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ओपिनियन

विफल होते क़ानूनों की वजह से ख़तरे में लोकतंत्र

बीते चार सालों में हमारे संवैधानिक लोकतंत्र की दो अहम विशेषताओं का पतन हुआ है। पहला, क़ानून के सर्वोपरि होने की धारणा पर हमले हुए हैं। दूसरा, क़ानूनी प्रक्रिया का सियासी मक़सद के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है।

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Kapil Sibal

संवैधानिक लोकतंत्र के दो अनिवार्य अंग हैं। पहला, इंसान नहीं, बल्कि क़ानून सर्वोपरि है। दूसरा, हरेक निर्वाचित प्रतिनिधि की सम्प्रभुता उन संस्थाओं की हैसियत से ऊपर है जो चुनाव से स्थापित नहीं होते। संवैधानिक लोकतंत्र में क़ानून का दर्ज़ा सबसे ऊपर है। यही संविधान की बुनियादी धारणा है। विधायिका किसी क़ानून के ज़रिये इसमें कटौती नहीं कर सकती। यदि विधायिका कभी ऐसा करे भी तो अदालतें ये सुनिश्चित करती हैं कि क़ानून ही सर्वोपरि है। निर्वाचित संस्थाएँ, संविधान के दायरे में ही अपना काम करती हैं और संविधान के मुताबिक़ ही समय-समय पर जनता के प्रति उनकी जबाबदेही तय होती है।

बीते चार सालों में हमारे संवैधानिक लोकतंत्र की दो अहम विशेषताओं का पतन हुआ है। पहला, क़ानून के सर्वोपरि होने की धारणा पर हमले हुए हैं। दूसरा, क़ानूनी प्रक्रिया का सियासी मक़सद के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है। स्थापित प्रक्रिया को दरकिनार किया जा रहा है। जनप्रतिनिधि ही एजेंडा की आवाज़ बन रहे हैं और उन मूल्यों को तहस-नहस कर रहे हैं जो लोकतंत्र की बुनियाद हैं। हमारे कुछ जनप्रतिनिधि और एक ख़ास विचारधारा के लोग न सिर्फ़ हिंसा को उकसाते हैं, बल्कि कई बार उसका हिस्सा भी बनते हैं। संवैधानिक अधिकारों का गला घोटा जाता है। अभिव्यक्ति की आज़ादी इसका शिकार बनती है। लोकतांत्रिक संस्थाएँ अपाहिज़ हो रही हैं।

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने 131 मुक़दमों को वापस लेने का ऐलान किया। ये मामले हत्या और हत्या का प्रयास जैसे संगीन अपराधों से जुड़े थे। ये प्रसंग इस बात की मिसाल है कि कुछ लोग क़ानून से भी ऊपर हो सकते हैं। बेशक़, किसी मुक़दमें को लेकर यदि सरकारी वकील को तथ्यों के आधार पर ये लगे कि उसे वापस लेना ही उचित होगा तो अदालत की मंज़ूरी से मुकदमा वापस लिया जा सकता है। लेकिन राजनीतिक मक़सद से, एक ही झटके में 131 मुकदमों को वापस ले लेने का फ़ैसले की कल्पना भी लोकतंत्र में नहीं की जा सकती। हत्या या इसकी कोशिश की वजह तो राजनीतिक हो सकती है, लेकिन हत्या का होना राजनीतिक नहीं हो सकता।

सरकार में बैठे लोगों पर संगीन अपराधों के आरोप हों और अभियोजन की आँखों के सामने ही उसे रफ़ा-दफ़ा कर दिया जाए तो हालात को बेहद चिन्ताजनक समझिए। अभियुक्त नामी-गिरामी लोग हैं। सत्ता से उनकी नज़दीकी को नकारा नहीं जा सकता। मौजूदा दौर में जाँच एजेंसियों के दुरुपयोग करके राजनीतिक विरोधियों को भी निशाना बनाया जा रहा है। एक के बाद एक गवाहों का अपने बयान से मुकर जाना भी क़ानून के राज के लिए बेहद चिन्ताजनक है। जाँच एजेंसियों के सरकारी एजेंट बन जाने से सच का दमन हो रहा है। इसीलिए ज़रूरी है कि संगीन अपराधों के मामलों को सत्ता के नशे से दूर ही रखा जाए और दुर्भावनापूर्ण मुकदमें ठोंककर क़ानूनी प्रक्रिया का दमन नहीं हो।

क़ानूनी प्रक्रिया का पक्षपातपूर्ण हो जाना भी बेहद चिन्ताजनक है। दिन-दहाड़े होने वाले अपराधों की यदि प्रमाणिक जाँच नहीं होगी या जाँच में प्रभावशाली अभियुक्तों को बचाया जाएगा तो क़ानून के राज की गरिमा कैसे बचेगी? सरेआम बर्बरतापूर्वक हुई दलितों की पिटाई, घुड़सवारी करने की वजह से दलित की हत्या कर देना, धार्मिक जुलूसों के ज़रिये हिंसा फैलाना और इसमें पुलिस के शामिल होने पर क़ानून की क्या औक़ात रह जाएगी! हाल ही में हमने देखा कि पश्चिम बंगाल के आसनसोल में एक केन्द्रीय मंत्री ने दिन-दहाड़े लोगों को चमड़ी उधेड़ लेने की धमकी दी। ये बताता है कि देश में क़ानून के राज की धारणा कितनी तबाह हो चुकी है!

बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के अलावा कई स्थानों पर फैली हिंसा को अभी-अभी हमने क़रीब से देखा है। उत्तर प्रदेश में सारे नियम-क़ायदों को ताक़ पर रखकर पुलिस ऐसे मुठभेड़ों को अंज़ाम दे रही है, जिससे पता चलता है कि सरकार पर सत्ता का नशा किस क़दर सवार है और वो क़ानून को कितनी अहमियत दे रही है! ये नज़ारा उस सरज़मीं का है जो अपनी सहिष्णुता और आध्यात्म के लिए जाना जाता है। तानाशाही का उल्लंघन करने के लिए डाँडी मार्च का आयोजन किया गया था। लेकिन अभी तो सरकार ही तानाशाह बनकर रोज़ाना संविधान का उल्लंघन कर रही है।

जब क़ानून ही दमन का ज़रिया बन जाता है तो इसकी प्रतिष्ठा गिरती है। जाँच एजेंसियाँ जब कठोर क़ानूनों का दुरुपयोग करती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे किसी राजा के हाथों में तलवार हो! ऐसे दुरुपयोग से आप किसी की भी प्रतिष्ठा को तार-तार कर सकते हैं। बीते चार वर्षों ने हमने ऐसे दुरुपयोग बहुत व्यापक स्तर पर देखे हैं। क़ानून का उद्देश्य है, इंसाफ़ करना। लेकिन इसे तो नाइंसाफ़ी का हथकंडा बना दिया गया है। क़ानून का दुरुपयोग होने की वजह से तमाम लोकतांत्रिक संस्थाएँ लाचार हो जाती हैं। यही वजह है कि हाल ही में कई न्यायिक आदेशों ने अभियोजन पक्ष को दुर्भावनापूर्ण पाकर उसके आरोपों को ख़ारिज़ कर दिया है।

ज़रा सोचिए कि यदि झूठे और दुर्भावनापूर्ण आरोपों की वजह से एक व्यक्ति को 8-10 साल जेल में काटने पड़ें, इसकी उसकी ज़िन्दगी तबाह हो जाए, तब उसे हुए नुकसान की भरपाई कैसे होगी? हुक़ूमत तो इसका ख़ामियाज़ा भरती नहीं! इसीलिए ज़रूरी है कि हमारा लोकतंत्र अपने नागरिकों को क़ानून के दुरुपयोग से होने वाले ज़ुल्म से बचाए।

एक और पहलू भी चिन्ताजनक है। क़ानून सर्वोपरि है। न्यायपालिका इसकी पहरेदार है। लेकिन दुर्भाग्यवश आज न्यायपालिका की प्रक्रिया और उसकी सुचिता पर सरेआम सवाल उठाये जा रहे हैं। न्यायपालिका को भी सामूहिक रूप से ये सुनिश्चित करना होगा कि कोई उसे शक़ की नज़र से न देखे। यदि ऐसा नहीं होगा तो हमारा लोकतंत्र विफल हो जाएगा। इसीलिए न्यायपालिका ने भी कई बार अपनी गम्भीर चिन्ताएँ ज़ाहिर की हैं। इसके बावजूद, सुधारवादी उपाय होते नहीं दिख रहे। जब सत्तासीन लोग न्यायपालिका की स्वतंत्रता के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे, तब ये मानकर चलिए कि हमारा संविधान और उसकी व्यवस्थाएँ ख़तरे में हैं। बक़ौल लार्ड डेनिंग, ‘आप चाहे जितने बड़े हों, क़ानून आपसे भी ऊपर है।’ न्यायपालिका को इसी सिद्धान्त के मुताबिक़, निर्भय और निर्भीक होकर अपना काम करना चाहिए। लेकिन हमारे लोकतंत्र में कुछ लोगों ने ये धारणा पाल ली है कि वो क़ानून से भी ऊपर हैं। ऐसे में क़ानून को ही उनकी ग़लतफ़हमी दूर करनी होगी।

हमें उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि मौजूदा दौर से भी हमारा लोकतंत्र परिपक्व ही होगा। इतिहास में यही दर्ज होगा। एक नागरिक के तौर पर जब तक हम अपने लोकतंत्र को विफल नहीं कर देंगे, तब तक लोकतंत्र भी हमें विफल नहीं होने देगा। क़ानून को उन्हें बौना बनाना होगा जो हमारे लोकतंत्र की बुनियाद पर हमले कर रहे हैं।

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस। लेखक, वरिष्ठ काँग्रेस नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं।)

ओपिनियन

अगस्त क्रांति कैसे बनी जन-क्रांति?

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Quit India Movement

नई दिल्ली, 9 अगस्त | अगस्त क्रांति भारत से ब्रितानी हुकूमत को उखाड़ फेंकने की अंतिम और निर्णायक लड़ाई थी, जिसकी कमान कांग्रेस के नौजवान नेताओं के हाथ में आ गई थी। राष्ट्रपति महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ के नारे के साथ अंग्रेजों को देश छोड़ने पर मजबूर करने के लिए देश की जनता का आह्वान किया था। इसलिए इसे ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के रूप में याद किया जाता है।

देश की जनता उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध में भारत को झोंक दिए जाने से ब्रितानी सरकार से नाराज थी। युद्ध के कारण जरूरियात की चीजों की कीमतें आसमान छूने लगी थीं। खाने-पीने की वस्तुओं से लेकर सभी मूलभूत चीजों का टोटा पड़ गया था।

हालांकि कांग्रेस के नेता पहले से ही यह जानते थे कि आंदोलन को दबाने के लिए सरकार कोई भी दमनात्मक कार्रवाई करने से बाज नहीं आएगी, क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था और अंग्रेजों ने उस समय संभावित किसी भी प्रकार के विरोध को दबाने की पूरी तैयारी कर ली थी।

इतिहासकार विपिनचंद्र ने अपनी पुस्तक ‘भारत का स्वतंत्रता संघर्ष’ में लिखा है कि युद्ध की आड़ लेकर सरकार ने अपने को सख्त से सख्त कानूनों से लैस कर लिया था और शांतिपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों को को भी प्रतिबंधित कर दिया था।

देश की जनता की मर्जी के खिलाफ भारत को विश्वयुद्ध में झोंक दिए जाने से लोगों में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ भारी असंतोष था। महात्मा गांधी इस असंतोष से भलीभांति परिचित थे, इसलिए उन्होंने जनांदोलन खड़ा करने का फैसला लिया।

विपिन चंद्र ने अपनी पुस्तक में एक जगह लिखा है कि कांग्रेस में इस मसले पर मतभेद होने पर महात्मा गांधी ने कांग्रेस को चुनौती देते हुए कहा- “मैं देश की बालू से ही कांग्रेस से भी बड़ा आंदोलन खड़ा कर दूंगा।”

आखिरकार 14 जुलाई, 1942 को वर्धा में कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में आंदोलन शुरू करने का फैसला लिया गया। इसके बाद 8 अगस्त को कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में भारत छोड़ो आंदोलन छेड़ने का प्रस्ताव पास हुआ। महात्मा गांधी ने अपने भाषण में कांग्रस को इसके लिए धन्यवाद दिया। उन्हें भी अंग्रेजों की दमनात्मक कार्रवाई की आशंका थी। इसलिए उन्होंने अपने भाषण में ‘करो या मरो’ का आह्वान करते हुए जनता पर खुद निर्णय करने और अपना नेतृत्व करने की जिम्मेदारी सौंप दी।

तय कार्यक्रम के अनुसार, नौ अगस्त को अगस्त क्रांति का ऐलान किया गया। लेकिन इससे पहले ही ब्रितानी हुकूमत ने कांग्रेस के सारे प्रमुख नेताओं को हवालात में बंद करना शुरू कर दिया। महात्मा गांधी को 9 अगस्त को तड़के गिरफ्तार कर आगा खां महल स्थित कैदखाने में बंद कर दिया गया।

लेकिन इससे आंदोलन दबने के बजाय और उग्र हो गया और देशभर में ब्रितानी सरकार के खिलाफ जनाक्रोश उमड़ पड़ा। कांग्रेस की दूसरी पंक्ति के नेताओं और महिलाओं ने आंदोलन की कमान संभाल ली।

विपिन चंद्र ने लिखा है कि आंदोलन की बागडोर अच्युत पटवर्धन, अरुणा आसफ अली, राममनोहर लोहिया, सुचेता कृपलानी, बीजू पटनायक, छोटूभाई पुराणिक, आर.पी. गोयनका और बाद में जेल से भागकर जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने संभाले रखी।

सरकारी आकलनों के अनुसार, एक सप्ताह के भीतर 250 रेलवे स्टेशन और 500 डाकघरों और 150 थानों पर हमले हुए और उन्हें क्षति पहुंचाया गया। जगह-जगह टेलीफोन के तार काट दिए गए और सरकारी दफ्तरों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया।

आंदोलन जितना उग्र था, अंग्रेजों ने उसका दमन भी उतनी ही क्रूरता से किया। विपिनचंद्र के अनुसार, 1942 के अंत तक 60,000 से ज्यादा लोंगों को हवालात में बंद कर दिया गया, जिनमें 16,000 लोगों को सजा दी गई।

ब्रितानी हुकूमत ने आंदोलन को कुचलने की सारी तैयारी कर ली थी। दमनकारी कार्रवाई का अंदेशा कांग्रेसियों को पहले से ही था। इसलिए कांग्रेस ने 9 अगस्त को आंदोलन का आगाज होने से एक दिन पहले स्पष्ट कहा था कि आंदोलन में हिस्सा लेने वालों को खुद अपना मार्गदर्शक बनना होगा।

आंदोलनकारी अहिंसा का मार्ग छोड़ हिंसा पर उतर आए और उन्होंने जबरदस्त तोड़-फोड़ मचाकर अंग्रेजी सरकार की चूलें हिलाकर रख दी। मगर खुद गांधी ने भी इस हिंसक आंदोलन की निंदा करने से इनकार कर दिया और अनेक गांधीवादी विचारकों व नेताओं ने हिंसक कार्रवाई को वक्त की मांग बताई।

महात्मा गांधी की रिहाई के लिए पूरी दुनिया में मांग होने लगी। मगर, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल एक फकीर के आगे झुकने को तैयार नहीं थे। हालांकि ब्रितानी हुकूमत ने आखिरकार 6 मई, 1944 को महात्मा गांधी को रिहा कर दिया। इसके बाद अन्य प्रमुख नेताओं की रिहाई हुई।

अंग्रेजों ने भारत छोड़ो आंदोलन को क्रूरता के साथ दबा दिया, लेकिन इस आंदोलन से एक बात तय हो गया कि भारतीयों को अब पूर्ण आजादी के सिवा कुछ और मंजूर नहीं था और आखिरकार अंग्रेजों को महायुद्ध में विजय हासिल करने के बावजूद भारत को आजाद करना पड़ा।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

करुणानिधि : द्रविड़ राजनीति के शलाका पुरुष

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Karunanidhi DMK

चेन्नई, 7 अगस्त | मुथुवल करुणानिधि द्रविड़ अभियान से जुड़े उन अंतिम लोगों में से एक थे, जो तमिलनाडु में पांच दशक पहले सामाजिक न्याय के आधार पर राजनीति में पिछड़े वर्ग के उत्थान और कांग्रेस शासन की समाप्ति के अगुवा बनकर उभरे थे।

94 वर्षीय करुणानिधि तमिलनाडु के पांच बार मुख्यमंत्री रहे, जिन्होंने यहां एक शलाका पुरुष की तरह अपने सार्वजनिक जीवन को जीया। उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जब उन्होंने 1971 में इंदिरा गांधी का साथ दिया और इसका चुनावों में उन्हें फायदा मिला।

लेकिन उन्होंने 1975-77 के आपातकाल का कड़ा विरोध किया था, जिस दौरान उनकी सरकार को भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्त कर दिया गया था।

करुणानिधि के नेतृत्व में द्रमुक को 2004 और 2009 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में बेहतर स्थिति हासिल थी। इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में राजग सरकार में भी उनकी पार्टी को अच्छी स्थिति हासिल थी।

वह अपने पथ प्रदर्शक सी.एन. अन्नादुरई या अन्ना के स्थान पर 1969 में मुख्यमंत्री बने थे और पार्टी व सरकार पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई। वह लगभग 50 वर्षो तक द्रमुक के अध्यक्ष बने रहे।

वर्ष 2016 में उनकी प्रतिद्वंद्वी जे.जयललिता के निधन, और अब मंगलवार को उनके निधन के बाद तमिलनाडु में एक शून्य पैदा हो गया है।

करुणानिधि का जन्म तीन जून, 1924 को तंजावुर जिले में हुआ था। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने पत्रकार, नाटककार और पटकथा लेखक के तौर पर भी काम किया।

वह समाज सुधारक ‘पेरियार’ ई.वी. रामास्वामी और अन्ना के प्रभाव में आकर द्रविड़ अभियान से जुड़े।

कलैगनार के रूप में विख्यात करुणानिधि को कला, साहित्य, फैशन, रंगमंच और सिनेमा में भी दक्षता हासिल थी।

करुणानिधि के राजनीतिक भाग्य का निर्माण तब हुआ, जब अन्ना ने डीके से अलग होकर 1949 में द्रमुक की स्थापना की। तमिल फिल्म ‘पाराशक्ति’ के हिट हो जाने और तिरुचिरापल्ली के समीप काल्लाकुडी में रेल रोको अभियान ने उन्हें पूरे राज्य में पहचान दिलाने में मदद की। फिल्म में उन्होंने पटकथा लेखन किया था।

अन्नादुरई के निधन के बाद वह 1969 में राज्य के मुख्यमंत्री बने।

एक गरीब ईसाई वेल्लालर(एक पिछड़ी जाति) में जन्मे करुणानिधि का नाम उनके माता-पिता अंजुगम और मुथुलवल ने दक्षिणमूर्ति रखा था। बाद में उन्होंने अपना नाम बदलकर करुणानिधि रख लिया।

उन्होंने 1937-40 के दौरान हिंदी विरोधी प्रदर्शन में भी भाग लिया था और एक हस्तलिखित अखबार ‘मानवर नेसान(छात्रों का साथी)’ भी प्रकाशित किया था।

करुणानिधि ने मासिक ‘मुरासोली’ का भी प्रकाश किया था, जो बाद में साप्ताहिक हो गया और द्रमुक का अधिकारिक दैनिक पत्र बन गया। गत वर्ष इस पत्रिका ने हीरक जयंती मनाई थी।

उन्होंने 1957 में कुलिथालाई से सफलतापूर्वक अपना पहला चुनाव लड़ा था और उसके बाद से उन्होंने 13 चुनावों में से एक में भी हार का सामना नहीं किया।

–आईएएनएस

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Viral सच

लड़कियों की तुलना में लड़कों का यौन उत्पीड़न ज्यादा!

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Child Sexual Abuse in India

नई दिल्ली, 6 अगस्त | देश में अक्सर जब बात बच्चों से यौन उत्पीड़न के मामलों की आती है तो दिमाग में लड़कियों के साथ होने वाली यौन उत्पीड़न की घटनाएं आंखों के सामने उमड़ने लगती हैं, लेकिन इसका एक पहलू कहीं अंधकार में छिप सा गया है। महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की 2007 की रिपोर्ट दर्शाती है कि देश में 53.22 फीसदी बच्चों को यौन शोषण के एक या अधिक रूपों का सामना करना पड़ा, जिसमें से 52.94 फीसदी लड़के इन यौन उत्पीड़न की घटनाओं का शिकार हुए।

चेंज डॉट ओआरजी के माध्यम से बाल यौन उत्पीड़न के मामले को उठाने वाली याचिकाकर्ता, फिल्म निर्माता और लेखक इंसिया दरीवाला ने मुंबई से फोन पर आईएएनएस को बताया, “सबसे बड़ी समस्या है कि इस तरह के मामले कभी सामने आती ही नहीं क्योंकि हमारे समाज में बाल यौन उत्पीड़न को लेकर जो मानसिकता है उसके कारण बहुत से मामले दर्ज ही नहीं होते और होते भी हैं तो मेरी नजर में बहुत ही कम ऐसा होता है। इस तरह के मामले सामने आने पर समाज की पहली प्रतिक्रिया होती है कि लड़कों के साथ तो कभी यौन शोषण हो नहीं सकता, क्योंकि वे पुरुष हैं और पुरुषों के साथ कभी यौन उत्पीड़न नहीं होता।”

उन्होंने कहा, “समाज का जो यह नजरिया है लड़कों को देखने का ठीक नहीं है क्योंकि पुरुष बनने से पहले वह लड़के और बच्चे ही होते हैं। बच्चों की यह जो श्रेणी है काफी दोषपूर्ण है इसमें कोई लड़का-लड़की का भेद नहीं होता। लड़कों का जो शोषण हो रहा है अधिकतर पुरुषों द्वारा ही हो रहा है। मेरे हिसाब से यह काफी नजरअंदाज कर दी जाने वाली सच्चाई है और मैं पहले भी कई बार बोल चुकी हूं हम जो बच्चों व महिलाओं पर यह यौन हिंसा हमारे समाज में देख रहे हैं, कहीं न कहीं हम उसकी जड़ को नहीं पकड़ पा रहे हैं।”

लड़कों के साथ यौन उत्पीड़न होने पर बताने में कतराने की वजह के सवाल पर फिल्मनिर्माता ने कहा, “दरअसल जब समाज में किसी लड़की के साथ यौन उत्पीड़न की घटना होती है तो समाज की पहली प्रतिक्रिया हमदर्दी की होती है, उन्हें बचाने के लिए सपोर्ट सिस्टम होता है लेकिन अगर कोई लड़का अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामले को लेकर बोलता भी है तो पहले लोग उसपर हंसेंगे, उसका मजाक उड़ाएंगे व मानेंगे भी नहीं और उसकी बातों का विश्वास नहीं करेंगे, कहेंगे तुम झूठ बोल रहे हो यह तो हो नहीं सकता। हंसी और मजाक बनाए जाने के कारण लड़कों को आगे आने से डर लगता है इसलिए समाज बाल यौन उत्पीड़न में एक अहम भूमिका निभा रहा है।”

उन्होंने बताया, “पिछले एक साल में जब से मैंने अपना अभियान और लोगों से बात करना शुरू किया है तब से काफी चीजें हुई हैं। इसलिए मैं सरकार की शुक्रगुजार हूं कि कम से कम वह इस ओर ध्यान दे रहे हैं। आज सामान्य कानूनों को निष्पक्ष बनाने की प्रक्रिया चल रही है, इसकी शुरुआत पॉस्को कानून से हुई और अब धारा 377, पुरुषों के दुष्कर्म कानून को भी देखा जा रहा है। अब अखिरकार हम लोग लिंग समानता की बात कर सकते हैं, जिससे वास्तव में समानता आएगी। लिंग समानता का मतलब यह नहीं है कि वह एक लिंग को ध्यान में रखकर सारे कानून बनाए, यह सिर्फ महिलाओं की बात नहीं है। पुरुष और महिलाओं को समान रूप से सुरक्षा मिलनी चाहिए।”

लेखक इंसिया दरीवाल ने कहा, “देखिए पॉस्को कानून निष्पक्ष है लेकिन जब आप लड़कों के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में दंड के प्रावधान को देखते हैं तो वह धारा 377 के तहत दिया जाता था। जैसे पहले अगर दो पुरुषों के बीच सहमति से हुआ तो भी धारा 377 के तहत दोनों लोगों को सजा मिलती थी और नहीं हुआ तो भी दोनों को इसी धारा के तहत सजा दी जाती थी। इसमें पीड़ित को भी सजा मिलने का खतरा था, हालांकि अब चीजों में सुधार हुआ है और इसपर अब काफी चर्चा हो रही है और समाज में भी बदलाव आ रहा है।”

महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी से मिले समर्थन पर उन्होंने कहा, “उन्होंने मेरे काम की सराहना की है और कहा कि यह काम काफी जरूरी है। मैंने उनसे एक स्टडी की मांग की थी, जिसमें यह देखना था कि बाल यौन उत्पीड़न की हमारे समाज में कितनी प्रबलता है और इसके जो प्रभाव हैं वह बच्चों और पुरुषों पर क्या हैं, इसमें यौन प्रभाव, उनके संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ता है, उनके मानसिकता और शारिरिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता यह सब शामिल है। इस स्टडी के निष्कर्षो से मुझे मापदंड तैयार करने हैं और उन मापदंड़ों को मैं इसलिए तैयार करना चाहती हूं क्योंकि जब तक हम जड़ की जांच नहीं करेंगे तब तक नहीं पता चलेगा कि यह क्यों हो रहा है।”

बाल यौन उत्पीड़न मामलों में समाज की गलती के सवाल पर इंसिया ने कहा, “समाज कौन है हम लोग, इसलिए मानसिकता बदलना बहुत जरूरी है क्योंकि अगर हम लोग मानसिकता नहीं बदल पाए तो कानून कितने भी सख्त हो जाए तो उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। जब भी कोई घटना होती है तो हम सरकार, कानून और वकीलों को दोषी ठहराते हैं लेकिन हमें कहीं न कहीं खुद को भी देखना चाहिए क्योंकि हमारे समाज में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग भूमिका तैयार कर दी गई है, जिसे उन्हें निभाना पड़ता है, इसे बदलने की जरूरत है।”

भारत सरकार ने लिंग निष्पक्ष कानून बनाने के मद्दनेजर लड़कों के साथ होने वाले यौन शोषण को मौजूदा यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा (पॉस्को) अधिनियम में संशोधनों को मंजूरी दे दी है जिसे कैबिनेट के पास मंजूरी के लिए भेजा जाना बाकी है।

–आईएएनएस

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