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ओपिनियन

विफल होते क़ानूनों की वजह से ख़तरे में लोकतंत्र

बीते चार सालों में हमारे संवैधानिक लोकतंत्र की दो अहम विशेषताओं का पतन हुआ है। पहला, क़ानून के सर्वोपरि होने की धारणा पर हमले हुए हैं। दूसरा, क़ानूनी प्रक्रिया का सियासी मक़सद के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है।

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Kapil Sibal

संवैधानिक लोकतंत्र के दो अनिवार्य अंग हैं। पहला, इंसान नहीं, बल्कि क़ानून सर्वोपरि है। दूसरा, हरेक निर्वाचित प्रतिनिधि की सम्प्रभुता उन संस्थाओं की हैसियत से ऊपर है जो चुनाव से स्थापित नहीं होते। संवैधानिक लोकतंत्र में क़ानून का दर्ज़ा सबसे ऊपर है। यही संविधान की बुनियादी धारणा है। विधायिका किसी क़ानून के ज़रिये इसमें कटौती नहीं कर सकती। यदि विधायिका कभी ऐसा करे भी तो अदालतें ये सुनिश्चित करती हैं कि क़ानून ही सर्वोपरि है। निर्वाचित संस्थाएँ, संविधान के दायरे में ही अपना काम करती हैं और संविधान के मुताबिक़ ही समय-समय पर जनता के प्रति उनकी जबाबदेही तय होती है।

बीते चार सालों में हमारे संवैधानिक लोकतंत्र की दो अहम विशेषताओं का पतन हुआ है। पहला, क़ानून के सर्वोपरि होने की धारणा पर हमले हुए हैं। दूसरा, क़ानूनी प्रक्रिया का सियासी मक़सद के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है। स्थापित प्रक्रिया को दरकिनार किया जा रहा है। जनप्रतिनिधि ही एजेंडा की आवाज़ बन रहे हैं और उन मूल्यों को तहस-नहस कर रहे हैं जो लोकतंत्र की बुनियाद हैं। हमारे कुछ जनप्रतिनिधि और एक ख़ास विचारधारा के लोग न सिर्फ़ हिंसा को उकसाते हैं, बल्कि कई बार उसका हिस्सा भी बनते हैं। संवैधानिक अधिकारों का गला घोटा जाता है। अभिव्यक्ति की आज़ादी इसका शिकार बनती है। लोकतांत्रिक संस्थाएँ अपाहिज़ हो रही हैं।

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने 131 मुक़दमों को वापस लेने का ऐलान किया। ये मामले हत्या और हत्या का प्रयास जैसे संगीन अपराधों से जुड़े थे। ये प्रसंग इस बात की मिसाल है कि कुछ लोग क़ानून से भी ऊपर हो सकते हैं। बेशक़, किसी मुक़दमें को लेकर यदि सरकारी वकील को तथ्यों के आधार पर ये लगे कि उसे वापस लेना ही उचित होगा तो अदालत की मंज़ूरी से मुकदमा वापस लिया जा सकता है। लेकिन राजनीतिक मक़सद से, एक ही झटके में 131 मुकदमों को वापस ले लेने का फ़ैसले की कल्पना भी लोकतंत्र में नहीं की जा सकती। हत्या या इसकी कोशिश की वजह तो राजनीतिक हो सकती है, लेकिन हत्या का होना राजनीतिक नहीं हो सकता।

सरकार में बैठे लोगों पर संगीन अपराधों के आरोप हों और अभियोजन की आँखों के सामने ही उसे रफ़ा-दफ़ा कर दिया जाए तो हालात को बेहद चिन्ताजनक समझिए। अभियुक्त नामी-गिरामी लोग हैं। सत्ता से उनकी नज़दीकी को नकारा नहीं जा सकता। मौजूदा दौर में जाँच एजेंसियों के दुरुपयोग करके राजनीतिक विरोधियों को भी निशाना बनाया जा रहा है। एक के बाद एक गवाहों का अपने बयान से मुकर जाना भी क़ानून के राज के लिए बेहद चिन्ताजनक है। जाँच एजेंसियों के सरकारी एजेंट बन जाने से सच का दमन हो रहा है। इसीलिए ज़रूरी है कि संगीन अपराधों के मामलों को सत्ता के नशे से दूर ही रखा जाए और दुर्भावनापूर्ण मुकदमें ठोंककर क़ानूनी प्रक्रिया का दमन नहीं हो।

क़ानूनी प्रक्रिया का पक्षपातपूर्ण हो जाना भी बेहद चिन्ताजनक है। दिन-दहाड़े होने वाले अपराधों की यदि प्रमाणिक जाँच नहीं होगी या जाँच में प्रभावशाली अभियुक्तों को बचाया जाएगा तो क़ानून के राज की गरिमा कैसे बचेगी? सरेआम बर्बरतापूर्वक हुई दलितों की पिटाई, घुड़सवारी करने की वजह से दलित की हत्या कर देना, धार्मिक जुलूसों के ज़रिये हिंसा फैलाना और इसमें पुलिस के शामिल होने पर क़ानून की क्या औक़ात रह जाएगी! हाल ही में हमने देखा कि पश्चिम बंगाल के आसनसोल में एक केन्द्रीय मंत्री ने दिन-दहाड़े लोगों को चमड़ी उधेड़ लेने की धमकी दी। ये बताता है कि देश में क़ानून के राज की धारणा कितनी तबाह हो चुकी है!

बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के अलावा कई स्थानों पर फैली हिंसा को अभी-अभी हमने क़रीब से देखा है। उत्तर प्रदेश में सारे नियम-क़ायदों को ताक़ पर रखकर पुलिस ऐसे मुठभेड़ों को अंज़ाम दे रही है, जिससे पता चलता है कि सरकार पर सत्ता का नशा किस क़दर सवार है और वो क़ानून को कितनी अहमियत दे रही है! ये नज़ारा उस सरज़मीं का है जो अपनी सहिष्णुता और आध्यात्म के लिए जाना जाता है। तानाशाही का उल्लंघन करने के लिए डाँडी मार्च का आयोजन किया गया था। लेकिन अभी तो सरकार ही तानाशाह बनकर रोज़ाना संविधान का उल्लंघन कर रही है।

जब क़ानून ही दमन का ज़रिया बन जाता है तो इसकी प्रतिष्ठा गिरती है। जाँच एजेंसियाँ जब कठोर क़ानूनों का दुरुपयोग करती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे किसी राजा के हाथों में तलवार हो! ऐसे दुरुपयोग से आप किसी की भी प्रतिष्ठा को तार-तार कर सकते हैं। बीते चार वर्षों ने हमने ऐसे दुरुपयोग बहुत व्यापक स्तर पर देखे हैं। क़ानून का उद्देश्य है, इंसाफ़ करना। लेकिन इसे तो नाइंसाफ़ी का हथकंडा बना दिया गया है। क़ानून का दुरुपयोग होने की वजह से तमाम लोकतांत्रिक संस्थाएँ लाचार हो जाती हैं। यही वजह है कि हाल ही में कई न्यायिक आदेशों ने अभियोजन पक्ष को दुर्भावनापूर्ण पाकर उसके आरोपों को ख़ारिज़ कर दिया है।

ज़रा सोचिए कि यदि झूठे और दुर्भावनापूर्ण आरोपों की वजह से एक व्यक्ति को 8-10 साल जेल में काटने पड़ें, इसकी उसकी ज़िन्दगी तबाह हो जाए, तब उसे हुए नुकसान की भरपाई कैसे होगी? हुक़ूमत तो इसका ख़ामियाज़ा भरती नहीं! इसीलिए ज़रूरी है कि हमारा लोकतंत्र अपने नागरिकों को क़ानून के दुरुपयोग से होने वाले ज़ुल्म से बचाए।

एक और पहलू भी चिन्ताजनक है। क़ानून सर्वोपरि है। न्यायपालिका इसकी पहरेदार है। लेकिन दुर्भाग्यवश आज न्यायपालिका की प्रक्रिया और उसकी सुचिता पर सरेआम सवाल उठाये जा रहे हैं। न्यायपालिका को भी सामूहिक रूप से ये सुनिश्चित करना होगा कि कोई उसे शक़ की नज़र से न देखे। यदि ऐसा नहीं होगा तो हमारा लोकतंत्र विफल हो जाएगा। इसीलिए न्यायपालिका ने भी कई बार अपनी गम्भीर चिन्ताएँ ज़ाहिर की हैं। इसके बावजूद, सुधारवादी उपाय होते नहीं दिख रहे। जब सत्तासीन लोग न्यायपालिका की स्वतंत्रता के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे, तब ये मानकर चलिए कि हमारा संविधान और उसकी व्यवस्थाएँ ख़तरे में हैं। बक़ौल लार्ड डेनिंग, ‘आप चाहे जितने बड़े हों, क़ानून आपसे भी ऊपर है।’ न्यायपालिका को इसी सिद्धान्त के मुताबिक़, निर्भय और निर्भीक होकर अपना काम करना चाहिए। लेकिन हमारे लोकतंत्र में कुछ लोगों ने ये धारणा पाल ली है कि वो क़ानून से भी ऊपर हैं। ऐसे में क़ानून को ही उनकी ग़लतफ़हमी दूर करनी होगी।

हमें उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि मौजूदा दौर से भी हमारा लोकतंत्र परिपक्व ही होगा। इतिहास में यही दर्ज होगा। एक नागरिक के तौर पर जब तक हम अपने लोकतंत्र को विफल नहीं कर देंगे, तब तक लोकतंत्र भी हमें विफल नहीं होने देगा। क़ानून को उन्हें बौना बनाना होगा जो हमारे लोकतंत्र की बुनियाद पर हमले कर रहे हैं।

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस। लेखक, वरिष्ठ काँग्रेस नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं।)

ओपिनियन

प्रणब का मिशन नागपुर लोकतंत्र के लिए कितना सही?

अपने अब तक के राजनीतिक करियर में मुखर्जी जिन मान्यताओं और मूल्यों पर कायम रहने के लिए जाने जाते रहे, क्या उन्हें ताक पर रखकर उनका नागपुर जाने का फैसला गलत था?

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Pranab Mukherjee

नागपुर से प्रणब की जो तस्वीरें देखने को मिलीं, उसे एक कांग्रेस नेता के शब्दों में हजम करना मुश्किल था। जो शख्स धर्मनिरपेक्षता के रंग में रंगे रहे, जिदंगी के कई साल कांग्रेस पार्टी को दिए और फिर संविधान कायम रखने की जिम्मेदारी के साथ राष्ट्रपति बने, वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जैसे संगठन के प्रमुख के साथ मंच साझा कर रहे थे और उनकी आवभगत का आनंद ले रहे थे। यह उन्हें उन मूल्यों व आदर्शो का समर्थन करता दिखाता है, जिनके विरोध में वे हमेशा खड़े रहे और संघर्ष करते रहे।

मुखर्जी के पहली बार हिंदूवादी संगठन के मुख्यालय में जाने के विवाद पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक वैचारिक सलाहकार ने मध्यम स्तर के एक कांग्रेस नेता से पूछा, “आप उस सरकार का हिस्सा थे, जिसने 1975 में और फिर 1992 में आरएसएस को प्रतिबंधित किया। क्या आपको नहीं लगता कि आपको हमें बताना चाहिए कि उस समय आरएसएस में क्या बुराई थी, जो अब उसका गुण बन गया है?”

प्रणब की बेटी शर्मिष्ठा सहित कांग्रेस पार्टी के कई नेताओं ने ऐसे संगठन से मिले निमंत्रण को स्वीकार करने पर सवाल उठाए, जो वामपंथी-उदारवादी- धर्मनिरपेक्षता की स्थापना को नापसंद करता आया है। न सिर्फ समर्पित, बल्कि चिंतित नागरिक भी भी देश में नफरत और पूर्वाग्रह वाले माहौल में अपनी व्यथा जाहिर कर रहे हैं और अल्पसंख्यकों पर सुनियोजित हमले और सामाजकि रूप से सताए दलितों व पिछड़ों के दमन के लिए आरएसएस और उससे संबद्ध संघ परिवार के संगठनों की विचारधारा को दोषी ठहराते रहे हैं।

कई लोगों ने आवाज उठाई है कि यदि इस तरह से नफरत का जहर फैलाने दिया जाता रहा, तो यह भारत के उस बहुपक्षीय, बहुसंख्यक और बहुसांस्कृतिक सामाजिक संरचना व तानेबाने को खत्म कर सकता है, जो देश को इतना अनोखा व अद्वितीय बनाता है।

कथित रूप से हिंदू राष्ट्रवादी समूहों से संबद्ध कमसिन लड़कियों के खिलाफ क्रूर हिंसा के बाद अप्रैल में देशभर में चलाए गए ‘हैशटैगनॉटइन माइनेम’ विरोध अभियान के दौरान ऐसे संदेश छाए रहे कि “आज हम घृणा की राजनीति का सामना कर रहे हैं जो हमारे देश के बड़े हिस्सों में फैल गया है .. मुसलमान अगले दौर के हमलों के डर के साये में रहते हैं, यहां तक कि संविधान में दलितों और आदिवासियों को जो अधिकार मिले हैं, उस पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।”

83 वर्षीय मुखर्जी ने बढ़ते ध्रुवीकरण के इस माहौल में पुराने कैबिनेट और पार्टी के कुछ सहयोगियों की अपील को अनदेखा कर दिया। राष्ट्रीय स्तर पर टेलीविजन पर सीधे प्रसारित भाषण में मुखर्जी ने कहा “भारत की आत्मा बहुलवाद और सहिष्णुता में बसती है” और “धर्मनिरपेक्षता व समावेश हमारे लिए विश्वास का विषय है।”

उन्होंने उस आरएसएस रैंक और फाइल की याद दिलाई, जिन्होंने हिंदू सर्वोच्चवादी विचारधारा का प्रचार किया और जिसके संस्थापक ने मुसलमानों और ईसाइयों को ‘आक्रमणकारी’ माना। यह (विभिन्न धर्म) वह चीज है जिससे “हमारी संस्कृति, विश्वास और भाषा की बहुतायत भारत को विशेष बनाती है” और “धर्मशास्त्र, धर्म, क्षेत्र, घृणा और असहिष्णुता के सिद्धांत व पहचान के आधार पर हमारे राष्ट्रवाद को परिभाषित करने का कोई प्रयास हमारी राष्ट्रीय पहचान को धूमिल करने का ही काम करेगा।”

अपने अब तक के राजनीतिक करियर में मुखर्जी जिन मान्यताओं और मूल्यों पर कायम रहने के लिए जाने जाते रहे, क्या उन्हें ताक पर रखकर उनका नागपुर जाने का फैसला गलत था?

उनकी सोच की एक झलक उनके भाषण में दिखाई पड़ती है, जिसमें उन्होंने इस बात पर दुख जाहिर किया कि ‘क्रोध की अभिव्यक्ति’ राष्ट्रीय संरचना को पूरी तरह से नष्ट कर रही है। उन्होंने कहा, “बातचीत न केवल प्रतिस्पर्धी हितों को संतुलित करने के लिए, बल्कि उन्हें सुलझाने के लिए भी जरूरी है .. सिर्फ संवाद के माध्यम से हम बिना हमारे राजनीति के भीतर अस्वास्थ्यकर संघर्ष के जटिल समस्याओं को हल करने की समझ विकसित कर सकते हैं।

संवाद और समायोजन लोकतांत्रिक कार्यकलापों के आधारशिला हैं और उनकी अनुपस्थिति अक्सर लोकतंत्र की मौत की घंटी बजती है।

अपनी किताब ‘हाउ डेमोक्रेसीज डाई’ में हार्वर्ड के प्रोफेसरों स्टीवन लेविट्स्की और डेनियल जिबलाट ने आज अमेरिकी लोकतंत्र में मौजूद ‘चरम कट्टरपंथी विभाजन’ के बारे में बात की है जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में सामाजिक धारणाओं व मान्यताओं के टूटने को दर्शाता है, यह न सिर्फ डेमोक्रेट और रिपब्लिकन नेताओं के बीच बढ़ते नीतिगत मतभेद में नजर आ रहा है, बल्कि नस्ली और धार्मिक मतभेदों का भी बढ़ना नजर आ रहा है और लोकतंत्र की सुरक्षा रेलिंग को भी नुकसान पहुंच रहा है।

भारत आज भी दोराहे पर खड़ा है, जो शायद 71 साल के इतिहास में अभूतपूर्व है। जैसे ही कोई राष्ट्रीय प्रवचन दिनभर में चर्चा का विषय बन जाता है, सोशल मीडिया पर अक्सर दो चरम विभाजनकारी और नफरत फैलाने वाली विचारधाराओं के बीच ठन जाती है। इससे लोकतंत्र के हिमायती आम नागरिकों, खासकर युवा, जो परिवर्तन और प्रगति के लिए उत्सुक हैं, उन्हें निराशा हाथ लगती है।

देश में हाल के चुनावों में बुरी स्थिति देखने को मिली है। न सिर्फ शपथ ग्रहण करने वाले राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच, बल्कि विचारधाराओं के बीच भी विरोध देखने को मिला है जो मूल रूप से उनके राष्ट्रीय दृष्टिकोण में भी एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत है।

और शायद यही कारण है कि मुखर्जी ने महसूस किया कि उन्हें राष्ट्रीय भाषण में विचारों में गहराती खाई को पाटने के लिए आगे आना होगा और संवाद के लिए आग्रह करना होगा।

द इकोनॉमिस्ट ने अपने हालिया स्तंभों में से एक में प्यू ग्लोबल सर्वेक्षण का जिक्र करते हुए कहा, “यह शायद अप्रियकर हो सकता है, भारत की राजनीतिक व्यवस्था को शायद बड़ी उपलब्धियों के साथ श्रेय दिया जा सके।” सर्वेक्षण में पाया गया कि किसी अन्य लोकतांत्रिक देशों के नागरिकों के मुकाबले भारतीय लोग लोकतंत्र को लेकर कम उत्साहित हैं और मजबूत नेता चाहने या सैन्य शासन की ओर ज्यादा आकर्षित हैं।

लोकतंत्र ने एक विशाल और लगभग असंभव रूप से विविधता वाले देश को एकजुट रखने में मदद की है। इसने सेना को सत्ता से बाहर रखा है और इसने नागरिक स्वतंत्रता को बरकरार रखा है। भारत अपनी लचीली व्यवस्था के कारण ही कई पड़ोसियों के लिए ईष्र्या का विषय बना हुआ है।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

मप्र : विधानसभा चुनाव में निर्णायक होंगे फर्जी मतदाता

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Fake Voter ID

भोपाल, 4 जून | मध्य प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में फर्जी मतदाता बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इसे लेकर कांग्रेस ने चुनाव आयोग के यहां शिकायत दर्ज कराई है। कांग्रेस ने 60 लाख फर्जी मतदाता होने का दावा किया है।

फर्जी मतदाताओं का सबसे पहला और बड़ा खुलासा तो इसी साल के फरवरी माह में शिवपुरी के कोलारस और अशोकनगर के मुंगावली में हुए विधानसभा उपचुनाव के दौरान हुआ था। आगामी चुनाव में राजनीतिक दल और उनके कार्यकर्ता सजग व सर्तक रहे तो चुनाव के नतीजों में बड़े बदलाव की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है।

पिछले माह की नौ मई को आईएएनएस ने सिर्फ शिवपुरी जिले में 60 हजार फर्जी मतदाताओं का खुलासा किया था। इनमें से 21,000 मतदाता ऐसे थे, जिनकी वषरें पहले मौत हो चुकी थी।

इस सूची में 28,067 मतदाता ऐसे हैं, जो दूसरी जगह चले गए, फिर भी सूची में उनके नाम हैं। जिले में अपने स्थान पर अनुपस्थित पाए गए मतदाताओं की संख्या 5,633, और एक से ज्यादा स्थानों पर 5,031 मतदाताओं के नाम पाए गए थे।

गौरतलब है कि फरवरी माह में कोलारस विधानसभा उपचुनाव के दौरान भी यह बात सामने आई थी कि 5,537 मृत मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में मौजूद थे। शिकायत के बाद शिवपुरी के तत्कालीन जिलाधिकारी तरुण राठी को इस मामले में चुनाव आयोग ने लापरवाही का दोषी पाया था।

आयोग ने जांच में पाया था कि जिलाधिकारी तरुण राठी ने सूची में गड़बड़ी पर सही मॉनिटरिंग नहीं की। इसके बाद निर्वाचन आयोग ने मुख्य सचिव बसंत प्रताप सिंह को पत्र भी लिखा था। बाद में राठी का तबादला कर दिया गया।

ऐसे में सवाल उठा कि जब शिवपुरी जिले के पांच विधानसभा क्षेत्रों में 60,000 फर्जी मतदाता अर्थात औसतन एक विधानसभा में 12,000 फर्जी मतदाता हो सकते हैं, तो प्रदेश के 230 विधानसभा क्षेत्रों का क्या हाल होगा। इसी आधार पर कांग्रेस ने विधानसभा की 100 सीटों पर मतदाताओं की स्थिति का पता लगाया, जिसमें औसत तौर पर एक बात सामने आई कि राज्य में 6000,000 फर्जी मतदाता हैं। एक मतदाता की 10 से 20 मतदान केंद्रों की सूची में नाम और तस्वीरें हैं।

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा अन्य नेताओं ने चुनाव आयोग को शिकायत की, जिस पर जांच भी शुरू हो गई है। आयोग ने एक जांच दल भोपाल भी भेजे हैं।

राज्य की मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी सलीना सिंह का कहना है, “जो हुआ है वह नहीं होना चाहिए। इसमें सुधार के लिए हमारी ओर से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। जिला स्तर पर ऐसा सिस्टम बनाने की कोशिश हो रही है, जिसके जरिए एक ही तस्वीर कई स्थानों पर पाए जाने पर उन्हें हटाया जाए। हमारी सबसे मजबूत कड़ी ब्लॉक स्तर का अधिकारी होता है, वह अच्छा काम करेगा, कलेक्टर उस पर निगरानी अच्छे से रखेंगे तो तस्वीरों का दोहराव नहीं होगा।”

राज्य सरकार के सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग ने कहा, “मतदाता सूची में गड़बड़ी है तो उसमें सुधार होना चाहिए, मगर एक सवाल यह भी उठता है कि मतदाता सूची ब्रेक कैसे हुई। ऐसा कौन सा सॉफ्टवेयर आ गया, यह भी जांच का विषय है। इतना तय है कि इससे सरकार या उससे जुड़े लोगों का कोई लेना-देना नहीं है।”

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता महेंद्र सिंह चौहान ने पिछले दिनों चुनाव आयोग से शिकायत की थी कि भोपाल जिले के नरेला विधानसभा क्षेत्र में कई मकान ऐसे हैं, जिनका आकार 1550 से 2000 वर्ग फुट है और वहां 100 से 150 तक मतदाता होना बताया गया है।

राज्य के आगामी विधानसभा चुनाव में फर्जी मतदाता का मसला काफी अहम रहने वाला है, क्योंकि 230 विधानसभा क्षेत्रों में लगभग 50 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां जीत हार का अंतर अधिकतम 5,000 रहता है। इस स्थिति में अगर फर्जी मतदाताओं के नाम काट दिए गए और उनके स्थान पर कोई वोट नहीं डाल पाया तो नतीजे चुनावी तस्वीर बदलने वाले साबित हो सकते हैं।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

राहुल गांधी कर सकते हैं मप्र में मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा : कमलनाथ

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kamal nath

नई दिल्ली, 7 मई | मध्यप्रदेश कांग्रेस के नए अध्यक्ष कमलनाथ का कहना कि पार्टी में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करने की परंपरा नहीं है। मगर, जरूरत पड़ी तो पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर सकते हैं।

कमलनाथ ने कहा कि मध्यप्रदेश के लोग शिवराज सिंह चौहान की सरकार की ‘ठगी’ से नाराज हैं और कांग्रेस ने इस साल के आखिर में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव में उन्हें हराने के लिए कमर कस ली है।

उन्होंने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “बेशक, समय कम है मगर मुझे पक्का विश्वास है कि मैं गांव स्तर पर पार्टी के संगठन को मजबूत बनाने में सक्षम साबित होऊंगा। यह मुकाबला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की संगठन-शक्ति व पैसे की ताकत के साथ है।”

कांग्रेस के 71 वर्षीय वरिष्ठ नेता और छिंदवाड़ा से सांसद कमलनाथ नौ बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। उन्होंने कहा कि आगामी चुनाव के मद्देनजर पार्टी की प्रदेश इकाई में बदलाव संबंधी फैसला बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था। लेकिन वह अब बीती बातों पर नुक्ताचीनी नहीं करना चाहते कि इस संबंध में फैसला पहले क्यों नहीं लिया गया।

पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ को 26 अप्रैल को मध्यप्रदेश कांग्रेस की प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने कहा कि उनका कोई गुट नहीं है और पार्टी के सभी नेताओं से उनके अच्छे रिश्ते हैं।

कमलनाथ की बातों से जाहिर होता है कि विधानसभा चुनाव में खुद उतरने को लेकर उन्होंने अपना विकल्प खुला रखा है। उन्होंने कहा, “मैं 40 साल से चुनाव लड़ता आ रहा हूं। बतौर सांसद मेरा सेवाकाल सबसे लंबा रहा है।”

जब पूछा गया कि क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया विधानसभा चुनाव मैदान में उतरेंगे तो उन्होंने कहा, “मुझे नहीं मालूम।”

मध्यप्रदेश में कांग्रेस द्वारा मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं किए जाने और सिंधिया को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख नियुक्त कर संतुलन कायम किए जाने के संबंध में पूछे गए सवालों पर कमलनाथ ने कहा, “मध्यप्रदेश एक बड़ा राज्य है और यहां कोई एक शख्स चुनाव नहीं जीत सकता। आपको कई चेहरों की जरूरत होती है। यही कारण है कि पार्टी ने ऐसा फैसला लिया है।”

जब पूछा गया कि क्या वह चाहेंगे कि पार्टी मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करे तो उन्होंने कहा कि हर राज्य के लिए अगल रणनीति होती है।

कमलनाथ ने कहा, “कभी-कभी यह जरूरी होता है, जबकि कभी इसकी जरूरत नहीं होती। क्या भाजपा ने उत्तर प्रदेश में किसी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया था? क्या उन्होंने उत्तराखंड में किसी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया? उनका कभी कोई मुख्यमंत्री उम्मीदवार (चुनाव से पूर्व) नहीं था। इसलिए यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है।”

कमलनाथ ने इससे पहले अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि पार्टी को हर राज्य में बताना चाहिए कि वहां उसका नेता कौन है। इसका जिक्र करने पर उन्होंने कहा, “अगर जरूरत महसूस होगी तो कांग्रेस अध्यक्ष किसी के नाम की घोषणा करेंगे।”

कमलनाथ ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख के तौर पर उनकी प्राथमिकता पार्टी को गांव स्तर पर मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा, “चुनाव बहुत मायने में स्थानीय बन गया है और हमें यह समझना होगा।”

कांग्रेस को मध्यप्रदेश में पिछले तीन विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा है। कमलनाथ का आरोप है कि भाजपा पूर्व में किए अपने वादों को पूरा करने में विफल रही है।

पार्टी के प्रदेश प्रमुख के तौर पर अपनी नियुक्ति के संबंध मे कमलनाथ ने कहा, “मेरे सभी से अच्छे रिश्ते हैं। इसलिए मेरे लिए पार्टी में एकता लाना कोई चुनौती नहीं है। मैं भाग्यशाली हूं कि इसकी कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि पार्टी में पहले से ही एकता है।” उन्होंने पार्टी में सिंधिया के साथ किसी भी प्रकार के मतभेद से इनकार किया।

कमलनाथ ने कहा कि उनका मुकाबला अभी वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज से है।

–आईएएनएस

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