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2015 की हार के लिए बीजेपी अब दिल्ली के पार्षदों को बनाएगी ‘बलि का बकरा!’

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के पास पहुँची ज़मीनी रिपोर्ट के मुताबिक़, 22 अप्रैल को होने वाले दिल्ली नगर निगम चुनाव में उनकी पार्टी की हालत बेहद ख़स्ता है। क्योंकि दिल्लीवासियों की नज़र में बीजेपी के पार्षदों की छवि बेहद ख़राब है। इसी ख़राब छवि की वजह से दिल्ली में दो साल पहले आम आदमी पार्टी का परचम लहराया था। तब लगातार 15 साल से राजधानी पर राज कर रही काँग्रेस की शीला दीक्षित सरकार का तो सफाया हुआ ही, बीजेपी भी नेस्तनाबूद हो गयी। इसीलिए आपात रणनीति के तहत अमित शाह ने इस बार अपने सभी 153 पार्षदों को ‘बलि का बकरा’ बनाने का फ़ैसला किया! उन्हें लगता है कि उनका यही नुस्ख़ा पार्टी का उद्धार कर देगा।

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विधानसभा चुनाव के नतीज़ों के बाद जब अमित शाह ने पाया कि पाँच में से चार राज्यों में बीजेपी की जायज़ या नाजायज़ हथकंडों से सरकार बन जाएगी, तब ये ख़बर उड़ा दी गयी कि दिल्ली में इस बार बीजेपी अपने किसी भी मौजूदा निगम पार्षद या उसके परिजन या रिश्तेदार को भी टिकट नहीं देगी। अमित शाह की इस रणनीति से राजधानी के भगवा ख़ानदान में अज़ीबोग़रीब खलबली है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। 22 अप्रैल को होने वाले तीनों नगर निगम में नये चेहरों को मौक़ा देने की रणनीति का असली मतलब है कि बीजेपी ने मान लिया है कि उसके पुराने चेहरों की छवि इतनी बदतर और दाग़दार हो चुकी है कि अब उसे सर्ज़िकल हमले की ज़रूरत है। अमित शाह को मिले ज़मीनी फ़ीडबैक के मुताबिक़, इस बार यदि बीजेपी की पतवार उसके पुराने नेताओं के हाथों में ही रही तो उसकी नैय्या को डूबने से कोई नहीं बचा सकता!

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दिल्ली में 2014 से पहले लगातार 15 साल तक शीला दीक्षित की सरकार रही। तो बीते दस साल से शहर की तीनों नगर निगमों पर बीजेपी क़ाबिज़ रही है। 2014 में आम आदमी पार्टी ने पहली बार में ही जहाँ काँग्रेस को मृतप्राय बना दिया वहीं 2015 में विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीतकर बीजेपी को भी नेस्तनाबूद कर दिया। इस सफ़र में 13 पार्षद आम आदमी पार्टी के विधायक बन गये। इनकी सीटों पर 2016 में चुनाव हुआ तो आम आदमी पार्टी सिर्फ़ पाँच सीटें बचा पायी। इसमें पाँच सीटें जीतकर काँग्रेस का पुनर्जन्म हुआ तो एक दशक से निगम की सत्ता में मौजूद बीजेपी को महज तीन सीटों से सन्तोष करना पड़ा।

बीजेपी के ऐसे प्रदर्शन से उसका भविष्य अन्धकारमय हो गया। इसीलिए अब चुनाव विशेषज्ञ अमित शाह ने तय किया है कि राजधानी में बीजेपी अपने सभी मौजूदा पार्षदों को 2014, 2015 और 2016 के प्रदर्शनों की सज़ा देगी। क्योंकि यदि पार्षदों ने अपनी छवि बनायी होती तो 2014 और 2015 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को शर्मनाक दिन न देखने पड़ते। और न ही 2016 में रही-सही इज़्ज़त पर बट्टा लगता। लिहाज़ा, अमित शाह अबकी बार बीजेपी की ओर से सारे के सारे नये चेहरों को मैदान में उतारेंगे और चुनाव की कमान अपनी मुट्ठी में रखेंगे। उन्हें लगता है कि हाल के विधानसभा चुनावों में मिली क़ामयाबी के ज़रिये बनी बीजेपी की छवि को वो दिल्ली में भुनाने में सफल हो जाएँगे।

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ऐसी ही तरक़ीब को बीजेपी ने 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में भी सफलतापूर्वक आज़माया था। तब मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर नये लोगों को मैदान में उतारा था और उन्हें जिता भी लिया था। पार्टी को लगता है कि ऐसा करके सत्ताविरोधी लहर यानी Anti incumbency factor का तोड़ निकाला जा सकता है। लेकिन बड़ा सवाल ये होगा कि क्या दिल्लीवालों को नयी बोतल में पुरानी शराब पसन्द आएगी? क्या सिर्फ़ पैकेज़िग बदल जाने से उत्पाद यानी Product भी बदल जाएगा? उसकी गुणवत्ता यानी Quality में भी अपने आप सुधार आ जाएगा? इस पर मोदी-शाह का जवाब होगा कि जब यही नुस्ख़ा गुजरात में रंग ला सकता है तो दिल्ली में क्यों नहीं!

वैसे भी बीजेपी का नया चिन्तन अब सिर्फ़ चुनाव जीतने की क्षमता या Winnability Factor तक सीमित हो गया है। हाल के विधानसभा चुनावों में जनता देख चुकी है कि बीजेपी को अब रातों-रात दल-बदलकर आने वालों और दूसरी पार्टियों में रहे भ्रष्ट और दाग़दार लोगों से भी कोई गुरेज़ नहीं रहा, बशर्ते उनमें जीतने का माद्दा हो! इस प्रवृति ने बीजेपी का उसी तरह काँग्रेसीकरण किया है, जैसा उस दौर में होता था जब काँग्रेस की लोकप्रियता उफान पर थी। बहरहाल, ये मानना मुश्किल नहीं है कि मौजूदा पार्षदों को टिकट नहीं देने का इरादा ये बताता है कि बाज़ी को हारता देख बीजेपी ने ताश की गड्डी को फिर से फेंटकर पत्ते बाँटने की रणनीति बनायी है।

यहीं एक कौतूहल भी है कि यदि पाँच साल पहले विजयी रहे दिल्ली के 153 पार्षदों का पत्ता साफ़ होगा तो फिर क्या ऐसा ही फ़ार्मूला देश भर में पार्टी के मौजूदा विधायकों और सांसदों के लिए भी अपनाया जाएगा? फ़ौरी तौर पर तो ऐसा लगता नहीं और न ही ये व्यावहारिक होगा। इस बीच, बीजेपी ख़ेमे में ये बात भी उड़ाई गयी कि अपवाद स्वरूप उन पार्षदों की उम्मीदवारी पर विचार किया जा सकता है जिनके बारे में सांसदों या अन्य बड़े नेताओं का राय बहुत उम्दा होगी। इसका मतलब ये हुआ कि जिन मौजूदा पार्षदों को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा उनके बारे में पार्टी का फ़ीडबैक बहुत ख़राब है। दूसरे शब्दों में टिकट गँवाने वाले पार्षद ही उन नेताओं में शुमार माने जाएँगे जिन्होंने दिल्ली में बीजेपी का कबाड़ा किया। एक साथ सबका टिकट कटने सबको एकसमान सज़ा भी मिल जाएगी। ग़ौरतलब ये भी है कि यदि बीजेपी के पार्षदों की छवि अच्छी होती तो दो साल पहले जब काँग्रेस की शीला दीक्षित सरकार की विदाई के वक़्त जनता उसे मौक़ा दे सकती थी। लेकिन तब जनता ने बीजेपी के नेताओं के वादों-इरादों पर यक़ीन नहीं किया और राजधानी को आम आदमी पार्टी के हवाले कर दिया वो भी अद्भुत जनादेश के साथ।

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‘सारे घर के बदल डालूँगा’ वाली बीजेपी की प्रस्तावित रणनीति क्या गुल खिलाएगी, इसका पता तो 25 अप्रैल को आने वाले नतीज़े बताएँगे। फ़िलहाल, शुरुआती माहौल बनाने में आम आदमी पार्टी आगे चल रही है, क्योंकि उसके ज़्यादातर उम्मीदवार घोषित हो चुके हैं। उनका प्रचार भी शुरू हो चुका है। जबकि बीजेपी और काँग्रेस इस लिहाज़ से अभी पिछड़े हुए हैं। उधर, दिल्ली का राज्य निर्वाचन आयोग साफ़ कर चुका है कि मतदान ईवीएम में ही होगा। पहली बार ‘नोटा’ बटन भी होगा। हालाँकि, अभी साफ़ नहीं है कि ईवीएम से निकलने वाली पर्ची यानी VVPAT का आगमन इस बार होगा या नहीं। यदि ऐसा नहीं हुआ तो ताज़ा प्रथा के मुताबिक, चुनाव हारने वाली पार्टियाँ एक बार फिर से ईवीएम पर ही हार का ठीकरा क्यों नहीं फोड़ेंगीं!

अन्त में, बीजेपी ने सारे पुराने पार्षदों का टिकट काटने का जो इरादा बनाया है वो एक और मायने में ‘मौके पर चौका लगाने’ जैसा है क्योंकि इस बार दिल्ली के 272 में से 175 वार्डों का परिसीमन और रोटेशन होना है। इस वजह से कुछ आरक्षित सीटें, सामान्य बन जाएँगी तो कुछ सामान्य सीटें, आरक्षित। नतीज़तन, बीजेपी के बमुश्किल 45 पार्षद ही दोबारा चुनाव लड़ने के लायक रह पाएँगे। इसीलिए सबका टिकट काटने की नीति जहाँ ‘कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना’ जैसी है, वहीं इसमें ‘एक तीर से कई निशाना साधने’ का माद्दा भी दिखायी देता है।

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