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मॉनसून में फंगल इंफेक्शन से खुद को इस तरह रखें सुरक्षित…

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मॉनसून न केवल भीषण गर्मी बल्कि गर्मी से होने वाली बहुत सी बीमारियों से भी हमें राहत दिलाता है, लेकिन बारिश का यह मौसम अपने साथ कई स्वास्थ्य व त्वचा से जुड़ी समस्याएं भी लेकर आता है।

त्वचा पर लाल चकत्ते, मुंहासे, उलझे चिपचिपे बाल जैसी दिक्कतों के साथ एक दिक्कत और आती है और वह है ‘फंगल संक्रमण’। मानसून की शुरुआत के बाद फंगल संक्रमण के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। फंगस पैदा करने वाले जीवाणु आमतौर पर मानसून के दौरान कई गुना तेजी से फैलते हैं।

यह सामान्य तौर पर शरीर के नजर अंदाज किए गए अंगों जैसे की पैर की उंगलियों के पोरों पर, उनके बीच के स्थानों पर या उन जगहों पर जहां जीवाणु या कवक का संक्रमण बहुत अधिक तेजी से होता है, वहां फैलते हैं। अक्सर मॉनसून के दौरान लोग हल्की बूंदा-बांदी में भीगने के बाद अपनी त्वचा को अनदेखा कर देते हैं।

लेकिन यही छोटी सी असावधानी कई बार फंगस से संक्रमित होने का कारण बन जाती है। फंगल संक्रमण से बचने के लिए यह बहुत आवश्यक है कि आप इस बात का ध्यान अवश्य रखें कि त्वचा ज्यादा देर तक गीली नहीं रहे। यह समस्या जुलाई और अगस्त के महीने के दौरान काफी बढ़ जाती है।

स्कैल्प में होने वाले फंगल संक्रमण के लक्षण सामान्य फंगल संक्रमण से अलग होते हैं। ये स्कैल्प पर छोट-छोटे फोड़ों, दानों या चिपचिपी परत के रूप में दिखाई देता है। आपको ऐसा कोई लक्षण नजर आए तो फौरन ही विशेषज्ञ की मदद लें अन्यथा वक्त पर इलाज नहीं करने पर यह आपके बाल झड़ने का बड़ा कारण बन सकता है ।

सर गंगाराम अस्पताल के त्वचा विशेषज्ञ डॉ. रोहित बत्रा का कहना है, “इस समस्या से बचने के लिए खुद को साफ और सूखा रखना आवश्यक है। इसके साथ ही एंटीबैक्टीरियल साबुन के प्रयोग से भी आप खुद को फंगस से संक्रमित होने से बचा सकते हैं। इसके अलावा अपने कपड़ों को नियमित रूप से धोएं।

बरसात में अगर आपके कपड़ों में कीचड़ आदि लग जाए तो उसे फौरन धो लें। इससे फंगल संक्रमण से बचाव में मदद मिलेगी। रोहित बात्रा का कहना है कि पिछले एक महीने में फंगल संक्रमण के बहुत से मामले देखने को मिले हैं। ऐसे में आपका सतर्क रहना बहुत ही जरूरी हैं।

अगर आपको आपकी त्वचा में कुछ भी अजीब नजर आए तो फौरन किसी अच्छे त्वचा विशेषज्ञ से संपर्क करें, क्योंकि मॉनसून के दौरान त्वचा से संबंधित बहुत सी समस्याओं का जन्म होता है। विशेषज्ञ की राय लें, जिससे फंगल संक्रमण से आप पूरी तरह से मुक्त हो सकें।

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गलत मुद्रा में बैठना शरीर के निचले हिस्से के लिए हानिकारक

“शरीर को सीधा रखने के लिए बहुत सारी मांसपेशियों की ताकत की आवश्यकता होती है। लंबे समय तक खड़े रहने से पैरों में रक्त की मात्रा बढ़ जाती है और रक्त के प्रवाह में रुकावट आती है। इससे थकान, पीठ और गर्दन की मांसपेशियों में दर्द की शुरुआत हो सकती है।”

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Sitting Wrong Posture

नई दिल्ली, 15 सितम्बर | दफ्तर में कामकाज के दौरान गलत मुद्रा में लगातार चार-पांच घंटे तक बैठे रहने से कमर दर्द की शिकायत हो सकती है। बैठे रहना संभवत: नया धूम्रपान है और पीठ दर्द नवीनतम जीवनशैली का विकार है। बैठने की मुद्रा और शारीरिक गतिविधि पर पर्याप्त ध्यान देना आवश्यक है। हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया (एचसीएफआई) के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल का मानना है कि आज लगभग 20 प्रतिशत युवाओं को 16 से 34 साल आयु वर्ग में ही पीठ और रीढ़ की हड्डी की समस्याएं हो रही हैं।

डॉ. अग्रवाल ने यहां जारी एक बयान में कहा है, “एक ही स्थिति में लंबे समय तक बैठने से पीठ की मांसपेशियों और रीढ़ की हड्डी पर भारी दबाव पड़ सकता है। इसके अलावा, टेढ़े होकर बैठने से रीढ़ की हड्डी के जोड़ खराब हो सकते हैं और रीढ़ की हड्डी की डिस्क पीठ और गर्दन में दर्द का कारण बन सकती है। लंबे समय तक खड़े रहने से भी स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है।”

उन्होंने कहा, “शरीर को सीधा रखने के लिए बहुत सारी मांसपेशियों की ताकत की आवश्यकता होती है। लंबे समय तक खड़े रहने से पैरों में रक्त की मात्रा बढ़ जाती है और रक्त के प्रवाह में रुकावट आती है। इससे थकान, पीठ और गर्दन की मांसपेशियों में दर्द की शुरुआत हो सकती है।”

पीठ और रीढ़ की हड्डी की समस्याओं के लक्षणों में वजन घटना, शरीर के तापमान में वृद्धि (बुखार), पीठ में सूजन, पैर के नीचे और घुटनों में दर्द, मूत्र असंतुलन, मूत्र त्यागने में कठिनाई और जननांगों की त्वचा का सुन्न पड़ जाना शामिल है।

डॉ. अग्रवाल ने बताया, “योग पुरानी पीठ दर्द के लिए एक सुरक्षित और प्रभावी उपाय है, क्योंकि यह कार्यात्मक विकलांगता को कम करता है। यह इस स्थिति के साथ गंभीर दर्द को कम करने में भी प्रभावी है। यदि आप सुबह उठते हैं या कुछ घंटे के लिए अपनी डेस्क पर बैठे होने पर थकान या दर्द का अनुभव करते हैं, तो यह संकेत हो सकता है कि आपकी मुद्रा सही नहीं है।”

–आईएएनएस

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ऑफिस को इस तरह बनाएं रचनात्मक…

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प्रतीकात्मक तस्वीर

ऑफिस ऐसी जगह है जहां आप भले ही दिन का एक तिहाई वक्त बिताते हों, पर यह वह समय होता है, जब दिमाग ज्यादा सक्रिय रहता है और इसी वजह से यह दिनभर का सबसे प्रोडक्टिव समय भी माना जाता है।

ऐसे में ऑफिस का इंटीरियर ऐसा होना चाहिए कि कर्मचारियों की प्रोडक्टिविटी बढ़ाने में मदद करे।

लाइट का संतुलन : लाइट कर्मचारियों के मूड पर सबसे अधिक प्रभाव डालती है। इसलिए इसका खास ध्यान रखा जाना चाहिए। डेस्क के पास लाइट 300-400 लक्स की होनी चाहिए और अगर एलईडी लाइट लगी हो तो और भी बेहतर होता है।

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लाइटिंग के दौरान अधिक फोकस चमक और विजन पर होना जरूरी है, इससे कर्मचारियों को आंखों में जलन भी नहीं होती और बिना आंखों पर जोर डाले वह ज्यादा काम कर पाते हैं। लाइट को इस तरह प्लान करके भी लगाना चाहिए कि वह बाहर से आने वाली गर्मी और रोशनी का भी संतुलन बनाने में सक्षम हों।

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स्वच्छ फर्श : ऑफिस का फर्श साफ और सुरक्षित होना चाहिए। फर्श को ज्यादातर कड़क और नरम फर्श में बांटा जाता है। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि फर्श थर्मल प्रतिरोधी व ज्वलनशील हो, साथ ही फर्श ऑफिस में होने वाले शोर को भी सोख लेने में सक्षम हो ताकि काम ज्यादा बेहतर तरीके से हो सके। इसके अलावा इसे साफ करना आसान हो और पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए, फर्श में कम कार्बन फुटप्रिंट होना चाहिए।

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रंगों का सही मिश्रण : रंग न केवल मूड पर प्रभाव डालते हैं, बल्कि ऑफिस के माहौल, मौसम के असर, प्रोडक्टिविटी और व्यवहार पर भी कारगर होता है। ऑफिस के लिए हमेशा हल्के रंग जैसे नीला, सफेद, हल्का हरा, हल्का पीला आदि इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

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आरामदायक फर्नीचर : एर्गोनोमिक फर्नीचर (कार्यस्थल के लिया बनाया गया खास फर्नीचर) को हमेशा प्राथमिकता देनी चाहिए। काम करने वाली टेबल का साइज पर्याप्त होना चाहिए, कंप्यूटर, स्टेशनरी आदि आने के बाद भी कुछ जगह खाली होनी चाहिए। 4 फीट बाय 2 फीट की टेबल प्रोडक्टिविटी को बढ़ाने के लिए सबसे उचित मानी जाती है।

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चलने की जगह : ऑफिस के अंदर चलने और खड़े होने के लिए खुली जगह होना बहुत जरूरी है। कोरिडोर, बालकनी, और बाकी खुली जगह का साइज पर्याप्त होना जरूरी है। कोरिडोर और खुली जगह इस तरह की हो कि वहां से वेंटिलेशन सही होने के साथ ज्यादा भीड़ या आपातकाल के समय में कोई दिक्कत न उत्पन्न हो। खुली जगह ऑफिस को सुंदर और मजेदार भी बनती है, जो प्रोडक्टिविटी पर सीधा असर डालती है।

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घर के किचन में मौजूद ये चीज हमेशा रखेगी जवां

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प्रतीकात्मक फोटो

काम के प्रेशर के चलते और बदलते खानपान से आजकल इंसान समय से पहले बूढ़ा हो जाता है। इसलिए जवा दिखने के लिए लोग बॉडी मसाज से लेकर अलग-अलग थैरेपी लेते हैं। महिलाएं सुंदर दिखने के लिए हर महीने पार्लर पर जाकर पैसे खर्च करती है। बुढ़ापे में हमारे शरीर में शारीरिक कमजोरी आ जाती है, और चेहरे पर झुर्रियां पड़ जाती हैं।

लेकिन बहुत से ऐसे लोग होते हैं, जो बुढ़ापे में भी जवानों की तरह दिखते हैं। उनकी सेहत का कुछ राज होता है। दोस्तों आज हम आपको एक ऐसी चीज के बारे में बताने जा रहे हैं। जिसका रोज सेवन करने से आप बुढ़ापे तक जवान रह सकते हैं। बुढ़ापे तक जवान रहने के लिए पिस्ते का सेवन बहुत ही उपयोगी होता है, लेकिन यह थोड़ा महंगा होता है, इसलिए हर कोई इसका सेवन नहीं कर सकता है।

इसके अलावा अजवाइन भी शरीर को स्वस्थ और ताकतवर बनाए रखने के लिए काफी लाभदायक होती है। नियमित रूप से रोज शाम 10 ग्राम अजवाइन का सेवन करने से त्वचा ग्लोइंग बनी रहती है, तथा चेहरे पर झुर्रियां भी नहीं पड़ती। रोज अजवाइन खाने से शरीर में बीमारियां भी नहीं होती हैं। किडनी और पेट संबंधी बीमारियों में अजवाइन बहुत ही लाभदायक होती है।

यह शरीर के रक्त के प्रवाह को भी सुचारू तरीके से संचार करने में मददगार होती है। इसके लिए अजवाइन को पीसकर उसका पाउडर बना लें। रोज शाम सोने से पहले 10 ग्राम अजवाइन पाउडर में थोड़ा सा काला नमक मिलाकर उसका पानी के साथ सेवन करें। ऐसा नियमित रूप से करने से आप बुढ़ापे तक जवा रह सकती हैं।

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