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गौ रक्षकों का मोदी की बात न सुनना चिंताजनक : हामिद अंसारी

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Hamid Ansari

नई दिल्ली, 15 जुलाई | पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का कहना है कि देश में ‘अतिसतर्कता’ उफान पर है और यदि गौ रक्षक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात भी नहीं सुनते हैं तो यह चिंता का विषय है।

अंसारी ने अपनी नई किताब ‘डेयर आई क्वेस्चन’ के विमोचन से पहले आईएएनएस से विशेष बातचीत में कहा, “मोदी एक मजबूत नेता हैं। वह अपनी पार्टी के निर्विवाद नेता हैं। अगर उनकी बात नहीं सुनी जा रही है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। यह कहने की कोई जरूरत नहीं कि उनकी पार्टी के ही लोग उनकी बात नहीं मान रहे हैं। यह निष्कर्ष मैं नहीं निकाल रहा हूं।”

यह पुस्तक विभिन्न अवसरों पर अलग-अलग विषयों पर अंसारी द्वारा दिए गए भाषणों का संकलन है। उन्होंने कहा, “मैंने पुस्तक में विभिन्न मुद्दों पर प्रकाश डाला है, जैसे भारतीय होना क्या है, भारतीय राष्ट्रवाद क्या है या हम खुद को बहुलवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक क्यों कहते हैं।”

अंसारी ने जोर देकर कहा कि समाज में अहिष्णुता बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद ही सांप्रदायिक विभाजन उभरा, बल्कि यह काफी लंबे समय से है।

उन्होंने कहा, “असहिष्णुता लंबे समय से हमारे समाज में रही है। लेकिन मुझे लगता है कि जब पानी का स्तर बढ़ता है, तो आप प्रारंभ में उसपर गौर नहीं करते हैं और यह बढ़ता जाता है। उसके बाद आपकी नजर उसपर पड़ती हैं, और आज यही हो रहा है।”

उन्होंने आईएएनएस से कहा, “हां, अतिसतर्कता (विजिलैंटिज्म) उफान पर है। इस बारे में राष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लिखा गया है। अंतर्राष्ट्रीय समाचार पत्रों ने कहा है कि इसमें वृद्धि हुई है। मैं कोई सटीक तारीख (कि पहली बार इसपर कब गौर किया गया था) .. विभिन्न अवसर, विभिन्न स्थान नहीं बता सकता । यह कई वर्षो से चल रहा है।”

कुछ राज्यों में गाय की तस्करी के संदेह में या गोमांस खाने के नाम पर अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित लोगों पर गैर कानूनी ढंग से हमले करने और उन्हें पीट-पीट कर मार डालने जैसी कई घटनाएं घटित हुई हैं।

क्या मोदी के सत्ता में आने के बाद इस तरह की घटनाएं बढ़ी हैं?

अंसारी ने कहा, “नहीं, नहीं। विफलता की दोषी हर सरकार रही है। हर बार कहीं न कहीं कोई सांप्रदायिक दंगा हुआ है, यह असहिष्णुता की अभिव्यक्ति है और दूसरा प्रशासन की विफलता है।”

अंसारी ने कहा, “आप देखिए कि दो लोगों के बीच हमेशा असहमति हो सकती है। सड़क पर दो साइकिलें आपस में टकराती हैं और वहां गाली-गलौच शुरू हो जाता है। लेकिन एक छोटी असहमति सांप्रदायिक दंगे का रूप ले ले, इसके लिए सोच और साजिश रचनी पड़ती है। और जहां भी इस तरह की साजिश होती है, समझिए कि वहां कानून-व्यवस्था विफल हुई है।”

तो क्या वह विलिलैंटिज्म में वृद्धि के लिए खासतौर से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली राज्य सरकारों की ओर इशारा कर रहे हैं? पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, “देखिए, जहां भी ऐसा है, मैं वहां की सरकार की तरफ इशारा कर रहा हूं। चाहे यह असम, केरल में हो या पंजाब में। यह कोई मायने नहीं रखता। मैं राजनीतिक दलों को निशाना नहीं बना रहा, मैं प्रशासन को निशाना बना रहा हूं।”

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के एक कार्यक्रम में दो मई को अंसारी वहां मौजूद थे, और उस दौरान वहां हिंदूवादी गुंडे घुस गए थे। तो क्या उस घटना में स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत थी? अंसारी ने कहा कि वह इस तरह का निष्कर्ष निकालने से बचना चाहेंगे, लेकिन उन्होंने यह जरूर स्पष्ट किया कि जिन्ना का चित्र तो वहां व्यवधान पैदा करने का बहाना भर था।

उन्होंने कहा, “मैं उस तरह का निष्कर्ष नहीं निकालना चाहता। लेकिन मैं इतना जानता हूं कि मुझे वहां आमंत्रित किया गया था, और वहां व्यवधान पैदा किया गया। कार्यक्रम नहीं हो सका था। जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अगले दिन स्वीकार किया था कि बंदोबस्त विफल रहा और वह इसकी जांच करने जा रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “मैं यह निष्कर्ष नहीं निकाल रहा हूं कि उपद्रवियों के साथ स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत थी। लेकिन मैं इसे शुद्ध रूप से प्रशासनिक विफलता मानता हूं। अब यह विफलता क्यों हुई, जांच से यह पता किया जाए।”

अंसारी ने कहा, “लेकिन हां, जिन्ना का चित्र मात्र बहाना था। यह लंबे समय से वहां है। जिस सज्जन ने चित्र पर आपत्ति खड़ा की, वह तीन साल तक एएमयू कोर्ट के सदस्य थे। आपने इसके बारे में क्या किया?”

एएमयू और जामिया मिलिया इस्लामिया का अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त करने की दक्षिणपंथी नेताओं की मांग पर अंसारी ने कहा कि चूंकि सर्वोच्च न्यायालय में मामले की सुनवाई चल रही है, इसलिए उन्हें और अन्य किसी को भी इस पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।

अगला लोकसभा चुनाव निकट है, लिहाजा वर्तमान सरकार की उपलब्धियों और विफलताओं को जांचना-परखना जरूरी लगता है। प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान को लेकर एक कठोर नीति न अपनाने के लिए पूर्व की मनमोहन सिंह सरकार पर हमला बोलेते रहे हैं, तो क्या मौजूदा सरकार ने अपने चार साल के कार्यकाल के दौरान पाकिस्तान पर कोई ठोस, प्रभावी नीति बना पाई है?

पेशेवर राजनयिक रह चुके अंसारी ने कहा, “जहां तक मेरी समझ है पाकिस्तान को लेकर हमारी नीति ढुलमुल हैं। हम पेंडुलम की तरह एक बार इस तरफ जाते हैं फिर दूसरी तरफ चले जाते हैं। अगर यह नीति है, तो मान लीजिए कि हमारे पास एक नीति है। आप इसके बारे में क्या कर सकते हैं?”

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय अपनाई गई भारत की गुटनिरपेक्षता की पारंपरिक नीति बिल्कुल सही थी और इस नीति से दुनिया में देश को इज्जत भी मिली थी, लेकिन हाल के वर्षो में पड़ोसियों को लेकर भारत की नीति बुरी हालत में है।

उन्होंने कहा, “इस समय पड़ोसी देशों को लेकर हमारी नीति तनाव में नजर आती है। जो लोग इसके जानकार हैं, उन्होंने इस बारे में लिखा भी है।”

चीन के बढ़ते रसूख से निपटने के लिए क्या भारत पर्याप्त कोशिश कर रहा है?

अंसारी ने कहा, “यहां आईं सभी सरकारें इस बारे में बहुत सचेत रही हैं। चीन एक बड़ा पड़ोसी है। और चीन के साथ हमारे संबंध हैं, विभिन्न तरह के संबंध – राजनीतिक, सांस्कृतिक और यहां तक कि सैन्य संबंध भी। दोनों देश इस बात को समझते हैं कि हमारे बीच समस्याएं भी हैं, और हमारे बीच सकारात्मक संबंध भी हैं।”

–आईएएनएस

ओपिनियन

समाज में बदलाव के लिए अपने घर में झांकने की जरूरत : निकिता आनंद

साल 2003 की मिस इंडिया का कहना है कि महिलाओं के साथ हो रहे उत्पीड़न पर लगाम लगाने व समाज में सुधार और बदलाव लाने के लिए घर से शुरुआत करनी चाहिए और बाहर के बजाय सबसे पहले घर में झांककर देखना चाहिए कि घर में क्या हो रहा है।

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नई दिल्ली, 7 दिसंबर | साल 2003 की मिस इंडिया टाइटल विजेता व अभिनेत्री निकिता आनंद का मानना है कि समाज में कोई भी सुधार लाने के लिए हमें सबसे पहले अपने घर में झांककर देखना चाहिए और घर से सुधार व बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए।

निकिता हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी में ‘इंटरनेशनल वीमेन पॉलिटेक्निक’ द्वारा आयोजित ‘मिराकी 2018’ कार्यक्रम का हिस्सा बनीं, जहां उन्होंने आईएएनएस से बात की।

निकिता से जब पूछा गया कि मॉडलिंग में उनका कैसे आना हुआ तो उन्होंने आईएएनएस को बताया, “मैं आर्मी बैकग्राउंड से हूं मेरे पिता डॉक्टर हैं। 10वीं के बाद या 12 वीं के आसपास मेरी मॉडलिंग शुरू हो गई थी और मैंने काफी लोकल पेजेन्ट्स भी जीते हैं और साथ ही साथ प्रोफेशनल रैंप वॉक भी शुरू कर दिया था और मैं एनआईएफटी की स्टूडेंट थीं तो फैशन डिजाइनिंग भी हो रही थी और फैशन रैंप वॉक भी हो रहा था। मुझे मिस इंडिया के लिए पार्टिसिपेट करने का ख्याल आया और थोड़ा सोचने के बाद हिस्सा ले लिया और फिर मैंने मिस इंडिया का टाइटल जीत लिया।”

टीएलसी के शो ‘ओ माई गोल्ड’ की मेजबानी कर चुकीं निकिता को वास्तविक जीवन में गोल्ड के बजाय प्लेटिनम ज्यूलरी ज्यादा पसंद है। शो के बारे में उन्होंने कहा, “इस शो के लएि हमने पूरे देशभर में ट्रैवल किया जो दिलचस्प था। इसमें हमने गोल्ड के बारे में बात की थी, क्योंकि भारत में पारंपरिक आभूषण के तौर पर ज्यादातर पीले सोने का इस्तेमाल होता है। शो करके मुझे मुझे दक्षिण भारतीय और बंगाली ज्यूलरी के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला, लेकिन मुझे निजी तौर पर गोल्ड के बजाय प्लेटिनम और डायमंड ज्यूलरी ज्यादा पसंद है। मैं इनेक आभूषण ज्यादातर पहनती हूं।”

साल 2003 की मिस इंडिया का कहना है कि महिलाओं के साथ हो रहे उत्पीड़न पर लगाम लगाने व समाज में सुधार और बदलाव लाने के लिए घर से शुरुआत करनी चाहिए और बाहर के बजाय सबसे पहले घर में झांककर देखना चाहिए कि घर में क्या हो रहा है।

उन्होंने कहा, “महिलाओं के साथ उत्पीड़न की बहुत सारी घटनाएं होती हैं। भारत में हर रोज हर क्षण कहीं न कहीं नाइंसाफी होती है। ऐसे लाखों केस होते होंगे जो कि रिपोर्ट नहीं होते हैं। किसी भी क्षेत्र में किसी भी किस्म के इंसान में बदलाव लाने का काम हमेशा शिक्षा से ही होता है। अपने बच्चों को क्या सिखाते हैं यह मायने रखता है। लोगों की मानसिकता होती है कि पहले बाहर देखो, वहां क्या खराब हो रहा है। लेकिन अपने घर में नहीं झांककर देखते कि उनके घर में क्या हो रहा है।”

निकिता ने कहा कि बच्चा स्कूल से ज्यादा वक्त घर में बिताता है, तो घर में अच्छे संस्कार व माहौल देने की कोशिश करनी चाहिए, तभी वह अच्छा नागरिक बन सकेगा। समाज में सुधार और बदलाव लाने की कोशिश घर से की जानी चाहिए। इस तरह की घटनाओं पर लगाम लगाने और समाज में बदलाव लाने के मानसिकता में बदलाव लाना बेहद जरूरी है।

उनका मानना है कि ‘हैशटैगमीटू’ मूवमेंट को आगे बढ़ाया जाना चाहिए, जिससे और महिलाओं को भी आगे आकर अपनी दास्तां बयां करने का प्रोत्साहन मिले।

उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि इस मूवमेंट को आगे बढ़ाना चाहिए, आवाज तो हर किसी की है तो क्यों एक हिस्से को बोलने दिया जाए और एक हिस्से को दबाया जाए वो नहीं होना चाहिए। जब हम समानता की और सशक्तिकरण की बात करते हैं तो इसका मतलब यही है न कि सबको समान अधिकार मिले। अगर किसी और के आगे आने से और उसकी कहानी आगे आने से किसी और को प्रोत्साहन मिलता है तो ये एक अच्छी बात है। किसी भी महिला के लिए अपने हुए दर्दनाक वाकये को याद करना मुश्किल होता है। उसकी भावना को समझने की कोशिश करनी चाहिए।”

मॉडलिंग में आने की ख्वाहिश रखने वाली लड़कियों के लिए दिए संदेश में उन्होंने कहा, “सबसे पहले आपको तय करना चाहिए कि आपको कहां जाना है, क्योंकि यह आसान लाइन नहीं है, आपके पास जरूरी क्राइटेरिया होनी चाहिए जैसे रैंप वॉक के लिए एक परफेक्ट बॉडी स्ट्रक्चर और हाइट होनी चाहिए। अगर, आपको प्रिंट मॉडलिंग के लिए जाना है तो फिर आपके पास वैसा चेहरा-मोहरा, भाव-भंगिमा होनी चाहिए, जिसे कैमरा अच्छे से कैप्चर कर सकें। आप किसी भी फील्ड को बस इसलिए नहीं चुने कि वो आपको आकर्षित कर रहा है, बल्कि अच्छे से आकलन कर लें कि आप उसके लायक है या नहीं।”

निकिता ने ‘लाइफ में कभी-कभी’ और ‘फोर टू का वन’ जैसी फिल्मों में भी काम किया है। लेकिन अब वह फिल्में नहीं कर रही हैं। फिल्मों से दूरी बनाने के बारे में उन्होंने कहा, “मैंने फिल्मों में काम किया है, लेकिन मुझे टेलीविजन प्रेजेंट करना या फिर लाइव शो करना ज्यादा पसंद है। आजकल मैं गायन का भी प्रशिक्षण ले रही हूं आगे जाकर मैं गायन में भी परफार्मेस दूंगी। अगर मैं टीवी की बात करूं तो मैंने लाइफस्टाइल के अलावा स्पोर्ट्स शो भी बहुत किया है, क्रिकेट पर भी बहुत शो किया है। मुझे टीवी बहुत पसंद आता है, क्योंकि निजी जिंदगी में मैं बहुत आर्गनाइज हूं और यही चीज टीवी में भी है।”

–आईएएनएस

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ओपिनियन

सहित्य साधना सृजन की चीज : वीणा ठाकुर

कथाकार वीणा का कहना है कि पुरस्कार एक उपलब्धि होती है, इसे नकारा नहीं जा सकता, लेकिन साहित्य सृजन की चीज है, जिसका सही मूल्यांकन पाठक ही करते हैं।

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veena thakur maithili sahitya
Picture Cridit : Swatva Samachar

दरभंगा, 6 दिसंबर | सर्वोच्च साहित्यिक संस्था साहित्य अकादमी से मिथिला क्षेत्र की समृद्ध मैथिली भाषा ही बिहार को अमूमन हर साल पुरस्कार दिलाती रही है। इस बार इस पुरस्कार के लिए दरभंगा की रहने वाली कथाकार प्रो.वीणा ठाकुर को चुना गया है। वीणा का चयन उनके कथा-संग्रह ‘परिणीता’ के लिए किया गया है।

वीणा का कहना है कि साहित्य साधना की चीज है। किसी भी कृति का समय खुद मूल्यांकन करता है, इस कारण साहित्यकारों को हड़बड़ी में नहीं, बल्कि किसी भी रचना के लिए धैर्य रखने की जरूरत है।

बचपन से ही लिखने-पढ़ने की शौक रखने वाली वीणा अपने संस्मरणों को याद करते हुए बताती हैं, “जब मैं पांचवीं कक्षा में थी, तभी तुलसीदास की रामचरित मानस पढ़ ली थी। यही नहीं, छठे वर्ग की पढ़ाई के दौरान ही घर से पैसे चुराकर विमल मित्र के बांग्ला उपन्यास का हिंदी अनुवाद ‘खरीदी कौड़ियों का मोल’ खरीदकर लाई थी और उसे मैंने पढ़ा था। पैसे चुराने को लेकर मुझे घर में डांट भी पड़ी थी।”

मधुबनी जिले के भवानीपुर की बेटी और दरभंगा के पंचोभ गांव की बहू वीणा ने अकादमी पुरस्कार की घोषणा के बाद आईएएनएस से खास बातचीत में कहा कि यह सम्मान मैथिली भाषा का है। इस पुरस्कार के बाद उनकी जिम्मेवारी और बढ़ गई है।

उन्होंने कहा कहा, “वैसे तो साहित्यकारों के लिए कई पुरस्कार हैं, लेकिन साहित्य अकादमी पुरस्कार साहित्यकारों के लिए सर्वोच्च पुरस्कार है। मुझ पर ईश्वर की असीम अनुकंपा है कि इस पुरस्कार के लिए मेरा नाम चयनित हुआ।”

कथा-संग्रह ‘परिणीता’ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इस कथा संग्रह में वैसे तो कई कहानियां हैं, मगर कथा ‘निरूत्तरित प्रश्न’ आज की जीवनशैली के काफी नजदीक है। उन्होंने कहा कि इसमें बुढ़ापे की अवस्था में पहुंचने और पुत्रों के रवैये को बताया गया है।

उपन्यास ‘भारती’, कथा-संग्रह ‘आलाप’, समीक्षा ‘मैथिली रामकाव्यक परंपरा’, ‘विद्यापतिक उत्स’, ‘इतिहास दर्पण’, ‘वाणिनी’, ‘मैथिली गीत साहित्यक विकास आ परंपरा’ तथा अनुवाद की पुस्तक ‘हाट-बाजार’ और ‘भारतीय कविता संचयन : हिंदी’ की रचनाकार वीणा का कहना है कि आज के युवा साहित्यकार किसी भी काम में हड़बड़ी में रहते हैं और तुरंत सभी कुछ पा लेना चाहते हैं।

उनका मानना है साहित्य हड़बड़ी नहीं, धैर्य की चीज है, जिसमें आपकी कृति या रचना को पाठक अवलोकन और मूल्यांकन करते हैं।

कथाकार वीणा का कहना है कि पुरस्कार एक उपलब्धि होती है, इसे नकारा नहीं जा सकता, लेकिन साहित्य सृजन की चीज है, जिसका सही मूल्यांकन पाठक ही करते हैं।

मधुबनी जिले के भवानीपुर गांव में प्रो. मोहन ठाकुर के घर 19 मार्च, 1954 को जन्म लेने वाली और दरभंगा के पंचोभ गोव में पशु चिकित्सा पदाधिकारी डॉ़ दिलीप झा की पत्नी वीणा ठाकुर बिरला फाउंडेशन के प्रतिष्ठित सम्मान के लिए गठित मैथिली भाषा समिति की संयोजिका हैं।

ललित नारायण विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर मैथिली विभाग की पूर्व अध्यक्ष वीणा की प्रारंभिक शिक्षा सहरसा में हुई और उच्च शिक्षा भागलपुर विश्वविद्यालय में हुई।

मैथिली भाषा के विषय में पूछे जाने पर प्रोफेसर वीणा कहती हैं, “मैंने तो मैथिली भाषा मां की गोद में सीखी। मैं इस भाषा की कृतज्ञ हूं। मेरे लिए यह भाषा नहीं, मेरा साहित्य सफर है। यही कारण है कि मेरी कहानियों में परंपरा, साहित्य, संस्कृति के साथ आधुनिकता से मैथिली के जुड़ने की भी कहानी रहती है।”


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आज के भारतीय सिनेमा में कंटेंट महत्वपूर्ण : मेघना गुलजार

“अब लोग कंटेंट के भूखे हैं..चीजें बदल गई हैं। पहले लोग अक्सर बड़े पर्दे पर बस अपने पसंदीदा सितारों को देखने के लिए थिएटर जाते थे, उन्हें कहानी से कोई मतलब नहीं होता था और अब वही लोग हैं जो कहानी के बारे में जानना चाहते हैं। वे फिल्म की समीक्षा पढ़ते हैं और उसके बाद किसी एक फिल्म को देखने के लिए थिएटर पर जाते हैं।”

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Filmmaker, Meghna Gulzar

फिल्मकार मेघना गुलजार का कहना है कि वह दिन चले गए जब फिल्में स्टार वैल्यू पर हिट हुआ करती थीं। अब भारतीय सिनेमा के दर्शक स्टार के साथ-साथ स्टोरी भी चाहते हैं। उनके मुताबिक, अच्छा कंटेंट आज के समय में फिल्मों की सफलता में एक बड़ी भूमिका निभा रहा है।

टाइम्स लिटफेस्ट दिल्ली 2018 में रविवार को ‘हिंदी सिनेमा के बदलते चलन’ सत्र में मेघना ने कहा, “भारतीय सिनेमा में पहले हीरो और हिरोइनों को ज्यादा तवज्जो दी जाती थी लेकिन अब चीजें पहले जैसी नहीं हैं। अब लोग अभिनेताओं के अलावा कंटेंट को भी महत्व दे रहे हैं..कंटेंट भारतीय सिनेमा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।”

पैनल का हिस्सा रहे गीतकार प्रसून जोशी ने भी इसपर सहमति जताई और कहा कि इस मामले में विकास हुआ है।

उन्होंने कहा, “अब लोग कंटेंट के भूखे हैं..चीजें बदल गई हैं। पहले लोग अक्सर बड़े पर्दे पर बस अपने पसंदीदा सितारों को देखने के लिए थिएटर जाते थे, उन्हें कहानी से कोई मतलब नहीं होता था और अब वही लोग हैं जो कहानी के बारे में जानना चाहते हैं। वे फिल्म की समीक्षा पढ़ते हैं और उसके बाद किसी एक फिल्म को देखने के लिए थिएटर पर जाते हैं।”

सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने कहा कि भारत में ‘जानकार (इन्फॉर्म्ड) सिनेमा’ का उदय हुआ है।

–आईएएनएस

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