहमति बनाकर क़ानून को बदलना होगा

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वो चाहे अपनी मर्ज़ी से चलें या एक-दूसरे से तालमेल बिठाकर, लेकिन स्पीकर और राज्यपाल किसी राज्य सरकार की तक़दीर बदल सकते हैं। राज्यपाल के पास तो ये अधिकार है कि वो किसी की भी सरकार को बनवा दे और फिर उसे बहुमत साबित करने के लिए पर्याप्त वक़्त भी दे दे। राज्यपाल का विवेकाधिकार तो उन्हें, या तो सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए बुलाने की छूट दे देता है या फिर वो उस धड़े की भी सरकार बनवा सकते हैं जिन्होंने चुनाव के बाद चटपट गठबन्धन बना लिया हो। फिर चाहे इसके लिए पूरी उदारता से धन या अन्य उपकारों का सहारा लिया गया हो। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि स्पीकर और राज्यपाल अपनी नियुक्ति के बाद भी अपनी पार्टी के हितों को साधने के लिए ही काम करते हैं। यही वजह है कि इन अहम संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों में जनता का भरोसा, बेहद मामूली सा ही होता है। इस तरह, राजनीतिक मक़सद के लिए संवैधानिक मूल्यों की बलि चढ़ा दी जाती है।

संविधान की जिस दसवीं अनुसूची को दलबदल की रोकथाम के लिए बनाया गया था, उसी की बदौलत अब दलबदलुओं की हिफ़ाज़त की जाती है। स्पीकर यानी विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका उस वक़्त बेहद अहम और नाज़ुक होती है जब दलबदल के पीछे या तो नयी सरकार को बनवाना होता है और फिर पुरानी सरकार को जीवनदान देकर उसे लम्बी उम्र देने की कोशिश की जाती है।

उदाहरणार्थ

तमिलनाडु में, स्पीकर उस वक़्त मुख्यमंत्री के लिए ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं, जब दसवीं अनुसूची के मुताबिक़ उन्हें दलबदल से सम्बन्धित याचिका पर फ़ैसला करना होता है। मार्च 2017 में मौजूदा उप मुख्यमंत्री और अन्नाद्रमुक पार्टी के 10 अन्य विधायकों की सदस्यता को रद्द करने के लिए स्पीकर को अर्ज़ी दी गयी, क्योंकि इन सभी ने फरवरी 2017 में हुए शक्ति परीक्षण के दौरान पार्टी व्हिप (परमादेश) का उल्लंघन किया था। मज़े की बात तो ये भी है कि इस अर्ज़ी पर आज तक स्पीकर ने व्हिप का उल्लंघन करने वाले विधायकों को नोटिस देकर उनसे अपना पक्ष रखने के लिए जबाब-तलब तक नहीं किया। लेकिन दूसरी ओर, जब 22 अगस्त 2017 को टीटीवी दिनाकरन गुट ने राज्यपाल को चिट्ठी लिखी कि उनका मुख्यमंत्री में विश्वास नहीं है, तो इस मामले में उसी स्पीकर ने असामान्य तत्परता दिखाते हुए दो दिन में ही 19 विधायकों को नोटिस जारी करके चटपट का फ़ैसला सुना दिया। स्पीकर ने सरकार के चीफ़ व्हिप की इस दलील को सही पाया कि विधायकों के रुख़ से साफ़ है कि उन्होंने पार्टी से नाता तोड़ लिया है। स्पीकर ने 18 विधायकों को तीन सप्ताह के भीतर अयोग्य घोषित कर दिया। क्योंकि फ़ैसला सुनाने से पहले एक विधायक वापस मुख्यमंत्री का समर्थक बन गया था। ये फ़ैसला भी तब आनन-फ़ानन में दिया गया, जब विपक्षी डीएमके ने हाईकोर्ट से गुहार लगायी कि वो शक्ति परीक्षण का आदेश दे। इसके बावजूद कई हफ़्तों तक दिनाकरन के अविश्वास प्रस्ताव पर सदन में मत-विभाजन नहीं हुआ। क्योंकि राज्यपाल ने शक्ति परीक्षण का आदेश नहीं दिया और अल्पमत की सरकार चलती रही।

स्पीकर संविधान के मुक़ाबले अपनी पार्टी और सरकार के प्रति ज़्यादा वफ़ादार थे। पहले मामले में कार्रवाई ही नहीं करना और दूसरे में 18 विधायकों को अयोग्य घोषित कर देने वाले, दोनों फ़ैसलों को हाईकोर्ट में चुनौती दी गयी। लेकिन दुर्भाग्यवश अदालत ने भी अपेक्षित बुद्धिमत्ता नहीं दिखायी। ये एक ऐसी मिसाल है, जिसमें न तो स्पीकर ने अपने कर्त्तव्य को निभाया, ना ही हाईकोर्ट ने ही स्पीकर को अयोग्यता वाली याचिकाओं पर जल्दी फ़ैसला लेने का निर्देश दिया। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने ये तय करने के लिए एक संविधान पीठ बना रखी है कि क्या हाईकोर्ट को ये अधिकार है कि वो स्पीकर को परमादेश (मैनडामस) दे सकता है? इस मामले की आड़ में हाईकोर्ट ने कहा कि वो संविधान पीठ के फ़ैसले का इन्तजार करेगा। इस आधार पर तो स्पीकर को भी उन याचिकाओं पर फ़ैसला देने से मना कर देना चाहिए था। लेकिन मज़े की बात ये भी रही कि जब दिनाकरन गुट के 18 विधायकों को अयोग्य ठहराने की बारी आयी तब हाईकोर्ट ने यही रुख़ क्यों नहीं दिखाया? यदि अदालत ने विधायकों को अयोग्य ठहराये जाने के फ़ैसले को रद्द कर दिया होता तो सरकार गिर भी सकती थी।

आन्ध्र प्रदेश में वाईएसआर काँग्रेस के 67 विधायकों में से 21 ने दलबदल कर लिया। इससे मुख्यमंत्री चन्द्र बाबू नायडु की स्थिति अभेद्य बन जाती। दलबदल करने वालों में कुछ कैबिनेट मंत्री भी थे। लेकिन स्पीकर ने दलबदलुओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं की और उनकी याचिका लम्बित ही रहीं। इसकी वजह को समझना मुश्किल नहीं है। यहाँ तक कि हाईकोर्ट भी ये कहकर मामले की सुनवाई से मुकर गया कि उसके पास 3.25 लाख मुक़कमें लम्बित हैं। ऐसे में हर मामले को नये मुक़दमें की तरह नहीं देखा जा सकता।

तेलंगाना में, तेलगू देशम पार्टी के 15 में से 12 विधायकों ने तेलंगाना राष्ट्र समिति का दमन थाम लिया। पहले टीडीपी के 8 विधायकों ने दलबदल किया, फिर 4 और उनके साथ हो लिये। विधायकों को अयोग्य घोषित करने की याचिका दायर हुई, लेकिन यथास्थिति बनी रही। आगे चलकर टीडीपी के बाक़ी बचे 3 विधायकों ने भी दलबदल कर लिया। दूसरी ओर, विधानसभा में काँग्रेस विधायक दल की संख्या भी 21 से घटकर 12 हो गयी लेकिन किसी भी दलबदलु की सदस्यता नहीं गयी, क्योंकि स्पीकर की महिमा अपरम्पार है!

स्पीकर के पक्षपात रवैये की पुरानी मिसालें भी हैं। 1997 में असंशोधित दसवीं अनुसूची के मुताबिक़, समाजवादी पार्टी ने बीएसपी के एक-तिहाई विधायकों से दलबदल करवा जनबसपा नाम की नयी पार्टी बनवा दी। उस प्रसंग ने दलबदल को वैधता दी। लेकिन जब तक इसे चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुनाया, तब तक विधानसभा की मियाद ख़त्म हो गयी। ऐसी ही दशा कई और राज्यों में भी होती रही है।

मज़ाक बने दिशानिर्देश

राज्यपालों ने भी ख़ुद को बेदाग़ नहीं बनाया। उन्होंने उस पार्टी के हितों के लिए सारी मर्यादाएँ तोड़ दीं, जिसने उन्हें नियुक्त किया था। इसीलिए पहले सरकारिया आयोग और फिर पुँछी आयोग ने स्पष्ट दिशानिर्देशों की सिफ़ारिश की जिसके मुताबिक़, चुनाव के बाद किसी राज्यपाल को कैसे काम करना चाहिए। लेकिन हम बार-बार देख रहे हैं कि राज्यपाल उन दिशानिर्देशों की अनदेखी करते हैं। अदालती फ़ैसलों में वक़्त लगता है, जबकि उसी वक़्त संवैधानिक मर्यादाओं की धज़्ज़ियाँ उड़ाकर राज्यपाल की ओर से लोकतंत्र का मज़ाक बनाया जाता है। अदालत के हरेक फ़ैसले के बाद राज्यपाल उसकी अनदेखी करते हैं। ताज़ा प्रसंग कर्नाटक का है, तो इससे पहले हम गोवा, मणिपुर और मेघालय में भी देख चुके हैं कि राज्यपाल कैसे राजनीतिक हित को साधने के लिए पक्षपात करते हैं। पहले भी, अरूणाचल प्रदेश के मामले में राज्यपाल के आचरण को सुप्रीम कोर्ट असंवैधानिक ठहरा चुका है। इसी तरह, उत्तराखंड के मामले में ही हाईकोर्ट ने राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश को ख़ारिज़ कर चुका है।

पहले भी राज्यपालों के संवैधानिक फ़ैसलों पर अदालतों ने तीख़ी टिप्पणियाँ की हैं। एसआर बोम्मई केस (1994) समेत कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों की बर्ख़ास्तगी को अवैध ठहराया है और राज्यपालों को केन्द्र सरकार का ऐजेंट बनकर काम नहीं करने की सिफ़ारिश की है। लेकिन फिर भी, तरह-तरह के अपवादों का पैदा होना जारी है।

इसीलिए अब ये बेहद ज़रूरी हो चुका है कि दसवीं अनुसूची और दलबदल के मामले में स्पीकर के कार्यक्षेत्र में सुधार किया जाए। इसके लिए संविधान में संशोधन बेहद ज़रूरी है। ताकि राज्यपालों के विवेकाधिकार और स्पीकर की मनमर्ज़ी के दायरे पर लग़ाम कसी जा सके। इन्हें लोकतंत्र और संविधान की भावना के अनुरूप ढाला जा सके। इसके लिए सरकार को आगे आकर आम सहमति बनानी चाहिए, ताकि लोकतंत्र को विनाश से बचाया जा सके। ये लोहे के चने चबाने जैसा है!
(साभार: द हिन्दू)

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बिहार : समस्तीपुर में डेयरी संयंत्र, भोजपुर में पशु आहार कारखाना लगेंगे

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मोतिहारी, 19 जनवरी | बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने यहां शनिवार को कहा कि अगले वित्तीय वर्ष 2019-20 में बिहार राज्य दुग्ध सहकारी संघ लिमिटेड (कम्फेड) द्वारा समस्तीपुर में पांच लाख लीटर प्रतिदिन क्षमता के डेयरी संयंत्र और भोजपुर के बिहिया में 300 मीट्रिक टन प्रतिदिन उत्पादन क्षमता के पशु आहार कारखाने लगाए जाएंगे। पूर्वी चंपारण जिले के मठबनवारी में 11 महीने के रिकार्ड समय में बन कर तैयार मदर डेयरी के प्रति दिन एक लाख लीटर क्षमता के दूध प्रसंस्करण संयंत्र का शनिवार को उद्घाटन करने के बाद बिहार के उपमुख्यमंत्री ने कहा कि इस संयंत्र द्वारा मार्च से 1250 गांवों के 50 हजार किसानों से प्रतिदिन 2 लाख लीटर दूध का संग्रह किया जा सकेगा।

उन्होंने कहा कि अब सुधा व मदर डेयरी, दोनों मिलकर किसानों से दूध खरीदेगी।

मोदी ने कहा, “वर्तमान वित्तीय वर्ष में सुपौल में एक लाख लीटर क्षमता का डेयरी संयंत्र, समस्तीपुर व हाजीपुर में 30-30 मीट्रिक टन के दूध पाउडर संयंत्र, पटना व नालंदा में 20-20 हजार किलो दैनिक क्षमता के आइसक्रीम प्लांट स्थापित किए जाने के साथ ही पटना में पूर्व से स्थापित 100 मीट्रिक टन क्षमता के पशु आहार फैक्ट्री को 150 मीट्रिक टन में विस्तारित और 150 मीट्रिक टन की नई इकाई स्थापित की गई है।”

डेयरी स्थापित करने वाले किसानों को सरकार द्वारा 50 प्रतिशत तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को 66 प्रतिशत अनुदान दिए जाने का दावा करते हुए उन्होंने कहा कि किसानों की आमदनी केवल धान, गेहूं की खेती करने से दोगुनी नहीं होगी, बल्कि इसके लिए समग्र रूप से वानिकी, डेयरी, मछली और मुर्गी पालन को अपनाना होगा।

उन्होंने कहा कि फिलहाल बिहार में प्रतिदिन 18 लाख किलो दूध का संग्रह व 14 लाख लीटर की मार्केटिंग सुधा डेयरी द्वारा की जा रही है।

इस मौके पर केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह, बिहार सरकार में मंत्री प्रमोद कुमार, राणा रणधीर सिंह समेत कई अधिकारी और नेता मौजूद थे।

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मुकेश अंबानी ने ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ अभियान का आह्वान किया

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mukesh ambani

गांधीनगर, 18 जनवरी | औपनिवेशीकरण के खिलाफ महात्मा गांधी के अभियान को याद करते हुए रिलायंस इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक मुकेश अंबानी ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करने की गुजारिश की और कहा कि भारतीय डेटा भारतीयों के ‘स्वामित्व और नियंत्रण’ में होने चाहिए। उन्होंने यहां वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट 2019 में कहा, “हम अपने राष्ट्रपिता को उनकी 150वीं जयंती के वर्ष में श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। गांधी जी ने राजनीतिक औपनिवेशीकरण के खिलाफ आन्दोलन चलाया था.. आज हम सब मिलकर डेटा औपनिवेशीकरण के खिलाफ नया अभियान शुरू कर रहे हैं।” इस समिट का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था।

अंबानी ने कहा कि डेटा नई दुनिया में ‘नया तेल और धन’ है। उन्होंने कहा कि भारत के डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण भारतीय लोगों के हाथ में ही होना चाहिए और कॉर्पोरेट्स द्वारा नहीं किया जाना चाहिए, खासतौर से वैश्विक कॉर्पोरेशंस द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “माननीय प्रधानमंत्री, मैं आश्वस्त हूं कि आप अपने डिजिटल इंडिया मिशन के प्रमुख लक्ष्यों में इसे भी शामिल करेंगे।”

उन्होंने कहा, “भारत को इस डेटा संचालित क्रांति में सफल होने के लिए, हमें भारतीय डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण वापस भारत भेजना होगा.. दूसरे शब्दों में भारतीय संपत्ति वापस लौटानी होगी। भारतीय डेटा को भरतीयों द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए, न कि वैश्विक कॉर्पोरेट्स द्वारा। डेटा का नियंत्रण हमें अपने हाथों में लेने के लिए अभियान चलाने की आवश्यकता है।”

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अक्टूबर में कहा था कि सभी डिजिटल भुगतान कंपनियों जैसे गूगल प्ले, वाट्सएप और अन्य को अपने भारतीय कारोबार का डेटा स्थानीय तौर पर स्टोर करना चाहिए।

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ओपिनियन

बसपा-सपा गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं : शीला दीक्षित

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वरिष्ठ कांग्रेस नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कहना है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं मिल रहे हैं, लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस के परिणाम चौंकाने वाले होंगे।

शीला दीक्षित ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, “उनको एक साथ आने दीजिए। वे मिलते और जुदा होते रहे हैं और फिर साथ आ रहे हैं। मेरा अभिप्राय यह है कि उनमें स्थिरता नहीं है और वे स्थायित्व के संकेत नहीं दे रहे हैं। अब आगे देखते हैं।”

तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं दीक्षित (80) सपा और बसपा गठबंधन को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रही थीं। सपा और बसपा ने कांग्रेस को महागठबंधन से अलग रखते हुए प्रदेश में 80 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए एक गठबंधन किया है। दीक्षित को 10 जनवरी को दिल्ली कांग्रेस की कमान सौंपी गई।

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने से पहले शीला दीक्षित को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था। दीक्षित ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीद क्षीण पड़ गई है।

दीक्षित की टिप्पणी से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेता चुनाव अभियान के दौरान सपा और बसपा को निशाना बनाएंगे, जबकि उनका सीधा मुकाबला सत्ताधारी पार्टी भाजपा से होगा।

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है, लेकिन पार्टी ने भाजपा को शिकस्त देने वाले सेक्यूलर दलों के लिए दरवाजा खुला रखा है।

उत्तर प्रदेश में पार्टी नेता उम्मीदवारों को बता सकते हैं कि कांग्रेस ही नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से बाहर कर सकती है और भाजपा को शिकस्त दे सकती है।

कांग्रेस इस बात पर बल देंगे कि इस चुनाव के नतीजों से प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि देश का प्रधानमंत्री चुना जाएगा।

लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो ही सीटें बचा पाई थीं, जबकि उससे पहले 2009 में पार्टी ने 21 सीटों पर जीत हासिल की थी, जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) दूसरी बार केंद्र की सत्ता को बरकार रख पाई थी।

दीक्षित ने कहा कि उनसे कहा जाएगा तो वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी, लेकिन वह दिल्ली पर अपना अधिक ध्यान केंद्रित करेंगी क्योंकि उनको यहां काफी काम करना है।

उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी को कांग्रेस द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करने का अनुमोदन किया।

उन्होंने कहा, “पार्टी को इस पर फैसला लेने दीजिए। हम चाहते हैं और खासतौर से मैं चाहती हूंं और हमारे बीच अधिकांश लोग चाहते हैं। लेकिन इस पर पूरी पार्टी द्वारा फैसला लिया जाएगा।”

गैर-भाजपा दलों में प्रधानमंत्री का पद विवादास्पद मसला है। राहुल गांधी ने खुद भी कहा कि इसका फैसला चुनाव के बाद लिया जाएगा और पहला काम नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित करना है।

संपूर्ण भारत में महागठबंधन की संभावना पर पूछे जाने पर दीक्षित ने कहा कि लोग इस दिशा में प्रयासरत हैं, लेकिन इस पर अभी पूरी सहमति नहीं बन पाई है।

विपक्षी दलों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में गठबंधन की संभावना कम है, लेकिन भाजपा को शिकस्त देने के लिए राज्य विशेष में गठबंधन होगा।

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