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नोटबंदी की दूसरी बरसी : जानें क्या रहा नफ़ा-नुकसान

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File Photo

दो साल पहले नोटबंदी को मोदी सरकार ने जहां कालेधन, नक्सलवाद, आतंकवाद, जाली नोट और भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार बताया था, वहीं विपक्षी दलों ने इसे सरकार का तुगलकी फरमान करार दिया। नोटबंदी का कांग्रेस ने जमकर विरोध किया। आइए जानते हैं कि सरकार के नोटबंदी के फैसले से देश को क्या नफ़ा-नुकसान हुआ…

नोटबंदी के दौरान हुई थी 115 लोगों की मौत

सरकार के इस फैसले से देश के जीडीपी भारी गिरवाट आई थी। कई छोटे-मोटे मैन्यूफैक्चरिंग के यूनिट बंद हो गए थे। कैश के लिए लाइन में लगने के कारण करीब 115 लोगों की मौत हो गई थी। धीरे धीरे रिजर्व बैंक ने 500 और 2000 के नए नोट को बाजार में उतारे। नए नोट एटीएम मशीन में फिट नहीं हो रहे थे इस कारण और भी लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ा था।

सरकार ने 50 दिनों में 74 बार बदले थे नियम

आरबीआई और केंद्र सरकार ने मिलकर नोटबंदी के पहले 50 दिनों में 74 बार नोटबंदी को लेकर नोटिफिकेशन जारी किए थे जबकि कई फैसले वापस लिए गए थे। नोटबंदी के बाद सरकार ने आदेश जारी किया था कि तीस दिसंबर तक पुराने नोट बदले जाएंगे। लोगों के बीच कैश की कमी न हो इसके लिए शुरुआत में सरकार ने आदेश जारी किया कि एक व्यक्ति एक कार्ड से 2000 रुपये ही निकाल सकते हैं।

जबकि चार हजार रुपये तक बदल सकते हैं। सरकार ने आदेश जारी कर पांच हजार या उससे ज्यादा के पुराने नोट जमा करने वालों के लिए पैन कार्ड अनिवार्य कर दिया था। लोगों ने सरकार के इस कदम की जमकर आलोचान की थी।

जब 99 प्रतिशत पुराने नोट आ गए वापस

विपक्ष जहां सरकार के इस फैसले पर सवाल खड़े कर रहा था, तो वहीं दूसरी तरफ सरकार अपने बचाव में इस फैसले को सही ठहरा रही थी। आरबीआई के 2017 -18 के वार्षिक रिपोर्ट में जिक्र किया गया है कि करीब 99 प्रतिशत पुराने नोट वापस आ गए हैं। आरबीआई ने बताया कि 15.31 लाख करोड़ रुपये जो कि पांच सौ (पुराने) और एक हजार के नोट थे जो कि वापस बैंकिंग सिस्टम में आ गया है।

जबकि मार्केट में 15.417 लाख करोड़ रुपये का नोट चलन में था। हालांकि, नोटबंदी के वक्त अलग-अलग रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि करीब तीन से पांच लाख करोड़ रुपये बैंकिंग सिस्टम में वापस नहीं लौटेंगे और इस तरह सरकार को भारी मुनाफा होगा।

नोटबंदी को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरा

आरबीआई की इस रिपोर्ट के बाद विपक्षी दल सरकार पर हमलावर हो गए थे। कांग्रेस समेत तमाम दलों ने सरकार के उस दावे पर सवाल उठाया था जिसमें कहा गया था कि इस कदम से कालेधन पर अंकुश लगेगा। वहीं कई दलों ने यहा भी सवाल पूछा था कि नोटबंदी के दौरान कहा गया था कि इससे नक्सलियों के कमर टूटेंगे और जम्मू कश्मीर में पत्थरबाजी में कमी आएगी उस दावे का क्या हुआ था।

सरकार के दावों की खुली थी पोल

आरबीआई की रिपोर्ट के मुतालबिक इसका मतलब यह है कि मात्र 10,720 करोड़ रुपये चलन से बाहर हुए।

सरकार के फैसले का जेटली ने किया था बचाव

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सरकार के इस फैसले का बचाव किया है और कहा है कि सरकार की ओर से उठाया गया यह कदम सफल रहा। जेटली ने कहा कि सरकार के इस कदम के बाद ज्यादा लोगों ने टैक्स भरना शुरू कर दिया है। उन्होंने कहा, ”नोटबंदी के पहले दो साल में लोगों ने 6.6 और 9 प्रतिशत लोगों ने अपना इनकम टैक्स भरा था। जबकि नोटबंदी के बाद दो साल में 15 और 18 प्रतिशत लोगों ने अपना टैक्स जमा किया और तीसरे साल भी ऐसे ही बढ़ने की उम्मीद है।

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नोटबंदी और राफेल डील पर ऑडिट रिपोर्ट नहीं देने का CAG पर आरोप!

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फाइल फोटो

कैग को पत्र लिखकर साठ सेवानिवृत्त अधिकारियों ने उसपर नोटबंदी और राफेल डील पर ऑडिट रिपोर्ट को जानबूझकर टालने का आरोप लगाया है।

हिंदी न्यूज वेबसाइट जनसत्ता की खबर के मुताबिक, पूर्व अधिकारियों ने पत्र में कहा है कि नोटबंदी और राफेल लड़ाकू विमान सौदे पर ऑडिट रिपोर्ट लाने में अस्वाभाविक और अकारण देरी पर चिंता पैदा हो रही है और रिपोर्ट संसद के शीत सत्र में पटल पर रखी जानी चाहिए। पत्र में कहा है कि समय पर नोटबंदी और राफेल सौदे को लेकर ऑडिट रिपोर्ट जारी करने में देरी को पक्षपातपूर्ण कदम कहा जाएगा और इससे संस्थान की साख पर संकट पैदा हो सकता है। नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) से फिलहाल कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई है।

नोटबंदी पर मीडिया की खबरों का संदर्भ देते हुए पूर्व नौकरशाहों ने कहा है कि तत्कालीन नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक शशि कांत शर्मा ने कहा था कि ऑडिट में नोटों की छपाई पर खर्च, रिजर्व बैंक के लाभांश भुगतान तथा बैंकिंग लेन-देन के आंकड़ों को शामिल किया जाएगा। पत्र में कहा गया है, इस तरह की ऑडिट रिपोर्ट पर पिछला बयान 20 महीने पहले आया था लेकिन नोटबंदी पर वादे के मुताबिक ऑडिट रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

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व्यापमं केस का आरोपी गिरफ्तार

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व्यापमं केस के आरोपी राकेश नरगावे को सीबीआई ने मध्य प्रदेश के बरवानी जिले से गिरफ्तार किया।

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कठुआ गैंगरेप: पीड़ित परिवार ने वकील दीपिका सिंह को हटाया

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जम्मू-कश्मीर के कठुआ में गैंगरेप की शिकार आठ साल की बच्ची के परिवार ने वकील दीपिका सिंह राजावत को केस से हटा दिया है। पीड़िता के पिता ने पठानकोट की कोर्ट में दिए आवेदन में कहा कि राजावत इस केस में रुचि नहीं ले रही हैं। इस केस की अब तक हुई 110 सुनवाई में से वे महज दो बार ही पेश हुई हैं। इस कारण वह उनसे अपना केस वापस लेना चाहते हैं। कोर्ट ने उनका आवेदन स्वीकर किया है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, दीपिका सिंह राजावत ने इस मामले में दुख प्रकट करते हुए अपनी समस्याओं के बारे में बताया। उन्होंने इस मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट में पेश नहीं होने के सवाल पर कहा कि उनकी जगह से पठानकोट करीब ढाई सौ किलोमीटर दूर है, ऐसे में उनके लिए हर हियरिंग पर कोर्ट जाना मुश्किल होता था। हालांकि इसके साथ ही उन्होंने कहा कि पीड़ित परिवार ने कभी उनसे संपर्क नहीं किया और अब यह खबर सुनकर उन्हें दुख पहुंचा।

गौरतलब है कि जम्मू जिले के कठुआ में जनवरी 2018 में आठ साल की एक बच्ची से रेप कर उसको मौत के घाट उतार दिया था।

पुलिस की चार्जशीट में कहा गया था कि जम्मू के हिंदू बहुल इलाके से मुस्लिम चरवाहों को भगाने के लिए इस बच्ची से गैंगरेप और फिर बेहद नृशंस ढंग से हत्या की गई थी।

इस मामले में राजावत ने परिवार की तरफ से पीड़िता का केस लड़ने के लिए पहल की थी। इसे लेकर तब उनकी खूब चर्चा भी हुई थी। शुरुआत में यह केस जम्मू कोर्ट में चल रहा था, हालांकि स्थानीय लोगों के गुस्से और उनके दखल की आशंका को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले को पठानकोट ट्रांसफर करने का आदेश दिया था।

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