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दलित-विरोधी नहीं होती बीजेपी तो उसके सांसद अपनी क़िस्मत पर क्यों रोते…?

अब फैलाया जाएगा कि ये बेईमान सांसद, अच्छे दिन वाली बीजेपी और रामराज्य रूपी सुशासन के विशेषज्ञ योगी आदित्यनाथ पर तथ्यहीन लाँछन लगाकर उन्हें बदनाम कर रहे हैं!

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Photo Credit : Thewire

चौकीदार नरेन्द्र मोदी बेहद गदगद हैं कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के एक दलित राम नाथ कोविन्द को राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद पर बिठा दिया। मोदी, जनता को बरगला रहे हैं कि बीजेपी का दलित-प्रेम देखकर उसके विरोधियों के छक्के छूट गये। बीजेपी को ख़ुशफ़हमी है कि चितपावन ब्राह्मणों के संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ऐसा त्याग देखकर उन विरोधियों के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गयी है जिन्होंने दलित समाज से आने वाले के आर नारायणन को दशकों पहले वहाँ तक पहुँचा दिया था, जहाँ कोविन्द अब पहुँचे हैं! काँग्रेस ने आम्बेडकर, जगजीवन राम जैसे दलित नेताओं को प्रमुखता देने में कोई कोताही नहीं की। उसने पिछड़े वर्ग से आने वाले ज्ञानी जैल सिंह को भी राष्ट्रपति बनाया तो महिलाओं के रूप में प्रतिभा पाटिल और मीरा कुमार को भी शीर्ष संवैधानिक पदों तक पहुँचाया। इसीलिए, ये समझना बेहद ज़रूरी है कि संघ-बीजेपी का दलित-प्रेम उसके दिखाने के दाँत हैं।

अब सवाल ये है कि खाने का दाँत कैसे हैं? इसका सबसे शानदार जबाब, उत्तर प्रदेश के ही दलित समाज से आने वाले बीजेपी के कम से कम तीन सांसदों ने पूरी बेबाकी से दे दिया है। ये सांसद हैं: राबर्ट्सगंज से छोटेलाल खरवार, इटावा से अशोक दोहरे और नग़ीना से डॉ यशवन्त सिंह। इन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ख़त लिखकर बताया है कि उत्तर प्रदेश में दलितों के प्रति बहुत बुरा सलूक हो रहा है, वो भी सीधे-सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की शह पर इशारे पर! इन तीनों के अलावा सावित्री बाई फुले भी संघ-बीजेपी के दलित-विरोधी रवैये से आहत हैं।

दरअसल, बीजेपी बुनियादी तौर पर एक झूठी और दोगली बातें करने वाली पार्टी है। ये एक ओर तो तुष्टिकरण की विरोधी होने का दावा करती है लेकिन दूसरी ओर कभी हिन्दुओं का तो कभी सवर्णों का और कभी दलितों का तुष्टिकरण करती नज़र आती है। सवर्णों को ख़ुश करने के लिए उनके बीच आरक्षण को लेकर दुष्प्रचार किया जाता है। अन्दरखाने फ़ैलाया जाता है कि बीजेपी, आरक्षण को ख़त्म कर देगी। लेकिन चुनाव जीतने के लिए संघ प्रमुख मोहन भागवत कहते हैं कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए। समीक्षा का सीधा-सीधा मतलब है कि अभी जो आरक्षण है, वो ग़लत है। ख़राब है। घटिया है। यही पहलू उन सवर्णों के बीच फैलाया जाता है जो आरक्षण को लेकर तरह-तरह की अज्ञानता में जी रहे हैं।

दलितों की नाराज़गी जब सामने आती है तो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के भी हाथ-पैर फूलने लगते हैं। तभी तो वो समीक्षा की बातों को दरकिनार करके ऐलान करते हैं कि ‘बीजेपी कभी आरक्षण ख़त्म नहीं करेगी और ना ही किसी को ऐसा करने देगी।’ उधर, बेहिसाब चमक-दमक में जीने वाले चौकीदार भी कहते हैं कि विरोधियों को ये बर्दाश्त नहीं हो रहा कि वो ग़रीब और पिछड़े परिवेश से आये हैं। ये लफ़्फ़ाज़ी है! सच तो ये है कि यदि आपके आगे आने के रास्ते बन्द होते तो आप आगे आते कैसे? आप आगे आये क्योंकि रास्ता था। प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनने का रास्ता किसी के लिए भी आसान नहीं होता। फिर चाहे वो ग़रीब हो या अमीर, राजा हो या रंक, वंशवादी हो या नहीं हो! इतिहास में भी ऐसा कभी नहीं हुआ कि अयोग्य व्यक्ति शीर्ष पर बना रहे। युवराज होने के नाते कोई अगला राजा भले ही बनता था, लेकिन नये राजा के रूप में उसे भी अपनी क़ाबलियत स्थापित करने पड़ती थी। यही वजह है कि दुनिया के हर समाज में राजवंश बदलते रहे हैं।

कोई राजवंश चिर-स्थायी नहीं होता। हो ही नहीं सकता! काँग्रेस में इन्दिरा, राजीव, सोनिया और राहुल सभी पर संघियों ने वंशवादी होने के आरोप लगाये। सबका यथासम्भव चरित्रहनन किया। लेकिन ये भी सच है, सबने अपने-अपने दौर में अपनी श्रेष्ठता साबित की। क्या इन नेताओं को जनादेश हासिल करने की अग्निपरीक्षा से नहीं गुज़रना पड़ा? क्या इन नेताओं को अपने से संगठन में विरोध और बग़ावत के स्वरों से नहीं जूझना पड़ा? राजनीति में महत्वाकाँक्षा का होना स्वाभाविक है। इसी से आन्तरिक अंकुश और सन्तुलन पैदा होता है। राजीव गाँधी भी यदि काँग्रेस को चमका नहीं पाएँगे तो उनकी भी विदाई को कोई टाल नहीं सकता!

अरे, ये तो विषयान्तर हो गया। वापस रुख़ करते हैं, बीजेपी के दलित प्रेम की ओर। उत्तर प्रदेश के दलित समाज से आने वाले सांसदों को अब ये अच्छी तरह से समझ में आ चुका है कि किन मनुवादी ताक़तों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के ज़रिये SC-ST Act को बेअसर बनाने की साज़िश को मुक़ाम तक पहुँचाया है! कौन सी ऐसी मानसिकता है जो कभी रोहित वेमुला के मौत की वजह बनती है, तो जिसे कभी दलित युवक की घुड़सवारी करना बर्दाश्त नहीं होती, जिसे उना और भीमा कोरेगाँव में दलितों पर बर्बरता दिखाने में गर्व होता है, जो आरक्षण की समीक्षा की आड़ में इसे मिटाने के पक्षधर हैं, लेकिन जब गोरखपुर जैसे अपने अभेद्य क़िले में मुँह की खाते हैं तो कहने लगते हैं कि बीजेपी कभी आरक्षण ख़त्म नहीं करेगी!

यही वो लोग हैं, जिनके चुनाव नहीं जीतने की वजह से पाकिस्तान, दिवाली मनाते-मनाते रह गया…! जो सत्ता पाने के बाद न तो अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के नारे को दोहराते हैं और ना कश्मीरी पंडितों को वापस घाटी में भेजकर दिखाते हैं, और ना ही ‘काँग्रेस मुक्त भारत’ के प्रति प्रतिबद्ध रहना चाहते हैं! क्योंकि इन्हें अच्छी तरह से पता है कि काँग्रेस, एक भारतीय प्रवाह है! प्रवाह, हल्का या तेज़ तो हो सकता है, लेकिन ख़त्म कभी नहीं हो सकता! इसीलिए एक दिन अचानक मोहन भागवत को ज्ञान-प्राप्ति होती है और वो कहने लगते हैं कि ‘संघ की विचारधारा में ‘मुक्त’ करने की कोई नीति नहीं है। हम तो सबको जोड़ने की बात करते हैं।’

अरे भागवत जी, यही बात आपने तब क्यों नहीं की, जब बड़बोले नरेन्द्र मोदी और अमित शाह, बार-बार काँग्रेस मुक्त भारत बनाने की दुहाई देते फिरते थे। यदि वाकई में ‘मुक्त’ आपकी विचाराधारा नहीं है तो फिर आपने हिन्दू गाँधी की हत्या क्यों करवायी? आप हिन्दुओं के सबसे बड़े ठेकेदार होने का ख़म ठोंकते हैं, लेकिन ये किसी से छिपा नहीं है कि आप कभी दलितों को हिन्दू मानकर उनके सम्मान की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध नहीं रहे। भगवा को आलोचना बर्दाश्त नहीं है। यही फासीवाद है। इसीलिए यशवन्त सिन्हा, कीर्ति आज़ाद, अरुण शौरी और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे अपने ही नेताओं की ओर से आ रहे आलोचना के स्वर सुनते ही आपकी भक्त-मंडली इनका चरित्रहनन करने के लिए टूट पड़ती है!

बीजेपी ने मतलब निकल जाने के बाद हमेशा अपने वरिष्ठ नेताओं को दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका है। बलराज मधोक, लाल कृष्ण आडवाणी, विजय कुमार मल्होत्रा, मदन लाल खुराना, मुरली मनोहर जोशी, विनय कटियार जैसे दर्जनों नेता हैं जिन्हें भगवा ख़ानदान ने उनके हाल पर ही बेहाल छोड़ दिया! अभी-अभी लफ़्फ़ाज़ चौकीदार ने दावा किया था कि असली आम्बेडकरवादी तो बीजेपी है! यदि ये सच होता तो क्या बीजेपी के सांसदों सावित्री बाई फुले, डॉ यशवन्त सिंह, अशोक दोहरे और छोटेलाल खरवार जैसे ज़मीन से जुड़े बीजेपी के सिपाहियों को दिखायी नहीं देता! अब जल्दी ही भक्त समुदाय इन सांसदों को दोगला, भ्रष्ट और काँग्रेस के दलाल बताने लगेंगे।

अब फैलाया जाएगा कि ये बेईमान सांसद, अच्छे दिन वाली बीजेपी और रामराज्य रूपी सुशासन के विशेषज्ञ योगी आदित्यनाथ पर तथ्यहीन लाँछन लगाकर उन्हें बदनाम कर रहे हैं! वर्ना, साम्प्रदायिक ज़हर की उल्टियाँ करने के अभ्यस्त योगी तो जन्मजात महात्मा हैं! और हाँ, 2019 के लिए भगवा रणनीति होगी कि जो सांसद-विधायक और नेता-कार्यकर्ता, बीजेपी को दलित विरोधी मानते हैं वो पार्टी छोड़कर चले जाएँ! पार्टी छोड़कर जाने वाले नुस्ख़े को बाँटने में कोई भेदभाव नहीं है, क्योंकि ऐसा कई सवर्ण नेताओं और यहाँ तक कि शिवसेना जैसे सबसे पुराने दोस्त को भी कई-कई बार कहा जा चुका है!

By : Mukesh Kumar Singh

Mukesh Kumar

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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नवजात शिशुओं में लीवर रोग की पहचान के लिए जागरूकता अभियान

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Liver Disease Newborns

नई दिल्ली, 19 अप्रैल | नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों को आमतौर पर प्रभावित करने वाली लीवर की बीमारी को लेकर आम लोगों के बीच जागरूकता फैलाने के लिए अपोलो अस्पताल ने वर्ल्ड लीवर डे के मौके पर जागरूकता अभियान चलाया। अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप में मेडिकल डायरेक्टर व सीनियर कन्सलटेन्ट डॉ. अनुपम सिब्बल ने कहा, “दिमाग के बाद लीवर शरीर का दूसरा सबसे बड़ा ठोस अंग है, जो बहुत सारे मुश्किल काम करता है। लीवर हमारे शरीर में ऐसे सभी कामों को अंजाम देता है, जो अन्य अंगों के ठीक कार्य करने के लिए जरूरी हैं।”

उन्होंने कहा, “लीवर पाचन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भोजन पचाने के लिए बाईल बनाने के अलावा लीवर ब्लड शुगर को नियन्त्रित रखने में मदद करता है, शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालता है और कॉलेस्ट्रॉल का स्तर सामान्य बनाए रखता है। लीवर क्लॉटिंग फैक्टर्स, एल्बुमिन और ऐसे कई महत्वपूर्ण उत्पाद बनाता है।”

डॉ. अनुपम सिब्बल ने कहा, “लीवर बिना रुके काम करता है और अक्सर इसमें किसी भी तरह की खराबी के लक्षण जल्दी से दिखाई नहीं देते। लीवर रोगों के आम लक्षण हैं आंखों का पीला पड़ना, पेशाब का रंग पीला होना, भूख न लगना, मतली और उल्टी। 100 से ज्यादा ऐसी बीमारियां हैं जिनका असर लीवर पर पड़ता है।”

उन्होंने कहा, “अगर आपको पेट के आस-पास सूजन, पैरों में सूजन, वजन में कमी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें।”

डॉ. अनुपम सिब्बल ने लीवर की बीमारियों से बचने और इसके प्रबन्धन के लिए सुझाव दिए। इसमें हर बच्चे को जन्म के तुरंत बाद हेपेटाइटिस बी का टीका लगाना, रक्त और रक्त उत्पादों का इस्तेमाल करने से पहले हेपेटाइटिस बी और सी की जांच, साफ पेयजल का ही सेवन करना, कच्चे फलों और सब्जियों को सेवन से पहले अच्छी तरह धोना, जब भी संभव हो हेपेटाइटिस ए का टीका लगवाना, नवजात शिशु को अगर दो सप्ताह से ज्यादा पीलिया रहता है तो इसकी जांच करवाना चाहिए ताकि अगर लीवर की कोई बीमारी है तो इसका निदान कर तुरंत इलाज किया जा सके।

हाल ही में हेपेटाइटिस बी, सी और कई अन्य आनुवंशिक बीमारियों का इलाज खोज लिया गया है और यह सभी आधुनिक इलाज भारत में उपलब्ध हैं। भारत में लीवर ट्रांसप्लान्ट अब कामयाबी से किया जा रहा है।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

अंबेडकर ने नहीं सीखा था अन्याय के आगे झुकना

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Bhim-Rao-Ambedkar

कबीरपंथी परिवार में जन्मे डॉ. भीमराव अंबेडकर अपनी 127वीं जयंती के मौके पर भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितना संविधान के निर्माण के बाद और दलितों के संघर्ष के दौरान थे। दलितों और पिछड़ों को वोट बैंक समझने वाले सभी दल आज अंबेडकर को अपना मार्गदर्शक और प्रेरणा पुंज कहते नहीं अघाते हैं।

अंबेडकर के नाम पर कसमें खाई जाती हैं, आंदोलन किए जाते हैं और यह संदेश देने की पुरजोर कोशिशें की जाती हैं कि दलितों का सबसे बड़ा सिपहसालार कौन है। लेकिन यह भी हकीकत है कि राजनीति के मौजूदा बदले हुए तेवर में अगर वाकई कोई पीछे छूटता जा रहा है तो वह है सिर्फ और सिर्फ भीमराव अंबेडकर।

विलक्षण प्रतिभा के धनी भीमराव बेहद निर्भीक थे। वे न चुनौतियों से डरते थे, न झुकते थे। लड़ाकू और हठी अंबेडकर ने अन्याय के आगे झुकना तो जैसे सीखा ही न था।

14 अप्रैल, 1891 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के केंद्रीय प्रांत (मध्य प्रदेश) के इंदौर के पास महू नगर की छावनी में एक महार परिवार में माता-पिता की 14वीं संतान के रूप में जन्मे भीमराव के पिता की मृत्यु बालपन में ही हो गई थी। 1897 में बॉम्बे के एलफिन्सटोन हाईस्कूल में पहले अस्पृश्य के रूप में दाखिला लेकर 1907 में मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। पढ़ाई के दौरान ही 15 साल की उम्र में 1906 में 9 साल की रमाबाई से इनकी शादी हुई।

अंबेडकर ने अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र में डिग्री हासिल की। हिंदू धर्म में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव और छुआछूत से दुखी होकर उन्होंने इसके खिलाफ संघर्ष भी किया, लेकिन विशेष सफलता न मिलने पर इस धर्म को ही त्याग दिया। 14 अक्टूबर, 1956 को उन्होंने लाखों दलितों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। यह क्रम निरंतर जारी है।

कहा जाता है कि दलित मुद्दों पर अंबेडकर के गांधीजी से मतभेद रहे हैं। पत्रिका ‘हरिजन’ के 18 जुलाई, 1936 के अंक में अंबेडकर के ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ की समीक्षा में गांधीजी ने जोर दिया था कि हर किसी को अपना पैतृक पेशा जरूर मानना चाहिए, जिससे अधिकार ही नहीं, कर्तव्यों का भी बोध हो। यह सच्चाई है कि ब्रिटिश शासन के डेढ़ सौ वर्षों में भी अछूतों पर होने वाले जुल्म में कोई कमी नहीं आई थी, जिससे अंबेडकर आहत थे।

लेकिन धुन के पक्के अंबेडकर ने गोलमेज कॉन्फ्रें स में जो तर्क रखे, वो इतने ठोस और अधिकारपूर्ण थे कि ब्रिटिश सरकार तक को उनके सामने झुकना पड़ा और 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मैक्डोनल्ड ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के लिए एक तात्कालिक योजना की घोषणा की जिसे कम्युनल अवार्ड के नाम से जाना गया। इस अवार्ड में अछूत कहे जाने वाले समाज को दोहरा अधिकार मिला। पहला यह कि वे सुनिश्चित सीटों की आरक्षित व्यवस्था में अलग चुनकर जाएंगे और दूसरे में दो वोटों का अधिकार मिला। एक वोट आरक्षित सीट के लिए और दूसरा वोट अनारक्षित सीट के लिए। इसके बाद बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का कद समाज में काफी ऊंचा हो गया।

उनकी अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग का गांधीजी ने पुरजोर विरोध कर एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। उनकी दलील थी कि इससे हिंदू समाज बिखर जाएगा, लेकिन जब अंबेडकर जीत गए तो गांधीजी ने पूना पैक्ट (समझौता) पर दस्तखत के लिए उन्हें मजबूर कर दिया और आमरण अनशन पर चले गए।

गांधीजी की बिगड़ती तबीयत और उससे बढ़ते दबाव के चलते अंबेडकर 24 सितंबर, 1932 की शाम येरवदा जेल पहुंचे, जहां पर दोनों के बीच समझौता हुआ। इसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। समझौते के तहत डॉ. अंबेडकर ने दलितों को कम्युनल अवार्ड में मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार को छोड़ने की घोषणा की, लेकिन इसी में 78 आरक्षित सीटों को बढ़ाकर 148 करवाया। साथ ही अस्पृश्य लोगों के लिए हर प्रांत में शिक्षा अनुदान के लिए पर्याप्त रकम की व्यवस्था के साथ नौकरियों में बिना किसी भेदभाव के दलित वर्ग के लोगों की भर्ती को सुनिश्चित कराया।

उन्हें हालांकि इसके क्रियान्वयन की चिंता थी, तभी तो 25 सितंबर 1932 को बंबई में सवर्ण हिंदुओं की बहुत बड़ी सभा में अंबेडकर ने कहा, “हमारी एक ही चिंता है, क्या हिंदुओं की भावी पीढ़ियां इस समझौते का अनुपालन करेंगी?” इस पर सभी सवर्ण हिंदुओं ने एक स्वर में कहा था कि करेंगे।

डॉ. अंबेडकर ने यह भी कहा था, “हम देखते हैं कि दुर्भाग्यवश हिंदू संप्रदाय एक संघटित समूह नहीं है, बल्कि विभिन्न संप्रदायों का फेडरेशन है। मैं आशा और विश्वास करता हूं कि आप अपनी तरफ से इस अभिलेख को पवित्र मानेंगे तथा सम्मानजनक भावना से काम करेंगे।”

लेकिन आज जो हो रहा है, क्या इसी भाव से हो रहा है? कहीं अंबेडकर के नाम पर जोड़-तोड़ की कोशिशें तो कहीं इस कोशिश पर ऐतराज की नई राजनीति शुरू हो गई है। यह सच है कि दलितों के शोषण और अत्याचार का एक सदियों पुराना और लंबा सिलसिला है जो अब भी किसी न किसी रूप में बरकरार है।

गुलाम भारत में अंबेडकर के राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष ने दलितों को जहां राह दिखाई, वहीं आजाद भारत में दलितों के सम्मानजनक स्थान के लिए मार्ग भी प्रशस्त किया। लेकिन लगता नहीं कि आत्मसम्मान और गरिमा की लड़ाई में दलित समुदाय अब भी अकेला है। अंबेडकर का उपयोग सभी दल करना चाहते हैं।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्कूल में पढ़ते समय भीम की प्रतिभा और लगन को देखकर महादेव अंबेडकर नामक ब्राह्मण अध्यापक अपने बेहद प्रिय इस छात्र को दोपहर की छुट्टी के समय अपने भोजन से चावल, दाल, रोटी देते थे। यह अत्यधिक स्नेह ही था जो भीमराव का उपनाम सकपाल घराने के अंबेवाडी गांव के चलते अंबेवाडेकर से बदलकर अपना ब्राह्मण उपनाम अंबेडकर कर दिया, बल्कि स्कूल के रजिस्टर तक में बदल डाला।

इस तरह दलित भीम के नाम के साथ ब्राह्मण अंबेडकर का नाम सदैव के लिए जुड़ गया, लेकिन राजनीति की फितरत देखिए कि भीमराव अंबेडकर के नाम पर राजनीति थमने का नाम नहीं ले रही है, जबकि उनका स्थान शुरू से ही राजनीति से कहीं ऊपर था, है और रहेगा।

By : ऋतुपर्ण दवे

–आईएएनएस

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अंबेडकर ने हर शोषित वर्ग की लड़ाई लड़ी

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babasaheb ambedkar

नई दिल्ली, 13 अप्रैल | भारतरत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर को दलितों का मसीहा माना जाता है, जबकि असलियत में उन्होंने जीवन भर दलितों की नहीं, बल्कि समाज के सभी शोषित वर्गो के अधिकारों की लड़ाई लड़ी।

भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को मध्य प्रदेश के महू नामक एक गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल था। इनके पिता ब्रिटिश भारतीय सेना में काम करते थे। ये अपने माता-पिता की 14वीं संतान थे। ये महार जाति से ताल्लुक रखते थे, जिसे हिंदू धर्म में अछूत माना जाता था।

घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण इनका पालन-पोषण बड़ी मुश्किल से हो पाया। इन परिस्थितियों में ये तीन भाई- बलराम, आनंदराव और भीमराव तथा दो बहनें मंजुला और तुलसा ही जीवित बच सके। सभी भाई-बहनों में सिर्फ इन्हें ही उच्च शिक्षा मिल सकी।

हिंदू धर्म में व्याप्त चतुष्वर्णीय जाति व्यवस्था के कारण इन्हें जीवन भर छुआछूत का सामना करना पड़ा। स्कूल के सबसे मेधावी छात्रों में गिने जाने के बावजूद इन्हें पानी का गिलास छूने का अधिकार नहीं था। उच्च जाति का छात्र काफी ऊपर से हाथ में डालकर इन्हें पानी पिलाता था। बाद में इन्होंने हिंदू धर्म की कुरीतियों को समाप्त करने का जिंदगी भर प्रयास किया। जब इन्हें लगा कि ये हिंदू धर्म से कुरीतियों को नहीं मिटा पाएंगे, तब 14 अक्टूबर, 1956 में अपने लाखों समर्थकों सहित बौद्ध धर्म अपना लिया।

आज के दौर में हिंदू के नाम पर राजनीति तो की जा रही है और दलितों का वोट पाने के लिए डॉ. अंबेडकर को ‘अपना’ बताया जा रहा है, लेकिन कोई यह सोचने के लिए तैयार नहीं है कि बाबा साहेब ने हिंदू धर्म क्यों छोड़ा।

Image result for Bhimrao Ambedkar,

राजनीति करने वाले आज डॉ. अंबेडकर का भी भगवाकरण करने का प्रयास करते हैं, किसी के धर्मातरण पर व्यग्र और उग्र हो उठते हैं, लेकिन अपने धर्म पर आत्मचिंतन करना, सोच बदलना, कुरीतियां मिटाना जरूरी नहीं समझते। अगर सोच बदली होती तो जगह-जगह अंबेडकर की मूर्तियां नहीं तोड़ी जातीं।

डॉ. अंबेडकर की पहली शादी नौ साल की उम्र में रमाबाई से हुई। रमाबाई की मृत्यु के बाद इन्होंने ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाली सविता से विवाह कर लिया। सविता ने भी इनके साथ ही बौद्ध धर्म अपना लिया था। अंबेडकर की दूसरी पत्नी सविता का निधन वर्ष 2003 में हुआ।

भीमराव ने अपने एक ब्राह्मण दोस्त के कहने पर अपने नाम से सकपाल हटाकर अंबेडकर जोड़ लिया, जो अंबावड़े गांव से प्रेरित था।

अंबेडकर की गिनती दुनिया के सबसे मेधावी व्यक्तियों में होती थी। वे नौ भाषाओं के जानकार थे। इन्हें देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों से पीएचडी की कई मानद उपाधियां मिली थीं। इनके पास कुल 32 डिग्रियां थीं।

अंबेडकर को 15 अगस्त, 1947 को देश की आजादी के बाद देश के पहले देशी संविधान के निर्माण के लिए 29 अगस्त, 1947 को संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। फिर दो वर्ष, 11 माह, 18 दिन के बाद संविधान बनकर तैयार हुआ, 26 नवंबर, 1949 को इसे अपनाया गया और 26 जनवरी, 1950 को लागू कर दिया गया।

कानूनविद् अंबेडकर को प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत का पहला कानून मंत्री बनाया था।

डॉ. अंबेडकर ने समाज में व्याप्त बुराइयों के लिए सबसे ज्यादा महिलाओं की अशिक्षा को जिम्मेदार माना। इन्होंने महिलाओं की शिक्षा पर जोर दिया। उनके सशक्तिकरण के लिए इन्होंने हिंदू कोड अधिनियम की मांग की। तब भारी विरोध के चलते वह पारित नहीं हो सका, लेकिन बाद में वही अधिनियम हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम और हिंदू विशेष विवाह अधिनियम के नाम से 1956 में पारित हुआ। इससे हिंदू महिलाओं को मजबूती मिलती थी।

बाबा साहेब ने सिर्फ अछूतों के अधिकार के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज के पुनर्निर्माण के लिए प्रयासरत रहे। उन्होंने मजदूर वर्ग के कल्याण के लिए भी उल्लेखनीय कार्य किया। पहले मजदूरों से प्रतिदिन 12-14 घंटों तक काम लिया जाता था। इनके प्रयासों से प्रतिदिन आठ घंटे काम करने का नियम पारित हुआ।

इसके अलावा इन्होंने मजदूरों के लिए इंडियन ट्रेड यूनियन अधिनियम, औद्योगिक विवाद अधिनियम, मुआवजा आदि सुधार भी इन्हीं के प्रयासों से हुए। उन्होंने मजदूरों को राजनीति में सक्रिय भागीदारी करने के लिए प्रेरित किया। वर्तमान के लगभग सभी श्रम कानून बाबा साहेब के ही बनाए हुए हैं।

बाबा साहेब कृषि को उद्योग का दर्जा देना चाहते थे। उन्होंने कृषि का राष्ट्रीयकरण करने का प्रयास किया। राष्ट्रीय झंडे में अशोक चक्र लगाने का श्रेय भी इन्हीं को जाता है।

ये अकेले भारतीय हैं, जिनकी प्रतिमा लंदन संग्रहालय में कार्ल मार्क्‍स के साथ लगी है। साल 1948 में डॉ. अंबेडकर मधुमेह से पीड़ित हो गए। छह दिसंबर, 1956 को इनका निधन हो गया।

डॉ. अंबेडकर को देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। इनके निधन के 34 साल बाद वर्ष 1990 में जनता दल की वी.पी. सिंह सरकार ने इन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारतरत्न से सम्मानित किया था। इस सरकार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बाहर से समर्थन दे रही थी। वी.पी. सिंह ने जब वी.पी. मंडल कमीशन की सिफारिश लागू कर दलितों, पिछड़ों को आरक्षण का अधिकार दिया, तब भाजपा ने समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी थी और सवर्ण युवाओं को आरक्षण के खिलाफ आत्मदाह के लिए उकसाया था। देशभर में कई युवकों ने आत्मदाह कर लिया था और जातीय दंगे हुए थे, जिसे ‘मंडल-कमंडल विवाद’ नाम दिया गया था।

BY : अनुराग सक्सेना

–आईएएनएस

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