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आख़िर, ये शपथ है क्या बला!

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oath taking ceremony

संवैधानिक पदों का दायित्व सम्भालने वालों के लिए संविधान में पद और गोपनीयता की शपथ लेने का विधान बनाया गया है। संविधान के अनुच्छेद 60, 69, 75(4), 99, 124(6), 148(2), 159, 164(3), 188 और 219 में इसका बाक़ायदा ज़िक्र है। इसका सम्बन्ध राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, स्पीकर, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस और जजों, सांसदों, विधायकों और सीएजी के पदों से है। संवैधानिक पद होने के बावजूद संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों, राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों, चुनाव आयुक्तों, एटार्नी जनरल और एडवोकेट जनरल को शपथ-विधि से नहीं जोड़ा गया है। जिन पदों पर शपथ ग्रहण की अनिवार्यता है, उनके लिए शपथ की शब्दावली क्या होगी? इसका ब्यौरा संविधान के थर्ड शिड्यूल में प्रोविज़न I से लेकर VIII तक में अलग से भी दोहराया गया है।

लेकिन शपथ-ग्रहण की पूरी प्रक्रिया के साथ एक अज़ब सी विडम्बना भी जुड़ी हुई है। वो ये कि ऐसे शपथ-ग्रहण की वैधता की मियाद सिर्फ़ एक कार्यकाल तक ही होती है। नये कार्यकाल के शुरुआत से पहले इन गणमान्य व्यक्तियों को फिर से शपथ लेना पड़ता है। लेकिन जब मंत्रियों के विभाग में परिवर्तन होता था, तब उन्हें नये सिरे से शपथ की ज़रूरत नहीं पड़ती, जबकि यदि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री उनका प्रमोशन करके उन्हें राज्यमंत्री से स्वतंत्र प्रभार वाला मंत्री बनाते हैं या फिर कैबिनेट मंत्री का दर्ज़ा दिलवाते हैं तो मंत्रि परिषद का सदस्य होने के बावजूद इन्हें भी नये सिरे से शपथ लेना पड़ता है। यही हाल जजों का भी है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की शपथ अलग है, तो चीफ़ जस्टिस बनने पर नये सिरे से शपथ लेनी पड़ती है। यहाँ तक कि राज्यपालों का भी जब एक राज्य से दूसरे राज्य में तबादला होता है तो उन्हें नये पद के लिए नये सिरे से शपथ लेनी पड़ती है।

ये शपथ ग्रहण या तो ईश्वर के नाम पर होता है या शुद्ध अन्तःकरण के नाम पर। इन्हें संविधान और क़ानून के प्रति सच्ची निष्ठा रखने, निष्पक्ष और निर्भीक रहने तथा देश की एकता और अखंडता का बरकरार रखने की सार्वजनिक तौर पर प्रतिज्ञा की जाती है। वादा किया जाता है। शब्द कोश के मुताबिक़, शपथ-प्रतिज्ञा-वादा-सौगन्ध-हलफ़, सभी परस्पर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। मज़े की बात तो ये है कि शपथ, सशर्त तो हो सकती है। लेकिन इसकी कोई मियाद नहीं हो सकती। प्रतिज्ञा का सम्बन्ध पूरी ज़िन्दगी से होता है। वादे का मतलब ही है, ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’। तो फिर ऐसा क्यों है कि शपथ के ज़रिये पद-भार सम्भालने वालों को तब भी शपथ दोहरानी होती है, जबकि वो लगातार उसी पद पर बने रहने वाले हों?

संवैधानिक पदों के लिए शपथ लेने वाले लोग यदि इसकी मर्यादा भंग करते हैं तो उन्हें उनके पद से हटाने की जटिल प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया को इम्पीचमेंट कहते हैं। इम्पीचमेंट तो आपराधिक सज़ा का दर्ज़ा हासिल नहीं है। अलबत्ता, यदि दुराचरण के तहत कोई आपराधिक मामला भी बने तो उनके लिए अपराध-विधान के मुताबिक़ कार्रवाई हो सकती है। मसलन, यदि किसी को ग़बन करने के मामले में इम्पीच किया गया है तो उनके ख़िलाफ़ ग़बन से जुड़ा मुक़दमा चल सकता है और उसे अदालती प्रक्रिया से सज़ा भी दी जा सकती है।

लेकिन शपथ-भंग करने, कसम तोड़ने या वादा-ख़िलाफ़ी के लिए क़ानून में कोई सज़ा नहीं है। अलबत्ता, शपथ-पत्र या हलफ़नामें पर झूठा ब्यौरा देना या कोर्ट में झूठी गवाही देना बाक़ायदा अपराध है। इसके लिए कोर्ट सज़ा देती है। लेकिन अब ज़रा उस क़सम को याद कीजिए जिसे अरविन्द केजरीवाल ने अपने बच्चों का वास्ता देकर खायी थी, या फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस वादे को याद कीजिए, जब उन्होंने नोटबन्दी के वक़्त देश से 50 दिन की मोहलत माँगी थी, या जब उन्होंने विदेश से काला धन लाकर सबके खाते में 15-15 लाख रुपये डालने का वादा किया था। अब सोचिए कि यदि कसम नहीं निभाने या प्रतिज्ञा तोड़ने या वादा ख़िलाफ़ी के लिए किसी सज़ा का विधान होता तो आज क्या देश नेताओं के लिए तरस नहीं होता?

आख़िर में, मुझे शपथ की मर्यादा तोड़ने का एक प्रसंग याद आ रहा है। बात 24 या 25 अगस्त 2015 है। उस दिन एनसीपी नेता शरद पवार का एक बयान था कि उन्होंने पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ख़त लिखकर यूपीए सरकार के एक निर्णय को बदलने की माँग की है। पवार ने लिखा है कि उन्होंने 2009 में कैबिनेट की बैठक में अपने सहयोगी जयराम रमेश के उस प्रस्ताव का विरोध किया था जिसके तहत जयराम ने जीएम यानी जेनेटिकली मोडिफ़ाइड अथवा अनुवांशिक रूप से परिष्कृत बीजों का परीक्षण उन राज्यों में नहीं करने का नियम बना दिया जो इसकी इजाज़त ना दें। शरद पवार ने लिखा है कि वो इस नियम के ख़िलाफ़ थे। जबकि जयराम का कहना था कि कृषि राज्यों का विषय है। लिहाज़ा, ये नहीं माना जा सकता कि राज्य ये नहीं जानते कि उनके लिए क्या मुफ़ीद होगा और क्या नहीं?

शरद पवार का नरेन्द्र मोदी को ख़त लिखना कतई ग़लत नहीं है। लेकिन बड़ी बात ये है कि कैबिनेट में लिये गये फ़ैसले से असहमत होते हुए भी शरद पवार मंत्री पद पर बने रहे। जो कैबिनेट के बने सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धान्त के ख़िलाफ़ था। इस सिद्धान्त का मतलब ही ये है कि कैबिनेट सभी फ़ैसले सर्वसम्मत्ति से लेगी। यदि कोई मंत्री कैबिनेट के फ़ैसले से असहमत है तो उसे इस्तीफ़ा देना होगा। वर्ना ये माना जाएगा कि फ़ैसले की पीछे उसकी चाहे जो आपत्ति रही हो, लेकिन जब फ़ैसला हो गया तो उसका भी फ़ैसला माना जाएगा।

सामूहिक उत्तरदायित्व के इस सिद्धान्त की वजह से ही राजीव गाँधी की कैबिनेट से आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने इसलिए इस्तीफ़ा दे दिया था क्योंकि वो शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को क़ानून बनाकर पलटने के ख़िलाफ़ थे। नियम ये है कि कैबिनेट से इस्तीफ़ा देने के बाद ही कोई मंत्री अपनी असहमति को सार्वजनिक कर सकता है। कैबिनेट में रहते हुए ऐसा करना सर्वथा वर्जित है। पवार का आचरण मंत्री-पद की शपथ के ख़िलाफ़ था। इस तरह उन्होंने संविधान की बुनियादी मान्यता का मखौल उड़ाया था।

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…तो क्या बीजेपी ने विधायक ओम प्रकाश शर्मा को सुपर पीएम बना दिया है?

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क्या बीजेपी ने दिल्ली में अपने पुनर्निर्वाचित विधायक ओम प्रकाश शर्मा को सुपर पीएम बना दिया है? वर्ना वो कैसे कह रहे हैं कि ‘दिल्ली में हार के बाद भी बीजेपी की नीतियों में कोई बदलाव नहीं आएगा। देश में नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के बाद एनआरसी भी आएगा और जनसंख्या नियंत्रण क़ानून भी आएगा।’

ओम प्रकाश शर्मा का ये बयान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के उन बयानों के बाद कैसे आ सकता है जिसमें देश के ये दोनों शीर्षस्थ नेता कह चुके हैं कि फ़िलहाल देश में एनआरसी लागू करने का कोई बात नहीं है। मोदी-शाह के उपरोक्त बयान संसद की कार्यवाहियों में भी दर्ज़ हैं और चुनावी रैलियों में भी दोहराये गये हैं। तो क्या ये माना जाए कि मोदी-शाह से आगे जाकर ओम प्रकाश शर्मा ने सरकार और पार्टी में भीतरखाने चल रही गतिविधियों का ख़ुलासा कर दिया है। यदि ऐसा नहीं है, तो बीजेपी या सरकार के प्रवक्ताओं ने शर्मा के बयानों से अब तक किनारा क्यों नहीं किया?

बात यहीं नहीं थमती। ओम प्रकाश शर्मा चुनाव ख़त्म होने के बाद भी अरविन्द केजरीवाल को बार-बार आतंकवादी बताने से बाज नहीं आ रहे हैं। लिहाज़ा, ये सवाल उठना भी लाज़िमी है कि क्या बीजेपी ने उन्हें ऐसे बयानों को दोहराने के लिए अधिकृत किया है? यदि नहीं, तो फिर शर्मा जैसे बयान-वीरों की ज़ुबान पर कौन लगाम कसेगा? और, यदि बीजेपी भी शर्मा के अलावा प्रकाश जावड़ेकर, परवेश वर्मा, कपिल मिश्रा और तेजिन्दर बग्गा जैसे छोड़े-बड़े नेताओं की तरह केजरीवाल को आतंकवादी मानती है, तो फिर उन्हें जेल में क्यों नहीं डाल रही?

क्या मोदी-शाह की नाक के ठीक नीचे देश की राजधानी में 16 फरवरी को तीसरी बार एक आतंकवादी की मुख्यमंत्री के पद पर ताजपोशी होनी चाहिए? या फिर बीजेपी वास्तव में केजरीवाल को आतंकवादी नहीं मानती है बल्कि वो उन्हें प्यार से अथवा हँसी-मज़ाक में आतंकवादी कह रही है, या फिर दिल्ली में जनादेश से पिटने के बाद बीजेपी में अब आतंकवादी के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का हौसला नहीं बचा।

चुनाव आयोग ने 12 फरवरी को दिल्ली में नयी विधानसभा के गठन की अधिसूचना जारी कर दी है। इस तरह चुनाव सम्पन्न हो जाने की वजह से अब चुनाव आयोग का निष्प्रभावी हो जाना स्वाभाविक है। हालाँकि, चुनाव के दौरान जब वो बेहद शक्तिशाली था, तब भी वो बीजेपी के उन बड़बोले नेताओं को माकूल सज़ा कहाँ दे पाया, जिन्होंने अपने राष्ट्रवादी शौर्य को प्रदर्शित करते हुए अरविन्द केजरीवाल को आतंकवादी होने का ख़िताब दिया था। चुनाव आयोग ने यदि उस वक़्त समुचित सख़्ती दिखायी होती तो क्या बीजेपी के पुनर्निर्वाचित विधायक ओम प्रकाश शर्मा की इतनी ज़ुर्रत होती कि वो केजरीवाल को फिर से आतंकवादी होने का बयान दे देते?

ओम प्रकाश शर्मा ने तो बदज़ुबानी की हद्दों को भी तोड़ डाला। चुनाव ख़त्म होने के बाद भी उन्होंने बयान दिया कि ‘अरविन्द केजरीवाल एक भ्रष्ट आदमी है। आतंकवादियों के साथ उनकी सहानुभूति है। वह पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता की भूमिका निभाते हैं। टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन करते हैं और भारतीय सेना पर सवाल उठाते हैं। आतंकवादी शब्द उनके लिए सबसे उपयुक्त है।’ शर्मा यहीं नहीं रुके। उन्होंने आगे कहा कि ‘केजरीवाल ने एक बार फिर दिल्ली की जनता की आँखों में धूल झोंकी है। ये शातिर ठग है। इनकी पोल जरा देर से खुलेगी। केजरीवाल टुकड़े-टुकड़े गैंग के साथी हैं। वह आतंकी हैं और रहेंगे। अगर आतंकवाद से भी घिनौना कोई शब्द है तो वैसा काम केजरीवाल ने किया है। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के साथ खड़े होने वाले, पाकिस्तान की सेना के प्रवक्ता का काम करने वाले को हम आतंकवादी ना कहें तो क्या कहें?’

जवाब में आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह भी बीजेपी के नेताओं ख़ासकर अमित शाह को ललकार चुके हैं कि यदि केजरीवाल आतंकवादी हैं तो सरकार उन्हें गिरफ़्तार क्यों नहीं करती, उन्हें जेल में क्यों नहीं डालती, उनके ख़िलाफ़ मुकदमा क्यों नहीं चलाती? ख़ुद केजरीवाल भी ऐसे बयानों का प्रतिकार कर चुके हैं। लेकिन नतीज़ा, वही ढाक के तीन पात। चुनाव प्रचार के दौरान चुनाव आयोग ने अनुराग ठाकुर, परवेश वर्मा और कपिल मिश्रा को उनके जीभ के लपलपाने की सज़ा तो दी लेकिन वो इतनी नाकाफ़ी थी कि उससे बीजेपी वालों ने कोई सबक नहीं लिया।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी कह चुके हैं कि ऐसे नेताओं के ख़िलाफ़ पुलिस में भी एफआईआर दर्ज़ करवानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। शायद इसीलिए ओम प्रकाश शर्मा और शेर हो गये। तभी तो उन्होंने आतंकवादी के अलावा केजरीवाल को भ्रष्ट, पाकिस्तानी सेना का प्रवक्ता और टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थक भी बता दिया। वैसे मौजूदा संसद सत्र में ही गृह मंत्रालय ने ख़ुलासा किया कि उसके पास किसी भी ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ से सम्बन्धित कोई ब्यौरा नहीं है।

नेताओं की लपलपाती ज़ुबान के बहकने के असंख्य अफ़सानों में से ये तो महज एक और किस्सा है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि अपने राजनीतिक विरोधियों के ऐसे बिगड़े बोलों का बार-बार दोहराया जाना भी सबसे ज़्यादा उस भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की ओर से हो रहा है जो अपने नेता को मौत का सौदागर, चाय-वाला, क़ातिल, हत्यारा, चौकीदार चोर है और साइकोपैथ वग़ैरह बताये जाने से तो बेहद मर्माहत होती है, लेकिन केजरीवाल को आतंकवादी और राहुल गाँधी को शहजादा कहने में उसे गुरेज़ नहीं होता? ऐसे में क्या ये मान लिया जाए कि सियासत जमात में ‘जाके पैर न फटे बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई’ वाला मुहावरा लागू नहीं होता? यहाँ शीशे के घरों में रहने वालों को भी दूसरों के घरों पर पत्थर फेंकने का शौक़ क्यों होता है? क्या यहाँ का दस्तूर ‘आँख के बदले आँख’ और इस ‘हम्माम में सारे नंगे’ वाला ही बना रहेगा?

वैसे ख़ुद केजरीवाल भी अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करते रहे हैं। यहाँ तक कि नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी जैसे तमाम बड़े नेताओं का ज़ुबान भी कई बार अपने विरोधियों के अमर्यादित विशेषणों का इस्तेमाल करती रही है। इनके बयानों को लेकर ख़ूब छीछालेदर भी होती रही है। अदालतों में मानहानि के मुक़दमे भी दर्ज़ हुए हैं। सज़ाएँ भी हुई हैं। ख़ेद जताने और क्षमादान की भी मिसालें भी हैं। लेकिन लपलपाती ज़ुबान की महामारी ऐसा विकराल रूप धारण कर चुकी है कि काबू में आने का नाम ही नहीं लेती। बयान-वीरों ने ख़ुद को सभी शिष्टाचार और मर्यादाओं से ऊपर मान लिया है।

यही वजह है कि नेताओं की देखादेखी हमारी पुलिस भी दिनों-दिन और बर्बर होती जा रही है। अदालतें संवेदनहीन होती जा रही हैं। सड़कों पर लिंचिंक रूपी इंसाफ़ होने लगा है। कोई भी दिन-दहाड़े हाथों में पिस्तौल लहराने और गोली चलाने लगा है तो कोई जेएनयू में नक़ाबपोश बनकर और दिल्ली के गार्गी कॉलेज में घुसकर अपराध करता है तो कभी पुलिस ही जामिया में सारे नियम-क़ायदों की धज़्ज़ियाँ उड़ा रही होती है। जेलों में विचाराधीन क़ैदियों का अम्बार होता है और क़ानून ख़र्राटे भरता रहता है। धन्ना-सेठों के बड़े-बड़े घोटालों के बाद देश से भाग निकलने की मिसालें पैदा होती रहती हैं। ऐसे और भी बहुत सारे उदाहरण हो सकते हैं, जो चीख़-चीख़कर बताते हैं कि देश में नियम-क़ायदे और उन्हें लागू करने वाली संस्थाएँ बेमानी हो चुकी हैं।

समाज से ग़लत-सही के बीच के फ़र्क़ का मिटने जाना बेहद ख़तरनाक है। इससे उन अपराधों के भी बेधड़क होने का रास्ता खुलता जा रहा है, जो अभी यदा-कदा होते हैं। लिहाज़ा, सियासी जमात को भी ये खुशफ़हमी नहीं पालनी चाहिए कि वो समाज के बाक़ी तबकों में फैल रही ग़लतफ़हमी से हमेशा सुरक्षित ही रहेंगे। वो दिन दूर नहीं जब उनका भी सीधा वास्ता तरह-तरह के सिर-फिरों से ज़रूर पड़ेगा। इसीलिए अब भी वक़्त है कि हम पुराने अनुभवों से नसीहत लें, वर्ना गाँधी या इन्दिरा के हत्यारों वाली मानसिकता का बार-बार उभरना निश्चित है।

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हेमंत की ‘बदलाव यात्रा’ ने बदली झारखंड की सत्ता और सियासत

हेमंत सोरेन ने ‘बदलाव यात्रा’ की शुरुआत संथाल परगना के साहिबगंज से की थी और इसका समापन रांची में हुआ। इस यात्रा के दौरान उन्होंने पूरे झारखंड के सुदूर इलाकों का दौरान किया और लोगों की समस्याएं सुनीं और उसके समाधान का वादा किया।

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Jharkhand CM oath-taking ceremony

रांची। झारखंड की राजनीति में एक सौम्य और साधारण चेहरा माने जाने वाले हेमंत को भले ही राजनीति विरासत में मिली है, परंतु अपने पिता शिबू सोरेन की छांव से खुद को बाहर निकाल कर उन्होंने अपने संघर्ष के बल दोबारा राज्य की सत्ता हासिल की है।

हेमंत ने चुनाव पूर्व अपने सहयोगियों के साथ सीट बंटवारे में उदारता दिखाई और सहयोगियों को खुश रखा। उन्होंने अपनी टीम को लेकर संघर्ष किया और झामुमो को उस जगह पहुंचाया, जहां पहुंचना कठिन-सा लगने लगा था। विधानसभा चुनाव में झामुमो सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। उन्होंने सहयोगियों के साथ ऐसा समन्वय बनाया कि सभी ने एक-दूसरे को सहयोग किया और गठबंधन बहुमत के आंकड़े से काफी आगे निकल गया।

हेमंत ने राजनीति का ककहरा अपने पिता शिबू सोरेन से सीखा है और राजनीति में उनका आगमन बड़े भाई दुर्गा सोरेन के आकस्मिक निधन के बाद हुआ। लेकिन जब उन्होंने राजनीति में कदम रखा तो इस मजबूती के साथ कि आज वह दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बन पाए हैं। हमेशा जनता के बीच रहना उनकी राजनीति का अहम हिस्सा रहा है और उसी के परिणामस्वरूप वह आगे बढ़ते चले गए। पारिवारिक और सामाजिक व्यक्ति की पहचान के साथ 2019 के विधानसभा चुनाव में हेमंत ने नई रणनीति बनाई और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की रघुवर दास सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया।

हेमंत ने अपने आज के अभियान की शुरुआत सितंबर, 2018 से ही कर दी थी। लोकसभा चुनाव से पहले जो अभियान झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने शुरू किया था, उसे ‘संघर्ष यात्रा’ का नाम दिया था। इसके तहत वह राज्य के सभी 263 प्रखंडों में पहुंचे और वहां जाकर सभाएं की। उन्होंने कार्यकर्ताओं में जोश भरा और युवाओं को पार्टी से जोड़ा।

इस दौरान झारखंड के लिए शहीद हुए आदिवासियों को उन्होंने सम्मानित भी किया। इसी दौरान उन्होंने अपनी एक 12 सदस्यीय टीम बनाई, जिसने बड़े पैमाने पर डिजिटल प्रचार अभियान चलाया।

लातेहार से झामुमो के नवनिर्वाचित विधायक वैद्यनाथ राम कहते हैं, “हेमंत को प्रारंभ से ही सादगी पसंद है। वह वन-टू-वन लोगों से मिलते हैं और उनकी समस्याओं को सुनकर उनके समाधान की कोशिश करते हैं। इससे लोगों में विश्वास पैदा होता है।”

झामुमो के संगठन से जुड़े एक नेता का कहना हैं, “संघर्ष यात्रा की समाप्ति के बाद हेमंत ‘बदलाव यात्रा’ पर निकल गए और उन्होंने लोगों से सत्ता बदलने की अपील की। इस दौरान उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को एकजुट रखा। पार्टी में ‘वन मैन’ की रणनीति के तहत सोरेन ने जमकर मेहनत की और सहयोगी दलों के साथ जुड़ाव बनाए रखा।”

हेमंत सोरेन ने ‘बदलाव यात्रा’ की शुरुआत संथाल परगना के साहिबगंज से की थी और इसका समापन रांची में हुआ। इस यात्रा के दौरान उन्होंने पूरे झारखंड के सुदूर इलाकों का दौरान किया और लोगों की समस्याएं सुनीं और उसके समाधान का वादा किया। लोगों की समस्याओं, उनके समाधान के मुद्दों को उन्होंने घोषणा-पत्र में शामिल किया।

इसका परिणाम यह हुआ कि संथाल परगना के आदिवासी बहुल सीटों तक सीमित मानी जाने वाली पार्टी राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में पहुंच गई। झामुमो का जनाधार बढ़ा, और पहली बार लातेहार और गढ़वा विधानसभा में झामुमो के उम्मीदवारों की जीत हुई।

सोरेन ने अपने अभियान को आधुनिक बनाने के लिए एक प्रोफेशनल टीम को सोशल मीडिया के लिए उतारा। झामुमो के कार्यकर्ताओं को इसके लिए प्रशिक्षण दिलाया और सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया। दूसरी ओर, सुदूर क्षेत्रों में पहुंचने के लिए उन्होंने साइकिल को साधन बनाया, जिस पर सवार होकर कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव लोगों से मुलाकात की और झामुमो का संदेश पहुंचाया।

हेमंत की इस कुशल रणनीति का परिणाम रहा कि भाजपा का ‘अबकी बार 65 पार’ का नारा धरा का धरा रह गया और झामुमो, राजद और कांग्रेस गठबंधन बहुमत का आंकड़ा पार कर सत्ता पर काबिज हो गया।

अब हेमंत के सामने झारखंड के लोगों से किए वादे निभाने की चुनौती है। देखने वाली बात होगी कि हेमंत अपने वादों को निभाने को लेकर कितना खरा उतर पाते हैं।

BY: मनोज पाठक

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पुलिस और सेना, सिर्फ़ तब बर्बर नहीं होती जब ‘ऊपर’ से हुक़्म होता है!

IT Cell की बदौलत तरह-तरह के झूठ, अफ़वाह और विरोधियों के चरित्र-हनन का सहारा लेकर बीजेपी ने 2014 में सबको धूल चटा दी। तब तक उसका IT Cell अभेद्य दुर्ग की तरह अपराजेय बन चुका था। 2015 में आम आदमी पार्टी ने भी बीजेपी के आज़माये हुए इसी नुस्ख़े को और सफलता से अपनाया।

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Police and Students Jamia

नये नागरिकता क़ानून का उग्र विरोध असम से शुरू भले ही हुआ, लेकिन अब ये तक़रीबन देशव्यापी है। विरोध स्वरूप सड़कों पर उतरने वाले नागरिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सरकारी तंत्र की सारी अपीलें भी बेअसर साबित हैं। विरोध की आग के रोज़ाना किसी न किसी नये इलाके में फैलने की ख़बरें हैं। विरोधियों को कुचलने के लिए पुलिस की बर्बरता, सरकारी सम्पत्तियों की तबाही, तरह-तरह की अफ़वाहों का फ़ैलना, जनजीवन का अस्त-व्यस्त होना, मृतकों और घायलों की संख्या का बढ़ना, विपक्षी पार्टियों का आक्रोशित होना और सत्ता पक्ष की ओर से विरोधियों पर सियासी रोटियाँ सेंकने का आरोप लगाना — ये सभी बातें हमेशा होती रही हैं। हालाँकि, अब ज़माना बदल चुका है।

अब यदि आपको ये जानना है कि देश के किसी इलाके के हालात कैसे हैं तो इसका बेहद आसान ‘बैरोमीटर’ है कि यदि वहाँ मोबाइल और इंटरनेट बैन हुआ है या नहीं? यदि नहीं हुआ तो हालात काबू में हैं, यदि हुआ है तो स्थिति चिन्ताजनक और गम्भीर है। यदि लैंडलाइन का सम्पर्क भी ख़त्म है और लोगों की आवाजाही पर मनाही है या फिर कड़ा अंकुश है तो समझिए कि माहौल बेहद ख़तरनाक मुक़ाम पर है। पुलिस या सेना की बर्बरता अपने चरम पर है, मानवाधिकारों का वजूद ख़त्म है, प्रभावित इलाके के नागरिकों को बुनियादी सुविधाओं के लाले पड़े हैं।

Representative image: Police lathi charge Credit: YouTube screengrab

सरकारी तंत्र का हरेक बयान हमेशा लीपा-पोती भरा ही होता है। इसके रवैये में इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता कि सरकार किसकी है, सत्ता में कौन है? पुलिस या सेना को जब ‘ऊपर’ से हुक़्म मिलता है कि ‘विरोध को कुचल दो’ तो वो ‘हिंसा’ का इन्तज़ाम करती है। ऐसे तत्वों को विरोधियों के बीच घुसेड़ा जाता है जो हिंसा के हालात पैदा करें कि ‘पुलिस अपनी पे आ जाए’। पुलिस का अपनी पर आना ही बर्बरता है। वो विरोधियों को दंगाई, ज़िहादी, नक्सली, माओवादी जैसा बताएगी और उनका क़त्ल करके लाश को नदी या नहर में बहा देने से भी गुरेज़ नहीं करेगी। एनकाउन्टर तो उसके लिए चुटकियों का खेल है।

यदि ‘ऊपरी हुक़्म’ संयम दिखाने का है तो दर्ज़नों बसों-वाहनों-दुकानों और घरों के फूँके जाने के बावजूद किसी की भी मौत की ख़बर नहीं आएगी। इसीलिए कभी जहाँ महज धारा-144 वाली निषेधाज्ञा से ही बात बन जाती है, वहीं कभी कर्फ़्यू और सेना के फ़्लैग मार्च से भी बात नहीं बनती। अयोध्या विवाद का फ़ैसला आया तो निषेधाज्ञा से ही बात बन गयी। लेकिन 2016 के जाट आरक्षण आन्दोलन के वक़्त सेना का फ़्लैग मार्च भी हरियाणा की व्यापक तबाही को नहीं रोक सका। अभी 5 दिसम्बर 2019 को संसद के सामने ‘रेप और हत्या’ का विरोध कर रही इकलौती युवती पर बर्बरता दिखायी गयी। जबकि इसी संसद से फर्लांग भर दूर नार्थ ब्लॉग के सामने, 1996 में पत्रकारों को प्रदर्शन करने दिया गया।

केन्द्रीय गृह मंत्रालय यानी नार्थ ब्लॉक के सामने प्रदर्शन का वो इकलौता मौका था। तब सरकार या पुलिस ने बर्बरता नहीं दिखायी। उस अप्रत्याशित प्रदर्शन की अगुवाई अपने दौर के मशहूर सम्पादक सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने की थी और इसमें बीएसपी नेता कांशीराम के उस रवैये के ख़िलाफ़ विरोध जताया गया था, जिसमें उन्होंने रिपोर्टर आशुतोष को थप्पर मारा था। 2012 के निर्भया कांड के बाद विजय चौक और राजपथ जैसे अति-संवेदनशील और सुरक्षित इलाकों पर भी प्रदर्शन हुए, लेकिन पुलिस को बर्बरता दिखाने का हुक़्म नहीं था। अलबत्ता, ये वही दिल्ली पुलिस थी जिसने जून-2011 में रामदेव को सलवारी बाबा बनने के लिए मज़बूर कर दिया था।

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Demonstrators during a protest at Vijay Chowk, following the gangrape of a para-medical student in a moving bus, in New Delhi, December, 2012. (Sonu Mehta / HT File )

इसी पृष्ठभूमि में नागरिकों के लिए ये समझना बेहद ज़रूरी है कि आख़िर, मोबाइल या इंटरनेट बैन की नौबत क्यों आती है? दरअसल, बीजेपी या संघ परिवार का संचार-तंत्र हमेशा से बेजोड़ रहा है। कोई भी, कभी भी उनके आसपास तक नहीं फटक पाया। सोशल मीडिया और मोबाइल की मौजूदा पहुँच की बात तो छोड़िए, 1995 में देश में ‘टेली-डेन्सिटी’ भी बेहद मामूली सी थी, लेकिन तब 21 सितम्बर को गणेश चतुर्थी को ऐसी अफ़वाह फैली कि सारी दुनिया में गणेश जी प्रतिमाएँ दूध पीने लगी थीं। संचार-तंत्र की वो अद्भुत मिसाल थी। वहाँ से संघ-बीजेपी में जो आत्मविश्वास पनपा वो साल 2011-12 तक आते-आते अपने चरम पर जा पहुँचा। अब तक बीजेपी के IT Cell ने सारा मोर्चा सम्भाल लिया था।

WhatsApp University और सोशल मीडिया से कैसे-कैसे चमत्कार हो सकते हैं, इसे अमेरिका ने सारी दुनिया को उस वक़्त दिखाया, जब अनोखे प्रचार-तंत्र का फ़ायदा उठाकर जनवरी 2009 में बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बने। बीजेपी ने उस प्रयोग से न सिर्फ़ सबसे अच्छा सबक सीखा, बल्कि इसमें महारत भी हासिल की। अपने IT Cell की बदौलत तरह-तरह के झूठ, अफ़वाह और विरोधियों के चरित्र-हनन का सहारा लेकर बीजेपी ने 2014 में सबको धूल चटा दी। तब तक उसका IT Cell अभेद्य दुर्ग की तरह अपराजेय बन चुका था। 2015 में आम आदमी पार्टी ने भी बीजेपी के आज़माये हुए इसी नुस्ख़े को और सफलता से अपनाया।

Anna-Movement-Kiran-Bedi-Anna-Hazarey-Kejriwal-and-Sisodia
Anna Movement: Kiran Bedi, Anna Hazarey, Arvind Kejriwal and Manish Sisodia-
March 30, 2012

इसके बाद, राजनीति और राजकरण या गवरनेंस की रंगत ऐसी बदली कि इंटरनेट और मोबाइल बहुत बड़े हथियार बन गये। अब सत्ता में बैठे नेता और मंत्री अलग-अलग तरह की बातें फ़ैलाते हैं, तो अफ़सरों का हथकंडा कुछ और होता है। देखते ही देखते आईटी सेल का मुख्य काम भी ‘हिन्दू-मुस्लिम नैरिटव’ को हवा देना बन गया। इसी ने देश में ऐसी फ़िज़ा बनायी कि जो सरकार के साथ नहीं है, वो देशद्रोही है। अनुच्छेद-370 को ख़त्म करने के बाद कश्मीर में लोकतंत्र बर्ख़ास्त है। राज्य के बड़े-बड़े नेता अब भी जेलों में हैं। महीनों तक वहाँ इंटरनेट, मोबाइल और फ़ोन इसलिए ठप रहे क्योंकि सरकार नहीं चाहती है कि उसके नागरिक ही अपने नागरिकों के हाल-चाल की हक़ीक़त जानें। इसे दमन तो कहा जा सकता है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ऐसे दमनकारी हथकंडों का इस्तेमाल करने वाली बीजेपी कोई पहली और एकलौती पार्टी है। हमेशा से सत्ताधारी पार्टियों ने ऐसे ही तेवर अपनाये हैं। पुलिस और सेना हमेशा से बर्बर ही रही है। कोई अपवाद नहीं है।

अभी नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर बने हालात में सिर्फ़ इतना फ़र्क नज़र आया है कि बीजेपी का आईटी सेल और उसके तमाम छोटे-बड़े नेता और मंत्री तब तक साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए काम करते हैं, जब तक कि उन्हें सामने से भी माकूल जवाब ना मिलने लगे। हिंसा या विरोध प्रभावित इलाकों में जब ये जवाब ज़्यादा दमदार साबित होने लगते हैं तो क़ानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए विरोधियों के संचार-तंत्र को निष्क्रिय कर दिया जाता है। ऐसा कभी नहीं हुआ कि अफ़वाह फ़ैलाने की तिकड़मों को किसी एक पक्ष ने ही आज़माया हो। सरकारें और पुलिस भी ख़ूब झूठ फ़ैलाती रही हैं। अलबत्ता, हरेक मौक़े के लक्ष्य अलग-अलग ज़रूर होते हैं।

Jamia Milia Students CAB Protest 4
Jamia Milia Students Anti CAB Protest at Delhi Jamia Nagar Area.

मसलन, दिल्ली में गरमाये विरोध का ताना-बाना यहाँ के आगामी विधानसभा चुनाव से जुड़ा है। IT Cell की मंशा है कि जामिया और जेएनयू के छात्रों के विरोध को मुसलमानों के विरोध की तरह पेश किया जाए। ऐसा करने से यदि हिन्दुओं का ध्रुवीकरण हो गया तो शायद, बीजेपी की दिल्ली में लाज़ बच जाए, वर्ना ज़मीनी स्तर पर हवा उसके ख़िलाफ़ है। हाल का चुनावी सर्वे भी इसकी पुष्टि करता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि यही फ़ार्मूला देश के अन्य इलाकों में भी लागू हो। मिसाल के तौर पर, दिल्ली में जामिया और ओखला के इलाकों में तो इंटरनेट बैन होगा, लेकिन बंगाल और असम में ये किसी छोटे इलाके तक सीमित नहीं रहेगा। अलीगढ़ और हैदराबाद में अपेक्षाकृत बड़ा इलाका प्रभावित होता है तो लखनऊ का छोटा क्षेत्र।

हालाँकि, इसी नियम के तहत, कश्मीर के इंटरनेट बैन को सबसे व्यापक व्यापक बनाया जाता है। लेकिन 2016 और 2018 में पश्चिम बंगाल का माल्दा साम्प्रदायिक आग में सुलगता रहता है और वहाँ इंटरनेट पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगता, क्योंकि तब IT Cell जैसी सामग्री फैला रहा था, उससे बीजेपी को बंगाल के चुनाव में फ़ायदा मिलने की उम्मीद दिख रही थी। ज़ाहिर है, यदि माहौल बीजेपी या सरकार के ख़िलाफ़ होगा तो इंटरनेट का बैन होना तय है। अलबत्ता, ये भी सही है कि किसी भी विरोध के हिंसक होने से सत्तारूढ़ पार्टी को ही फ़ायदा होता है क्योंकि हिंसा से आन्दोलन की गरिमा गिरने लगती है, उसकी शुचिता भंग होती है। आन्दोलनकारियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती ख़ुद को हिंसा से दूर रखने और किसी के उकसावे में नहीं आने की होनी ही चाहिए। वर्ना, सारी मेहनत पर पानी फिरते देर नहीं लगती।

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