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व्यंग्य

व्यंग्य: कैबिनेट की बैठक में मोदी ने अपने मंत्रियों को दिया अलौकिक तत्व ज्ञान…!

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रेखांकन साभार: सी एस सुकुमार

केन्द्रीय कैबिनेट की पिछली बैठक में जब सारे मंत्री नोटबन्दी से पैदा हुआ हालात पर अपना सिर धुन रहे थे, तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने सभी साथियों को अलौकिक ज्ञान का पाठ पढ़ाया। उन्होंने कहा:

मित्रों, क्या आपको पता है कि शोरूम और गोदाम में क्या फ़र्क होता है? शायद, आप जानते होंगे। लेकिन मैं आपको नयी बात बताता हूँ। शोरूम, महिलाओं के ब्रा की तरह है जबकि गोदाम, पैंटी में क़ैद रहता है। पहली जगह सिर्फ़ आकर्षण और तैयारियों के लिए है जबकि असली सौदा दूसरी जगह होता है।

मित्रों, शादी के बाद जैसे ही मुझे ये गूढ़ रहस्य समझ में आया मैंने जशोदा बेन को छोड़ दिया। क्योंकि मेरा यक़ीन सिर्फ़ शोरूम में रहता है। गोदाम का बोझ मैं कभी नहीं उठाना चाहता। आज भी यही हाल है। आप मेरे किसी भी काम को इस उदाहरण में फिट पाएँगे। चाहे वो पड़ोसी देशों से सम्बन्ध हो या आतंकवादियों पर सर्ज़िकल हमला या कालाधन के नाम पर की गयी नोटबन्दी! मेरे हरेक क्रियाकलाप में आपको शोरूम की गतिविधियों का ही अहसास होगा। मेरे कर्मों में आपको गोदाम की हरकतें ढूँढ़ने से भी नहीं मिलेंगी, क्योंकि उनका वजूद ही नहीं होता!

मित्रों, आप अच्छी तरह जानते हैं कि देश की जनता 2014 में नये ब्रा की ओर किस क़दर आकर्षित हुई थी। लम्बे अरसे से पुरानी ब्रा के इस्तेमाल से वो बोर हो चुकी थी। मैंने उसे मुफ़्त में नयी और फ़ैन्सी ब्रा देने का सपना दिखाया। जनता मेरे झाँसे में आ गयी। अब मैं पाँच साल तक नये ब्रा के मज़े लूँगा।

मित्रों, मैं जानता हूँ कि जनता को जब गोदाम की ख़्वाहिश होगी तो उसे काँग्रेस के पास ही जाना होगा, क्योंकि अच्छा-बुरा जैसा भी वो गोदाम के संचालन का गुरुमंत्र और सलीक़ा सिर्फ़ काँग्रेस को ही आता है। मुझे यदि गोदाम चलाने का हुनर आता होता तो मैंने जशोदा बेन को ही क्यों छोड़ा होता! मज़े की बात ये भी अविवाहित रहे वाजपेयी जी भी गोदाम के संचालन में अनाड़ी थे। यही हाल संघ के सैंकड़ों नेताओं का भी रहा है और यहाँ तक कि आज भी है।

मित्रों, अपने शोरूम के कुशल संचालन से काँग्रेस जब-जब भटकी है, तब-तब देश को गोदाम के सुख से वंचित होना पड़ा है! इसकी एक और वजह ये है कि बीजेपी मूलत: उन रेडियोलॉज़िस्ट और पैथोलॉज़िस्ट की तरह है, जो रोग को पहचानने में तो मददगार हो सकते हैं लेकिन मरीज़ का इलाज़ कर पाना उनके बूते का होता नहीं! जबकि काँग्रेस को कुशल सर्ज़न और फ़िज़िशियन की तरह मरीज़ का उपचार करने में महारथ हासिल है। उसके पास 60 साल का लम्बा अनुभव भी है। देश को उस पर पर्याप्त भरोसा भी रहा है और भविष्य में देश को उसके पास ही जाना होगा!

कैबिनेट में मोदी जी के इस तत्व ज्ञान पर बाद सन्नाटा छा गया! सभी को राजनीति का गूढ़ मंत्र समझ में आ चुका था! अब सभी जल्द से 2019 के आने और सत्ता से विदा लेने की बाट जोह रहे हैं!

ओपिनियन

बधाई हो! भीड़-तंत्र ने भारत को अब भीड़-युग में पहुँचा दिया!

अब तो भीड़, पुलिस को भी पीट डालती है। क़ानून को हाथ में लेने वालों का पुलिस-अदालत कुछ नहीं बिगाड़ पाती। यही आलम दंगाइयों का भी होता है। उनके चेहरे पर भी भीड़ का मुखौटा ही होता है।

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ये विरोधी दल के किसी नेता या अवार्ड वापसी गैंग का नहीं, बल्कि माननीय सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया है कि ‘भारत में भीड़-तंत्र की इजाज़त नहीं दी सकती। नया क़ायदा नहीं बन सकता कि भीड़ ही सड़कों पर इंसाफ़ करने लगे। कोई भी क़ानून हाथ में नहीं ले सकता। भय, अराजकता और हिंसा फ़ैलाने वालों को सख़्ती से रोकना पुलिस और राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है। राज्यों को भीड़-तंत्र के पीड़ितों के लिए महीने भर में मुआवज़ा नीति बनानी होगी। भीड़-तंत्र की रोकथाम करने में विफल रहे पुलिस अफ़सरों के ख़िलाफ़ विभागीय कार्रवाई के अलावा सीधा ज़ुर्माना भी ठोंका जाएगा। भीड़ की अराजकता से जुड़े मामलों में अदालतों को रोज़ाना सुनवाई करके छह महीने में अपराधियों को अधिक से अधिक सज़ा देनी होगी। यही नहीं, भीड़-तंत्र यानी Mobocracy के ख़िलाफ़ संसद को भी सख़्त क़ानून बनाना चाहिए।’

यदि आप भीड़-तंत्र को भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक मानते हैं तो शायद आपको सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा फ़ैसले से तसल्ली मिले। हालाँकि, ये अफ़सोसनाक तो है कि लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक प्रवृत्ति यानी भीड़-तंत्र के प्रति न्याय के सर्वोच्च मन्दिर को अपनी संवेदनशीलता ज़ाहिर करने में ख़ासा वक़्त लग गया। आप कह सकते हैं कि ‘हुज़ूर, आते-आते बहुत देर कर दी!’ क्योंकि मोदी राज में ही गोरक्षा और बच्चा चोर के नाम पर अब तक 80 से ज़्यादा हिंसक वारदातें हो चुकी हैं। भीड़-तंत्र अब तक 33 इंसानों की बलि चढ़ा चुका है! मोदी और उनकी भक्त मंडली भले ही इस दौर को आधुनिक भारत का ‘स्वर्ण-युग’ बताते ना अघाते हों, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया कि भारत अब ‘भीड़-युग’ में आ चुका है!

mob lynching

सोशल मीडिया पर तैनात ‘भक्तों’ और अफ़वाह गढ़ने और फ़ैलाने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला किसी मुबारक़बाद या बधाई से कम नहीं है। इसकी साज़िशों ने ही सवा सौ करोड़ भारतवासियों को ‘भीड़-युग’ में पहुँचाया है! भीड़-युग के शुरुआती चार वर्षों में ही आदिकाल से मौजूद ‘भीड़’ का ऐसा ज़बरदस्त और ऐतिहासिक ‘विकास’ हुआ, जैसा ‘विकास-विरोधी’ पिछली सरकारें बीते 70 वर्षों में भी नहीं कर पायीं! सदियों से शैशवकाल में मचलने वाली ‘भीड़’ ने अब चार साल में बाल-काल और यौवन को पार करके गबरू जवान वाला व्यक्तित्व पा लिया। वैसे तो आधुनिक भारत का इतिहास असंख्य साम्प्रदायिक दंगों से अटा पड़ा है। हमारा कोई सियासी दल ऐसा नहीं है, जिसके दामन पर दंगों के ख़ून के छींटे ना रंगे हों। लेकिन गोरक्षा और बच्चा चोर के नाम पर कहीं भी, कभी भी ‘भीड़’ का किसी को भी पीट-पीटकर मार डालना, भीड़-युग का अद्भुत आयाम है!

भीड़-युग में भीड़ के तुष्टिकरण की नीति लागू होना स्वाभाविक है। आप चाहें तो माननीय सुप्रीम कोर्ट की मंशा पर तरस खा सकते हैं कि उसे अब भी उम्मीद है कि उसके सख़्त तेवर से भगवा सरकारें जाग जाएँगी, संघियों का वो अफ़वाह-तंत्र ख़ुदकुशी कर लेगा, जिन्हें इसी भीड़-तंत्र की भीड़ से संजीवनी मिलती है! सकारात्मक होने की यदि कोई सीमा नहीं होगी तभी तो जिन्होंने ‘विकास’ की ख़ातिर अपने कलेज़े के टुकड़े ‘लोकपाल’ की क़ुर्बानी दे दी हो, उनसे ये अपेक्षा की जा सकती है कि वो सुप्रीम कोर्ट की तसल्ली के लिए संसद में क़ानून बनाकर भीड़-तंत्र रूपी अपनी ही धमनियों को काट डालने का फ़ैसला ले लेंगे! जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उसी दिन से बैल भी दूध देने लगेंगे! देख लीजिएगा, मई 2019 तक भारत की संसद भीड़-युग का बाल भी बाकाँ नहीं कर पाएगी!

भीड़-तंत्र, बुनियादी तौर पर बोतल में बन्द ज़िन्न की तरह है, जो एक बार बोतल से बाहर आ जाए तो फिर उसे वापस बोतल में नहीं डाला जा सकता! ये अंडे से निकला वो चूजा है, जिसे कोई वापस अंडे में नहीं डाल सकता! इसीलिए भीड़-युग से वापसी बहुत मुश्किल है। हालाँकि, असम्भव कुछ भी नहीं होता! सम्भव बनाने के लिए सरकार को वैसे ही व्यापक उपाय करने होंगे जैसे उफ़नती नदी की बाढ़ से रोकथाम के लिए विशाल बाँधों और नहरों का नेटवर्क बनाया जाता है। इसके लिए भी सबसे पहले तो हमें ये स्वीकार करना होगा कि भीड़-राज को महज ये उपदेश देकर क़ाबू में नहीं लाया जा सकता कि ‘कोई भी क़ानून हाथ में नहीं ले सकता!’

अरे, ये किससे छिपा है कि भारत में भीड़ से बड़ा कोई क़ानून नहीं! भीड़ कब अराजक नहीं होती! भीड़ का तो स्वभाव ही है बेक़ाबू होना! इसमें नया क्या है! भीड़ तो हड़ताल, चक्का-जाम, रेल-रोको, तोड़फोड़-उपद्रव-आगजनी और हिंसा करती रही है। 70 साल में लाखों बसों और अन्य वाहनों की होली क्या भीड़ ने नहीं जलायी! तो क्या अब इंसानों की बलि ले रही भीड़, सुप्रीम कोर्ट की हाय-तौबा से अपना चरित्र बदल लेगी! किस राजनीतिक दल ने और कब ये ख़्वाहिश नहीं रखी कि उसके पीछे ‘भीड़’ खड़ी हो! राजनीति के लिए ‘भीड़’ ज़रूरी है। आमलोगों के पास ‘भीड़’ नहीं है, इसीलिए वो राजनेता नहीं हैं।

COW-VIGILANTE

भीड़ को भीड़ बनने से रोकने का काम क़ानून और संवेदनशील सरकार का है। संवेदनशील सरकार का कर्त्तव्य है कि वो छोटे-छोटे जनसमूह और संगठन की माँगों, उम्मीदों और अपेक्षाओं का वक़्त रहते निराकरण करे, ताकि वो भीड़ में तब्दील ना हों। अभी तो भारत का संस्कार ही ये हो चुका है कि सरकारें सिर्फ़ हिंसा-हड़ताल और चक्का जाम वग़ैरह की भाषा ही समझती हैं। समाज का जो तबक़ा सरकारी व्यवस्था की चूलें नहीं हिला सकता, मौजूदा व्यवस्था में उसकी तब तक कोई सुनवाई नहीं है, जब तक कि सड़कों पर हिंसा नहीं करता। ढीठ नौकरशाही और विधायिका को तो अदालतों के फ़ैसलों की भी तब तक कोई परवाह नहीं होती, जब तक कि बात अवमानना तक न पहुँच जाए।

अब तो सरकारी तंत्र को भी सड़क का अतिक्रमण हटाने के लिए भी कोर्ट के आदेश की ज़रूरत पड़ती है! नौकरशाही को अपना फ़र्ज़ निभाने के लिए अदालत की अवमानना का वास्ता देना पड़ता है। जब तक अदालत की लाठी सिर पर नहीं हो, तब तक वही सरकारी अमला अतिक्रमण को पैदा करके उगाही करता है, जिस पर अतिक्रमण ख़त्म करने का ज़िम्मा होता है। सबकी उगाही बँधी हुई है! इसीलिए जब अदालती आदेश के बग़ैर जब सरकारी तंत्र, अतिक्रमण हटाने पहुँचता है तो उसका वास्ता जनता के सहयोग और समर्थन से नहीं, बल्कि भीड़ के विरोध से पड़ता है! सबको, सब कुछ पता है! अदालतें भी अनजान नहीं हैं! जज साहब को भी सब पता है! फिर भी सिर्फ़ अदालती आदेश ही ये बोल पाता है कि ‘कोई भी क़ानून हाथ में नहीं ले सकता!’

भीड़ की असलियत भी किसी से छिपी नहीं है। भीड़, जब इंसानों की होती है तो वो वोट भी होती है। ‘जहाँ वोट, वहाँ तुष्टिकरण!’ तुष्टिकरण की विकृति से लोकतंत्र को बचाने का दारोमदार जिस क़ानून पर है, उसके तीन अंग हैं। विधायिका, पुलिस या कार्यपालिका और अदालत। पुलिस और अदालतों में पर्याप्त निवेश करके यदि उन्हें कारगर बना दिया जाए तो वो कमज़ोर क़ानून की भी भरपायी कर देंगे। अन्यथा, कठोर क़ानून भी किताबों में ही बन्द पड़े रहेंगे। हत्या, बलात्कार, दहेज-उत्पीड़न, बाल-विवाह जैसे मामलों में जो क़ानून भारत में हैं, उससे सख़्त सज़ा कहीं नहीं हो सकती।

हमारी न्याय-व्यवस्था किसी को इंसाफ़ नहीं दे पाती। हमारी अदालतों से किसी को इंसाफ़ नहीं मिलता। छोटा-बड़ा, अमीर-ग़रीब सभी अदालतों में लगने वाले असामान्य वक़्त के शिकार हैं। भारतीय जेलों में अपराधियों से दोगुनी संख्या विचाराधीन क़ैदियों की है। मुक़दमों के निपटारे में 20-25 साल लगना सामान्य बात है। पुलिस जिन मुट्ठी भर अपराधियों को पकड़ पाती है, उनमें से भी महज 6 फ़ीसदी का ज़ुर्म अदालत में साबित हो पाता है। मज़े की बात ये भी है कि क़ानून किसी के हाथ में नहीं, बल्कि कहीं है ही नहीं। आज़ाद भारत में पुलिस-अदालत की दशा हमेशा चिन्ताजनक ही रही है। भीड़-युग में फ़र्क़ सिर्फ़ इतना आया है कि ये पूरी तरह से चौपट हो चुका है। सियासत और लगातार बढ़ती आबादी ने पुलिस-अदालत को कभी सुधरने नहीं दिया। पुलिस, राज्य सरकारों की वर्दीधारी लठैत है। ये न्याय-व्यवस्था की पहली सीढ़ी है। लेकिन खंडहर से भी ज़्यादा जर्जर हो चुकी है। ये सिर्फ़ साधन-सम्पन्न लोगों का ख़्याल रख पाती है।

भीड़ को ऐतबार नहीं है कि क़ानून अपना काम ज़रूर करेगा। मोदी राज से पहले भी कभी-कभार ऐसी ख़बरें मिलती थीं कि भीड़ ने किसी चोर या जेबकतरे को रंग हाथ पकड़ लिया और फिर उसे पुलिस के हवाले करने से पहले ही भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। अब तो भीड़, पुलिस को भी पीट डालती है। क़ानून को हाथ में लेने वालों का पुलिस-अदालत कुछ नहीं बिगाड़ पाती। यही आलम दंगाइयों का भी होता है। उनके चेहरे पर भी भीड़ का मुखौटा ही होता है। कुख़्यात अपराधियों को भी ज़मानत पर ज़मानत मिलते जाना, उनका एक के बाद एक जघन्य अपराधों को करते जाना, दाग़ी लोगों का सियासी क्षेत्र में चमककर सफ़ेदपोश बनना और दशकों तक अदालत की कार्यवाही का पूरा नहीं होना भी भीड़ को यही सन्देश देता है कि पुलिस-अदालत उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी।

रही-सही क़सर तब पूरी हो जाती है, जब भीड़ को राजनीतिक आश्रय मिलने लगता है। भीड़ में से अपराधी को ढूँढ़ना और अदालत में उसका अपराध साबित करना, बेशक़ पुलिस की उपलब्धि है। लेकिन इन्हीं अपराधियों को चटपट जमानत मिल जाना और मंत्रियों की ओर से उनका माल्यार्पण होना, भीड़-युग के वैभव का गुणगान करता है। जब वाचाल प्रधानमंत्री के पास भी ऐसी प्रवृत्तियों की भर्त्सना करने का भी वक़्त नहीं हो, जब भीड़ में हिन्दू-मुसलिम ढूँढ़े जाएँ, जब भीड़ में तिरंगा, राष्ट्रवाद और देशद्रोह का तड़का लगे, जब भीड़ में पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण वाला क्षेत्रवाद घुसेड़ा जाए, तब जो भीड़-तंत्र पैदा होगा, उसे किसी अदालती फ़रमान और क़ानून से काबू में नहीं लाया जा सकता! फ़िलहाल, भारत के नसीब में यही भीड़-युग लिखा है।

रात कितनी भी लम्बी हो, वो भोर को रोक नहीं पाती! भीड़-वादियों में ग़लतफ़हमी फैलायी गयी है कि भीड़, उनके बग़ैर रह नहीं पाएगी! सत्ता तंत्र की मन्दबुद्धि सवर्ण हिन्दुओं में यही धारणा फैलायी जा रही है कि ‘जनता को कुछ याद ही नहीं रहता!’ जबकि सच्चाई ये है कि जनता ने हमेशा अपनी यादाश्त का लोहा मनवाया है। दांडी मार्च में महात्मा गाँधी की तस्वीरों में दिखने वाली जनता हाशिये पर दिखती ज़रूर है, लेकिन चुटकी बजाकर सत्ता को उखाड़ फेंकती है। इसी जनता ने इमरजेंसी और बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद संविधान की रक्षा की थी। भीड़-राज को ख़ुशफ़हमी है कि वही जनता लिंचिंग, दंगे, एनकाउंटर, कठुआ, उन्नाव रेप, ऊना कांड, महंगाई, नोटबन्दी, बेरोज़गारी सब भूल जाएगी और उसकी साज़िश के मुताबिक, फिर से साम्प्रदायिकता के नशे में टूट जाएगी। लेकिन काठ की हाँडी कब बार-बार चढ़ी है!

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ब्लॉग

2019 में ‘महँगाई दिवस समारोह’ का भव्य आयोजन!

‘महँगाई दिवस’ समारोह का ऐसा भव्य आयोजन होना चाहिए कि भगवान विश्वकर्मा की नज़रें भी शर्म से झुक जाएँ। अमित शाह ने यक़ीन जताया है कि 2019 में दाख़िल होते-होते 70 साल में पहली बार पेट्रोल-डीज़ल दोनों का भाव समान हो जाएँगे। इन्हें गर्व के साथ भारतवासियों को 100 रुपये प्रति लीटर से ऊपर के भाव पर बेचा जाएगा।

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Mehangai Inflation

तीन देशों के सैर-सपाटे की वजह से कई दिनों के बाद जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लगा कि चलो, अब कुछ भारत में भी रह आते हैं। विदेश में ख़ूब फेंक लिया, अब ज़रा घरेलू मैदान पर भी चलकर खेल लिया जाए। ताकि, अपने देश में रहने वाले उन भक्तों में नया जोश भरा जा सके जो उपचुनावों में ईवीएम के इस्तेमाल के बावजूद बीजेपी के अखिल भारतीय स्तर पर चुनाव हारने से बेहद मायूस हैं। तभी मोदी के साथ दुनिया घूम रहे उनके गुर्गों ने उन्हें बताया है कि भारत में जनता रसोई गैस का दाम बढ़ाये जाने से बहुत प्रसन्न है। इसीलिए चारों ओर ‘मोदी-मोदी-मोदी’ का जयघोष करने वाली रिकॉर्डिंग्स बजवायी जा रही है!

बुन्देले हरबोलों के मुँह से अपनी सच्ची तारीफ़ सुनकर बेचारे प्रधान सेवक महाशय बुरी तरह झेंप गये। ग़रीबी को क़रीब से देखने और यहाँ तक कि उसकी चाय में डुबकियाँ लगाकर विश्व के सबसे महँगे चौकीदार का ख़िताब पाने वाले की विनम्रता देखते ही बनती थी! चश्मदीदों ने तो यहाँ तक बताया कि दिन-रात सरकारी ख़र्च पर मौज़ कर रहे नसीबवाले महाराज को जब बताया गया कि इन दिनों पेट्रोल-डीज़ल और सीएनजी के बाद रसोई ग़ैस के दाम में आये ज़बरदस्त उछाल से जनता वैसे ही बेहद प्रसन्न है, जैसे नोटबन्दी के वक़्त वो लाइन में खड़ी होकर देश के लिए शहीद हो रही थी। किसी को नहीं खाने देने की बातें करने वाला, लेकिन हर वक़्त यार-दोस्तों की ख़ुराक़ का ख़्याल रखने वाला फ़क़ीर, सारा ब्यौरा पाकर बेहद भावुक हो गया। उनकी आँखें डबडबा गयी। गला रूँध गया।

5 पैसे की राहत देकर बीजेपी जीतेगी 350 सीटें

देखते ही देखते मोदी में करूणानिधान का देवत्व प्रकट होने लगा। मोदी ने बड़ी मुश्किल से अपने ज़ज़्बातों पर क़ाबू पाया। फिर त्वरित गति से और कड़े फ़ैसले लेने वाले मोदी ने पलक झपकते ही पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को फ़ोन लगा दिया। मोदी ने प्रधान से कहा कि वो फ़ौरन ग़रीबों को राहत देने के लिए बग़ैर सब्सिडी वाले सिलेंडर के दाम में कम से कम 5 पैसे की कटौती का ऐलान करें! इतना सुनना था कि प्रधान की घिग्घी बँध गयी। वो हक़लाने लगे। दुहाई देने लगे कि मैंने अभी-अभी बयान दिया है कि पेट्रोलियम का भाव तेल कम्पनियाँ ख़ुद तय करती हैं। इसमें सरकार दख़ल नहीं देती।

प्रधान ने आगे कहा कि जैसे ही जनता को 5 पैसे की कटौती वाली राहत भरे फ़ैसला का पता चलेगा, वैसे ही उनकी बड़ी थू-थू होगी। चुनावी साल में एक पक्षीय होकर 5 पैसे की रियायत देने का फ़ैसला बीजेपी को और ख़ुद उन्हें भी बहुत भारी पड़ जाएगा। लेकिन महामानव मोदी ने धर्मेन्द्र प्रधान को ढाँढस बँधाया कि अरे याद, मैं दिन-रात नये-नये बयान देता रहता हूँ। न जाने कितने यू-टर्न का रिकॉर्ड मेरे नाम है। क्या मुझे कभी कुछ भारी पड़ा! इतना सुनकर प्रधान की जान में जान आयी! इसीलिए, भरोसा रखिए, जल्द ही मोदी की जय-जयकार करने के लिए सवा सौ करोड़ भारतवासियों को रसोई गैस के दाम में 5 पैसे की कटौती की तोहफ़ा दिया जाएगा।

पेट्रोलियम विशेषज्ञों का पूर्वानुमान है कि जिस सिलेंडर का दाम 52 रुपये महँगा होकर 786 रुपये हो गया, उसी का दाम 2019 के लोकसभा चुनाव तक 1000 रुपये को पार कर जाएगा। ये कोई मामूली विकास नहीं होगा। 55 साल से अधिक वक़्त तक देश पर राज करने वाली और काँग्रेस मुक्त भारत के ख़्वाब को साकार करने में सबसे बड़ी बाधक बनी पार्टी सिर के बल भी खड़ी हो जाती, तब भी ऐसी शानदार उपलब्धियाँ हासिल नहीं कर पाती! इन्हीं तथ्यों से उत्साहित होकर अमित भाई ने दुनिया भर में फैले मतान्ध भक्तों को सन्देश दिया है कि वो 1 जनवरी 2019 को ‘महँगाई दिवस’ का आयोजन करें।

‘महँगाई दिवस’ समारोह का ऐसा भव्य आयोजन होना चाहिए कि भगवान विश्वकर्मा की नज़रें भी शर्म से झुक जाएँ। अमित शाह ने यक़ीन जताया है कि 2019 में दाख़िल होते-होते 70 साल में पहली बार पेट्रोल-डीज़ल दोनों का भाव समान हो जाएँगे। इन्हें गर्व के साथ भारतवासियों को 100 रुपये प्रति लीटर से ऊपर के भाव पर बेचा जाएगा। सीएनजी भी तब तक 80 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव को पार कर जाएगी। यहाँ तक कि डॉलर के मुक़ाबले रुपये का भाव भी निश्चित रूप से 100 रुपये से ऊपर हो जाएगा! इसी के साथ, शाह ने यक़ीन दिलाया कि जिस दिन भारत इस उपलब्धि को हासिल कर लेगा उसी दिन बीजेपी को लोकसभा में अपने बूते 350 से ज़्यादा सीटें हासिल करने का रास्ता साफ़ हो जाएगा! फिर उसे किसी एनडीए वग़ैरह की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

2019 में ही भारत के हिन्दू राष्ट्र बनने की घोषणा

अपने बूते 350 सीटें जीतने का मतलब है कि भारत को पूर्णतः हिन्दू राष्ट्र घोषित कर दिया जाएगा। उस मुबारक़ दिन का स्वागत करने के लिए अमित भाई ने हरेक भक्त को अपने घर या दफ़्तर या कार में हर वक़्त ‘मोदी-मोदी-मोदी’ वाली रिकॉर्डिंग को राम-धुन का तरह बजाने का आदेश भी दिया। ये वही भक्त हैं जो कर्नाटक चुनाव से पहले और बाद में पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में लगी आग में ‘जय श्रीराम’ का नहीं बल्कि ‘जय श्रीमोदी’ का अक्स देख रहे हैं और वीर रस की मुद्रा में नथुने फूला-फूलाकर नारा लगा रहे हैं कि ‘कसम मोदी की खाते हैं, मन्दिर वहीं बनाएँगे’।

पेट्रोल, डीज़ल, सीएनजी और एलपीजी के दाम से आहत भक्त मंडली को जैसे ही ये पता चला कि किसानों ने मोदी सरकार को सबक सिखाने के लिए 10 दिनी आन्दोलन छेड़ दिया है। वैसे ही करोड़ों ट्रोल्स ने सोशल मीडिया का रुख़ किया। आनन-फ़ानन में उन्होंने नया नारा गढ़ दिया कि ‘कम पड़ी महँगाई की मार, अगली बार मोदी सरकार’। इस नारे पूरे भक्त समुदाय में जंगल की आग की तेज़ी से जोश भर दिया। देखते ही देखते काफ़ी भक्तों ने अपना आपा खो दिया। बस, फिर क्या था! 2014 के सभी नारों में खुशी के तत्वों को जोड़कर ऐसा जय-घोष होने लगा कि पाकिस्तान और चीन में घबराहट फैल गयी।

तभी मोदी के तमाम पुराने भाषणों को भी भक्तों ने अपने-अपने मोबाइल पर बजाना शुरू कर दिया। नसीबवाला, प्रधानसेवक, अच्छे दिन, चौकीदार, खाऊँगा, गंगा, क्योटो, विकास, स्वच्छता, पेंशन, उज्ज्वला, जनधन, आधार, स्टेंट्स, स्टार्ट अप, स्मार्ट सिटी वग़ैरह-वग़ैरह। कुलमिलाकर, जितने भक्त, उतने मोबाइल और उसके सौ गुना, ऐसे वीडियो क्लिप्स जो सोशल मीडिया पर मोदी की शान बने घूमते हैं। देखते ही देखते भक्तों का उत्साह अद्भुत बनाता चला गया। क्योंकि वयोवृद्ध पूर्व बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने उन्हें ज्ञान की ताज़ा ख़ेप दी है कि लम्बी छलाँग लगाने से पहले दो-चार क़दम पीछे आना पड़ता है। इसीलिए न चाहते हुए भी भारी मन से बीजेपी को उपचुनाव में हार को गले लगाना पड़ा। ये उनका ही पीड़ादायक था, जैसे किसी मुसलमान को गले लगाना। उसे ‘मार दो, काट दो’ से बचाना।

ईवीएम ही होगा लम्बी छलाँग वाला ईष्ट-देव

दरअसल, राजनाथ सिंह को अमित शाह ने समझाया था कि लम्बी छलाँग वाले यंत्र को ही तो ईवीएम कहते हैं। ईवीएम ही बीजेपी का ईष्ट-देव होगा। छोटे मुक़ाबलों यानी उपचुनावों में भी यदि विपक्षी दलों को जीतने नहीं दिया गया तो ईवीएम के ख़िलाफ़ बग़ावत पर क़ाबू पाना असम्भव हो जाएगा। चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और संसद के मुट्ठी में होने के बावजूद यदि एक बार जनता भी ईवीएम के ख़िलाफ़ हो गयी तो सारे करे-धरे पर पानी फिर जाएगा। बैलेट पर चुनाव हुए तो मोदी को वापस गुजरात की क़मान थमाना भी सम्भव नहीं होगा। देश की चौकीदारी तो बहुत दूर की बात होगी। लिहाज़ा, फिलहाल, पहली और आख़िरी प्राथमिकता ईवीएम की लाज बचाने की है। इसी लाज की वजह से बेचारी मशीनों को ख़ुद ही लू लगने और गर्मी से पिघल जाने के बहाने बनाने पड़े।

अब दिसम्बर में होने वाले मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिज़ोरम के चुनाव से पहले इन्हीं मशीनों को शीत-लहरी और फ्रोस्ट बाइट (ठंड में अंग के कटकर गिर जाना) से जम जाने के अफ़साने सुनाने पड़ेंगे। लेकिन इन्हीं मशीनों को 2019 के चुनाव से पहले ‘दो-बूँद ज़िन्दगी की’ वाले वायरस की बूस्टर डोज़ दे दी जाएगी। उसके बाद 17वीं लोकसभा के कार्यकाल में होने वाले विधानसभा और उपचुनावों के हारें या जीतें, इसके बारे में सोचा जाएगा। इस बीच, तमाम उधेड़बुन को ख़त्म करते हुए नागपुर से मोहन भागवत ने सन्देश भिजवाया है कि 2019 के बाद की चिन्ता अभी से करने की ज़रूरत नहीं है। तब की तब देखी जाएगी!

ईवीएम के शानदार प्रदर्शन की ताज़ा ख़बर अफ्रीकी देश युगान्डा से आयी है। वहाँ भारतीय ईवीएम की बदौलत साफ़-सुथरे चुनाव हुए। वोटों की गिनती हुई तो सभी हक्के-बक्के रहे रहे गये। बीजेपी ने वहाँ तीन-चौथाई सीटें जीतकर तहलका मचा दिया! वैसे भारतीय ईवीएम और वीवीपीएटी को लेकर बोत्सवाना के चुनाव अधिकारी भी इन दिनों हमारे निर्वाचन आयोग से ये समझने आये हुए हैं कि कैसे इन्हें फूल-प्रूफ़ यानी विश्वनीय माना जाए? अब ज़रा सोचिए कि निर्वाचन सदन में बैठे भक्त अफ़सरों के बूते का है कि वो तहलका मचाने वाली मशीन का राज खोल दें।

अरे हाँ, तहलके से याद आया कि कैसे वाजपेयी सरकार के दौर वाले बीजेपी अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को कैमरे ने रुपये लेते पकड़ा था। क्या शानदार तहलका था वो? ईमानदारी के हर रंग से रंगीन! उसी ईमानदारी से प्रेरणा लेकर पहले राफ़ैल सौदे और फिर AN-32 सौदे में दलाली खाने की घटनाएँ सामने आयीं। लेकिन राज-धर्म में निपुण मोदी ने क्या मज़ाल जो चूँ भी किया हो। बेचारे ढोंगी बाबा ने भी कभी नीरव-मेहुल-माल्या-ललित के नाम भी अपनी ज़ुबान पर नहीं आने दिये। तभी तो बैंक लुट चुके हैं। उसके कर्मचारी कटोरा लेकर सड़कों पर खड़े हैं। पता चला है कि नोटबन्दी के वक़्त यही कर्मचारी बड़ी श्रद्धा से नमो-नमो कर रहे थे। भारत के काला-धन मिटा रहे थे। अब अपने मिट जाने की दुहाई दे रहे हैं।

बहरहाल, जैसे सरकार पेट्रोल-डीज़ल पर 5 पैसे की राहत देने वाली है, वैसे ही बैंककर्मियों को निहाल करने के लिए उन्हें 2 फ़ीसदी वेतन-वृद्धि का झुनझुना थमाया गया है। जल्द ही किसानों को भी मिट्टी की जाँच के लिए ज़मीन का आधार कार्ड दिखाने और नीम कोटेड यूरिया को भीम ऐप या पेटीएम से ही ख़रीदने की सुविधा दी जाएगी। उधर, सीताजी के टेस्ट ट्यूब बेबी साबित होते ही संचार मंत्री रवि शंकर प्रसाद से कहा गया है कि वो महाभारत कालीन टेक्नोलॉज़ी के ताज़ा वर्ज़न की बदौलत 2022 तक हरेक घर में इंटरनेट डाटा की ज़रिये दूध सप्लाई करने का ऐलान वैसे ही करें, जैसे देश में मोदी राज वाली बुलेट ट्रेन दौड़ने लगी है और काँग्रेसियों की ज़माने वाली ट्रेन की औक़ात बैलगाड़ी से भी बदतर बनायी जा चुकी है। तभी तो भक्तों से ये फ़ैलाने को कहा गया है कि ‘ईवीएम है तो मोदी है!’ और हाँ, ‘बात समझ में आयी तो हिलाओ अपनी मुंडी!’

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व्यंग्य

‘विकास’ के डैडी की आत्मकथा के काले पन्ने

अपनी चारों सन्तानों से मुझे जितना सुख मिला, उससे कहीं अधिक सन्ताप मिला। शायद, ये सब मेरे कर्मों का ही फल है। मैंने भी इन चारों का ज़रूरत से ज़्यादा शोषण किया। उनकी जमकर बेक़द्री की। मैं हमेशा ये समझता रहा कि मेरी चारों औलादें मेरी ग़ुलाम हैं। ये मेरा बहुत बड़ा गुनाह है!

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Vikas

भाईयों-बहनों,

मैं नहीं जानता कि कितने लोग मेरे अन्ध भक्त हैं, लेकिन मैं उत्कृष्ट राम भक्त हूँ। राम के जीवन से मैंने बहुत प्रेरणा ली है। तभी तो राम के पिता दशरथ की तीन पत्नियों को जहाँ नियोग से चार पुत्र हासिल हुए, वहीं, अपनी ब्याहता को लावारिस छोड़ देने के बावजूद मुझे भी नियोग से चार पुत्र हासिल हुए हैं! यहीं मैं साफ़ कर दूँ कि मेरी इस उपलब्धि का नेहरू से कोई लेना-देना नहीं है।

दशरथ के राम की तरह मेरा सबसे बड़ा पुत्र है विकास। इसी की वजह से जो लोग सीधे-सीधे मेरा नाम लेने में झिझक महसूस करते हैं, वो मुझे ‘विकास के पापा’ कहकर सम्बोधित करते हैं। ये सम्बोधन मुझे भी बहुत पसन्द है! लेकिन मेरी बदनसीबी देखिए कि जैसे ही मैं दिल्ली के तख़्त पर बैठा, वैसे ही कमबख़्त विकास मुझे छोड़कर ग़ायब हो गया! मैंने देश-विदेश में घूमकर सैंकड़ों रैलियाँ और जलसे किये। हर जगह विकास को ही तलाशता रहा। लेकिन उसका कोई सुराग़ नहीं मिला! अब चार साल मुझे दिल्ली की गद्दी पर बैठे हो चुका है। अब मुझे साफ़ दिख रहा है कि विकास के लापता होने के पीछे काँग्रेसियों की ही साज़िश है। उन्होंने ही विकास को बन्धक बनाकर रखा होगा, क्योंकि बचपन से ही विकास को ज़्यादातर वक़्त उन्हीं के घरों में बीता है।

सवा सौ करोड़ भारतवासियों ने मुझे विकास का पापा समझकर ही अपना चौकीदार बनाया। इसीलिए जब भी वो मुझे लापता विकास को लेकर व्यथित देखते हैं तो उनका दिल भर आता है। यही वजह है कि वो मेरे प्रति हमदर्दी दिखाते हुए चुनाव पर चुनाव जिताते रहे हैं, ताकि किसी भी तरह से मैं विकास को ढूँढ़ लूँ। लेकिन कमबख़्त विकास ऐसा नालायक निकला कि उसकी कहीं भनक ही नहीं मिल रही। उसके ग़ुम होने की वजह से मेरा किसी भी काम में मन ही लगता। इसीलिए मेरी मन की बातें नीरस और उबाऊ होती हैं। विकास का शोक मुझे भी वैसे ही खाये जा रहा है, जैसा दशरथ को राम को लेकर हुआ था।

अब मैं उम्र के अन्तिम वर्ष में हूँ। यदि इस वर्ष भी मुझे विकास नहीं मिला तो मेरी मृत्यु निश्चित है। विकास की तलाश को लेकर मेरी बेचैनी बेक़ाबू होती जा रही है! बीते चार साल में भले ही मैं ऊपर से मुस्कुराता हुआ दिखता रहा हूँ, लेकिन विकास से बिछोह ने मेरे चित्त को हमेशा व्यथित ही रखा! इसी वेदना की वजह से मेरी लिव-इन पार्टनर ‘अच्छे दिन’ ने भी मुझसे नाता तोड़ लिया और वो मुझे हमेशा की छोड़कर चली गयी! मानो, उसने मुझसे मेरी पत्नी के परित्याग का बदला लिया हो!

उधर, विकास की गुमशुदगी के बाद मेरे दो अन्य कमाऊ पूतों ‘पेट्रोल और डीज़ल’ का भी मानसिक सन्तुलन बुरी तरह से बिगड़ता चला गया। कभी इन दोनों के शील-स्वभाव को देखकर मैं अपने नसीब पर बहुत इतराता करता था। लेकिन लगता है कि मुझे विकास और अच्छे-दिन की हाय लग गयी। अब मुझे लगता है कि शायद, विकास इसलिए मुझे ख़फ़ा हो गया कि मैंने उसके नाम को गुजरात मॉडल कहकर उसकी बहुत खिल्ली उड़ाई थी। वक़्त बीतने के साथ ही जब इस बात का ख़ुलासा हुआ तो मेरे दूसरे और तीसरे नम्बर के बेटों यानी पेट्रोल-डीज़ल की भी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी।

पेट्रोल-डीज़ल को भी मैंने बहुत समझाने-बुझाने की कोशिश की, लेकिन लगता है कि वो पाकिस्तान की शह पाकर आवारा, डकैत और नरभक्षी बन चुकी हैं। दोनों मिलकर उन्हीं ग़रीबों पर सबसे ज़्यादा क़हर बरपा कर रही हैं, जिनके लिए मैं दिन-रात जीने-मरने की झूठी क़समें खाता फिरता हूँ! हर वक़्त झूठ बोलकर जनता को झाँसा देने की मेरी आदत के मेरी यही औलादें सबसे अधिक ज़िम्मेदार हैं। इसीलिए पेट्रोल-डीज़ल की करतूतों से पनपी अराजकता को देखते हुए मैंने तय किया है कि मैं इनसे कोई नाता नहीं रखूँगा। मैं इन दोनों से हर तरह का नाता तोड़ने का ऐलान करता हूँ और इन्हें अपनी पैतृक विरासत से बेदख़ल किये जाने की घोषणा करता हूँ। लेकिन हाँ, राष्ट्रहित में मैं इनकी उगाही से हासिल होने वाली भारी-भरकम रक़म से अपनी और अपने दोस्तों जैसे नीरव-मेहुल-माल्या-ललित की मौज़-मस्ती को जारी रखूँगा!

मेरा चौथा और सबसे छोटा बेटा है ‘रुपया’! ये मुझे सबसे ज़्यादा दुलारा है। फ़िलहाल, मेरे इस लाडले रुपये का भी बुरा हाल है। इसने भी अपने बड़े भाईयों विकास, पेट्रोल और डीज़ल के नक़्श-ए-क़दम पर चलना शुरू कर दिया है। आजकल रुपये ने भी मेरे घर को छोड़कर डॉलर-नगर में अपना बसेरा बना लिया है। वहाँ वो कुछ आवारा तत्त्वों की संगत में बुरी आदतों में फँस गया है! मुझे पता चला है कि वो हर तरह के व्यसनों का अभ्यस्त हो चुका है। इसी वजह से मेरा प्रिय रुपया भी अब बेहद कमज़ोर या दुर्बल हो चुका है। हालाँकि, उसकी काया में भूने हुए पापड़ों वाला कुरकुरापन अब भी बरक़रार है! क्योंकि नोटबन्दी के ज़माने में मैंने उसके जो कपड़े बदलवाये थे, वो अब भी साफ़-सुथरे दिखते हैं।

कुलमिलाकर, अपनी चारों सन्तानों से मुझे जितना सुख मिला, उससे कहीं अधिक सन्ताप मिला। शायद, ये सब मेरे कर्मों का ही फल है। मैंने भी इन चारों का ज़रूरत से ज़्यादा शोषण किया। उनकी जमकर बेक़द्री की। मैं हमेशा ये समझता रहा कि मेरी चारों औलादें मेरी ग़ुलाम हैं। ये मेरा बहुत बड़ा गुनाह है! ये इतना बड़ा पाप है जिसका प्रायश्चित मैं सत्ता के हटाये जाने के बाद भी शायद ही कभी कर सकूँ। भारतवासियों मुझे मेरे कर्मों के लिए कभी माफ़ नहीं करेंगे।

(लेखक, एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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