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2015 की हार के लिए बीजेपी अब दिल्ली के पार्षदों को बनाएगी ‘बलि का बकरा!’

बीजेपी ने सारे पुराने पार्षदों का टिकट काटने का जो इरादा बनाया है वो एक और मायने में ‘मौके पर चौका लगाने’ जैसा है क्योंकि इस बार दिल्ली के 272 में से 175 वार्डों का परिसीमन और रोटेशन होना है।

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बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के पास पहुँची ज़मीनी रिपोर्ट के मुताबिक़, 22 अप्रैल को होने वाले दिल्ली नगर निगम चुनाव में उनकी पार्टी की हालत बेहद ख़स्ता है। क्योंकि दिल्लीवासियों की नज़र में बीजेपी के पार्षदों की छवि बेहद ख़राब है। इसी ख़राब छवि की वजह से दिल्ली में दो साल पहले आम आदमी पार्टी का परचम लहराया था। तब लगातार 15 साल से राजधानी पर राज कर रही काँग्रेस की शीला दीक्षित सरकार का तो सफाया हुआ ही, बीजेपी भी नेस्तनाबूद हो गयी। इसीलिए आपात रणनीति के तहत अमित शाह ने इस बार अपने सभी 153 पार्षदों को ‘बलि का बकरा’ बनाने का फ़ैसला किया! उन्हें लगता है कि उनका यही नुस्ख़ा पार्टी का उद्धार कर देगा।

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विधानसभा चुनाव के नतीज़ों के बाद जब अमित शाह ने पाया कि पाँच में से चार राज्यों में बीजेपी की जायज़ या नाजायज़ हथकंडों से सरकार बन जाएगी, तब ये ख़बर उड़ा दी गयी कि दिल्ली में इस बार बीजेपी अपने किसी भी मौजूदा निगम पार्षद या उसके परिजन या रिश्तेदार को भी टिकट नहीं देगी। अमित शाह की इस रणनीति से राजधानी के भगवा ख़ानदान में अज़ीबोग़रीब खलबली है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। 22 अप्रैल को होने वाले तीनों नगर निगम में नये चेहरों को मौक़ा देने की रणनीति का असली मतलब है कि बीजेपी ने मान लिया है कि उसके पुराने चेहरों की छवि इतनी बदतर और दाग़दार हो चुकी है कि अब उसे सर्ज़िकल हमले की ज़रूरत है। अमित शाह को मिले ज़मीनी फ़ीडबैक के मुताबिक़, इस बार यदि बीजेपी की पतवार उसके पुराने नेताओं के हाथों में ही रही तो उसकी नैय्या को डूबने से कोई नहीं बचा सकता!

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दिल्ली में 2014 से पहले लगातार 15 साल तक शीला दीक्षित की सरकार रही। तो बीते दस साल से शहर की तीनों नगर निगमों पर बीजेपी क़ाबिज़ रही है। 2014 में आम आदमी पार्टी ने पहली बार में ही जहाँ काँग्रेस को मृतप्राय बना दिया वहीं 2015 में विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीतकर बीजेपी को भी नेस्तनाबूद कर दिया। इस सफ़र में 13 पार्षद आम आदमी पार्टी के विधायक बन गये। इनकी सीटों पर 2016 में चुनाव हुआ तो आम आदमी पार्टी सिर्फ़ पाँच सीटें बचा पायी। इसमें पाँच सीटें जीतकर काँग्रेस का पुनर्जन्म हुआ तो एक दशक से निगम की सत्ता में मौजूद बीजेपी को महज तीन सीटों से सन्तोष करना पड़ा।

बीजेपी के ऐसे प्रदर्शन से उसका भविष्य अन्धकारमय हो गया। इसीलिए अब चुनाव विशेषज्ञ अमित शाह ने तय किया है कि राजधानी में बीजेपी अपने सभी मौजूदा पार्षदों को 2014, 2015 और 2016 के प्रदर्शनों की सज़ा देगी। क्योंकि यदि पार्षदों ने अपनी छवि बनायी होती तो 2014 और 2015 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को शर्मनाक दिन न देखने पड़ते। और न ही 2016 में रही-सही इज़्ज़त पर बट्टा लगता। लिहाज़ा, अमित शाह अबकी बार बीजेपी की ओर से सारे के सारे नये चेहरों को मैदान में उतारेंगे और चुनाव की कमान अपनी मुट्ठी में रखेंगे। उन्हें लगता है कि हाल के विधानसभा चुनावों में मिली क़ामयाबी के ज़रिये बनी बीजेपी की छवि को वो दिल्ली में भुनाने में सफल हो जाएँगे।

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ऐसी ही तरक़ीब को बीजेपी ने 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में भी सफलतापूर्वक आज़माया था। तब मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर नये लोगों को मैदान में उतारा था और उन्हें जिता भी लिया था। पार्टी को लगता है कि ऐसा करके सत्ताविरोधी लहर यानी Anti incumbency factor का तोड़ निकाला जा सकता है। लेकिन बड़ा सवाल ये होगा कि क्या दिल्लीवालों को नयी बोतल में पुरानी शराब पसन्द आएगी? क्या सिर्फ़ पैकेज़िग बदल जाने से उत्पाद यानी Product भी बदल जाएगा? उसकी गुणवत्ता यानी Quality में भी अपने आप सुधार आ जाएगा? इस पर मोदी-शाह का जवाब होगा कि जब यही नुस्ख़ा गुजरात में रंग ला सकता है तो दिल्ली में क्यों नहीं!

वैसे भी बीजेपी का नया चिन्तन अब सिर्फ़ चुनाव जीतने की क्षमता या Winnability Factor तक सीमित हो गया है। हाल के विधानसभा चुनावों में जनता देख चुकी है कि बीजेपी को अब रातों-रात दल-बदलकर आने वालों और दूसरी पार्टियों में रहे भ्रष्ट और दाग़दार लोगों से भी कोई गुरेज़ नहीं रहा, बशर्ते उनमें जीतने का माद्दा हो! इस प्रवृति ने बीजेपी का उसी तरह काँग्रेसीकरण किया है, जैसा उस दौर में होता था जब काँग्रेस की लोकप्रियता उफान पर थी। बहरहाल, ये मानना मुश्किल नहीं है कि मौजूदा पार्षदों को टिकट नहीं देने का इरादा ये बताता है कि बाज़ी को हारता देख बीजेपी ने ताश की गड्डी को फिर से फेंटकर पत्ते बाँटने की रणनीति बनायी है।

यहीं एक कौतूहल भी है कि यदि पाँच साल पहले विजयी रहे दिल्ली के 153 पार्षदों का पत्ता साफ़ होगा तो फिर क्या ऐसा ही फ़ार्मूला देश भर में पार्टी के मौजूदा विधायकों और सांसदों के लिए भी अपनाया जाएगा? फ़ौरी तौर पर तो ऐसा लगता नहीं और न ही ये व्यावहारिक होगा। इस बीच, बीजेपी ख़ेमे में ये बात भी उड़ाई गयी कि अपवाद स्वरूप उन पार्षदों की उम्मीदवारी पर विचार किया जा सकता है जिनके बारे में सांसदों या अन्य बड़े नेताओं का राय बहुत उम्दा होगी। इसका मतलब ये हुआ कि जिन मौजूदा पार्षदों को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा उनके बारे में पार्टी का फ़ीडबैक बहुत ख़राब है। दूसरे शब्दों में टिकट गँवाने वाले पार्षद ही उन नेताओं में शुमार माने जाएँगे जिन्होंने दिल्ली में बीजेपी का कबाड़ा किया। एक साथ सबका टिकट कटने सबको एकसमान सज़ा भी मिल जाएगी। ग़ौरतलब ये भी है कि यदि बीजेपी के पार्षदों की छवि अच्छी होती तो दो साल पहले जब काँग्रेस की शीला दीक्षित सरकार की विदाई के वक़्त जनता उसे मौक़ा दे सकती थी। लेकिन तब जनता ने बीजेपी के नेताओं के वादों-इरादों पर यक़ीन नहीं किया और राजधानी को आम आदमी पार्टी के हवाले कर दिया वो भी अद्भुत जनादेश के साथ।

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‘सारे घर के बदल डालूँगा’ वाली बीजेपी की प्रस्तावित रणनीति क्या गुल खिलाएगी, इसका पता तो 25 अप्रैल को आने वाले नतीज़े बताएँगे। फ़िलहाल, शुरुआती माहौल बनाने में आम आदमी पार्टी आगे चल रही है, क्योंकि उसके ज़्यादातर उम्मीदवार घोषित हो चुके हैं। उनका प्रचार भी शुरू हो चुका है। जबकि बीजेपी और काँग्रेस इस लिहाज़ से अभी पिछड़े हुए हैं। उधर, दिल्ली का राज्य निर्वाचन आयोग साफ़ कर चुका है कि मतदान ईवीएम में ही होगा। पहली बार ‘नोटा’ बटन भी होगा। हालाँकि, अभी साफ़ नहीं है कि ईवीएम से निकलने वाली पर्ची यानी VVPAT का आगमन इस बार होगा या नहीं। यदि ऐसा नहीं हुआ तो ताज़ा प्रथा के मुताबिक, चुनाव हारने वाली पार्टियाँ एक बार फिर से ईवीएम पर ही हार का ठीकरा क्यों नहीं फोड़ेंगीं!

अन्त में, बीजेपी ने सारे पुराने पार्षदों का टिकट काटने का जो इरादा बनाया है वो एक और मायने में ‘मौके पर चौका लगाने’ जैसा है क्योंकि इस बार दिल्ली के 272 में से 175 वार्डों का परिसीमन और रोटेशन होना है। इस वजह से कुछ आरक्षित सीटें, सामान्य बन जाएँगी तो कुछ सामान्य सीटें, आरक्षित। नतीज़तन, बीजेपी के बमुश्किल 45 पार्षद ही दोबारा चुनाव लड़ने के लायक रह पाएँगे। इसीलिए सबका टिकट काटने की नीति जहाँ ‘कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना’ जैसी है, वहीं इसमें ‘एक तीर से कई निशाना साधने’ का माद्दा भी दिखायी देता है।

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नवजात शिशुओं में लीवर रोग की पहचान के लिए जागरूकता अभियान

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नई दिल्ली, 19 अप्रैल | नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों को आमतौर पर प्रभावित करने वाली लीवर की बीमारी को लेकर आम लोगों के बीच जागरूकता फैलाने के लिए अपोलो अस्पताल ने वर्ल्ड लीवर डे के मौके पर जागरूकता अभियान चलाया। अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप में मेडिकल डायरेक्टर व सीनियर कन्सलटेन्ट डॉ. अनुपम सिब्बल ने कहा, “दिमाग के बाद लीवर शरीर का दूसरा सबसे बड़ा ठोस अंग है, जो बहुत सारे मुश्किल काम करता है। लीवर हमारे शरीर में ऐसे सभी कामों को अंजाम देता है, जो अन्य अंगों के ठीक कार्य करने के लिए जरूरी हैं।”

उन्होंने कहा, “लीवर पाचन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भोजन पचाने के लिए बाईल बनाने के अलावा लीवर ब्लड शुगर को नियन्त्रित रखने में मदद करता है, शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालता है और कॉलेस्ट्रॉल का स्तर सामान्य बनाए रखता है। लीवर क्लॉटिंग फैक्टर्स, एल्बुमिन और ऐसे कई महत्वपूर्ण उत्पाद बनाता है।”

डॉ. अनुपम सिब्बल ने कहा, “लीवर बिना रुके काम करता है और अक्सर इसमें किसी भी तरह की खराबी के लक्षण जल्दी से दिखाई नहीं देते। लीवर रोगों के आम लक्षण हैं आंखों का पीला पड़ना, पेशाब का रंग पीला होना, भूख न लगना, मतली और उल्टी। 100 से ज्यादा ऐसी बीमारियां हैं जिनका असर लीवर पर पड़ता है।”

उन्होंने कहा, “अगर आपको पेट के आस-पास सूजन, पैरों में सूजन, वजन में कमी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें।”

डॉ. अनुपम सिब्बल ने लीवर की बीमारियों से बचने और इसके प्रबन्धन के लिए सुझाव दिए। इसमें हर बच्चे को जन्म के तुरंत बाद हेपेटाइटिस बी का टीका लगाना, रक्त और रक्त उत्पादों का इस्तेमाल करने से पहले हेपेटाइटिस बी और सी की जांच, साफ पेयजल का ही सेवन करना, कच्चे फलों और सब्जियों को सेवन से पहले अच्छी तरह धोना, जब भी संभव हो हेपेटाइटिस ए का टीका लगवाना, नवजात शिशु को अगर दो सप्ताह से ज्यादा पीलिया रहता है तो इसकी जांच करवाना चाहिए ताकि अगर लीवर की कोई बीमारी है तो इसका निदान कर तुरंत इलाज किया जा सके।

हाल ही में हेपेटाइटिस बी, सी और कई अन्य आनुवंशिक बीमारियों का इलाज खोज लिया गया है और यह सभी आधुनिक इलाज भारत में उपलब्ध हैं। भारत में लीवर ट्रांसप्लान्ट अब कामयाबी से किया जा रहा है।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

अंबेडकर ने नहीं सीखा था अन्याय के आगे झुकना

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Bhim-Rao-Ambedkar

कबीरपंथी परिवार में जन्मे डॉ. भीमराव अंबेडकर अपनी 127वीं जयंती के मौके पर भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितना संविधान के निर्माण के बाद और दलितों के संघर्ष के दौरान थे। दलितों और पिछड़ों को वोट बैंक समझने वाले सभी दल आज अंबेडकर को अपना मार्गदर्शक और प्रेरणा पुंज कहते नहीं अघाते हैं।

अंबेडकर के नाम पर कसमें खाई जाती हैं, आंदोलन किए जाते हैं और यह संदेश देने की पुरजोर कोशिशें की जाती हैं कि दलितों का सबसे बड़ा सिपहसालार कौन है। लेकिन यह भी हकीकत है कि राजनीति के मौजूदा बदले हुए तेवर में अगर वाकई कोई पीछे छूटता जा रहा है तो वह है सिर्फ और सिर्फ भीमराव अंबेडकर।

विलक्षण प्रतिभा के धनी भीमराव बेहद निर्भीक थे। वे न चुनौतियों से डरते थे, न झुकते थे। लड़ाकू और हठी अंबेडकर ने अन्याय के आगे झुकना तो जैसे सीखा ही न था।

14 अप्रैल, 1891 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के केंद्रीय प्रांत (मध्य प्रदेश) के इंदौर के पास महू नगर की छावनी में एक महार परिवार में माता-पिता की 14वीं संतान के रूप में जन्मे भीमराव के पिता की मृत्यु बालपन में ही हो गई थी। 1897 में बॉम्बे के एलफिन्सटोन हाईस्कूल में पहले अस्पृश्य के रूप में दाखिला लेकर 1907 में मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। पढ़ाई के दौरान ही 15 साल की उम्र में 1906 में 9 साल की रमाबाई से इनकी शादी हुई।

अंबेडकर ने अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र में डिग्री हासिल की। हिंदू धर्म में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव और छुआछूत से दुखी होकर उन्होंने इसके खिलाफ संघर्ष भी किया, लेकिन विशेष सफलता न मिलने पर इस धर्म को ही त्याग दिया। 14 अक्टूबर, 1956 को उन्होंने लाखों दलितों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। यह क्रम निरंतर जारी है।

कहा जाता है कि दलित मुद्दों पर अंबेडकर के गांधीजी से मतभेद रहे हैं। पत्रिका ‘हरिजन’ के 18 जुलाई, 1936 के अंक में अंबेडकर के ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ की समीक्षा में गांधीजी ने जोर दिया था कि हर किसी को अपना पैतृक पेशा जरूर मानना चाहिए, जिससे अधिकार ही नहीं, कर्तव्यों का भी बोध हो। यह सच्चाई है कि ब्रिटिश शासन के डेढ़ सौ वर्षों में भी अछूतों पर होने वाले जुल्म में कोई कमी नहीं आई थी, जिससे अंबेडकर आहत थे।

लेकिन धुन के पक्के अंबेडकर ने गोलमेज कॉन्फ्रें स में जो तर्क रखे, वो इतने ठोस और अधिकारपूर्ण थे कि ब्रिटिश सरकार तक को उनके सामने झुकना पड़ा और 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मैक्डोनल्ड ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के लिए एक तात्कालिक योजना की घोषणा की जिसे कम्युनल अवार्ड के नाम से जाना गया। इस अवार्ड में अछूत कहे जाने वाले समाज को दोहरा अधिकार मिला। पहला यह कि वे सुनिश्चित सीटों की आरक्षित व्यवस्था में अलग चुनकर जाएंगे और दूसरे में दो वोटों का अधिकार मिला। एक वोट आरक्षित सीट के लिए और दूसरा वोट अनारक्षित सीट के लिए। इसके बाद बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का कद समाज में काफी ऊंचा हो गया।

उनकी अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग का गांधीजी ने पुरजोर विरोध कर एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। उनकी दलील थी कि इससे हिंदू समाज बिखर जाएगा, लेकिन जब अंबेडकर जीत गए तो गांधीजी ने पूना पैक्ट (समझौता) पर दस्तखत के लिए उन्हें मजबूर कर दिया और आमरण अनशन पर चले गए।

गांधीजी की बिगड़ती तबीयत और उससे बढ़ते दबाव के चलते अंबेडकर 24 सितंबर, 1932 की शाम येरवदा जेल पहुंचे, जहां पर दोनों के बीच समझौता हुआ। इसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। समझौते के तहत डॉ. अंबेडकर ने दलितों को कम्युनल अवार्ड में मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार को छोड़ने की घोषणा की, लेकिन इसी में 78 आरक्षित सीटों को बढ़ाकर 148 करवाया। साथ ही अस्पृश्य लोगों के लिए हर प्रांत में शिक्षा अनुदान के लिए पर्याप्त रकम की व्यवस्था के साथ नौकरियों में बिना किसी भेदभाव के दलित वर्ग के लोगों की भर्ती को सुनिश्चित कराया।

उन्हें हालांकि इसके क्रियान्वयन की चिंता थी, तभी तो 25 सितंबर 1932 को बंबई में सवर्ण हिंदुओं की बहुत बड़ी सभा में अंबेडकर ने कहा, “हमारी एक ही चिंता है, क्या हिंदुओं की भावी पीढ़ियां इस समझौते का अनुपालन करेंगी?” इस पर सभी सवर्ण हिंदुओं ने एक स्वर में कहा था कि करेंगे।

डॉ. अंबेडकर ने यह भी कहा था, “हम देखते हैं कि दुर्भाग्यवश हिंदू संप्रदाय एक संघटित समूह नहीं है, बल्कि विभिन्न संप्रदायों का फेडरेशन है। मैं आशा और विश्वास करता हूं कि आप अपनी तरफ से इस अभिलेख को पवित्र मानेंगे तथा सम्मानजनक भावना से काम करेंगे।”

लेकिन आज जो हो रहा है, क्या इसी भाव से हो रहा है? कहीं अंबेडकर के नाम पर जोड़-तोड़ की कोशिशें तो कहीं इस कोशिश पर ऐतराज की नई राजनीति शुरू हो गई है। यह सच है कि दलितों के शोषण और अत्याचार का एक सदियों पुराना और लंबा सिलसिला है जो अब भी किसी न किसी रूप में बरकरार है।

गुलाम भारत में अंबेडकर के राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष ने दलितों को जहां राह दिखाई, वहीं आजाद भारत में दलितों के सम्मानजनक स्थान के लिए मार्ग भी प्रशस्त किया। लेकिन लगता नहीं कि आत्मसम्मान और गरिमा की लड़ाई में दलित समुदाय अब भी अकेला है। अंबेडकर का उपयोग सभी दल करना चाहते हैं।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्कूल में पढ़ते समय भीम की प्रतिभा और लगन को देखकर महादेव अंबेडकर नामक ब्राह्मण अध्यापक अपने बेहद प्रिय इस छात्र को दोपहर की छुट्टी के समय अपने भोजन से चावल, दाल, रोटी देते थे। यह अत्यधिक स्नेह ही था जो भीमराव का उपनाम सकपाल घराने के अंबेवाडी गांव के चलते अंबेवाडेकर से बदलकर अपना ब्राह्मण उपनाम अंबेडकर कर दिया, बल्कि स्कूल के रजिस्टर तक में बदल डाला।

इस तरह दलित भीम के नाम के साथ ब्राह्मण अंबेडकर का नाम सदैव के लिए जुड़ गया, लेकिन राजनीति की फितरत देखिए कि भीमराव अंबेडकर के नाम पर राजनीति थमने का नाम नहीं ले रही है, जबकि उनका स्थान शुरू से ही राजनीति से कहीं ऊपर था, है और रहेगा।

By : ऋतुपर्ण दवे

–आईएएनएस

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अंबेडकर ने हर शोषित वर्ग की लड़ाई लड़ी

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babasaheb ambedkar

नई दिल्ली, 13 अप्रैल | भारतरत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर को दलितों का मसीहा माना जाता है, जबकि असलियत में उन्होंने जीवन भर दलितों की नहीं, बल्कि समाज के सभी शोषित वर्गो के अधिकारों की लड़ाई लड़ी।

भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को मध्य प्रदेश के महू नामक एक गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल था। इनके पिता ब्रिटिश भारतीय सेना में काम करते थे। ये अपने माता-पिता की 14वीं संतान थे। ये महार जाति से ताल्लुक रखते थे, जिसे हिंदू धर्म में अछूत माना जाता था।

घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण इनका पालन-पोषण बड़ी मुश्किल से हो पाया। इन परिस्थितियों में ये तीन भाई- बलराम, आनंदराव और भीमराव तथा दो बहनें मंजुला और तुलसा ही जीवित बच सके। सभी भाई-बहनों में सिर्फ इन्हें ही उच्च शिक्षा मिल सकी।

हिंदू धर्म में व्याप्त चतुष्वर्णीय जाति व्यवस्था के कारण इन्हें जीवन भर छुआछूत का सामना करना पड़ा। स्कूल के सबसे मेधावी छात्रों में गिने जाने के बावजूद इन्हें पानी का गिलास छूने का अधिकार नहीं था। उच्च जाति का छात्र काफी ऊपर से हाथ में डालकर इन्हें पानी पिलाता था। बाद में इन्होंने हिंदू धर्म की कुरीतियों को समाप्त करने का जिंदगी भर प्रयास किया। जब इन्हें लगा कि ये हिंदू धर्म से कुरीतियों को नहीं मिटा पाएंगे, तब 14 अक्टूबर, 1956 में अपने लाखों समर्थकों सहित बौद्ध धर्म अपना लिया।

आज के दौर में हिंदू के नाम पर राजनीति तो की जा रही है और दलितों का वोट पाने के लिए डॉ. अंबेडकर को ‘अपना’ बताया जा रहा है, लेकिन कोई यह सोचने के लिए तैयार नहीं है कि बाबा साहेब ने हिंदू धर्म क्यों छोड़ा।

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राजनीति करने वाले आज डॉ. अंबेडकर का भी भगवाकरण करने का प्रयास करते हैं, किसी के धर्मातरण पर व्यग्र और उग्र हो उठते हैं, लेकिन अपने धर्म पर आत्मचिंतन करना, सोच बदलना, कुरीतियां मिटाना जरूरी नहीं समझते। अगर सोच बदली होती तो जगह-जगह अंबेडकर की मूर्तियां नहीं तोड़ी जातीं।

डॉ. अंबेडकर की पहली शादी नौ साल की उम्र में रमाबाई से हुई। रमाबाई की मृत्यु के बाद इन्होंने ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाली सविता से विवाह कर लिया। सविता ने भी इनके साथ ही बौद्ध धर्म अपना लिया था। अंबेडकर की दूसरी पत्नी सविता का निधन वर्ष 2003 में हुआ।

भीमराव ने अपने एक ब्राह्मण दोस्त के कहने पर अपने नाम से सकपाल हटाकर अंबेडकर जोड़ लिया, जो अंबावड़े गांव से प्रेरित था।

अंबेडकर की गिनती दुनिया के सबसे मेधावी व्यक्तियों में होती थी। वे नौ भाषाओं के जानकार थे। इन्हें देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों से पीएचडी की कई मानद उपाधियां मिली थीं। इनके पास कुल 32 डिग्रियां थीं।

अंबेडकर को 15 अगस्त, 1947 को देश की आजादी के बाद देश के पहले देशी संविधान के निर्माण के लिए 29 अगस्त, 1947 को संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। फिर दो वर्ष, 11 माह, 18 दिन के बाद संविधान बनकर तैयार हुआ, 26 नवंबर, 1949 को इसे अपनाया गया और 26 जनवरी, 1950 को लागू कर दिया गया।

कानूनविद् अंबेडकर को प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत का पहला कानून मंत्री बनाया था।

डॉ. अंबेडकर ने समाज में व्याप्त बुराइयों के लिए सबसे ज्यादा महिलाओं की अशिक्षा को जिम्मेदार माना। इन्होंने महिलाओं की शिक्षा पर जोर दिया। उनके सशक्तिकरण के लिए इन्होंने हिंदू कोड अधिनियम की मांग की। तब भारी विरोध के चलते वह पारित नहीं हो सका, लेकिन बाद में वही अधिनियम हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम और हिंदू विशेष विवाह अधिनियम के नाम से 1956 में पारित हुआ। इससे हिंदू महिलाओं को मजबूती मिलती थी।

बाबा साहेब ने सिर्फ अछूतों के अधिकार के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज के पुनर्निर्माण के लिए प्रयासरत रहे। उन्होंने मजदूर वर्ग के कल्याण के लिए भी उल्लेखनीय कार्य किया। पहले मजदूरों से प्रतिदिन 12-14 घंटों तक काम लिया जाता था। इनके प्रयासों से प्रतिदिन आठ घंटे काम करने का नियम पारित हुआ।

इसके अलावा इन्होंने मजदूरों के लिए इंडियन ट्रेड यूनियन अधिनियम, औद्योगिक विवाद अधिनियम, मुआवजा आदि सुधार भी इन्हीं के प्रयासों से हुए। उन्होंने मजदूरों को राजनीति में सक्रिय भागीदारी करने के लिए प्रेरित किया। वर्तमान के लगभग सभी श्रम कानून बाबा साहेब के ही बनाए हुए हैं।

बाबा साहेब कृषि को उद्योग का दर्जा देना चाहते थे। उन्होंने कृषि का राष्ट्रीयकरण करने का प्रयास किया। राष्ट्रीय झंडे में अशोक चक्र लगाने का श्रेय भी इन्हीं को जाता है।

ये अकेले भारतीय हैं, जिनकी प्रतिमा लंदन संग्रहालय में कार्ल मार्क्‍स के साथ लगी है। साल 1948 में डॉ. अंबेडकर मधुमेह से पीड़ित हो गए। छह दिसंबर, 1956 को इनका निधन हो गया।

डॉ. अंबेडकर को देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। इनके निधन के 34 साल बाद वर्ष 1990 में जनता दल की वी.पी. सिंह सरकार ने इन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारतरत्न से सम्मानित किया था। इस सरकार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बाहर से समर्थन दे रही थी। वी.पी. सिंह ने जब वी.पी. मंडल कमीशन की सिफारिश लागू कर दलितों, पिछड़ों को आरक्षण का अधिकार दिया, तब भाजपा ने समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी थी और सवर्ण युवाओं को आरक्षण के खिलाफ आत्मदाह के लिए उकसाया था। देशभर में कई युवकों ने आत्मदाह कर लिया था और जातीय दंगे हुए थे, जिसे ‘मंडल-कमंडल विवाद’ नाम दिया गया था।

BY : अनुराग सक्सेना

–आईएएनएस

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