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2015 की हार के लिए बीजेपी अब दिल्ली के पार्षदों को बनाएगी ‘बलि का बकरा!’

बीजेपी ने सारे पुराने पार्षदों का टिकट काटने का जो इरादा बनाया है वो एक और मायने में ‘मौके पर चौका लगाने’ जैसा है क्योंकि इस बार दिल्ली के 272 में से 175 वार्डों का परिसीमन और रोटेशन होना है।

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बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के पास पहुँची ज़मीनी रिपोर्ट के मुताबिक़, 22 अप्रैल को होने वाले दिल्ली नगर निगम चुनाव में उनकी पार्टी की हालत बेहद ख़स्ता है। क्योंकि दिल्लीवासियों की नज़र में बीजेपी के पार्षदों की छवि बेहद ख़राब है। इसी ख़राब छवि की वजह से दिल्ली में दो साल पहले आम आदमी पार्टी का परचम लहराया था। तब लगातार 15 साल से राजधानी पर राज कर रही काँग्रेस की शीला दीक्षित सरकार का तो सफाया हुआ ही, बीजेपी भी नेस्तनाबूद हो गयी। इसीलिए आपात रणनीति के तहत अमित शाह ने इस बार अपने सभी 153 पार्षदों को ‘बलि का बकरा’ बनाने का फ़ैसला किया! उन्हें लगता है कि उनका यही नुस्ख़ा पार्टी का उद्धार कर देगा।

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विधानसभा चुनाव के नतीज़ों के बाद जब अमित शाह ने पाया कि पाँच में से चार राज्यों में बीजेपी की जायज़ या नाजायज़ हथकंडों से सरकार बन जाएगी, तब ये ख़बर उड़ा दी गयी कि दिल्ली में इस बार बीजेपी अपने किसी भी मौजूदा निगम पार्षद या उसके परिजन या रिश्तेदार को भी टिकट नहीं देगी। अमित शाह की इस रणनीति से राजधानी के भगवा ख़ानदान में अज़ीबोग़रीब खलबली है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। 22 अप्रैल को होने वाले तीनों नगर निगम में नये चेहरों को मौक़ा देने की रणनीति का असली मतलब है कि बीजेपी ने मान लिया है कि उसके पुराने चेहरों की छवि इतनी बदतर और दाग़दार हो चुकी है कि अब उसे सर्ज़िकल हमले की ज़रूरत है। अमित शाह को मिले ज़मीनी फ़ीडबैक के मुताबिक़, इस बार यदि बीजेपी की पतवार उसके पुराने नेताओं के हाथों में ही रही तो उसकी नैय्या को डूबने से कोई नहीं बचा सकता!

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दिल्ली में 2014 से पहले लगातार 15 साल तक शीला दीक्षित की सरकार रही। तो बीते दस साल से शहर की तीनों नगर निगमों पर बीजेपी क़ाबिज़ रही है। 2014 में आम आदमी पार्टी ने पहली बार में ही जहाँ काँग्रेस को मृतप्राय बना दिया वहीं 2015 में विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीतकर बीजेपी को भी नेस्तनाबूद कर दिया। इस सफ़र में 13 पार्षद आम आदमी पार्टी के विधायक बन गये। इनकी सीटों पर 2016 में चुनाव हुआ तो आम आदमी पार्टी सिर्फ़ पाँच सीटें बचा पायी। इसमें पाँच सीटें जीतकर काँग्रेस का पुनर्जन्म हुआ तो एक दशक से निगम की सत्ता में मौजूद बीजेपी को महज तीन सीटों से सन्तोष करना पड़ा।

बीजेपी के ऐसे प्रदर्शन से उसका भविष्य अन्धकारमय हो गया। इसीलिए अब चुनाव विशेषज्ञ अमित शाह ने तय किया है कि राजधानी में बीजेपी अपने सभी मौजूदा पार्षदों को 2014, 2015 और 2016 के प्रदर्शनों की सज़ा देगी। क्योंकि यदि पार्षदों ने अपनी छवि बनायी होती तो 2014 और 2015 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को शर्मनाक दिन न देखने पड़ते। और न ही 2016 में रही-सही इज़्ज़त पर बट्टा लगता। लिहाज़ा, अमित शाह अबकी बार बीजेपी की ओर से सारे के सारे नये चेहरों को मैदान में उतारेंगे और चुनाव की कमान अपनी मुट्ठी में रखेंगे। उन्हें लगता है कि हाल के विधानसभा चुनावों में मिली क़ामयाबी के ज़रिये बनी बीजेपी की छवि को वो दिल्ली में भुनाने में सफल हो जाएँगे।

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ऐसी ही तरक़ीब को बीजेपी ने 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में भी सफलतापूर्वक आज़माया था। तब मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर नये लोगों को मैदान में उतारा था और उन्हें जिता भी लिया था। पार्टी को लगता है कि ऐसा करके सत्ताविरोधी लहर यानी Anti incumbency factor का तोड़ निकाला जा सकता है। लेकिन बड़ा सवाल ये होगा कि क्या दिल्लीवालों को नयी बोतल में पुरानी शराब पसन्द आएगी? क्या सिर्फ़ पैकेज़िग बदल जाने से उत्पाद यानी Product भी बदल जाएगा? उसकी गुणवत्ता यानी Quality में भी अपने आप सुधार आ जाएगा? इस पर मोदी-शाह का जवाब होगा कि जब यही नुस्ख़ा गुजरात में रंग ला सकता है तो दिल्ली में क्यों नहीं!

वैसे भी बीजेपी का नया चिन्तन अब सिर्फ़ चुनाव जीतने की क्षमता या Winnability Factor तक सीमित हो गया है। हाल के विधानसभा चुनावों में जनता देख चुकी है कि बीजेपी को अब रातों-रात दल-बदलकर आने वालों और दूसरी पार्टियों में रहे भ्रष्ट और दाग़दार लोगों से भी कोई गुरेज़ नहीं रहा, बशर्ते उनमें जीतने का माद्दा हो! इस प्रवृति ने बीजेपी का उसी तरह काँग्रेसीकरण किया है, जैसा उस दौर में होता था जब काँग्रेस की लोकप्रियता उफान पर थी। बहरहाल, ये मानना मुश्किल नहीं है कि मौजूदा पार्षदों को टिकट नहीं देने का इरादा ये बताता है कि बाज़ी को हारता देख बीजेपी ने ताश की गड्डी को फिर से फेंटकर पत्ते बाँटने की रणनीति बनायी है।

यहीं एक कौतूहल भी है कि यदि पाँच साल पहले विजयी रहे दिल्ली के 153 पार्षदों का पत्ता साफ़ होगा तो फिर क्या ऐसा ही फ़ार्मूला देश भर में पार्टी के मौजूदा विधायकों और सांसदों के लिए भी अपनाया जाएगा? फ़ौरी तौर पर तो ऐसा लगता नहीं और न ही ये व्यावहारिक होगा। इस बीच, बीजेपी ख़ेमे में ये बात भी उड़ाई गयी कि अपवाद स्वरूप उन पार्षदों की उम्मीदवारी पर विचार किया जा सकता है जिनके बारे में सांसदों या अन्य बड़े नेताओं का राय बहुत उम्दा होगी। इसका मतलब ये हुआ कि जिन मौजूदा पार्षदों को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा उनके बारे में पार्टी का फ़ीडबैक बहुत ख़राब है। दूसरे शब्दों में टिकट गँवाने वाले पार्षद ही उन नेताओं में शुमार माने जाएँगे जिन्होंने दिल्ली में बीजेपी का कबाड़ा किया। एक साथ सबका टिकट कटने सबको एकसमान सज़ा भी मिल जाएगी। ग़ौरतलब ये भी है कि यदि बीजेपी के पार्षदों की छवि अच्छी होती तो दो साल पहले जब काँग्रेस की शीला दीक्षित सरकार की विदाई के वक़्त जनता उसे मौक़ा दे सकती थी। लेकिन तब जनता ने बीजेपी के नेताओं के वादों-इरादों पर यक़ीन नहीं किया और राजधानी को आम आदमी पार्टी के हवाले कर दिया वो भी अद्भुत जनादेश के साथ।

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‘सारे घर के बदल डालूँगा’ वाली बीजेपी की प्रस्तावित रणनीति क्या गुल खिलाएगी, इसका पता तो 25 अप्रैल को आने वाले नतीज़े बताएँगे। फ़िलहाल, शुरुआती माहौल बनाने में आम आदमी पार्टी आगे चल रही है, क्योंकि उसके ज़्यादातर उम्मीदवार घोषित हो चुके हैं। उनका प्रचार भी शुरू हो चुका है। जबकि बीजेपी और काँग्रेस इस लिहाज़ से अभी पिछड़े हुए हैं। उधर, दिल्ली का राज्य निर्वाचन आयोग साफ़ कर चुका है कि मतदान ईवीएम में ही होगा। पहली बार ‘नोटा’ बटन भी होगा। हालाँकि, अभी साफ़ नहीं है कि ईवीएम से निकलने वाली पर्ची यानी VVPAT का आगमन इस बार होगा या नहीं। यदि ऐसा नहीं हुआ तो ताज़ा प्रथा के मुताबिक, चुनाव हारने वाली पार्टियाँ एक बार फिर से ईवीएम पर ही हार का ठीकरा क्यों नहीं फोड़ेंगीं!

अन्त में, बीजेपी ने सारे पुराने पार्षदों का टिकट काटने का जो इरादा बनाया है वो एक और मायने में ‘मौके पर चौका लगाने’ जैसा है क्योंकि इस बार दिल्ली के 272 में से 175 वार्डों का परिसीमन और रोटेशन होना है। इस वजह से कुछ आरक्षित सीटें, सामान्य बन जाएँगी तो कुछ सामान्य सीटें, आरक्षित। नतीज़तन, बीजेपी के बमुश्किल 45 पार्षद ही दोबारा चुनाव लड़ने के लायक रह पाएँगे। इसीलिए सबका टिकट काटने की नीति जहाँ ‘कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना’ जैसी है, वहीं इसमें ‘एक तीर से कई निशाना साधने’ का माद्दा भी दिखायी देता है।

ओपिनियन

विपक्षी दलों को साझा उम्मीदवार उतारना चाहिए : सलमान खुर्शीद

राहुल गांधी पार्टी में बदलाव लाएंगे और वह कांग्रेस को नया स्वरूप देंगे।

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Salman Khurshid

वरिष्ठ कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद का कहना है कि विपक्षी दलों को अगले लोकसभा चुनाव में साथ मिलकर सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के खिलाफ प्रत्येक चुनाव क्षेत्र में अपना साझा उम्मीदवार उतारना चाहिए। इसके लिए उनके बीच गठबंधन पर बातचीत पहले शुरू होनी चाहिए, जिससे सभी दलों के कार्यकर्ता आपस में तालमेल बैठा सकें।

सलमान खुर्शीद ने आईएएनएस को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि जाहिर है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी की पसंद हैं, लेकिन किसी प्रकार की घोषणा के लिए विपक्षी दलों के साथ गठबंधन की बातचीत के नतीजों का इंतजार करना होगा।

खुर्शीद का मानना है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले राजग के खिलाफ समान विचार वाले विपक्षी दलों को एक साथ लाने के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की अध्यक्ष सोनिया गांधी सबसे उत्तम व्यक्ति हैं।

खुर्शीद ने कहा, “जहां तक मेरा और हमारी पार्टी की बात है, तो पसंद जाहिर है। लेकिन वृहत सहयोग व गठबंधन की स्थिति में तो यह होना चाहिए कि गठबंधन बनने तक हम प्रतीक्षा करें। लेकिन हमारे लिए बिल्कुल स्पष्ट है कि राहुल गांधी ही वह शख्सियत हैं, जो इस कार्य के लिए उपयुक्त हैं और वह हमारा नेतृत्व करेंगे।”

पूर्व केंद्रीय मंत्री से जब पूछा गया कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ 2019 के आम चुनाव में विपक्ष की ओर से किसी प्रधानमंत्री उम्मीदवार की घोषणा होनी चाहिए, तो उन्होंने कहा कि मोदी की विश्वसनीयता काफी घट गई है।

सलमान खुर्शीद की हाल ही में आई किताब ‘ट्रिपल तलाक : एग्जामिनिंग फेथ’ में उन्होंने तीन तलाक के मसले पर सवाल उठाया है।

उन्होंने कहा, “जहां तक मोदीजी का सवाल है, तो उनकी विश्वसनीयता में काफी कमी आई है, लेकिन मैं यह नहीं कहता कि यह गिरावट अभी पर्याप्त है। गिरावट लगातार जारी है।

राजग के खिलाफ विपक्षी एकता की संभावना के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “इस समय यह कहना कठिन है, लेकिन अगर गठबंधन नहीं बनता है तो मौका गंवाने का हमें खेद रहेगा।” उन्होंने कहा कि भिन्न-भिन्न स्तरों पर बातचीत चल रही है।

खुर्शीद ने कहा, “सभी दल मान रहे हैं कि भारत के इतिहास के लिए यह बेहद अहम व क्रांतिकारी परिवर्तन का दौर है। मेरा मानना है कि बीती बातों को भुला देना चाहिए। लेकिन इसके लिए अभी कदम उठाने होंगे। कुछ लोगों को धीरे-धीरे ऐसी पहल शुरू कर देनी चाहिए। मैं नहीं बता सकता कि वह शख्सियत कौन होंगे और कौन इस काम को अंजाम देंगे। लेकिन धीरे-धीरे बातचीत चल रही है।”

विपक्षी दलों को एकजुट करने में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अहम भूमिका होने की संभावना के बावत पूछे जाने पर खुर्शीद ने कहा कि वही नहीं, कोई और भी यह काम कर सकता है।

उन्होंने कहा कि राहुल गांधी पार्टी में बदलाव लाएंगे और वह कांग्रेस को नया स्वरूप देंगे।

पूर्व विदेश मंत्री ने माना कि पूर्वोत्तर के प्रांत त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है, लेकिन उन्होंने अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों में पार्टी की बेहतर स्थिति रहने की संभावना जताई।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

हिंदू चरमपंथियों को परोक्ष रूप से बढ़ावा दे रही है सरकार : रामानुन्नी

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Ramanunney

साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखक के. पी. रामानुन्नी का कहना है कि भाजपानीत केंद्रीय सरकार अप्रत्यक्ष रूप से हिंदू सांप्रदायिक चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई करने से बच रही है और उन्हें बढ़ावा दे रही है। इस वजह से देश में अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना बढ़ी है।

रामानुन्नी ने आईएएनएस के साथ एक साक्षात्कार में कहा, “(केंद्रीय) सरकार हिंदू सांप्रदायिक चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही है। वह इस मुद्दे से बच रही है। यह अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देने जैसा है।”

उन्होंने कहा, “जब बात अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार की आती है तो वे (सरकार) कानून के तहत सख्त कदम नहीं उठाते हैं। अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं।”

मलयालम भाषा के लेखक रामानुन्नी पिछले सप्ताह सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने अपनी साहित्य अकदामी पुरस्कार की इनामी राशि लेने के कुछ ही मिनटों बाद उसे जुनैद खान की मां को दे दिया था। 16 वर्षीय जुनैद की जून 2017 में एक ट्रेन के अंदर लोगों के एक समूह ने हत्या कर दी थी।

उन्होंने इनाम राशि में से केवल तीन रुपये अपने पास रखे और बाकी के एक लाख रुपये जुनैद की मां सायरा बेगम को दे दिए थे।

रामानुन्नी ने आईएएनएस से कहा, “सांप्रदायिक घृणा कैंसर की तरह है और जब यह हो जाता है तो इसे रोक पाना बहुत मुश्किल होता है।”

यह पूछने पर कि क्या आपको लगता है कि सांप्रदायिक घटनाएं वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद बढ़ गई हैं, उन्होंने कहा, ‘हां।’

उन्होंने कहा, “वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद कई सांप्रदायिक मुद्दे उठे हैं। जब मैं सांप्रदायिक कहता हूं तो मेरा दोनों पक्षों से मतलब नहीं होता, यह अधिकतर हिंदू समुदाय के लिए है जो मुस्लिमों के साथ असहिष्णुता बरत रहे हैं।”

उन्होंने कहा कि सरकार इन सांप्रदायिक झगड़ों को समाप्त करने का प्रयास नहीं कर रही और एक दर्शक की तरह बर्ताव कर रही है। उन्होंने कहा कि वर्तमान हालात राष्ट्र के हित के लिए खराब हैं।

रामानुन्नी के साहित्यिक काम सांप्रदायिक सद्धभाव के उनके संदेश के लिए जानें जाते हैं। उनकी किताब ‘दैवाथिंते पुस्तकम’ (ईश्वर की अपनी पुस्तक) के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार 2017 मिला है।

जब उनसे यह पूछा गया कि उन्होंने अपनी इनाम की राशि जुनैद की मां को क्यों दी, तो उन्होंने कहा, “यह दान नहीं है। अगर ऐसा होता तो मैं जुनैद की मां को उनके घर जाकर यह देता। जब आप यह साहित्य अकादमी के मंच पर दे रहे हैं तो इसके कई मायने हैं। यह अन्य लेखकों को अत्याचारों के बारे में लिखने के लिए प्रोत्साहित करेगा और दूसरे हिंदुओं को बताएगा कि असली और सच्चे हिंदू सिद्धांतों के मुताबिक आपको सांप्रदायिक नहीं होना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि जुनैद की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि वह मुस्लिम था और यह सच्ची और असली हिंदू संस्कृति के लिए शर्मनाक है।

रामानुन्नी को जुलाई 2017 में उनका दाहिना हाथ काटने की धमकी मिली थी। उन्होंने कहा कि इस तरह की बातें लेखक के दिमाग को जकड़ देती हैं।

उन्होंने कहा, “बहुत से लोगों ने मुझसे पूछा कि क्या मैं सांप्रदायिक एकता पर लिखना बंद कर दूंगा। मैंने उनसे कहा कि नहीं। यह आत्महत्या करने जैसा होगा। एक लेखक के लिए अपना पक्ष नहीं जाहिर करना आत्महत्या के समान है।”

लेखक ने कहा, “हालांकि यह भी सही है कि आप यह सब कहते तो हैं, लेकिन जब आपको धमकियां मिलती हैं तो कई लोगों का अवचेतन मन उन्हें सब कुछ कहने से रोकता है। यह एक तरह से किसी को परोक्ष रूप से नियंत्रित करना है। धमकियां लोगों में यह डर पैदा करती हैं। यह तथ्य है।”

इंटरनेट के आज के दौर में किताबों के बारे में पूछने पर रामानुन्नी ने कहा कि पढ़ने की गुणवत्ता पिछले कुछ सालों में कम हुई है। उन्होंने कहा कि पढ़ने में लोग अब उस तरह का आनंद नहीं लेते जैसे पहले लिया जाता था। पढ़ने की आदत मरी तो नहीं है लेकिन इसकी गुणवत्ता घटी है।

–आईएएनएस

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श्रीलंका में चीन की उपस्थिति भारत के लिए चिंताजनक!

श्रीलंकाई लोगों के मुंह से अक्सर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वे चीनी उपस्थिति से कितने असंतुष्ट और नाखुश हैं, जो काफी कठोर और अभिमानी हैं।

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70th Independence Day celebrations in Colombo,

मेरी पत्नी और मैं हाल ही में अपने कुछ मित्रों के साथ छुट्टियों के लिए श्रीलंका गए थे। हम दोनों के लिए लगभग 15 वर्षों बाद यह पहली श्रीलंका यात्रा थी, जबकि उससे पहले यह सुंदर द्वीपीय देश हिंसक गृहयुद्ध में जकड़ा था, जिसने अनगिनत जानें लीं और देश की अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया था।

यह वह दौर था जब महिंदा राजपक्षे ने श्रीलंका के राष्ट्रपति के रूप में सत्ता संभाली और तमिल टाइगर्स के सफाए को अपना सबसे प्रमुख उद्देश्य बनाया। 30 महीनों की असहनीय हिंसा के बाद लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम(लिट्टे) के नेता वेलु पिल्लई प्रभाकरन और उसके समर्थकों की मौत के साथ ही 2009 में 26 सालों का गृहयुद्ध समाप्त हो गया।

यह तर्क दिया जाता है कि उस समय बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ था और तमिलों के साथ खुले तौर पर भेदभाव किया गया था। यह सच है। लेकिन सच यह भी है कि यह द्वीपीय देश अंत में अशांति, अनिश्चितता और आतंकवाद के दशकों के बाद पहली बार शांति की ओर लौट आया। जिस श्रीलंका का मैं पहले आदी हो गया था, वह अब उससे बिलकुल विपरीत है। उस समय बंदूक लिए सुरक्षा कर्मी हर तरफ घूमते रहते थे। अब यहां शांति है।

भारत के लिए भी गृहयुद्ध और लिट्टे का अंत अच्छी खबर थी। इससे पहले ही लिट्टे को एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया गया था, लेकिन तमिलनाडु में प्रभाकरन के साथ कुछ संगठनों का गठबंधन नई दिल्ली के लिए चुनौती बन गया था। दुर्भाग्य से गृहयुद्ध के अंत के साथ इतिहास ने खुद को एक बार फिर दोहराया और भारत ने अपनी स्थिति खराब कर ली और आज हम एक बार फिर चीन की कूटनीति के बीच श्रीलंका को खोने के कगार पर हैं।

श्रीलंका में चीनी उपस्थिति कोई छिपी हुई बात नहीं है। आप उन्हें हर जगह पाएंगे। चीनी ड्रेजिंग (समुद्री पानी को साफ करने वाले) जहाजों को खुले तौर पर काम करते हुए देखा जा सकता है। हंबनटोटा बंदरगाह पर काम शुरू हो गया है। शॉपिंग मॉल से लेकर पब तक हर जगह चीनी श्रमिक नजर आएंगे। कई चीनी श्रीलंका की भाषा सिंहली बोलना सीख रहे हैं। होटल, सड़कों, बुनियादी ढांचों, थिएटरों और सुख-सुविधाओं से लैस क्रिकेट स्टेडियम केवल कागजों पर लिखी परियोजना भर नहीं हैं, बल्कि लोग उन्हें देख सकते हैं। आंखों देखी चीजों के महत्व को कभी भी कम करके आंका नहीं जाना चाहिए और जिस गति से चीन यहां परियोजनाओं को अंजाम दे रहा है, वह इस बात की बानगी है कि श्रीलंका में रियल एस्टेट परिवर्तन तेजी से हो रहा है।

2005-17 के बीच 12 वर्षों की अवधि में बीजिंग ने श्रीलंका की परियोजनाओं में 15 अरब डॉलर का निवेश किया है। वहीं, चीन के एक राजदूत भारत को एक स्पष्ट संदेश दे चुके हैं, जो श्रीलंका में चीनी उपस्थिति को अपने प्रभाव क्षेत्र में घुसपैठ के रूप में देखता है। राजदूत ने भारत को स्पष्ट जवाब देते हुए कहा था, “कोई नकारात्मक ताकत श्रीलंका और चीन के बीच सहयोग को कमजोर नहीं कर सकती है।”

भारत के लिए यह परेशान करने वाला है। भारतीय विदेश नीति समय की कसौटी पर खरा उतरे संबंधों पर काफी भरोसा करती है, लेकिन श्रीलंकाई लोगों में उम्मीदों की अधीरता रही है, जिन पर भारत ध्यान देने और प्रतिक्रिया करने में विफल रहा और चीन सफल रहा है।

श्रीलंकाई लोगों के मुंह से अक्सर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वे चीनी उपस्थिति से कितने असंतुष्ट और नाखुश हैं, जो काफी कठोर और अभिमानी हैं। इसे एक खतरे को गले लगाने के रूप में समझा जा सकता है, लेकिन जब उनके मन-मस्तिष्क में एक समृद्ध भविष्य की इच्छा उभरती है तो वे इस मौके को काफी आकर्षक पाते हैं।

वहीं, दूसरी ओर भारत सभी ओर से अलग-थलग पड़ता जा रहा है। पाकिस्तान से दुश्मनी है। मालदीव अस्थिर है। नेपाल की स्थिति लगभग असमजंस से भरी है और श्रीलंका एक स्पष्ट लुभावने मायाजाल में फंसा है। भारत वास्तव में इस समय अब तक की सबसे गंभीर सुरक्षा चुनौती का सामना कर रहा है।

अगर भारत को एक साथ मिलकर काम करना है तो इसके लिए केवल कल्पना की नहीं, बल्कि गति और दक्षता की जरूरत है, ताकि श्रीलंका के भविष्य को लेकर किए गए वादे पूरे हो सकें।

दिग्गज शतंरज खिलाड़ी बॉबी फिशर ने एक बार कहा था, “अगर आप खेल खेल रहे हैं तो आप जीतने के लिए खेलें, लेकिन अगर आप खेल हार गए तो वह इसलिए क्योंकि आपने अपनी आंखों को प्यादों से हटा लिया था, इसलिए आप हारने के ही लायक थे।”

By : अमित दासगुप्ता

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