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Narendra Modi Narendra Modi

ओपिनियन

साफ़ दिख रहा है कि गुजरात की बयार देख बदहवास हो गये हैं मोदी…!

असली हिन्दू और नकली हिन्दू, हिन्दू या ग़ैर-हिन्दू जैसी फ़िज़ूल की बातों में लोगों को उलझाया जाता है। झूठ फैलाया जाता है कि सरदार पटेल और सुभाष चन्द्र बोस से नेहरू की ठनी रहती थी। इन्हें पता ही नहीं है कि उस दौर के नेताओं में मतभेदों के बावजूद साथ चलने, एक-दूसरे का आदर करने तथा सही मायने में देश को आगे रखने का बेजोड़ संस्कार था। इन्हीं संस्कारों की वजह से काँग्रेस पार्टी दशकों तक जनता की चहेती बनी रही।

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पिछले कई चुनावों की तरह गुजरात में भी नरेन्द्र मोदी ताबड़तोड़ रैलियाँ कर रहे हैं। हालाँकि, ज़मीनी स्तर पर उन्होंने साफ़ दिख रहा है कि नोटबन्दी, जीएसटी, बेरोज़गारी और महँगाई जैसी अर्थतंत्र को चौपट कर देने वाली उनकी नीतियों की वजह से उनके गृह राज्य में बीजेपी के प्रति हवा बहुत ख़िलाफ़ हो चुकी है। मोदी और उनके सहयोगी नेताओं की विशाल चांडाल-चौकड़ी भी इस हवा का रुख़ नहीं मोड़ पा रही है। इसीलिए मोदी के भाषणों में बदहवासी और खिसियाहट न सिर्फ़ साफ़ नज़र आती है। बल्कि ये इस क़दर बढ़ चुकी है जैसे गुजरात में 22 साल से काँग्रेस ही सत्ता में हो और बीजेपी उसे उखाड़ फेंकने के लिए प्राण-प्रण से जुटी है।

जगज़ाहिर रहा कि मोदी, देश के ऐसे अनोखे नेता हैं जिन्हें सवालों से अज़ीब-ओ-ग़रीब किस्म की एलर्ज़ी है। उन्हें दूसरों से सवाल पूछने में तो ख़ूब मज़ा आता है कि लेकिन दूसरों के सवालों का जबाव देना उन्हें कतई गँवारा नहीं। मोदी को गौरक्षा, बीफ़, दलित उत्पीड़न जैसे बेहद शर्मनाक और देश को झकझोर रहे मुद्दों पर त्वरित प्रतिक्रिया देना भी पसन्द नहीं है। भले ही देश उनसे अति-संवेदनशील रवैये की अपेक्षा रखता हो। इसीलिए, दिन-रात भाषण देने वाले, काँग्रेस से असंख्य सवाल पूछने के अभ्यस्त नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद कभी पत्रकारों के सवालों का सामना नहीं किया। इसके अलावा, संघ परिवार के संस्कारों के मुताबिक़, मोदी को भी अपने विरोधियों का झूठा चरित्रहनन करने में बहुत मज़ा आता है।

गुजरात की बयार को देख मोदी अब बेहद गुस्से में नॹर आते हैं। बौखलाहट, खिसियाहट, बदहवासी, बेचैनी को अब वो छिपा नहीं पा रहे। उनकी तकलीफ़ में काँग्रेस रोज़ाना नये-नये सवाल पूछकर आग में घी डाल रही है। इससे मोदी बुरी तरह से तिलमिला गये हैं। काँग्रेस ने उनसे पूछ लिया कि 2012 में उन्होंने ग़रीबों को 50 लाख नये घर बनाकर देने का वादा किया था, लेकिन पाँच साल में भी सिर्फ़ 4.72 लाख घर ही क्यों बन पाये? क्या ये गुजरात मॉडल की हक़ीक़त नहीं है! मोदी की दिक्कत ये भी है कि अब कौन उनकी ओर से गुजरातियों को बताएगा कि ‘अच्छे दिन’ और हर खाते में 15-15 लाख रुपये की तरह 50 लाख घरों को बनाने का वादा भी एक जुमला ही था! और, जनता को तो ये देखकर ही निहाल हो जाना चाहिए कि गुजरात के बेटे ने ग़रीबों के लिए 4.72 लाख घर बनवाए! 70 साल में यदि ऐसा हुआ होता तो उनके पास करने के लिए कुछ बचता ही नहीं!

दरअसल, #मोदीजी_बदहवास हो गये हैं! उन्हें समझ में आ गया है कि गुजरात का व्यापारी समाज उनके खोटे जीएसटी की वजह से बेहद ख़फ़ा है। इसीलिए वो जनता को बरगलाने के लिए बेहद मूर्खतापूर्ण दलीलें भी गढ़ लेते हैं। वो कहते हैं, ‘नमक और कार पर एक जैसा GST कैसे हो सकता है?’ ताज़्ज़ुब की बात तो ये है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे की तर्ज़ पर मोदी को ये कौन समझाये कि 18 रुपये प्रति किलो बिकने वाले साधारण नमक पर 18% जीएसटी होगा 3.24 रुपये। जबकि 5 करोड़ रुपये की कार पर यही टैक्स 90 लाख रुपये का होगा। लिहाज़ा, दोनों की तुलना करना ही सर्वथा बेमानी है! लेकिन मोदी यही नहीं रुके। उन्होंने जीएसटी की दर को एक समान 18% रखने की बात करने वालों को ‘ग्रांड स्टुपिड थॉट’ यानी ‘महामूर्खतापूर्ण विचार’ तक कह दिया। अब मोदी जी ये तो बताने से रहे कि क्या सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रमण्यम और उन तमाम अर्थशास्त्रियों का ये नज़रिया ‘महामूर्खतापूर्ण विचार’ कहा जा सकता है क्योंकि वो जीएसटी को अधिकतम 18 फ़ीसदी रखने की पैरोकारी करते रहे हैं?

#मोदीजी_बदहवास हो गये हैं! क्योंकि वो कहते हैं, ‘लोग जानते हैं कि काँग्रेस ने गुजरात के बेटों सरदार पटेल और मोरारजी के साथ कैसा व्यवहार किया था? उसी सोच की वजह से अब कथित तौर पर मोदी भी काँग्रेस के निशाने पर है।’ मज़े की बात ये है कि मोदी को अब ये कैसे याद रह सकता है कि भगवा ख़ानदान ने अपने ही बड़े नेताओं जैसे बलराज मधोक, लाल कृष्ण आडवाणी, गोविन्दाचार्य, यशवन्त सिन्हा, अरूण शौरी, नवजोत सिंह सिद्धू, कीर्ति आज़ाद, केशुभाई पटेल, शंकर सिंह वाघेला, सुरेश मेहता, आनन्दीबेन पटेल और शत्रुघ्न सिन्हा के साथ कैसा व्यवहार किया है, ये किससे छिपा है!

#मोदीजी_बदहवास हो गये हैं! तभी तो वो सोमनाथ मन्दिर में राहुल गाँधी के जाने से तिलमिला गये। कहने लगे, ‘आज जिन लोगों को सोमनाथ याद आ रहे हैं, इनसे एक बार पूछिए कि तुम्हें इतिहास पता है? तुम्हारे परनाना, तुम्हारे पिताजी के नाना, तुम्हारी दादी माँ के पिताजी, जो तब देश के पहले प्रधानमंत्री थे, जब सरदार पटेल सोमनाथ का उद्धार करा रहे थे। तब उनकी भौहें तन गयीं थीं। तब सरदार पटेल ने भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को उद्घाटन के लिए सोमनाथ आने का न्योता दिया था। तब तुम्हारे परनाना पंडित जवाहर लाल नेहरू ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को पत्र लिखकर सोमनाथ मन्दिर के कार्यक्रम में जाने पर नाराज़गी व्यक्त की थी।’

सोमनाथ मन्दिर से जुड़ा ये प्रसंग तो सही है। लेकिन मोदी ने इसका निहायत भ्रष्ट ब्यौरा दिया है। 2 मार्च 1951 को नेहरू ने राजेन्द्र प्रसाद को भेजे अपने ख़त में लिखा है कि जनता के चन्दे से हुए सोमनाथ मन्दिर के जीर्णोद्धार के लिए पटेल या राष्ट्रपति को सरकारी तौर पर अपनी मौज़ूदगी से परहेज़ करना चाहिए। वर्ना, इस दुष्प्रचार का जोख़िम पैदा होगा कि शीर्ष पदों पर बैठे नेता ही संविधान के उन धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का आदर नहीं कर रहे, जो धर्म और धार्मिक आस्थाओं को निहायत निजी चीज़ समझने की पैरवी करता है। दिलचस्प ये भी है कि नेहरू को तब जिन बातों का शक़ था, आज बिल्कुल वही काम नरेन्द्र मोदी और उनका संघ परिवार कर रहा है!

भगवा ख़ानदान हमेशा से ख़ुद को हिन्दुओं का इकलौता ख़ैरख़्वाह दिखाना चाहता है। इसीलिए गुजरात के प्रसिद्ध मन्दिरों में जाने पर राहुल गाँधी की खिल्ली उड़ाई जाती है। इसे नाटक बताया जाता है। असली हिन्दू और नकली हिन्दू, हिन्दू या ग़ैर-हिन्दू जैसी फ़िज़ूल की बातों में लोगों को उलझाया जाता है। झूठ फैलाया जाता है कि सरदार पटेल और सुभाष चन्द्र बोस से नेहरू की ठनी रहती थी। इन्हें पता ही नहीं है कि उस दौर के नेताओं में मतभेदों के बावजूद साथ चलने, एक-दूसरे का आदर करने तथा सही मायने में देश को आगे रखने का बेजोड़ संस्कार था। इन्हीं संस्कारों की वजह से काँग्रेस पार्टी दशकों तक जनता की चहेती बनी रही। उस दौर के नेता छिटपुट मतभेद के बावजूद एक-दूसरे के गुणों का बहुत आदर करते थे। तभी तो सुभाष चन्द्र बोस ने आज़ादी मिलने से काफ़ी पहले महात्मा गाँधी से कह दिया था कि आज़ाद हिन्दुस्तान का पहला प्रधानमंत्री बनने की सर्वोच्च क्षमता जवाहर लाला नेहरू में ही है!

सचमुच, #मोदीजी_बदहवास हो गये हैं! इसीलिए वो सच्चाई को ऐसे तोड़-मरोड़ पेश करते हैं, जिसे विरोधियों का चरित्रहनन किया जा सके। गुजरातियों को मोदी बरगला रहे हैं कि इन्दिरा गाँधी उनके राज्य को इस क़दर नापसन्द करती थीं कि 1979 में वो जब मोरबी शहर में पहुँची तो उन्होंने मुँह पर रूमाल रख लिया था। मोदी ने इस मिसाल को जैसे पेश किया वो निहायत शर्मनाक और गरिमा-रहित है। क्योंकि सच्चाई ये है कि मच्छू डैम टूटने (1979) के वक़्त मोरबी में बहुत बदबू फैली हुई थी। क्योंकि हज़ारों इंसान और पशु हादसे में मारे गये थे। चारों ओर लाशें सड़ रही थीं। महामारी का ख़तरा था। तब सरकार ने राहत और बचाव के काम में सभी लोगों के लिए मुँह पर रूमाल बाँधकर रखना अनिवार्य कर दिया था। इसी वजह से तब स्वयंसेवकों को भी मुँह पर रूमाल बाँधना पड़ा था। दिलचस्प ये भी है कि ख़ुद नरेन्द्र मोदी भी तब गुजरात में ही थे और एक स्वयंसेवक थे।

ओपिनियन

बधाई हो! भीड़-तंत्र ने भारत को अब भीड़-युग में पहुँचा दिया!

अब तो भीड़, पुलिस को भी पीट डालती है। क़ानून को हाथ में लेने वालों का पुलिस-अदालत कुछ नहीं बिगाड़ पाती। यही आलम दंगाइयों का भी होता है। उनके चेहरे पर भी भीड़ का मुखौटा ही होता है।

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ये विरोधी दल के किसी नेता या अवार्ड वापसी गैंग का नहीं, बल्कि माननीय सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया है कि ‘भारत में भीड़-तंत्र की इजाज़त नहीं दी सकती। नया क़ायदा नहीं बन सकता कि भीड़ ही सड़कों पर इंसाफ़ करने लगे। कोई भी क़ानून हाथ में नहीं ले सकता। भय, अराजकता और हिंसा फ़ैलाने वालों को सख़्ती से रोकना पुलिस और राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है। राज्यों को भीड़-तंत्र के पीड़ितों के लिए महीने भर में मुआवज़ा नीति बनानी होगी। भीड़-तंत्र की रोकथाम करने में विफल रहे पुलिस अफ़सरों के ख़िलाफ़ विभागीय कार्रवाई के अलावा सीधा ज़ुर्माना भी ठोंका जाएगा। भीड़ की अराजकता से जुड़े मामलों में अदालतों को रोज़ाना सुनवाई करके छह महीने में अपराधियों को अधिक से अधिक सज़ा देनी होगी। यही नहीं, भीड़-तंत्र यानी Mobocracy के ख़िलाफ़ संसद को भी सख़्त क़ानून बनाना चाहिए।’

यदि आप भीड़-तंत्र को भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक मानते हैं तो शायद आपको सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा फ़ैसले से तसल्ली मिले। हालाँकि, ये अफ़सोसनाक तो है कि लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक प्रवृत्ति यानी भीड़-तंत्र के प्रति न्याय के सर्वोच्च मन्दिर को अपनी संवेदनशीलता ज़ाहिर करने में ख़ासा वक़्त लग गया। आप कह सकते हैं कि ‘हुज़ूर, आते-आते बहुत देर कर दी!’ क्योंकि मोदी राज में ही गोरक्षा और बच्चा चोर के नाम पर अब तक 80 से ज़्यादा हिंसक वारदातें हो चुकी हैं। भीड़-तंत्र अब तक 33 इंसानों की बलि चढ़ा चुका है! मोदी और उनकी भक्त मंडली भले ही इस दौर को आधुनिक भारत का ‘स्वर्ण-युग’ बताते ना अघाते हों, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया कि भारत अब ‘भीड़-युग’ में आ चुका है!

mob lynching

सोशल मीडिया पर तैनात ‘भक्तों’ और अफ़वाह गढ़ने और फ़ैलाने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला किसी मुबारक़बाद या बधाई से कम नहीं है। इसकी साज़िशों ने ही सवा सौ करोड़ भारतवासियों को ‘भीड़-युग’ में पहुँचाया है! भीड़-युग के शुरुआती चार वर्षों में ही आदिकाल से मौजूद ‘भीड़’ का ऐसा ज़बरदस्त और ऐतिहासिक ‘विकास’ हुआ, जैसा ‘विकास-विरोधी’ पिछली सरकारें बीते 70 वर्षों में भी नहीं कर पायीं! सदियों से शैशवकाल में मचलने वाली ‘भीड़’ ने अब चार साल में बाल-काल और यौवन को पार करके गबरू जवान वाला व्यक्तित्व पा लिया। वैसे तो आधुनिक भारत का इतिहास असंख्य साम्प्रदायिक दंगों से अटा पड़ा है। हमारा कोई सियासी दल ऐसा नहीं है, जिसके दामन पर दंगों के ख़ून के छींटे ना रंगे हों। लेकिन गोरक्षा और बच्चा चोर के नाम पर कहीं भी, कभी भी ‘भीड़’ का किसी को भी पीट-पीटकर मार डालना, भीड़-युग का अद्भुत आयाम है!

भीड़-युग में भीड़ के तुष्टिकरण की नीति लागू होना स्वाभाविक है। आप चाहें तो माननीय सुप्रीम कोर्ट की मंशा पर तरस खा सकते हैं कि उसे अब भी उम्मीद है कि उसके सख़्त तेवर से भगवा सरकारें जाग जाएँगी, संघियों का वो अफ़वाह-तंत्र ख़ुदकुशी कर लेगा, जिन्हें इसी भीड़-तंत्र की भीड़ से संजीवनी मिलती है! सकारात्मक होने की यदि कोई सीमा नहीं होगी तभी तो जिन्होंने ‘विकास’ की ख़ातिर अपने कलेज़े के टुकड़े ‘लोकपाल’ की क़ुर्बानी दे दी हो, उनसे ये अपेक्षा की जा सकती है कि वो सुप्रीम कोर्ट की तसल्ली के लिए संसद में क़ानून बनाकर भीड़-तंत्र रूपी अपनी ही धमनियों को काट डालने का फ़ैसला ले लेंगे! जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उसी दिन से बैल भी दूध देने लगेंगे! देख लीजिएगा, मई 2019 तक भारत की संसद भीड़-युग का बाल भी बाकाँ नहीं कर पाएगी!

भीड़-तंत्र, बुनियादी तौर पर बोतल में बन्द ज़िन्न की तरह है, जो एक बार बोतल से बाहर आ जाए तो फिर उसे वापस बोतल में नहीं डाला जा सकता! ये अंडे से निकला वो चूजा है, जिसे कोई वापस अंडे में नहीं डाल सकता! इसीलिए भीड़-युग से वापसी बहुत मुश्किल है। हालाँकि, असम्भव कुछ भी नहीं होता! सम्भव बनाने के लिए सरकार को वैसे ही व्यापक उपाय करने होंगे जैसे उफ़नती नदी की बाढ़ से रोकथाम के लिए विशाल बाँधों और नहरों का नेटवर्क बनाया जाता है। इसके लिए भी सबसे पहले तो हमें ये स्वीकार करना होगा कि भीड़-राज को महज ये उपदेश देकर क़ाबू में नहीं लाया जा सकता कि ‘कोई भी क़ानून हाथ में नहीं ले सकता!’

अरे, ये किससे छिपा है कि भारत में भीड़ से बड़ा कोई क़ानून नहीं! भीड़ कब अराजक नहीं होती! भीड़ का तो स्वभाव ही है बेक़ाबू होना! इसमें नया क्या है! भीड़ तो हड़ताल, चक्का-जाम, रेल-रोको, तोड़फोड़-उपद्रव-आगजनी और हिंसा करती रही है। 70 साल में लाखों बसों और अन्य वाहनों की होली क्या भीड़ ने नहीं जलायी! तो क्या अब इंसानों की बलि ले रही भीड़, सुप्रीम कोर्ट की हाय-तौबा से अपना चरित्र बदल लेगी! किस राजनीतिक दल ने और कब ये ख़्वाहिश नहीं रखी कि उसके पीछे ‘भीड़’ खड़ी हो! राजनीति के लिए ‘भीड़’ ज़रूरी है। आमलोगों के पास ‘भीड़’ नहीं है, इसीलिए वो राजनेता नहीं हैं।

COW-VIGILANTE

भीड़ को भीड़ बनने से रोकने का काम क़ानून और संवेदनशील सरकार का है। संवेदनशील सरकार का कर्त्तव्य है कि वो छोटे-छोटे जनसमूह और संगठन की माँगों, उम्मीदों और अपेक्षाओं का वक़्त रहते निराकरण करे, ताकि वो भीड़ में तब्दील ना हों। अभी तो भारत का संस्कार ही ये हो चुका है कि सरकारें सिर्फ़ हिंसा-हड़ताल और चक्का जाम वग़ैरह की भाषा ही समझती हैं। समाज का जो तबक़ा सरकारी व्यवस्था की चूलें नहीं हिला सकता, मौजूदा व्यवस्था में उसकी तब तक कोई सुनवाई नहीं है, जब तक कि सड़कों पर हिंसा नहीं करता। ढीठ नौकरशाही और विधायिका को तो अदालतों के फ़ैसलों की भी तब तक कोई परवाह नहीं होती, जब तक कि बात अवमानना तक न पहुँच जाए।

अब तो सरकारी तंत्र को भी सड़क का अतिक्रमण हटाने के लिए भी कोर्ट के आदेश की ज़रूरत पड़ती है! नौकरशाही को अपना फ़र्ज़ निभाने के लिए अदालत की अवमानना का वास्ता देना पड़ता है। जब तक अदालत की लाठी सिर पर नहीं हो, तब तक वही सरकारी अमला अतिक्रमण को पैदा करके उगाही करता है, जिस पर अतिक्रमण ख़त्म करने का ज़िम्मा होता है। सबकी उगाही बँधी हुई है! इसीलिए जब अदालती आदेश के बग़ैर जब सरकारी तंत्र, अतिक्रमण हटाने पहुँचता है तो उसका वास्ता जनता के सहयोग और समर्थन से नहीं, बल्कि भीड़ के विरोध से पड़ता है! सबको, सब कुछ पता है! अदालतें भी अनजान नहीं हैं! जज साहब को भी सब पता है! फिर भी सिर्फ़ अदालती आदेश ही ये बोल पाता है कि ‘कोई भी क़ानून हाथ में नहीं ले सकता!’

भीड़ की असलियत भी किसी से छिपी नहीं है। भीड़, जब इंसानों की होती है तो वो वोट भी होती है। ‘जहाँ वोट, वहाँ तुष्टिकरण!’ तुष्टिकरण की विकृति से लोकतंत्र को बचाने का दारोमदार जिस क़ानून पर है, उसके तीन अंग हैं। विधायिका, पुलिस या कार्यपालिका और अदालत। पुलिस और अदालतों में पर्याप्त निवेश करके यदि उन्हें कारगर बना दिया जाए तो वो कमज़ोर क़ानून की भी भरपायी कर देंगे। अन्यथा, कठोर क़ानून भी किताबों में ही बन्द पड़े रहेंगे। हत्या, बलात्कार, दहेज-उत्पीड़न, बाल-विवाह जैसे मामलों में जो क़ानून भारत में हैं, उससे सख़्त सज़ा कहीं नहीं हो सकती।

हमारी न्याय-व्यवस्था किसी को इंसाफ़ नहीं दे पाती। हमारी अदालतों से किसी को इंसाफ़ नहीं मिलता। छोटा-बड़ा, अमीर-ग़रीब सभी अदालतों में लगने वाले असामान्य वक़्त के शिकार हैं। भारतीय जेलों में अपराधियों से दोगुनी संख्या विचाराधीन क़ैदियों की है। मुक़दमों के निपटारे में 20-25 साल लगना सामान्य बात है। पुलिस जिन मुट्ठी भर अपराधियों को पकड़ पाती है, उनमें से भी महज 6 फ़ीसदी का ज़ुर्म अदालत में साबित हो पाता है। मज़े की बात ये भी है कि क़ानून किसी के हाथ में नहीं, बल्कि कहीं है ही नहीं। आज़ाद भारत में पुलिस-अदालत की दशा हमेशा चिन्ताजनक ही रही है। भीड़-युग में फ़र्क़ सिर्फ़ इतना आया है कि ये पूरी तरह से चौपट हो चुका है। सियासत और लगातार बढ़ती आबादी ने पुलिस-अदालत को कभी सुधरने नहीं दिया। पुलिस, राज्य सरकारों की वर्दीधारी लठैत है। ये न्याय-व्यवस्था की पहली सीढ़ी है। लेकिन खंडहर से भी ज़्यादा जर्जर हो चुकी है। ये सिर्फ़ साधन-सम्पन्न लोगों का ख़्याल रख पाती है।

भीड़ को ऐतबार नहीं है कि क़ानून अपना काम ज़रूर करेगा। मोदी राज से पहले भी कभी-कभार ऐसी ख़बरें मिलती थीं कि भीड़ ने किसी चोर या जेबकतरे को रंग हाथ पकड़ लिया और फिर उसे पुलिस के हवाले करने से पहले ही भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। अब तो भीड़, पुलिस को भी पीट डालती है। क़ानून को हाथ में लेने वालों का पुलिस-अदालत कुछ नहीं बिगाड़ पाती। यही आलम दंगाइयों का भी होता है। उनके चेहरे पर भी भीड़ का मुखौटा ही होता है। कुख़्यात अपराधियों को भी ज़मानत पर ज़मानत मिलते जाना, उनका एक के बाद एक जघन्य अपराधों को करते जाना, दाग़ी लोगों का सियासी क्षेत्र में चमककर सफ़ेदपोश बनना और दशकों तक अदालत की कार्यवाही का पूरा नहीं होना भी भीड़ को यही सन्देश देता है कि पुलिस-अदालत उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी।

रही-सही क़सर तब पूरी हो जाती है, जब भीड़ को राजनीतिक आश्रय मिलने लगता है। भीड़ में से अपराधी को ढूँढ़ना और अदालत में उसका अपराध साबित करना, बेशक़ पुलिस की उपलब्धि है। लेकिन इन्हीं अपराधियों को चटपट जमानत मिल जाना और मंत्रियों की ओर से उनका माल्यार्पण होना, भीड़-युग के वैभव का गुणगान करता है। जब वाचाल प्रधानमंत्री के पास भी ऐसी प्रवृत्तियों की भर्त्सना करने का भी वक़्त नहीं हो, जब भीड़ में हिन्दू-मुसलिम ढूँढ़े जाएँ, जब भीड़ में तिरंगा, राष्ट्रवाद और देशद्रोह का तड़का लगे, जब भीड़ में पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण वाला क्षेत्रवाद घुसेड़ा जाए, तब जो भीड़-तंत्र पैदा होगा, उसे किसी अदालती फ़रमान और क़ानून से काबू में नहीं लाया जा सकता! फ़िलहाल, भारत के नसीब में यही भीड़-युग लिखा है।

रात कितनी भी लम्बी हो, वो भोर को रोक नहीं पाती! भीड़-वादियों में ग़लतफ़हमी फैलायी गयी है कि भीड़, उनके बग़ैर रह नहीं पाएगी! सत्ता तंत्र की मन्दबुद्धि सवर्ण हिन्दुओं में यही धारणा फैलायी जा रही है कि ‘जनता को कुछ याद ही नहीं रहता!’ जबकि सच्चाई ये है कि जनता ने हमेशा अपनी यादाश्त का लोहा मनवाया है। दांडी मार्च में महात्मा गाँधी की तस्वीरों में दिखने वाली जनता हाशिये पर दिखती ज़रूर है, लेकिन चुटकी बजाकर सत्ता को उखाड़ फेंकती है। इसी जनता ने इमरजेंसी और बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद संविधान की रक्षा की थी। भीड़-राज को ख़ुशफ़हमी है कि वही जनता लिंचिंग, दंगे, एनकाउंटर, कठुआ, उन्नाव रेप, ऊना कांड, महंगाई, नोटबन्दी, बेरोज़गारी सब भूल जाएगी और उसकी साज़िश के मुताबिक, फिर से साम्प्रदायिकता के नशे में टूट जाएगी। लेकिन काठ की हाँडी कब बार-बार चढ़ी है!

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ओपिनियन

भारत कई आर्थिक संकेतकों में बांग्लादेश से भी काफी पीछे

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Amartya Sen

नई दिल्ली, 15 जुलाई | दुनिया की सर्वाधिक तीव्र दर से आर्थिक विकास वाली भारतीय अर्थव्यवस्था विकास के कई संकेतकों में बांग्लादेश से भी काफी पीछे है। मसलन, महिला कामगार भागीदारी दर 2010 में भारत 29 फीसदी थी तो बांग्लादेश में 57 फीसदी। यह चौंकाने वाली बात नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अर्मत्य सेन और ज्यां द्रेंज ने अपनी किताब ‘भारत और उसके विरोधाभास’ में बताई है।

मूल अंग्रेजी कृति ‘एन अनसर्टेन ग्लोरी : इंडिया एंड इट्स कंट्राडिक्शन’ का यह हिंदी रूपांतर है, जिसका प्रकाशन इसी साल हुआ है। मूल पुस्तक 2013 में ही प्रकाशित हुई थी।

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लेखक द्वय ने किताब में इस तल्ख सच्चाई को रेखांकित किया है कि लाभ अर्जित करने के मकसद से शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो निजी पूंजी निवेश होता है, उससे तब्दीली तो आती है, मगर उसका लाभ सबको नहीं मिल पाता, क्योंकि वह निवेश जनहित के उद्देश्य से कम, लाभ कमाने के लिए ज्यादा होता है।

किताब में तीव्र आर्थिक विकास के पथ पर अग्रसर भारत की वास्तविक तस्वीर पेश की गई है, जिसमें उपलब्धियों के साथ-साथ कई विफलताएं भी शामिल हैं, जिन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता।

लेखक द्वय ने यह बताने का प्रयास किया है कि आर्थिक विकास का फायदा अगर समाज में कमजोर तबकों और वंचितों को नहीं मिल रहा है तो फिर देश के आर्थिक विकास के कोई मायने नहीं हैं। इनके कहने का अभिप्राय यह है कि आर्थिक विकास के लाभ का पुनर्वितरण सुविधाओं से महरूम लोगों के बीच होना जरूरी है।

दोनों अर्थशास्त्री आर्थिक विकास के लिए सार्वजनिक व्यय को जरूरी मानते हैं। इनके मुताबिक शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सृजन के लिए सार्वजनिक व्यय जरूरी है, जिससे आर्थिक विकास को भी रफ्तार मिलती है।

किताब में मीडिया की जवाबदेही पर भी सवाल किया गया है। लेखक द्वय के अनुसार, भारतीय मीडिया रूपहले पर्दे, खान-पान और जीवन पद्धति और खेल जैसे मनोरंजन की खबरों में ज्यादा अभिरुचि दिखाता है, जबकि विकास के मसलों में उसकी दिलचस्पी कम देखी गई है।

इन्होंने किताब में योजना आयोग की एक रिपोर्ट का जिक्र किया है, जिसमें आयोग ने कहा है कि 2011-12 में देश की 1.2 अरब आबादी का एक चौथाई से कम निर्धनता रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि 1990 से 2010 के दौरान दुनियाभर में निर्धनता में कमी आई, जो आर्थिक विकास का परिणाम है। बाद के वर्षो में दुनिया के विकासशील देशों में एक चौथाई आबादी नितांत गरीबी का जीवन बसर करने को मजबूर थी और भारत में 40 फीसदी से ज्यादा लोग इस हालत में थे।

आर्थिक उदारीकरण के कारण भारत में 1990 के बाद गरीबी में कमी जरूर आई लेकिन इसमें सत्ता में बैठे लोगों की कोई कृपा नहीं थी। जिन लोगों ने उदारीकरण का विरोध किया वे 1991 के पूर्व की नीतियों में विश्वास करते थे।

लेखकों ने किताब की भूमिका में हालिया घटनाओं का भी जिक्र किया है, जिनमें 8 नवंबर, 2016 को भारत सरकार द्वारा की गई नोटबंदी की भर्सना की गई है। लेखक द्वय ने सरकार ने बेरोजगारों को रोजगार देने के बजाय अचानक नोटबंदी कर 86 फीसदी नकदी को गैरकानूनी घोषित कर दिया।

किताब में तुलनात्मक आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था को बेहतर ढंग से समझने में सहायक हैं। हालांकि अनूदित रचना होने के कारण संप्रेषणीयता का प्रवाह कहीं-कहीं अवरुद्ध होता है। इसमें कहीं दो राय नहीं कि अनुवादक ने मूल पाठ और लक्षित पाठ के बीच तारतम्य बनाने की पूरी चेष्टा की है। पुस्तक पठनीय है, खासतौर से आंकड़ों और तथ्यों का तुलनात्मक अध्ययन अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए लाभकारी हो सकता है।

किताब : भारत और उसके विरोधाभास

लेखक : अर्मत्य सेन, ज्यां द्रेंज

अनुवादक : अशोक कुमार

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

मूल्य : 399 रुपये

–आईएएनएस

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ओपिनियन

गौ रक्षकों का मोदी की बात न सुनना चिंताजनक : हामिद अंसारी

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Hamid Ansari

नई दिल्ली, 15 जुलाई | पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का कहना है कि देश में ‘अतिसतर्कता’ उफान पर है और यदि गौ रक्षक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात भी नहीं सुनते हैं तो यह चिंता का विषय है।

अंसारी ने अपनी नई किताब ‘डेयर आई क्वेस्चन’ के विमोचन से पहले आईएएनएस से विशेष बातचीत में कहा, “मोदी एक मजबूत नेता हैं। वह अपनी पार्टी के निर्विवाद नेता हैं। अगर उनकी बात नहीं सुनी जा रही है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। यह कहने की कोई जरूरत नहीं कि उनकी पार्टी के ही लोग उनकी बात नहीं मान रहे हैं। यह निष्कर्ष मैं नहीं निकाल रहा हूं।”

यह पुस्तक विभिन्न अवसरों पर अलग-अलग विषयों पर अंसारी द्वारा दिए गए भाषणों का संकलन है। उन्होंने कहा, “मैंने पुस्तक में विभिन्न मुद्दों पर प्रकाश डाला है, जैसे भारतीय होना क्या है, भारतीय राष्ट्रवाद क्या है या हम खुद को बहुलवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक क्यों कहते हैं।”

अंसारी ने जोर देकर कहा कि समाज में अहिष्णुता बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद ही सांप्रदायिक विभाजन उभरा, बल्कि यह काफी लंबे समय से है।

उन्होंने कहा, “असहिष्णुता लंबे समय से हमारे समाज में रही है। लेकिन मुझे लगता है कि जब पानी का स्तर बढ़ता है, तो आप प्रारंभ में उसपर गौर नहीं करते हैं और यह बढ़ता जाता है। उसके बाद आपकी नजर उसपर पड़ती हैं, और आज यही हो रहा है।”

उन्होंने आईएएनएस से कहा, “हां, अतिसतर्कता (विजिलैंटिज्म) उफान पर है। इस बारे में राष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लिखा गया है। अंतर्राष्ट्रीय समाचार पत्रों ने कहा है कि इसमें वृद्धि हुई है। मैं कोई सटीक तारीख (कि पहली बार इसपर कब गौर किया गया था) .. विभिन्न अवसर, विभिन्न स्थान नहीं बता सकता । यह कई वर्षो से चल रहा है।”

कुछ राज्यों में गाय की तस्करी के संदेह में या गोमांस खाने के नाम पर अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित लोगों पर गैर कानूनी ढंग से हमले करने और उन्हें पीट-पीट कर मार डालने जैसी कई घटनाएं घटित हुई हैं।

क्या मोदी के सत्ता में आने के बाद इस तरह की घटनाएं बढ़ी हैं?

अंसारी ने कहा, “नहीं, नहीं। विफलता की दोषी हर सरकार रही है। हर बार कहीं न कहीं कोई सांप्रदायिक दंगा हुआ है, यह असहिष्णुता की अभिव्यक्ति है और दूसरा प्रशासन की विफलता है।”

अंसारी ने कहा, “आप देखिए कि दो लोगों के बीच हमेशा असहमति हो सकती है। सड़क पर दो साइकिलें आपस में टकराती हैं और वहां गाली-गलौच शुरू हो जाता है। लेकिन एक छोटी असहमति सांप्रदायिक दंगे का रूप ले ले, इसके लिए सोच और साजिश रचनी पड़ती है। और जहां भी इस तरह की साजिश होती है, समझिए कि वहां कानून-व्यवस्था विफल हुई है।”

तो क्या वह विलिलैंटिज्म में वृद्धि के लिए खासतौर से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली राज्य सरकारों की ओर इशारा कर रहे हैं? पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, “देखिए, जहां भी ऐसा है, मैं वहां की सरकार की तरफ इशारा कर रहा हूं। चाहे यह असम, केरल में हो या पंजाब में। यह कोई मायने नहीं रखता। मैं राजनीतिक दलों को निशाना नहीं बना रहा, मैं प्रशासन को निशाना बना रहा हूं।”

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के एक कार्यक्रम में दो मई को अंसारी वहां मौजूद थे, और उस दौरान वहां हिंदूवादी गुंडे घुस गए थे। तो क्या उस घटना में स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत थी? अंसारी ने कहा कि वह इस तरह का निष्कर्ष निकालने से बचना चाहेंगे, लेकिन उन्होंने यह जरूर स्पष्ट किया कि जिन्ना का चित्र तो वहां व्यवधान पैदा करने का बहाना भर था।

उन्होंने कहा, “मैं उस तरह का निष्कर्ष नहीं निकालना चाहता। लेकिन मैं इतना जानता हूं कि मुझे वहां आमंत्रित किया गया था, और वहां व्यवधान पैदा किया गया। कार्यक्रम नहीं हो सका था। जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अगले दिन स्वीकार किया था कि बंदोबस्त विफल रहा और वह इसकी जांच करने जा रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “मैं यह निष्कर्ष नहीं निकाल रहा हूं कि उपद्रवियों के साथ स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत थी। लेकिन मैं इसे शुद्ध रूप से प्रशासनिक विफलता मानता हूं। अब यह विफलता क्यों हुई, जांच से यह पता किया जाए।”

अंसारी ने कहा, “लेकिन हां, जिन्ना का चित्र मात्र बहाना था। यह लंबे समय से वहां है। जिस सज्जन ने चित्र पर आपत्ति खड़ा की, वह तीन साल तक एएमयू कोर्ट के सदस्य थे। आपने इसके बारे में क्या किया?”

एएमयू और जामिया मिलिया इस्लामिया का अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त करने की दक्षिणपंथी नेताओं की मांग पर अंसारी ने कहा कि चूंकि सर्वोच्च न्यायालय में मामले की सुनवाई चल रही है, इसलिए उन्हें और अन्य किसी को भी इस पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।

अगला लोकसभा चुनाव निकट है, लिहाजा वर्तमान सरकार की उपलब्धियों और विफलताओं को जांचना-परखना जरूरी लगता है। प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान को लेकर एक कठोर नीति न अपनाने के लिए पूर्व की मनमोहन सिंह सरकार पर हमला बोलेते रहे हैं, तो क्या मौजूदा सरकार ने अपने चार साल के कार्यकाल के दौरान पाकिस्तान पर कोई ठोस, प्रभावी नीति बना पाई है?

पेशेवर राजनयिक रह चुके अंसारी ने कहा, “जहां तक मेरी समझ है पाकिस्तान को लेकर हमारी नीति ढुलमुल हैं। हम पेंडुलम की तरह एक बार इस तरफ जाते हैं फिर दूसरी तरफ चले जाते हैं। अगर यह नीति है, तो मान लीजिए कि हमारे पास एक नीति है। आप इसके बारे में क्या कर सकते हैं?”

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय अपनाई गई भारत की गुटनिरपेक्षता की पारंपरिक नीति बिल्कुल सही थी और इस नीति से दुनिया में देश को इज्जत भी मिली थी, लेकिन हाल के वर्षो में पड़ोसियों को लेकर भारत की नीति बुरी हालत में है।

उन्होंने कहा, “इस समय पड़ोसी देशों को लेकर हमारी नीति तनाव में नजर आती है। जो लोग इसके जानकार हैं, उन्होंने इस बारे में लिखा भी है।”

चीन के बढ़ते रसूख से निपटने के लिए क्या भारत पर्याप्त कोशिश कर रहा है?

अंसारी ने कहा, “यहां आईं सभी सरकारें इस बारे में बहुत सचेत रही हैं। चीन एक बड़ा पड़ोसी है। और चीन के साथ हमारे संबंध हैं, विभिन्न तरह के संबंध – राजनीतिक, सांस्कृतिक और यहां तक कि सैन्य संबंध भी। दोनों देश इस बात को समझते हैं कि हमारे बीच समस्याएं भी हैं, और हमारे बीच सकारात्मक संबंध भी हैं।”

–आईएएनएस

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