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मेरा भारत बदल चुका है

Kapil Sibal

आज यहाँ भय का राज है, विरोध को कुचलने की मानसिकता है

सत्तर साल की उम्र में ही भारत पूरी तरह से बदल चुका है। ऐसा नहीं है कि साम्प्रदायिक नफ़रत का माहौल देश में पहले नहीं था। लेकिन पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि साम्प्रदायिक उन्माद का रूप व्यक्तिगत स्तर पर हिंसक बनकर दिखायी देता हो। मौजूदा हुक़ूमत ही हिन्दुत्व की ऐसी धार्मिक विचारधारा का पोषक बन चुकी है, जो इस क़दर असहिष्णु हो गयी है कि विरोध के हरेक स्वर को हिंसा से कुचल देने में यक़ीन करती है। गोरक्षकों की ओर से किये जाने वाले ‘तुरन्त इंसाफ़’ का मकसद सिर्फ़ लोगों में भय पैदा करना है। गाय को हिन्दुत्वादी विचारधारा का प्रतीक बना दिया गया है। हालाँकि, हिन्दुत्ववादी उत्पातियों के लिए गाय की रक्षा की रक्षा की कोई अहमियत नहीं है। इनका मक़सद तो सिर्फ़ गाय की आड़ में अल्पसंख्यकों में हिंसा का भय पैदा करना है।

काँग्रेस की योजनाओं का संक्षिप्त नाम (Acronyms) बदलकर, सच्चाई से कोसों दूर झूठ से लबरेज़ बयानों के ज़रिये जनता का बरगलाने का ढर्रा नया हथियार बनकर सामने है। चीन और जापान के साथ हुए करोड़ों डॉलर के समझौते अधूरे पड़े हुए हैं, स्मार्ट सिटी का नारा, किसी महामारी के कीचड़ में जा धँसा है, गंगा का प्रदूषण भी अपने नसीब पर रो रहा है और डिज़ीटल अर्थव्यवस्था की बातें मृग-मारीचिका बनकर सामने है।

ये सब कुछ उस प्रधानमंत्री की देन हैं जो बातें तो बहुत लम्बी-चौड़ी करते हैं, लेकिन उनकी उपलब्धियाँ नगण्य हैं। उनके विदेश दौरे किसी प्रायोजित समारोह की तरह होते हैं। ये ऐसा दिखाने की कोशिश करते हैं कि उनकी आगवानी में जो रेड कार्पेट बिछा था, वैसा शिष्टाचार तो पिछले प्रधानमंत्रियों को भी मयस्सर नहीं रहा। इसके बावजूद, देश को प्रधानमंत्री के सैर-सपाटों से कुछ भी हासिल नहीं हुआ। अमेरिका से प्रधानमंत्री 22 गार्डियन ड्रोन के अलावा और कुछ नहीं ला सके।

फ्रांस से 126 राफेल लड़ाकू विमानों के दाम पर हमने सिर्फ़ 36 विमानों का सौदा किया। पड़ोसियों के साथ जिन महान उपलब्धियों की बातें करके जश्न मनाया गया, वो फुस्स साबित हुए। भारत और चीन के सैनिक डोकलाम में एक-दूसरे को आँखें तरेर रहे हैं। कश्मीर में सीमा पार से आ रहा आतंकवाद मासूमों को अपना शिकार बना रहा है। नेपाल में चीन का दख़ल बेतहाशा बढ़ चुका है। म्यांमार और श्रीलंका में भी चीन प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है। हमारे ज़्यादातर पड़ोसी चीन के ‘वन बेल्ट वन रोड’ (OBOR) के पक्ष में खड़े हैं।

नोटबन्दी से हमारी अर्थव्यवस्था को सदमा लगा है। 8 नवम्बर 2016 को नोटबन्दी का ऐलान करते वक़्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो चार उद्देश्य बताये थे, वो उड़न-छू हो गये। आतंकवाद और कालाधन, दोनों ही मौजूद हैं। झूठ बोला जा रहा है कि भारत, भ्रष्टाचार से मुक्त हो चुका है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनैशनल की मार्च में जारी हुई रिपोर्ट में भारत को एशिया-प्रशान्त क्षेत्र के सबसे भ्रष्ट देशों में शुमार किया गया है। जाली नोट अब भी अर्थव्यवस्था में घूम रहे हैं। उल्टा, नोटबन्दी ने तो भ्रष्ट लोगों को अपनी काली कमाई को ख़ुर्द-बुर्द करने का ज़रिया मुहैया करवाया। इसीलिए आश्चर्यजनक रूप से उत्तर प्रदेश के चुनाव में नोटबन्दी का कोई असर नहीं दिखायी दिया।

ख़ामियों से भरपूर जीएसटी को जिस हड़बड़ी में लागू किया गया, उसने निवेशकों में मायूसी भर दी। मोदी सरकार का ताज़ा आर्थिक सर्वेक्षण बता रहा है कि विकास दर 6.5 फ़ीसदी रहने वाली है, जबकि पिछले साल इसके 7.5 फ़ीसदी रहने की बात की गयी थी। हालाँकि, तभी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रमणियन ने कह दिया था कि विकास दर 6.5 फ़ीसदी के आसपास ही रह पाएगी।

सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन तो मीडिया के चरित्र में आया है। ज़्यादातर मीडिया संस्थान सरकार के भोंपू बन गये हैं। टीवी चैनलों की हिम्मत नहीं है कि वो सूरत में प्रदर्शन कर रहे टेक्सटाइल मज़दूरों या मराठाओं की तकलीफ़ के बारे में जनता को बताएँ। यहाँ तक कि मौजूदा मीडिया तो तमिलनाडु के किसानों के दर्द से भी नज़रे फेर लेता है।

राज्यपालों की नियुक्ति के लिए एक ख़ास राजनीतिक विचारधारा के प्रति समर्पण ही अनिवार्य योग्यता बन चुकी है। स्कूलों की पाठ्यपुस्तकों को बदला जा रहा है। सार्वजनिक संस्थाओं पर ऐसे लोगों को मुखिया बनाकर बिठाया जा रहा है जो आज़ादी के आन्दोलन के सितारों की जगह उन लोगों को स्थापित कर रहे हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन का विरोध किया था। मौजूदा राजतंत्र तो बातें महात्मा गाँधी की करता है, लेकिन इसका आचरण उन मूल्यों-सिद्धान्तों के बिल्कुल विपरीत है, जो गाँधी की विरासत है, उनकी पहचान है।

सीबीआई, एनआईए और प्रवर्तन निदेशालय जैसी जाँच एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्ष के दमन के लिए किया जा रहा है। इन संस्थानों की हैसियत बीजेपी के राजनीतिक एजेंडा का हासिल करने के लिए इस्तेमाल होने वाले लठैतों जैसी बना दी गयी है। आज़ादी का संरक्षण करने वाली न्यायपालिका भी सत्ता के कुचक्र में फँसकर बेअसर बनायी जा चुकी है। सचमुच, मेरा भारत बदल चुका है।

(साभार: IndianExpress। लेखक पूर्व केन्द्रीय मंत्री, राज्यसभा सदस्य और काँग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं।)

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