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मीडिया और सरकार : कई सवाल अभी बाकी

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क्या सरकार आलोचनाओं से घबरा गई है? या आर्थिक मोर्चे पर विफलताओं की चर्चाओं से डरी हुई है? या फिर आंदोलनों को लेकर जवाब दे पाने की स्थिति में नहीं है? यदि नहीं तो सरकार की ओर से कैसे प्रेस/मीडिया को नियंत्रित करने, पत्रकारों को ब्लैक लिस्टेड तक कर देने का एकाएक फैसला ले लिया गया था?

ऐसे कई सवाल उस समय उठे थे, जब कुछ घंटों पहले ही लिए गए फैसले ने सरकार की मंशा पर सवाल उठा दिए थे, जिसमें फेक न्यूज के बढ़ने की बात कहते हुए पत्रकारों की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने और ब्लैक लिस्टेड तक कर देना शामिल था! लेकिन फैसले और इसके दूरगामी प्रभाव को देखते हुए प्रधानमंत्री ने खुद आगे बढ़कर न केवल इसे बदल दिया, बल्कि यह तक कह दिया कि मामला केवल भारतीय प्रेस परिषद में ही उठाया जाना चाहिए। निश्चित रूप से सरकार इस पूरे मामले में बैकफुट पर नजर आई। लेकिन सरकार की मंशा पर तो सवाल उठेंगे ही!

यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा ही ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ की सबसे बड़ी पक्षधर होने का दंभ भरती थी। यह भी सही है कि तमाम राजनैतिक दलों में भाजपा ही प्रमुख रही है, जिसके प्रवक्ता पहले भी और अब भी काफी मुखर होकर अपनी बातें विपक्ष में रहते हुए भी और सत्ता में आने के बाद भी कहने के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में सूचना प्रसारण मंत्री का यह फैसला निश्चित रूप से कई तरह के सवालों को खड़ा करता है। प्रधानमंत्री की ओर से भले ही मरहम लगाने की कोशिश की गई है, लेकिन फैसले ने कई चर्चाओं को विषय जरूर दे दिया है।

यह भी अहम हो चला है कि क्या स्मृति ईरानी ने, जो अतिउत्साह और लीक से हटकर काम करने के लिए जानी जाती हैं, बिना प्रधानमंत्री कार्यालय को बताए फैसला किया? या इसके पीछे कोई और वजह है? अब कारण जो भी हों, उनसे क्या। मुख्य तो यह है कि स्मृति ईरानी की नजरों में फेक न्यूज की परिभाषा क्या है? बिना परिभाषा तय हुए उन्होंने इतने बड़े और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को प्रभावित करने वाला, जानते-बूझते हुए कदम उठा लिया कि जो करने जा रही हैं, वह न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है, वरन आपातकाल के अघोषित ऐलान की पुनरावृत्ति जैसी बात होगी।

गौरतलब है कि स्मृति ईरानी के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने पत्रकारों की मान्यता संबंधी गाइड लाइंस को संशोधित करते हुए कहा था कि यदि कोई पत्रकार फर्जी खबरों के प्रकाशन या प्रसारण का दोषी पाया गया तो उसे ब्लैकलिस्टेड कर दिया जाएगा। इसमें फर्जी समाचार के प्रकाशन या प्रसारण की पुष्टि होती है तो पहली बार मान्यता छह महीने के लिए निलंबित होगी, दोबारा ऐसा करने पर साल भर मान्यता निलंबित रहेगी। लेकिन तीसरी बार उल्लंघन करते पाए जाने पर उस पत्रकार को हमेशा के लिए ब्लैकलिस्टेड कर दिया जाएगा और उसकी मान्यता स्थायी रूप से रद्द कर दी जाएगी, यानी पत्रकारिता के पेशे से छुट्टी।

आगे कहा था कि फैसला ‘प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया’ और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) लेगी जो प्रिंट और टेलीविजन मीडिया की नियामक संस्थाएं हैं। इस फैसले के बाद चुनावी तैयारियों में जुटी मोदी सरकार पर कई तरह के सवाल उठने शुरू हो गए थे। स्थिति की नजाकत को भांपते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने तुरंत चतुराई दिखाई, लेकिन सवाल तो यह बरकरार है कि क्या इसे प्रेस/मीडिया के प्रति सरकार का नजरिया नहीं कहा जाएगा?

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

–आईएएनएस

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अब सुप्रीम कोर्ट ही तय करेगा कि उसके मुखिया पर महाभियोग चलेगा या नहीं?

सच-झूठ को तय करने के लिए ही जाँच की जाती है। संविधान के मुताबिक़, उपराष्ट्रपति चाहकर भी जाँच समिति की जगह नहीं ले सकता। वेंकैया का ऐसा निर्णय इसीलिए असंवैधानिक है।

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CJI Dipak Misra

मोदी राज के कर्ताधर्ताओं का व्यवहार ऐसा है, जैसे ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि!’ मोदी राज में हम देखते रहे हैं कि किस तरह से शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं का पतन हो रहा है। न्यायपालिका में जारी गिरावट हमारे सामने है, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर अँगुलियाँ उठती रही हैं, भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) का कामकाज संविधान की भावना के मुताबिक़ नहीं हो रहा है, नोटबन्दी से लेकर बैंकों की डकैती डालकर देश से फ़ुर्र हो चुके बेईमानों ने साबित कर दिया है कि भारतीय रिज़र्व बैंक की दशा कितनी दयनीय हो चुकी है! लोकतांत्रिक मूल्यों, सिद्धान्तों और परम्पराओं के पतन का ऐसा अपूर्व सिलसिला अब और आगे बढ़ते हुए देश के दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद यानी उपराष्ट्रपति की गरिमा को भी आहत कर चुका है।

भारत के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ विपक्ष की ओर से लाये गये महाभियोग प्रस्ताव को उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने जिस मनमाने ढंग से ख़ारिज़ कर दिया है, उससे अब अराजनीतिक माना जाने वाला उनका पद भी राजनीति का मोहरा बन चुका है। वेंकैया नायडू का फ़ैसला ग़ैरक़ानूनी और असंवैधानिक है। इसीलिए शर्मनाक है। काँग्रेस की ये दलील हर तर्क के आधार पर सही है कि किसी भी व्यक्ति के ख़िलाफ़ लगाये गये आरोपों की जाँच किये बग़ैर उसे निर्दोष कैसे ठहराया जा सकता है? जाँच करना उपराष्ट्रपति के क्षेत्राधिकार में ही नहीं है। महाभियोग के मामले में जजों की ही एक ख़ास समिति ही जाँच कर सकती है। लेकिन यदि आरोप उस समिति के हवाले ही नहीं किये जाएँगे तो जाँच होगी कैसे?

उच्च न्यायपालिका के किसी जज को हटाना ज़रूरी है या नहीं, ये तय करना सांसदों का काम है। देश में किसी भी जज को, किसी भी मामले में, सही या ग़लत फ़ैसला सुनाने के लिए, दंडित नहीं किया जा सकता। इसका सिर्फ़ एक अपवाद हो सकता है कि जज ने किसी वजह से दुराचरण किया हो। ज़िला अदालतों के किसी जज के दुराचरण की जाँच करने और उसे दंडित करने का अधिकार सम्बन्धित हाईकोर्ट को होता है। जबकि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के दुराचरण के मामले में संविधान के अनुच्छेद 124 के मुताबिक़, सिर्फ़ महाभियोग चलाने का प्रावधान है। कोई मामला महाभियोग के लायक है या नहीं इसे तय करने का अधिकार सिर्फ़ सांसदों को है। सांसदों को भी निजी तौर पर महाभियोग का निर्णय लेना होता है।

महाभियोग के लिए पार्टियाँ अपने सांसदों को कोई आदेश नहीं दे सकतीं। सांसद भी सीधे किसी जज को नहीं हटा सकते। उन्हें संसद के किसी भी सदन में महाभियोग के लिए प्रस्ताव देना होगा, क्योंकि महाभियोग का मतलब ही है, महा-मुक़दमा यानी बहुत बड़ा मुक़दमा! इसे बहुत बड़ा बनाने के लिए इसकी शर्तों को बेहद सख़्त बनाया गया है। इसी सख़्ती की वजह से संविधान में महाभियोग के प्रस्ताव पर ग़ौर करने के लिए भी राज्यसभा के कम से कम 50 या लोकसभा के कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर की शर्त रखी गयी है। ताकि महाभियोग को किसी भी राजनीति से बचाया जा सके। सांसदों को भी सिर्फ़ अपेक्षित हस्ताक्षर जुटा लेने से ही, किसी जज को बर्ख़ास्त करने में कामयाबी नहीं मिल सकती। हस्ताक्षर से तो सिर्फ़ जज के ख़िलाफ़ लगाये गये आरोपों की जाँच की शुरुआत हो सकती है।

जज के ख़िलाफ़ जाँच करने का ज़िम्मा भी पुलिस-सीबीआई जैसी जाँच एजेंसियों को नहीं दिया जा सकता। इस काम को तीन सदस्यों की एक समिति की कर सकती है। जिसमें एक सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा जज, एक किसी हाईकोर्ट का चीफ़ जस्टिस और एक जाने-माने क़ानून-विद् को होना चाहिए। ये समिति अपनी जाँच रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपेगी। तब राष्ट्रपति, संसद से उस रिपोर्ट पर ग़ौर करने को कहेगी। संसद के दोनों सदनों को अलग-अलग से फ़ैसला देना होगा कि जाँच समिति की रिपोर्ट के मुताबिक़, वो अमुक जज के ख़िलाफ़ लगाये गये आरोपों को सही पाते हैं। सांसद चाहें तो जज से ज़िरह करने के लिए उसे संसद में तलब भी कर सकते हैं। जहाँ जज ख़ुद या उनका वकील उनका बचाव कर सकता है। इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद दोनों सदनों को अलग-अलग ये प्रस्ताव पारित करना होगा कि वो दो-तिहाई बहुमत से जज को बर्ख़ास्त करने के पक्षधर हैं। इतनी सारी कठोर शर्तों को निभाने के बाद ही महाभियोग सफल हो सकता है। अन्त में, राष्ट्रपति ही दोषी जज को बर्ख़ास्त करने का आदेश जारी करते हैं।

अब ज़रा ये समझिए कि भारत के प्रधान न्यायाधीश के ख़िलाफ़ लगे आरोपों को लेकर पहली सीढ़ी तब चढ़ी गयी जब राज्यसभा के 64 सांसदों ने उपराष्ट्रपति को महाभियोग प्रस्ताव दिया। दूसरी सीढ़ी थी, प्रस्ताव को मंज़ूर या ख़ारिज़ करना। फ़िलहाल, मामला इसी स्तर पर अटक गया। क्योंकि वेंकैया नायडू ने इसे ख़ारिज़ कर दिया। नायडू के ऐसा जिन आधारों पर किया वो उसे तय करने के लिए अधिकृत ही नहीं है। मसलन, बग़ैर जाँच के नायडू ये नहीं कह सकते कि आरोप जाँच के लायक नहीं हैं। यहीं ये समझना ज़रूरी है कि आख़िर ये कैसे तय होगा कि कौन सा आरोप जाँच के लायक हो सकता है और कौन से नहीं?

कल्पना कीजिए कि यदि सांसद ये आरोप लगाकर महाभियोग प्रस्ताव पेश कर दें कि अमुक जज सिर्फ़ चार घंटा सोते हैं। लिहाज़ा, उन्हें हटा देना चाहिए। तो क्या इस आरोप की पड़ताल के लिए महाभियोग प्रस्ताव को जाँच समिति के भेज देना चाहिए? ऐसी दशा में लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति से ये अपेक्षित है कि वो प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ाएँ, बल्कि सीधे ख़ारिज़ कर दें। संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए विवेकाधीन निर्णय लेने का दायरा ऐसे ही काल्पनिक आरोपों तक सीमित हो सकता है, क्योंकि ये सबको मालूम है कि जज तो क्या, किसी का कम ये ज़्यादा सोना, किसी भी लिहाज़ से दुराचरण नहीं है।

वेंकैया नायडू ने अपनी विवेकाधीन शक्तियों का बेज़ा इस्तेमाल किया है। वो सिर्फ़ ये जाँचने के अधिकारी हैं कि कहीं सांसदों के आरोप महज कपोल-कल्पना पर तो आधारित नहीं हैं? क्या सांसदों के दस्तख़त सही और पूरे हैं? यदि ऐसा कोई ख़ोट नहीं है, तो उनके पास ये तय करने का अधिकार नहीं है कि सच्चे सही हैं या झूठे? सच-झूठ को तय करने के लिए ही जाँच की जाती है। संविधान के मुताबिक़, उपराष्ट्रपति चाहकर भी जाँच समिति की जगह नहीं ले सकता। वेंकैया का ऐसा निर्णय इसीलिए असंवैधानिक है। चूँकि वो बीजेपी से सम्बन्धित रहे हैं और बीजेपी, बग़ैर जाँच के लिए महाभियोग को ग़ैर-ज़रूरी ठहराना चाहती है। लिहाज़ा, वेंकैया के व्यवहार से साफ़ दिख रहा है कि उन्होंने अपनी पुरानी पार्टी को ख़ुश करने के लिए राज्यसभा के सभापति के विवेकाधीन अधिकारों और उससे जुड़ी गरिमा के साथ समझौता किया है। इस तरह से अपने फ़ैसले की वजह से वेंकैया ने भारत के संसदीय इतिहास के लिए एक कलंकित मिसाल पैदा की है।

अब सवाल है कि आगे क्या? महाभियोग प्रस्ताव लाने वाले सांसदों की ओर से वेंकैया के फ़ैसले को आड़े हाथों लेते हुए कहा गया है कि उनके पास अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने के लिए सिवाय और कोई विकल्प नहीं है। उम्मीद है कि कुछ दिनों में सुप्रीम कोर्ट में ये फ़रियाद दायर हो जाएगी कि महाभियोग प्रस्ताव पर लिये गये वेंकैया नायडू के फ़ैसले को असंवैधानिक ठहराया जाए। मज़े की बात ये है कि इस याचिका की सुनवाई ख़ुद प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा नहीं कर सकते, क्योंकि सारा प्रसंग उनसे ही जुड़ा हुआ है। वो ख़ुद से जुड़े मामले की सुनवाई ख़ुद नहीं कर सकते। भले ही, उनके पास किसी भी याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करने और उसके लिए उपयुक्त खंडपीठ (बेंच) तय का सबसे अहम विशेषाधिकार हो! लिहाज़ा, अब सुप्रीम कोर्ट ही तय करेगा कि उसके मुखिया पर महाभियोग चलेगा या नहीं? न्यायपालिका को इस मामले में इतिहास के कई पन्ने लिखने होंगे।

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लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक़ बन चुकी मोदी-शाह की बीजेपी से यशवन्त का अलविदा!

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आख़िरकार, यशवन्त सिन्हा ने बीजेपी को अलविदा कह दिया! घटा तो महीनों से छायी हुई थी! नोटबन्दी के बाद से मेघ, जब-तब गरज तो रहे थे, लेकिन बरसे आज! आज मोदी-शाह के अन्ध-भक्तों ने राहत की साँस ली होगी! आज भक्तों से ज़्यादा ख़ुश तो शायद ही कोई और हुआ होगा! बहुतों का मन-मयूरा ख़ुशी से झूम रहा होगा! बहुतेरे संघी तो दिवाली भी मना रहे होंगे! उच्च कोटि के भक्तों ने तो घी के दीपक भी जलाये होंगे! क्योंकि यशवन्त सिन्हा लम्बे अरसे से, ख़ासकर नोटबन्दी के मूर्खतापूर्ण फ़ैसले के बाद से अपनी आलोचनात्मक टिप्पणियों की वजह से मोदी-शाह-भागवत वाली मौजूदा बीजेपी के लिए आँखों की किरकिरी बने हुए थे!

उम्र के 80 बसन्त देख चुके वयोवृद्ध नेता यशवन्त सिन्हा अब भी वैसे ही स्वस्थ हैं, जैसे उनकी पीढ़ी वाले लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अरूण शौरी, शत्रुघ्न सिन्हा वग़ैरह हैं। मोदी-शाह-भागवत के राज में घर में ही तिरस्कार तो सबका हो रहा था, लेकिन सिन्हा साहब की अन्तर्आत्मा ने उन्हें जितना कचोटा, वैसा अन्य नेताओं के साथ अभी तक नहीं हुआ है। शायद, औरों में बर्दाश्त करने की शक्ति ज़्यादा हो। लेकिन इस ‘अलविदा’ में ‘न दैन्यम्, न पलायनम्’ का भाव है। यानी, न तो दासता स्वीकार करूँगा और ना ही पलायन करूँगा, बल्कि युद्ध करूँगा! वो भी किसी राज-पाट को पाने की ख़ातिर नहीं, बल्कि उस लोकतंत्र की रक्षा की ख़ातिर, जिसकी बुनियाद गाँधी-नेहरू-पटेल-आम्बेडकर जैसे महापुरुषों ने बनायी थी, और जिसे पतित संघी विचारधारा तथा उसके प्रवर्तक तार-तार करने पर आमादा हैं!

बीजेपी को अलविदा कहने के साथ ही यशवन्त सिन्हा ने साफ़ कर दिया कि मोदी-शाह-जेटली-राजनाथ-सुषमा-गडकरी-पीयूष-सीतारामन-प्रभु वग़ैरह की काली छाया में पल रहा भारतीय लोकतंत्र ख़तरे में है! ये कोई साधारण टिप्पणी नहीं है। इसे ‘डेथ वारंट’ भी कह सकते हैं। इसका साफ़ मतलब है कि मौजूदा बीजेपी और इसका मस्तिष्क यानी संघ, भारतीय लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक हैं, विनाशकारी हैं! विपक्ष तो सवा करोड़ भारतवासियों को आगाह करता ही रहा है, लेकिन अफ़ीम के नशे में झूम रहे मन्दबुद्धि हिन्दुओं को सच्चाई समझ में आती होती तो आज देश को ऐसे दिन क्यों देखने पड़ते!

यशवन्त सिन्हा का भगवा को अलविदा कहना वैसा ही है, जैसे हस्तिनापुर के राजदरबार से महामंत्री विदुर का बहिर्गमन! अब सिर्फ़ यही प्रश्न अनुत्तरित है कि बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आज़ाद जैसे लोग यशवन्त सिन्हा के नक्श-ए-क़दम को अपनाते हुए कब नज़र आएँगे! सिन्हा साहब के इस्तीफ़े ने लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वयोवृद्ध नेताओं को भी अघोषित तौर पर लताड़ लगायी है। उन्होंने अव्यक्त शब्दों में ये कौतूहल ज़ाहिर किया है कि क्या वो लोग, पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य की तरह भरे दरबार में चल रहे द्रौपदी के चीरहरण यानी लोकतंत्र के पतन को निगाहें नीची करके ही यूँ ही देखते रहेंगे, जैसा कि वो अभी तक करते आये हैं! अब वो नीति और नैतिकता में से किसे तरज़ीह देंगे! क्या वो भी यशवन्त सिन्हा की तरह ये ऐलान करने की हिम्मत दिखाएँगे कि कलियुग में द्वापर वाली धूर्तताएँ अब और बर्दाश्त नहीं की जाएँगी!

पिता यशवन्त सिन्हा ने अपने बेटे और लोकतंत्र की हत्यारिन मोदी सरकार में मंत्री बने बैठे जयन्त सिन्हा के सामने भी भारी धर्म-संकट पैदा कर दिया है! बेचारे जयन्त को अब ये तय करना होगा कि वो कब तक अपने तुच्छ स्वार्थों की ख़ातिर दुर्योधनों की चाकरी करना जारी रखना चाहेंगे, वो भी राष्ट्रहित और लोकतंत्र की क़ीमत पर! जयन्त को राजनीति में जो भी जगह मिली है, वो उसी पिता की विरासत की बदौलत है जो आज संन्यास के नैतिक बल से आलोकित है! पिता ने उस महल का परित्याग कर दिया, जिसे वो चार दशकों तक अपने ख़ून-पसीने से वैभवशाली बनाते रहे। वो इस ऐलान के साथ कि अब वो किसी भी सियासी तालाब में डुबकी नहीं लगाएँगे, बल्कि सीधे सामाजिक क्षेत्र में काम करके लोकतंत्र को बचाने के लिए काम करेंगे।

दलगत राजनीति से संन्यास लेने का सीधा-सीधा मतलब है कि अब वो मोदी-शाह के चंगुल से भारतीय लोकतंत्र को मुक्त करवाने के लिए अपना जीवन ख़पाना चाहेंगे। चुनावी राजनीति से तो उन्होंने 2014 में विदा ले लिया था। लेकिन इसके बावजूद भक्तों ने उन पर लाँछन लगाया कि वो दरकिनार किये जाने से आहत होकर विपक्ष की कठपुतली बन गये हैं! सिन्हा ने साबित कर दिया कि अन्तर्आत्मा की हत्या करके वो सियासी नहीं बने रह सकते! इसमें कोई शक़ नहीं हो सकता कि बीजेपी में अपने योगदान की वजह से यशवन्त सिन्हा को ‘शानदार-विदाई’ का हक़दार होना चाहिए था, लेकिन उनके नसीब में तो ‘शर्मनाक-विदाई’ लिखी थी। आख़िर, नसीब का लेखा कभी कोई बदल पाया है! फिर भी उनकी ऐसी गति को देख, यदि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की निग़ाहों में ज़रा भी शर्म-ओ-हया हो तो उन्हें चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।

विदाई से पहले मोदी-शाह की शह पर भगवा अन्ध भक्तों ने अपने ही परिवार के बुज़ुर्ग पर ऐसे-ऐसे लाँछन लगाये कि उनका ज़िक्र करना भी अफ़सोसनाक है। सिन्हा ने उस दौर में राजनीति और सत्ता से जुड़ी शीर्षस्थ ऊँचाईयों को हासिल किया जब मोदी-शाह की टके भर की भी औक़ात नहीं थी! दौर बदला तो अगली पीढ़ी के पतित नेताओं ने सिन्हा साहब के प्रति वैसा ही सलूक किया, जैसे कुछ लोग अपने माता-पिता का तिरस्कार करते हुए उन्हें वृद्धाश्रम के सहारे छोड़ देते हैं! सिन्हा साहब, जैसे लोगों की अहमियत के बारे में महर्षि वेद व्यास ने महाभारत (5-35-58) में लिखा है:

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा, वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम्।

धर्म स नो यत्र न सत्यमस्ति, सत्यं न तद् यद् छलमभ्युपैति॥

अर्थात्, “वह सभा नहीं हो सकती जहाँ वृद्ध या विवेकशील व्यक्ति मौजूद न हों। उन्हें वृद्ध नहीं माना जा सकता जो न्याय की बात नहीं करें। वह न्याय नहीं है जो सत्य पर आधारित नहीं हो। और, वो सत्य नहीं है जिसकी उत्पत्ति छल से हुई हो।”

किसी सभा के सदस्यों की विशेषता को बताने वाले इस सूक्ति वाक्य को भारतीय संसद के मुख्य भवन के गेट नम्बर-2 के पास मौजूद लिफ़्ट नम्बर-1 के गुम्बद पर भी उकेरा गया है। लेकिन मोदी-शाह वाली बीजेपी में इन बातों को जानने-समझने और अपनाने वाला चाल-चरित्र और चेहरा तो कभी दिखा ही नहीं। याद है ना कि जून 2013 में नरेन्द्र मोदी को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाने के बाद आडवाणी ने भी बीजेपी के हरेक पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। बीजेपी, किस तरह से लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक़ बनती गयी, इसका ज़िक्र आडवाणी के इस्तीफ़े में था। बहरहाल, ग़नीमत है कि आस्तीन के साँपों ने जैसी गति आडवाणी की की, वैसे दिन यशवन्त सिन्हा को नहीं देखने पड़े! फ़िलहाल, सिन्हा साहब ने जो आग़ाज़ किया है, वो 2019 में अंज़ाम पर पहुँचकर ही शान्त होगा। धीरे-धीरे कई नेताओं को बीजेपी से विदा लेने के लिए आगे आना पड़ेगा! वैसे भी सिन्हा साहब ने अपने एक ताज़ा लेख में भविष्यवाणी की है कि बीजेपी के आधे से ज़्यादा सांसद 2019 में संसद नहीं पहुँच पाएँगे!

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नवजात शिशुओं में लीवर रोग की पहचान के लिए जागरूकता अभियान

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Liver Disease Newborns

नई दिल्ली, 19 अप्रैल | नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों को आमतौर पर प्रभावित करने वाली लीवर की बीमारी को लेकर आम लोगों के बीच जागरूकता फैलाने के लिए अपोलो अस्पताल ने वर्ल्ड लीवर डे के मौके पर जागरूकता अभियान चलाया। अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप में मेडिकल डायरेक्टर व सीनियर कन्सलटेन्ट डॉ. अनुपम सिब्बल ने कहा, “दिमाग के बाद लीवर शरीर का दूसरा सबसे बड़ा ठोस अंग है, जो बहुत सारे मुश्किल काम करता है। लीवर हमारे शरीर में ऐसे सभी कामों को अंजाम देता है, जो अन्य अंगों के ठीक कार्य करने के लिए जरूरी हैं।”

उन्होंने कहा, “लीवर पाचन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भोजन पचाने के लिए बाईल बनाने के अलावा लीवर ब्लड शुगर को नियन्त्रित रखने में मदद करता है, शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालता है और कॉलेस्ट्रॉल का स्तर सामान्य बनाए रखता है। लीवर क्लॉटिंग फैक्टर्स, एल्बुमिन और ऐसे कई महत्वपूर्ण उत्पाद बनाता है।”

डॉ. अनुपम सिब्बल ने कहा, “लीवर बिना रुके काम करता है और अक्सर इसमें किसी भी तरह की खराबी के लक्षण जल्दी से दिखाई नहीं देते। लीवर रोगों के आम लक्षण हैं आंखों का पीला पड़ना, पेशाब का रंग पीला होना, भूख न लगना, मतली और उल्टी। 100 से ज्यादा ऐसी बीमारियां हैं जिनका असर लीवर पर पड़ता है।”

उन्होंने कहा, “अगर आपको पेट के आस-पास सूजन, पैरों में सूजन, वजन में कमी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें।”

डॉ. अनुपम सिब्बल ने लीवर की बीमारियों से बचने और इसके प्रबन्धन के लिए सुझाव दिए। इसमें हर बच्चे को जन्म के तुरंत बाद हेपेटाइटिस बी का टीका लगाना, रक्त और रक्त उत्पादों का इस्तेमाल करने से पहले हेपेटाइटिस बी और सी की जांच, साफ पेयजल का ही सेवन करना, कच्चे फलों और सब्जियों को सेवन से पहले अच्छी तरह धोना, जब भी संभव हो हेपेटाइटिस ए का टीका लगवाना, नवजात शिशु को अगर दो सप्ताह से ज्यादा पीलिया रहता है तो इसकी जांच करवाना चाहिए ताकि अगर लीवर की कोई बीमारी है तो इसका निदान कर तुरंत इलाज किया जा सके।

हाल ही में हेपेटाइटिस बी, सी और कई अन्य आनुवंशिक बीमारियों का इलाज खोज लिया गया है और यह सभी आधुनिक इलाज भारत में उपलब्ध हैं। भारत में लीवर ट्रांसप्लान्ट अब कामयाबी से किया जा रहा है।

–आईएएनएस

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