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महाराष्ट्र में मोहरे बने मुहावरे!

सियासी दंगल को देखें तो इनमें से अलग-अलग मुहावरे, अलग-अलग मठाधीशों पर बिल्कुल सटीक ढंग से चस्पाँ होता है। हरेक मुहावरा दंगल के अलग-अलग खिलाड़ियों मसलन, बीजेपी, शिवसेना, एनसीपी और काँग्रेस की मार्कशीट बनकर उभरता है।

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महाराष्ट्र की राजनीति को लेकर अचानक कई मुहावरे दिमाग़ में कौंधने लगे। मसलन, ‘समरथ को नहिं दोष गुसाई’, ‘वीर भोग्य वसुन्धरा’, ‘घर का भेदी लंका ढाहे’, ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’, ‘सैय्याँ भये कोतवाल अब डर काहे का’, ‘जैसी करनी वैसी भरनी’, ‘अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत’, ‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाये’… वगैरह-वगैरह। 24 अक्टूबर से महाराष्ट्र में जारी सियासी दंगल को देखें तो इनमें से अलग-अलग मुहावरे, अलग-अलग मठाधीशों पर बिल्कुल सटीक ढंग से चस्पाँ होता है। हरेक मुहावरा दंगल के अलग-अलग खिलाड़ियों मसलन, बीजेपी, शिवसेना, एनसीपी और काँग्रेस की मार्कशीट बनकर उभरता है।

‘समरथ को नहिं दोष गुसाई’

शिवसेना के गच्चा देने के बाद बीजेपी ने बीते महीने भर में जिस तरह की बेशर्मी दिखायी, जैसे राज्यपाल की संस्था से मनमानी-भरे फ़ैसले करवाये, जैसे राज्यपाल ने केन्द्र सरकार की कठपुतली और एजेंट या दलाल की तरह काम किया, जैसे शिवसेना और उसके ‘कुर्कमों’ यानी वादा-ख़िलाफ़ी को ‘पापी’ और ‘पाप’ की उपमा दी गयी, तथा वैसे ही ‘पाप’ और उसे करने वाले ‘पापी’ अजीत पवार को धो-पोंछकर पुण्यात्मा बना दिया गया, उसने सिर्फ़ इतना ही साबित किया है कि सत्ता के भूखे भेड़ियों से किसी दीन-ईमान की अपेक्षा रखना बेवकूफ़ी है। बीजेपी और इसके हुक़्मरान बेवकूफ़ तो हो नहीं सकते। उनके पास हरेक ‘पाप’ को ‘पुण्य’ बना देने का वरदान है। दिल्ली में उसकी प्रचंड बहुमत वाली सरकार है। उसे किसी तरह की नैतिकता का डर नहीं सताता क्योंकि वो आज इतनी समर्थ या मज़बूत है कि अपने किसी को सियासी विरोधी को सरे आम पटक-पटककर मार सकती है। कोई क़ानून और यहाँ तक कि जनादेश भी उसका बाल तक बाँका नहीं कर सकते। आज वो सत्ता में है, समर्थ है। इसीलिए उनका आचरण ‘समरथ को नहिं दोष गुसाई’ वाला है।

‘वीर भोग्य वसुन्धरा’

बीजेपी ने ऐसा ही सार्मथ्य जम्मू-कश्मीर, गोवा और कर्नाटक में दिखाया है। सबने देखा है कि बीजेपी ने कितनी तपस्या करके अभी-अभी हरियाणा में सरकार बनायी है। ऐसी ही तपस्याएँ पार्टी ने गोवा, कर्नाटक, अरूणाचल और बिहार जैसे राज्यों में करके दिखाया है। जिन्हें बेहद आदर के साथ बीजेपी के चाणक्य की उपाधि मिली हुई है उन्होंने बारम्बार अपने सामर्थ्य को साबित करके दिखाया है। जो कुछ हुआ वो डंके की चोट पर हुआ, ताल ठोंककर हुआ। चन्द घंटों में नये ‘दोस्त’ का बनाना और फिर उसे टिकाऊ तथा नैतिक जीवन-साथी बना देना, किस चमत्कार से कम है। इसीलिए सक्षम और सामर्थ्यवान बीजेपी में कोई दोष नहीं ढूँढा जा सकता। उसे यदि शिवसेना मझधार में छोड़कर जा सकती है तो अजीत पवार उसके पास आ क्यों नहीं सकते?

जब साज़िशें करके सरकार को समर्थन दिया जा सकता है तो विधायकों के दस्तख़त वाले उस ख़त को राज्यपाल के सामने भी पेश किया जा सकता है, जिस पर उनके ही विधायक दल के नेता ने ये कहकर दस्तख़त करवा लिये कि पार्टी आलाक़मान के निर्देश पर लिये गये इन दस्तख़तों का इस्तेमाल शिवसेना-एनसीपी और काँग्रेस की प्रस्तावित साझा सरकार के लिए लिये जा रहे हैं। दस्तख़त पाते ही विधायक दल के नेता ने जो ‘कवरिंग लेटर’ तैयार किया उसमें बीजेपी को समर्थन की बात लिख दी और कुछेक घंटों के भीतर ही उपमुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले ली गयी।

सारी साज़िश को इतने आनन-फ़ानन और गुपचुप तरीके से अंज़ाम दिया गया कि पता ही नहीं चला कि कैसे चुटकियों में फड़नवीस के दावों की जाँच भी हो गयी और केन्द्रीय कैबिनेट की मंज़ूरी के बग़ैर राष्ट्रपति शासन को भी हटा दिया गया। ज़ाहिर है, महीनों के काम को चुटकियों में कर दिखाना ही तो परमवीर चक्र पाने लायक वीरता है। इसी वीरता और पराक्रम को तो बीजेपी ने साबित करके दिखाया है। लिहाज़ा, इस बीजेपी रूपी वीर को महाराष्ट्र रूपी वसुन्धरा को भोगने का अधिकार मिलना स्वाभाविक था। अब इससे यदि किसी की छाती पर भी साँप लोटता हो, तो लोटता रहे। कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

कर्नाटक और गोवा में जिन विधायकों ने येदुरप्पा को विश्वास मत नहीं जीतने दिया, उन्हें ही बीजेपी ने अलग-अलग ‘सेटिंग्स’ से जीतकर दिखा दिया। काँग्रेस और जेडीएस में बैठे जन्म-जन्म के पापियों को धो-पोंछकर उन्हें बीजेपी में लाया गया। विधायकी गयी तो क्या हुआ, फिर से टिकट देकर चुनावी मैदान में तो उतार दिया गया है ना! किसी ने भी बीजेपी और दलबदलुओं का क्या बिगाड़ लिया? ऐसी ही विजय पताका हरियाणा, गोवा और जम्मू-कश्मीर में भी फ़हरायी गयी तो किसी ने बीजेपी का क्या हिला लिया? ऐसी ही मिसालों से, ऐसे ही स्वर्ण पदकों से बीजेपी का पिटारा भरा पड़ा है। लिहाज़ा, ‘वीर भोग्य वसुन्धरा’ की सच्चाई बीजेपी पर नहीं तो फिर और किस पर लागू होगी!

‘घर का भेदी लंका ढाहे’

ये मुहावरा उस विभीषण के लिए बना था, जिसने राम को ये बताया था कि रावण का नाभि में अमृत है। तब राम ने रावण की नाभि पर ऐसा बाण मारा कि वो अमरत्व के गुण वाले अमृत के जल जाने का चमत्कार हो गया। विभीषण जैसा काम ही अजीत पवार ने किया और पुरस्कार स्वरूप उसे लंका के राजतिलक के रूप में न सिर्फ़ उपमुख्यमंत्री का पद मिला, बल्कि उसके असंख्य भ्रष्टाचार रूपी पापों ऐसे पापों से भी मुक्ति मिल गयी, जिसकी वजह से उनका हाल चिदम्बरम जैसा होने से बच गया। बेचारे ने अपनी जान बचाने के लिए यदि गुरु तुल्य चाचा शरद पवार की पीठ में छुरा भोंकने का काम किया तो कौन सा अनर्थ कर दिया! बेचारे अजीत को क्या प्राणरक्षा का नैसर्गिक अधिकार नहीं होना चाहिए!

शिवसेना ने चुनाव बीजेपी के साथ मिलकर लड़ा और जनादेश को धोखा दे दिया तो पतित नहीं हुई, लेकिन यदि अजीत पवार ने शिवसेना का अनुशरण करके काँग्रेस-एनसीपी को मिले जनादेश से धोखा किया तो ये पतित हो गया? ये क्या बात हुई? दोनों के लिए नैतिकता और राजनीतिक सुचिता के लिए अलग-अलग पैमाना कैसे हो सकता है? ‘तुम करो तो रासलीला हम करें तो करेक्टर ढीला’, ये कैसे चलेगा? अरे! ज़्यादा पुरानी बात थोड़े ही है कि कर्नाटक में काँग्रेस के ख़िलाफ़ लड़ी जेडीएस ने चुनाव के बाद उसी के साथ मिलकर सरकार बनायी थी, तो फिर यदि वहाँ येदियुरप्पा ने विधायकों की बोली लगवाकर उन्हें ख़रीद लिया तो ग़ुनाह कैसे हो गया? इसलिए अजीत पवार ‘घर का भेदी लंका ढाहे’ वाले हैं तो हैं। वो इस डीएनए के कोई पहले राजनेता तो हैं नहीं। कभी गुरु चाचा ने भी तो ऐसी ही मिसालें क़ायम की थीं। क्या इसके बाद में बहन सुप्रिया सुले में पहले कभी ये कहा था कि ‘पार्टी टूटी, परिवार टूटा, फिर किस पर भरोसा करें!’ यदि उन्होंने अब तक कभी पिता को नहीं धिक्कारा तो अब चचेरे भाई का धिक्कारना कितना मुनासिब है?

‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’

कोई भी राज्यपाल हो, उसे हमेशा से केन्द्र सरकार की लाठी बनकर ही रहना पड़ता है। काँग्रेस और अन्य ग़ैर-काँग्रेसी सत्ताओं में भी राज्यपाल की सच्चाई हमेशा ऐसी ही रही है। तो बेचारे भगत सिंह कोश्यारी का क्या कोसना? दिल्ली ने उन्हें मुम्बई भेजा ही था अपनी लाठी बनाकर। इसी दिन के लिए राज्यपाल रूपी लाठी को तेल पिलाया जाता है। लिहाज़ा, यदि राज्यपाल रूपी लाठी की बदौलत दिल्ली रूपी बीजेपी महाराष्ट्र रूपी भैंस को हाँककर ले गयी तो कोई सी अनहोनी हो गयी? यदि ये लोकतंत्र के लिए एक और काला दिन है तो काँग्रेस के इतिहास में क्या काले पन्नों की भरमार नहीं रही है?

लिहाज़ा, जब तक राज्यपालों पर संविधान के मौजूदा प्रावधान ही लागू होते रहेंगे, तब तक उन्हें केन्द्र की लाठी बनने से कोई नहीं बचा सकता। अब विपक्ष में है हिम्मत तो वो ऐलान करे कि वो जब भी सत्ता की सत्ता में आएगी तब राज्यपाल की शक्तियों को तय करने वाले अनुच्छेद 164 और किसी भी राज्य की सरकार को भंग करके वहाँ राष्ट्रपति शासन लगाने वाले अनुच्छेद 356 को वैसे ही ख़त्म करके दिखाएगी, जैसे बीजेपी हमेशा कहती रही है कि वो सत्ता में आएगी तो 370 ख़त्म करके, राम मन्दिर को बनवाकर और समान नागरिक संहिता को लागू करके दिखाएगी। और, वक़्त आने पर उसने करके दिखा भी दिया। बाक़ी जिसको जो कहना है सो कहता रहे। सच्चाई सबके सामने है।

‘सैय्याँ भये कोतवाल अब डर काहे का’

बीजेपी को इस बात का इत्मिनान क्यों नहीं होना चाहिए कि लोकतंत्र के सैय्याँ यानी संसद उसकी मुट्ठी में है। उसकी अकाट्य दलीलों और उसके शानदार वकीलों की वजह से सुप्रीम कोर्ट से भी वैसे ही फ़ैसले बाहर आते हैं जैसा वो चाहती है! चुनाव आयोग भी वैसी ही भाषा बोलता है, जैसे उससे कहा जाता है। यानी, जब सारे कोतवाल अपने हों, तो फिर डर का सवाल ही क्यों उठना चाहिए। जो करना है खुलकर करो, बिन्दास करो! बीजेपी ने महाराष्ट्र में वही तो किया है। क्या देवेन्द्र फड़नवीस ये रट नहीं लगाये हुए थे कि सरकार तो बीजेपी की ही बनेगी और वही मुख्यमंत्री बनेंगे? क्या वो सच्चे साबित नहीं हुए? बाक़ी काँग्रेस या अन्य विपक्षी पार्टियों ने क्या कभी विपक्ष को सन्तुष्ट करके राजनीति की थी जो अब बीजेपी भी वैसा करने के लिए अभिशप्त हो? लिहाज़ा, बोलने दीजिए, जिसको जो बोलना है। महाराष्ट्र में एक स्थिर सरकार बन चुकी है। अब विकास होगा। बेरोज़गारी पर भी सर्ज़िकल स्ट्राइक होगा। आर्थिक मन्दी के ख़ौफ़नाक़ बादल भी फड़नवीस को देख अपना रास्ता बदल लेंगे।

‘जैसी करनी वैसी भरनी’

शरद पवार के अपनी राजनीतिक खोपड़ी पर बड़ा ग़ुमान था। अब भी है। उन्हें लगता है कि भतीजा तो दग़ाबाज़ निकल गया लेकिन जिन्हें उन्होंने कार्यकर्ताओं से उठाकर नेता और विधायक बनवा दिया वो अहसान-फ़रामोशी नहीं करेंगे। ईश्वर उनकी मुराद पूरी करे तो हमें क्या ऐतराज़ हो सकता है लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जैसे पैंतरे वो सोनिया गाँधी और उद्धव ठाकरे से खेल रहे थे जो जिस चतुराई से नरेन्द्र मोदी से मिलने चले गये थे, उसकी अंज़ाम तो ऐसा होना ही था। इस जन्म के कर्मों का फल तो सबको इसी जन्म में भोगना पड़ता है। पुनर्जन्म की सारी धारणाएँ मिथ्या हैं, फ़रेब हैं। जब उन्होंने उद्धव को उकसाकर बीजेपी के लिए गड्ढा खोदा था, तब क्यों नहीं सोचा कि बेरहम वक़्त कहीं उन्हें ही इस गड्ढे में ना फेंक दे। लिहाज़ा, होनी को अनहोनी बताने से कर्मों का फल छिपने वाला नहीं है।

‘अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत’

काँग्रेस कितने झटके खाकर सम्भलेगी? इस यक्ष प्रश्न का उत्तर तो शायद विधाता के पास भी ना हो। कहने को तो उसके पास राजनीति के एक से एक चाणक्य हैं। लेकिन सभी एक ज़माने से ‘आउट ऑफ़ फ़ॉर्म’ ही चल रहे हैं। बेचारे बार-बार रन-आउट ही हो रहे हैं। राहुल से पहले भी और राहुल के बाद भी। काँग्रेस अपने नये मौकापरस्त साथियों को भी इतना नहीं समझा सकी कि साज़िश को ख़ामोशी या गुपचुप तरीके से ही किया जाना चाहिए। रोज़ाना, तरह-तरह की बयानबाज़ी की झड़ी लगाने की क्या ज़रूरत थी? उसे ये गुण बीजेपी से सीखना चाहिए। अजीत पवार कब उसकी गोदी में बैठने को तैयार हो गये, इसकी हवा तक नहीं लगी एनसीपी और काँग्रेस के रणनीतिकारों को। हरियाणा में काँग्रेस की ख़रीद-फ़रोख़्त से पहले ही बीजेपी ने चौटाला को हथिया लिया। हरियाणा पर हुड्डा की पकड़ के बारे में काँग्रेस को तब समझ में आया, जब तक कि कांडा कांड कर चुका था? अगले पाँच साल तक गोपाल कांडा राज्य का सबसे धर्मात्मा राजनेता बना रहेगा। देख लीजिएगा। उसके पापों की भी धुलाई हो चुकी है। इससे पहले गोवा में भी काँग्रेस जब तक नींद से जागकर अंगड़ाई लेते हुए अखाड़े में पहुँची तक ‘चिड़िया चुग गयी खेत’ हो चुका था। उत्तराखंड में भी विजय बहुगुणा कब काँग्रेस के हाथ से जा फिसले, इसकी पार्टी आलाकमान को भनक तक नहीं लगी थी? यही हाल अरूणाचल में भी हुआ। लेकिन कभी लगा नहीं कि काँग्रेस अपने अनुभवों से कुछ नया सीखने को तैयार है। ज़ाहिर है, काँग्रेस को ‘अब पछताये होत क्या’ वाली दशा से बाहर निकलकर दिखाना होगा।

‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाये’

शिवसेना ने आम खाने का काम कब किया? ये किसी को पता नहीं। सबने ये तो देखा कि वो चुनाव में बीजेपी के साथ गठबन्धन करके उतरी थी। उसके गठबन्धन को ही बहुमत भी मिला। लेकिन वो कभी इस वादे का सबूत नहीं पेश कर सकी कि बीजेपी ने 50-50 का वादा कब किया था? यदि ये मान भी लें कि शिवसेना सच बोल रही है तो ये कैसे माने हैं कि वो सच ही है। कोई सबूत, गवाह या चश्मदीद है क्या? कोई ऑडियो है क्या? क्या बीजेपी से अलग होने से पहले शिवसेना को ये नहीं मालूम था कि वो सत्ता के शानदार सौदागर बन चुके हैं। क्या शिवसेना जानती नहीं थी कि बीजेपी को हर मनपसन्द चीज़ की मुँह-माँगी कीमत चुकाने आता है? उसके पास साम-दाम-भेद-दंड के सभी ब्रह्मास्त्र मौजूद हैं। ये कैसे मुमकिन है कि बीजेपी के सामने परोसी गयी जनादेश की थाली के ऐन-वक़्त पर पीछे ख़ींच लेंगे और वो चोट खायी नागिन जैसा व्यवहार नहीं करेगी? यदि ‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाये’ वाली बात पहले कभी नहीं हुई तो अब भला कैसे हो जाएगी? शिवसेना ये कैसे भूल गयी कि बीजेपी ने कैसे सत्ता की ख़ातिर उस नीतीश से यारी कर ली, जिससे ख़िलाफ़ वो चुनाव लड़कर हार चुकी थी? इतना ही नहीं, जब महबूबा की पीठ में छुरा भोंका जा रहा था, तब क्या शिवसेना उसके साथ नहीं खड़ी थी। अरे! यदि वो महबूबा के साथ दग़ाबाज़ी कर सकते हैं, तो तुम्हें क्यों छोड़ देंगे? अब यदि बीजेपी की किस्मत ने साथ दिया और वो तमाम तिगड़में करके विश्वास मत प्राप्त कर लेती है तो जल्द ही शिवसेना मुक्त महाराष्ट्र की जंग छेड़ देगी, तब देखते हैं कि शिवसैनिक कैसे बाल ठाकरे की विरासत को बचाते हैं!

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राहुल गांधी वापस संभालेंगे कांग्रेस की कमान?

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नई दिल्ली/वायनाड (केरल), 6 दिसम्बर | पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी वापस पार्टी की कमान संभालने वाले हैं। इस बात की संभावना है कि अगले साल के आरंभ में दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद वह दोबारा पार्टी की कमान संभालें। कांग्रेस महासचिव के. सी. वेणुगोपाल का कहना है कि देश अब ज्यादा चाहने लगा है कि वह नेतृत्व की भूमिका में हों।

राहुल गांधी के साथ केरल स्थित उनके संसदीय क्षेत्र वायनाड गए वेणुगोपाल ने संवाददाताओं से कहा, “देश नाजुक दौर से गुजर रहा है। पार्टी को उनके नेतृत्व की जरूरत है और पार्टी के कार्यकर्ताओं की ओर से उनकी वापसी की मांग उठने लगी है। हमें उम्मीद है कि वह उनकी बात सुनेंगे।”

अगले कुछ महीनों में कांग्रेस का अधिवेशन होने वाला है जिसमें पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी की नियुक्ति को मंजूरी प्रदान की जाएगी।

एक सूत्र ने बताया कि उस सम्मेलन में राहुल गांधी की वापसी को लेकर आवाज उठेगी क्योंकि पार्टी के युवा नेताओं ने इसकी योजना बनाई है।

पार्टी संगठन में राहुल गांधी को प्रोन्नति करने की मांग पहली बार अखिल भारतीय कांग्रेस कमेर्टी के हैदराबाद अधिवेशन में 2006 में उठी थी जहां उत्तर प्रदेश के पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनके पक्ष में नारे बुलंद किए थे और 2007 में उनको पार्टी का महासचिव बनाया गया। उसके बाद उनको उपाध्यक्ष बनाने की मांग 2013 में जयपुर अधिवेशन में उठी।

पार्टी के विभिन्न वर्गो की मांग के बाद राहुल गांधी 2017 में निर्विरोध कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित हुए, लेकिन 2019 के आम चुनाव में उनके नेतृत्व में पार्टी का प्रदर्शन खराब रहने के कारण उन्होंने उसकी जिम्मेदारी लेते हुए मई में इस्तीफा दे दिया। पार्टी की ओर से उनसे दोबारा विचार करने का आग्रह बार-बार किए जाने के बाद भी वह नहीं माने। इसके बाद अगस्त में सोनिया गांधी को पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

राहुल गांधी भले ही पार्टी के प्रमुख न हों लेकिन उनका फैसला पार्टी का फैसला होता है जैसाकि शिव सेना-कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस गठबंधन नीत महाराष्ट्र सरकार में नितिन राउत की मंत्री के रूप में नियुक्ति और नाना पटोले के विधानसभाध्यक्ष बनने से जाहिर होता है।

सूत्र ने बताया कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन स्थल को लेकर पार्टी अंतिम फैसला लेने वाली है जोकि कांग्रेस शासति मध्यप्रदेश या राजस्थान में जनवरी व फरवरी में होने वाली है।

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आख़िर कोई दास्तान-ए-प्याज़ बताता क्यों नहीं?

सरकार कभी अफ़ग़ानिस्तान से तो कभी मिस्र से प्याज़ के आयात का भारी-भरकम आँकड़ा देकर कहती है कि ‘देश में तो सब ठीक है’। प्याज़ का दाम न तो कोई राष्ट्रीय समस्या है और ना ही कोई प्राकृतिक आपदा। हरेक दो-तीन साल पर प्याज़ ऐसे ही और लाल हो उठता रहा है, तो प्याज़ के भाव घटने के बजाय बढ़ क्यों रहा है?

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प्याज़ के दाम को लेकर देशभर में हाहाकार है। इसे शतक-वीर कहा जा रहा है क्योंकि इसका दाम 100 रुपये प्रति किलोग्राम को पार कर चुका है। सरकार कहती है कि मौसम की मार की वजह से प्याज़ का उत्पादन क़रीब 28-29 फ़ीसदी गिरा है। लेकिन कोई ये बताने वाला नहीं है कि 30 प्रतिशत पैदावार घटने से दाम सामान्य के मुक़ाबले चार से पाँच गुना यानी 400 से 500 फ़ीसदी तक क्यों बढ़ गये? क्या उत्पादन में आयी गिरावट को देखते हुए जनता ने ज़्यादा प्याज़ खाना शुरू कर दिया, वो भी इतना ज़्यादा कि दाम बढ़ने के बावजूद ख़पत भी बेतहाशा बढ़ने लगे? वर्ना, दाम बढ़ने पर तो ख़पत घटनी चाहिए। वो बढ़ कैसे सकती है?

प्याज़ के दाम में ऐसी आग भी तब लगती है जब अर्थव्यवस्था की विकास दर के औधें मुँह गिरने का सिलसिला सालों-साल से जारी है। विकास दर गिरने का मतलब है — देश के सकल घरेलू उत्पादन में गिरावट। इसका स्वाभाविक असर होता है — जनता की औसत आमदनी में कमी। यानी, आम आदमी की आमदनी घट रही है, बेरोज़गारी बढ़ती ही जा रही है, तो फिर वो लोग कौन और कितने हैं जो आसमान छूती क़ीमतों के बावजूद प्याज़ पर टूटे पड़े हैं? प्याज़ को लेकर सीधा और छोटा सा सवाल सिर्फ़ इतना ही है। लेकिन सही जबाब नदारद है।

सरकार कभी अफ़ग़ानिस्तान से तो कभी मिस्र से प्याज़ के आयात का भारी-भरकम आँकड़ा देकर कहती है कि ‘देश में तो सब ठीक है’। सारा क़सूर विश्व बाज़ार की तेज़ी का है। ज़रूर होगा। सरकार भला क्यों झूठ बोलेगी? वो तो अब बस इतना बता दे कि क्या भारतीय जनता उस दौर में भी बेहद महँगे प्याज़ की बेतहाशा ख़पत कर रही है, जब उसका दाम आसमान छू रहा हो? बेशक़, प्याज़ का दाम न तो कोई राष्ट्रीय समस्या है और ना ही कोई प्राकृतिक आपदा। हरेक दो-तीन साल पर प्याज़ ऐसे ही और लाल हो उठता रहा है। पिछली सरकारों ने भी प्याज़ पर कोई कम आँसू तो बहाये नहीं। लिहाज़ा, सवाल फिर वही है कि यदि प्याज़ की राष्ट्रीय किल्लत है तो आँसुओं की सकल मात्रा घटने के बजाय बढ़ क्यों रही है?

अरे! जब प्याज़ ही कम होगा तो इसे छीला-काटा भी कम ही जाएगा। कम प्याज़ कटेंगे तो इसके काटने पर बहने वाले आँसुओं की मात्रा भी तो घटनी चाहिए या नहीं? बहरहाल, प्याज़ की किल्लत जितनी भी सच्ची या झूठी हो, लेकिन इसे लेकर होने वाली बातों में कहीं कोई कंजूसी नहीं है। हर कोई प्याज़-मर्मज्ञ बना फिरता है। आपने ज़रा सा ज़िक्र छेड़ा नहीं कि सामने वाला फ़ौरन शुरू हो जाएगा। देखते ही देखते अपनी बातों से आपको छलनी कर देगा। इसकी वजह बहुत सीधी है। लोकतंत्र में जनता अपनी सरकार के दिखाये रास्ते पर चलती है। सरकार भी ज़मीन पर कुछ करे या ना करे, बातें करने में कभी कंजूसी नहीं करती। दरअसल, ये दौर ही बातों का है। बातें करना ही असली काम है। कमर्ठता की निशानी है।

ये लेख भी तो बातें ही कर रहा है। इससे न तो प्याज़ का उत्पादन होगा और ना आयात। दाम भी कम होने से रहा। सरकार भी जागने से रही। फिर भी बातें करने का धर्म तो निभाना ही होगा। कोई अपना धर्म कैसे छोड़ सकता है भला? कुत्ते का धर्म है भौंकना, साँप का धर्म है डसना, मच्छर का धर्म है ख़ून चूसना। ऐसे ही क़ुदरत ने हर चीज़ का एक धर्म तय कर रखा है। सभी अपने-अपने धर्म का पालन करना होता है। इसीलिए जितनी बातें प्याज़ की कमी की होती है, उतनी ही इसके आयात की भी होती है। कमोबेश वैसे ही जैसे 2016-17 में दालों के आयात की अनन्त बातें हुआ करती थीं।

ज़रा उस दौर को याद करें। क्या तब सरकार ने आयात की धमकी देकर या वास्तव में दालों के आयात करके इसकी किल्लत को दूर करने और दाम को काबू में लाने की कोशिश नहीं की थी? बेशक़ की थी। सरकार कार्रवाई नहीं करती तो क्या दालें 500 रुपये प्रति किलोग्राम के दाम से नहीं बिकती? तब भी तो खाद्य आपूर्ति मंत्री की ओर से जनता को मीठी गोली दी जाती थी कि ‘दालों का ऐसा आयात किया जा रहा है, मानों सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त होकर ही मानेंगे।’ बातें ख़ूब हुईं इसीलिए दाल के दाम तभी नरम पड़े जब किसानों ने बम्पर पैदाकर करके दिखाया। हालाँकि, ज़्यादा दलहन उत्पादन के बावजूद अभागे किसानों की दुर्दशा बनी ही रही, क्योंकि उनके मुनाफ़े को बिचौलियों, आढ़तियों और सूदख़ोरों की मिलीभगत ने हड़प लिया।

कालाबाज़ारियों और मिलावटख़ोरों की तब भी पौ-बारह थी और आज भी है। इनके लिए कमी दालें बहार का सबब बनती हैं तो कभी आलू-प्याज़ और टमाटर जैसी चीज़ों के दाम। केन्द्र की हो या राज्यों की, इस पार्टी की हो या उस पार्टी की, कोई भी कालाबाज़ारियों का बाल तक बाँका नहीं कर पाता। आयात करने वाली सरकारी कम्पनियों को तभी नींद से जगाया जाता है, जब चिड़ियाँ खेतों को चुग कर फ़ुर्र हो चुकी होती हैं। सौ दिन चले अढ़ाई कोस के संस्कारों में ढली सरकारी कम्पनियाँ क़ीमतों को नीचे लाने के लिए यदि एक लाख टन सामान की ज़रूरत होगी तो हज़ार टन का आयात करते-करते हाँफ़ने लगती हैं।

अब ज़रा ये समझिए कि ऐसी तमाम बातें कितनी बनावटी होती हैं? सरकार के पास एक से बढ़कर एक एक्सपर्ट यानी विशेषज्ञ होते हैं, जो वक़्त रहते आगाह करते हैं कि अति-वृष्टि यानी अत्यधिक बारिश की वजह से किसानों की किन-किन फ़सल को कैसा-कैसा नुकसान होने वाला है। इसी बुरी ख़बर से कालाबाज़ारियों में ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है। ज़माख़ोर तैयार होकर शिकार पर निकल पड़ते हैं। सरकारी बाबुओं को भी रिश्वतख़ोरी और मक्कारी की ख़ुराक़ मिल जाती है। छापेबाज़ी का ढोंग किया जाता है। तरह-तरह की झूठी ख़बरें ‘प्लांट’ होती हैं। इससे जनता को बहकाया और बरगलाया जाता है।

वर्ना, ज़रा सोचिए कि यदि हम भारत में 80 प्रतिशत ईंधन की आपूर्ति आयातित कच्चे तेल से हमेशा कर सकते हैं कि तो वक़्त रहते प्याज़ का आयात करके क़ीमतों पर नकेल क्यों नहीं कस पाते? क्या सिर्फ़ इसलिए कि कच्चे तेल का आयात हमारी बड़ी प्राथमिकता है, क्योंकि यही केन्द्र और राज्य सरकारों की आमदनी यानी टैक्स-संग्रह का सबसे बड़ा ज़रिया है। दूसरे शब्दों में कहें तो कच्चे तेल के आयात में यदि कोताही होगी तो ये सरकार को बहुत ज़्यादा भारी पड़ेगा। उसके कर्मचारियों को तनख़्वाह के लाले पड़ने लगेंगे। सरकारी ठाठ-बाट और शान-ओ-शौक़त पर आँच आएगी। दूसरी ओर प्याज़-टमाटर, खाद्य तेल और दालों की क़ीमतों के चढ़ने-उतरने से सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उल्टा उसके चहेते ज़माख़ोरों में हर्ष और उल्लास की लहर दौड़ने लगेगी। तभी तो ‘अच्छे दिन’ का मज़ा मिलेगा।

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किन पंच-तत्वों पर निर्भर रहेगी महाराष्ट्र के महा-प्रयोग की तक़दीर?

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Maharashtra Govt Collision

राजनीति को ‘अनन्त सम्भावनाओं का खेल’ कहा गया है। इसमें कोई भी अछूत नहीं होता। राजनीति का सत्ता और कुर्सी के पीछे भागना अनिवार्य है। राजनीतिक विचारधाराएँ सिर्फ़ मुखौटा होती हैं। विजेता ही नैतिकता को परिभाषित करता है। नहीं जीतने वाले अंगूरों को खट्टा बताते रहते हैं। राजनीति में खाने और दिखाने के दाँत हमेशा अलग ही होते हैं। राजनीति में किसी की भी कथनी और करनी हमेशा एक जैसी नहीं होती। गठबन्धन को राजनीति का प्रमुख वाद्ययंत्र कह सकते हैं। इसके साज़िदें बेमेल सुरों के तालमेल से सुरीलापन विकसित करते हैं। इसीलिए यक्ष-प्रश्न ये है कि महाराष्ट्र में सियासी सुरीलेपन की अभी जो तरंगें उभरी हैं, वो कैसे सुहानी रह पाएँगी?

चुनाव पूर्व गठबन्धन जहाँ प्रतिद्वन्दियों की ताक़त का अन्दाजा लगाकर बनते हैं, वहीं चुनाव बाद वाले गठबन्धन ‘जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी’ के उसूल से चलती है। गठबन्धन की बुनियाद परस्पर मान-सम्मान, सह-अस्तित्व, साफ़-सुथरा लेन-देन या हिसाब-क़िताब तथा भूल-चूक लेनी-देनी के उसूलों से चलता है। गठबन्धन तभी तक टिकाऊ रहता है जब तक कि एक-साथ हुए राजनीतिक दल अपनी-अपनी थालियों में खाकर सन्तुष्ट रहते हैं। जैसे ही दूसरे की थाली में हाथ मारने की कोशिशें होती हैं, वैसे ही गठबन्धन टूटने लगता है। गठबन्धन की समन्वय समिति ही उसे रस्सी की तरह बाँधे रखती है। ये ‘थर्ड अम्पायर या वीडियो रेफ़री’ की तरह होते हैं। इनके निष्पक्ष रहने तक ही गठबन्धन का मैच चलता है।

राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले सुधी पाठक उपरोक्त नियमों को खेल के मैदान की सीमा-रेखाओं या लक्ष्मण-रेखाओं की तरह भी देख सकते हैं। इन्हीं सरहदें अथवा चुनौतियों से तय होगा कि मुम्बई में उद्धव ठाकरे की अगुवाई में बनी महाविकास अघाड़ी सरकार कितनी टिकाऊ और सुरीली होगी? महाराष्ट्र का महा-प्रयोग अब निम्न पंच-तत्वों पर ही निर्भर रहेगा। इसे परीक्षा के उस प्रश्न-पत्र की तरह देखा जा सकता है, जिसमें सबसे ऊपर निर्देश लिखा है कि ‘प्रश्न संख्या एक अनिवार्य है!’

उदार बनाम कट्टर हिन्दुत्व

भारतीय राजनीति में हिन्दुत्व का अंश हमेशा रहा है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि गाँधी के अनुयायी उदार वाले रास्ते पर चले और संघ के खिलाड़ियों ने कट्टर की राह थामी। एक पर अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के आरोप लगे तो दूसरे पर बहुसंख्यकों को उकसाने के। एनसीपी और काँग्रेस की छवि जहाँ नरम हिन्दुत्व वाली है, वहीं शिवसेना की पहचान आक्रामक हिन्दुत्व वाली रही है। शिवसैनिकों के लिए विनम्र बनना भले ही बहुत मुश्किल हो, लेकिन सरकार चलानी है तो अपने तेवरों से समझौता करना ही होगा।

उद्धव का अयोध्या दौरा रद्द करना ये बताता है कि वो लचीलेपन के लिए राज़ी हैं। शिवसैनिकों को अब परप्रान्तीयों को आड़े हाथों लेने के अपने अन्दाज़ से भी परहेज़ करना होगा। गोडसे को देशभक्त बताने पर बीजेपी जैसी सख़्ती से अपनी सांसद प्रज्ञा ठाकुर के साथ पेश आयी है, उसे देखते हुए सावरकर को भारत-रत्न देने के अपने नज़रिये से शिवसेना को भी तौबा करना होगा। नाटक-फ़िल्म का हिंसक विरोध करने के पुराने रवैये से बचना होगा। क्रिकेट मैच से पहले पिच खोदने वाले आदतें छोड़नी होंगी। शिवसेना में यदि ऐसे बदलाव दिखे तभी महाविकास अघाड़ी की सरकार पाँच साल चल जाएगी।

तोड़-फोड़ से बचाव का कवच

तीनों दलों को अपने-अपने घरों को दलबदलुओं की सेंधमारी से बचाना होगा। काँग्रेस-एनसीपी को कर्नाटक, गोवा, बिहार, अरूणाचल, मेघालय, मिज़ोरम, उत्तराखंड जैसे राज्यों से मिले सबक को गाँठ बाँधकर रखना होगा। बीजेपी के मुँह में नरभक्षी का ख़ून लगा हुआ है। वो तोड़-फोड़ करके महाविकास अघाड़ी की गाड़ी को पंचर करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ने वाली, लिहाज़ा तीनों दलों को अपने असन्तुष्टों को साधने के लिए पुख़्ता कवच विकसित करना होगा। इस लिहाज़ से तीनों दलों को ही एक-दूसरे पर निगरानी रखते हुए उनकी मदद के लिए तत्पर रहना होगा। शिवसेना के लिए भी ये बेहतर होगा कि पवार परिवार की तर्ज़ पर वक़्त रहते राज ठाकरे से सुलह-सफ़ाई करके अपने परिवारिक क़िले को मज़बूत बना ले। वर्ना, परिवारिक घाव उसे बहुत भारी पड़ सकता है।

ताल-मेल की तकनीक

सरकार चलाने का असली मंत्र परस्पर ताल-मेल ही होगा। इसके कई रूप हैं। नीतियों के लिए तो ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ बन गया, लेकिन जब तक ‘मुख्यमंत्री का फ़ैसला अन्तिम’ वाला नियम चलेगा तभी तक सरकार बग़ैर खटपट के चल पाएगी। मुख्यमंत्री को भी सहयोगियों को उनकी राजनीति के लिए पर्याप्त जगह छोड़नी होगी। जल्द ही ये ऐलान भी ज़रूरी है कि क्या शिवसेना, अब यूपीए का हिस्सा बन चुकी है? यदि हाँ, तो फिर भविष्य के चुनावों में उतरने के लिए महाविकास अघाड़ी का फ़ॉर्मूला क्या होगा? तीनों दलों के नेताओं का दावा भले ही ये हो कि सरकार के फ़ैसले आमसहमति से लिये जाएँगे, लेकिन रोज़मर्रा में यही असली अग्नि-परीक्षा होगी। अघाड़ी में उद्धव जैसे नौसिखिए को सीखना होगा कि वो अनुभवी मुख्यमंत्रियों पृथ्वीराज चाव्हाण, अशोक चाव्हाण, शरद पवार, सुशील कुमार शिन्दे जैसों को कैसे साध पाएँगे? अन्य नेताओं की महत्वाकांक्षों को काबू में रखना भी तलवार की धार पर चलने जैसा होगा।

केन्द्र से सम्बन्ध

मौजूदा केन्द्र सरकार के पास अपार बहुमत है। उसे इसका अहंकार होना स्वाभाविक है। बीजेपी को विरोधी दलों की सरकारों को अस्थिर करके गिराने का चस्का लग चुका है। चुनाव में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी महाराष्ट्र बीजेपी विपक्ष में शान्ति से नहीं बैठने वाली। वो सरकार की नाक में दम करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ने वाली। केन्द्र सरकार से उसे पूरी शह मिलती रहेगी। ऐसे में महाराष्ट्र और केन्द्र सरकार के सम्बन्धों का हमेशा तल्ख़ रहना तथा राजभवन में सियासी साज़िशों का होना स्वाभाविक है। उद्धव इस चुनौती से अच्छी तरह से वाक़िफ़ हैं। तभी तो उन्होंने ‘मुख्यमंत्री की कुर्सी को नुकीली कीलों से भरपूर’ कहा है। उन्हें अब केन्द्र में अपनी सरकार होने का लाभ नहीं मिलेगा। ‘केन्द्र से रिश्ते की तासीर’ अब बहुत कठिन चुनौती होगी।

चुनावी वादे निभाना

हरेक सरकार अपने चुनावी वादों को ‘पहली प्राथमिकता’ भले ही बताती है, लेकिन व्यवहारिक राजनीति का तकाज़ा इसे ‘आख़िरी प्राथमिकता’ बना देता है। लिहाज़ा, जब तक महाविकास अघाड़ी उपरोक्त चारों प्रश्नों या चुनौतियों के सही-सही समाधान करने में सफल रहेगी, तभी तक इस पाँचवें मुद्दे यानी चुनावी वादों को निभाने की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता निकलता रहेगा। तीन दलों को मिलकर एक-दूसरे के साथ ताल-मेल बिठाकर उन चुनावी मुद्दों को अमली जामा पहनाने की कोशिश करनी होगी जिसे ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ में जगह मिली है। तीनों दलों को बराबर से इस बात के लिए सतर्क रहना होगा कि उन पर भ्रष्टाचार के इतने गम्भीर आरोप नहीं लगें जिनका सामना करना मुश्किल हो जाए। तीनों को ये नहीं भूलना चाहिए कि सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग, हर पल उनके शिकार की फ़िराक़ में क्यों नहीं रहेंगे?

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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