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ज़रा हटके

नीतीश कुमार के मिथ का पर्दाफाश, 100 में से केवल 17 बिहारी मददाता करते है जद(यू) का समर्थन

बिहार में नीतीश कुमार की लोकप्रियता चुनावी संख्या में दिखाई नहीं देती है। सवाल यह है कि 2005 से अब तक, यानी 13 सालों से नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री कैसे रहे हैं?

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अक्सर अंग्रेजी अखबार और बड़े मीडिया घरानों की खबरें हमें बताती रहती थी कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्य के सबसे लोकप्रिय नेता इसलिए हैं कि उन्होंने राज्य के विकास और सुशासन की तरफ ध्यान दिया है।

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लेकिन क्या बिहार के वास्तविक मतदाताओं का भी यही मानना है? हमारे विश्लेषण के अनुसार, ऐसा नहीं है। चुनावी लोकप्रियता में, नीतीश कुमार की पार्टी केवल कांग्रेस के ऊपर है। वर्ष 2004 के बाद से छह चुनावों के परिणामों पर हमारे विश्लेषण के अनुसार  भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राज्य की सबसे लोकप्रिय पार्टी रही है और 100 में से 17 से ज्यादा मतदाताओं ने नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) या जद (यू) को वोट देने का फैसला नहीं किया है।

पिछले दशक में बिहार के मतदाताओं ने छह चुनावों में मतदान किया है- 2004 लोकसभा, 2005 विधानसभा, 2009 लोकसभा, 2010 विधानसभा, 2014 लोकसभा और 2015 विधानसभा। इस अवधि में, हर 100 बिहारी मतदाताओं में से लगभग 37 ने भाजपा को वोट दिया है, 30 मतदाताओं ने लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के लिए वोट दिया है, 17 से अधिक ने जद (यू) के लिए वोट नहीं दिया है और केवल 10 ने राष्ट्रीय कांग्रेस को वोट दिया है।

दूसरे शब्दों में, बिहार में नीतीश कुमार की लोकप्रियता चुनावी संख्या में दिखाई नहीं देती है। सवाल यह है कि 2005 से अब तक, यानी 13 सालों से नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री कैसे रहे हैं? इसका जवाब नीतीश कुमार के चुनावी गठबंधनों की पैंतरेबाजी और ‘फर्स्ट-पास्ट-द – पोस्ट सिस्टम’ में है।

वर्ष 2004 के बाद से बिहार में छह चुनावों के दौरान, चार मुख्य पार्टी, जद (यू), भाजपा,  आरजेडी और कांग्रेस के बीच चुनाव गठबंधन सहयोगी हमेशा बदलते रहे हैं। इसलिए इनमें से प्रत्येक दलों के लिए मतदाता समर्थन को सही ढंग से प्रस्तुत करना मुश्किल है।

लेकिन इन छह चुनावों में कम से कम एक उदाहरण ऐसा सामने आया है, जब इनमें से सभी पार्टियों ने अकेले चलने का निर्णय लिया और इससे हमें पार्टी और इसके नेता के लिए साफ समर्थन करने का एक रास्ता मिल जाता है। वर्ष 2009 और 2010 में  आरजेडी और कांग्रेस ने अपने दम पर चुनाव लड़ा था। 2014 में जद (यू) और भाजपा ने अकेले चुनाव लड़ा, जबकि 2015 में  भाजपा चुनावी मैदान में अकेले उतरी थी। नीचे छह चुनावों का चुनावी नक्शा दिया गया है।

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किसी भी गठबंधन से भाजपा को क्यों है सबसे कम लाभ

बिहार में भाजपा सबसे लोकप्रिय और जनाधार वाली पार्टी है। जैसा कि हमने बताया बिना किसी गठबंधन के हर 100 मतदाताओं में से 37 मतदाताओं ने भाजपा को ही वोट दिया है। बिहार में भाजपा का समर्थन सबसे स्थिर (37-39 फीसदी) रहा है और किसी भी गठबंधन से इसे सबसे कम लाभ मिलने की संभावना है।

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बिहार में भाजपा की लोकप्रियता से नरेंद्र मोदी के लिए 2014 के आम चुनाव में जीत की पहले ही भविष्यवाणी हो चुकी थी। जनाधार के आधार पर, 100 में से 30 मतदाताओं के साथ लालू यादव की राजद दूसरी सबसे लोकप्रिय पार्टी है।

धारणा के विपरीत, इन तीनों में नीतीश कुमार सबसे कम लोकप्रिय हैं। जैसा कि हमने पहले बताया, बिहार के 100 मतदाताओं में से केवल 17 ने नीतीश कुमार की पार्टी को वोट दिया है। नीचे दिए गए चार्ट में, चार चुनावों में पार्टी के वोट शेयर दिखाया गया है और हाईलाइट किए गए वोट शेयर उनकी सबसे कम वोट शेयर है, जब उन्होंने अपने दम पर चुनाव लड़ा है।

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इसके अलावा, बिहार में 55 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां 2009 और 2015 के बीच हुए प्रत्येक चार चुनाव में जद (यू) के उम्मीदवार रहे हैं। इन 55 विधानसभा क्षेत्रों में जद (यू) के अकेले चुनाव लड़ने पर केवल 22 फीसदी मतदाताओं ने इसे चुना है। लेकिन जब इसने भाजपा या आरजेडी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, तब 43 फीसदी ने जद (यू) को चुना है।

दूसरे शब्दों में, बिहार के मतदाताओं ने बड़ी संख्या में जद (यू) को तभी वोट दिया है, जब यह पार्टी किसी के साथ गठबंधन में रहा है। इसके विपरीत, हमने चार चुनावों में आरजेडी उम्मीदवार के साथ 58 निर्वाचन क्षेत्रों का उल्लेख किया था। 33 फीसदी मतदाताओं ने राजद को तब चुना, जब पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ा और किसी अन्य पार्टी के साथ गठबंधन करने पर 45 फीसदी वोट हासिल किए । जद (यू) की तुलना में आरजेडी के पास अपना खुद का मजबूत जनाधार है।

अधिक आश्चर्यजनक यह है कि नीतीश कुमार मुख्यतः लालू यादव के आरजेडी के कारण मुख्यमंत्री हैं। वर्ष 2015 के चुनावों में जब नीतीश कुमार, लालू यादव और कांग्रेस ने हाथ मिला लिया था, तो लालू यादव के समर्थकों ने इस गठबंधन को जीत दिला दी। वर्ष 2015 के चुनाव में गठबंधन सहयोगी के रूप में आरजेडी और जद (यू) ने प्रत्येक ने 101 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इनमें से आधे से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में जद (यू) अपने सभी पारंपरिक वोटों को इस गठबंधन को दिला नहीं पाई, जबकि आरजेडी वर्ष 2014 में लगभग तीन-चौथाई निर्वाचन क्षेत्रों में अपने सभी मतों को इस गठबंधन को दिलाने में सफल हुआ।

इस अंतरण का सीधा लाभार्थी जद (यू) था, जिसने अपना वोट शेयर 2014 में 17 फीसदी से बढ़ाकर 2015 में 41 फीसदी किया था। आंकड़ों से स्पष्ट है कि आज नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री नहीं होते, अगर आरजेडी के मूल समर्थक वफादार नहीं होते और गठबंधन छोड़ दिया होता।

वर्ष 2014 में जब नीतीश कुमार को अकेले के दम पर चुनाव लड़ने छोड़ दिया गया था, तभी यह स्पष्ट हो गया था कि उनके समर्थन का आधार उतना बड़ा नहीं था, और समर्थक उतने वफादार नहीं थे, जैसा माना जाता था। आज भी नीतीश कुमार को भाजपा या आरजेडी की ज्यादा जरुरत है। जैसा कि प्रसिद्ध निवेशक वॉरेन बुफे ने कहा था: “केवल जब ज्वार निकल जाता है, तो आप जानते हैं कि कौन बिना कपड़ों के तैर रहा है।”

ज़रा हटके

वैलेंटाइन बाबा : प्यार की दो विचारधाराओं का टकराव

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Valentine Baba

नई दिल्ली, 15 जुलाई | ‘वैलेंटाइन बाबा’ बागी बलिया की मिट्टी से उपजी एक मीठी सी प्रेम कहानी है जो बलिया से शुरू होकर दिल्ली में दम तोड़ देती है। इस उपन्यास में चार प्रमुख पात्र हैं : मनीष, सुजाता, शिवेश और मोहिनी।

यह उपन्यास प्यार की दो विचारधाराओं की टकराहट को पेश करता है, जिसमें एक और प्यार मोहब्बत के नाम पर मौज मस्ती करने वाला शिवेश है तो वहीं दूसरी ओर प्यार में मिलावट को कतई बर्दाश्त नहीं करने वाला मनीष, जो बचपन से ही सुजाता से प्यार करता है। कहानी की चौथी किरदार मोहिनी दिल्ली में सुजाता की रूममेट है और प्यार को लेकर हमेशा उधेड़बुन में रहती है।

बागी बलिया का ‘कड़क लौंडा’ शिवेश वैलेंटाइन बाबा का परम भक्त है शायद इसलिए वह कपड़ों की तरह जल्दी जल्दी प्रेमिकाएं भी बदलता है, लेकिन कहानी का मुख्य किरदार मनीष और उसकी बचपन की दोस्त सुजाता स्कूली दिनों से एक-दूसरे से प्यार करते हैं। बलिया के इन तीनों दोस्तों के दिल्ली जाने के बाद कहानी में नए मोड़ आते हैं।

मनीष प्यार के मामले में गऊ है तो शिवेश ने इसमें पीएचडी की हुई है। कहानी पानी की धार की तरह सरलता से आगे बढ़ती है। शिवेश के संवाद आपको बांधे रखते हैं। उसके संवादों में आकर्षण है और उसकी बातों की तुकबंदी और उर्दू के प्रति उसके लगाव को कहानी में खूबसूरती से गढ़ा गया है। सशक्त महिला के तौर पर सुजाता के किरदार को गढ़ा गया है जो मनीष से बेइंतहा प्यार करती है लेकिन उसे अपनी सीमाएं भी पता है।

शशिकांत मिश्र का ‘नॉन रेजिडेंट बिहारी’ के बाद यह दूसरा उपन्यास है। इसलिए वह युवाओं की रूह को समझने में कामयाब रहे हैं और कहानी को उसी तरह से गढ़ा भी है।

उपन्यास में गालियों की भरमार है, कहानी के बागी कैरेक्टर शिवेश से लेकर सुजाता के गालियों से भरे संवाद कान खड़े कर देते हैं। यह कहानी युवाओं के लिए हैं और उन्हें सीधे कनेक्ट कर पाएगी। सुजाता का कैरेक्टर मेरा पसंदीदा कैरेक्टर है। वह मनीष से प्यार करती है लेकिन साथ में अपनी सीमाएं भी जानती हैं। मनीष के ठुकराए जाने के बाद भी वह उसकी मदद करती है।

सुजाता का कैरेक्टर बहुत बोल्ड है, वह उससे फ्लर्ट करने वाले किसी शख्स को नहीं बख्शती। किताब के सभी पात्र वास्तविक लगे हैं। लेखक ने इसे इतने शानदार तरीके से लिखा है कि इसे पढ़ते वक्त आप उन घटनाओं को विजुएलाइज कर सकते हैं। कई जगह द्विअर्थी वाक्यों का इस्तेमाल किया गया है, जो शायद युवाओं को टारगेट कर किया गया है और यकीनन यह किताब युवाओं को बहुत पसंद आएगी।

लेखक ने किताब में अंत तक रोचकता बनाए रखी है कि रह-रहकर दिमगा कचोटता है कि आखिर मनीष ने सुजाता को छोड़ क्यों दिया। इसका क्लाइमेक्स किसी बॉलीवुड फिल्म से कम नहीं लगता।

लेखक : शशिकांत मिश्र

मूल्य : 150 रुपये

प्रकाशक : राजकृष्ण प्रकाशन

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ओपिनियन

भारत कई आर्थिक संकेतकों में बांग्लादेश से भी काफी पीछे

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Amartya Sen

नई दिल्ली, 15 जुलाई | दुनिया की सर्वाधिक तीव्र दर से आर्थिक विकास वाली भारतीय अर्थव्यवस्था विकास के कई संकेतकों में बांग्लादेश से भी काफी पीछे है। मसलन, महिला कामगार भागीदारी दर 2010 में भारत 29 फीसदी थी तो बांग्लादेश में 57 फीसदी। यह चौंकाने वाली बात नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अर्मत्य सेन और ज्यां द्रेंज ने अपनी किताब ‘भारत और उसके विरोधाभास’ में बताई है।

मूल अंग्रेजी कृति ‘एन अनसर्टेन ग्लोरी : इंडिया एंड इट्स कंट्राडिक्शन’ का यह हिंदी रूपांतर है, जिसका प्रकाशन इसी साल हुआ है। मूल पुस्तक 2013 में ही प्रकाशित हुई थी।

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लेखक द्वय ने किताब में इस तल्ख सच्चाई को रेखांकित किया है कि लाभ अर्जित करने के मकसद से शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो निजी पूंजी निवेश होता है, उससे तब्दीली तो आती है, मगर उसका लाभ सबको नहीं मिल पाता, क्योंकि वह निवेश जनहित के उद्देश्य से कम, लाभ कमाने के लिए ज्यादा होता है।

किताब में तीव्र आर्थिक विकास के पथ पर अग्रसर भारत की वास्तविक तस्वीर पेश की गई है, जिसमें उपलब्धियों के साथ-साथ कई विफलताएं भी शामिल हैं, जिन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता।

लेखक द्वय ने यह बताने का प्रयास किया है कि आर्थिक विकास का फायदा अगर समाज में कमजोर तबकों और वंचितों को नहीं मिल रहा है तो फिर देश के आर्थिक विकास के कोई मायने नहीं हैं। इनके कहने का अभिप्राय यह है कि आर्थिक विकास के लाभ का पुनर्वितरण सुविधाओं से महरूम लोगों के बीच होना जरूरी है।

दोनों अर्थशास्त्री आर्थिक विकास के लिए सार्वजनिक व्यय को जरूरी मानते हैं। इनके मुताबिक शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सृजन के लिए सार्वजनिक व्यय जरूरी है, जिससे आर्थिक विकास को भी रफ्तार मिलती है।

किताब में मीडिया की जवाबदेही पर भी सवाल किया गया है। लेखक द्वय के अनुसार, भारतीय मीडिया रूपहले पर्दे, खान-पान और जीवन पद्धति और खेल जैसे मनोरंजन की खबरों में ज्यादा अभिरुचि दिखाता है, जबकि विकास के मसलों में उसकी दिलचस्पी कम देखी गई है।

इन्होंने किताब में योजना आयोग की एक रिपोर्ट का जिक्र किया है, जिसमें आयोग ने कहा है कि 2011-12 में देश की 1.2 अरब आबादी का एक चौथाई से कम निर्धनता रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि 1990 से 2010 के दौरान दुनियाभर में निर्धनता में कमी आई, जो आर्थिक विकास का परिणाम है। बाद के वर्षो में दुनिया के विकासशील देशों में एक चौथाई आबादी नितांत गरीबी का जीवन बसर करने को मजबूर थी और भारत में 40 फीसदी से ज्यादा लोग इस हालत में थे।

आर्थिक उदारीकरण के कारण भारत में 1990 के बाद गरीबी में कमी जरूर आई लेकिन इसमें सत्ता में बैठे लोगों की कोई कृपा नहीं थी। जिन लोगों ने उदारीकरण का विरोध किया वे 1991 के पूर्व की नीतियों में विश्वास करते थे।

लेखकों ने किताब की भूमिका में हालिया घटनाओं का भी जिक्र किया है, जिनमें 8 नवंबर, 2016 को भारत सरकार द्वारा की गई नोटबंदी की भर्सना की गई है। लेखक द्वय ने सरकार ने बेरोजगारों को रोजगार देने के बजाय अचानक नोटबंदी कर 86 फीसदी नकदी को गैरकानूनी घोषित कर दिया।

किताब में तुलनात्मक आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था को बेहतर ढंग से समझने में सहायक हैं। हालांकि अनूदित रचना होने के कारण संप्रेषणीयता का प्रवाह कहीं-कहीं अवरुद्ध होता है। इसमें कहीं दो राय नहीं कि अनुवादक ने मूल पाठ और लक्षित पाठ के बीच तारतम्य बनाने की पूरी चेष्टा की है। पुस्तक पठनीय है, खासतौर से आंकड़ों और तथ्यों का तुलनात्मक अध्ययन अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए लाभकारी हो सकता है।

किताब : भारत और उसके विरोधाभास

लेखक : अर्मत्य सेन, ज्यां द्रेंज

अनुवादक : अशोक कुमार

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

मूल्य : 399 रुपये

–आईएएनएस

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ओपिनियन

गौ रक्षकों का मोदी की बात न सुनना चिंताजनक : हामिद अंसारी

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Hamid Ansari

नई दिल्ली, 15 जुलाई | पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का कहना है कि देश में ‘अतिसतर्कता’ उफान पर है और यदि गौ रक्षक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात भी नहीं सुनते हैं तो यह चिंता का विषय है।

अंसारी ने अपनी नई किताब ‘डेयर आई क्वेस्चन’ के विमोचन से पहले आईएएनएस से विशेष बातचीत में कहा, “मोदी एक मजबूत नेता हैं। वह अपनी पार्टी के निर्विवाद नेता हैं। अगर उनकी बात नहीं सुनी जा रही है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। यह कहने की कोई जरूरत नहीं कि उनकी पार्टी के ही लोग उनकी बात नहीं मान रहे हैं। यह निष्कर्ष मैं नहीं निकाल रहा हूं।”

यह पुस्तक विभिन्न अवसरों पर अलग-अलग विषयों पर अंसारी द्वारा दिए गए भाषणों का संकलन है। उन्होंने कहा, “मैंने पुस्तक में विभिन्न मुद्दों पर प्रकाश डाला है, जैसे भारतीय होना क्या है, भारतीय राष्ट्रवाद क्या है या हम खुद को बहुलवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक क्यों कहते हैं।”

अंसारी ने जोर देकर कहा कि समाज में अहिष्णुता बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद ही सांप्रदायिक विभाजन उभरा, बल्कि यह काफी लंबे समय से है।

उन्होंने कहा, “असहिष्णुता लंबे समय से हमारे समाज में रही है। लेकिन मुझे लगता है कि जब पानी का स्तर बढ़ता है, तो आप प्रारंभ में उसपर गौर नहीं करते हैं और यह बढ़ता जाता है। उसके बाद आपकी नजर उसपर पड़ती हैं, और आज यही हो रहा है।”

उन्होंने आईएएनएस से कहा, “हां, अतिसतर्कता (विजिलैंटिज्म) उफान पर है। इस बारे में राष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लिखा गया है। अंतर्राष्ट्रीय समाचार पत्रों ने कहा है कि इसमें वृद्धि हुई है। मैं कोई सटीक तारीख (कि पहली बार इसपर कब गौर किया गया था) .. विभिन्न अवसर, विभिन्न स्थान नहीं बता सकता । यह कई वर्षो से चल रहा है।”

कुछ राज्यों में गाय की तस्करी के संदेह में या गोमांस खाने के नाम पर अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित लोगों पर गैर कानूनी ढंग से हमले करने और उन्हें पीट-पीट कर मार डालने जैसी कई घटनाएं घटित हुई हैं।

क्या मोदी के सत्ता में आने के बाद इस तरह की घटनाएं बढ़ी हैं?

अंसारी ने कहा, “नहीं, नहीं। विफलता की दोषी हर सरकार रही है। हर बार कहीं न कहीं कोई सांप्रदायिक दंगा हुआ है, यह असहिष्णुता की अभिव्यक्ति है और दूसरा प्रशासन की विफलता है।”

अंसारी ने कहा, “आप देखिए कि दो लोगों के बीच हमेशा असहमति हो सकती है। सड़क पर दो साइकिलें आपस में टकराती हैं और वहां गाली-गलौच शुरू हो जाता है। लेकिन एक छोटी असहमति सांप्रदायिक दंगे का रूप ले ले, इसके लिए सोच और साजिश रचनी पड़ती है। और जहां भी इस तरह की साजिश होती है, समझिए कि वहां कानून-व्यवस्था विफल हुई है।”

तो क्या वह विलिलैंटिज्म में वृद्धि के लिए खासतौर से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली राज्य सरकारों की ओर इशारा कर रहे हैं? पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, “देखिए, जहां भी ऐसा है, मैं वहां की सरकार की तरफ इशारा कर रहा हूं। चाहे यह असम, केरल में हो या पंजाब में। यह कोई मायने नहीं रखता। मैं राजनीतिक दलों को निशाना नहीं बना रहा, मैं प्रशासन को निशाना बना रहा हूं।”

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के एक कार्यक्रम में दो मई को अंसारी वहां मौजूद थे, और उस दौरान वहां हिंदूवादी गुंडे घुस गए थे। तो क्या उस घटना में स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत थी? अंसारी ने कहा कि वह इस तरह का निष्कर्ष निकालने से बचना चाहेंगे, लेकिन उन्होंने यह जरूर स्पष्ट किया कि जिन्ना का चित्र तो वहां व्यवधान पैदा करने का बहाना भर था।

उन्होंने कहा, “मैं उस तरह का निष्कर्ष नहीं निकालना चाहता। लेकिन मैं इतना जानता हूं कि मुझे वहां आमंत्रित किया गया था, और वहां व्यवधान पैदा किया गया। कार्यक्रम नहीं हो सका था। जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अगले दिन स्वीकार किया था कि बंदोबस्त विफल रहा और वह इसकी जांच करने जा रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “मैं यह निष्कर्ष नहीं निकाल रहा हूं कि उपद्रवियों के साथ स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत थी। लेकिन मैं इसे शुद्ध रूप से प्रशासनिक विफलता मानता हूं। अब यह विफलता क्यों हुई, जांच से यह पता किया जाए।”

अंसारी ने कहा, “लेकिन हां, जिन्ना का चित्र मात्र बहाना था। यह लंबे समय से वहां है। जिस सज्जन ने चित्र पर आपत्ति खड़ा की, वह तीन साल तक एएमयू कोर्ट के सदस्य थे। आपने इसके बारे में क्या किया?”

एएमयू और जामिया मिलिया इस्लामिया का अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त करने की दक्षिणपंथी नेताओं की मांग पर अंसारी ने कहा कि चूंकि सर्वोच्च न्यायालय में मामले की सुनवाई चल रही है, इसलिए उन्हें और अन्य किसी को भी इस पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।

अगला लोकसभा चुनाव निकट है, लिहाजा वर्तमान सरकार की उपलब्धियों और विफलताओं को जांचना-परखना जरूरी लगता है। प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान को लेकर एक कठोर नीति न अपनाने के लिए पूर्व की मनमोहन सिंह सरकार पर हमला बोलेते रहे हैं, तो क्या मौजूदा सरकार ने अपने चार साल के कार्यकाल के दौरान पाकिस्तान पर कोई ठोस, प्रभावी नीति बना पाई है?

पेशेवर राजनयिक रह चुके अंसारी ने कहा, “जहां तक मेरी समझ है पाकिस्तान को लेकर हमारी नीति ढुलमुल हैं। हम पेंडुलम की तरह एक बार इस तरफ जाते हैं फिर दूसरी तरफ चले जाते हैं। अगर यह नीति है, तो मान लीजिए कि हमारे पास एक नीति है। आप इसके बारे में क्या कर सकते हैं?”

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय अपनाई गई भारत की गुटनिरपेक्षता की पारंपरिक नीति बिल्कुल सही थी और इस नीति से दुनिया में देश को इज्जत भी मिली थी, लेकिन हाल के वर्षो में पड़ोसियों को लेकर भारत की नीति बुरी हालत में है।

उन्होंने कहा, “इस समय पड़ोसी देशों को लेकर हमारी नीति तनाव में नजर आती है। जो लोग इसके जानकार हैं, उन्होंने इस बारे में लिखा भी है।”

चीन के बढ़ते रसूख से निपटने के लिए क्या भारत पर्याप्त कोशिश कर रहा है?

अंसारी ने कहा, “यहां आईं सभी सरकारें इस बारे में बहुत सचेत रही हैं। चीन एक बड़ा पड़ोसी है। और चीन के साथ हमारे संबंध हैं, विभिन्न तरह के संबंध – राजनीतिक, सांस्कृतिक और यहां तक कि सैन्य संबंध भी। दोनों देश इस बात को समझते हैं कि हमारे बीच समस्याएं भी हैं, और हमारे बीच सकारात्मक संबंध भी हैं।”

–आईएएनएस

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