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क्या शिवसेना कुर्सी के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद छोड़ देगी?

शिवसेना को अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपने दो परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों एनसीपी और कांग्रेस का समर्थन लेना पड़ेगा। ऐसे में यहां अब सवाल यह उठता है कि हिंदू हृदय सम्राट बाल ठाकरे की शिवसेना उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे की अनुवाई में सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़ देगी और सेकुलर शब्द को ‘छद्म’ कहने वाली शिवसेना सेकुलर रास्ता अख्तियार करेगी?

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मुंबई, 10 नवंबर | महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और शिवसेना के बीच 1980 के दशक के अंत से शुरू हुए रोमांस का शिवसेना की हठधर्मिता के चलते करीब-करीब अंत हो गया है। भाजपा ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को रविवार शाम बता दिया कि महागठबंधन के प्रमुख सहयोगी शिवसेना के गठबंधन धर्म निभाने से इनकार करने के कारण वह राज्य में सरकार बनाने की स्थिति में फिलहाल नहीं है। इसके साथ ही भाजपा नेताओं ने शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के संभावित गठबंधन को शुभकामनाएं दी।

भाजपा के सरकार बनाने से असमर्थता जताने के तुरंत बाद शिवसेना प्रवक्ता संजय राऊत ने कहा कि अगर उद्धव ठाकरे बोले हैं कि महाराष्ट्र का अगला मुख्यमंत्री शिवसेना का होगा तो मुख्यमंत्री शिवसेना का ही होगा। यानी भाजपा के सरकार बनाने से इनकार करने के बाद शिवसेना के लिए अपना मुख्यमंत्री बनाने का स्वर्णिम मौका है। लेकिन उसके पास केवल 56 विधायक हैं। यानी सरकार बनाने के लिए जरूरी 88 विधायक एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन के होंगे।

इसका मतलब शिवसेना को अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपने दो परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों एनसीपी और कांग्रेस का समर्थन लेना पड़ेगा। ऐसे में यहां अब सवाल यह उठता है कि हिंदू हृदय सम्राट बाल ठाकरे की शिवसेना उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे की अनुवाई में सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़ देगी और सेकुलर शब्द को ‘छद्म’ कहने वाली शिवसेना सेकुलर रास्ता अख्तियार करेगी? अगर शिवसेना सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़कर ‘सेकुलर शिवसेना’ में ट्रांसफॉर्म होगी तो यह महाराष्ट्र की राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव होगा।

राम जन्मभूमि आंदोलन शुरू होने के बाद शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने कट्टर हिदुत्व का रास्ता अपना लिया था। बाल ठाकरे तो यहां तक दावा करते रहे कि अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को शिवसेना कार्यकर्ताओं ने ही ढहाया। इसके बाद से ही शिवसेना देश में हिंदुत्व का प्रतिनिधि दल रहा है। हिंदुत्व के मुद्दे पर शिवसेना कई मामलों में भारतीय जनता पार्टी से भी ज्यादा आक्रामक रही है। इसीलिए हिंदू उनके नाम के आगे ‘हिंदू हृदय सम्राट’ का अलंकरण लगाने लगे।

ठाकरे के बाद शिवसेना की कमान संभालने वाले उद्धव भी कट्टर हिंदुत्व के रास्ते पर ही चलते रहे हैं। वह भाजपा पर राम मंदिर निर्माण की राह में आई बाधाओं को जानबूझकर दूर न करने का भी आरोप लगाते रहे हैं। इतना ही नहीं उद्धव ने अपने बेटे के साथ अयोध्या में राम मंदिर निर्माण पर जोर देने के लिए पिछले वर्ष अयोध्या का दौरा किया था। उनके उस दौरे को खूब हाइप भी मिला, क्योंकि ठाकरे परिवार का कोई सदस्य पहली बार महाराष्ट्र के बाहर निकला था।

यह संयोग ही है कि जब अयोध्या विवाद का सैद्धांतिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने हल कर दिया और रामलला के विवादित स्थल को हिंदुओं को राम मंदिर बनाने के लिए सौंप दिया, ठीक उसी समय शिवसेना उस मुकाम पर पहुंच गई जब उसे कट्टर हिंदुत्व या महाराष्ट्र में अपना मुख्यमंत्री दोनों में से एक का चयन करना है। एनसीपी-कांग्रेस के साथ सरकार बनाने पर निश्चित तौर पर शिवसेना को कट्टर हिंदुत्व का मार्ग छोड़ना पड़ेगा। शिवसेना को अब अपने उस नारे को भी छोड़ना पड़ेगा, जिसमें वह अयोध्या के बाद काशी और मथुरा की बात करती रही है।

अगर 2014 के महाराष्ट्र चुनाव प्रचार के दौरान उद्धव ठाकरे के भाषण को फिर से सुनें तो यह साफ हो जाएगा कि उनके मन में भाजपा और भाजपा नेताओं के खिलाफ बहुत अधिक विष भरा है, जिसे वह जब भी मौका मिलेगा, उगल देंगे। इसीलिए जब इस बार विधानसभा चुनाव में भाजपा पिछली बार की 23 की तुलना में 40 सीट पिछड़ गई तो उद्धव को 2014 के चुनाव और उसके बाद छोटे भाई का दर्जा स्वीकार करने के अपमान का बदला लेने का मौका मिल गया।

शिवसेना दरअसल, 2014 के बाद से ही मौका तलाश रही थी। चूंकि भाजपा बहुत मजबूत स्थिति में पहुंच गई थी, लिहाजा, वह वेट एंड वॉच के मोड में रही। मौके की तलाश में ही 2014 में छोटे भाई ‘भाजपा’ को 127 सीट से अधिक देने को तैयार न होने वाली शिवसेना 2019 में 144 के बजाय 124 सीट पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गई।

शिवसेना जानती थी कि भाजपा के साथ गठबंधन बनाकर लड़ने पर ही वह विधानसभा में सम्मानजनक सीटें हासिल कर सकती है। उसके सामने 2014 का उदाहरण था, जब चुनाव में पूरी ताकत लगाने के बावजूद शिवसेना 63 सीटों से आगे नहीं बढ़ पाई, जबकि भाजपा उसके लगभग दोगुना यानी 122 सीटें जीतने में सफल रही। शायद इसीलिए फिफ्टी-फिफ्टी फॉर्मूले की बात करने वाले उद्धव और संजय राऊत 124 सीटें मिलने पर चुप रहे।

दरअसल, शिवसेना नेता जानते थे कि कांग्रेस-एनसीपी का गठबंधन हो गया है, लिहाजा, उसके लिए भाजपा के साथ लड़ना लाभदायक होगा। अन्यथा वह बहुत ज्यादा घाटे में जा सकती है। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान, जब नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे नेता बोल रहे थे कि इस बार चुनाव देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में लड़ा जा रहा है और वही अगले पांच साल मुख्यमंत्री रहेंगे, तब भी पिता-पुत्र ने खामोश रहने में अपना हित समझा।

24 अक्टूबर का दिन उद्धव ठाकरे और संजय राऊत के लिए बदला लेने का दिन था। चुनाव परिणाम में भाजपा की 18 सीटें कम होने से दोनों नेता अचानक से फिफ्टी-फिफ्टी फॉर्मूले का राग आलापने लगे और ढाई-ढाई साल का मुख्यमंत्री और सरकार में बराबर मंत्रालय की मांग करने लगे। वह जानते थे कि भाजपा पिछली बार की तरह मजबूत पोजिशन में नहीं है, वह शिवसेना के समर्थन के बिना सरकार नहीं बना सकती। अचानक से शिवसेना की बारगेनिंग पावर बहुत बढ़ गई।

महाराष्ट्र में भगवा गठबंधन में ‘बड़ा भाई’ बनने की हसरत पाले उद्धव ठाकरे की नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थी। इसीलिए मुंबई की वरली सीट से आदित्य ठाकरे चुनाव मैदान में उतरे और विधायक चुने गए। उद्धव ठाकरे बार-बार हवाला दे रहे हैं कि उन्होंने अपने पिता और शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे को वचन दिया है कि महाराष्ट्र में एक न एक दिन शिवसैनिक को मुख्यमंत्री बनाकर ही रहेंगे।

दरअसल, 1988-89 में जब प्रमोद महाजन और बाल ठाकरे ने भाजपा और शिवसेना के बीच गठबंधन का फैसला किया, तब भाजपा का राज्य में कोई खास जनाधार नहीं था। उस समय शिवसेना बड़े भाई और भाजपा छोटे भाई के किरदार में थी। 1995 में जब भगवा गठबंधन की सरकार बनी तब शिवसेना के मनोहर जोशी मुख्यमंत्री और भाजपा के गोपीनाथ मुंडे उपमुख्यमंत्री बने थे। यह सिलसिला 2014 के लोकसभा चुनाव तक जारी रहा, लेकिन 2014 के विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा बड़े भाई के किरदार में आ गई। इस अदला-बदली को उद्धव मन से कभी स्वीकार नहीं कर सके। अब भाजपा से बदला लेने का मौका मिला तो अवसर क्यों चूकते।

यानी पहले मराठी मानुस, फिर कट्टर हिंदुत्व की राह पर चलने वाली शिवसेना अब एनसीपी और कांग्रेस के साथ धर्मनिरपेक्ष हो जाएगी!

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सिंघु बॉर्डर : किसान आंदोलन का प्रभावशाली केंद्र

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Farmers Protest

नई दिल्ली, 13 दिसम्बर : दिल्ली-चंडीगढ़ मार्ग पर पहला प्रमुख किसान आंदोलन स्थल सिंघु सीमा, पिछले 17 दिनों के दौरान राष्ट्रीय राजधानी में किसानों के धरने के लिए भविष्य की रणनीति बनाने के साथ किसानों के प्रदर्शन के लिए एक प्रभावशाली केंद्र बन गया है। यह तीन महीने पहले संसद द्वारा तीन कृषि कानूनों को लागू करने के बाद उनके मुद्दों को हल करने में सरकार के साथ चर्चा करने के लिए प्रतिनिधियों का चयन करने और धरने को लेकर रणनीति बनाने का अड्डा बन गया है।

शांतिपूर्ण विरोध जिसमें पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के हजारों किसान शामिल हैं, विभिन्न राज्यों और कस्बों के 40 से अधिक किसान यूनियनों से जुड़े किसानों के प्रतिनिधियों द्वारा केंद्रीय रूप से निगरानी की जा रही है, जो 26 नवंबर से सिंघु बॉर्डर पर डेरा डाले हुए हैं।

मध्य दिल्ली से 50 किलोमीटर दूर, सिंघु, जहां बहुसंख्यक जाट और गुर्जर समुदाय निवास करते हैं, उस समय सुर्खियों में आया जब अपने दिल्ली चलो मार्च के तहत झंडे लेकर जा रहे हजारों किसान नारे लगाते हुए यहां और दिल्ली-हरियाणा में टीकरी सीमा पर 17 दिन पहले एकत्रित हो गए। इन किसानों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए पुलिस ने बैरिकेड लगाए, आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज भी किया।

क्रान्तिकारी किसान यूनियन के अध्यक्ष दर्शनपाल ने आईएएनएस को बताया कि सिंघु सीमा से जारी संदेश का अनुपालन दिल्ली के विभिन्न सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों द्वारा किया जा रहा है, जो उन्हें अब तक के पूरे आंदोलन को शांतिपूर्ण बनाए रखने में मदद करते हैं।

हालांकि, नेता ने इस दावे को नकार दिया कि विरोध में वामपंथी लोग हावी हैं। लोगों ने जोर देकर कहा कि सिंघु से मीडिया के माध्यम से एक केंद्रीय संदेश प्रसारित किया जाता है और विभिन्न राज्यों के हमारे किसानों द्वारा इसका पालन किया जा रहा है जो सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ यहां एकत्र हुए हैं।

भारतीय किसान यूनियन के नेता गुरनाम सिंह चढूनी ने आईएएनएस को बताया, कई लोगों ने अपना कार्यक्रम लिया, लेकिन हम उन्हें ऐसा नहीं करने की अपील कर रहे हैं क्योंकि यह आंदोलन को दिशाहीन बनाता है। यह समस्याओं को बढ़ाता है। सिंघु बॉर्डर से जो भी संदेश दिए जाते हैं, उनका सभी को पालन करना चाहिए।

आंदोलन का मैदान, जहां अधिकांश किसान पंजाबी हैं, अब उन सभी लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र है, जो इनके समर्थन में खड़े हैं। देश भर के गायक, पहलवान और राजनेता किसानों के समर्थन में आए हैं, बॉर्डर पहुंचकर किसानों से मिले हैं।

पिछले कुछ दिनों में मिनी-पंजाब में तब्दील हो चुके सिंघु ने अब तक किसानों-सरकार की वार्ता के तीसरे, चौथे और 5 वें दौर का आयोजन किया है, जो दुर्भाग्य से, तीन कृषि कानूनों को लेकर दोनों पक्षों के अड़ियल रुख के कारण बेनतीजा रहे।

केंद्रीय नेतृत्व ने सिंघु से अपने फैसले सर्कुलेट किए और किसानों की पंचायत बैठक का आयोजन भी उस जगह पर किया गया, जहां किसानों के विभिन्न समूह अपने ट्रक और ट्रैक्टरों के साथ, तीन कृषि कानूनों को रद्द करने की अपनी मांग को स्वीकार करने के सरकार के फैसले का इंतजार कर रहे हैं, जिसे वे काला कानून, किसान विरोधी कानून कहते हैं।

सिंघू सीमा विरोध स्थल से ही 8 दिसंबर को भारत बंद का आह्वान किया था, जिसका कई विपक्षी दलों ने समर्थन किया था।

–आईएएनएस

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बढ़ती बेरोज़गारी, गर्त में जाती अर्थव्यवस्था के बीच सरकारों का निजीकरण पर जोर

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केन्द्र सरकार इस बात को लेकर बहुत सन्तुष्ट नज़र आती है कि ताज़ा कृषि क़ानूनों का अभी मुख्य रूप से सिर्फ़ दो राज्यों- पंजाब और हरियाणा में ही भारी विरोध हो रहा है। बाक़ी देश के किसान ख़ुश और गदगद हैं कि ‘मोदी जी ने एक और चमत्कार कर दिखाया है।’

बेशक़, सबको अपनी धारणाएँ बनाने की आज़ादी है। लेकिन कृषि क़ानूनों को लेकर जिस ढंग से सियासत गरमायी उससे साफ़ दिख रहा है कि अब पंजाब और हरियाणा के ‘बड़ी जोत वाले किसानों’ पर देशद्रोहियों का ठप्पा लग गया है। वो देश भर के किसानों के हितों के ख़िलाफ़ जाकर विपक्षियों की कठपुतली बन गये हैं क्योंकि उन्हें बरगलाया और ग़ुमराह किया गया।

तो क्या हम ये मान लें कि पंजाब और हरियाणा के किसान बुद्धू हैं, मूर्ख हैं, नासमझ हैं, दिग्भ्रमित हैं? या फिर हम ये समझें कि वे बेहद समझदार और दूरदर्शी हैं। उन्होंने नोटबन्दी, कैशलेस लेन-देन, जियो क्रान्ति, स्टार्ट अप इंडिया, मेक इन इंडिया, इंक्रेडिबल इंडिया, आरोग्य सेतु, ताली-थाली, दीया-पटाखा, पुष्प वर्षा, कोरोना पैकेज़ और आत्मनिर्भर भारत के चमत्कारी जुमलों के अंज़ाम को क़रीब से देखा है।

निजीकरण की आशंका से डर

क्या उन्हें दिख रहा है कि सरकार अब किसानों और खेती-किसानी को भी अपने चहेतों के हाथों बेचने पर आमादा है? कहीं इन अल्पसंख्यक किसानों को ऐसा तो नहीं लग रहा कि मोदी युग में जिस मुस्तैदी से सरकारी सम्पदा को बेचने-ख़रीदने और औने-पौने दाम पर निजीकरण की जो बयार बह रही है, उसमें उनका भी बह जाना तय है?

बोलिविया का सटीक उदाहरण

कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी ने पंजाब और हरियाणा जैसे छोटे राज्यों के मुट्ठी भर किसानों को लैटिन अमेरिकी देश बोलिविया का 20 साल पुराना किस्सा सुना दिया। वैसे ये किस्सा एनसीईआरटी की कक्षा-9 के पाठ्यक्रम में भी है। हुआ यूँ था कि दशकों के फ़ौजी शासन के बाद 1982 में बोलिविया में राजनीतिक सत्ता बहाल हुई। फिर अर्थव्यवस्था इतनी चरमराई कि अगले 15 साल में महँगाई 25 हज़ार गुना तक बढ़ गयी। तब रेलवे, संचार, पेट्रोलियम, उड्डयन जैसे बुनियादी क्षेत्रों का निजीकरण शुरू हुआ। 1999 में देश के चौथे बड़े शहर कोचाबांबा की जलापूर्ति व्यवस्था के निजीकरण का फ़ैसला लिया गया।

निजी कम्पनी को जलापूर्ति सुधारने के लिए एक बाँध बनाना था। इसके लिए धन जुटाने के नाम पर पानी का दाम चार गुना बढ़ा दिया गया। इससे ऐसा हाहाकार मचा कि पाँच हज़ार रुपये महीना औसत कमाई वाले परिवारों को एक हज़ार रुपये का पानी का बिल मिलने लगा। ख़र्च घटाने के लिए जब लोग नदी और नहरों से पानी लाने लगे तो वहाँ पहरा बिठा दिया गया।

सरकार को पीछे हटना पड़ा

कुछ लोगों ने बारिश का पानी जमा करके काम चलाना चाहा तो आदेश आया कि बारिश का पानी इकठ्ठा करने पर चोरी का केस दर्ज़ होगा, क्योंकि वो पानी भी निजी कम्पनी का है। इससे ऐसा जनाक्रोश फूटा कि पुलिस और सेना को भी सड़कों पर उतारने के बावजूद बात नहीं बनी। आख़िरकार, छह महीने के उग्र विद्रोह के बाद सरकार को फ़ैसला वापस लेना पड़ा।

निजीकरण से पहले कोचाबांबा शहर की 80 प्रतिशत आबादी को स्थानीय संस्था से बिजली और अन्य ख़र्च को जोड़कर पर्याप्त पानी मिल जाता था। लेकिन निजीकरण की ख़ातिर इस संस्था को भ्रष्ट और लुटेरा करार दिया गया।

दरअसल, बोलिविया की तरह भारत में भी पूँजीवाद और बाज़ारवाद ने दशकों की मेहनत से ये ‘नैरेटिव’ यानी धारणा बनायी है कि सरकारी तंत्र, सरकारी कम्पनियाँ और सरकारी ताना-बाना निहायत घटिया और भ्रष्ट है। इसे निजीकरण के बग़ैर नहीं सुधारा जा सकता।

भारत में इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि देश के ज़्यादातर नेता और अफ़सर देखते-देखते सम्पन्न लोगों की ऐसी जमात का हिस्सा बन चुके हैं जो पब्लिक या जनता और ख़ासकर ग़रीबों, मज़दूरों और सर्वहारा वर्ग को चोर और भिखमंगा समझते हैं। इन्हें इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि सामाजिक व्यवस्थाएँ निजी हाथों में हैं या सरकारों के।

इससे भी रोचक तथ्य ये है कि ऐसे लोगों को ये मुग़ालता होता है कि वो शिक्षित, देशभक्त और क्रान्तिकारी हैं, जबकि वास्तव में इन्हीं पर समाज के सबसे भ्रष्ट तबके में शामिल होने का आरोप होता है। तमाम सरकारी लूट की बन्दरबाट भी यही समुदाय करता है। ये तबका अपने घरों के ड्रॉइंग रूम में अपने ही जैसे लोगों के बीच परिचर्चाएँ करता है और निजी शिक्षण संस्थाओं, अस्पतालों, म्यूनिस्पैलिटी, पुलिस, कोर्ट, चुनाव प्रक्रिया और आरक्षण को कोसते हुए उस निजीकरण की पैरोकारी करता है जिससे देश लगातार और तबाह हो रहा है।

अर्थशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो निजी क्षेत्र के विस्तार में कोई बुराई नहीं है। देश में ऑटोमोबाइल सेक्टर की तरक्की निजी क्षेत्र या बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की बदौलत ही हुई है। लेकिन ऐसा अन्य सेक्टरों में नहीं हुआ। दरअसल, मोटे तौर पर दो तरह की व्यवस्थाएँ होती हैं- सरकारी या सहकारी और प्राइवेट। आदर्श स्थिति में दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। लेकिन यदि एक की कामयाबी के लिए दूसरे का मरना ज़रूरी होगा, तो निजीकरण दैत्य और राक्षस बन जाएगा।

बड़ी पूँजी, छोटी पूँजी को खा जाएगी क्योंकि प्राइवेट की बुनियाद ही मुनाफ़ाख़ोरी है, जबकि सरकारी तंत्र को सियासत के प्रति संवेदनशील रहते हुए व्यावयासिक हितों को साधना पड़ता है। यही इसकी ख़ामी भी है और ख़ूबी भी।

प्राइवेट सेक्टर को बढ़ाने की कोशिश

भारत में सरकारी शिक्षा, स्वास्थ्य, दूरसंचार और उड्डयन क्षेत्र के डूबने का भरपूर उदाहरण हमारे सामने है। सरकारी क्षेत्र में कमियाँ होती हैं, लेकिन प्राइवेट के आने से पहले और बाद में इन्हें और बढ़ाया जाता है। क्योंकि सरकारी व्यवस्था ठीक रहेगी तो प्राइवेट में कौन जाएगा? मुनाफ़ाख़ोरी कैसे होगी? इसीलिए सरकारी तंत्र की जड़ों में मट्ठा डाला जाता है। सरकारी कम्पनियों को बीमार बनाया जाता है। ताकि प्राइवेट पूँजी लहलहा सके।

शुरुआती पीढ़ी वाले काँग्रेसियों ने सैकड़ों सरकारी कम्पनियाँ स्थापित कीं। कई तरह के राष्ट्रीयकरण किये। लेकिन इनकी ही अगली पीढ़ियों ने तमाम किस्म की लूट-खसोट करके सरकारी तंत्र को खोखला करने की प्रथा भी स्थापित की।

अरुण शौरी पर मुक़दमा

बीजेपी में काँग्रेस वाली अच्छाईयाँ भले ही न हों, लेकिन काँग्रेस वाली ख़ामियों के लिहाज़ से वह उससे हज़ार दर्ज़ा आगे निकल चुकी है। सरकारी कम्पनियों को बेचने या निजीकरण के मोर्चों पर तो ये ख़ूब हुआ। इनका नया रचने में कोई ख़ास यक़ीन नहीं है। लेकिन बेचने में इनके जैसी तेज़ी और किसी में नहीं।

वाजपेयी ने विनिवेश मंत्रालय बनाकर अरुण शौरी को सरकारी सम्पदा बेचने का ज़िम्मा सौंपा। इन्होंने भी अरबों का माल करोड़ों में बेचने का काम बहुत बहादुरी से किया। अब मुक़दमे की गाज़ गिरी है। शायद, इसलिए क्योंकि अब वो मोदी राज के आलोचक हैं। फिर भी कहना मुश्किल है कि इसका अंज़ाम क्या निकलेगा?

टेलीकॉम सेक्टर में रिलायंस का आना

धीरुभाई ने जब टेलीकॉम सेक्टर का रुख़ किया तो वाजपेयी ने वीएसएनएल, एमटीएनएल और बीएसएनएल जैसी तीन सरकारी कम्पनियों के हितों की अनदेखी करके रिलायंस कम्युनिकेशन को लॉन्च किया। समारोह में तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री प्रमोद महाजन ने मंच संचालन किया। आज सभी देख रहे हैं कि जियो लहलहा रहा है और सरकारी कम्पनियाँ बिकने को तैयार हैं।

उड्डयन सेक्टर में भी निजी कम्पनियों को मुनाफ़ा कमाने वाले रूट थमाये गये। ताकि वो निहाल हो सकें और सरकारी कम्पनी डूबती रहे। रेलवे भी इसी राह पर चल पड़ा है। कई साल से इसका घाटा लगातार बढ़ाया जा रहा है। ताकि ये दलील तैयार हो सके कि रेलवे को बेचने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

निजी ट्रेनों को चलाने की तैयारी

रेलवे की ज़मीन बेची जा रही है ताकि चहेतों को और मालामाल बनाया जा सके। बुलेट ट्रेन तो चलने से रही, लिहाज़ा निजी ट्रेनों को ही चलाने की तैयारी हो रही है। जनता के पैसों से बनी पटरियों पर निजी ट्रेनें दौड़ेंगी। ठेके पर कर्मचारी तैनात होंगे। जनता दुबली होती जाएगी और नेता और अफ़सर मोटे होते जाएँगे।

ट्रेड यूनियनों का सौदा हो चुका है। नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कान्त पर आरोप है कि वे लगातार अपने आका के लिए नये झाँसे तैयार करते रहते हैं। इन्हीं का शिग़ूफ़ा है कि निजीकरण से रेलवे में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। किराया कम होगा और जनता को लाभ होगा। भले ही सभी दिहाड़ी मज़दूर बन जाएँ।

अभी युवा बेरोज़गारी से तड़प रहा है। मज़दूर भूख से सिसक रहा है। किसान गिड़गिड़ा रहा है कि बस, इतनी घोषणा कर दीजिए कि मंडी से बाहर भी कोई सौदा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे नहीं होगा। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही।

इन्हीं अमिताभ कान्त ने दिसम्बर, 2015 में प्रकाशित नीति आयोग के एक दस्तावेज़ में किसानों की आमदनी को दोगुना करने वाला जुमला पकाया था। इसमें कहा गया था कि ‘एमएसपी से किसानों का भला नहीं हो सकता क्योंकि सरकार सारी उपज नहीं ख़रीद सकती और ना ही उसे ख़रीदनी चाहिए।’

2016 में नोटबन्दी के बाद अमिताभ कान्त ने कहा था कि दो-तीन साल में अर्थव्यवस्था कैशलेस हो जाएगी। हम देख चुके हैं कि कोरोना की दस्तक से पहले लगातार 16 तिमाहियों तक भारतीय अर्थव्यवस्था गर्त में जाती रही। कोरोना के आंकड़े रोज़ाना आरोग्य सेतु की पोल खोल रहे हैं। यही हाल पीएम केयर्स का है। 5 ट्रिलियन डॉलर भी इनके ही दिमाग़ की ख़ुराफ़ात थी तो ‘स्टार्ट अप इंडिया’ के भी बुनियादी चिन्तक और विचारक यही हैं। 2014 में शुरू हुआ ‘मेक इन इंडिया’ भी इन्हीं के दिमाग़ का कीड़ा था।

स्टार्ट अप योजना फेल?

2019 में एक सर्वे में 33 हज़ार स्टार्ट अप वालों से पूछा गया कि आख़िर यह योजना फेल क्यों हुई? जवाब में 80 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें स्टार्ट अप इंडिया से कोई फ़ायदा नहीं मिला। 50 प्रतिशत ने बताया कि अधिकारी ही उन्हें लूट लेते हैं। वर्ष 2016-19 के दौरान सिर्फ़ 88 स्टार्टअप ही टैक्स लाभ लेने के लायक बन सके।

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की बदहाली और बेरोज़गारों की बढ़ती तादाद सरकार के सारे दावों की पोल खोल देते हैं। कोई नहीं जानता कि देश की पहली स्मार्ट सिटी कहाँ है?

‘इंक्रेडिबल इंडिया’ का क्या हुआ?

‘इंक्रेडिबल इंडिया’ तो ऐसी मनहूस योजना साबित हुई कि इसके विज्ञापनों पर जितना ख़र्च बढ़ता गया, उतनी ही विदेशी सैलानियों की संख्या घटती गयी। कुल मिलाकर, मोदी युग की सबसे बड़ी पहचान यही हो गयी है कि यहाँ ‘मन की बात’ की तो भरमार है लेकिन ‘काम की बात’ को ढूँढना मुहाल है। इसीलिए, बोलिविया के अनुभवों से सीखना ज़रूरी है। देश बेचने वालों से निपटना ज़रूरी है।

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‘टाइम’ में अमरत्व वाली मनमाफ़िक छवि अर्जित करने से श्रेष्ठ और कुछ नहीं!

मोदी युग की सबसे बड़ी पहचान यही हो गयी है कि यहाँ ‘मन की बात’ की तो भरमार है लेकिन ‘काम की बात’ को ढूँढ़ना मुहाल है। इसीलिए ‘टाइम’ और बोलिविया के अनुभवों से सीखना ज़रूरी है। देश बेचने वालों से निपटना ज़रूरी है।

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Narendra Damodar Das Modi

भगवा कुलभूषण अब बहुत ख़ुश हैं, पुलकित हैं, आह्लादित हैं, भाव-विभोर हैं क्योंकि टाइम मैगज़ीन ने चौथी बार उन्हें विश्व के सौ प्रभावशाली लोगों में शामिल किया है। उनके लिए इससे भी ज़्यादा सन्तोष की बात तो ये है कि ‘टाइम’ ने उनकी जैसी-जैसी विशेषताएँ बतायी हैं, बिल्कुल वैसी ही छवि बनाने के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्र और मानवता को समर्पित कर दिया, इसकी आहुति दे दी। सार्वजनिक जीवन में ऐसे लोग बहुत कम होते हैं जिनकी वैसी ही छवि बनी हो, जैसा कि वो ख़ुद चाहते हैं। जीते-जी ऐसी मनमाफ़िक छवि का सृजन ही अपने आप में अद्भुत उपलब्धि है! हरेक उपलब्धि से ऊपर है। यही उपलब्धि उन्हें इतिहास में अमरत्व प्रदान करेगी!

दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली हस्तियों में शुमार करते वक़्त ‘टाइम’ ने लिखा, “पिछले सात दशकों से भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के तौर पर मशहूर है। इस दौरान भारत में सभी धर्मों के लोग मिल-जुलकर रहते आए हैं, जिसे दलाई लामा ने सद्भाव और शान्ति की मिसाल बताया है। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने इन सभी बातों को सन्देह के घेरे में ला दिया है। हालाँकि भारत के लगभग सभी प्रधानमंत्री देश की 80 फ़ीसदी हिन्दू आबादी से ही आते रहे हैं, लेकिन मोदी इस तरह राज कर रहे हैं, मानो किसी और की उनके लिए कोई अहमियत ही नहीं है….उनकी हिन्दू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी ने बहुलतावाद को ख़ारिज़ कर दिया है और भारत के मुसलमान तो ख़ासतौर पर उसके निशाने पर हैं। महामारी के हालात ने विरोध को कुचलने का बहाना दे दिया है। जिससे दुनिया का सबसे जीवन्त लोकतंत्र और भी गहरे अन्धकार में चला गया है।”

‘टाइम’ के इस नज़रिये से सावरकर और गोडसे की रूहों या भटकती आत्माओं को अब ज़रूर चैन मिला होगा, ज़रूर चिर-शान्ति का अहसास हो रहा होगा कि उनके विद्रूप ख़ानदान में आख़िर एक नौनिहाल तो ऐसा पैदा हुआ जो कुल-ख़ानदान की धर्म-ध्वजा को आसमान से भी ऊपर ले गया! मनुष्य के रूप में जन्म लेकर जीते-जी देवत्व प्राप्त करने के लिए जितने भी वीभत्स कर्मों की सम्भावना हो सकती है, इन्होंने अल्पकाल में ही वो सब करके दिखाया है, जिसे ‘टाइम’ ने लिखा है। वैसे अभी तो इनके स्वर्ण काल में क़रीब साढ़े तीन वर्ष और शेष हैं। तब तक भारतवर्ष को ये ऐसी जगह तक पहुँचा देंगे जहाँ से वापस आने में सदियाँ लगेंगी!

देशद्रोही किसान?

उधर, ताज़ा कृषि क़ानूनों को लेकर गरमायी सियासत के तहत अब पंजाब और हरियाणा के ‘बड़ी जोत वाले किसानों’ पर देशद्रोहियों का ठप्पा लगा दिया गया है, क्योंकि वो देश भर के अपनी किसान बिरादरी के हितों के ख़िलाफ़ जाकर विपक्षियों की कठपुतली बन गये हैं। शाहीन बाग़ वालों की तरह बरगलाये और ग़ुमराह किये जा चुके हैं। दरअसल, मोदी सरकार ये साबित करना चाहती है कि पंजाब और हरियाणा के किसान बुद्धू हैं, मूर्ख हैं, नासमझ हैं, दिग्भ्रमित हैं। जबकि बाक़ी देश के किसान ख़ुश और गदगद हैं कि ‘मोदी जी ने एक और चमत्कार कर दिखाया है। किसानों की आमदनी दोगुनी तो पहले ही हो चुकी थी, अब चौगुनी होने वाली है।’

तो क्या हम ये मानें कि पंजाब और हरियाणा के आन्दोलनकारी किसान जागरूक, समझदार और दूरदर्शी हैं? उन्होंने नोटबन्दी, कैशलेस लेन-देन, जियो क्रान्ति, स्टार्ट अप इंडिया, मेक इन इंडिया, इंक्रेडिबल इंडिया, आरोग्य सेतु, ताली-थाली, दीया-पटाखा, पुष्प वर्षा, कोरोना पैकेज़ और आत्मनिर्भर भारत के चमत्कारी जुमलों के अंज़ाम को क़रीब से देखा है। इसी ख़ुशी में हरसिमरत कौर बादल ने कैबिनेट मंत्री की कुर्सी पर लात मार दी। उनकी भी आँख खुल गयी कि मोदी सरकार अब खेती-किसानी को भी अपने चहेतों के हाथों बेचने पर आमादा है। इन्हें भी साफ़ दिखने लगा कि मोदी युग में जिस मुस्तैदी से सरकारी सम्पदा को बेचने-ख़रीदने और औने-पौने दाम पर निजीकरण करने की जो बयार बह रही उसमें शिरोमणि अकाली दल का बह जाना तय है?

किस्सा-ए-बोलिविया

सारे घटनाक्रम को देखकर लगता है कि किसी ने पंजाब और हरियाणा के किसानों को लैटिन अमेरिकी देश बोलिविया का 20 साल पुराना किस्सा सुना दिया है। वैसे ये किस्सा एनसीईआरटी की कक्षा-9 के पाठ्यक्रम में भी है। हुआ यूँ कि दशकों के फ़ौजी शासन के बाद 1982 में बोलिविया में राजनीतिक सत्ता बहाल हुई। फिर अर्थव्यवस्था इतनी चरमराई कि अगले 15 साल में महँगाई 25 हज़ार गुना तक बढ़ गयी। तब विश्व बैंक की सलाह पर वहाँ की सरकार ने अपने रेलवे, संचार, पेट्रोलियम, उड्डयन जैसे बुनियादी क्षेत्रों का निजीकरण शुरू हुआ। इसी सिलसिले में 1999 में देश के चौथे बड़े शहर कोचाबांबा की जलापूर्ति व्यवस्था का निजीकरण का फ़ैसला लिया गया।

निजी कम्पनी को शहर की जलापूर्ति सुधारने के लिए एक बाँध बनाना था। इसके लिए धन जुटाने के नाम पर पानी का दाम चार गुना बढ़ा दिया गया। इससे ऐसा हाहाकार मचा कि पाँच हज़ार रुपये महीना औसत कमाई वाले परिवारों को एक हज़ार रुपये का पानी का बिल मिलने लगा। ख़र्च घटाने के लिए जब लोग नदी और नहरों से पानी लाने लगे तो वहाँ पहरा बिठा दिया गया। कुछ लोगों ने बारिश का पानी जमा करके अपना काम चलाना चाहा तो आदेश आया कि बारिश का पानी इकठ्ठा करने पर चोरी का केस दर्ज़ होगा, क्योंकि वो पानी भी निजी कम्पनी का है। इससे ऐसा जनाक्रोश फूटा कि पुलिस और सेना को भी सड़कों पर उतारने के बावजूद बात नहीं बनी। आख़िरकार, छह महीने के उग्र विद्रोह के बाद सरकार को फ़ैसला वापस लेना पड़ा। निजीकरण से पहले शहर की 80 प्रतिशत आबादी को स्थानीय संस्था से बिजली और अन्य ख़र्च को जोड़कर पर्याप्त पानी मिल जाता था। लेकिन निजीकरण की ख़ातिर इस संस्था को भ्रष्ट और लुटेरा करार दिया गया।

सर्वहारा बना भिखमंगा

दरअसल, बोलिविया की तरह भारत में भी पूँजीवाद और बाज़ारवाद ने दशकों की मेहनत से ये ‘नैरेटिव’ यानी धारणा बनायी है कि सरकारी तंत्र, सरकारी कम्पनियाँ और सरकारी ताना-बाना निहायत घटिया और भ्रष्ट है। इसे निजीकरण के बग़ैर नहीं सुधारा जा सकता। भारत में इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि देश के ज़्यादातर नेता और अफ़सर देखते-देखते सम्पन्न लोगों की ऐसी जमात का हिस्सा बन चुके हैं जो पब्लिक या जनता और ख़ासकर ग़रीबों, मज़दूरों और सर्वहारा वर्ग को चोर और भिखमंगा समझते हैं। इन्हें इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि सामाजिक व्यवस्थाएँ निजी हाथों में हैं या सरकारों के।

इससे भी रोचक तथ्य ये है कि ऐसे लोगों को ये मुग़ालता होता है कि वो शिक्षित, देशभक्त और क्रान्तिकारी हैं, जबकि वास्तव में वही समाज का सबसे भ्रष्ट तबका होते हैं। तमाम सरकारी लूट की बन्दरबाट भी यही समुदाय करता है। सार्वजनिक क्षेत्र की लूट-खसोट में शामिल ये तबका अपने घरों के ड्रॉइंग रूम में अपने ही जैसे लोगों के बीच परिचर्चाएँ करता है और निजी शिक्षण संस्थाओं, अस्पतालों, म्यूनिस्पैलिटी, पुलिस, कोर्ट, चुनाव प्रक्रिया और आरक्षण को कोसते हुए उस निजीकरण की पैरोकारी करता है जिससे देश लगातार और तबाह हो रहा है।

प्राइवेट के लिए मरेगा सरकारी

अर्थशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो निजी क्षेत्र के विस्तार में कोई बुराई नहीं है। बशर्ते, इसमें सरकारी क्षेत्र को मिटाकर पनपने से रोकने की व्यवस्था हो। मसलन, देश में ऑटोमोबाइल सेक्टर की तरक्की निजी क्षेत्र या बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की बदौलत ही हुई है। लेकिन ऐसा अन्य सेक्टरों में नहीं हुआ। दरअसल, मोटे तौर पर दो तरह की व्यवस्थाएँ होती हैं – सरकारी या सहकारी और प्राइवेट। आदर्श स्थिति में दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। लेकिन यदि एक की कामयाबी के लिए दूसरे का मरना ज़रूरी होगा, तो निजीकरण दैत्य और राक्षस बन जाएगा। बड़ी पूँजी, छोटी पूँजी को खा जाएगी क्योंकि प्राइवेट की बुनियाद ही मुनाफ़ाख़ोरी है, जबकि सरकारी तंत्र को सियासत के प्रति संवेदनशील रहते हुए व्यावयासिक हितों को साधना पड़ता है। यही इसकी ख़ामी भी है और ख़ूबी भी।

भारत में सरकारी शिक्षा, स्वास्थ्य, दूरसंचार और उड्डयन क्षेत्र के डूबने का भरपूर उदाहरण हमारे सामने है। सरकारी क्षेत्र में कमियाँ होती हैं, लेकिन प्राइवेट के आने से पहले और बाद में इन्हें और बढ़ाया जाता है। क्योंकि सरकारी व्यवस्था ठीक रहेगी तो प्राइवेट में कौन जाएगा? मुनाफ़ाख़ोरी कैसे होगी? इसीलिए सरकारी तंत्र की जड़ों में मट्ठा डाला जाता है। सरकारी कम्पनियों को बीमार बनाया जाता है। ताकि प्राइवेट पूँजी लहलहा सके। शुरुआती पीढ़ी वाले काँग्रेसियों ने सैकड़ों सरकारी कम्पनियाँ स्थापित कीं। कई तरह के राष्ट्रीयकरण किये। लेकिन इनकी ही अगली पीढ़ियों ने तमाम किस्म की लूट-खसोट करके सरकारी तंत्र को खोखला करने की प्रथा भी स्थापित की।

अरबों का माल करोड़ों में

बीजेपी में काँग्रेस वाली अच्छाईयाँ भले ही न हों, लेकिन काँग्रेस वाली ख़ामियों के लिहाज़ से भगवा उससे हज़ार दर्ज़ा आगे निकल चुका है। सरकारी कम्पनियों को बेचने या निजीकरण के मोर्चों पर तो ये ख़ूब हुआ। इनका नया रचने में कोई ख़ास यक़ीन नहीं है। लेकिन बेचने में इनके जैसी तेज़ी और किसी में नहीं। वाजपेयी ने विनिवेश मंत्रालय बनाकर अरुण शौरी को सरकारी सम्पदा बेचने का ज़िम्मा सौंपा। इन्होंने भी अरबों का माल करोड़ों में बेचने का काम बहुत बहादुरी से किया। अब मुक़दमे की गाज़ गिरी है। शायद, इसलिए क्योंकि अब वो मोदी राज के आलोचक हैं। फिर भी कहना मुश्किल है कि इसका अंज़ाम क्या निकलेगा?

धीरुभाई ने जब टेलीकॉम सेक्टर का रुख़ किया तो वाजपेयी ने वीएसएनएल, एमटीएनएल और बीएसएनएल जैसी तीन सरकारी कम्पनियों के हितों की अनदेखी करके रिलायंस कम्युनिकेशन को लॉन्च किया। समारोह में तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री प्रमोद महाजन ने मंच संचालन किया। आज सभी देख रहे हैं कि जियो लहलहा रहा है और सरकारी कम्पनियाँ बिकने को हैं। उड्डयन सेक्टर में भी निजी कम्पनियाँ को मुनाफ़ा कमाने वाले रूट थमाये गये। ताकि वो निहाल हो सकें और सरकारी कम्पनी डूबती रहे। रेलवे भी इसी राह पर चल पड़ा है। कई साल से इसका घाटा लगातार बढ़ाया जा रहा है। ताकि ये दलील तैयार हो सके कि रेलवे को बेचने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

कहाँ बनते हैं झाँसे?

रेलवे की ज़मीन बेची जा रही है ताकि चहेतों को और मालामाल बनाया जा सके। बुलेट ट्रेन तो चलने से रही, लिहाज़ा निजी ट्रेनों को ही चलाने की तैयारी हो रही है। जनता के पैसों से बनी पटरियों पर निजी ट्रेन दौड़ेंगी। ठेके पर कर्मचारी तैनात होंगे। जनता दुबली होती जाएगी। नेता और अफ़सर मोटे होते जाएँगे। ट्रेड यूनियनों का सौदा हो चुका है। नीति आयोग के सबसे बड़े कलाकार अमिताभ कान्त लगातार अपने आका के लिए नये झाँसे तैयार करते रहते हैं। इन्हीं का शिग़ूफ़ा है कि निजीकरण से रेलवे में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। किराया कम होगा। जनता को लाभ होगा। भले ही सभी दिहाड़ी मज़दूर बन जाएँ।

अभी युवा बेरोज़गारी से तड़प रहा है। मज़दूर भूख से सिसक रहा है। किसान गिड़गिड़ा रहा है कि बस, इतनी घोषणा कर दीजिए कि मंडी से बाहर भी कोई सौदा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे नहीं होगा। लेकिन कोई सुनवाई नहीं। इन्हीं अमिताभ कान्त ने दिसम्बर 2015 में प्रकाशित नीति आयोग के एक दस्तावेज़ में किसानों की आमदनी को दोगुना करने वाला जुमला पकाया था। इसमें कहा गया था कि ‘एमएसपी से किसानों का भला नहीं हो सकता क्योंकि सरकार सारी उपज नहीं ख़रीद सकती और ना ही उसे ख़रीदना चाहिए’।

‘काम की बात’ को ढूँढ़ना मुहाल

2016 में नोटबन्दी के बाद इसी अमिताभ कान्त ने कहा था कि दो-तीन साल में अर्थव्यवस्था कैशलेस हो जाएगी। हम देख चुके हैं कि कोरोना की दस्तक से पहले लगातार 16 तिमाहियों तक भारतीय अर्थव्यवस्था गर्त में जाती रही। कोरोना के आंकड़े रोज़ाना आरोग्य सेतु की पोल खोल रहे हैं। यही हाल पीएम केयर्स का है। 5 ट्रिलियन डॉलर भी इनके ही दिमाग़ की ख़ुराफ़ात थी तो ‘स्टार्ट अप इंडिया’ के भी बुनियादी चिन्तक और विचारक यही हैं। 2019 में एक सर्वे में 33 हज़ार स्टार्टअप वालों से पूछा गया कि आख़िर योजना फेल क्यों हुई? जवाब में 80 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें स्टार्टअप इंडिया से कोई फ़ायदा नहीं मिला। 50 प्रतिशत ने बताया कि अधिकारी ही लूट लेते हैं। वर्ष 2016-19 के दौरान सिर्फ़ 88 स्टार्टअप ही टैक्स लाभ लेने के लायक बन सके।

2014 में शुरू हुआ ‘मेक इन इंडिया’ भी इन्हीं के दिमाग़ का कीड़ा था। मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर का बदहाली और बेरोज़गारों की तादाद सारे दावों की पोल खोल देते हैं। कोई नहीं जानता कि देश की पहली स्मार्ट सिटी कहाँ है? ‘इंक्रेडिबल इंडिया’ तो ऐसी मनहूस योजना साबित हुई कि इसके विज्ञापनों पर जितना ख़र्च बढ़ता गया उतना ही विदेशी सैलानियों की संख्या घटती गयी। कुलमिलाकर, मोदी युग की सबसे बड़ी पहचान यही हो गयी है कि यहाँ ‘मन की बात’ की तो भरमार है लेकिन ‘काम की बात’ को ढूँढ़ना मुहाल है। इसीलिए ‘टाइम’ और बोलिविया के अनुभवों से सीखना ज़रूरी है। देश बेचने वालों से निपटना ज़रूरी है।

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