Connect with us

ओपिनियन

मप्र : कांग्रेस की जीत के शिल्पकार अब भी ‘पर्दे के पीछे’

“महान टीम असाधारण परिणाम प्रदान करती है, मैं टीम एआईसीसी, हमारे महासचिव, राज्य-प्रभारी, सचिवों और अन्य सभी असंगत नायकों को धन्यवाद देना चाहता हूं, जिनकी कड़ी मेहनत और समर्पण ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अपनी जीत हासिल की।”

Published

on

Congress Team

मध्य प्रदेश में कांग्रेस की डेढ़ दशक बाद सत्ता में वापसी हुई है। कांग्रेस की जीत के लिए बीते एक साल से जमीनी स्तर पर काम हो रहा था। जिन लोगों ने जमीन पर काम किया और पार्टी की जीत में अहम भूमिका निभाई, वे अब भी पर्दे के पीछे हैं। राज्य के नेता भले ही उनका लोहा न मान रहे हों, मगर पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने जीत के शिल्पकारों का लोहा माना है और सफलता का श्रेय उन्हें यानी पर्दे के पीछे के किरदारों को दिया है।

क्षेत्र कोई भी हो, जब सफलता मिलती है तो उसके कई नायक बन जाते हैं और हार का कोई नायक नहीं होता। मध्य प्रदेश में भी ऐसा ही कुछ हो रहा है। कांग्रेस को सत्ता मिली तो तरह-तरह से जीत के आधार गढ़े जा रहे हैं, श्रेय लेने और देने की होड़ मची है। इस जश्न से अगर कोई दूर है तो वे लोग, जिन्होंने बीते एक साल में राज्य के गांव से लेकर भोपाल तक के बिखरे मोतियों को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश की।

राज्य में कांग्रेस डेढ़ दशक बाद सत्ता में लौटी है, श्रेय लेने की हर तरफ होड़ मची है। कोई किसी को जीत का नायक बता रहा है तो कोई किसी के पीछे खड़ा है। मजे की बाज यह है कि बहुमत न मिल पाने और दिग्गजों की हार पर कोई भी कुछ बोलने को तैयार नहीं है। कांग्रेस को भाजपा से पांच ही सीटें ज्यादा मिली हैं। वहीं वोटों का प्रतिशत भाजपा का कांग्रेस से ज्यादा है।

कांग्रेस को बहुमत दूसरे दलों के सहयोग से हासिल हुआ है, यही कारण है कि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी तंज कसते हुए अपने कार्यकर्ताओं से कह रहे हैं कि “हो सकता है कि पांच साल से पहले ही वे सत्ता में लौट आएं।”

एक तरफ भाजपा जल्दी वापसी की आस रखे हुए है तो दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने ट्वीट पर एक तस्वीर साझा की है और उसमें उनके साथ जीत के किरादार भी हैं।

राहुल ने लिखा है, “महान टीम असाधारण परिणाम प्रदान करती है, मैं टीम एआईसीसी, हमारे महासचिव, राज्य-प्रभारी, सचिवों और अन्य सभी असंगत नायकों को धन्यवाद देना चाहता हूं, जिनकी कड़ी मेहनत और समर्पण ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अपनी जीत हासिल की।”

राहुल ने अपने ट्वीट के साथ तीनों राज्यों से जुड़े नेताओं की तस्वीर साझा की है और अंत में लिखा है- “मैं आपको सलाम करता हूं (आई सैल्यूट यू)।”

राजनीतिक विश्लेषक रवींद्र व्यास का कहना है, “यह बात सही है कि इस बार के चुनाव में कांग्रेस के लिए एक ऐसी टीम काम करती रही, जिसने जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं से लेकर पदाधिकारियों के बीच समन्वय स्थापित किया, यह क्रम लगातार चला। इसका असर यह हुआ कि कार्यकर्ताओं को लगा कि सरकार बनने पर उनकी हैसियत तो बढ़ेगी ही, साथ में राज्य के हालात भी बदलेंगे। राज्य के नेताओं में गुटबाजी होने के बावजूद ‘टीम राहुल’ अपना काम कर गई और राज्य की सत्ता कांग्रेस के हाथ आ गई।”

व्यास कहते हैं, “अभी कांग्रेस को बहुत कुछ करना होगा तभी, उसकी सरकार का रास्ता आसान होने वाला है। आगे लोकसभा चुनाव है, सत्ता में आते ही खींचतान बढ़ेगी यह अंदेशा हर किसी को था और अब वह दिख भी रहा है। नेता श्रेय लेने की होड़ में शामिल हो गए हैं। असली कार्यकर्ता कहीं पीछे छूट गया है, लिहाजा कांग्रेस को उस कार्यकर्ता का मान रखना होगा, जिसने जीत दिलाई। कांग्रेस ने अगर कार्यकर्ता का मान नहीं रखा तो राज्य में लोकसभा चुनाव में बाजी पलट भी सकती है।”

कांग्रेस के लिए सरकार चलना उतना आसान नहीं है, जितना कांग्रेस के नेता समझ रहे हैं। वजह यह है कि विपक्ष मजबूत है, भाजपा आक्रामक हो चली है। दूसरी तरफ , अगर कांग्रेस खेमों में बंटी नजर भी आई तो भाजपा के लिए अपनी पकड़ बनने में और लोकसभा चुनाव में बढ़त बनाए रखने में दिक्कत नहीं आने वाली।

–आईएएनएस

ओपिनियन

बसपा-सपा गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं : शीला दीक्षित

Published

on

By

sheila dikshit-min

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कहना है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं मिल रहे हैं, लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस के परिणाम चौंकाने वाले होंगे।

शीला दीक्षित ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, “उनको एक साथ आने दीजिए। वे मिलते और जुदा होते रहे हैं और फिर साथ आ रहे हैं। मेरा अभिप्राय यह है कि उनमें स्थिरता नहीं है और वे स्थायित्व के संकेत नहीं दे रहे हैं। अब आगे देखते हैं।”

तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं दीक्षित (80) सपा और बसपा गठबंधन को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रही थीं। सपा और बसपा ने कांग्रेस को महागठबंधन से अलग रखते हुए प्रदेश में 80 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए एक गठबंधन किया है। दीक्षित को 10 जनवरी को दिल्ली कांग्रेस की कमान सौंपी गई।

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने से पहले शीला दीक्षित को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था। दीक्षित ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीद क्षीण पड़ गई है।

दीक्षित की टिप्पणी से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेता चुनाव अभियान के दौरान सपा और बसपा को निशाना बनाएंगे, जबकि उनका सीधा मुकाबला सत्ताधारी पार्टी भाजपा से होगा।

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है, लेकिन पार्टी ने भाजपा को शिकस्त देने वाले सेक्यूलर दलों के लिए दरवाजा खुला रखा है।

उत्तर प्रदेश में पार्टी नेता उम्मीदवारों को बता सकते हैं कि कांग्रेस ही नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से बाहर कर सकती है और भाजपा को शिकस्त दे सकती है।

कांग्रेस इस बात पर बल देंगे कि इस चुनाव के नतीजों से प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि देश का प्रधानमंत्री चुना जाएगा।

लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो ही सीटें बचा पाई थीं, जबकि उससे पहले 2009 में पार्टी ने 21 सीटों पर जीत हासिल की थी, जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) दूसरी बार केंद्र की सत्ता को बरकार रख पाई थी।

दीक्षित ने कहा कि उनसे कहा जाएगा तो वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी, लेकिन वह दिल्ली पर अपना अधिक ध्यान केंद्रित करेंगी क्योंकि उनको यहां काफी काम करना है।

उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी को कांग्रेस द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करने का अनुमोदन किया।

उन्होंने कहा, “पार्टी को इस पर फैसला लेने दीजिए। हम चाहते हैं और खासतौर से मैं चाहती हूंं और हमारे बीच अधिकांश लोग चाहते हैं। लेकिन इस पर पूरी पार्टी द्वारा फैसला लिया जाएगा।”

गैर-भाजपा दलों में प्रधानमंत्री का पद विवादास्पद मसला है। राहुल गांधी ने खुद भी कहा कि इसका फैसला चुनाव के बाद लिया जाएगा और पहला काम नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित करना है।

संपूर्ण भारत में महागठबंधन की संभावना पर पूछे जाने पर दीक्षित ने कहा कि लोग इस दिशा में प्रयासरत हैं, लेकिन इस पर अभी पूरी सहमति नहीं बन पाई है।

विपक्षी दलों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में गठबंधन की संभावना कम है, लेकिन भाजपा को शिकस्त देने के लिए राज्य विशेष में गठबंधन होगा।

Continue Reading

ओपिनियन

मोदी राज में लुप्त हुआ संसदीय संवाद

संसद में सार्थक चर्चा नहीं हो रही। प्रक्रिया और परम्परा दम तोड़ चुकी है। नौकरशाही भी दमघोटू हाल में है। लोकतंत्र की लौ फड़फड़ा रही है।

Published

on

Parliament of India
Indian Parliament Picture

देश पर विश्वास के संकट छाया है। संसद रूपी लोकतांत्रिक संस्था का तेज़ी से पतन हो रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच होने वाला सार्थक संवाद नदारद है। विपक्ष का गला घोंटकर सियासी लाभ उठाने के क़ानून बनाये जा रहे हैं। विधेयकों को उन संसदीय समितियों की समीक्षा से बचाया जा रहा है, जो प्रस्तावित क़ानून को कारगर बनाने के लिए सभी पक्षों की राय को समायोजन करती हैं। झूठी वाहवाही बटोरने के लिए मंत्रीगण ग़लत आँकड़ों को परोसते हैं, क्योंकि उन्हें विशेषाधिकार हनन की परवाह नहीं है। अभी जो मंत्री संसद में गतिरोध से आहत होने की दलीलें देते हैं, वहीं जब विपक्ष में थे तो उनकी दलील होती थी कि गतिरोध भी संसदीय रणनीति का हिस्सा है। सरकार हमारे विरोध को भले ही ढोंग बताये, हमें श्रेय नहीं दे, लेकिन हम वही कर रहे हैं, जो हमारा दायित्व है। सरकार के ऐसे रवैये की वजह से ही संसद पर जनता का भरोसा न्यूनतम स्तर पर जा पहुँचा है।

वो दिन लद गये जब जजों के पास मुक़दमों के लिए इत्मिनान भरा वक़्त होता था। मुक़दमों का अम्बार है। न्यायतंत्र चरमरा चुका है। लेकिन कसूर जजों का नहीं है। न्यायालयों की गरिमा तार-तार हो चुकी है। अदालतों को बाहरी दख़ल से सुरक्षित होना चाहिए। लेकिन पूर्व प्रधान न्यायाधीश जैसे उच्च पद पर बैठे व्यक्ति पर ही ‘मास्टर ऑफ़ रोस्टर’ के अधिकार के दुरुपयोग का आरोप लगा। लेकिन कोई सच्चाई की तह तक नहीं जाना चाहता। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार उसके चार वरिष्ठतम जजों को अपने अन्तःकरण की आवाज़ का ख़ुलासा प्रेस कॉन्फ़्रेंस में करना पड़ा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र ख़तरे में है। अदालतों के बाहर घड़ल्ले से ऐसी हरक़तें हो रही हैं, जिससे न्यायिक फ़ैसलों को प्रभावित किया जा सके। न्यायिक फ़ैसलों में समानता वाली परम्परा को अनोखे तर्कों के सहारे ध्वस्त किया जा रहा है।

अदालतें बेहद उदारता से सील-बन्द लिफ़ाफ़ों में मिली सरकारी दलीलें स्वीकार कर रही हैं, ताकि दूसरे पक्ष उसे चुनौती भी नहीं दे सकें। ऐसी बोझिल प्रक्रिया से न्यायिक आदेश का प्रभावित होना लाज़िमी है। घपलों-घोटालों से जुड़े काग़ज़ातों पर कोर्ट ग़ौर तक नहीं कर रही। जज लोया मामले की कार्यवाही, राफ़ेल सौदे में जाँच को नकारना और सीबीआई निदेशक के तबादले से जुड़े प्रसंगों से साफ़ है कि देश को झकझोरने वाले मुद्दों के प्रति न्याय-तंत्र का रवैया भी सवालों के घेरे में है। दुहाई तो क़ानून की दी जाती है, लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मोर्चे पर सारे वादे पीछे छूट जाते हैं। अलग-अलग बेंच में संवैधानिक पीठ के जजों के फ़ैसले भी बदल जाते हैं। इसीलिए जनता के बढ़ते मोहभंग के प्रति न्यायपालिका को ख़ासतौर पर सचेत रहने की ज़रूरत है।

संसद में हासिल पूर्ण बहुमत का सही इस्तेमाल जटिल जनसमस्याओं को लोकतांत्रिक ढंग से निपटाने के लिए होना चाहिए। लेकिन ये तभी मुमकिन है, जब सबको साथ लेकर चलने की भावना से काम किया जाए। सरकार को सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का ज़रिया बनना चाहिए, लेकिन वो मतभेद के स्वरों को दबाने में जुटी हुई है। इन सन्दर्भों में देखें तो हमारी संस्थाओं पर भारी संकट गहराया हुआ है, कुछेक तो बन्धक बन चुकी हैं। कई संस्थाएँ तो सिर्फ़ आपने आकाओं की जी-हुज़ूरी कर रही हैं। सीबीआई, ईडी, एनआईए और सीबीडीटी यानी केन्द्रीय जाँच ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी और केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड जैसी संस्थाओं से जुड़ा ताज़ा घटनाक्रम इन्हीं बातों का साबित करता है। ये संस्थाएँ आज क़ानून को सर्वोपरि बनाये रखने के लिए काम नहीं कर रहीं, बल्कि वो अक्सर इसे तबाह करती नज़र आती हैं। इसीलिए संस्थाओं में कलह बढ़ रहा है। वो शर्मसार हो रही हैं। जो पतन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है, उसे निकाल बाहर किया जा रहा है। जिनका काम क़ानून को सर्वोपरि बनाना है, वो बौने साबित हो रहे हैं। यदि जाँच एजेंसियाँ दाग़दार होंगी तो अदालती फ़ैसले भी वैसे ही होंगे। पक्षपात और दुर्भावनापूर्ण जाँच से अन्याय और आक्रोश पैदा होता है। तब जनता सड़कों पर उतरने के लिए मज़बूर होती है।

नौकरशाही का दम घुट रहा है। निष्कलंक निष्ठा वाले अफ़सरों का सताया जा रहा है। क्योंकि उनके पुराने बॉस मौजूदा सत्ता की आँखों में खटक रहे हैं। इसने कार्यपालिका में उदासी भरी थकान भर दी है। चहेते अफ़सर अपने आकाओं के इशारों पर नाच रहे हैं। बाक़ी उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। प्रशासन इसी का नतीज़ा भुगत रहा है, योजनाओं में देरी हो रही है और आर्थिक विकास सुस्त पड़ा हुआ है। विकास दर में शिथिलता की वजह से स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे उन दो बुनियादी क्षेत्रों के लिए संसाधन नहीं जुटा पा रही, जो सामाजिक बदलाव के सबसे अहम तत्व हैं। हमने देखा है कि भ्रष्टाचार के आरोपी अफ़सरों का गुस्सा कैसे मासूम लोगों पर फूट रहा है! ऐसे वातावरण की वजह से अफ़सरों का सारा ज़ोर सत्ता के प्रति वफ़ादार रहने का बन जाता है, जबकि उनसे भय और पक्षपात से मुक्त रहकर काम करना चाहिए।

संचार क्रान्ति ने नये तरह के दमन को बढ़ाया है। झूठ और अफ़वाह के ज़रिये लोगों के दिमाग़ में ज़हर भरा जा रहा है। ख़ासकर, इलेक्ट्रानिक मीडिया और काफ़ी हद्द तक प्रिंट मीडिया भी उन उद्योगों की मुट्ठी में है, जो अर्थव्यवस्था में भारी दबदबा रखते हैं। बड़े-बड़े मीडिया मालिक, सरकार की मदद से अपने कॉरपोरेट को चमकाने के लिए पत्रकारीय उसूलों से समझौता कर रहे हैं। मीडिया के ऐसे समझौते से लोकतंत्र का पतन निश्चित है।

चौतरफ़ा संकट वाले मौजूदा माहौल में उम्मीद की किरण सिर्फ़ यही है कि 2019 में भारत की जनता इसे पहचाने और इससे लोहा ले। सिर्फ़ जनता ही लोकतंत्र को बचा सकती है। वो चुनौतियों से कैसे निपटेगी, ये तो वक़्त ही बताएगा। लेकिन यदि वो नहीं चेती तो लोकतंत्र की फड़फड़ाती लौ को असहिष्णुता की तेज़ हवाएँ बुझा देंगी।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)

(साभार:इंडियन एक्सप्रेस)

Continue Reading

ओपिनियन

अयोध्या: कोर्ट की अवमानना वाले बयान नहीं, बल्कि फ़ैसले का इन्तज़ार होना चाहिए

ताज़्ज़ुब की बात है कि क़ानून मंत्री और केन्द्र तथा बीजेपी शासित राज्यों की सरकारों में बैठे गणमान्य लोग, सार्वजनिक तौर पर ऐसे बयान देते रहे हैं, जिनसे साफ़ तौर पर कोर्ट के इन आदेश की अनदेखी होती है। ये सीधे-सीधे अदालत की अवमानना है।

Published

on

Ayodhya Verdict Supreme Court

अयोध्या विवाद से जुड़े ज़मीन के मालिकाना हक़ वाले मुकदमें में आगे की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट इसी महीने अपनी खंडपीठ (बेंच) गठित करने वाला है। फिर बेंच, सुनवाई का कार्यक्रम तय करेगी। लेकिन इसी वक़्त सोची-समझी साज़िश के तहत ऐसे बयानों की झड़ी लग गयी है, जिसने माहौल को प्रदूषित कर दिया है। कुछेक बयान तो ऐसे हैं जो साफ़ तौर पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना हैं। जबकि बाक़ी का मकसद ऐसे माहौल को गरमाना है कि मन्दिर का निर्माण फ़ौरन शुरू होना चाहिए।

28 नवम्बर 2018 तो संघ के वरिष्ठ नेता इन्द्रेश कुमार ने धमकी दी कि ‘दो-तीन’ जजों की वजह से देश अपाहिज़ नहीं बन सकता या अदालत हमारी आस्था का दमन करके राम मन्दिर के निर्माण में देर कर रही है। इससे ऐसा लगा कि संघ को अब मन्दिर निर्माण में ज़रा सी भी देरी बर्दाश्त नहीं है। इसके लिए उसे सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की कोई परवाह नहीं है।

इन्द्रेश ने आगे कहा कि ‘भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) ने मामले की सुनवाई को जनवरी तक खिसकाकर इंसाफ़ में ‘देरी करने, इसे नकारने और इसका अनादर करने’ का काम किया है। इससे जनता की भावनाओं को चोट पहुँच रही है। इसीलिए यदि तीनों जज फ़ैसला नहीं सुनाना चाहते तो फिर उन्हें सोचना चाहिए कि वो जज बने रहेंगे या इस्तीफ़ा देंगे।’ इन्द्रेश कुमार के बयान से ऐसा लग रहा है कि अदालती फ़ैसला सुनाने का मतलब ये है कि संघ चाहता है कि फ़ैसला उसकी ख़्वाहिश के मुताबिक़ ही होना चाहिए।

अयोध्या का विवादित परिसर क़िले में बदल दिया गया। क्योंकि वहाँ शिवसेना, शक्ति प्रदर्शन करके बीजेपी पर हमला करना चाहती थी कि उसने मन्दिर निर्माण को लेकर अपना वादा नहीं निभाया। दिसम्बर में संघ और वीएचपी की ओर से दिल्ली के राम लीला मैदान में एक महारैली की गयी। दावा था कि रैली में 8 लाख लोग जुटेंगे। लेकिन संख्या कुछेक हज़ार को भी पार नहीं कर सकी। इस रैली का दो मकसद था। पहला, सुप्रीम कोर्ट को धमकी भरा सन्देश देना और दूसरा, लोकसभा चुनाव 2019 से ऐन पहले धार्मिक ध्रुवीकरण के माहौल को गरमाना। इसके अलावा ये धमकियाँ भी दी गयीं कि सरकार, अदालत के आगे लाचार नहीं दिख सकती। उसे मामले में दख़ल देना चाहिए और अध्यादेश लाकर न्याय करना चाहिए।

26 नवम्बर 2018 को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का बयान था कि सत्तारूढ़ दल का मानना है कि अयोध्या में राम मन्दिर ज़रूर बनना चाहिए क्योंकि वो भगवान राम की जन्मस्थली है। उन्होंने आगे कहा कि ‘मुझे लगता है कि फ़ैसला हमारे पक्ष में होगा।’ इससे पहले 19 दिसम्बर को अमित शाह ने एक उत्तेजक बयान दिया कि ‘फ़ैसला जल्दी आना चाहिए… इसका लोगों के बहुत महत्व है… इससे देश भर के लोगों की भावनाएँ जुड़ी हुई हैं।’

मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी 24 दिसम्बर को उनकी बात में ही सुर से सुर मिलाया। उन्होंने कहा कि ‘हमारी इच्छा है कि मामले की रोज़ाना सुनवाई होनी चाहिए ताकि जल्दी फ़ैसला आ सके।’ इसी दिन रविशंकर प्रसाद ने कहा कि ‘क़ानून मंत्री के नाते नहीं, बल्कि एक नागरिक के नाते मेरी सुप्रीम कोर्ट से अपील है कि मामले की सुनवाई, फ़ास्ट-ट्रैक की तरह होनी चाहिए।’ इसी तरह, बीजेपी के महासचिव राम माधव ने कहा कि यदि मामले की सुनवाई फ़ास्ट-ट्रैक में नहीं हो सकती तो अन्य विकल्पों को आज़माना चाहिए।

ऐसे तमाम बयानों का मकसद जन भावनाओं को उकसाने के अलावा कोर्ट को ये धमकी देना भी है कि यदि मामले की फ़ौरन सुनवाई नहीं हुई तो अन्य विकल्प आज़माये जाएँगे। इससे ये साबित होता है कि क़ानूनी प्रक्रिया में दख़ल देने की कोशिश की जा रही है। इसी प्रसंग में जब अदालत को ये सुझाव दिया गया कि सुनवाई 2019 के चुनाव के बाद होनी चाहिए तो बीजेपी ने आरोप लगाया था कि वकील, कोर्ट को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। अब बीते महीनों में जिस तरह से बयानों की झड़ी लगी है, क्या उसका मकसद अदालत को प्रभावित करना नहीं है? ज़ाहिर है, दो-मुँही बातों की अति हो गयी है।

अब जिस बेहूदा ढंग से अदालत पर दबाव बनाया जा रहा है, वो किसी भी लिहाज़ से अदालत की अवमानना से कम नहीं है। ऐसे बयान देने वालों को पता होना चाहिए कि इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 20 अगस्त 2002 को जो फ़ैसला सुनाया था, उसमें 17 फरवरी 2003 में संशोधन करके ये जोड़ा गया कि अदालत की कार्यवाही को लेकर मीडिया अपना नज़रिया नहीं ज़ाहिर कर सकती। इसमें किसी भी व्यक्ति, दल और उसके वकील की निजी राय भी शामिल होगी। इतना ही नहीं, 30 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने भी आदेश दिया कि मुकदमें के निपटारे तक हाईकोर्ट का अन्तरिम आदेश लागू रहेगा।

ताज़्ज़ुब की बात है कि क़ानून मंत्री और केन्द्र तथा बीजेपी शासित राज्यों की सरकारों में बैठे गणमान्य लोग, सार्वजनिक तौर पर ऐसे बयान देते रहे हैं, जिनसे साफ़ तौर पर कोर्ट के इन आदेश की अनदेखी होती है। ये सीधे-सीधे अदालत की अवमानना है।

सुप्रीम कोर्ट को भी अच्छी तरह से पता है कि उसका फ़ैसला जो भी हो, लेकिन उसका भारत के भविष्य पर बहुत गम्भीर असर पड़ेगा। इसीलिए जन भावनाओं को भड़काकर ऐसा माहौल नहीं बनाया जाना चाहिए जिससे हमारे लोकतंत्र की बुनियाद पर ही ख़तरा मँडराने लगे। अदालत में ये कहना कि मामला विवादित ‘ज़मीन के मालिकाना हक़’ का है। लेकिन अदालत से बाहर इसे आस्था के ऐसे स्वरूप में पेश करना जिससे लगे कि यदि अमुक फ़ैसला नहीं हुआ तो कोर्ट का सारी क़वायद ही फ़िज़ूल है।

मन्दिर को लेकर आने वाले उत्तेजक बयानों से साफ़ है कि ये लोग, न्याय की गरिमा और क़ानून के राज के प्रति कैसा आदर भाव रखते हैं? ये राजनीति को क़ानून से ऊपर समझने की मानसिकता है। ये ऐसे ही नेता हैं।

The writer is a former Union minister and senior Congress leader. (DISCLAIMER : Views expressed above are the author’s own.)

Continue Reading
Advertisement
sheila dikshit-min
ओपिनियन1 hour ago

बसपा-सपा गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं : शीला दीक्षित

CBI
टेक1 hour ago

सीबीआई ने साई निदेशक सहित 6 लोगों को किया गिरफ्तार

Students School Bags
शहर2 hours ago

अधिकारी, नेता अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाएं : सत्यपाल सिंह

khichdi
ज़रा हटके2 hours ago

बीरबल की खिचड़ी पकी, लोगों ने उठाया लुत्फ

akhilesh yadav
राजनीति2 hours ago

सपा-बसपा गठबंधन से भाजपा का हिसाब गड़बड़ाया : अखिलेश

income tax
शहर2 hours ago

उत्तर प्रदेश : लखनऊ-कानपुर समेत 6 जिलों के अस्पतालों में आयकर छापा

Nitish Modi
राजनीति2 hours ago

मोदी दोबारा बनेंगे प्रधानमंत्री : नीतीश

Tejashwi Yadav
राजनीति3 hours ago

मोदी झूठ बोलने की फैक्ट्री ही नहीं, डिस्ट्रीब्यूटर भी : तेजस्वी

shot dead
शहर3 hours ago

मध्य प्रदेश : मंदसौर में भाजपा नेता की गोली मारकर हत्या, हंगामा

ram rahim
राष्ट्रीय6 hours ago

गुरमीत राम रहीम को पत्रकार हत्या मामले में उम्रकैद

rahul gandhi
राजनीति3 weeks ago

‘फोटो खिंचवाने के बजाय खनिकों को बचायें मोदी’

Abhishek-Manu-Singhvi
राजनीति2 weeks ago

जेटली बने राफेल डिफेंसिव मिनिस्‍टर, 72% बढ़े बैंक फ्रॉड: सिंघवी

kapil sibal
राष्ट्रीय2 weeks ago

CBDT सर्कुलर ने नेशनल हेराल्ड मामले में सरकार को किया बेनकाब : कपिल सिब्बल

heart
लाइफस्टाइल3 weeks ago

सर्दियों में ऐसे रखें अपने दिल का ख्याल

Kader-Khan-Twitter
मनोरंजन2 weeks ago

काबुल से कनाडा तक ऐसा रहा कादर खान का सफरनामा…

Communal Violence
ब्लॉग3 weeks ago

चुनाव को सामने देख उत्तर प्रदेश में निकल पड़ा ब्रह्मास्त्र!

टेक3 weeks ago

नया आईफोन अमेरिका में ज्यादा एंड्रायड यूजर्स को लुभा रही

rahul-gandhi-pti
ब्लॉग3 weeks ago

राहुल प्रभावी प्रचारक, रणनीतिकार के तौर पर उभरे – 2018 in Retrospect

real-estate
ब्लॉग3 weeks ago

सस्ते मकानों की बिक्री से रियल स्टेट में आया सुधार – 2018 in Retrospect

health Issue
Viral सच1 week ago

जहां 40 की उम्र में आता है बुढ़ापा

Priya Prakash
मनोरंजन2 days ago

प्रिया प्रकाश की फिल्म ‘श्रीदेवी बंग्लो’ का टीजर जारी

Makar Sankranti 2019
राष्ट्रीय3 days ago

कुंभ में पहला शाही स्नान शुरू

Game of Thrones
मनोरंजन3 days ago

Game of Thrones सीजन 8 का टीजर जारी

BIHAR
शहर5 days ago

वीडियो: देखें, बिहार में रंगदारों का आतंक

Ranveer Singh-
मनोरंजन1 week ago

रणवीर की फिल्म ‘गली बॉय’ का ट्रेलर’ रिलीज

Nageshwar Rao
राष्ट्रीय2 weeks ago

आंध्र यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर बोले- टेस्ट ट्यूब बेबी थे कौरव

Vikram Saini
राजनीति2 weeks ago

बीजेपी विधायक बोले- ‘असुरक्षित महसूस करने वालों को बम से उड़ा दूंगा’

Ranveer Singh-
मनोरंजन2 weeks ago

फिल्म ‘गली बॉय’ का फर्स्ट लुक जारी

Gazipur Cops Killed
राष्ट्रीय3 weeks ago

पीएम मोदी की जनसभा से लौट रहे भाजपा समर्थकों की गाड़ियों पर पथराव, कॉन्स्टेबल की मौत

isis
शहर3 weeks ago

श्रीनगर की मस्जिद में लहराया ISIS का झंडा

Most Popular