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क्या शिवसेना कुर्सी के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद छोड़ देगी?

शिवसेना को अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपने दो परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों एनसीपी और कांग्रेस का समर्थन लेना पड़ेगा। ऐसे में यहां अब सवाल यह उठता है कि हिंदू हृदय सम्राट बाल ठाकरे की शिवसेना उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे की अनुवाई में सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़ देगी और सेकुलर शब्द को ‘छद्म’ कहने वाली शिवसेना सेकुलर रास्ता अख्तियार करेगी?

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मुंबई, 10 नवंबर | महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और शिवसेना के बीच 1980 के दशक के अंत से शुरू हुए रोमांस का शिवसेना की हठधर्मिता के चलते करीब-करीब अंत हो गया है। भाजपा ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को रविवार शाम बता दिया कि महागठबंधन के प्रमुख सहयोगी शिवसेना के गठबंधन धर्म निभाने से इनकार करने के कारण वह राज्य में सरकार बनाने की स्थिति में फिलहाल नहीं है। इसके साथ ही भाजपा नेताओं ने शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के संभावित गठबंधन को शुभकामनाएं दी।

भाजपा के सरकार बनाने से असमर्थता जताने के तुरंत बाद शिवसेना प्रवक्ता संजय राऊत ने कहा कि अगर उद्धव ठाकरे बोले हैं कि महाराष्ट्र का अगला मुख्यमंत्री शिवसेना का होगा तो मुख्यमंत्री शिवसेना का ही होगा। यानी भाजपा के सरकार बनाने से इनकार करने के बाद शिवसेना के लिए अपना मुख्यमंत्री बनाने का स्वर्णिम मौका है। लेकिन उसके पास केवल 56 विधायक हैं। यानी सरकार बनाने के लिए जरूरी 88 विधायक एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन के होंगे।

इसका मतलब शिवसेना को अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपने दो परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों एनसीपी और कांग्रेस का समर्थन लेना पड़ेगा। ऐसे में यहां अब सवाल यह उठता है कि हिंदू हृदय सम्राट बाल ठाकरे की शिवसेना उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे की अनुवाई में सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़ देगी और सेकुलर शब्द को ‘छद्म’ कहने वाली शिवसेना सेकुलर रास्ता अख्तियार करेगी? अगर शिवसेना सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़कर ‘सेकुलर शिवसेना’ में ट्रांसफॉर्म होगी तो यह महाराष्ट्र की राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव होगा।

राम जन्मभूमि आंदोलन शुरू होने के बाद शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने कट्टर हिदुत्व का रास्ता अपना लिया था। बाल ठाकरे तो यहां तक दावा करते रहे कि अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को शिवसेना कार्यकर्ताओं ने ही ढहाया। इसके बाद से ही शिवसेना देश में हिंदुत्व का प्रतिनिधि दल रहा है। हिंदुत्व के मुद्दे पर शिवसेना कई मामलों में भारतीय जनता पार्टी से भी ज्यादा आक्रामक रही है। इसीलिए हिंदू उनके नाम के आगे ‘हिंदू हृदय सम्राट’ का अलंकरण लगाने लगे।

ठाकरे के बाद शिवसेना की कमान संभालने वाले उद्धव भी कट्टर हिंदुत्व के रास्ते पर ही चलते रहे हैं। वह भाजपा पर राम मंदिर निर्माण की राह में आई बाधाओं को जानबूझकर दूर न करने का भी आरोप लगाते रहे हैं। इतना ही नहीं उद्धव ने अपने बेटे के साथ अयोध्या में राम मंदिर निर्माण पर जोर देने के लिए पिछले वर्ष अयोध्या का दौरा किया था। उनके उस दौरे को खूब हाइप भी मिला, क्योंकि ठाकरे परिवार का कोई सदस्य पहली बार महाराष्ट्र के बाहर निकला था।

यह संयोग ही है कि जब अयोध्या विवाद का सैद्धांतिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने हल कर दिया और रामलला के विवादित स्थल को हिंदुओं को राम मंदिर बनाने के लिए सौंप दिया, ठीक उसी समय शिवसेना उस मुकाम पर पहुंच गई जब उसे कट्टर हिंदुत्व या महाराष्ट्र में अपना मुख्यमंत्री दोनों में से एक का चयन करना है। एनसीपी-कांग्रेस के साथ सरकार बनाने पर निश्चित तौर पर शिवसेना को कट्टर हिंदुत्व का मार्ग छोड़ना पड़ेगा। शिवसेना को अब अपने उस नारे को भी छोड़ना पड़ेगा, जिसमें वह अयोध्या के बाद काशी और मथुरा की बात करती रही है।

अगर 2014 के महाराष्ट्र चुनाव प्रचार के दौरान उद्धव ठाकरे के भाषण को फिर से सुनें तो यह साफ हो जाएगा कि उनके मन में भाजपा और भाजपा नेताओं के खिलाफ बहुत अधिक विष भरा है, जिसे वह जब भी मौका मिलेगा, उगल देंगे। इसीलिए जब इस बार विधानसभा चुनाव में भाजपा पिछली बार की 23 की तुलना में 40 सीट पिछड़ गई तो उद्धव को 2014 के चुनाव और उसके बाद छोटे भाई का दर्जा स्वीकार करने के अपमान का बदला लेने का मौका मिल गया।

शिवसेना दरअसल, 2014 के बाद से ही मौका तलाश रही थी। चूंकि भाजपा बहुत मजबूत स्थिति में पहुंच गई थी, लिहाजा, वह वेट एंड वॉच के मोड में रही। मौके की तलाश में ही 2014 में छोटे भाई ‘भाजपा’ को 127 सीट से अधिक देने को तैयार न होने वाली शिवसेना 2019 में 144 के बजाय 124 सीट पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गई।

शिवसेना जानती थी कि भाजपा के साथ गठबंधन बनाकर लड़ने पर ही वह विधानसभा में सम्मानजनक सीटें हासिल कर सकती है। उसके सामने 2014 का उदाहरण था, जब चुनाव में पूरी ताकत लगाने के बावजूद शिवसेना 63 सीटों से आगे नहीं बढ़ पाई, जबकि भाजपा उसके लगभग दोगुना यानी 122 सीटें जीतने में सफल रही। शायद इसीलिए फिफ्टी-फिफ्टी फॉर्मूले की बात करने वाले उद्धव और संजय राऊत 124 सीटें मिलने पर चुप रहे।

दरअसल, शिवसेना नेता जानते थे कि कांग्रेस-एनसीपी का गठबंधन हो गया है, लिहाजा, उसके लिए भाजपा के साथ लड़ना लाभदायक होगा। अन्यथा वह बहुत ज्यादा घाटे में जा सकती है। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान, जब नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे नेता बोल रहे थे कि इस बार चुनाव देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में लड़ा जा रहा है और वही अगले पांच साल मुख्यमंत्री रहेंगे, तब भी पिता-पुत्र ने खामोश रहने में अपना हित समझा।

24 अक्टूबर का दिन उद्धव ठाकरे और संजय राऊत के लिए बदला लेने का दिन था। चुनाव परिणाम में भाजपा की 18 सीटें कम होने से दोनों नेता अचानक से फिफ्टी-फिफ्टी फॉर्मूले का राग आलापने लगे और ढाई-ढाई साल का मुख्यमंत्री और सरकार में बराबर मंत्रालय की मांग करने लगे। वह जानते थे कि भाजपा पिछली बार की तरह मजबूत पोजिशन में नहीं है, वह शिवसेना के समर्थन के बिना सरकार नहीं बना सकती। अचानक से शिवसेना की बारगेनिंग पावर बहुत बढ़ गई।

महाराष्ट्र में भगवा गठबंधन में ‘बड़ा भाई’ बनने की हसरत पाले उद्धव ठाकरे की नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थी। इसीलिए मुंबई की वरली सीट से आदित्य ठाकरे चुनाव मैदान में उतरे और विधायक चुने गए। उद्धव ठाकरे बार-बार हवाला दे रहे हैं कि उन्होंने अपने पिता और शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे को वचन दिया है कि महाराष्ट्र में एक न एक दिन शिवसैनिक को मुख्यमंत्री बनाकर ही रहेंगे।

दरअसल, 1988-89 में जब प्रमोद महाजन और बाल ठाकरे ने भाजपा और शिवसेना के बीच गठबंधन का फैसला किया, तब भाजपा का राज्य में कोई खास जनाधार नहीं था। उस समय शिवसेना बड़े भाई और भाजपा छोटे भाई के किरदार में थी। 1995 में जब भगवा गठबंधन की सरकार बनी तब शिवसेना के मनोहर जोशी मुख्यमंत्री और भाजपा के गोपीनाथ मुंडे उपमुख्यमंत्री बने थे। यह सिलसिला 2014 के लोकसभा चुनाव तक जारी रहा, लेकिन 2014 के विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा बड़े भाई के किरदार में आ गई। इस अदला-बदली को उद्धव मन से कभी स्वीकार नहीं कर सके। अब भाजपा से बदला लेने का मौका मिला तो अवसर क्यों चूकते।

यानी पहले मराठी मानुस, फिर कट्टर हिंदुत्व की राह पर चलने वाली शिवसेना अब एनसीपी और कांग्रेस के साथ धर्मनिरपेक्ष हो जाएगी!

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आख़िर, ये शपथ है क्या बला!

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oath taking ceremony

संवैधानिक पदों का दायित्व सम्भालने वालों के लिए संविधान में पद और गोपनीयता की शपथ लेने का विधान बनाया गया है। संविधान के अनुच्छेद 60, 69, 75(4), 99, 124(6), 148(2), 159, 164(3), 188 और 219 में इसका बाक़ायदा ज़िक्र है। इसका सम्बन्ध राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, स्पीकर, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस और जजों, सांसदों, विधायकों और सीएजी के पदों से है। संवैधानिक पद होने के बावजूद संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों, राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों, चुनाव आयुक्तों, एटार्नी जनरल और एडवोकेट जनरल को शपथ-विधि से नहीं जोड़ा गया है। जिन पदों पर शपथ ग्रहण की अनिवार्यता है, उनके लिए शपथ की शब्दावली क्या होगी? इसका ब्यौरा संविधान के थर्ड शिड्यूल में प्रोविज़न I से लेकर VIII तक में अलग से भी दोहराया गया है।

लेकिन शपथ-ग्रहण की पूरी प्रक्रिया के साथ एक अज़ब सी विडम्बना भी जुड़ी हुई है। वो ये कि ऐसे शपथ-ग्रहण की वैधता की मियाद सिर्फ़ एक कार्यकाल तक ही होती है। नये कार्यकाल के शुरुआत से पहले इन गणमान्य व्यक्तियों को फिर से शपथ लेना पड़ता है। लेकिन जब मंत्रियों के विभाग में परिवर्तन होता था, तब उन्हें नये सिरे से शपथ की ज़रूरत नहीं पड़ती, जबकि यदि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री उनका प्रमोशन करके उन्हें राज्यमंत्री से स्वतंत्र प्रभार वाला मंत्री बनाते हैं या फिर कैबिनेट मंत्री का दर्ज़ा दिलवाते हैं तो मंत्रि परिषद का सदस्य होने के बावजूद इन्हें भी नये सिरे से शपथ लेना पड़ता है। यही हाल जजों का भी है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की शपथ अलग है, तो चीफ़ जस्टिस बनने पर नये सिरे से शपथ लेनी पड़ती है। यहाँ तक कि राज्यपालों का भी जब एक राज्य से दूसरे राज्य में तबादला होता है तो उन्हें नये पद के लिए नये सिरे से शपथ लेनी पड़ती है।

ये शपथ ग्रहण या तो ईश्वर के नाम पर होता है या शुद्ध अन्तःकरण के नाम पर। इन्हें संविधान और क़ानून के प्रति सच्ची निष्ठा रखने, निष्पक्ष और निर्भीक रहने तथा देश की एकता और अखंडता का बरकरार रखने की सार्वजनिक तौर पर प्रतिज्ञा की जाती है। वादा किया जाता है। शब्द कोश के मुताबिक़, शपथ-प्रतिज्ञा-वादा-सौगन्ध-हलफ़, सभी परस्पर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। मज़े की बात तो ये है कि शपथ, सशर्त तो हो सकती है। लेकिन इसकी कोई मियाद नहीं हो सकती। प्रतिज्ञा का सम्बन्ध पूरी ज़िन्दगी से होता है। वादे का मतलब ही है, ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’। तो फिर ऐसा क्यों है कि शपथ के ज़रिये पद-भार सम्भालने वालों को तब भी शपथ दोहरानी होती है, जबकि वो लगातार उसी पद पर बने रहने वाले हों?

संवैधानिक पदों के लिए शपथ लेने वाले लोग यदि इसकी मर्यादा भंग करते हैं तो उन्हें उनके पद से हटाने की जटिल प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया को इम्पीचमेंट कहते हैं। इम्पीचमेंट तो आपराधिक सज़ा का दर्ज़ा हासिल नहीं है। अलबत्ता, यदि दुराचरण के तहत कोई आपराधिक मामला भी बने तो उनके लिए अपराध-विधान के मुताबिक़ कार्रवाई हो सकती है। मसलन, यदि किसी को ग़बन करने के मामले में इम्पीच किया गया है तो उनके ख़िलाफ़ ग़बन से जुड़ा मुक़दमा चल सकता है और उसे अदालती प्रक्रिया से सज़ा भी दी जा सकती है।

लेकिन शपथ-भंग करने, कसम तोड़ने या वादा-ख़िलाफ़ी के लिए क़ानून में कोई सज़ा नहीं है। अलबत्ता, शपथ-पत्र या हलफ़नामें पर झूठा ब्यौरा देना या कोर्ट में झूठी गवाही देना बाक़ायदा अपराध है। इसके लिए कोर्ट सज़ा देती है। लेकिन अब ज़रा उस क़सम को याद कीजिए जिसे अरविन्द केजरीवाल ने अपने बच्चों का वास्ता देकर खायी थी, या फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस वादे को याद कीजिए, जब उन्होंने नोटबन्दी के वक़्त देश से 50 दिन की मोहलत माँगी थी, या जब उन्होंने विदेश से काला धन लाकर सबके खाते में 15-15 लाख रुपये डालने का वादा किया था। अब सोचिए कि यदि कसम नहीं निभाने या प्रतिज्ञा तोड़ने या वादा ख़िलाफ़ी के लिए किसी सज़ा का विधान होता तो आज क्या देश नेताओं के लिए तरस नहीं होता?

आख़िर में, मुझे शपथ की मर्यादा तोड़ने का एक प्रसंग याद आ रहा है। बात 24 या 25 अगस्त 2015 है। उस दिन एनसीपी नेता शरद पवार का एक बयान था कि उन्होंने पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ख़त लिखकर यूपीए सरकार के एक निर्णय को बदलने की माँग की है। पवार ने लिखा है कि उन्होंने 2009 में कैबिनेट की बैठक में अपने सहयोगी जयराम रमेश के उस प्रस्ताव का विरोध किया था जिसके तहत जयराम ने जीएम यानी जेनेटिकली मोडिफ़ाइड अथवा अनुवांशिक रूप से परिष्कृत बीजों का परीक्षण उन राज्यों में नहीं करने का नियम बना दिया जो इसकी इजाज़त ना दें। शरद पवार ने लिखा है कि वो इस नियम के ख़िलाफ़ थे। जबकि जयराम का कहना था कि कृषि राज्यों का विषय है। लिहाज़ा, ये नहीं माना जा सकता कि राज्य ये नहीं जानते कि उनके लिए क्या मुफ़ीद होगा और क्या नहीं?

शरद पवार का नरेन्द्र मोदी को ख़त लिखना कतई ग़लत नहीं है। लेकिन बड़ी बात ये है कि कैबिनेट में लिये गये फ़ैसले से असहमत होते हुए भी शरद पवार मंत्री पद पर बने रहे। जो कैबिनेट के बने सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धान्त के ख़िलाफ़ था। इस सिद्धान्त का मतलब ही ये है कि कैबिनेट सभी फ़ैसले सर्वसम्मत्ति से लेगी। यदि कोई मंत्री कैबिनेट के फ़ैसले से असहमत है तो उसे इस्तीफ़ा देना होगा। वर्ना ये माना जाएगा कि फ़ैसले की पीछे उसकी चाहे जो आपत्ति रही हो, लेकिन जब फ़ैसला हो गया तो उसका भी फ़ैसला माना जाएगा।

सामूहिक उत्तरदायित्व के इस सिद्धान्त की वजह से ही राजीव गाँधी की कैबिनेट से आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने इसलिए इस्तीफ़ा दे दिया था क्योंकि वो शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को क़ानून बनाकर पलटने के ख़िलाफ़ थे। नियम ये है कि कैबिनेट से इस्तीफ़ा देने के बाद ही कोई मंत्री अपनी असहमति को सार्वजनिक कर सकता है। कैबिनेट में रहते हुए ऐसा करना सर्वथा वर्जित है। पवार का आचरण मंत्री-पद की शपथ के ख़िलाफ़ था। इस तरह उन्होंने संविधान की बुनियादी मान्यता का मखौल उड़ाया था।

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…तो क्या बीजेपी ने विधायक ओम प्रकाश शर्मा को सुपर पीएम बना दिया है?

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क्या बीजेपी ने दिल्ली में अपने पुनर्निर्वाचित विधायक ओम प्रकाश शर्मा को सुपर पीएम बना दिया है? वर्ना वो कैसे कह रहे हैं कि ‘दिल्ली में हार के बाद भी बीजेपी की नीतियों में कोई बदलाव नहीं आएगा। देश में नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के बाद एनआरसी भी आएगा और जनसंख्या नियंत्रण क़ानून भी आएगा।’

ओम प्रकाश शर्मा का ये बयान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के उन बयानों के बाद कैसे आ सकता है जिसमें देश के ये दोनों शीर्षस्थ नेता कह चुके हैं कि फ़िलहाल देश में एनआरसी लागू करने का कोई बात नहीं है। मोदी-शाह के उपरोक्त बयान संसद की कार्यवाहियों में भी दर्ज़ हैं और चुनावी रैलियों में भी दोहराये गये हैं। तो क्या ये माना जाए कि मोदी-शाह से आगे जाकर ओम प्रकाश शर्मा ने सरकार और पार्टी में भीतरखाने चल रही गतिविधियों का ख़ुलासा कर दिया है। यदि ऐसा नहीं है, तो बीजेपी या सरकार के प्रवक्ताओं ने शर्मा के बयानों से अब तक किनारा क्यों नहीं किया?

बात यहीं नहीं थमती। ओम प्रकाश शर्मा चुनाव ख़त्म होने के बाद भी अरविन्द केजरीवाल को बार-बार आतंकवादी बताने से बाज नहीं आ रहे हैं। लिहाज़ा, ये सवाल उठना भी लाज़िमी है कि क्या बीजेपी ने उन्हें ऐसे बयानों को दोहराने के लिए अधिकृत किया है? यदि नहीं, तो फिर शर्मा जैसे बयान-वीरों की ज़ुबान पर कौन लगाम कसेगा? और, यदि बीजेपी भी शर्मा के अलावा प्रकाश जावड़ेकर, परवेश वर्मा, कपिल मिश्रा और तेजिन्दर बग्गा जैसे छोड़े-बड़े नेताओं की तरह केजरीवाल को आतंकवादी मानती है, तो फिर उन्हें जेल में क्यों नहीं डाल रही?

क्या मोदी-शाह की नाक के ठीक नीचे देश की राजधानी में 16 फरवरी को तीसरी बार एक आतंकवादी की मुख्यमंत्री के पद पर ताजपोशी होनी चाहिए? या फिर बीजेपी वास्तव में केजरीवाल को आतंकवादी नहीं मानती है बल्कि वो उन्हें प्यार से अथवा हँसी-मज़ाक में आतंकवादी कह रही है, या फिर दिल्ली में जनादेश से पिटने के बाद बीजेपी में अब आतंकवादी के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का हौसला नहीं बचा।

चुनाव आयोग ने 12 फरवरी को दिल्ली में नयी विधानसभा के गठन की अधिसूचना जारी कर दी है। इस तरह चुनाव सम्पन्न हो जाने की वजह से अब चुनाव आयोग का निष्प्रभावी हो जाना स्वाभाविक है। हालाँकि, चुनाव के दौरान जब वो बेहद शक्तिशाली था, तब भी वो बीजेपी के उन बड़बोले नेताओं को माकूल सज़ा कहाँ दे पाया, जिन्होंने अपने राष्ट्रवादी शौर्य को प्रदर्शित करते हुए अरविन्द केजरीवाल को आतंकवादी होने का ख़िताब दिया था। चुनाव आयोग ने यदि उस वक़्त समुचित सख़्ती दिखायी होती तो क्या बीजेपी के पुनर्निर्वाचित विधायक ओम प्रकाश शर्मा की इतनी ज़ुर्रत होती कि वो केजरीवाल को फिर से आतंकवादी होने का बयान दे देते?

ओम प्रकाश शर्मा ने तो बदज़ुबानी की हद्दों को भी तोड़ डाला। चुनाव ख़त्म होने के बाद भी उन्होंने बयान दिया कि ‘अरविन्द केजरीवाल एक भ्रष्ट आदमी है। आतंकवादियों के साथ उनकी सहानुभूति है। वह पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता की भूमिका निभाते हैं। टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन करते हैं और भारतीय सेना पर सवाल उठाते हैं। आतंकवादी शब्द उनके लिए सबसे उपयुक्त है।’ शर्मा यहीं नहीं रुके। उन्होंने आगे कहा कि ‘केजरीवाल ने एक बार फिर दिल्ली की जनता की आँखों में धूल झोंकी है। ये शातिर ठग है। इनकी पोल जरा देर से खुलेगी। केजरीवाल टुकड़े-टुकड़े गैंग के साथी हैं। वह आतंकी हैं और रहेंगे। अगर आतंकवाद से भी घिनौना कोई शब्द है तो वैसा काम केजरीवाल ने किया है। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के साथ खड़े होने वाले, पाकिस्तान की सेना के प्रवक्ता का काम करने वाले को हम आतंकवादी ना कहें तो क्या कहें?’

जवाब में आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह भी बीजेपी के नेताओं ख़ासकर अमित शाह को ललकार चुके हैं कि यदि केजरीवाल आतंकवादी हैं तो सरकार उन्हें गिरफ़्तार क्यों नहीं करती, उन्हें जेल में क्यों नहीं डालती, उनके ख़िलाफ़ मुकदमा क्यों नहीं चलाती? ख़ुद केजरीवाल भी ऐसे बयानों का प्रतिकार कर चुके हैं। लेकिन नतीज़ा, वही ढाक के तीन पात। चुनाव प्रचार के दौरान चुनाव आयोग ने अनुराग ठाकुर, परवेश वर्मा और कपिल मिश्रा को उनके जीभ के लपलपाने की सज़ा तो दी लेकिन वो इतनी नाकाफ़ी थी कि उससे बीजेपी वालों ने कोई सबक नहीं लिया।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी कह चुके हैं कि ऐसे नेताओं के ख़िलाफ़ पुलिस में भी एफआईआर दर्ज़ करवानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। शायद इसीलिए ओम प्रकाश शर्मा और शेर हो गये। तभी तो उन्होंने आतंकवादी के अलावा केजरीवाल को भ्रष्ट, पाकिस्तानी सेना का प्रवक्ता और टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थक भी बता दिया। वैसे मौजूदा संसद सत्र में ही गृह मंत्रालय ने ख़ुलासा किया कि उसके पास किसी भी ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ से सम्बन्धित कोई ब्यौरा नहीं है।

नेताओं की लपलपाती ज़ुबान के बहकने के असंख्य अफ़सानों में से ये तो महज एक और किस्सा है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि अपने राजनीतिक विरोधियों के ऐसे बिगड़े बोलों का बार-बार दोहराया जाना भी सबसे ज़्यादा उस भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की ओर से हो रहा है जो अपने नेता को मौत का सौदागर, चाय-वाला, क़ातिल, हत्यारा, चौकीदार चोर है और साइकोपैथ वग़ैरह बताये जाने से तो बेहद मर्माहत होती है, लेकिन केजरीवाल को आतंकवादी और राहुल गाँधी को शहजादा कहने में उसे गुरेज़ नहीं होता? ऐसे में क्या ये मान लिया जाए कि सियासत जमात में ‘जाके पैर न फटे बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई’ वाला मुहावरा लागू नहीं होता? यहाँ शीशे के घरों में रहने वालों को भी दूसरों के घरों पर पत्थर फेंकने का शौक़ क्यों होता है? क्या यहाँ का दस्तूर ‘आँख के बदले आँख’ और इस ‘हम्माम में सारे नंगे’ वाला ही बना रहेगा?

वैसे ख़ुद केजरीवाल भी अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करते रहे हैं। यहाँ तक कि नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी जैसे तमाम बड़े नेताओं का ज़ुबान भी कई बार अपने विरोधियों के अमर्यादित विशेषणों का इस्तेमाल करती रही है। इनके बयानों को लेकर ख़ूब छीछालेदर भी होती रही है। अदालतों में मानहानि के मुक़दमे भी दर्ज़ हुए हैं। सज़ाएँ भी हुई हैं। ख़ेद जताने और क्षमादान की भी मिसालें भी हैं। लेकिन लपलपाती ज़ुबान की महामारी ऐसा विकराल रूप धारण कर चुकी है कि काबू में आने का नाम ही नहीं लेती। बयान-वीरों ने ख़ुद को सभी शिष्टाचार और मर्यादाओं से ऊपर मान लिया है।

यही वजह है कि नेताओं की देखादेखी हमारी पुलिस भी दिनों-दिन और बर्बर होती जा रही है। अदालतें संवेदनहीन होती जा रही हैं। सड़कों पर लिंचिंक रूपी इंसाफ़ होने लगा है। कोई भी दिन-दहाड़े हाथों में पिस्तौल लहराने और गोली चलाने लगा है तो कोई जेएनयू में नक़ाबपोश बनकर और दिल्ली के गार्गी कॉलेज में घुसकर अपराध करता है तो कभी पुलिस ही जामिया में सारे नियम-क़ायदों की धज़्ज़ियाँ उड़ा रही होती है। जेलों में विचाराधीन क़ैदियों का अम्बार होता है और क़ानून ख़र्राटे भरता रहता है। धन्ना-सेठों के बड़े-बड़े घोटालों के बाद देश से भाग निकलने की मिसालें पैदा होती रहती हैं। ऐसे और भी बहुत सारे उदाहरण हो सकते हैं, जो चीख़-चीख़कर बताते हैं कि देश में नियम-क़ायदे और उन्हें लागू करने वाली संस्थाएँ बेमानी हो चुकी हैं।

समाज से ग़लत-सही के बीच के फ़र्क़ का मिटने जाना बेहद ख़तरनाक है। इससे उन अपराधों के भी बेधड़क होने का रास्ता खुलता जा रहा है, जो अभी यदा-कदा होते हैं। लिहाज़ा, सियासी जमात को भी ये खुशफ़हमी नहीं पालनी चाहिए कि वो समाज के बाक़ी तबकों में फैल रही ग़लतफ़हमी से हमेशा सुरक्षित ही रहेंगे। वो दिन दूर नहीं जब उनका भी सीधा वास्ता तरह-तरह के सिर-फिरों से ज़रूर पड़ेगा। इसीलिए अब भी वक़्त है कि हम पुराने अनुभवों से नसीहत लें, वर्ना गाँधी या इन्दिरा के हत्यारों वाली मानसिकता का बार-बार उभरना निश्चित है।

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हेमंत की ‘बदलाव यात्रा’ ने बदली झारखंड की सत्ता और सियासत

हेमंत सोरेन ने ‘बदलाव यात्रा’ की शुरुआत संथाल परगना के साहिबगंज से की थी और इसका समापन रांची में हुआ। इस यात्रा के दौरान उन्होंने पूरे झारखंड के सुदूर इलाकों का दौरान किया और लोगों की समस्याएं सुनीं और उसके समाधान का वादा किया।

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रांची। झारखंड की राजनीति में एक सौम्य और साधारण चेहरा माने जाने वाले हेमंत को भले ही राजनीति विरासत में मिली है, परंतु अपने पिता शिबू सोरेन की छांव से खुद को बाहर निकाल कर उन्होंने अपने संघर्ष के बल दोबारा राज्य की सत्ता हासिल की है।

हेमंत ने चुनाव पूर्व अपने सहयोगियों के साथ सीट बंटवारे में उदारता दिखाई और सहयोगियों को खुश रखा। उन्होंने अपनी टीम को लेकर संघर्ष किया और झामुमो को उस जगह पहुंचाया, जहां पहुंचना कठिन-सा लगने लगा था। विधानसभा चुनाव में झामुमो सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। उन्होंने सहयोगियों के साथ ऐसा समन्वय बनाया कि सभी ने एक-दूसरे को सहयोग किया और गठबंधन बहुमत के आंकड़े से काफी आगे निकल गया।

हेमंत ने राजनीति का ककहरा अपने पिता शिबू सोरेन से सीखा है और राजनीति में उनका आगमन बड़े भाई दुर्गा सोरेन के आकस्मिक निधन के बाद हुआ। लेकिन जब उन्होंने राजनीति में कदम रखा तो इस मजबूती के साथ कि आज वह दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बन पाए हैं। हमेशा जनता के बीच रहना उनकी राजनीति का अहम हिस्सा रहा है और उसी के परिणामस्वरूप वह आगे बढ़ते चले गए। पारिवारिक और सामाजिक व्यक्ति की पहचान के साथ 2019 के विधानसभा चुनाव में हेमंत ने नई रणनीति बनाई और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की रघुवर दास सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया।

हेमंत ने अपने आज के अभियान की शुरुआत सितंबर, 2018 से ही कर दी थी। लोकसभा चुनाव से पहले जो अभियान झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने शुरू किया था, उसे ‘संघर्ष यात्रा’ का नाम दिया था। इसके तहत वह राज्य के सभी 263 प्रखंडों में पहुंचे और वहां जाकर सभाएं की। उन्होंने कार्यकर्ताओं में जोश भरा और युवाओं को पार्टी से जोड़ा।

इस दौरान झारखंड के लिए शहीद हुए आदिवासियों को उन्होंने सम्मानित भी किया। इसी दौरान उन्होंने अपनी एक 12 सदस्यीय टीम बनाई, जिसने बड़े पैमाने पर डिजिटल प्रचार अभियान चलाया।

लातेहार से झामुमो के नवनिर्वाचित विधायक वैद्यनाथ राम कहते हैं, “हेमंत को प्रारंभ से ही सादगी पसंद है। वह वन-टू-वन लोगों से मिलते हैं और उनकी समस्याओं को सुनकर उनके समाधान की कोशिश करते हैं। इससे लोगों में विश्वास पैदा होता है।”

झामुमो के संगठन से जुड़े एक नेता का कहना हैं, “संघर्ष यात्रा की समाप्ति के बाद हेमंत ‘बदलाव यात्रा’ पर निकल गए और उन्होंने लोगों से सत्ता बदलने की अपील की। इस दौरान उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को एकजुट रखा। पार्टी में ‘वन मैन’ की रणनीति के तहत सोरेन ने जमकर मेहनत की और सहयोगी दलों के साथ जुड़ाव बनाए रखा।”

हेमंत सोरेन ने ‘बदलाव यात्रा’ की शुरुआत संथाल परगना के साहिबगंज से की थी और इसका समापन रांची में हुआ। इस यात्रा के दौरान उन्होंने पूरे झारखंड के सुदूर इलाकों का दौरान किया और लोगों की समस्याएं सुनीं और उसके समाधान का वादा किया। लोगों की समस्याओं, उनके समाधान के मुद्दों को उन्होंने घोषणा-पत्र में शामिल किया।

इसका परिणाम यह हुआ कि संथाल परगना के आदिवासी बहुल सीटों तक सीमित मानी जाने वाली पार्टी राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में पहुंच गई। झामुमो का जनाधार बढ़ा, और पहली बार लातेहार और गढ़वा विधानसभा में झामुमो के उम्मीदवारों की जीत हुई।

सोरेन ने अपने अभियान को आधुनिक बनाने के लिए एक प्रोफेशनल टीम को सोशल मीडिया के लिए उतारा। झामुमो के कार्यकर्ताओं को इसके लिए प्रशिक्षण दिलाया और सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया। दूसरी ओर, सुदूर क्षेत्रों में पहुंचने के लिए उन्होंने साइकिल को साधन बनाया, जिस पर सवार होकर कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव लोगों से मुलाकात की और झामुमो का संदेश पहुंचाया।

हेमंत की इस कुशल रणनीति का परिणाम रहा कि भाजपा का ‘अबकी बार 65 पार’ का नारा धरा का धरा रह गया और झामुमो, राजद और कांग्रेस गठबंधन बहुमत का आंकड़ा पार कर सत्ता पर काबिज हो गया।

अब हेमंत के सामने झारखंड के लोगों से किए वादे निभाने की चुनौती है। देखने वाली बात होगी कि हेमंत अपने वादों को निभाने को लेकर कितना खरा उतर पाते हैं।

BY: मनोज पाठक

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