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मानो या न मानो, MeToo के नाम पर एमजे अकबर इस्तीफ़ा नहीं देने वाले!

दस महिला पत्रकारों ने उनके हवसी स्वभाव की परतें उधेड़ दी हैं। मुमकिन है कि फ़ेहरिस्त और लम्बी होती चली जाए। इसीलिए चाल-चरित्र-चेहरा तथा भारतीय संस्कारों के सबसे प्रखर संरक्षक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके सियासी धड़े बीजेपी ने प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरीक़े से साफ़ कर दिया है कि एमजे अकबर का बाल बाँका तक नहीं होने वाला।

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#MeToo यानी दुनिया भर की उन महिलाओं की आवाज़ जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी में कभी ना कभी यौन-उत्पीड़न का दंश झेला हो और वो भी किसी नामी-गिरामी या जानी-पहचानी हस्ती की हवाले से! जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है, जो #MeToo से अछूता हो! भारत ही नहीं, सारी दुनिया के लिए यही हक़ीक़त है। वो बात अलग है, तमाम पतित करतूतों की तरह, #MeToo के तहत बेनक़ाब होने वाले लोग, भी ख़ुद को पाक-साफ़ बताने में लगे हैं! ये स्वाभाविक भी है, क्योंकि क्या कभी किसी ‘शरीफ़’ आदमी ने ये क़बूल किया है कि उसके चोले में कैसी हवस भरी हुई है!

#MeToo मुद्दे ने अभी तक देश में जैसे-जैसे रूप दिखाये हैं, उससे किसी ग़ुनहगार को फ़ौज़दारी क़ानूनों के तहत, सलाखों के पीछे पहुँचा पाना तक़रीबन नामुमकिन है। क्योंकि क़ानून को सबूत चाहिए, जो ऐसे मामलों में अक्सर होते नहीं या जो कुछ सबूत होते भी हैं वो भी किसी आरोपी को अदालत में अपराधी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हो पाते। लेकिन इस #MeToo से हवसी मर्दों की छवि को तकड़ी चोट ज़रूर पहुँचायी जा सकती है। वो बात अलग है कि ऐसे मर्द ख़ुद को धर्मात्मा साबित करने के लिए पीड़ितों को अदालतों में घसीटेंगे और मुक़दमों का अम्बार झेल हमारी न्यायपालिका पर कुछ बोझ और बढ़ जाएगा। अब यदि हम ये मान लें कि सामाजिक व्यवस्थाएँ, क़ानूनों से कम और लोकलाज़ की धारणाओं से ज़्यादा प्रभावित होती हैं। तो #MeToo का तीर एक बार क़मान से निकलने के बाद, न तो बेकार साबित होने वाला है और ही खाली हाथ रहने वाला है! ये अपने सामान्य लक्ष्य को ज़रूर हासिल करेगा!

ये लोकलाज़ ही है जिसके आधार पर केन्द्रीय विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर की ज़िन्दगी के ‘अच्छे दिन’ अब ख़त्म हो लिये। उनके ख़राब दिनों वाली घड़ी बहुत तेज़ी से भाग रही है। दस महिला पत्रकारों ने उनके हवसी स्वभाव की परतें उधेड़ दी हैं। मुमकिन है कि फ़ेहरिस्त और लम्बी होती चली जाए। इसीलिए चाल-चरित्र-चेहरा तथा भारतीय संस्कारों के सबसे प्रखर संरक्षक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके सियासी धड़े बीजेपी ने प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरीक़े से साफ़ कर दिया है कि एमजे अकबर का बाल बाँका तक नहीं होने वाला। उन पर आलाक़मान का आशीर्वाद पहले की तरह ही बरसता रहेगा!

बीजेपी के तमाम बड़े नेताओं और केन्द्रीय मंत्रियों ने तय कर लिया है कि अकबर का इस्तीफ़ा माँगने वालों के आगे ‘56 इंची गंगा पुत्र’ झुकने वाले नहीं हैं! क्योंकि पार्टी को अच्छी तरह पता है कि यदि एक बार झुके तो गये काम से! ‘इस्तीफ़ों के सर्ज़िकल हमले’ वाली नौबत आ जाएगी! कितने नेताओं के इस्तीफ़े होंगे? मुमकिन है कि इस चुनावी मौसम में बहुत सारी नारियाँ उन नेताओं को ब्लैकमेल भी करें कि ‘टिकट नहीं दिया तो #MeToo कर दूँगी!’

राजनीतिक दलों में #MeToo पीड़िताओं की भरमार है। लेकिन संघर्ष को मुकाम पर पहुँचाना बहुत मुश्किल होता है। याद है ना कि नारायण दत्त तिवारी का बेटा और बीवी बनने के लिए रोहित और उज्ज्वला शर्मा को कितने पापड़ बेलने पड़े थे। वो तो ग़नीमत थी कि वैज्ञानिकों ने डीएनए तकनीक विकसित कर दी, वर्ना ईश्वर भी न्याय नहीं दिला पाते! जब डीएनए नहीं था, तब क्या किसी को कभी न्याय मिला? बेचारी कुन्ती को भी कर्ण को त्यागना पड़ा था!

मानव इतिहास का विशाल अलिखित हिस्सा #MeToo से सराबोर है! असंख्य कहानियाँ हैं! हर युग में नारियाँ शोषित होती रही हैं! नारी-देह है ही ऐसी कि पुरुषों को विचलित कर दे। बेचारी स्त्रियाँ, न तो अपने अबोध बचपन में सुरक्षित हैं और ना ही नक़ाब, हिजाब, बुर्का, घूँघट और पर्दे में! आप कहाँ से शुरू करेंगे! कहाँ पहुँचेंगे! ये तो अथाह आकाशगंगा है! सदियों से प्रवाहमान है!

यही वजह है कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने साफ़ कर दिया कि “देखना पड़ेगा कि यह [एमजे अकबर के ख़िलाफ़ लगे आरोप] सच हैं या ग़लत! हमें उस शख्स के पोस्ट की सत्यता जाँचनी होगी, जिसने आरोप लगाये हैं। मेरा नाम इस्तेमाल करते हुए भी, आप कुछ भी लिख सकते हैं!” अमित शाह का ये बयान जुमला नहीं है। वोट बटोरने या जनता को ग़ुमराह करने के लिए दिये जाने भाषणों की तरह सच्चाई से कोसों दूर भी नहीं है। आख़िर, बीजेपी का मुखिया ये कैसे मान लेगा कि उसके ख़ानदान में कोई ‘गन्दा व्यक्ति’ हो भी सकता है!

अकबर पर तो हवसी होने का इल्ज़ाम है, वो भी अभी पुलिस-थाने तक नहीं पहुँचा है। सिर्फ़ हवा में ही तैर रहा है। हवा में तैरती बातों को लेकर भी कहीं इस्तीफ़े होते हैं! ग़नीमत है कि अमित शाह ने अभी ब्रह्मास्त्र नहीं चलाया कि ‘#MeToo के तहत हो रहे ख़ुलासे भी वैसे ही झूठे हैं, जैसे कि राफ़ेल घोटाला!’ क्योंकि वो कह रहे हैं, बीजेपी कह रही है, निर्मला कह रही हैं, जेटली कह रहे हैं, पीयूष कह रहे हैं, पात्रा तो भौंकता ही है और रविशंकर तो चीख़ते ही हैं।

एमजे अकबर का परोक्ष बचाव करने के लिए बीजेपी की तमाम महिलाएँ आगे आयीं। हालाँकि, अकबर की बॉस और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पहले दिन से ही ख़ामोशी ओढ़ रखी है। लेकिन फ़ायर ब्रॉन्ड साध्वी रहीं, केन्द्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्री उमा भारती की दलील है कि “अकबर से जुड़ा मामला तब का है जब वो केन्द्र सरकार में मंत्री नहीं थे। यह मामला पूरी तरह महिला और अकबर के बीच है।” अनुभवी उमा के ऐसे बयान के सामने कौन हथियार नहीं डाल देगा! अलबत्ता, बीजेपी में ऐसे लोगों की भरमार है, जो राहुल गाँधी से चार पीढ़ियों का हिसाब माँगते हैं! मानों राहुल गाँधी ने ही नेहरू, इन्दिरा और राजीव को प्रधानमंत्री तथा सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बनाया हो!

दरअसल, संघ और बीजेपी ऐसे संगठन हैं जिन पर तथ्यों और तर्कों की कभी कोई बन्दिश नहीं रहती! तभी तो परम विदुषी और केन्द्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति इरानी ने अकबर प्रसंग को लेकर रहस्योद्घाटन किया कि “मेरा मानना है कि इस मामले में सम्बन्धित व्यक्ति [एमजे अकबर] को ही बयान जारी करना चाहिए। क्योंकि मैं व्यक्तिगत तौर पर वहाँ [जहाँ-जहाँ अकबर पुराण की लीलाएँ हुई] मौजूद नहीं थी।” अब ज़रा सोचिए कि इससे समझदारी भरा बयान क्या कुछ और हो सकता है! हर्ग़िज़ नहीं। लेकिन यही समझदारी स्मृति के उन बयानों में कभी नहीं दिखायी देती जब वो राहुल गाँधी या नेहरू-गाँधी परिवार पर हमले करती हैं। वो जिन-जिन प्रसंगों का ब्यौरा देती हैं, क्या वहाँ कभी मौजूद थीं?

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री के आसन पर सुशोभित, रीता बहुगुणा जोशी भी #MeToo विषयक विद्वान बनकर उभरी हैं। बेचारी बहुत पढ़ी-लिखी हैं। कभी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाती भी थीं। रीता के समझ में ही नहीं आ रहा कि इस्तीफ़ा किस बात पर! तभी तो कहती हैं, “सवाल इस्तीफ़े का नहीं है। सवाल ये है कि अगर मैं किसी पर आरोप लगाऊँ तो वो सिद्ध हो।” अब इनसे कौन पूछे कि क्या आरोप लगाते ही सिद्ध हो जाते हैं? या फिर आरोपों की तह तक पहुँचने और उसकी सच्चाई जानने की भी तय प्रक्रिया को अपनाना पड़ता है। क्या जाँच की इस प्रक्रिया के पूरा हुए बग़ैर कभी आरोप सही या ग़लत साबित होता है!

रीता बहुगुणा की ही तरह, मध्य प्रदेश बीजेपी महिला मोर्चा अध्यक्ष लता एलकर भी, ग़ज़ब का नमूना निकलीं। सार्वजनिक जीवन के लम्बे अनुभवों का वास्ता देते हुए उन्होंने ख़ुलासा किया कि “पत्रकार बहनों को मैं कोई ऐसी innocent (मासूम, भोली-भाली) महिला नहीं कहती कि जिसका कोई भी misuse (बेज़ा इस्तेमाल) कर ले।”

इसका मतलब ये हुआ कि #MeToo के तहत ख़ुलासे करने वाली सभी महिला पत्रकार बहुत सयानी या शातिर हैं और अभी पूर्वजन्म के किसी बैर का बदला लेने के लिए एमजे अकबर जैसे धर्मात्मा व्यक्ति पर लाँछन लगा रही हैं! ग़नीमत हैं कि उन्होंने इसके पीछे काँग्रेस की साज़िश होने का ख़ुलासा नहीं किया और ना ही महिला पत्रकारों को बिका हुआ बताया। लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं है कि आने वाले दिनों में आपको ऐसे बयान सुनाई नहीं देंगे।

बीजेपी में अभी सैकड़ों प्रतिष्ठित महिलाएँ और हैं जिनकी बयान आना बाक़ी है। ये बयान जब आएँगे, तब आएँगे। लेकिन जैसे अन्धों के गाँव में भी एक काना ज़रूर होता है, वैसे ही बीजेपी में भी कभी-कभार समझदारी भरी बातें भी सुनायी देती हैं! तभी तो #MeToo को लेकर केन्द्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गाँधी ने कहा, “मैं उन सब [उत्पीड़ित महिलाओं] पर विश्वास करती हूँ! मैं प्रत्येक शिकायतकर्ता के दर्द और सदमे को समझती हूँ!” पूरे प्रसंग में भगवा ख़ेमे से निकला, यही इकलौता समझदारी भरा बयान है। ये उस महिला के मुँह से निकला है, जो इत्तेफ़ाकन, नेहरू-गाँधी ख़ानदान की ही एक वारिस है!

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सिन्धु का पानी तो भारत सिर के बल खड़े होकर भी नहीं रोक सकता!

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indus water treaty

पुलवामा हमले के बाद देश में राष्ट्रभक्ति का उन्माद है। कोई युद्ध की दुन्दुभि बजा रहा है, तो कोई पाकिस्तान को दिये गये मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन (MFN) के दर्ज़े को ख़त्म करने को निर्णायक कार्रवाई के रूप में पेश कर रहा है। उन्माद की आग इतना प्रचंड है कि पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने पाकिस्तान को जा रहे सिन्धु नदी के पानी को रोकने का मशविरा दे डाला। उरी हमले (18 सितम्बर 2016) के हफ़्ते भर बाद ख़ुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी ये जुमला छोड़ चुके हैं कि पानी और ख़ून एक साथ नहीं बह सकता। हालाँकि, सिन्धु नदी की भौगोलिक सच्चाई ऐसी है कि भारत यदि सिर के बल खड़ा हो जाए तो भी उसका पानी नहीं रोक सकता।

पुलवामा हमले के बाद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में विदेश सचिव रहे कंवल सिब्बल ने कहा कि “भारत को जितना सख़्त होना चाहिए, वो नहीं हो पा रहा है। भारत को सिन्धु जल सन्धि को तोड़ देना चाहिए। इससे पाकिस्तान सीधा हो जाएगा।” उरी हमले के 27 जनवरी 2017 को प्रधानमंत्री ने जालन्धर की एक चुनावी रैली में ऐलान किया कि “पंजाब के किसानों को ज़्यादा पानी मिलना चाहिए। इसके लिए हमने फैसला किया है कि सिन्धु नदी का जो पानी पाकिस्तान को चला जाता है, वो भारत को मिलना चाहिए।” इससे पहले 25 नवम्बर 2016 को भी मोदी ने बठिंडा की रैली में कहा था, “सिन्धु नदी का पानी भारतीय किसानों का है। हमारे किसानों को पर्याप्त पानी मुहैया कराने के लिए हम कुछ भी करेंगे।”

नामुमकिन है सिन्धु को रोकना

प्रधानमंत्री होने के नाते नरेन्द्र मोदी को अच्छी तरह से मालूम था कि पाकिस्तान के हिस्से वाले सिन्धु के पानी को रोकना तक़रीबन नामुमकिन है। सच्चाई तो ये है कि 1960 में दोनों पड़ोसियों के बीच हुए सिन्धु नदी जल समझौते के मुताबिक़, भारत को जो 20 फ़ीसदी पानी मिला था, उसके दोहन के लिए भी हम आज तक कोई ख़ास इन्तज़ाम नहीं कर पाये। कश्मीर के गुरेज़ सेक्टर में किशनगंगा नदी पर एक बड़ी पनबिजली परियोजना ज़रूर चल रही है, लेकिन एक तो इसके बनकर तैयार होने में अभी दसियों साल और लगेंगे तथा दूसरा इससे बन जाने के बाद भी सिन्धु बेसिन के कुल पानी के मुक़ाबले उसके मामूली सा हिस्से का ही दोहन हो पाएगा।

ऐसा नहीं है कि भारत की पूर्ववर्ती सरकारें सिन्धु नदी के पानी की अहमियत से अनजान थीं। बल्कि सच्चाई तो ये है कि सिन्धु के बेशुमार पानी को रोकना भारत के बूते का ही नहीं है। इसके लिए जितनी बड़ी इंज़ीनियरिंग और जितने अधिक धन का ज़रूरत होगी, उसे जुटाना भारत के लिए बहुत टेढ़ी खीर है। सिन्धु नदी का उद्गम चीन के क़ब्ज़े वाले तिब्बत से होता है। लेकिन महाशक्ति होने के बावजूद चीन चाहकर भी सिन्धु के पानी को अपने ही देश में नहीं रोक सकता। दरअसल, मनुष्य कितना भी बलशाली हो जाए, वो हरेक क़ुदरती ताक़त या भौगोलिक परिस्थिति को ठेंगा नहीं दिखा सकता। ग्लेशियरों (हिमनद) से निकलने वाली हिमालय की बारहमासी नदियाँ अपने साथ बहुत बड़ा पर्यावरण भी बनाती हैं। नदी के क़ुदरती मार्ग में बड़े फ़ेरबदल का सीधा मतलब है कि उसका सारा पर्यावरण भी बदलना होगा। यही पहलू हरेक कल्पना को सीमित करने के लिए काफ़ी है।

गंगा से भी बड़ी है सिन्धु

भारत, चीन और पाकिस्तान के बीच सिन्धु बेसिन क़रीब 11.5 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है। ये अपनी पाँच सहायक नदियों चिनाब, झेलम, सतलज, राबी और ब्यास के बेसिनों से मिलकर बना है। ये भारत के गंगा बेसिन से भी बड़ा है। उत्तर प्रदेश जैसे चार राज्य सिन्धु बेसिन में समा सकते हैं। सिन्धु की लम्बाई गंगा से भी अधिक यानी 3 हज़ार किलोमीटर से ज़्यादा है। सिन्धु के अलावा सतलज भी चीन से निकलती है। जबकि बाक़ी चारों नदियों का उद्गम स्थल भारतीय सीमा में ही है। कराची और कच्छ के रन के बीच सभी सहायक नदियाँ सिन्धु के डेल्टा में मिलते हुए अरब सागर में विलीन होती हैं।

1960 की सिन्धु जल सन्धि की बदौलत भारत और पाकिस्तान के बीच तीन-तीन नदियों का बँटवारा हुआ। सिन्धु, चिनाब और झेलम जैसी पश्चिमी नदियों का 80 फ़ीसदी पानी पाकिस्तान के और बाक़ी 20 फ़ीसदी पानी भारत के हिस्से में आया। इस पानी का इस्तेमाल सिंचाई और पनबिजली उत्पादन के लिए हो सकता है। बशर्ते, भारत नदी के दुर्गम रास्तों में ऐसे-ऐसे बाँध और बिजलीघर बना सकें जिससे नदी का प्रवाह एक सीमा से ज़्यादा बाधित नहीं हो। ऐसी परियोजनाओं को ‘Run of the river projects’ कहते हैं।

सिन्धु की आड़ में झाँसा

कश्मीर के दुर्गम पहाड़ी और बर्फ़ीले इलाकों की तो छोड़िए, अन्य क्षेत्रों में भी किसी एक नदी बेसिन के पानी को दूसरे नदी बेसिन की ओर ले जाना बहुत मुश्किल काम है। इसमें बड़े पैमाने पर आबादी के विस्थापन की नौबत भी आती है। सबसे बड़ी चुनौती ये है कि क़ुदरत ने किसी भी बेसिन को ऐसा नहीं बनाया है कि वो अपने पड़ोसी बेसिन के अधिकतर पानी को भी सम्भाल सके। वैसे नदियों को जोड़ने की योजना के तहत एक नदी के पानी को दूसरे नदी के बेसिन में भेजने की कल्पना को साकार करने का काम देश के एकाध राज्यों के बीच शुरू हुआ है। लेकिन इससे सम्बन्धित नदियाँ बहुत छोटी हैं।

ज़रा सोचिए कि इन तथ्यों को अच्छी तरह से जानने-समझने के बावजूद देश के महत्वपूर्ण लोग भारतवासियों को कैसी अज्ञानता में ढकेलना चाहते हैं! ऐसे लोगों की मंशा को बेनक़ाब करना ही असली राष्ट्रभक्ति है जो जनता की आँखों में धूल झोंककर अपना सियासी उल्लू सीधा करना चाहते हैं। ऐसा नहीं होने की वजह से ही अन्ध-भक्तों की टोली उन्माद फ़ैलाने लगती हैं। मानों, सिन्धु नदी का पानी रोकना किसी बहते नल को बन्द कर देने जैसा आसान काम है।

भारत में भी तबाही लाएगी सिन्धु

भौगोलिक दृष्टि से देखें तो दो-तिहाई पाकिस्तान सिन्धु बेसिन में बसा है। पाकिस्तान ने सिन्धु पर कई बाँध, सिंचाई के लिए नहरें और पनबिजलीघर बनाये हैं। सिन्धु नदी के अपने ही हिस्से का पानी रोकने के लिए भी भारत को कई विशाल बाँध, विकराल सुरंगें, नहरों का व्यापक जाल तैयार करना होगा। इतना होने के बाद ही सिन्धु जल सन्धि को तोड़ने की बात हो सकती है। कल्पना कीजिए कि जब पाकिस्तान को सिन्धु का पानी नहीं मिलेगा, वहाँ पानी के लिए हाहाकार मचेगा तो क्या दुनिया की महाशक्तियाँ मानवाधिकारों की दुहाई देते हुए दख़ल नहीं देंगी? क्या इससे ऐसा तनाव नहीं पैदा होगा कि युद्ध की नौबत आ जाएगी? युद्ध की दशा में विशाल बाँधों की सुरक्षा असम्भव हो जाएगी। बाँधों के टूटने से पाकिस्तान में तबाही तो बाद में होगी, पहले तो भारत पर क़हर बरपा होगा।

साफ़ है कि जो भी सिन्धु के पानी को रोकने की बातें करने वाले सिर्फ़ हवाई क़िले बनाते हैं। ज़मीनी हक़ीक़त तो ये है कि आज भारत के अधिकतर राज्य अपनी नदियों के पानी को लेकर आपस में ऐसे झगड़ते हैं, मानों वो नेक-दिल पड़ोसी नहीं बल्कि एक-दूसरे के जानी-दुश्मन हों। पंजाब और हरियाणा भी दशकों से यमुना लिंक नहर की मसला नहीं सुलझा सके। पंजाब के लोग किसी भी क़ीमत पर हरियाणा को पानी नहीं देना चाहते। भले ही वो समुन्दर में ही बहकर क्यों न चला जाए! इस जल-विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट के कड़े रवैये से भी आजकल कुछ भी हासिल नहीं हुआ।

राज्यों और केन्द्र में चाहे क्षेत्रीय दलों की सरकारें रही हों या बीजेपी-काँग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों की, देश में अभी तक तो अपनी नदियों के पानी से जुड़े झगड़ों के समाधान की संस्कृति विकसित नहीं हो सकी। फिर भी तुर्रा ये कि हम सिन्धु को मुट्ठी में बाँध लेंगे! काश! ढींगे हाकनें की भी कोई सीमा होती।

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दिग्गज मिसाइल निर्माता कंपनी ईडी के घेरे में

कई सूत्रों ने पुष्टि की है कि एमबीडीए के भारत प्रमुख लोइस पीडीवाचे को सोमवार को ईडी की दिल्ली शाखा में पेश होने को कहा गया है। सूत्रों ने दावा किया कि भारतीय बलों के साथ कंपनी के जुड़ाव पर सवालों के अलावा उससे तलवार के एनजीओ में भुगतान पर भी सवाल किए जाएंगे।

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नई दिल्ली, 17 फरवरी | राफेल लड़ाकू विमान विवाद के चरम पर पहुंचने के बाद मिसाइल बनाने वाली यूरोप की दिग्गज कंपनी एमबीडीए भारतीय जांच एजेंसियों के घेरे में आ गई है। एमबीडीए राफेल लड़ाकू विमान के लिए प्रमुख मिसाइल आपूर्तिकर्ता है और कंपनी 30 हजार करोड़ रुपये के ऑफसेट कार्यक्रम में शामिल है। ऑफसेट कार्यक्रम 36 युद्धक विमानों से जुड़ा है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कॉरपोरेट लॉबिस्ट दीपक तलवार से कंपनी के रिश्ते के संबंध में एमबीडीए के कंट्री हेड को जांच में शामिल होने के लिए समन जारी किया है।

सरकार के एक अधिकारी के मुताबिक, तलवार की एमबीडीए में हिस्सेदारी है। उसे पिछले महीने दुबई से प्रत्यर्पित कर लाया गया था। ऐसा माना जाता है कि उसने संप्रग शासन के दौरान एयरबस के साथ कई सौदों में मुख्य भूमिका निभाई थी।

कई सूत्रों ने पुष्टि की है कि एमबीडीए के भारत प्रमुख लोइस पीडीवाचे को सोमवार को ईडी की दिल्ली शाखा में पेश होने को कहा गया है। सूत्रों ने दावा किया कि भारतीय बलों के साथ कंपनी के जुड़ाव पर सवालों के अलावा उससे तलवार के एनजीओ में भुगतान पर भी सवाल किए जाएंगे।

सूत्रों के मुताबिक, तलवार के एनजीओ एडवांटेज इंडिया को 11 जून, 2012 से 17 अप्रैल, 2015 के बीच एमबीडीए और एयरबस से 88 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था। बाद में पूरी राशि फर्जी खरीद के जरिए निकाल ली गई थी।

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि ऐसा बहुत ही कम होता है कि एक यूरोपीय रक्षा कंपनी के कंट्री हेड को जांच में शामिल होने के लिए समन दिया गया हो।

सरकार के एक सूत्र ने दावा किया कि लोइस करीब एक दशक से भारत में कंपनी के संचालन का जिम्मा संभाल रहे हैं। मिराज अपग्रेड प्रोग्राम और राफेल पर भारत में लोइस के कार्यकाल के दौरान ही हस्ताक्षर किए गए थे और उसके पास गुप्त जानकारियां होंगी।

एक अधिकारी ने कहा, “अगर जरूरत पड़ी तो जांच एजेंसी समूह निर्यात निदेशक जीन लुक लामोथे को भी समन जारी कर सकती है। सबसे पहले लोइस से कंपनी द्वारा तलवार के एनजीओ को किए गए भुगतान के बारे में बताने के लिए कहा जाएगा।”

लोइस तक पहुंचने का प्रयास व्यर्थ हो चुका है। एमबीडीए के एक प्रवक्ता ने कहा, “एनबीडीए अधिकारियों के सवालों में पूरा सहयोग करेगी और जारी जांच पर कोई टिप्पणी नहीं करेगी। हम भारतीय बाजार के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।”

कंपनी ने दावा किया कि वह अपनी कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पहल के हिस्से के रूप में भारत में कई सामाजिक विकास कार्यक्रमों में शामिल है। इसमें ही एडवांटेज इंडिया को किया गया भुगतान भी शामिल हो सकता है।

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विदेशी कंपनियां उठा रही हैं गलाकाट घरेलू रक्षा स्पर्धा का फायदा – तहकीकात

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नई दिल्ली, 17 फरवरी | कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछले साल 31 अगस्त को राफेल विमान सौदे में ‘वैश्विक भ्रष्टाचार’ के बारे में ट्वीट किया था। इससे महज एक सप्ताह पहले जर्मनी के हैम्बर्ग में तुर्की मूल के पूर्व जर्मन राजनेता और वर्तमान में एयरबस इंडस्ट्री के बिक्री निदेशक (लड़ाकू विमान अभियान) महमत तुर्केर से उनकी मुलाकात हुई थी। भारत हथियार डीलरों के समूह के जरिए काम करने वाली दुनिया की विमान विनिर्माता कंपनियों के लिए जंग का मैदान बन गया है। ये डीलर सौदे करने के लिए हर तरकीब का इस्तेमाल करते हैं। इनमें से कुछ में सरकार भी शामिल होती है। रक्षा प्रतिष्ठान का यह कहना है कि भारत में बड़ा खेल खेला जा रहा है।

विवादित हथियार डीलर संजय भंडारी के डिफेंस कॉलोनी स्थित आवास में 2016 में छापा पड़ा था और कथित तौर पर मीडियम मल्टी रोल कांबैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) सौदे से जुड़े दस्तावेज उसके पास से बरामद किए गए। दिल्ली पुलिस ने ऑफीशियस सीक्रेट एक्ट के तहत उसके खिलाफ मामला दर्ज किया था। उसके खिलाफ इंटरपोल का भी अलर्ट था। केंद्रीय गृहमंत्रालय के पास उसके खिलाफ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के कार्यकाल के दौरान 126 राफेल जेट की खरीद के सौदे से जुड़े कागजात की चोरी करने की रिपोर्ट मौजूद है।

भंडारी हालांकि सही मायने में अवांछित व्यक्ति नहीं है। तुर्केर की भंडारी से कई मुलाकातें हो चुकी हैं। भंडारी 2016 में हुई छापेमारी के बाद देश छोड़कर भाग गया। उनके पास नरेंद्र मोदी विरोधी गठबंधन तक पहुंच बनाने का विशेषाधिकार है क्योंकि वे फ्रांस में बने लड़ाकू हथियार से पूरी तरह लैस जेट विमानों की खरीद को लेकर सरकार पर निशाना साधने के लिए कांग्रेस के लिए जानकारी मुहैया करवाते हैं। भारत के बड़े विमान सौदे में भंडारी एकमात्र विवादित हथियार डीलर नहीं है जिस पर उंगली उठी है।

सुधीर चौधरी भारत के सबसे बड़े हाथियार एजेंट और लॉबिस्ट के रूप में शीर्ष स्तर है। वह केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच के घेरे में है और उम्मीद के अनुरूप वह देश से पलायन कर गया है। ग्रिमी पनामा पेपर्स मामले में उसका नाम सबसे बड़े खातधारकों में शुमार है।

भंडारी और चौधरी दोनों सरकार द्वारा प्रतिरक्षा के क्षेत्र में शुरू किए गए ऑफसेट कार्यक्रम के लाभार्थी रहे हैं। भंडारी को रिकॉर्ड 918 अरब डॉलर का अनुबंध मिला था। वह प्रियंका वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा का कारोबारी सहयोगी था। चौधरी से संबद्ध बेंगलुरू की कंपनी अल्फा डिजाइन को संप्रग के शासनकाल में 1,000 करोड़ रुपये का ऑफसेट कांट्रैक्ट दिया गया था। रक्षा सौदे में कुछ और गहरे राजनीतिक लिंक जुड़े हुए हैं, क्योंकि ऐसे सौदों में काफी पैसों की बात होती है।

पंजाब के पूर्व कांग्रेस विधायक अरविंद खन्ना का पुत्र और हथियार एजेंट विपिन खन्ना संप्रग सरकार के दौरान एंब्रेयर के साथ तीन विमानों की खरीद के सौदे के ऑफसेट कांट्रैक्ट में भारी रिश्वत लेने वालों में शामिल है। अरविंद खन्ना खुद अब हथियार एजेंट हैं।

चंडीगढ़ स्थित राजनेता संतोष बगरोडिया के भाई की सॉफ्टवेयर कंपनी आईडीएस इन्फोटेक ने 2007 में अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर सौदे में बड़ी रिश्वत ली थी। बगरोडिया के भाई सतीश की कंपनी को 1,400 करोड़ रुपये का ऑफसेट कांट्रैक्ट मिला था।

इस बड़े खेल में दुनियाभर में रक्षा सौदों के एजेंट, उनके संचालनकर्ता-हथियार विनिर्माता और विमान डीलरों ने सावधानीपूर्वक उन राजनेताओं की पहचान की है जिनके बारे में उनको लगता है कि वे उनके साझेदार बन सकते हैं।

विशेषाधिकार प्राप्त यूरोपीय संघ की खुफिया जानकारी में खुलासा हुआ है कि अमेरिका और चीन का मानना है कि अपने नेतृत्व में कांग्रेस को चुनावी लाभ दिलाने के लिए उग्र बने हुए राहुल गांधी उनकी भारत योजना के लिए महत्वपूर्ण हैं।

मोदी सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालय पाने का सपना पालने वाले अरुण शौरी शायद नोटबंदी, जीडीपी के आंकड़े राफेल सौदे समेत अन्य मुद्दों को उठाकर सरकार के पीछे पड़े हुए हैं। लेकिन कहानी कहीं बड़ी हो सकती है क्योंकि उनके साले रक्षा मामलों के लेखक हैं और वह लगातार 36 राफेल विमान की खरीद के विरोध में तर्क देते रहे हैं। उनके एक भतीजे टाटा कंपनी के लिए काम करते हैं और 2012 से टाटा डिफेंस की अगुवाई कर रहे हैं। रतन टाटा लॉकहीड मार्टिन के भारतीय साझेदार हैं। अमेरिकियों ने कहा है कि अगर भारत पेंटागन के विदेशी सैन्य बिक्री कार्यक्रम के तहत लॉकहीड मार्टिन के एफ-16 जेट विमान खरीदेगा तो वे सीएटीएसए प्रतिबंध हटा लेंगे।

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