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मीडिया और सरकार : कई सवाल अभी बाकी

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क्या सरकार आलोचनाओं से घबरा गई है? या आर्थिक मोर्चे पर विफलताओं की चर्चाओं से डरी हुई है? या फिर आंदोलनों को लेकर जवाब दे पाने की स्थिति में नहीं है? यदि नहीं तो सरकार की ओर से कैसे प्रेस/मीडिया को नियंत्रित करने, पत्रकारों को ब्लैक लिस्टेड तक कर देने का एकाएक फैसला ले लिया गया था?

ऐसे कई सवाल उस समय उठे थे, जब कुछ घंटों पहले ही लिए गए फैसले ने सरकार की मंशा पर सवाल उठा दिए थे, जिसमें फेक न्यूज के बढ़ने की बात कहते हुए पत्रकारों की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने और ब्लैक लिस्टेड तक कर देना शामिल था! लेकिन फैसले और इसके दूरगामी प्रभाव को देखते हुए प्रधानमंत्री ने खुद आगे बढ़कर न केवल इसे बदल दिया, बल्कि यह तक कह दिया कि मामला केवल भारतीय प्रेस परिषद में ही उठाया जाना चाहिए। निश्चित रूप से सरकार इस पूरे मामले में बैकफुट पर नजर आई। लेकिन सरकार की मंशा पर तो सवाल उठेंगे ही!

यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा ही ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ की सबसे बड़ी पक्षधर होने का दंभ भरती थी। यह भी सही है कि तमाम राजनैतिक दलों में भाजपा ही प्रमुख रही है, जिसके प्रवक्ता पहले भी और अब भी काफी मुखर होकर अपनी बातें विपक्ष में रहते हुए भी और सत्ता में आने के बाद भी कहने के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में सूचना प्रसारण मंत्री का यह फैसला निश्चित रूप से कई तरह के सवालों को खड़ा करता है। प्रधानमंत्री की ओर से भले ही मरहम लगाने की कोशिश की गई है, लेकिन फैसले ने कई चर्चाओं को विषय जरूर दे दिया है।

यह भी अहम हो चला है कि क्या स्मृति ईरानी ने, जो अतिउत्साह और लीक से हटकर काम करने के लिए जानी जाती हैं, बिना प्रधानमंत्री कार्यालय को बताए फैसला किया? या इसके पीछे कोई और वजह है? अब कारण जो भी हों, उनसे क्या। मुख्य तो यह है कि स्मृति ईरानी की नजरों में फेक न्यूज की परिभाषा क्या है? बिना परिभाषा तय हुए उन्होंने इतने बड़े और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को प्रभावित करने वाला, जानते-बूझते हुए कदम उठा लिया कि जो करने जा रही हैं, वह न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है, वरन आपातकाल के अघोषित ऐलान की पुनरावृत्ति जैसी बात होगी।

गौरतलब है कि स्मृति ईरानी के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने पत्रकारों की मान्यता संबंधी गाइड लाइंस को संशोधित करते हुए कहा था कि यदि कोई पत्रकार फर्जी खबरों के प्रकाशन या प्रसारण का दोषी पाया गया तो उसे ब्लैकलिस्टेड कर दिया जाएगा। इसमें फर्जी समाचार के प्रकाशन या प्रसारण की पुष्टि होती है तो पहली बार मान्यता छह महीने के लिए निलंबित होगी, दोबारा ऐसा करने पर साल भर मान्यता निलंबित रहेगी। लेकिन तीसरी बार उल्लंघन करते पाए जाने पर उस पत्रकार को हमेशा के लिए ब्लैकलिस्टेड कर दिया जाएगा और उसकी मान्यता स्थायी रूप से रद्द कर दी जाएगी, यानी पत्रकारिता के पेशे से छुट्टी।

आगे कहा था कि फैसला ‘प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया’ और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) लेगी जो प्रिंट और टेलीविजन मीडिया की नियामक संस्थाएं हैं। इस फैसले के बाद चुनावी तैयारियों में जुटी मोदी सरकार पर कई तरह के सवाल उठने शुरू हो गए थे। स्थिति की नजाकत को भांपते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने तुरंत चतुराई दिखाई, लेकिन सवाल तो यह बरकरार है कि क्या इसे प्रेस/मीडिया के प्रति सरकार का नजरिया नहीं कहा जाएगा?

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

–आईएएनएस

ज़रा हटके

ग्रेटर नोएडा : इमारत में इसी सप्ताह हुआ था ‘गृह प्रवेश’

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Greater Noida building collapse

ग्रेटर नोएडा, 18 जुलाई (आईएएनएस)| ग्रेटर नोएडा में मंगलवार रात धराशायी हुई इमारत में हाल ही में अपनी मां के साथ रहने आए शिव त्रिवेदी (25) ने इसी सप्ताहांत गृह प्रवेश की पूजा आयोजित की थी। उनके सपनों के घर को सजाने के लिए उनकी साली अपने एक वर्षीय बच्चे के साथ यहीं रुक गईं थीं।

बुधवार को वे सभी एक बहुमजिला इमारत के उनकी इमारत के ऊपर ढहने से उसके मलवे में फंसे थे और इसमें उनके जीवित नहीं रहने की संभावना है।

दर्जनों बचाव कर्मी मलबे को हटाने के लिए क्रेनों और बुलडोजरों का इस्तेमाल कर रहे हैं। दूर रोते हुए खड़े त्रिवेदी परिवार के सदस्य मलवे में फंसे चारों लोगों के जीवन की प्रार्थना कर रहे थे।

Greater Noida Building

नोएडी की एक कंपनी में शाखा प्रबंधक शिव उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में रह रहे अपने माता-पिता के दो बेटों में छोटे हैं। तीन साल पहले बेहतर जीवन की तलाश में वे नोएडा रहने लगे थे।

उनके पिता ने कहा कि शिव परिवार के लिए आशा की किरण है और हमेशा से ही होनहार रहे हैं।

शिव ने दिल्ली आने के मात्र तीन सालों के अंदर इसी मार्च में ये घर खरीदा था।

शिव के एक चाचा ने आईएएनएस को बताया, “उसने काफी कम उम्र में बहुत कुछ हासिल कर लिया था। मेरी आयु 50 है और मैं अपने परिवार के लिए घर नहीं खरीद सकता। लेकिन उसने मात्र 25 वर्ष की आयु में घर खरीद लिया।”

उन्होंने अपने कार्यालय में आखिरी बार मंगलवार को रात लगभग 8.50 बजे बात की थी। लेकिन उसके बाद से उनसे संपर्क नहीं हो सका क्योंकि वे इस हादसे का शिकार हो गए। उनकी इमारत दिल्ली के व्यावसायिक केंद्र कनॉट प्लेस से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित है।

शिव के पिता, बड़े भाई, दो चाचा, चचेरे भाई और अन्य करीबी रिश्तेदार बुधवार सुबह तक घटनास्थल पर पहुंच गए थे।

शिव के भाई राम त्रिवेदी (27) ने आईएएनएस को बताया, “मुझे विश्वास है कि वे मलबे में हैं और उनके जीवित होने का भी पूर्ण विश्वास है लेकिन उन्हें जल्दी निकाले जाने की जरूरत है।”

पेशे से वकील राम ने कहा कि शिव ने शनिवार को गृह प्रवेश पूजा का आयोजन किया था जिसके बाद शिव की मां, साली और उनकी एक वर्षीय बेटी को छोड़कर लगभग सभी लोग मैनपुरी चले गए थे। ये लोग नए घर में कुछ दिन उनके साथ रहने और घर को व्यवस्थित करने के लिए यहीं रुक गए थे।

विचलित राम ने बैठने से मना कर दिया, इस दौरान वे मुट्ठी बांधे लगातार मलबे की तरफ देख रहे थे।

परिजनों ने आरोप लगाया कि इमारत के निर्माण में बिल्डर ने घटिया निर्माण सामग्री का उपयोग किया था। उन्होंने बचाव अभियान के देर से शुरू होने की भी शिकायत की, जिससे इमारत में फंसे हुए लोगों के जीवित बचने की उम्मीद कम हो गई है।

शिव के एक रिश्तेदार ने क्षेत्र में नियमों में ढिलाई का आरोप लगाते हुए कहा, “इतना समय हो गया है और हमारे परिवार का अभी तक कोई पता नहीं लगा है। उन्होंने अगर रात में ही बचाव अभियान शुरू किया होता तो मेरे परिवार को बचाया जा सकता था।”

–आईएएनएस

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ओपिनियन

बधाई हो! भीड़-तंत्र ने भारत को अब भीड़-युग में पहुँचा दिया!

अब तो भीड़, पुलिस को भी पीट डालती है। क़ानून को हाथ में लेने वालों का पुलिस-अदालत कुछ नहीं बिगाड़ पाती। यही आलम दंगाइयों का भी होता है। उनके चेहरे पर भी भीड़ का मुखौटा ही होता है।

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ये विरोधी दल के किसी नेता या अवार्ड वापसी गैंग का नहीं, बल्कि माननीय सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया है कि ‘भारत में भीड़-तंत्र की इजाज़त नहीं दी सकती। नया क़ायदा नहीं बन सकता कि भीड़ ही सड़कों पर इंसाफ़ करने लगे। कोई भी क़ानून हाथ में नहीं ले सकता। भय, अराजकता और हिंसा फ़ैलाने वालों को सख़्ती से रोकना पुलिस और राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है। राज्यों को भीड़-तंत्र के पीड़ितों के लिए महीने भर में मुआवज़ा नीति बनानी होगी। भीड़-तंत्र की रोकथाम करने में विफल रहे पुलिस अफ़सरों के ख़िलाफ़ विभागीय कार्रवाई के अलावा सीधा ज़ुर्माना भी ठोंका जाएगा। भीड़ की अराजकता से जुड़े मामलों में अदालतों को रोज़ाना सुनवाई करके छह महीने में अपराधियों को अधिक से अधिक सज़ा देनी होगी। यही नहीं, भीड़-तंत्र यानी Mobocracy के ख़िलाफ़ संसद को भी सख़्त क़ानून बनाना चाहिए।’

यदि आप भीड़-तंत्र को भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक मानते हैं तो शायद आपको सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा फ़ैसले से तसल्ली मिले। हालाँकि, ये अफ़सोसनाक तो है कि लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक प्रवृत्ति यानी भीड़-तंत्र के प्रति न्याय के सर्वोच्च मन्दिर को अपनी संवेदनशीलता ज़ाहिर करने में ख़ासा वक़्त लग गया। आप कह सकते हैं कि ‘हुज़ूर, आते-आते बहुत देर कर दी!’ क्योंकि मोदी राज में ही गोरक्षा और बच्चा चोर के नाम पर अब तक 80 से ज़्यादा हिंसक वारदातें हो चुकी हैं। भीड़-तंत्र अब तक 33 इंसानों की बलि चढ़ा चुका है! मोदी और उनकी भक्त मंडली भले ही इस दौर को आधुनिक भारत का ‘स्वर्ण-युग’ बताते ना अघाते हों, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया कि भारत अब ‘भीड़-युग’ में आ चुका है!

mob lynching

सोशल मीडिया पर तैनात ‘भक्तों’ और अफ़वाह गढ़ने और फ़ैलाने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला किसी मुबारक़बाद या बधाई से कम नहीं है। इसकी साज़िशों ने ही सवा सौ करोड़ भारतवासियों को ‘भीड़-युग’ में पहुँचाया है! भीड़-युग के शुरुआती चार वर्षों में ही आदिकाल से मौजूद ‘भीड़’ का ऐसा ज़बरदस्त और ऐतिहासिक ‘विकास’ हुआ, जैसा ‘विकास-विरोधी’ पिछली सरकारें बीते 70 वर्षों में भी नहीं कर पायीं! सदियों से शैशवकाल में मचलने वाली ‘भीड़’ ने अब चार साल में बाल-काल और यौवन को पार करके गबरू जवान वाला व्यक्तित्व पा लिया। वैसे तो आधुनिक भारत का इतिहास असंख्य साम्प्रदायिक दंगों से अटा पड़ा है। हमारा कोई सियासी दल ऐसा नहीं है, जिसके दामन पर दंगों के ख़ून के छींटे ना रंगे हों। लेकिन गोरक्षा और बच्चा चोर के नाम पर कहीं भी, कभी भी ‘भीड़’ का किसी को भी पीट-पीटकर मार डालना, भीड़-युग का अद्भुत आयाम है!

भीड़-युग में भीड़ के तुष्टिकरण की नीति लागू होना स्वाभाविक है। आप चाहें तो माननीय सुप्रीम कोर्ट की मंशा पर तरस खा सकते हैं कि उसे अब भी उम्मीद है कि उसके सख़्त तेवर से भगवा सरकारें जाग जाएँगी, संघियों का वो अफ़वाह-तंत्र ख़ुदकुशी कर लेगा, जिन्हें इसी भीड़-तंत्र की भीड़ से संजीवनी मिलती है! सकारात्मक होने की यदि कोई सीमा नहीं होगी तभी तो जिन्होंने ‘विकास’ की ख़ातिर अपने कलेज़े के टुकड़े ‘लोकपाल’ की क़ुर्बानी दे दी हो, उनसे ये अपेक्षा की जा सकती है कि वो सुप्रीम कोर्ट की तसल्ली के लिए संसद में क़ानून बनाकर भीड़-तंत्र रूपी अपनी ही धमनियों को काट डालने का फ़ैसला ले लेंगे! जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उसी दिन से बैल भी दूध देने लगेंगे! देख लीजिएगा, मई 2019 तक भारत की संसद भीड़-युग का बाल भी बाकाँ नहीं कर पाएगी!

भीड़-तंत्र, बुनियादी तौर पर बोतल में बन्द ज़िन्न की तरह है, जो एक बार बोतल से बाहर आ जाए तो फिर उसे वापस बोतल में नहीं डाला जा सकता! ये अंडे से निकला वो चूजा है, जिसे कोई वापस अंडे में नहीं डाल सकता! इसीलिए भीड़-युग से वापसी बहुत मुश्किल है। हालाँकि, असम्भव कुछ भी नहीं होता! सम्भव बनाने के लिए सरकार को वैसे ही व्यापक उपाय करने होंगे जैसे उफ़नती नदी की बाढ़ से रोकथाम के लिए विशाल बाँधों और नहरों का नेटवर्क बनाया जाता है। इसके लिए भी सबसे पहले तो हमें ये स्वीकार करना होगा कि भीड़-राज को महज ये उपदेश देकर क़ाबू में नहीं लाया जा सकता कि ‘कोई भी क़ानून हाथ में नहीं ले सकता!’

अरे, ये किससे छिपा है कि भारत में भीड़ से बड़ा कोई क़ानून नहीं! भीड़ कब अराजक नहीं होती! भीड़ का तो स्वभाव ही है बेक़ाबू होना! इसमें नया क्या है! भीड़ तो हड़ताल, चक्का-जाम, रेल-रोको, तोड़फोड़-उपद्रव-आगजनी और हिंसा करती रही है। 70 साल में लाखों बसों और अन्य वाहनों की होली क्या भीड़ ने नहीं जलायी! तो क्या अब इंसानों की बलि ले रही भीड़, सुप्रीम कोर्ट की हाय-तौबा से अपना चरित्र बदल लेगी! किस राजनीतिक दल ने और कब ये ख़्वाहिश नहीं रखी कि उसके पीछे ‘भीड़’ खड़ी हो! राजनीति के लिए ‘भीड़’ ज़रूरी है। आमलोगों के पास ‘भीड़’ नहीं है, इसीलिए वो राजनेता नहीं हैं।

COW-VIGILANTE

भीड़ को भीड़ बनने से रोकने का काम क़ानून और संवेदनशील सरकार का है। संवेदनशील सरकार का कर्त्तव्य है कि वो छोटे-छोटे जनसमूह और संगठन की माँगों, उम्मीदों और अपेक्षाओं का वक़्त रहते निराकरण करे, ताकि वो भीड़ में तब्दील ना हों। अभी तो भारत का संस्कार ही ये हो चुका है कि सरकारें सिर्फ़ हिंसा-हड़ताल और चक्का जाम वग़ैरह की भाषा ही समझती हैं। समाज का जो तबक़ा सरकारी व्यवस्था की चूलें नहीं हिला सकता, मौजूदा व्यवस्था में उसकी तब तक कोई सुनवाई नहीं है, जब तक कि सड़कों पर हिंसा नहीं करता। ढीठ नौकरशाही और विधायिका को तो अदालतों के फ़ैसलों की भी तब तक कोई परवाह नहीं होती, जब तक कि बात अवमानना तक न पहुँच जाए।

अब तो सरकारी तंत्र को भी सड़क का अतिक्रमण हटाने के लिए भी कोर्ट के आदेश की ज़रूरत पड़ती है! नौकरशाही को अपना फ़र्ज़ निभाने के लिए अदालत की अवमानना का वास्ता देना पड़ता है। जब तक अदालत की लाठी सिर पर नहीं हो, तब तक वही सरकारी अमला अतिक्रमण को पैदा करके उगाही करता है, जिस पर अतिक्रमण ख़त्म करने का ज़िम्मा होता है। सबकी उगाही बँधी हुई है! इसीलिए जब अदालती आदेश के बग़ैर जब सरकारी तंत्र, अतिक्रमण हटाने पहुँचता है तो उसका वास्ता जनता के सहयोग और समर्थन से नहीं, बल्कि भीड़ के विरोध से पड़ता है! सबको, सब कुछ पता है! अदालतें भी अनजान नहीं हैं! जज साहब को भी सब पता है! फिर भी सिर्फ़ अदालती आदेश ही ये बोल पाता है कि ‘कोई भी क़ानून हाथ में नहीं ले सकता!’

भीड़ की असलियत भी किसी से छिपी नहीं है। भीड़, जब इंसानों की होती है तो वो वोट भी होती है। ‘जहाँ वोट, वहाँ तुष्टिकरण!’ तुष्टिकरण की विकृति से लोकतंत्र को बचाने का दारोमदार जिस क़ानून पर है, उसके तीन अंग हैं। विधायिका, पुलिस या कार्यपालिका और अदालत। पुलिस और अदालतों में पर्याप्त निवेश करके यदि उन्हें कारगर बना दिया जाए तो वो कमज़ोर क़ानून की भी भरपायी कर देंगे। अन्यथा, कठोर क़ानून भी किताबों में ही बन्द पड़े रहेंगे। हत्या, बलात्कार, दहेज-उत्पीड़न, बाल-विवाह जैसे मामलों में जो क़ानून भारत में हैं, उससे सख़्त सज़ा कहीं नहीं हो सकती।

हमारी न्याय-व्यवस्था किसी को इंसाफ़ नहीं दे पाती। हमारी अदालतों से किसी को इंसाफ़ नहीं मिलता। छोटा-बड़ा, अमीर-ग़रीब सभी अदालतों में लगने वाले असामान्य वक़्त के शिकार हैं। भारतीय जेलों में अपराधियों से दोगुनी संख्या विचाराधीन क़ैदियों की है। मुक़दमों के निपटारे में 20-25 साल लगना सामान्य बात है। पुलिस जिन मुट्ठी भर अपराधियों को पकड़ पाती है, उनमें से भी महज 6 फ़ीसदी का ज़ुर्म अदालत में साबित हो पाता है। मज़े की बात ये भी है कि क़ानून किसी के हाथ में नहीं, बल्कि कहीं है ही नहीं। आज़ाद भारत में पुलिस-अदालत की दशा हमेशा चिन्ताजनक ही रही है। भीड़-युग में फ़र्क़ सिर्फ़ इतना आया है कि ये पूरी तरह से चौपट हो चुका है। सियासत और लगातार बढ़ती आबादी ने पुलिस-अदालत को कभी सुधरने नहीं दिया। पुलिस, राज्य सरकारों की वर्दीधारी लठैत है। ये न्याय-व्यवस्था की पहली सीढ़ी है। लेकिन खंडहर से भी ज़्यादा जर्जर हो चुकी है। ये सिर्फ़ साधन-सम्पन्न लोगों का ख़्याल रख पाती है।

भीड़ को ऐतबार नहीं है कि क़ानून अपना काम ज़रूर करेगा। मोदी राज से पहले भी कभी-कभार ऐसी ख़बरें मिलती थीं कि भीड़ ने किसी चोर या जेबकतरे को रंग हाथ पकड़ लिया और फिर उसे पुलिस के हवाले करने से पहले ही भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। अब तो भीड़, पुलिस को भी पीट डालती है। क़ानून को हाथ में लेने वालों का पुलिस-अदालत कुछ नहीं बिगाड़ पाती। यही आलम दंगाइयों का भी होता है। उनके चेहरे पर भी भीड़ का मुखौटा ही होता है। कुख़्यात अपराधियों को भी ज़मानत पर ज़मानत मिलते जाना, उनका एक के बाद एक जघन्य अपराधों को करते जाना, दाग़ी लोगों का सियासी क्षेत्र में चमककर सफ़ेदपोश बनना और दशकों तक अदालत की कार्यवाही का पूरा नहीं होना भी भीड़ को यही सन्देश देता है कि पुलिस-अदालत उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी।

रही-सही क़सर तब पूरी हो जाती है, जब भीड़ को राजनीतिक आश्रय मिलने लगता है। भीड़ में से अपराधी को ढूँढ़ना और अदालत में उसका अपराध साबित करना, बेशक़ पुलिस की उपलब्धि है। लेकिन इन्हीं अपराधियों को चटपट जमानत मिल जाना और मंत्रियों की ओर से उनका माल्यार्पण होना, भीड़-युग के वैभव का गुणगान करता है। जब वाचाल प्रधानमंत्री के पास भी ऐसी प्रवृत्तियों की भर्त्सना करने का भी वक़्त नहीं हो, जब भीड़ में हिन्दू-मुसलिम ढूँढ़े जाएँ, जब भीड़ में तिरंगा, राष्ट्रवाद और देशद्रोह का तड़का लगे, जब भीड़ में पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण वाला क्षेत्रवाद घुसेड़ा जाए, तब जो भीड़-तंत्र पैदा होगा, उसे किसी अदालती फ़रमान और क़ानून से काबू में नहीं लाया जा सकता! फ़िलहाल, भारत के नसीब में यही भीड़-युग लिखा है।

रात कितनी भी लम्बी हो, वो भोर को रोक नहीं पाती! भीड़-वादियों में ग़लतफ़हमी फैलायी गयी है कि भीड़, उनके बग़ैर रह नहीं पाएगी! सत्ता तंत्र की मन्दबुद्धि सवर्ण हिन्दुओं में यही धारणा फैलायी जा रही है कि ‘जनता को कुछ याद ही नहीं रहता!’ जबकि सच्चाई ये है कि जनता ने हमेशा अपनी यादाश्त का लोहा मनवाया है। दांडी मार्च में महात्मा गाँधी की तस्वीरों में दिखने वाली जनता हाशिये पर दिखती ज़रूर है, लेकिन चुटकी बजाकर सत्ता को उखाड़ फेंकती है। इसी जनता ने इमरजेंसी और बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद संविधान की रक्षा की थी। भीड़-राज को ख़ुशफ़हमी है कि वही जनता लिंचिंग, दंगे, एनकाउंटर, कठुआ, उन्नाव रेप, ऊना कांड, महंगाई, नोटबन्दी, बेरोज़गारी सब भूल जाएगी और उसकी साज़िश के मुताबिक, फिर से साम्प्रदायिकता के नशे में टूट जाएगी। लेकिन काठ की हाँडी कब बार-बार चढ़ी है!

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लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक है: न्यायपालिका और कार्यपालिका की मिलीभगत

सतर्क और सक्रिय न्यायपालिका की बदौलत ही नागरिकों के बुनियादी और संवैधानिक अधिकारों की हिफ़ाज़त हो पाती है। ऐसी सतर्कता के बग़ैर लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता।

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Supreme Court

संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए न्यायपालिका का स्वतंत्र और निर्भीक होना ज़रूरी है। संविधान की आत्मा का बसेरा न्यायपालिका में ही होता है। न्यायपालिका के बग़ैर संविधान के शब्द निर्जीव बने रहते हैं। क़ानून के मुताबिक़ इंसाफ़ करते हुए अदालतें जहाँ दुस्साहसी कार्यपालिका पर अंकुश लगाती हैं, वहीं विधायिका की सीनाज़ोरी पर भी नकेल कसती हैं। सतर्क और सक्रिय न्यायपालिका की बदौलत ही नागरिकों के बुनियादी और संवैधानिक अधिकारों की हिफ़ाज़त हो पाती है। ऐसी सतर्कता के बग़ैर लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता। इसीलिए जजों से ये अपेक्षा रहती है कि वो अदालतों की निष्पक्षता और निर्भीकता को क़ायम रखने के प्रति जहाँ न्यायपालिका में रहते हुए उत्साह दिखाते रहें, वहीं अन्य सभी का ये फ़र्ज़ है कि वो बाहर रहकर इस काम को आगे बढ़ाएँ।

जस्टिस राजन गोगोई को सुनना बेहद सुखद रहा। उन्होंने पिछले हफ़्ते रामनाथ गोयनका स्मृति व्याख्यान में उन मुद्दों पर अपनी बेबाक़ राय देश के सामने रखी, जो आज भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़े हैं। उनका नज़रिया लम्बे समय तक हमारे कानों में गूँजता रहेगा। हम जजों के ऐसे कारवाँ के साथ महफ़ूज़ हैं, जो अपने किस्सों के लिए नहीं जाने जाते। जस्टिस गोगोई उन जजों में से हैं जो ख़ुद को अचूक बनाने से ज़्यादा इस बात के लिए सन्तुष्ट रहना चाहते हैं कि उनके फ़ैसले से इंसाफ़ को तरज़ीह मिली। अचूक होना आदर्श स्थिति है। कोई अचूक नहीं हो सकता, फिर भी इस आदर्श को हासिल करने के लिए कोशिशें होती रहनी चाहिए। लोकतंत्र में स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारा, तीनों आदर्शों का संगम न्याय में होता है। बराबरी ही स्वस्थ समाज की बुनियाद है। इसीलिए हुक़ूमत से ये अपेक्षा रहती है कि वो हरेक व्यक्ति की ज़िन्दगी में इन आदर्शों की मौजूदगी को सुनिश्चित करे।

हम दो भारत में रहते हैं। दोनों एक-दूसरे से बेहद दूर हैं। एक में देश के सुविधा सम्पन्न लोग हैं तो दूसरे में वंचित। वंचित भारत आज भी उपेक्षित है और बेहद ग़रीबी में जी रहा है। उसके गरिमावान जीवन से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं को सम्पन्न भारत हड़प लेता है, तब इंसाफ़ ही वो आदर्श होता है जो दोनों के बीच की खाई को पाटने में मददगार बनता है। कई बार सुप्रीम कोर्ट के जज अपने युगान्तरकारी फ़ैसलों के ज़रिये संविधान के महत्वपूर्ण आदर्शों को स्थापित करते हैं, तो कई बार अन्यायपूर्ण फ़ैसलों के आगे मूकदर्शक भी बने रहते हैं। कभी तो गोपनीयता को मूल अधिकार बताया जाता है, लेकिन यही गोपनीयता उस वक़्त काफ़ूर हो जाती है जब जाँच एजेंसियाँ और सरकार के बीच मिलीभगत चल रही होती है।

सोशल मीडिया के मंचों पर कितने ही मूल अधिकारों की धज़्ज़ियाँ रोज़ाना उड़ती रहती हैं। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट का इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉज़ी एक्ट, 2000 (श्रेया सिंघल) की धारा 66 ए को असंवैधानिक ठहराना बिल्कुल सही है, क्योंकि तकनीक के मौजूदा दौर में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बहुलतावाद और मतभेद से जुड़े उन संवैधानिक अधिकारों से ऊपर नहीं माना जा सकता, जो लोकतंत्र की आत्मा हैं। इसके बावजूद रोज़ाना हमारे राजनेताओं के ख़िलाफ़ अशोभनीय टिप्पणियाँ हो रही हैं, लेकिन हुक़ूमतें हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं। इसीलिए आये दिन सोशल मीडिया पर मनगढ़न्त तस्वीरों, फ़र्ज़ी ख़बरों और अफ़वाहों के ज़रिये साम्प्रदायिक ज़हर फैलाया जाता है। ऐसी घटनाएँ साफ़ बताती हैं कि आदर्श और ज़मीनी सच्चाई में कितना फ़र्क़ है! सत्ता इन्हें देखकर आँखें बन्द कर लेती है और जज भी नज़रें फेर लेने को ही अपना कर्त्तव्य मान लेते हैं।

यही वजह है कि जस्टिस गोगोई जिन दो भारत ही बात करते हैं, उनके बीच की खाई को पाटना बेहद मुश्किल है। इसीलिए अदालतें जिस अभिव्यक्ति की आज़ादी की बातें करती हैं, वो महत्वहीन हो जाती है। लिहाज़ा, जस्टिस गोगोई का ये कहना बिल्कुल सही है कि भारत को सिर्फ़ शोर करने वाले नहीं बल्कि स्वतंत्र पत्रकारों की ज़रूरत है। जबकि आलम ये है कि जिस चौथे खम्भे यानी मीडिया को संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए अपने पत्रकारीय मूल्यों का शोर मचाना चाहिए वो आज सरकार से गलबहियाँ कर चुका है। ये दशा वाकई में लोकतंत्र के लिए बहुत ख़तरनाक है।

क़रीब दो सदी पहले एलेक्ज़ेडर हैमिल्टन ने लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक दशाओं की व्याख्या की थी। उसका सन्दर्भ देते हुए जस्टिस गोगोई ने बिल्कुल सही फ़रमाया कि न्यायपालिका का लोकतंत्र की बाक़ी दो में से किसी भी शाखा के साथ गठजोड़ बना लेना सबसे ख़तरनाक है। क्योंकि इससे अलग-अलग क्षेत्राधिकार वाली संविधान की मूल भावना का दमन हो जाता है। संसदीय लोकतंत्र में कार्यपालिका और विधायिका को एक-दूसरे के साथ सुर-ताल में चलना होता है, लेकिन यदि कार्यपालिका का न्यायपालिका से गठजोड़ हो जाए तो फिर लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा ख़तरा और कुछ नहीं हो सकता। इसी गठजोड़ के ज़रिये जब अन्याय और अत्याचार को जारी रखा जाता है तब अदालती आदेश को अन्तिम मानने का सिद्धान्त बेहद घातक हो जाता है।

ये निर्विवाद सत्य है कि हमारा राजनीतिक लोकतंत्र करोड़ों लोगों को इंसाफ़ देने में नाकाम रहा है। हमारे देश में ऐसे मुद्दों की भरमार है जिसका समतामूलक समाज की अभिकल्पना से कोई वास्ता नहीं है। धार्मिक ध्रुवीकरण को पैदा करने वाली बहस, किसी ख़ास धर्म के लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा और राजनेताओं की उस वक़्त की ख़ामोशी जब उनसे बयान की अपेक्षा हो। ऐसे मुद्दों का विकास से कोई नाता नहीं है। न्यायपालिका ने अतीत में जनहित याचिका को बेज़ुबानों की ज़ुबान बनाया था। इसके लिए हुक़ूमत को कई ऐसे क़दम उठाने के लिए मज़बूर किया गया, जिनसे वो कन्नी काट रही थी। लेकिन अब जनहित याचिका का चरित्र बदल चुका है। अब अक्सर इसका इस्तेमाल उन लोगों की रक्षा करने के लिए हो रहा है तो ख़ुद अन्यायकारी हैं।

हमारी न्यायपालिका को अपने विशिष्ट स्थान से जुड़े एक और पहलू पर भी ज़रूर ध्यान देना चाहिए। सरकारी कामकाज़ की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। सत्ता के गलियारों में, किन मंशाओं से प्रेरित होकर फ़ैसले लिये जाते हैं, इसे सूचना के अधिकार क़ानून, 2005 के बावजूद नहीं जाना जा सकता। राजनीतिक लाभ लेने के लिए अक्सर क़ानून तक बदल दिये जाते हैं। अदालत की कार्यवाही भले ही उसी और पारदर्शी है। लेकिन ये वरदान है तो अभिश्राप भी। वरदान इसलिए क्योंकि अदालत में हुई गतिविधियों का पता उन लोगों को भी चल जाता है, जो फ़ैसले को अपना अमोघ अस्त्र बनाना चाहते हैं। इससे न्याय करने की प्रक्रिया शुद्ध बनी रही है। लेकिन अभिश्राप ये है कि संवैधानिक धारणाओं के मुताबिक़, जब जज अपने फ़ैसले की गुणवत्ता को सर्वोपरि रखने में नाकाम रहते हैं, तब वो करोड़ों लोगों की चौकस नज़रों के सामने होते हैं। इसीलिए बात तब बहुत ख़ौफ़नाक हो जाती है जब ये धारणा बनने लगे कि सुप्रीम कोर्ट से भी इंसाफ़ नहीं मिला। इस पहलू को लेकर पूरी न्यायिक बिरादरी को बेहद संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।

जॉर्ज ओरवेल की 1984 का सन्दर्भ देते जस्टिस गोगोई ने सही कहा कि ‘स्वतंत्रता का मतलब है कि ये कहा जा सके कि दो और दो चार होते हैं’। लेकिन कई बार हमें डर लगता है कि दो और दो चार नहीं होते। ये चिन्ताजनक है।

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस)

The writer, a senior Congress leader, is a former Union minister

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