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दलित-विरोधी नहीं होती बीजेपी तो उसके सांसद अपनी क़िस्मत पर क्यों रोते…?

अब फैलाया जाएगा कि ये बेईमान सांसद, अच्छे दिन वाली बीजेपी और रामराज्य रूपी सुशासन के विशेषज्ञ योगी आदित्यनाथ पर तथ्यहीन लाँछन लगाकर उन्हें बदनाम कर रहे हैं!

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Dalit-MPs-UP
Photo Credit : Thewire

चौकीदार नरेन्द्र मोदी बेहद गदगद हैं कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के एक दलित राम नाथ कोविन्द को राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद पर बिठा दिया। मोदी, जनता को बरगला रहे हैं कि बीजेपी का दलित-प्रेम देखकर उसके विरोधियों के छक्के छूट गये। बीजेपी को ख़ुशफ़हमी है कि चितपावन ब्राह्मणों के संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ऐसा त्याग देखकर उन विरोधियों के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गयी है जिन्होंने दलित समाज से आने वाले के आर नारायणन को दशकों पहले वहाँ तक पहुँचा दिया था, जहाँ कोविन्द अब पहुँचे हैं! काँग्रेस ने आम्बेडकर, जगजीवन राम जैसे दलित नेताओं को प्रमुखता देने में कोई कोताही नहीं की। उसने पिछड़े वर्ग से आने वाले ज्ञानी जैल सिंह को भी राष्ट्रपति बनाया तो महिलाओं के रूप में प्रतिभा पाटिल और मीरा कुमार को भी शीर्ष संवैधानिक पदों तक पहुँचाया। इसीलिए, ये समझना बेहद ज़रूरी है कि संघ-बीजेपी का दलित-प्रेम उसके दिखाने के दाँत हैं।

अब सवाल ये है कि खाने का दाँत कैसे हैं? इसका सबसे शानदार जबाब, उत्तर प्रदेश के ही दलित समाज से आने वाले बीजेपी के कम से कम तीन सांसदों ने पूरी बेबाकी से दे दिया है। ये सांसद हैं: राबर्ट्सगंज से छोटेलाल खरवार, इटावा से अशोक दोहरे और नग़ीना से डॉ यशवन्त सिंह। इन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ख़त लिखकर बताया है कि उत्तर प्रदेश में दलितों के प्रति बहुत बुरा सलूक हो रहा है, वो भी सीधे-सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की शह पर इशारे पर! इन तीनों के अलावा सावित्री बाई फुले भी संघ-बीजेपी के दलित-विरोधी रवैये से आहत हैं।

दरअसल, बीजेपी बुनियादी तौर पर एक झूठी और दोगली बातें करने वाली पार्टी है। ये एक ओर तो तुष्टिकरण की विरोधी होने का दावा करती है लेकिन दूसरी ओर कभी हिन्दुओं का तो कभी सवर्णों का और कभी दलितों का तुष्टिकरण करती नज़र आती है। सवर्णों को ख़ुश करने के लिए उनके बीच आरक्षण को लेकर दुष्प्रचार किया जाता है। अन्दरखाने फ़ैलाया जाता है कि बीजेपी, आरक्षण को ख़त्म कर देगी। लेकिन चुनाव जीतने के लिए संघ प्रमुख मोहन भागवत कहते हैं कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए। समीक्षा का सीधा-सीधा मतलब है कि अभी जो आरक्षण है, वो ग़लत है। ख़राब है। घटिया है। यही पहलू उन सवर्णों के बीच फैलाया जाता है जो आरक्षण को लेकर तरह-तरह की अज्ञानता में जी रहे हैं।

दलितों की नाराज़गी जब सामने आती है तो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के भी हाथ-पैर फूलने लगते हैं। तभी तो वो समीक्षा की बातों को दरकिनार करके ऐलान करते हैं कि ‘बीजेपी कभी आरक्षण ख़त्म नहीं करेगी और ना ही किसी को ऐसा करने देगी।’ उधर, बेहिसाब चमक-दमक में जीने वाले चौकीदार भी कहते हैं कि विरोधियों को ये बर्दाश्त नहीं हो रहा कि वो ग़रीब और पिछड़े परिवेश से आये हैं। ये लफ़्फ़ाज़ी है! सच तो ये है कि यदि आपके आगे आने के रास्ते बन्द होते तो आप आगे आते कैसे? आप आगे आये क्योंकि रास्ता था। प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनने का रास्ता किसी के लिए भी आसान नहीं होता। फिर चाहे वो ग़रीब हो या अमीर, राजा हो या रंक, वंशवादी हो या नहीं हो! इतिहास में भी ऐसा कभी नहीं हुआ कि अयोग्य व्यक्ति शीर्ष पर बना रहे। युवराज होने के नाते कोई अगला राजा भले ही बनता था, लेकिन नये राजा के रूप में उसे भी अपनी क़ाबलियत स्थापित करने पड़ती थी। यही वजह है कि दुनिया के हर समाज में राजवंश बदलते रहे हैं।

कोई राजवंश चिर-स्थायी नहीं होता। हो ही नहीं सकता! काँग्रेस में इन्दिरा, राजीव, सोनिया और राहुल सभी पर संघियों ने वंशवादी होने के आरोप लगाये। सबका यथासम्भव चरित्रहनन किया। लेकिन ये भी सच है, सबने अपने-अपने दौर में अपनी श्रेष्ठता साबित की। क्या इन नेताओं को जनादेश हासिल करने की अग्निपरीक्षा से नहीं गुज़रना पड़ा? क्या इन नेताओं को अपने से संगठन में विरोध और बग़ावत के स्वरों से नहीं जूझना पड़ा? राजनीति में महत्वाकाँक्षा का होना स्वाभाविक है। इसी से आन्तरिक अंकुश और सन्तुलन पैदा होता है। राजीव गाँधी भी यदि काँग्रेस को चमका नहीं पाएँगे तो उनकी भी विदाई को कोई टाल नहीं सकता!

अरे, ये तो विषयान्तर हो गया। वापस रुख़ करते हैं, बीजेपी के दलित प्रेम की ओर। उत्तर प्रदेश के दलित समाज से आने वाले सांसदों को अब ये अच्छी तरह से समझ में आ चुका है कि किन मनुवादी ताक़तों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के ज़रिये SC-ST Act को बेअसर बनाने की साज़िश को मुक़ाम तक पहुँचाया है! कौन सी ऐसी मानसिकता है जो कभी रोहित वेमुला के मौत की वजह बनती है, तो जिसे कभी दलित युवक की घुड़सवारी करना बर्दाश्त नहीं होती, जिसे उना और भीमा कोरेगाँव में दलितों पर बर्बरता दिखाने में गर्व होता है, जो आरक्षण की समीक्षा की आड़ में इसे मिटाने के पक्षधर हैं, लेकिन जब गोरखपुर जैसे अपने अभेद्य क़िले में मुँह की खाते हैं तो कहने लगते हैं कि बीजेपी कभी आरक्षण ख़त्म नहीं करेगी!

यही वो लोग हैं, जिनके चुनाव नहीं जीतने की वजह से पाकिस्तान, दिवाली मनाते-मनाते रह गया…! जो सत्ता पाने के बाद न तो अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के नारे को दोहराते हैं और ना कश्मीरी पंडितों को वापस घाटी में भेजकर दिखाते हैं, और ना ही ‘काँग्रेस मुक्त भारत’ के प्रति प्रतिबद्ध रहना चाहते हैं! क्योंकि इन्हें अच्छी तरह से पता है कि काँग्रेस, एक भारतीय प्रवाह है! प्रवाह, हल्का या तेज़ तो हो सकता है, लेकिन ख़त्म कभी नहीं हो सकता! इसीलिए एक दिन अचानक मोहन भागवत को ज्ञान-प्राप्ति होती है और वो कहने लगते हैं कि ‘संघ की विचारधारा में ‘मुक्त’ करने की कोई नीति नहीं है। हम तो सबको जोड़ने की बात करते हैं।’

अरे भागवत जी, यही बात आपने तब क्यों नहीं की, जब बड़बोले नरेन्द्र मोदी और अमित शाह, बार-बार काँग्रेस मुक्त भारत बनाने की दुहाई देते फिरते थे। यदि वाकई में ‘मुक्त’ आपकी विचाराधारा नहीं है तो फिर आपने हिन्दू गाँधी की हत्या क्यों करवायी? आप हिन्दुओं के सबसे बड़े ठेकेदार होने का ख़म ठोंकते हैं, लेकिन ये किसी से छिपा नहीं है कि आप कभी दलितों को हिन्दू मानकर उनके सम्मान की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध नहीं रहे। भगवा को आलोचना बर्दाश्त नहीं है। यही फासीवाद है। इसीलिए यशवन्त सिन्हा, कीर्ति आज़ाद, अरुण शौरी और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे अपने ही नेताओं की ओर से आ रहे आलोचना के स्वर सुनते ही आपकी भक्त-मंडली इनका चरित्रहनन करने के लिए टूट पड़ती है!

बीजेपी ने मतलब निकल जाने के बाद हमेशा अपने वरिष्ठ नेताओं को दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका है। बलराज मधोक, लाल कृष्ण आडवाणी, विजय कुमार मल्होत्रा, मदन लाल खुराना, मुरली मनोहर जोशी, विनय कटियार जैसे दर्जनों नेता हैं जिन्हें भगवा ख़ानदान ने उनके हाल पर ही बेहाल छोड़ दिया! अभी-अभी लफ़्फ़ाज़ चौकीदार ने दावा किया था कि असली आम्बेडकरवादी तो बीजेपी है! यदि ये सच होता तो क्या बीजेपी के सांसदों सावित्री बाई फुले, डॉ यशवन्त सिंह, अशोक दोहरे और छोटेलाल खरवार जैसे ज़मीन से जुड़े बीजेपी के सिपाहियों को दिखायी नहीं देता! अब जल्दी ही भक्त समुदाय इन सांसदों को दोगला, भ्रष्ट और काँग्रेस के दलाल बताने लगेंगे।

अब फैलाया जाएगा कि ये बेईमान सांसद, अच्छे दिन वाली बीजेपी और रामराज्य रूपी सुशासन के विशेषज्ञ योगी आदित्यनाथ पर तथ्यहीन लाँछन लगाकर उन्हें बदनाम कर रहे हैं! वर्ना, साम्प्रदायिक ज़हर की उल्टियाँ करने के अभ्यस्त योगी तो जन्मजात महात्मा हैं! और हाँ, 2019 के लिए भगवा रणनीति होगी कि जो सांसद-विधायक और नेता-कार्यकर्ता, बीजेपी को दलित विरोधी मानते हैं वो पार्टी छोड़कर चले जाएँ! पार्टी छोड़कर जाने वाले नुस्ख़े को बाँटने में कोई भेदभाव नहीं है, क्योंकि ऐसा कई सवर्ण नेताओं और यहाँ तक कि शिवसेना जैसे सबसे पुराने दोस्त को भी कई-कई बार कहा जा चुका है!

By : Mukesh Kumar Singh

Mukesh Kumar

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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क्या कांग्रेस मप्र की जनता की आवाज सुनेगी?

राज्य की जनता ने भाजपा को सत्ता से उतारकर कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका दिया है। कांग्रेस क्या वास्तव में जनता की मंशा और भाव को समझ पा रही है? इस पर थोड़े सवाल उठ रहे हैं

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farmer strike in madhya pradesh

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में जनता ने किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया है, मगर कांग्रेस को बहुमत के करीब लाकर खड़ा कर दिया है। कांग्रेस सरकार बनाने जा रही है, बस सवाल एक ही उठ रहा है कि क्या कांग्रेस आलाकमान जनता की आवाज सुनेगी या राजनीतिक गणित के चलते अपना फैसला सुनाएगी।

राज्य के विधानसभा चुनाव के 11 दिसंबर की देर रात तक नतीजे आ गए, उसके बाद बुधवार को कांग्रेस विधायकों की भोपाल में बैठक बुलाई गई। इस बैठक में केंद्रीय पर्यवेक्षक के तौर पर ए.के. एंटनी आए, उन्होंने विधायकों की बैठक की, एक लाइन का प्रस्ताव पारित किया गया, जिसके जरिए मुख्यमंत्री चुनने का अधिकार पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को दिया गया। उसके बाद गुरुवार को प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और प्रचार अभियान समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने कई दौर की बात की।

कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी ने पर्यवेक्षक बनाकर भेजे गए एंटोनी की रिपोर्ट, शक्ति एप के जरिए पार्टी कार्यकर्ताओं से ली गई राय और नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों से आए नतीजों के साथ आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर रखकर कमलनाथ व सिंधिया की मौजूदगी में सभी प्रमुख नेताओं से चर्चा की। राहुल गांधी के साथ हुई बैठक में कमलनाथ, सिंधिया, एंटनी, प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया मौजूद रहे।

इतना ही नहीं, मप्र में मुख्यमंत्री को लेकर चल रही खींचतान के बीच सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी भी राहुल गांधी के आवास पर पहुंचीं। कहा जा रहा है कि मप्र के मुख्यमंत्री के मसले पर राहुल गांधी से सोनिया और प्रियंका ने भी चर्चा की।

वरिष्ठ पत्रकार रवींद्र व्यास का कहना है कि राज्य की जनता ने भाजपा को सत्ता से उतारकर कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका दिया है। कांग्रेस क्या वास्तव में जनता की मंशा और भाव को समझ पा रही है? इस पर थोड़े सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि दिल्ली में मुख्यमंत्री के नाम को लेकर कई घंटों तक माथापच्ची चली।

व्यास ने आगे कहा कि पार्टी हाईकमान कोई ऐसा फैसला भी नहीं करना चाहती, जिससे प्रदेश के मतदाताओं में नकारात्मक संदेश जाए। कांग्रेस को अंदेशा है कि अगर नकारात्मक संदेश चला गया, कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ गया तो लोकसभा चुनाव में संभावनाओं को बनाए रखना आसान नहीं होगा।

विधानसभा चुनाव में सफलता मिलने से कार्यकर्ताओं का उत्साह उफान पर है। राज्य के विभिन्न हिस्सों से सैकड़ों की तादाद में कार्यकर्ता राजधानी पहुंच चुके हैं। प्रदेश कार्यालय के बाहर सुबह से ही कार्यकर्ताओं का जमावड़ा है, कमलनाथ और सिंधिया के कटआउट, पोस्टर हाथ में थामे कार्यकर्ता जिंदाबाद के नारे लगाने में लगे हैं।

By : संदीप पौराणिक

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चुनाव

अब भारत से EVM का अलविदा होना ज़रूरी है!

EVM की तारीफ़ इसलिए भी की जाती थी कि इससे मतदान के नतीज़े महज कुछ घंटों में ही मिल जाते थे। लेकिन ताज़ा विधानसभा चुनाव की तमाम सीटों पर नतीज़े आने में 24 घंटे तक का वक़्त लग गया। इतना वक़्त तो बैलेट के दौर में पहले कभी नहीं लगा।

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evm

इतिहास बताता है कि तकनीकें न तो चिरजीवी होती हैं और ना कालजयी। हरेक तकनीक का अपना कार्यकाल होता है। नयी तकनीकें जन्म लेती हैं तो पुरानी का सफ़ाया होता है। EVM भी एक तकनीकी उपकरण है। इसका जीवन-काल पूरा हो चुका है! अब हमें वापस बैलेट यानी मतपत्र की ओर लौटना होगा। ये काम जितनी जल्दी होगा, उतना ही लोकतंत्र फ़ायदे में रहेगा। ताज़ा विधानसभा चुनावों ने उन आरोपों को और पुख्ता किया है कि EVM में घपला हो सकता है। बेशक़, ये हुआ भी है! तर्कवादी इसका सबूत चाहेंगे। ये स्वाभाविक है। मेरे पास घपलों के सबूत नहीं हैं। लेकिन प्रति-तर्क ज़रूर हैं।

सार्वजनिक जीवन में ‘छवि’ यानी इमेज़ का सबसे ज़्यादा महत्व है। EVM पर जितने लाँछन लगे हैं, उससे उसकी छवि कलंकित हुई है। ये लाँछन उन्हीं लोगों के हैं, जिन्हें EVM को विश्वसनीय बताना चाहिए। जब खिलाड़ी ही अम्पायर पर शक़ करें, तब अम्पायर को निष्ठा का निष्कलंकित होना अनिवार्य होना चाहिए। दर्जनों राजनीतिक दलों ने EVM की सच्चाई पर सवाल उठाये हैं। वैसे भी EVM में अब वो गुण भी नहीं रहे, जिसने कभी इसे श्रेष्ठ बनाया था।

मसलन, EVM की वजह से ये बात अब गोपनीय नहीं रह जाती कि किसी मतदान केन्द्र के मतदाताओं की पसन्द क्या रही है? कभी वोटों की गिनती से पहले EVM को बैलेट की तरह मिलाया जाता था ताकि मतदान की गोपनीयता पर आँच नहीं आये, लेकिन EVM में हुए घपलों को देखते हुए अब हरेक मशीन के आँकड़ों को अलग-अलग हासिल किया जाता है। कभी EVM की तारीफ़ इसलिए भी की जाती थी कि इससे मतदान के नतीज़े महज कुछ घंटों में ही मिल जाते थे। लेकिन ताज़ा विधानसभा चुनाव की तमाम सीटों पर नतीज़े आने में 24 घंटे तक का वक़्त लग गया। इतना वक़्त तो बैलेट के दौर में पहले कभी नहीं लगा।

EVM की ये भी तारीफ़ हुआ करती थी कि इससे बूथ कब्ज़ा करने वाले हतोत्साहित होते हैं। कभी ऐसा हुआ भी, लेकिन अब लोगों ने बेईमानी करने के नये-नये हथकंडे विकसित कर लिये हैं। जैसे मशीन की जाँच करने वाले Mock Poll की क़वायद को भी पोलिंग एजेंट की मिलीभगत से भ्रष्ट किया जा चुका है। ताज़ा चुनावों में तो कई ऐसे वीडियो भी वायरल हुए कि मतदान कर्मी EVM को लेकर उन जगहों पर जा पहुँचे जहाँ उनका होना पूरी तरह से ग़ैरक़ानूनी था। EVM के पक्ष में दलील भी थी कि इससे मतपत्र वाले काग़ज़ों की भारी बचत होती है। लेकिन अब साफ़ दिख रहा है कि ये बचत भारतीय लोकतंत्र के लिए काफ़ी भारी पड़ी है।

हमने देखा है कि मोदी राज ने उस EVM की ख़ूब तरफ़दारी की, जिसे लेकर ख़ुद उसने ही उस दौर में भरपूर हॉय-तौबा मचायी थी, जब वो विपक्ष में थी। लिहाज़ा, क्या वजह है कि सत्ता में आने के बाद बीजेपी को EVM पसन्द आने लगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने EVM में सेंधमारी की तकनीक को साध लिया है! 2014 के बाद हुए तमाम विधानसभा चुनावों में EVM की सच्चाई पर सवाल दाग़े गये। सुप्रीम कोर्ट के दख़ल के बाद चुनाव आयोग ने भी अपनी साख बचाने के लिए VVPAT (Voter-verified paper audit trail) की जुगत अपनायी। लेकिन इससे भी EVM की प्रतिष्ठा बहाल नहीं हुई।

EVM की तकनीक और मशीन यदि बेदाग़ होती तो आज सारी दुनिया में इसका डंका बज रहा होता। बेहतर तकनीक अपनी जगह बना ही लेती है। जीवन का कोई भी क्षेत्र नयी तकनीक से अछूता नहीं रहता। टेलिग्राम को किसने ख़त्म किया? पेज़र कहाँ चले गये? बजाज स्कूटर को कौन निगल गया? LED लाइट्स ने पुराने बल्ब-ट्यूब का क्या हाल किया? ऐसे असंख्य उदाहरण हैं। लेकिन तकनीक के बेहिसाब विस्तार के बावजूद तमाम विकसित देशों ने EVM को आज़माने के बाद इसे अनफिट ही क्यों पाया? क्यों चुनाव फिर से बैलेट पर ही लौट गये? वजह साफ़ है कि EVM की ख़ामियाँ, उसकी ख़ूबियों पर भारी पड़ीं! ये तर्क अकाट्य हैं।

सबसे बड़ा आरोप ये है कि EVM के हैकर्स विकसित हो चुके हैं! लेकिन चुनाव आयोग की ज़िद है कि मेरे सामने EVM को हैक करके दिखाओ, तभी मानेंगे कि हैकिंग सम्भव है! दुर्भाग्यवश, वो ये समझने को तैयार नहीं है कि करोड़ों-अरबों रुपये का वारा-न्यारा करने वाले हैकर्स और उनका फ़ायदा लेने वाले लोग क्यों अपने पाँव पर ही कुल्हाड़ी मारने को तैयार होंगे? इनसे ये अपेक्षा रखना नादानी होगी कि वो चुनाव आयोग की सनक को मिटाने के लिए अपनी कामधेनु का बलिदान दे दें!

अब तो ऐसे भी संकेत मिल रहे हैं कि EVM के हैकर्स, चुनाव जीतने और हारने वाली यानी दोनों पार्टियों से सौदा कर रहे हैं। जनाक्रोश से बचने के लिए वो हारने वाली पार्टियों की सीटों को सम्मानजनक बना रहे हैं तो जीतने वाले की जीत का अन्तर घटा रहे हैं। ये बात सच हो या अफ़वाह, लेकिन लोकतंत्र के लिए इसका किसी भी रूप में होना ही कोई कम नुकसानदायक नहीं है। सीता की अग्निपरीक्षा तो लंका में ही हो चुकी थी। फिर भी राम ने उन्होंने अयोध्या से बाहर इसलिए कर दिया क्योंकि एक धोबी ने सीता के शील-स्वभाव पर निराधार ही सही, लेकिन सन्देह की जता दिया था! EVM पर तो सन्देहों का भरमार है। बेचारे स्ट्रॉग रूम में भी महफ़ूज़ नहीं रहते! लिहाज़ा, अब EVM का अलविदा होना बेहद ज़रूरी है।

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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नोटबंदी ने राजनीतिक, आर्थिक उलझनें पैदा की : अरविंद सुबह्मण्यम

“इसका प्रमुख कारण भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था की एक व्यापक समझ में छिपा हुआ है, इस बारे में कि लोग वोट कैसे करते हैं।”

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Arvind Subramanian

नई दिल्ली, 9 दिसम्बर | देश के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुबह्मण्यम ने नोटबंदी और जीडीपी के आंकड़ों में संबंध स्थापित करते हुए कहा है कि नोटबंदी के कारण पैदा हुई उलझन के दोहरे पक्ष रहे हैं। क्या जीडीपी के आंकड़ों पर दिखे इसके प्रभाव ने एक लचीली अर्थव्यवस्था को प्रतिबिंबित किया है, और क्या वृद्धि दर के आंकड़ों ने आधिकारिक डेटा संग्रह प्रक्रिया पर सवाल खड़ा किए हैं।

सुबह्मण्यम इस समय हार्वर्ड केरेडी स्कूल में पढ़ा रहे हैं। वह यहां पेंगुइन द्वारा प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘ऑफ काउंसिल : द चैलेंजेस ऑफ द मोदी-जेटली इकॉनॉमी’ के विमोचन समारोह में हिस्सा लेने आए थे।

उन्होंने आईएएनएस के साथ एक बातचीत में पुस्तक के एक अध्याय ‘द टू पजल्स ऑफ डीमोनेटाइजेशन-पॉलिटिकल एंड इकॉनॉमिक’ का जिक्र किया।

उन्होंने अपनी पुस्तक में मौजूद दूसरे पजल का भी जिक्र किया, और यह पजल है भारत में पलायन और आर्थिक वृद्धि जैसी समकारी ताकतों के बावजूद क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में विचलन। उन्होंने कहा कि राज्यों की एक गतिशीलता प्रतिस्पर्धी संघवाद के तर्क के खिलाफ होती है।

उन्होंने कहा, “अपनी नई पुस्तक के जरिए मैं इस पजल (उलझन), नोटबंदी के बाद नकदी में 86 प्रतिशत कमी की बड़ी उलझन, बावजूद इसके अर्थव्यवस्था पर काफी कम असर की तरफ ध्यान खींचने की कोशिश की है।”

सुबह्मण्यम ने कहा, “ये उलझनें खासतौर से इस सच्चाई से पैदा होती हैं कि यह कदम राजनीतिक रूप से क्यों सफल हुआ, और जीडीपी पर इसका इतना कम असर हुआ..क्या यह ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हम जीडीपी को ठीक से माप नहीं रहे हैं, अनौपचारिक क्षेत्र को नहीं माप रहे हैं, या यह अर्थव्यवस्था में मौजूद लचीलेपन को रेखांकित कर रहा है?”

सुबह्मण्यम ने अपनी किताब में लिखा है, “नोटबंदी के पहली छह तिमाहियों में औसत वृद्धि दर आठ प्रतिशत थी और इसके बाद सात तिमाहियों में औसत वृद्धि दर 6.8 प्रतिशत।”

उन्होंने कहा, “इसका प्रमुख कारण भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था की एक व्यापक समझ में छिपा हुआ है, इस बारे में कि लोग वोट कैसे करते हैं।”

उन्होंने केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जीडीपी के बैक सीरीज डेटा को जारी करने के दौरान नीति आयोग की उपस्थिति को लेकर जारी विवाद का जिक्र किया। जीडीपी के इस आंकड़े में आधार वर्ष बदल दिया गया, और पूर्व की संप्रग सरकार के दौरान देश की आर्थिक विकास दर को कम कर दिया गया।

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि जीडीपी की गणना एक बहुत ही तकनीकी काम है और तकनीकी विशेषज्ञों को ही यह काम करना चाहिए। जिस संस्थान के पास तकनीकी विशेषज्ञ नहीं हैं, उसे इसमें शामिल नहीं होना चाहिए।”

सुब्रह्मण्यम ने कहा, “जब मानक बहुत ऊंचे होंगे और वृद्धि दर फिर भी समान रहेगी तो अर्थशास्त्री स्वाभाविक रूप से सवाल उठाएंगे। यह आंकड़े की विश्वसनीयता को लेकर उतना नहीं है, जितना कि आंकड़े पैदा करने की प्रक्रिया को लेकर और उन संस्थानों को लेकर जिन्होंने इस काम को किया है।”

क्या नोटबंदी पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में वह शामिल थे? सुब्रह्मण्यम ने कहा, “जैसा कि मैंने किताब में कहा है, यह कोई निजी संस्मरण नहीं है..यह गॉसिप लिखने वाले स्तंभकारों का काम है।”

सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बीच हाल के गतिरोध के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि आरबीआई के स्वायत्तता की हर हाल में रक्षा की जानी चाहिए, क्योंकि संस्थानों के मजबूत रहने से देश को लाभ होगा।

उन्होंने कहा, “मैंने इस बात की खुद वकालत की है कि आरबीआई को एक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, लेकिन इसके अधिशेष कोष को खर्च के लिए नियमित वित्तपोषण और घाटा वित्तपोषण में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। यह आरबीआई पर छापा मारना जैसा होगा।”

–आईएएनएस

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