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ऑपरेशन बालाकोट में ग़लत ‘सूत्रों’ के भरोसे ही रहा भारतीय मीडिया

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मैं तीन दशक से पेशेवर पत्रकार हूँ। कई बड़े और प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग की। सैन्य अभियानों और संसद तथा अक्षरधाम आतंकी हमलों जैसी बड़ी घटनाओं का भी टीवी के लिए रिपोर्टिंग करने का भी अवसर मिला। सियाचिन, लेह, गुरेज़, उरी जैसे इलाक़ों की सीमान्त चौकियों पर भी जाने का मौक़ा मिला। रक्षा मंत्रालय से मान्यता प्राप्त ‘डिफ़ेंस कोरेसपोंडेंट’ भी रहा। संसद, पीएमओ, कैबिनेट सेक्रेटेरिएट, राष्ट्रपति भवन, विदेश-गृह और वित्त मंत्रालय तथा बीजेपी-काँग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों का भी दशकों तक बीट रिपोर्टर रहा। असंख्य ख़बरें ‘सूत्रों’ से बटोरीं और ज़िम्मेदारी के साथ प्रसारित कीं। कभी कोई ‘ख़बर’ कभी झूठी या ग़लत नहीं निकली। कभी मेरे मीडिया संस्थान को या पत्रकारिता को मेरी वजह से शर्मसार नहीं होना पड़ा।

अब वो सारी बातें इतिहास हो चुकी हैं। अब ‘सूत्र’ का मतलब ‘सरकारी प्लांट’ या ‘भक्तों की गोदी पत्रकारिता’ बन चुका है। वायुसेना के मिशन बालाकोट के बाद तो पत्रकारिता ने अपने पतन का नया ऑर्बिट (orbit) ख़ुद ही बना लिया है। इसके लिए भले ही मोदी सरकार की नौकरशाही ज़िम्मेदार हो, लेकिन इससे भी बड़ा सवाल ये है कि क्या अफ़सरों की ख़ामियों की वजह से मीडिया अपने बुनियादी उसूलों को भी नज़रअन्दाज़ करके युद्धोन्माद फ़ैलाने में जुट जाएगा? वैसे तो नासमझ पत्रकारों और सम्पादकों की वजह से पत्रकारिता की जो छीछालेदर होनी थी, वो तो वो चुकी। लेकिन बेहतर होगा कि इससे सबक लिया जाए।

बालाकोट के आतंकी ठिकानों पर आधी रात को हमला करने के बाद भारत सरकार को इसका ब्यौरा देने में असामान्य वक़्त क्यों लगा? ख़ासकर, तब जब पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता ने तड़के पाँच बजे ही ट्वीट कर दिया हो। हमारे विदेश सचिव विजय केशव गोखले को प्रेस कॉन्फ़्रेस की तैयारी करते-करते सवा ग्यारह तक इन्तज़ार क्यों करना पड़ा? विदेश और रक्षा मंत्रालय तथा ख़ुद प्रधानमंत्री भी तो ट्वीट कर सकते थे। वैसे भी प्रेस कॉन्फ़्रेस का मतलब ही होता है – सवाल-जवाब

जब अफ़सरों को पत्रकारों के सवाल ही नहीं सुनने थे तो फिर उन्होंने प्रेस कॉन्फ़्रेस बुलायी ही क्यों? प्रेस रिलीज़ और साउंड बाइट को बग़ैर पत्रकारों को बुलाये भी जारी किया जा सकता था। पत्रकारों को सरकार की ओर से ऑन-रिकॉर्ड तो छोड़िए, ऑफ़ रिकॉर्ड भी ब्रीफ़्रिंग क्यों नहीं की गयी? यदि दोनों में से कोई विकल्प नहीं था, तो पत्रकारों ने इसका तीख़ा विरोध क्यों नहीं किया? यदि पहले दिन ही मीडिया ने कड़ी नाराज़गी दिखायी होती तो दूसरे दिन भी यही दोहराने की अफ़सरों की हिम्मत नहीं होती।

सरकार ने ये साफ़ क्यों नहीं किया कि भारतीय वायुसेना ने जिस बालाकोट को निशाना बनाया वो है कहाँ? पाक अधिकृत कश्मीर में या पाकिस्तान के उत्तर पश्चिमी सूबे ख़ैबर-पख़्तूनवा में। सरकार ने ये भी साफ़ नहीं किया कि मुहिम में कितने विमानों ने हिस्सा लिया? कितनों ने नियंत्रण रेखा पार की? कितने ‘स्टैंड बाई’ पर रहे? ये बहुत छोटे-छोटे, लेकिन अहम सवाल हैं। इन्हें लेकर ही सूत्रों ने अलग-अलग लोगों को इतनी अलग-अलग बातें बतायीं कि हमारी मीडिया कवरेज़ ही हास्यास्पद हो गया।

इसी तरह, यदि सरकार ने हमले से हुए नुकसान का ब्यौरा देने से परहेज़ किया तो रिपोर्टरों ने किस आधार पर ये तय कर लिया कि तीन सौ आतंकवादी, उनके 25 प्रशिक्षक और जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अज़हर के दो भाई और एक साला मारे गये? हो सकता है कि ऐसा हुआ ही हो, लेकिन ये भी तो हो सकता है कि ऐसा नहीं हुआ हो? इसीलिए, सबूत की बड़ी अहमियत है। बेशक़, भारत सरकार के पास सबूत होंगे, लेकिन उन्हें दुनिया के सामने लाया जाना चाहिए था। ख़ासकर तब, तब पाकिस्तान का ये दावा हो कि हमलों से कोई ख़ास नुकसान नहीं हुआ।

यही दुर्दशा अगली दिन की प्रेस कॉन्फ़्रेस में भी रही। पाकिस्तानी विमानों ने भारतीय सीमा में घुसपैठ की। भारतीय वायुसेना ने हमले का जवाब दिया। दोनों देशों के विमान मार गिराये गये। भारत का पायलट दुश्मन की सीमा में पकड़ा गया। संचार क्रान्ति के मौजूदा दौर में सारी दुनिया को बहुत कुछ पता चलता रहा। ट्वीटर और वीडियो, अपने काम की धूम मचाते रहे लेकिन भारत सरकार का ढर्रा वही बाबा आदम के ज़माने वाला रहा। इसीलिए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने ब्यौरा देने से पहले ही कोई सवाल नहीं पूछने की शर्त का ऐलान कर दिया। जब यही करना था तो प्रवक्ता अपने साथ वायुसेना के अफ़सर को लेकर क्यों पहुँचे? इतनी सी बात के लिए तो प्रेस कॉन्फ़्रेस होनी ही नहीं चाहिए थी।

यदि मीडिया को कम जानकारी देना किसी रणनीति का हिस्सा है तो फिर सरकार को ये सुनिश्चित करना चाहिए था कि सूत्रों की आड़ में ग़लत जानकारियाँ नहीं फैले। इससे देश, सेना और अन्य संस्थाएँ और कमज़ोर होती हैं। सूचना तंत्र, ग़लत हाथों में खेलने लगता है। कल्पना कीजिए कि यदि अमेरिका ने लादेन को मार गिराने का सबूत सारी दुनिया के सामने नहीं रखा होता तो क्या उसकी वैसी धाक बन पाती, जैसी है। दूसरी ओर, यदि भारत सरकार किसी भी वजह से सबूत को सामने नहीं रख सकती थी, तो उसे हमले का पूरा ब्यौरा मीडिया के ज़रिये सबके सामने रखना चाहिए था। इसी ब्यौरे को रिपोर्टरों को जब आधिकारिक रूप से नहीं दिया जाता है तो उस जानकारी को ‘सूत्रों’ के हवाले से प्राप्त जानकारी कहते हैं। ये ‘सूत्र’ सरकार में बैठे लोग ही होते हैं। वो जब अपनी पहचान को ज़ाहिर नहीं करना चाहते, तब ‘सूत्र’ बन जाते हैं।

पत्रकारिता में ‘सूत्रों’ के माध्यम से जानकारी देने का तरीक़ा विश्व-व्यापी और हमेशा से है। ‘सूत्रों’ के माध्यम से मीडिया ग़लत या अधूरी जानकारी देता है। क़ानूनन ऐसा नहीं किया जा सकता, लेकिन व्यवहार में ख़ूब होता है। वो इसलिए, क्योंकि झूठ को प्रकाशित या प्रसारित करने के लिए जिन्हें क़ानूनी कार्रवाई करनी होती है, वही तो पत्रकारों को झूठी जानकारी देते हैं। यही है, ‘सैंया भये कोतवाल तब डर काहे का’। होशियार रिपोर्टर और सम्पादक जब ऐसी जानकारियों को प्रकाशित या प्रसारित करते हैं तो क़ानून की नज़र में अपनी ख़ाल बचाने के लिए ‘दावा है कि’, ‘अपुष्ट जानकारी है कि’ और ‘कहा जा रहा है कि’ जैसे जुमलों का इस्तेमाल किया जाता है। इसी तरह, जब किसी के ख़िलाफ़ किसी आरोप की बात की जाती है तब ये अपेक्षित है कि सम्बन्धित व्यक्ति से उसका पक्ष ज़रूर जाना जाए। इसीलिए जब इस ‘पक्ष की सफ़ाई या ब्यौरा’ सामने नहीं होता तो लिखा जाता है कि ‘उनकी प्रतिक्रिया नहीं मिली’ या उन्होंने ‘बात करने से इनकार कर दिया’।

पत्रकारिता के इन्हीं बुनियादी उसूलों का यदि बालाकोट हमले की रिपोर्टिंग में ख़्याल रखा गया तो अलग-अलग मीडिया में अलग-अलग बातें नहीं दिखायी देतीं। ‘अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग’ वाला रवैया पत्रकारिता के अलावा भारत की गरिमा को भी धूमिल करता है। दुश्मन को इससे बहुत फ़ायदा पहुँचता है। इसी जोख़िम को देखते हुए 2008 के मुम्बई के आतंकी हमलों के दौरान सरकार ने मीडिया के लिए जो दिशा-निर्देश तैयार किये थे, उसमें ये भी कि पत्रकार अपुष्ट जानकारी नहीं प्रसारित करेंगे और सरकार की ओर से उन्हें मुनासिब जानकारियाँ मुहैया करवायी जाएँगी। तब सम्पादकों की दलील थी कि यदि सरकार हमें सही ब्यौरा नहीं देगी तो हमारे लिए ग़लत जानकारियों के प्रसारण को रोकना बहुत मुश्किल होगा।

बदकिस्मती से इस बार सारी पुरानी बातों को भुला दिया गया। ऐसा क्यों हुआ? दरअसल, मौजूदा दौर में मीडिया का भी राजनीतिकरण हो चुका है। कई चैनल और अख़बार सारी पत्रकारीय मर्यादाओं को ताक़ पर रखकर राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता की तरह काम करने लगे हैं। इसीलिए, इन्हें भक्त पत्रकार भी कहा जाने लगा है। एक ज़माना था जब ख़बरों की प्रमाणिकता यानी क्रेडिबिलिटी को मीडिया का आभूषण माना जाता है। लेकिन अभी तो दौर भेड़-चाल का है।

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सेना ने माना, आईएलएंडएफएस बांड में फंसा एजीआईएफ का पैसा

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Indian Army insurance ILFS bonds

नई दिल्ली, 18 मार्च | भारतीय सेना जो पहले यह मानने को तैयार नहीं थी कि उनके कल्याण की निधि का पैसा आईएनएंडएफएस के विषैले बांड में फंस गया है, जबकि आईएनएस इस बात को बार-बार दोहराता रहा, लेकिन अब वह स्वीकार करती है कि भारत की एकमात्र निष्पक्ष न्यूज वायर का विश्लेषण सही है।

सेना के पीआरओ ने आखिरकार सवालों का जबाव देते हुए कहा कि आर्मी ग्रुप इंश्योरेंस फंड (एजीआईएफ) के काफी सख्त निवेश नियम हैं। देश के अत्यंत सम्मानित व प्रख्यात वित्तीय शख्सियतों की सलाह पर निवेश किया जाता है। इससे पहले सेना के पीआरओ लेफ्टिनेंट कर्नल मोहित वैष्णव मसले को उलझाते रहे और जवाब नहीं दिए थे। सेना का हालिया बयान आईएएनएस के तथ्यों के साथ इस प्रकार है :

एजीआईएफ का वर्षो से रिटर्न निर्धारित जोखिम लाभ सांचे में काफी बेहतर रहा। आईएएनएस ने इसपर कभी संदेह नहीं किया।

एजीआईएफ को 200 से कोई एनपीए नहीं रहा। इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आईएनएंडएफएस) ट्रिपल ‘ए’ रेटेड कंपनी थी और जब एजीआईएफ का निवेश हुआ उस समय उसे केंद्र व राज्य सरकारों दोनों की मदद मिली थी। कंपनी अगस्त 2018 में अचानक चूक के कारण ट्रिपल ‘ए’ से नीचे आ गई।

आईएएलएंडएफएस के 91,000 करोड़ के कर्ज में बैंकों का 63 फीसदी, म्यूचुअल फंड का तीन फीसदी से ज्यादा और बीमा कंपनियों, ईपीएफ वे पेंशन निधि का पांच फीसदी से ज्यादा फंस गया है।

बैंक/एएमसी/पेंशन निधि के मुकाबले एजीआईएफ की रकम अत्यल्प (0.5 फीसदी से कम) है। (सारा कुछ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है और आईएएनएस का कहना है कि विषैले आईएलएंडएफएस बांड में एजीआईएफ की 210 करोड़ रुपये की रकम फंस गई है।)

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राफ़ेल सौदे में सीएजी ने उड़ाई पारदर्शिता की धज़्ज़ियाँ

राफ़ेल रिपोर्ट में सीएजी ने अपनी प्रतिष्ठा गँवाई, इसने जितने सवालों के जबाब दिये उसके ज़्यादा तो प्रश्न खड़े किये

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Rafale deal scam

राफ़ेल विमानों की ख़रीदारी के लिए भारत और फ़्राँस के बीच हुए सौदे को अन्तर-सरकारी क़रार (आईजीए) कहा गया। आईजीए के इस नामकरण को समझना बहुत मुश्किल है। ख़ासकर, उस घटनाक्रम को देखते हुए जो 10 अप्रैल 2015 से पहले का रहा है। इस दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फ़्राँसिसी कम्पनी डसॉल्ट से 36 विमान ख़रीदने के फ़ैसले का ऐलान किया था।

यूपीए सरकार ने ग्लोबल टेंडर के ज़रिये दो विमानों के चुना था। पहला, डसॉल्ट कम्पनी का राफ़ेल और दूसरा, चार यूरोपीय देशों में बनने वाला यूरोफ़ाईटर टाइफून। टेंडर में राफ़ेल का दाम कम था। तब यूपीए ने 126 राफ़ेल विमानों की ख़रीदारी के लिए सौदेबाज़ी शुरू की।

ये क़रार दो सरकारों के बीच होने वाला जी-टू-जी समझौता नहीं था। क्योंकि ग्लोबल टेंडर को इस ढाँचे में नहीं रखा जा सकता। यही वजह है कि यूपीए सरकार ने जब रूस या अमेरिका से रक्षा उपकरणों की ख़रीदारी की तभी जी-टू-जी क़रार किये गये। यूपीए ने डसॉल्ट से जिस सौदे की बातचीत की थी, उसके तहत 18 विमानों का निर्माण सीधे डसॉल्ट को करना था और बाक़ी 108 का निर्माण हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को करना था और डलॉल्ट को इसकी तकनीक मुहैया करवानी थी।

मार्च 2015 में डसॉल्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि एचएएल के साथ हो रहा समझौता 95 फ़ीसदी पूरा हो चुका है और बाक़ी भी जल्द ही पूरा हो जाएगा। लेकिन प्रधानमंत्री ने उस समझौते को ख़त्म कर दिया और उसकी जगह डसॉल्ट से सीधे 36 विमान ख़रीदने का सौदा किया। इस समझौते से एचएएल को बाहर कर दिया गया। साफ़ है कि अब भी राफ़ेल विमानों की आपूर्ति का ज़िम्मा डसॉल्ट पर ही है, फ़्राँसिसी सरकार पर नहीं। इसके बावजूद, नये सौदे को ‘सरकार से सरकार के बीच’ (जी-टू-जी) नहीं, बल्कि ‘अन्तर-सरकारी क़रार’ (आईजीए) कहा जा रहा है।

नये सौदे की आड़

प्रधानमंत्री की घोषणा का अंज़ाम ये हुआ कि पुराने समझौते से जुड़ी वो सारे शर्ते ख़त्म हो गयीं जिनका ताल्लुक राफ़ेल के दाम से था और जिसे इसे रक्षा ख़रीद प्रक्रिया यानी डिफ़ेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसिज़र्स (डीपीपी) के तहत तय किया गया था। दूसरे शब्दों में, अब पुराना क़रार ख़त्म हो गया और उसकी जगह 36 विमानों की पूरी तरह से नयी डील (सौदे) ने ले ली। 2015 में फ़्राँस की धरती पर किये गये प्रधानमंत्री के ऐलान से भारत सरकार पशोपेश में फँस गयी, क्योंकि ये प्रधानमंत्री का एकतरफ़ा फ़ैसला था। अब आगे की बातचीत का दारोमदार सीधे-सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) पर आ गया।

नये सौदे की शर्तों पर बातचीत करने का जो रास्ता प्रधानमंत्री कार्यालय ने चुना वो रक्षा ख़रीद प्रक्रिया (डीपीपी) और रक्षा ख़रीद परिषद (डिफ़ेंस एक्वीज़ीशन काउन्सिल – डीएसी) के दायरे से बाहर था। क्योंकि रक्षा ख़रीद के लिए सौदेबाज़ी करने का काम डीपीपी को करना होता है। ये उसी का क्षेत्राधिकार है। इसीलिए राफ़ेल की फ़ाइल में रक्षा मंत्रालय के अफ़सरों की टिप्पणी ने प्रधानमंत्री कार्यालय पर सीधा-सीधा आक्षेप किया। दस्तावेज़ों से साबित हो गया कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने सौदेबाज़ी में रक्षा मंत्रालय की रसूख़ को गिरा दिया। दिलचस्प ये भी रहा कि नये सौदे में दो नयी बातें हुईं। पहला, एक ऑफ़सेट पार्टनर का जुड़ना और दूसरा, हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के हाथों से 108 विमानों के निर्माण की शर्ते का ख़त्म होना।

नया क़रार ‘अन्तर-सरकारी’ (आईजीए) नहीं है। क्योंकि डसॉल्ट एक निजी कम्पनी है। ये फ़्रेंच सरकार की भी कम्पनी नहीं है। इसीलिए फ़्रेंच सरकार ने 36 विमानों की सप्लाई की गारंटी लेने वाली शर्त से अपना पल्ला झाड़ लिया। फिर सप्लायर होने के नाते डसॉल्ट को गोपनीयता और कमीशन की शर्तों से छुटकारा दिलाने के लिए ज़ुर्माने और भ्रष्टाचार से जुड़े प्रावधानों को हटाया गया। ये काम प्रधानमंत्री कार्यालय की शह के बग़ैर कैसे मुमकिन हुआ? इसकी क्या वजह रही और ऐसा किससे कहने से हुआ? इन सवालों का कोई जबाब नहीं मिला।

रक्षा ख़रीद परिषद (डीएसी) को दरकिनार करने के लिए ऐसी शर्तें तैयार की गयीं जिससे प्रधानमंत्री और फ़्रेंच सरकार के लिए मुश्किलें पैदा नहीं हों। गारंटी की जगह उस ‘लेटर ऑफ़ कम्फर्ट’ (सहुलियत पत्र) ने ले ली जिसका कोई क़ानूनी प्रभाव नहीं होता। यहाँ तक कि फ़्रेंच सरकार ने डसॉस्ट को भुगतान करने के लिए अपने ‘स्क्रू खाते’ की सुविधा भी नहीं दी। शायद इसीलिए, क्योंकि फ़्रेंच सरकार इस सौदे की किसी भी ज़िम्मेदारी लेने से बचना चाहती थी। स्क्रू खाते के ज़रिये फ़्रेंच सरकार को ये सुनिश्चित करना होता कि डसॉल्ट ने अपनी शर्तों को निभाया, तभी उसे भुगतान हुआ।

ख़ामियों भरी रिपोर्ट

सीएजी ने कई तरह से देश को गच्चा दिया। पहला, इसकी रिपोर्ट 36 विमानों के दाम तक सीमित रही। इसका कहना है कि यूपीए के दौर वाले क़रार के मुक़ाबले नया सौदा 2.86% सस्ता है। लेकिन इस नतीज़े पर पहुँचने से पहले सीएजी ने सभी तथ्यों का ख़ुलासा नहीं किया। कहना मुश्किल है कि सीएजी ऐसा कैसे कर सकता है! दूसरा, सीएजी ने ये नहीं बताया कि प्रधानमंत्री ने किस आधार पर 36 विमानों की सीधी ख़रीदारी का साहसिक फ़ैसला लिया। तीसरा, सीएजी रिपोर्ट ने 2013 से लागू रक्षा ख़रीद प्रक्रिया (डीपीपी) को दरकिनार किये जाने के प्रति अपने नज़रें पूरी तरह से फेर लीं।

चौथा, सीएजी रिपोर्ट में इस तथ्य के प्रति भी उदासीनता दिखायी गयी है कि भारत की सौदेबाज़ी टीम ने एक ऐतराज़ ज़ाहिर किया है और उसे ठुकराने या ख़ारिज़ करने के लिए क्या दलीलें हैं। पाँचवाँ, सीएजी रिपोर्ट ने ये भी साफ़ नहीं किया कि नये क़रार के मसौदे से भ्रष्टाचार-विरोधी प्रावधान ग़ायब क्यों हैं। छठा, सीएजी रिपोर्ट ये तो बताती है कि गारंटी नहीं मिलने का कोई वित्तीय नुकसान नहीं होगा, लेकिन रिपोर्ट ये साफ़ नहीं करती कि गारंटी का प्रावधान क्यों नहीं है।

सबसे आश्चर्यजनक तो ये रहा कि सीएजी ने राफ़ेल के चयन के लिए यूपीए की आलोचना की, लेकिन उसी विमान को जब प्रधानमंत्री ने चुनने का फ़ैसला किया तो सीएजी की बोलती बन्द थी। इतना ही नहीं, राफ़ेल विमानों की संख्या को 126 से घटाकर 36 करने को लेकर भी जो उद्देश्य बताया गया वो ये कि भारतीय वायुसेना में विमानों की भारी कमी है जिसे यथाशीघ्र पूरा करना ज़रूरी था। लेकिन जब यूपीए के सौदे की तुलना मोदी सरकार के क़रार से की गयी तो पता चला कि नये सौदे में सिर्फ़ एक महीने की बचत होगी।

साफ़ है कि मौके की नज़ाक़त को देखते सीएजी अपनी अपेक्षाओं पर ख़रा नहीं उतरा। उसने अपने दायरे से बाहर जाकर सरकार की सुरक्षा करने का रास्ता चुना। अब तो सीएजी की प्रतिष्ठा को भी सुरक्षित करना होगा।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)
(साभार: TheHindu)

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सरकार और मीडिया ही बने लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक

लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन का सबसे बड़ा सबूत है, ग़लत जानकारियों को ही विश्वसनीय बनाकर पेश करना

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Modi on TV

ज़माना बदल गया। हमारा राष्ट्रीय संवाद अब पक्ष-विपक्ष का नहीं रहा, बल्कि दोस्तों और दुश्मनों का हो चुका है। चर्चा और बहस की गुंज़ाइश नहीं रही। आज जो सरकार या उसके बैठे लोगों के विरोध में हो, उसे देशद्रोही कहा जाता है। ऐसा माहौल बना दिया गया है कि पाकिस्तान से सम्बन्धित सरकार के हरेक क़दम का समर्थन करना ज़रूरी है। यदि विपक्ष ऐसे सवाल पूछता है, जिन्हें पूछा ही जाना चाहिए तो उस पर राष्ट्रविरोधी होने का आरोप मढ़ दिया जाता है। फ़ेसबुक औऱ ट्वीटर जैसे सोशल मीडिया के माध्यमों पर भी यदि कोई सरकार की आलोचना करता है तो उसके ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा ठोंक दिया जाता है।

लोकसभा के चुनाव सामने पाकर जन-संवाद को इतना हानिकारक बना दिया गया है कि बात बर्दाश्त से बाहर हो गयी है। प्रधानमंत्री कुछ भी बोलें लेकिन उनके गुणगान के लिए इलेक्ट्रानिक मीडिया ने चीयरलीडर्स या भाँडों की भूमिका थाम ली है। जब ‘द हिन्दू’ अख़बार ने बोफ़ोर्स ख़ुलासा किया था, तब विपक्ष ने राजीव गाँधी से सवाल पूछे थे। लेकिन जब उसी ‘द हिन्दू’ ने राफ़ेल सौदे का भाँडाफोड़ किया तो सरकार ने ‘द हिन्दू’ को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। विपक्ष के सवालों को ऐसे पेश किया गया जिनसे सुरक्षा बल कमज़ोर पड़ जाएँगे।

मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर आतंकी हमला हुआ था, तब मुठभेड़ के दौरान ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुम्बई पहुँचकर केन्द्र सरकार को नकारा होने और राष्ट्रीय सुरक्षा में नाकाम रहने का तमग़ा दे दिया। लेकिन जब पुलवामा हमला हुआ तो सरकार ने उन्हीं लोगों पर सवाल दाग़ने शुरू कर दिये जो उससे सवाल पूछ रहे थे। लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी की यादाश्त बहुत कमज़ोर है। मोदी उस वक़्त देश की सरकार के समर्थन में नहीं खड़े जब मुम्बई में आतंकी तबाही मचा रहे थे। शायद, उन्हें उस वक़्त अपनी कथनी और करनी में राष्ट्रभक्ति की छटा दिखायी दे रही थी।

ऐसी वारदातों के सामने मीडिया का दोहरा चरित्र बेनक़ाब हो गया है, क्योंकि अब उसके पास प्रधानमंत्री के दोमुँही बातों को उजागर करने का वक़्त नहीं है। ये मिसाल है कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएँ अब कहाँ से कहाँ पहुँच चुकी हैं। 2014 से पहले पहले प्रेस और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (यूपीए) की क़दम-क़दम पर चीड़फाड़ की। आज वही लोग इस सरकार के लिए भाँड या चीयरलीडर्स बन गये हैं। हालाँकि, ये बात मीडिया का सभी वर्गों पर लागू नहीं होती है। आज विपक्षी नेताओं के तक़रीबन सारे बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है। आज सरकार के हर क़दम को राष्ट्रभक्ति बताकर उसका स्तुतिगान किया जाता है। प्रधानमंत्री और इस सरकार के हरेक मंत्री के बयान को अक्षरशः सत्य बनाकर पेश किया जाता है। उन आँकड़ों को लेकर कोई सवाल नहीं पूछे जाते जिन्हें राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे (एनएसएसओ) जारी करता है। कोई सरकार से ये नहीं पूछ रहा कि वो किस आधार पर बालाकोट में 300-400 आतंकियों के सफ़ाये का दावा कर रही है। पत्रकारों और टीवी के एंकरों में प्रधानमंत्री को उनकी हैसियत से बड़े से बड़ा करके दिखाने की होड़ मची हुई है।

कई योजनाओं के नाम बदलकर उनकी उपलब्धियों के बारे में सरकार जो आँकड़े पेश करती है, कोई उसकी सच्चाई को जाँचने वाला नहीं है। जो लोग सच्चाई को सामने रखते हैं उनके साथ दक्षिण-पन्थी भक्तों की टोली ग़ाली-गलौज़ करती है। विपक्ष के नेताओं को फ़र्ज़ी बयान को जोड़कर उन्हें वायरल करवाया जाता है, ताकि उनका चरित्र-हनन किया जा सके। लेकिन दूसरी ओर, फ़ेसबुक और ट्वीटर के अफ़सरों को बुलाकर सरकार तलाड़ती है कि वो उसके क़रीबियों के चुनिन्दा पोस्ट को क्यों हटा रही है। सरकार को उन फ़ेक-पोस्ट की परवाह नहीं है, जिनमें विपक्षियों को निशाना बनाया जाता है। भ्रष्ट जानकारियों को आज विश्वसनीय सूचनाएँ बनाकर पेश किया जाता है। हर तरफ़ से ये झूठ फ़ैलाया जा रहा है कि मोदी सरकार ने भारत की दिशा ही बदल दी है।

अख़बारों में प्रधानमंत्री के विज्ञापन भरे पड़े हैं। इन पर जनता का पैसा बहाया जा रहा है, लेकिन कोई सवाल उठाने वाला नहीं है। मुट्ठीभर सम्पादकों ने सरकार को आड़े हाथों लेने का साहस दिखाया है। वो बधाई के पात्र हैं। लेकिन लोकतंत्र के चौथे खम्भे का ज़्यादातर हिस्सा सरकार की जाग़ीर बन चुका है। मीडिया की साख़ इतनी गिर चुकी है कि समाज के बहुत बड़े तबक़े ने टेलीविज़न देखना बन्द कर दिया है, क्योंकि अब वो इसे ख़बरें देने वाले माध्यम के रूप में नहीं पाते हैं। हर शाम को कुछ चैनलों पर कुछ ख़ास लोगों की साउंड बाइट सर्कस करते नज़र आती है। इनके ज़रिये समाज में ज़हर परोसा जाता है। ये लोकतंत्र का अराजक चेहरा है, जो सिर्फ़ झूठ और दुष्प्रचार के भरोसे क़ायम है।

यदि सरकार और चौथा खम्भा यानी मीडिया, एक ही चट्टा-बट्टा बन चुके हैं तो लोकतंत्र भारी ख़तरे में है। इसीलिए बहुत महत्वपूर्ण है कि वो लोग आगे आयें जो अपनी बातों को प्रभावी तरह से रखना जानते हैं। यदि ऐसे लोग मुखर नहीं होंगे तो झूठ और अफ़वाह को कौन चुनौती देगा। सच को कौन सामने लाएगा। हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को संविधान से जो ज़िम्मेदारियाँ मिली हैं, उसे लेकर उन्हें सरकार के प्रति नहीं बल्कि देश के प्रति जबाबदेह होना चाहिए। उन्हें सरकार की रखैल बनने के बजाय अपने विवेक के काम लेना चाहिए। चाहे केन्द्रीय हो या प्रादेशिक, जाँच एजेंसियों को चाहिए कि वो डर और पक्षपात के बग़ैर क़सूरवार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करें। लेकिन ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जाँच एजेंसियाँ चुन-चुनकर उन लोगों को निशाना बना रही हैं, जो सरकार के विरोधी हैं, जबकि उन लोगों को नज़रअन्दाज़ किया जाता है जो या तो सरकार के क़रीबी हैं और फिर उसका हिस्सा हैं। न्यायपालिका को भी ये समझना होगा कि यदि वो बेक़सूर लोगों के हक़ में नहीं खड़ी होती तो उसे निष्पक्ष नहीं माना जा सकता।

ख़ुशहाली और अच्छे दिन के लिए शान्ति, सद्भाव और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा ज़रूरी है। ऐसा लगता है कि आज हम ऐसे अन्यायपूर्ण भारत में रह रहे हैं, जहाँ कमज़ोर तबकों के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ सपने हैं। मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर चारों ओर नाउम्मीदी नज़र आती है।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)
(साभार: द टेलिग्राफ)

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