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ओलम्पिक के कांस्य पदक के पास रखूंगी यह स्वर्ण पदक : सायना

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Saina Nehwal
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अपनी हमवतन और रियो ओलम्पिक की रजत पदक विजेता पी.वी. सिंधु को मात देकर 21वें राष्ट्रमंडल खेलों में महिला एकल वर्ग का स्वर्ण पदक जीतने वाली सायना नेहवाल का कहना है कि वह इस पदक को अपने लंदन ओलम्पिक के कांस्य पदक के पास रखेंगी।

वेबसाइट ‘ईएसपीएन डॉट कॉम’ की रिपोर्ट के अनुसार, सायना ने कहा कि यह पदक उनके लिए काफी खास है। इसीलिए, वह इसे खास जगह ही रखेंगी। वर्ल्ड नम्बर-12 सायना ने स्वर्ण पदक के लिए खेले गए मुकाबले में उलटफेर करते हुए वर्ल्ड नम्बर-3 सिंधु को सीधे गेमों में 21-18, 23-21 से मात देकर जीत हासिल की।

सायना का यह राष्ट्रमंडल खेलों का दूसरा स्वर्ण पदक है। इससे पहले उन्होंने 2010 में राजधानी दिल्ली में हुए 19वें राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता था। सायना ने कहा, “भारत में अगर मैं हारती हूं, तो 100 सवाल खड़े हो जाते हैं। सायना हार गई।

उसे संन्यास ले लेना चाहिए। इस पदक की इसलिए, मेरे लिए काफी खास अहमियत है। मैं इसे ओलम्पिक खेलों के कांस्य पदक के पास रखूंगी। रियो डी जनेरियो में चोटिल होने के कारण यह जीत मेरे लिए भावुकता से भरी हुई थी।”

–आईएएनएस

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सच हर हाल में बाहर आएगा : रोनाल्डो

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Cristiano Ronaldo-
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एक अमेरिकी महिला द्वारा लगाए गए दुष्कर्म के आरोपों में फंसे स्टार फुटबालर क्रिस्टियानो रोनाल्डो का कहना है कि वह तथा उनके वकील इस मामले में आश्वस्त हैं और सच हर हाल में बाहर आकर रहेगा।

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, रोनाल्डो ने जुवेंतस फुटबाल क्लब के संवाददाता सम्मेलन में खुलकर इस मामले पर बात की। अमेरिका की निवासी कैथरीन मेयोर्गा ने रोनाल्डो पर साल 2009 में लास वेगास के एक होटल में उनके साथ दुष्कर्म का आरोप लगाया है।

पुर्तगाल के स्टार खिलाड़ी ने ट्विटर के जरिए एक बयान में इस आरोप को सिरे से खारिज कर दिया था। पहली बार आधिकारिक रूप से इस मुद्दे पर बात करते हुए रोनाल्डो ने कहा, “हर हाल में सच बाहर आकर रहेगा। हमने दो सप्ताह पहले बयान जारी किया था। मैं इस स्थिति में झूठ नहीं बोलूंगा। मेरे वकील और मैं मामले को लेकर आश्वस्त हैं।”

रोनाल्डो ने कहा, “सबसे अहम बात यह है कि मैं फुटबाल के खेल का आनंद लेता हूं और मैं अपने जीवन से खुश हूं। मेरे पास मेरा ख्याल रखने वाले लोग हैं। निश्चित तौर पर सच बाहर आएगा। मेरे पास सबकुछ है और इसलिए बाकी चीजें मायने नहीं रखती हैं।”

–आईएएनएस

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अनाथ आश्रम में पला, ढाबों में काम कर इस दिव्यांग ने ऐसे जीता गोल्ड मेडल

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पैरा एशियन गेम्स में नारायण ठाकुर ने गोल्ड जीत रचा इतिहास।

जन्म से ही दिव्यांग नारायण ठाकुर ने जकार्ता में चल रहे एशियन पैरा गेम्स में 100 मीटर टी 35 स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया।

नारायण ठाकुर के पिता का निधन आठ साल की उम्र में हो गया। उसके बाद से ही आठ साल तक वह एक अनाथ आश्रम में गुजारे। वहां से निकलने के बाद पेट पालने के लिए डीटीसी की बसों की सफाई की और ढाबों पर काम किया।

यह कहानी उत्तर पश्चिमी दिल्ली के समयपुर बादली इलाके की झुग्गी बस्ती में रहने 27 वर्षीय नारायण एथलीट ही है। जिसने संघर्ष और कठिनाइयों से लड़कर अपने लक्ष्य को हासिल किया है।

दिल्ली के एक स्टेडियम में एक पुरस्कार वितरण समारोह में नारायण ने कहा, ‘मैं बिहार में पैदा हुआ। दिल की बीमारी के चलते मेरे पिता को दिल्ली शिफ्ट होना पड़ा। कुछ वर्षों बाद उन्हें ब्रेन ट्यूमर हो गया और इसी बीमारी ने उनकी जान ले ली।’

उसने आगे कहा, ‘मैंने बसें साफ कीं, एक वेटर के तौर पर काम किया।’ ठाकुर को शरीर के बाएं हिस्से पर हेमेपेरसिस हो गया था। इस बीमारी में मरीज को ब्रेन स्ट्रोक के बाद शरीर के बाएं हिस्से में लकवा हो जाता है।

नारायण के पिता प्लास्टिक फैक्टरी में काम करते थे। उनकी मौत के बाद मां के लिए अपने तीन बच्चों का लालन-पालन करना मुश्किल हो गया। ठाकुर ने कहा, ‘इसी समय मुझे दरियागंज के अनाथ आश्रम में भेज दिया गया ताकि मुझे भोजन के साथ पढ़ने का अवसर मिल सके।’

ठाकुर ने कहा कि वह हमेशा से ही खेल के शौकीन थे। क्रिकेट उनका पहला प्यार था। उन्होंने कहा, ‘मैं क्रिकेट खेलना चाहता था लेकिन किसी वजह से ऐसा नहीं हो सका। मैंने अनाथ आश्रम इसलिए छोड़ा ताकि मैं अन्य खेल विकल्पों पर विचार कर सकूं।’

2010 में जब ठाकुर ने अनाथ आश्रम छोड़ा तो परिवार को एक और मुसीबत का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा, ‘यह वह समय था जब समयपुर बादली की जिन झुग्गियों में हम रहते थे, उन्हें ढहा दिया गया था। तब उसके करीब ही शिफ्ट होना पड़ा। आर्थिक हालात ठीक नहीं थे, ऐसे में मेरे पास डीटीसी की बसें साफ करने और सड़क किनारे छोटे ठेलों पर काम करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं था लेकिन खेल को लेकर मेरा जज्बा तब भी कायम था।’

ठाकुर की जिंदगी में तब बदलाव आया जब किसी ने उन्हें जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में प्रैक्टिस करने की सलाह दी। उस लम्हे को याद करते हुए नारायण कहते हैं, ‘मैं काफी खुश था। समस्या यह थी कि मेरे पास घर से स्टेडियम तक जाने के पैसे नहीं थे। स्टेडियम तक पहुंचने के लिए मुझे तीन बसें बदलनी पड़ती थीं। मैंने अपना बेस पानीपत शिफ्ट करने की भी कोशिश की। ऐसा भी कर नहीं पाया। मैं रोज के 40-50 रुपये किराये में नहीं खर्च कर सकता था। फिर मैंने ट्रेनिंग के लिए अपना बेस त्यागराज स्टेडियम शिफ्ट कर लिया।’

ठाकुर ने कहा कि उन्होंने अपने खेल पर काफी मेहनत की और कुछ अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपने प्रदर्शन से लोगों को प्रभावित भी किया। इसके बाद जकार्ता खेलों में जाने का रास्ता तैयार हुआ। वह बड़े गर्व के साथ कहते हैं, ‘मैं देश के लिए जकार्ता में गोल्ड जीतकर काफी खुश हूं। मैं एशियन पैरा गैम्स या एशियाड में 100 मीटर में गोल्ड जीतने वाला इकलौता भारतीय हूं।’

ठाकुर के पास फिलहाल नौकरी नहीं है। अपनी मां को मदद करने के लिए वह पान/गुटखा की दुकान चलाते हैं। उन्हें हालांकि अब उम्मीद है कि उनका जीवन बदल जाएगा।

उन्होंने कहा, ‘मुझे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक पुरस्कार वितरण कार्यक्रम में 40 लाख रुपये का चेक दिया था। मुझे दिल्ली सरकार से भी कुछ आर्थिक मदद की उम्मीद है।’ वह इस पैसे का क्या करेंगे? इस पर उन्होंने कहा, ‘सबसे पहले अपने परिवार के लिए एक घर बनाऊंगा और बाकी अपनी ट्रेनिंग पर खर्च करूंगा।’

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विश्व कुश्ती चैम्पियनशिप: बजरंग स्वर्ण से चूके

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World wrestling championship

बुडापेस्ट के हंगरी में एशिया कप में सोने का तमगा जीतने वाले भारतीय पहलवान बजरंग पूनिया जारी विश्व कुश्ती चैम्पियनशिप में स्वर्ण हासिल करने से चूक गए। उन्हें फाइनल में हार के साथ ही रजत पदक से संतोष करना पड़ा, लेकिन हार के बाद भी बजरंग ने इतिहास रच दिया है। वह इस टूर्नामेंट में दो पदक जीतने वाले पहले भारतीय बन गए हैं।

बजरंग को पुरुषों की फ्री स्टाइल स्पर्धा के 65 किलोग्राम भारवर्ग के फाइनल में जापान के ताकुतो ओटुगोरो से 9-16 से हार का सामना करना पड़ा।

बजरंग अगर जापानी खिलाड़ी को मात देकर स्वर्ण जीतने में सफल होते तो वह इस चैम्पियनशिप में स्वर्ण जीतने वाले भारत के दूसरे पहलवान होते। उनसे पहले सुशील कुमार ने मॉस्को में 2010 में इस चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीता था। बजंरग का यह इस चैम्पियनशिप में दूसरा पदक है। इससे पहले वह 2013 में कांस्य पदक जीतने में सफल रहे थे।

फाइनल मैच काफी रोमांचक था। जापानी खिलाड़ी ने बजंरग को बाहर भेज एक अंक लिया और फिर बजरंग को पटकर कर चार अंक और जुटाए। बजरंग ने टेकडाउन से दो अंक लेकर अपना खाता खोला और फिर स्कोर 6-7 कर लिया।

दूसरे पीरियड में बजरंग ने वापसी की कोशिश की लेकिन जापानी खिलाड़ी ने तीन अंक लेकर अपनी बढ़त को 9-6 कर लिया। इस बढ़त को जापानी खिलाड़ी ने बजरंग के बेहद आक्रामक होने के बाद भी बचाए रखा।

–आईएएनएस

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