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NHRC ने योगी सरकार से कुपोषण से हुई मौतों को लेकर मांगा जवाब

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yogi adityanath
File Photo

नई दिल्ली, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने राज्य में कथित तौर पर कुपोषण से हुई मौतों को लेकर योगी सरकार को नोटिस जारी किया है। एक रपट के अनुसार, बस्ती के एक गांव में रहने वाले एक परिवार के चार सदस्यों की पिछले छह वर्षो में कथित तौर पर कुपोषण के कारण मौत हुई है।

एनएचआरसी ने रपट पर स्वत: संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव से चार हफ्तों में इस बाबत जवाब दाखिल करने को कहा है। आयोग ने साथ ही बस्ती में सामाजिक कल्याण योजनाओं के कार्यान्वयन पर भी एक रपट मांगी है। इसमें उस परिवार के बारे में विवरण दिया गया है, जहां कथित कुपोषण से मौतें हुई हैं।

बस्ती के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर जे.पी. त्रिपाठी ने कहा, “कुपोषण के कारण आठ महीने पहले हरीश चंद्र पांडे की पत्नी की कथित तौर पर मौत हो गई थी। ग्रामीणों ने हमें बताया कि हाल के वर्षों में हरीश चंद्र की तीन बेटियों की भी कुपोषण के चलते मौते हुई हैं।”

हरीश चंद्र बस्ती के ओझागंज गांव के कप्तानगंज ब्लॉक के मूल निवासी हैं। मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने कहा, “हरीश चंद्र की चार साल की बेटी वंध्यवासिनी गंभीर रूप से बीमार हैं और उसका इलाज चल रहा है।

वह एक न्यूरोलॉजिकल विकार से पीड़ित है। हालांकि, अब तक कुपोषण का कोई संकेत नहीं है। बेटी के अलावा हरीश परिवार के एक मात्र जीवित सदस्य हैं।”उन्होंने कहा की बच्ची के टेस्ट कराए गए हैं और उसकी रिपोर्ट्स का इंतजार है।

–आईएएनएस

ब्लॉग

कैसे बेमिसाल रणनीति है, ‘टेस्टिंग नहीं, तो कोरोना नहीं’?

राष्ट्रपति ट्रम्प आशंका जता चुके हैं कि अमेरिका की 34 करोड़ की आबादी में से क़रीब 2.5 लाख लोग कोरोना की भेंट चढ़ जाएँगे। यदि भारत में ऐसा ही अनुपात रहा तो अमेरिका से चार गुना आबादी वाले 130 करोड़ भारतीयों में से मृतकों की संख्या 10 लाख तक क्यों नहीं पहुँचेगी?

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Migrant workers
Migrant worker at Anand Vihar Bus Terminal

कोरोना से जूझने के लिहाज़ से मोदी सरकार की नीतियाँ पूरी तरह से अमेरिका की पिछलग्गू रही हैं। अमेरिका की ही तरह भारत ने विदेश आवागमन पर रोक लगाने और देश की सीमा को सील करने में बेहद देरी की। अमेरिका की ही तरह ही मेडिकल इमरजेंसी का प्रोटोकॉल अपनाने और लॉकडाउन का फ़ैसला लेने में क़रीब दो महीने की देरी की गयी। अमेरिका की तरह ही व्यापक पैमाने पर कोरोना टेस्टिंग की मुहिम छेड़ने में कोताही की गयी। अमेरिका की तरह ही वेंटिलेटर्स का इन्तज़ाम करने में भारत भी ख़ूब बिदकता रहा। अमेरिका की तरह ही वक़्त रहते चिकित्साकर्मियों के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों (PPE) को जुटाने में हीला-हवाली होती रही। और, अमेरिका की तरह ही कोरोना के आँकड़ों को दबाने-छिपाने का रास्ता अपनाया गया।

कोरोना को लेकर भारत और अमेरिका ने आपस में चाहे जितनी गलबहियाँ डाली हों लेकिन भारत की तरह अमेरिका में तो चमत्कार होने से रहे! इसीलिए अमेरिका में जहाँ कोरोना अब तक 12,000 से ज़्यादा लोगों को मरघट पहुँचा चुका है, वहीं उससे चार गुना आबादी वाले भारत में अभी स्कोर डेढ़ सौ के आसपास ही है। हालाँकि, हक़ीक़त में तस्वीर इतनी सन्तोषजनक नहीं हो सकती। क्योंकि 8 अप्रैल को शाम पाँच बजे तक दुनिया में कोरोना से संक्रमितों की कुल संख्या 14,91,351 थी। मृतकों की संख्या 87,435 और उपचार के बाद कोरोना मुक्त पाये गये लोगों की संख्या 3,19,031 थी।

दूसरे शब्दों में, अभी दुनिया में जो 10,84,886 कोरोना से पीड़ित हैं, उनमें से 4 फ़ीसदी यानी 48,051 मरीज़ों की हालत गम्भीर है। इसका मतलब ये हुआ कि सारी दुनिया में अभी तक कोरोना से जितने लोग बीमार पड़े, उनमें से 22 फ़ीसदी की मौत हुई है। जबकि 78 फ़ीसदी मरीज़ देर-सबेर ठीक हुए हैं। कोरोना की इसी भयावहता को देखते हुए भारत के हुक़्मरानों ने शानदार नुस्ख़ा अपनाया कि ‘टेस्टिंग ही कम से कम करो’। अर्थात् ‘न रहेगा बाँस, ना बजेगी बाँसुरी’।

यही वजह है कि नीति आयोग के ताज़ा आँकड़ों के अनुसार, अभी तक भारत के 732 में से 400 ज़िले ही कोरोना की मार से अछूते हैं। जबकि स्वास्थ्य मंत्रालय के ताज़ा आँकड़ों के मुताबिक़, देश में अब तक 5,274 लोग ही पॉज़िटिव पाये गये हैं। इनमें से 149 मरीज़ भले ही मरे गये, लेकिन 402 ठीक भी तो हुए। आप चाहें तो इसे भारत की अद्भुत उपलब्धि के रूप में देखें कि अमेरिका में जहाँ पहला कोरोना पॉज़िटिव 22 जनवरी को मिला, वहीं भारत में ये 30 जनवरी को केरल में सामने आया। उसके बाद के 9 हफ़्ते में कोरोना के संक्रमितों की संख्या में इतना मामूली इज़ाफ़ा हुआ क्योंकि हमारी सरकार की नीतियाँ सबसे उम्दा हैं।

अब ज़रा आँकड़ों का तुलनात्मक विश्लेषण करें। यदि हमारी रणनीति सही है तो हमारे यहाँ कोरोना से संक्रमित होने के बाद स्वस्थ होने वालों की तादाद 7.7 प्रतिशत ही क्यों है, जबकि दुनिया का औसत 78 फ़ीसदी लोगों का है। इसी तरह, ये चमत्कार नहीं तो फिर और क्या है कि दुनिया में जहाँ 22 फ़ीसदी कोरोना के मरीज़ मर रहे हैं, वहीं भारत में ये महज 2.8 प्रतिशत ही है। यानी ग़रीबों और पिछड़ों की भरमार वाले, स्वास्थ्य संसाधनों में कमज़ोर और सोशल डिस्टेंसिंग में तमाम लापरवाही दिखाने के बावजूद भारत के आँकड़े दुनिया के मुकाबले सात-आठ गुना कम हैं। कहीं ये सरकार की ‘टेस्टिंग नहीं, तो कोरोना नहीं’ वाली अघोषित नीति की ही उपलब्धि तो नहीं? यानी, ‘न नौ मन तेल होगा, ना राधा नाचेगी’।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के ताज़ा आँकड़ों के मुताबिक, 8 अप्रैल 2020 की रात 9 बजे तक भारत की 130 करोड़ की आबादी में से कुल 1,27,919 नमूनों की जाँच हुई। इनसे 5,114 लोगों के कोरोना पॉज़िटिव होने की पुष्टि हुई। 24 मार्च तक जहाँ हम प्रति दस लाख लोगों में से सिर्फ़ 18 की टेस्टिंग कर रहे थे, वो अब बढ़कर 98 व्यक्ति प्रति दस लाख हो गयी है। दूसरी ओर, विकसित देशों में रोज़ाना 7 से लेकर 10 हज़ार लोग प्रति दस लाख की दर से टेस्टिंग हो रही है। बहरहाल, भारत का ऐसा प्रदर्शन तब है जबकि सरकार का दावा है कि उसके पास रोज़ाना 15,000 नमूनों की जाँच करने की क्षमता है। इस क्षमता के मुक़ाबले, 8 अप्रैल को पहली बार सबसे अधिक यानी 13,143 नमूने जाँच के लिए लैब में पहुँचे।

दरअसल, आँकड़ों से खेलने के महारथी और उसे लुकाने-छिपाने के विशेषज्ञ बखूबी जानते हैं कि ज़्यादा टेस्ट करवाये जाएँगे तो ज़्यादा संक्रमित सामने आएँगे। इससे तो सारा गुड़गोबर हो जाएगा। सारे किये-कराये पर पानी फिर जाएगा। इसीलिए अमेरिका की तर्ज़ पर टेस्टिंग बग़ैर मरने वालों को भारत में भी कोरोना के मृतकों का दर्ज़ा नहीं मिल सकता। भारत ने इसकी प्रेरणा न्यूयार्क से ली है। वहाँ का सरकारी अनुमान है कि रोज़ाना क़रीब 200 लोगों की मौत उनके घरों में ही हो जा रही है। मौत के बाद न पोस्टमार्टम हो रहा है और ना ही कोरोना संक्रमण की जाँच। क्योंकि जाँच के लिए मृतक के मुँह से लार का नमूना लेना ज़रूरी है।

न्यूयार्क की हुक़ूमत ने इससे बचने के लिए दलील गढ़ी कि लाश पर धन-श्रम ख़र्च करना फ़िजूल है। इससे बेहतर है कि ज़िन्दा मरीज़ों की जाँच पर ही सारा ज़ोर लगाया जाए। ऐसी दलील को भला कौन ग़लत ठहरा सकता है! लेकिन इसके दो पहलू और हैं। पहला, बग़ैर जाँच वाले मृतकों को कोरोना पॉज़िटिव नहीं माना जा सकता। इससे कोरोना के मृतकों की कुल संख्या कम नज़र आएगी तो ट्रम्प सरकार की हाय-हाय कम होगी। अमेरिका का ये चुनावी साल है। इसमें ख़राब आँकड़ों का कमतर रहना ही बेहतर है। दूसरा, घरों में मरने वालों के मृत्यु प्रमाण पत्र में मौत की वजह कोरोना नहीं लिखी जाती। सरकार तो बस मौत की पुष्टि करती है।

अब ज़रा सोचिए कि यही दलीलें भारत में क्या-क्या गुल खिला सकती हैं? यहाँ भी मृत्यु प्रमाण पत्र में कोरोना की बात तो तभी लिखी जाएगी जबकि मृतक को कोरोना पॉज़िटिव पाया गया होगा। वर्ना, कोई कैसे किसी के बारे में ऐसा लिख देगा? अब यदि कोरोना ज्वालामुखी भारत में भी वैसे ही फटा जैसे अमेरिका में फटा है तो फिर अन्दाज़ा लगाइए कि यहाँ कितने लाख लोगों के मृत्यु प्रमाण पत्र में कोरोना का ज़िक्र नहीं होगा। कल्पना कीजिए कि यदि भविष्य में सरकार ने मृतकों के परिजनों के लिए किसी अनुग्रह राशि की घोषणा की तो लाखों मृतकों के परिजनों को कुछ नहीं मिलेगा, क्योंकि उनके मृत्यु प्रमाण पत्र में कोरोना का ज़िक्र नहीं होगा।

राष्ट्रपति ट्रम्प आशंका जता चुके हैं कि अमेरिका की 34 करोड़ की आबादी में से क़रीब 2.5 लाख लोग कोरोना की भेंट चढ़ जाएँगे। यदि भारत में ऐसा ही अनुपात रहा तो अमेरिका से चार गुना आबादी वाले 130 करोड़ भारतीयों में से मृतकों की संख्या 10 लाख तक क्यों नहीं पहुँचेगी? अब लगे हाथ आँकड़ों को दबाने-छिपाने का आर्थिक पहलू भी समझते चलिए। अनुमान लगाइए कि यदि कोरोना के मृतकों की वास्तविक संख्या 10 लाख रही और सरकारी आँकड़ा एक लाख का ही रहा तो इसका क्या असर पड़ेगा?

पहले तो अपनी शानदार कोरोना नीति के लिए सरकार खूब जमकर अपनी पीठ को ख़ुद ठोकती नज़र आएगी। फिर सियासी फ़ायदा उठाने के लिए उसका करुणानिधान स्वरूप सामने आएगा। ऐलान होगा कि कोरोना के हरेक मृतक के परिजनों को सरकार अनुग्रह राशि देगी। हालाँकि, ऐसा ज़रूरी नहीं कि अनुग्रह राशि बाँटी ही जाए, लेकिन सरकार के ढर्रों को देखते हुए इसकी सम्भावना को नकारा भी नहीं जा सकता।

अब यदि ये अनुग्रह राशि सिर्फ़ एक-एक लाख रुपये भी हुई तो एक लाख लोगों के लिए इसका बोझ होगा सिर्फ़ 10 अरब रुपये का। जबकि यही सहायता यदि 10 लाख लोगों के नाम पर देने की नौबत आ गयी तो खर्च बैठेगा 100 अरब रुपये। इसी सम्भावित बोझ से बचने के लिए दूरदर्शी फ़ैसला है, ‘कोरोना की टेस्टिंग से कन्नी काटते रहना’। कभी किट के नाम पर तो कभी लैब के नाम पर। जितना कम टेस्ट, उतना कम कोरोना। कल्पना कीजिए कि कोरोना के जाने के बाद अनुग्रह राशि का बोझ 100 अरब से घटाकर 10 अरब रुपये तक सीमित रखने से क्या सरकार 90 अरब रुपये की बचत नहीं कर लेगी? ऐसा हुआ तो सोचिए कि इस रकम से कितना ज़बरदस्त विकास होगा!

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राजनीति

लॉकडाउन पर बोले गहलोत- ‘केंद्र कोई भी फैसला राज्यों को भरोसे में लेकर ही करे’

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Ashok Gehlot
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (फाइल फोटो)

देश में मोदी सरकार द्वारा जारी 21 दिन का लॉकडाउन अंतिम पड़ाव पर है। लॉकडाउन को हटेगा या बढ़ेगा इस पर अटकले लगाई जा रही हैं। ऐसे में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा है कि 14 अप्रैल को खत्म होने वाले राष्ट्रीय लॉकडाउन के बारे में कोई भी फैसला लेने से पहले केंद्र सरकार को राज्यों को विश्वास में लेना चाहिए।

गहलोत ने कहा कि केंद्र को लॉकडाउन खत्म हटाने या बढ़ाने का फैसला राज्यों पर छोड़ देना चाहिए। क्योंकि हर राज्य में कोरोना संक्रमण की स्थिति और आंकड़े अलग-अलग हैं, इसलिए यह निर्णय राज्य सरकारों पर छोड़ देना चाहिए कि वह अपने-अपने राज्यों की परिस्थितियों और जरूरतों के मुताबिक किस सीमा तक पाबंदियां लगाएं। उन्होंने कहा कि हालांकि यह उनकी अपनी राय है और केंद्र सरकार जो भी फैसला करेगी राजस्थान सरकार उसका पालन करेगी।

मुख्यमंत्री ने उम्मीद जाहिर की राजस्थान में कोरोना संक्रमण पर काबू पा लिया जाएगा। गहलोत ने कहा कि भीलवाड़ा में जिस तरह स्वास्थ्यकर्मियों और स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने मुस्तैदी से काम किया है वह सिर्फ राजस्थान के लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए कोरोना के खिलाफ लड़ाई का एक मॉडल है।

गहलोत ने उम्मीद जाहिर की केंद्र सरकार कोरोना से लड़ने के लिए उनके बकाए का भुगतान जल्दी करेगी और अतिरिक्त धन व संसाधन मुहैया कराएगी।

गहलोत ने कहा कि राजस्थान में स्थितियां लगभग काबू में आ गईं थी, लेकिन दिल्ली के निजामुद्दीन के तब्लीगी जमात के कार्यक्रम में शामिल हुए कुछ लोगों के लौटने से यहां हालात फिर बिगड़े। लेकिन प्रशासन ने चुस्ती से संक्रमित लोगों को क्वारंटीन करके हालात पर नियंत्रण पा लिया है।

उन्होंने कहा कि जिस तरह पुलिस प्रशासन और डाक्टर व चिकित्साकर्मी राज्य में काम कर रहे हैं उससे उन्हें पूरी उम्मीद है कि राज्य को कोरोना से मुक्ति मिल जाएगी।

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राजनीति

फसल कटाई के लिए लॉकडाउन में किसानों को दी जाए ढील: राहुल

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Rahul Gandhi
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी (फाइल फोटो)

कोरोना वायरस से लड़ाई लड़ रहे भारत में लॉकडाउन जारी है। ऐसे में किसानों के लिए खासी परेशानी आ खड़ी हुई है। इस बीच पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने किसानों के हित के लिए लॉकडाउन में ढील देने की मांग की है। उन्होंने कहा, फसलों की कटाई के लिए लॉकडाउन में सुरक्षित तरीके से ढील देना एकमात्र रास्ता है।

राहुल गांधी ने कहा कि फसलों की कटाई के लिए लॉकडाउन में सुरक्षित तरीके से ढील देनी चाहिए। उन्होंने ट्वीट किया, ‘रबी की फसल खेतों में तैयार खड़ी है, लेकिन लॉकडाउन के कारण कटाई का काम बहुत मुश्किल हो गया है। इस वजह से सैकड़ों किसानों की आजीविका खतरे में है। देश के अन्नदाता किसान आज इस संकट में दोहरी मुसीबत में हैं।’

इसके साथ ही उन्होंने एक खबर भी शेयर की जिसमें लॉकडाउन के कारण किसानों को फसलों की कटाई में पेश आ रही मुश्किलों का उल्लेख है। गौरतलब है कि कोरोना वायरस का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए देश भर में लागू 21 दिवसीय लॉकडाउन 25 मार्च से शुरू हुआ था और 14 अप्रैल को खत्म होगा।

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