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ज़िम्मेदारी लेने के नाम पर भी देश को बेवकूफ़ ही बना रहे हैं नरेन्द्र मोदी…!

हिन्दुस्तान टाइम्स के एक समारोह में प्रधान सेवक नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि उन्हें मालूम है कि उनके ‘अदूरदर्शी’ आर्थिक फ़ैसलों का सियासी ख़ामियाज़ा उन्हें चुकाना पड़ सकता है। लेकिन वो इसके लिए ‘सीने पर गोलियाँ खाने को’ तैयार हैं। क्योंकि उन्होंने भ्रष्टाचार और काला धन के सफ़ाये के नाम पर नोटबन्दी और खोटा जीएसटी जैसे ‘नादानी भरे’, लेकिन कड़े फ़ैसले लिए हैं।

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Narendra Modi

प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति यदि पते की बातें नहीं भी करे तो भी सुर्ख़ियाँ तो बटोरता ही रहता है। ऐसी सुर्ख़ियाँ बटोरने में नरेन्द्र मोदी अपने सभी पूर्ववर्तियों को बहुत पीछे छोड़ चुके हैं। इसीलिए अपनी नीतियों की विफलताओं को भी मोदी ऐसे पेश करते हैं मानो शहीद का तमग़ा भी उन्हें ही मिलना चाहिए। तभी तो अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स के एक समारोह में प्रधान सेवक नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि उन्हें मालूम है कि उनके [अदूरदर्शी] आर्थिक फ़ैसलों का सियासी ख़ामियाज़ा उन्हें चुकाना पड़ सकता है। लेकिन देशहित में वो ‘सीने पर गोलियाँ खाने को’ तैयार हैं। क्योंकि उन्होंने भ्रष्टाचार और काला धन के सफ़ाये के नाम पर नोटबन्दी और खोटा जीएसटी जैसे [नादानी भरे, लेकिन] कड़े फ़ैसले लिए हैं। लिहाज़ा, इसके प्रतिकूल नतीज़ों की ज़िम्मेदारी भी उनकी ही है।

यानी, सारा क़सूर मेरा है। मेरा मंत्रिमंडल, मेरी पार्टी बीजेपी और मेरा वैचारिक गुरुकुल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सभी निर्दोष हैं। यदि देश की जनता मेरे कुकर्मों की कोई सज़ा देना चाहे तो वो सिर्फ़ मुझे ही दे, मेरे क़ुनबे को नहीं! मज़े की बात ये भी है कि ज़िम्मेदारी लेने की आड़ में प्रधानमंत्री जो तेवर दिखा रहे हैं, उसमें भी उनके स्वभाव के अनुरूप कोई ईमानदारी नहीं है! इसका मक़सद भी जनता को बेवकूफ़ बनाना और उसकी आँखों में धूल झोंकना ही है! क्योंकि असली सवाल तो है कि नोटबन्दी की वजह से जिन सौ से ज़्यादा लोगों की अकाल मौत हुई, उसकी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे? नोटबन्दी की वजह से जिन करोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी ख़त्म हो गयी, उसकी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे? नोटबन्दी की वजह से जैसे सारा का सारा काला धन रातों-रात सफ़ेद हो गया, उसकी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे?

demonetisation

 

Demonetisation Impact

नोटबन्दी को लागू करने के लिए जनता के जो ढाई लाख करोड़ रुपये बर्बाद हो गये, उसकी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे? नोटबन्दी के बावजूद न तो आतंकवाद की कमर टूटी और न ही नक्सलवाद की तो इसकी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे? नोटबन्दी की आड़ में पेटीएम जैसी कम्पनियाँ डिज़िटल लेन-देन को बढ़ावा देने के नाम पर जैसे मालामाल हो गयीं, उसकी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे? नोटबन्दी की वजह से खेती-मज़दूरी और व्यापार-कारोबार ये जुड़ी देश की उस 90 फ़ीसदी जनता को हुई तकलीफ़ की ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे, जिसे असंगठित क्षेत्र कहा जाता है? नोटबन्दी की वजह से किसी भी धन्ना सेठ का बाल तक बाँका नहीं हुआ, इसकी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे?

नोटबन्दी के बाद जैसे पर्याप्त तैयारियों के बग़ैर सरकार ने अपना खोटा जीएसटी देश की जनता पर थोप दिया, उसकी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे? इन अदूरदर्शी फ़ैसलों की वजह से औंधे मुँह गिरी देश की अर्थव्यवस्था की ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे? विकास दर में आयी गिरावट के रूप में सामने आये 4 लाख करोड़ रुपये के नुकसान की ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे? साफ़ है कि ज़िम्मेदारी लेने की सारी चोचलेबाज़ी सिर्फ़ और सिर्फ़ लफ़्फ़ाज़ी है! ताकि प्रधानमंत्री देश को ये सन्देश दे सकें कि उन्होंने जितनी भी नादानियाँ की हैं, वो अन्ततः देश का भला करने के लिए ही की हैं। लेकिन ऐसा है नहीं। क्योंकि ज़िम्मेदारी लेने का मतलब आख़िर होता क्या है?

सरकार अपने सैनिकों के प्रति ये ज़िम्मेदारी निभाती है कि यदि कर्तव्य-निर्वहन के दौरान वो घायल हो जाते हैं तो उनके इलाज़ का, उनके परिवार की देखरेख का सारा ज़िम्मा सरकार का होगा। यहाँ तक कि यदि वो अपंग हो जाएँ, या शहीद हो जाएँ, तो भी देश एक पूर्व निर्धारित नीति के मुताबिक़ उनकी ज़िम्मेदारियों को उठाएगा या क्षतिपूर्ति करेगा। ऐसा ही अन्य सरकारी कर्मचारियों के मामलों में भी होता है। इसी तरह, सरकार रेल यात्रियों की सुरक्षित यात्रा की कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती। फिर भी हादसों की दशा में पीड़ितों की मदद की जाती है। यहाँ तक कि जहाँ सरकार क़सूरवार नहीं ठहरायी जा सकती, वहाँ अनुग्रह राशि देकर पीड़ितों की मदद करने की परम्परा है। लेकिन ज़रा सोचिए कि नोटबन्दी और जीएसटी ने जिन लोगों की कमर तोड़ दी, क्या उनकी कोई भी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री ले सकते हैं? हर्ग़िज़ नहीं! इसीलिए, नरेन्द्र मोदी, हवाबाज़ी दिखाते हुए ‘ज़िम्मेदारी लेने’ की जुमलेबाज़ी करके जनता को सिर्फ़ बेवकूफ़ ही बना रहे हैं!

 

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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‘मी टू मूवमेंट’ का एकजुट होकर समर्थन करना चाहिए : महेश भट्ट

“हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

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mahesh bhatt

नई दिल्ली, 16 अक्टूबर | फिल्मों के जरिए बेबाकी से सामाजिक मुद्दों को सुनहरे पर्दे पर उतारने वाले निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट ने देश में चल रहे ‘मी टू मूवमेंट’ पर भी बेबाकी से अपनी राय दी है। उन्होंने कहा है कि यह कुछ ऐसा है, जिससे हम अलग-अलग विचार रखकर नहीं निपट सकते हैं। हमें पूरी जिम्मेदारी व एकजुटता के साथ इसका समर्थन करना चाहिए।

महेश भट्ट 12 अक्टूबर को रिलीज हुई अपनी होम प्रोडक्शन की फिल्म ‘जलेबी’ के प्रचार के लिए दिल्ली आए थे। उन्होंने बताया कि उनकी फिल्म में दिखाया गया प्यार किस तरह हिंदी फिल्मों में दिखाए जाने वाले पारंपरिक प्यार से अलग है।

महेश से जब पूछा गया कि फिल्म की कहानी अन्य प्रेम कहानियों से कितनी अलग है तो उन्होंने आईएएनएस को बताया, “हमारी फिल्म प्यार के उतार-चढ़ावों और उसकी बारीकियों से बड़ी हिम्मत से आंख मिलाती है। यह पारंपरिक हिंदी फिल्मों से इतर है। इसके अंत में लिखा आता है ‘एंड दे लिव्ड हैपिली एवर आफ्टर’। लेकिन वास्तव में प्यार परियों की कहानी से परे है। इंसानी सोच ने प्यार को शादी की परंपरा से जोड़ दिया, लेकिन प्यार तो कुदरत की देन है।

उन्होंने कहा, “आप देखें कि इस देश में राधा-कृष्ण के प्रेम को मंदिरों में बिठाया गया है, जबकि राधा-कृष्ण का प्यार शादी के बंधन तक सीमित नहीं था। हमारी फिल्म एक तरह से इसी तरह के प्यार और दो इंसानों की भावनाओं को पेश करती है।”

महेश कहते हैं, “फिल्म की सबसे खास बात यह है कि इसने नौजवान पीढ़ी को बहुत सम्मान दिया है। फिल्म के माध्यम से बताया गया है कि यह आज के दौर के जो युवा हैं या दर्शक हैं, वे जिंदगी से जुड़ी इस गहरी बात को समझेंगे।”

‘जलेबी’ के पोस्टर ने सुर्खियां और विवाद दोनों बटोरे थे। इसमें फिल्म की हीरोइन ट्रेन की खिड़की से चेहरा निकालकर हीरो को ‘किस’ करती नजर आती है। इसका जिक्र करने पर महेश हंसते हुए कहते हैं, “यह मार्केटिंग की जरूरत थी कि हम फिल्म की पहली ऐसी तस्वीर जारी करें, जिससे हल्ला मच जाए और देखिए आज आप भी यही सवाल पूछ रही हैं।..दरअसल, जब से हमारे संचार के माध्यम बदले हैं और हम शब्दों से तस्वीरों पर आए हैं, तब से अभिव्यक्ति ज्यादा असरदार हो गई है। तस्वीरों का असर ज्यादा होता है..उसका मिजाज कुछ अलग होता है। वास्तव में यह तस्वीर महिलाओं की आजादी को प्रतिबिंबित करती है।”

फिल्म की पृष्ठभूमि पुरानी दिल्ली है। इसके पीछे की वजह पूछे जाने पर महेश ने कहा, “इसका श्रेय फिल्म के निर्देशक (पुष्पदीप भारद्वाज) को जाता है। इनकी परवरिश पुरानी दिल्ली की जिन गलियों में हुई है, उन्होंने उन्हीं गलियों को पर्दे पर उतारा है। कोई शख्स जब किसी दौर में जिन पलों को जीता है तो जब वह उन्हें पर्दे पर उतारता है तो उसकी अदा कुछ और होती है।

महेश कहते हैं, “हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

‘मी टू मूवमेंट’ के बारे में आलिया भट्ट के पापा ने कहा, “हमें इस पहल का समर्थन करना चाहिए। यहां हमें अपनी जिम्मेदारी भी निभाने की जरूरत है। हम अलग-अलग राय रखकर इस समस्या का हल नहीं निकाल सकते, हम संवेदना और समझदारी के साथ इसका समाधान तलाशना होगा।”

–आईएएनएस

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‘आयुष्मान योजना काफी नहीं, लोगों को मिले स्वास्थ्य का अधिकार’

मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।

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Picture Credit : Quartz

नई दिल्ली, 17 अक्टूबर | देश में एक तरफ जहां महिला सशक्तिकरण का बड़ा जोरो-शोरो से ढिंढोरा पीटा जाता है, वहीं एक विश्वविद्यालय की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कामकाजी 92 प्रतिशत महिलाओं को प्रति माह 10,000 रुपये से भी कम की तनख्वाह मिलती है। इस मामले में पुरुष थोड़ा बेहतर स्थिति में हैं। लेकिन हैरत की बात यह है कि 82 प्रतिशत पुरुषों को भी 10,000 रुपये प्रति माह से कम की तनख्वाह मिलती है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र ने श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधार पर स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें उन्होंने देश में कामकाजी पुरुषों और महिलाओं पर आंकड़े तैयार किए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर 67 प्रतिशत परिवारों की मासिक आमदनी 10,000 रुपये थी जबकि सातवें केंद्रीय वेतन आयोग (सीपीसी) द्वारा अनुशंसित न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये प्रति माह है। इससे साफ होता है कि भारत में एक बड़े तबके को मजदूरी के रूप में उचित भुगतान नहीं मिल रहा है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है। यह आंकड़े पूरे भारत के हैं।”

उन्होंने कहा, “मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुताबिक, चिंता की बात यह है कि विनिर्माण क्षेत्र में भी 90 प्रतिशत उद्योग मजदूरों को न्यूनतम वेतन से नीचे मजदूरी का भुगतान करते हैं। असंगठित क्षेत्र की हालत और भी ज्यादा खराब है। अध्ययन के मुताबिक, तीन दशकों में संगठित क्षेत्र की उत्पादक कंपनियों में श्रमिकों की उत्पादकता छह प्रतिशत तक बढ़ी है, जबकि उनके वेतन में मात्र 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

क्या आप मानते हैं कि शिक्षित युवाओं के लिए वर्तमान हालात काफी खराब हो चुके हैं, जिस पर सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने कहा, “आज की स्थिति निश्चित रूप से काफी खराब है, खासकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में। हमें उन कॉलेजों से बाहर आने वाले बड़ी संख्या में शिक्षित युवाओं का बेहतर उपयोग करने की आवश्यकता है।”

इस स्थिति को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है, के सवाल पर उन्होंने आईएएनएस को बताया, “स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं, जैसे अगर सरकार सीधे गांवों व छोटे शहरों में रोजगार पैदा करे, इसके साथ ही बेहतर बुनियादी ढांचे (बिजली, सड़कों) उपलब्ध कराएं और युवाओं को कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध को सुनिश्चित करें, जिससे कुछ हद तक हालात सुधर सकते हैं।”

श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) के मुताबिक, 2015-16 के दौरान, भारत की बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी जबकि 2013-14 में यह 4.9 फीसदी थी। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि बेरोजगारी दर शहरी क्षेत्रों (4.9 फीसदी) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों (5.1 फीसदी) नें मामूली रूप से अधिक है।

अध्ययन के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाओं के बीच बेरोजगारी दर अधिक है। राष्ट्रीय स्तर पर महिला बेरोजगारी दर जहां 8.7 प्रतिशत है वहीं पुरुषों के बीच यह दर चार प्रतिशत है। काम में लगे हुए व्यक्तियों में से अधिकांश व्यक्ति स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं। राष्ट्र स्तर पर 46.6 प्रतिशत श्रमिकों स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं, इसके बाद 32.8 प्रतिशत सामयिक मजदूर हैं।

अध्ययन के मुताबिक, भारत में केवल 17 प्रतिशत व्यक्ति वेतन पर कार्य करते हैं और शेष 3.7 प्रतिशत संविदा कर्मी हैं।

–आईएएनएस

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नई नौकरियां नहीं पैदा हुई, देश में बढ़ी बेरोजगारी दर

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

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unemployment in India

नई दिल्ली/बेंगलुरू, 16 अक्टूबर | अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र की एक हालिया रिपोर्ट में बेरोजगारी दर के 20 वर्षो में सबसे अधिक होने की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने भारत में बेरोजगारी दर के बढ़ने की वजह नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना और शिक्षित युवाओं के तेजी से श्रमबल में शामिल होने को बताया है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है।”

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

अमित बसोले ने कहा, “देश में बढ़ती बेरोजगारी के पीछे दो कारक हैं, पहला 2013 से 2015 के बीच नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना क्योंकि कुल कार्यबल (नौकरियों में लगे लोगों की संख्या) बढ़ने की बजाय घट गया है। दूसरा कारक यह है कि श्रम बल में प्रवेश करने वाले अधिक शिक्षित युवा, जो उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी, जो पिछले 20 वर्षो में सबसे ज्यादा देखी गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में वृद्धि नहीं हुई है। अध्ययन के मुताबिक, जीडीपी में 10 फीसदी की वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में एक प्रतिशत से भी कम की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में बढ़ती बेरोजगारी को भारत के लिए एक नई समस्या बताया गया है।

इन हालात से निपटने के लिए क्या सरकार ने पर्याप्त कदम उठाए हैं, इस पर अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने बताया, “इन हालात पर सरकार के प्रदर्शन का मूल्यांकन करना थोड़ा मुश्किल है, विशेष रूप से 2015 के बाद क्योंकि उसके बाद से सरकार ने समग्र रोजगार की स्थिति पर कोई डेटा जारी नहीं किया है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग द इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) जैसे निजी स्रोतों के उपलब्ध डेटा से पता चलता है कि नौकरियों का सृजन कमजोर ही बना रहेगा। सीएमआईई डेटा यह भी इंगित करता है कि नोटबंदी के परिणामस्वरूप नौकरियों में कमी आई है, सरकार ने इस पर भी कोई डेटा जारी नहीं किया है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2018 की रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में अंडर एंप्लॉयमेंट और कम मजदूरी की भी समस्या हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त और युवाओं में बेरोजगारी 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है। बेरोजगारी पूरे देश में हैं, लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देश के उत्तरी राज्य हैं।

अमित बसोले ने यह भी कहा कि भारत के नौकरी बाजार की प्रकृति बदल गई है क्योंकि बाजार में अब अधिक शिक्षित लोग आ चुके हैं, वह उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं। उन्होंने कहा, “पिछले दशक में श्रम बाजार बदल गया है, विभिन्न डिग्रियों के अनुरूप रोजगार पैदा नहीं हुए हैं।”

हालात को सामान्य बनाने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाने चाहिए, इस सवाल पर रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने आईएएनएस को बताया, “यह हालात को सामान्य बनाने का सवाल नहीं है। इसके बजाय, हमें एक उचित राष्ट्रीय रोजगार नीति विकसित करने की आवश्यकता है, जो केंद्र द्वारा आर्थिक नीति बनाने में नौकरियों का सृजन करेगी।”

–आईएएनएस

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