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महाराष्ट्र में मोहरे बने मुहावरे!

सियासी दंगल को देखें तो इनमें से अलग-अलग मुहावरे, अलग-अलग मठाधीशों पर बिल्कुल सटीक ढंग से चस्पाँ होता है। हरेक मुहावरा दंगल के अलग-अलग खिलाड़ियों मसलन, बीजेपी, शिवसेना, एनसीपी और काँग्रेस की मार्कशीट बनकर उभरता है।

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महाराष्ट्र की राजनीति को लेकर अचानक कई मुहावरे दिमाग़ में कौंधने लगे। मसलन, ‘समरथ को नहिं दोष गुसाई’, ‘वीर भोग्य वसुन्धरा’, ‘घर का भेदी लंका ढाहे’, ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’, ‘सैय्याँ भये कोतवाल अब डर काहे का’, ‘जैसी करनी वैसी भरनी’, ‘अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत’, ‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाये’… वगैरह-वगैरह। 24 अक्टूबर से महाराष्ट्र में जारी सियासी दंगल को देखें तो इनमें से अलग-अलग मुहावरे, अलग-अलग मठाधीशों पर बिल्कुल सटीक ढंग से चस्पाँ होता है। हरेक मुहावरा दंगल के अलग-अलग खिलाड़ियों मसलन, बीजेपी, शिवसेना, एनसीपी और काँग्रेस की मार्कशीट बनकर उभरता है।

‘समरथ को नहिं दोष गुसाई’

शिवसेना के गच्चा देने के बाद बीजेपी ने बीते महीने भर में जिस तरह की बेशर्मी दिखायी, जैसे राज्यपाल की संस्था से मनमानी-भरे फ़ैसले करवाये, जैसे राज्यपाल ने केन्द्र सरकार की कठपुतली और एजेंट या दलाल की तरह काम किया, जैसे शिवसेना और उसके ‘कुर्कमों’ यानी वादा-ख़िलाफ़ी को ‘पापी’ और ‘पाप’ की उपमा दी गयी, तथा वैसे ही ‘पाप’ और उसे करने वाले ‘पापी’ अजीत पवार को धो-पोंछकर पुण्यात्मा बना दिया गया, उसने सिर्फ़ इतना ही साबित किया है कि सत्ता के भूखे भेड़ियों से किसी दीन-ईमान की अपेक्षा रखना बेवकूफ़ी है। बीजेपी और इसके हुक़्मरान बेवकूफ़ तो हो नहीं सकते। उनके पास हरेक ‘पाप’ को ‘पुण्य’ बना देने का वरदान है। दिल्ली में उसकी प्रचंड बहुमत वाली सरकार है। उसे किसी तरह की नैतिकता का डर नहीं सताता क्योंकि वो आज इतनी समर्थ या मज़बूत है कि अपने किसी को सियासी विरोधी को सरे आम पटक-पटककर मार सकती है। कोई क़ानून और यहाँ तक कि जनादेश भी उसका बाल तक बाँका नहीं कर सकते। आज वो सत्ता में है, समर्थ है। इसीलिए उनका आचरण ‘समरथ को नहिं दोष गुसाई’ वाला है।

‘वीर भोग्य वसुन्धरा’

बीजेपी ने ऐसा ही सार्मथ्य जम्मू-कश्मीर, गोवा और कर्नाटक में दिखाया है। सबने देखा है कि बीजेपी ने कितनी तपस्या करके अभी-अभी हरियाणा में सरकार बनायी है। ऐसी ही तपस्याएँ पार्टी ने गोवा, कर्नाटक, अरूणाचल और बिहार जैसे राज्यों में करके दिखाया है। जिन्हें बेहद आदर के साथ बीजेपी के चाणक्य की उपाधि मिली हुई है उन्होंने बारम्बार अपने सामर्थ्य को साबित करके दिखाया है। जो कुछ हुआ वो डंके की चोट पर हुआ, ताल ठोंककर हुआ। चन्द घंटों में नये ‘दोस्त’ का बनाना और फिर उसे टिकाऊ तथा नैतिक जीवन-साथी बना देना, किस चमत्कार से कम है। इसीलिए सक्षम और सामर्थ्यवान बीजेपी में कोई दोष नहीं ढूँढा जा सकता। उसे यदि शिवसेना मझधार में छोड़कर जा सकती है तो अजीत पवार उसके पास आ क्यों नहीं सकते?

जब साज़िशें करके सरकार को समर्थन दिया जा सकता है तो विधायकों के दस्तख़त वाले उस ख़त को राज्यपाल के सामने भी पेश किया जा सकता है, जिस पर उनके ही विधायक दल के नेता ने ये कहकर दस्तख़त करवा लिये कि पार्टी आलाक़मान के निर्देश पर लिये गये इन दस्तख़तों का इस्तेमाल शिवसेना-एनसीपी और काँग्रेस की प्रस्तावित साझा सरकार के लिए लिये जा रहे हैं। दस्तख़त पाते ही विधायक दल के नेता ने जो ‘कवरिंग लेटर’ तैयार किया उसमें बीजेपी को समर्थन की बात लिख दी और कुछेक घंटों के भीतर ही उपमुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले ली गयी।

सारी साज़िश को इतने आनन-फ़ानन और गुपचुप तरीके से अंज़ाम दिया गया कि पता ही नहीं चला कि कैसे चुटकियों में फड़नवीस के दावों की जाँच भी हो गयी और केन्द्रीय कैबिनेट की मंज़ूरी के बग़ैर राष्ट्रपति शासन को भी हटा दिया गया। ज़ाहिर है, महीनों के काम को चुटकियों में कर दिखाना ही तो परमवीर चक्र पाने लायक वीरता है। इसी वीरता और पराक्रम को तो बीजेपी ने साबित करके दिखाया है। लिहाज़ा, इस बीजेपी रूपी वीर को महाराष्ट्र रूपी वसुन्धरा को भोगने का अधिकार मिलना स्वाभाविक था। अब इससे यदि किसी की छाती पर भी साँप लोटता हो, तो लोटता रहे। कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

कर्नाटक और गोवा में जिन विधायकों ने येदुरप्पा को विश्वास मत नहीं जीतने दिया, उन्हें ही बीजेपी ने अलग-अलग ‘सेटिंग्स’ से जीतकर दिखा दिया। काँग्रेस और जेडीएस में बैठे जन्म-जन्म के पापियों को धो-पोंछकर उन्हें बीजेपी में लाया गया। विधायकी गयी तो क्या हुआ, फिर से टिकट देकर चुनावी मैदान में तो उतार दिया गया है ना! किसी ने भी बीजेपी और दलबदलुओं का क्या बिगाड़ लिया? ऐसी ही विजय पताका हरियाणा, गोवा और जम्मू-कश्मीर में भी फ़हरायी गयी तो किसी ने बीजेपी का क्या हिला लिया? ऐसी ही मिसालों से, ऐसे ही स्वर्ण पदकों से बीजेपी का पिटारा भरा पड़ा है। लिहाज़ा, ‘वीर भोग्य वसुन्धरा’ की सच्चाई बीजेपी पर नहीं तो फिर और किस पर लागू होगी!

‘घर का भेदी लंका ढाहे’

ये मुहावरा उस विभीषण के लिए बना था, जिसने राम को ये बताया था कि रावण का नाभि में अमृत है। तब राम ने रावण की नाभि पर ऐसा बाण मारा कि वो अमरत्व के गुण वाले अमृत के जल जाने का चमत्कार हो गया। विभीषण जैसा काम ही अजीत पवार ने किया और पुरस्कार स्वरूप उसे लंका के राजतिलक के रूप में न सिर्फ़ उपमुख्यमंत्री का पद मिला, बल्कि उसके असंख्य भ्रष्टाचार रूपी पापों ऐसे पापों से भी मुक्ति मिल गयी, जिसकी वजह से उनका हाल चिदम्बरम जैसा होने से बच गया। बेचारे ने अपनी जान बचाने के लिए यदि गुरु तुल्य चाचा शरद पवार की पीठ में छुरा भोंकने का काम किया तो कौन सा अनर्थ कर दिया! बेचारे अजीत को क्या प्राणरक्षा का नैसर्गिक अधिकार नहीं होना चाहिए!

शिवसेना ने चुनाव बीजेपी के साथ मिलकर लड़ा और जनादेश को धोखा दे दिया तो पतित नहीं हुई, लेकिन यदि अजीत पवार ने शिवसेना का अनुशरण करके काँग्रेस-एनसीपी को मिले जनादेश से धोखा किया तो ये पतित हो गया? ये क्या बात हुई? दोनों के लिए नैतिकता और राजनीतिक सुचिता के लिए अलग-अलग पैमाना कैसे हो सकता है? ‘तुम करो तो रासलीला हम करें तो करेक्टर ढीला’, ये कैसे चलेगा? अरे! ज़्यादा पुरानी बात थोड़े ही है कि कर्नाटक में काँग्रेस के ख़िलाफ़ लड़ी जेडीएस ने चुनाव के बाद उसी के साथ मिलकर सरकार बनायी थी, तो फिर यदि वहाँ येदियुरप्पा ने विधायकों की बोली लगवाकर उन्हें ख़रीद लिया तो ग़ुनाह कैसे हो गया? इसलिए अजीत पवार ‘घर का भेदी लंका ढाहे’ वाले हैं तो हैं। वो इस डीएनए के कोई पहले राजनेता तो हैं नहीं। कभी गुरु चाचा ने भी तो ऐसी ही मिसालें क़ायम की थीं। क्या इसके बाद में बहन सुप्रिया सुले में पहले कभी ये कहा था कि ‘पार्टी टूटी, परिवार टूटा, फिर किस पर भरोसा करें!’ यदि उन्होंने अब तक कभी पिता को नहीं धिक्कारा तो अब चचेरे भाई का धिक्कारना कितना मुनासिब है?

‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’

कोई भी राज्यपाल हो, उसे हमेशा से केन्द्र सरकार की लाठी बनकर ही रहना पड़ता है। काँग्रेस और अन्य ग़ैर-काँग्रेसी सत्ताओं में भी राज्यपाल की सच्चाई हमेशा ऐसी ही रही है। तो बेचारे भगत सिंह कोश्यारी का क्या कोसना? दिल्ली ने उन्हें मुम्बई भेजा ही था अपनी लाठी बनाकर। इसी दिन के लिए राज्यपाल रूपी लाठी को तेल पिलाया जाता है। लिहाज़ा, यदि राज्यपाल रूपी लाठी की बदौलत दिल्ली रूपी बीजेपी महाराष्ट्र रूपी भैंस को हाँककर ले गयी तो कोई सी अनहोनी हो गयी? यदि ये लोकतंत्र के लिए एक और काला दिन है तो काँग्रेस के इतिहास में क्या काले पन्नों की भरमार नहीं रही है?

लिहाज़ा, जब तक राज्यपालों पर संविधान के मौजूदा प्रावधान ही लागू होते रहेंगे, तब तक उन्हें केन्द्र की लाठी बनने से कोई नहीं बचा सकता। अब विपक्ष में है हिम्मत तो वो ऐलान करे कि वो जब भी सत्ता की सत्ता में आएगी तब राज्यपाल की शक्तियों को तय करने वाले अनुच्छेद 164 और किसी भी राज्य की सरकार को भंग करके वहाँ राष्ट्रपति शासन लगाने वाले अनुच्छेद 356 को वैसे ही ख़त्म करके दिखाएगी, जैसे बीजेपी हमेशा कहती रही है कि वो सत्ता में आएगी तो 370 ख़त्म करके, राम मन्दिर को बनवाकर और समान नागरिक संहिता को लागू करके दिखाएगी। और, वक़्त आने पर उसने करके दिखा भी दिया। बाक़ी जिसको जो कहना है सो कहता रहे। सच्चाई सबके सामने है।

‘सैय्याँ भये कोतवाल अब डर काहे का’

बीजेपी को इस बात का इत्मिनान क्यों नहीं होना चाहिए कि लोकतंत्र के सैय्याँ यानी संसद उसकी मुट्ठी में है। उसकी अकाट्य दलीलों और उसके शानदार वकीलों की वजह से सुप्रीम कोर्ट से भी वैसे ही फ़ैसले बाहर आते हैं जैसा वो चाहती है! चुनाव आयोग भी वैसी ही भाषा बोलता है, जैसे उससे कहा जाता है। यानी, जब सारे कोतवाल अपने हों, तो फिर डर का सवाल ही क्यों उठना चाहिए। जो करना है खुलकर करो, बिन्दास करो! बीजेपी ने महाराष्ट्र में वही तो किया है। क्या देवेन्द्र फड़नवीस ये रट नहीं लगाये हुए थे कि सरकार तो बीजेपी की ही बनेगी और वही मुख्यमंत्री बनेंगे? क्या वो सच्चे साबित नहीं हुए? बाक़ी काँग्रेस या अन्य विपक्षी पार्टियों ने क्या कभी विपक्ष को सन्तुष्ट करके राजनीति की थी जो अब बीजेपी भी वैसा करने के लिए अभिशप्त हो? लिहाज़ा, बोलने दीजिए, जिसको जो बोलना है। महाराष्ट्र में एक स्थिर सरकार बन चुकी है। अब विकास होगा। बेरोज़गारी पर भी सर्ज़िकल स्ट्राइक होगा। आर्थिक मन्दी के ख़ौफ़नाक़ बादल भी फड़नवीस को देख अपना रास्ता बदल लेंगे।

‘जैसी करनी वैसी भरनी’

शरद पवार के अपनी राजनीतिक खोपड़ी पर बड़ा ग़ुमान था। अब भी है। उन्हें लगता है कि भतीजा तो दग़ाबाज़ निकल गया लेकिन जिन्हें उन्होंने कार्यकर्ताओं से उठाकर नेता और विधायक बनवा दिया वो अहसान-फ़रामोशी नहीं करेंगे। ईश्वर उनकी मुराद पूरी करे तो हमें क्या ऐतराज़ हो सकता है लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जैसे पैंतरे वो सोनिया गाँधी और उद्धव ठाकरे से खेल रहे थे जो जिस चतुराई से नरेन्द्र मोदी से मिलने चले गये थे, उसकी अंज़ाम तो ऐसा होना ही था। इस जन्म के कर्मों का फल तो सबको इसी जन्म में भोगना पड़ता है। पुनर्जन्म की सारी धारणाएँ मिथ्या हैं, फ़रेब हैं। जब उन्होंने उद्धव को उकसाकर बीजेपी के लिए गड्ढा खोदा था, तब क्यों नहीं सोचा कि बेरहम वक़्त कहीं उन्हें ही इस गड्ढे में ना फेंक दे। लिहाज़ा, होनी को अनहोनी बताने से कर्मों का फल छिपने वाला नहीं है।

‘अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत’

काँग्रेस कितने झटके खाकर सम्भलेगी? इस यक्ष प्रश्न का उत्तर तो शायद विधाता के पास भी ना हो। कहने को तो उसके पास राजनीति के एक से एक चाणक्य हैं। लेकिन सभी एक ज़माने से ‘आउट ऑफ़ फ़ॉर्म’ ही चल रहे हैं। बेचारे बार-बार रन-आउट ही हो रहे हैं। राहुल से पहले भी और राहुल के बाद भी। काँग्रेस अपने नये मौकापरस्त साथियों को भी इतना नहीं समझा सकी कि साज़िश को ख़ामोशी या गुपचुप तरीके से ही किया जाना चाहिए। रोज़ाना, तरह-तरह की बयानबाज़ी की झड़ी लगाने की क्या ज़रूरत थी? उसे ये गुण बीजेपी से सीखना चाहिए। अजीत पवार कब उसकी गोदी में बैठने को तैयार हो गये, इसकी हवा तक नहीं लगी एनसीपी और काँग्रेस के रणनीतिकारों को। हरियाणा में काँग्रेस की ख़रीद-फ़रोख़्त से पहले ही बीजेपी ने चौटाला को हथिया लिया। हरियाणा पर हुड्डा की पकड़ के बारे में काँग्रेस को तब समझ में आया, जब तक कि कांडा कांड कर चुका था? अगले पाँच साल तक गोपाल कांडा राज्य का सबसे धर्मात्मा राजनेता बना रहेगा। देख लीजिएगा। उसके पापों की भी धुलाई हो चुकी है। इससे पहले गोवा में भी काँग्रेस जब तक नींद से जागकर अंगड़ाई लेते हुए अखाड़े में पहुँची तक ‘चिड़िया चुग गयी खेत’ हो चुका था। उत्तराखंड में भी विजय बहुगुणा कब काँग्रेस के हाथ से जा फिसले, इसकी पार्टी आलाकमान को भनक तक नहीं लगी थी? यही हाल अरूणाचल में भी हुआ। लेकिन कभी लगा नहीं कि काँग्रेस अपने अनुभवों से कुछ नया सीखने को तैयार है। ज़ाहिर है, काँग्रेस को ‘अब पछताये होत क्या’ वाली दशा से बाहर निकलकर दिखाना होगा।

‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाये’

शिवसेना ने आम खाने का काम कब किया? ये किसी को पता नहीं। सबने ये तो देखा कि वो चुनाव में बीजेपी के साथ गठबन्धन करके उतरी थी। उसके गठबन्धन को ही बहुमत भी मिला। लेकिन वो कभी इस वादे का सबूत नहीं पेश कर सकी कि बीजेपी ने 50-50 का वादा कब किया था? यदि ये मान भी लें कि शिवसेना सच बोल रही है तो ये कैसे माने हैं कि वो सच ही है। कोई सबूत, गवाह या चश्मदीद है क्या? कोई ऑडियो है क्या? क्या बीजेपी से अलग होने से पहले शिवसेना को ये नहीं मालूम था कि वो सत्ता के शानदार सौदागर बन चुके हैं। क्या शिवसेना जानती नहीं थी कि बीजेपी को हर मनपसन्द चीज़ की मुँह-माँगी कीमत चुकाने आता है? उसके पास साम-दाम-भेद-दंड के सभी ब्रह्मास्त्र मौजूद हैं। ये कैसे मुमकिन है कि बीजेपी के सामने परोसी गयी जनादेश की थाली के ऐन-वक़्त पर पीछे ख़ींच लेंगे और वो चोट खायी नागिन जैसा व्यवहार नहीं करेगी? यदि ‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाये’ वाली बात पहले कभी नहीं हुई तो अब भला कैसे हो जाएगी? शिवसेना ये कैसे भूल गयी कि बीजेपी ने कैसे सत्ता की ख़ातिर उस नीतीश से यारी कर ली, जिससे ख़िलाफ़ वो चुनाव लड़कर हार चुकी थी? इतना ही नहीं, जब महबूबा की पीठ में छुरा भोंका जा रहा था, तब क्या शिवसेना उसके साथ नहीं खड़ी थी। अरे! यदि वो महबूबा के साथ दग़ाबाज़ी कर सकते हैं, तो तुम्हें क्यों छोड़ देंगे? अब यदि बीजेपी की किस्मत ने साथ दिया और वो तमाम तिगड़में करके विश्वास मत प्राप्त कर लेती है तो जल्द ही शिवसेना मुक्त महाराष्ट्र की जंग छेड़ देगी, तब देखते हैं कि शिवसैनिक कैसे बाल ठाकरे की विरासत को बचाते हैं!

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गाय, गधा, ग़ालिब और दिलीप घोष की मज़ेदार जुगलबन्दी

दिलीप घोष ने बीते नवम्बर में रहस्योद्घाटन किया था कि ‘भारतीय नस्ल की गायों में एक खासियत होती है। इनके दूध में सोना मिला होता है और इसी वजह से उनके दूध का रंग सुनहरा होता है। उनके एक नाड़ी होती है जो सूर्य की रोशनी की मदद से सोने का उत्पादन करने में सहायक होती है। इसलिए हमें देसी गायें पालनी चाहिए।

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बात बहुत मज़ेदार है। मज़ेदार बातें करने में बीजेपी के नेताओं का कोई सानी नहीं। फिर यदि बात गाय की हो तो बीजेपी के नेता किसी भी सीमा तक चले जाते हैं। अब ज़रा पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बनने के लिए आतुर बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष के एक और मज़ेदार तथा ताज़ा बयान पर ग़ौर करें कि ‘…गधे कभी भी गाय की अहमियत नहीं समझेंगे। …हमें स्वस्थ रहने के लिए गोमूत्र पीना चाहिए। जो शराब पीते हैं वो कैसे एक गाय की अहमियत को समझेंगे।’ संघियों ने गोमूत्र की अवैज्ञानिक महिमा का बातें तो पहले भी ख़ूब की हैं, लेकिन दिलीप घोष ने अब ‘गधे’ को गाय से जोड़कर गज़ब कर दिया है।

इन्हीं दिलीप घोष ने बीते नवम्बर में रहस्योद्घाटन किया था कि ‘भारतीय नस्ल की गायों में एक खासियत होती है। इनके दूध में गोल्ड मिला होता है और इसी वजह से उनके दूध का रंग सुनहरा होता है। उनके एक नाड़ी होती है, जो सूर्य की रोशनी की मदद से सोने का उत्पादन करने में सहायक होती है। इसलिए हमें ऐसी देसी गायें पालनी चाहिए। अगर हम देसी गाय का दूध पिएंगे तो स्वस्थ रहेंगे और बीमारियों से भी बचाव होगा।’

घोष बाबू के ऐसे बयान सहसा राजस्थान हाईकोर्ट के जज महेश शर्मा की उस बयान की याद ताज़ा कर देते हैं कि ‘मोर ज़िन्दगी भर ब्रह्मचारी रहता है। उसके आँसू चुगकर मोरनी गर्भवती होती है। इसीलिए मोर को राष्ट्रीय पक्षी बनाया गया। मोर पंख को भगवान कृष्ण ने इसलिए सिर में लगाया क्योंकि वह ब्रह्मचारी है। साधु-सन्त भी इसीलिए मोर पंख का इस्तेमाल करते हैं। मन्दिरों में भी इसीलिए मोर पंख लगाया जाता है। ठीक इसी तरह गाय के अन्दर भी इतने गुण हैं कि उसे राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाना चाहिए।’

दिलीप घोष और जस्टिस महेश शर्मा की तरह ही त्रिपुरा के मुख्यमंत्री विप्लव देव भी अपने विचित्र बयानों को लेकर ही पहचाने गये, भले ही इससे उनका ख़ूब उपहास हुआ हो। मैकेनिकल इंज़ीनियर की डिग्रीधारी विप्लव देव बता चुके हैं कि ‘महाभारत के दौरान संजय ने हस्तिनापुर में बैठकर धृतराष्ट्र को बताया था कि कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध में क्या हो रहा है। संजय इतनी दूर रहकर आँख से कैसे देख सकते हैं। सो, इसका मतलब है कि उस समय भी तकनीक, इंटरनेट और सैटेलाइट था।’

इसी तरह, विप्लव देव ने रहस्योद्घाटन किया था कि ‘’जब बतख पानी में तैरते हैं, तो जलाशय में ऑक्सीजन का स्तर अपने आप बढ़ जाता है। इससे ऑक्सीजन रिसाइकिल होता है। पानी में रहने वाली मछलियों को ज़्यादा ऑक्सीजन मिलता है। इस तरह मछलियाँ तेज़ी से बढ़ती हैं और ऑर्गनिक तरीके से मत्स्यपालन को बढ़ावा मिलता है।’ उनके सामाजिक ज्ञान की झलक भी कई बयानों से मिली। जैसे, ‘युवा नौकरी पाने के पीछे नहीं भागें बल्कि पान की दुकान खोंले और गाय पालें।’ या फिर ‘मॉब लिंचिग की वारदातों के पीछे अन्तरराष्ट्रीय षड्यंत्र है।’ या, ‘डायना हेडन इंडियन ब्यूटी नहीं हैं। डायना हेडन की जीत फ़िक्स थी। क्योंकि डायना हेडन भारतीय महिलाओं की सुन्दरता की नुमाइन्दगी नहीं करतीं।’ और ये भी कि ‘मैकेनिकल इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि वाले लोगों को सिविल सेवाओं का चयन नहीं करना चाहिए।’

यदि आप ऐसे सिरफिरे बयानों को लेकर अपना सिर धुनना चाहते हैं तो धुनते रहें, लेकिन बीजेपी के बड़े-बड़े नेताओं को ऐसे ही सियायी बयानों को फ़ायदा मिलता रहा है। याद है न कि 2014 में 35 रुपये लीटर पेट्रोल बेचने का सपना बेचकर बीजेपी ने मनमोहन सरकार का तख़्ता पटल दिया था। यही हाल ‘काला धन’ और ‘अच्छे दिन’ का भी रहा। इसी तरह 50 दिन में नोटबन्दी के कष्टों से उबारने की बात की गयी थी, तो 18 दिन चले महाभारत के युद्ध का वास्ता देकर 21 दिन में कोरोना के सफ़ाया का सब्ज़बाग़ भी दिखाया गया था।

इसी तरह, जब ‘विकास’ लापता हो गया तो ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ से उसे ढूँढ़ निकालने को कहा गया। इसी तर्ज़ पर कहा गया कि “पूर्वी लद्दाख में न तो कोई हमारी सीमा में घुस आया है, न ही कोई घुसा हुआ है और ना ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्ज़े में है।” उधर, रक्षामंत्री भी लद्दाख जाकर भाषण दे आये कि ‘भारत ने कभी किसी देश की एक इंच ज़मीन भी नहीं हथियाई।’ अब किससे पूछें कि गोवा और पांडिचेरी से पुर्तगालियों और फ्रांसीसियों की विदाई की ख़ातिर हो सैनिक कार्रवाई हुई थी, क्या उससे क्या भारत का क्षेत्रफल नहीं बढ़ा था?

ऐसे ही एक से बढ़कर एक मज़ेदार बयानों को देखकर कभी-कभार तो शक़ होता है कि क्या जनता ने ऐसे ही मज़ेदार बयान सुनने के लिए बीजेपी को सत्ता दी है? बहरहाल, दिलीप घोष की मज़ेदार बातों को सुनकर ये कौतूहल क्या लाज़िमी नहीं है कि यदि गाय के दूध में सोना होता है तो दुनिया भर में सोने की खदानों से इसके अयस्क (Ore) का खनन क्यों होता है? क्यों दुनिया भर में धरती को खोदकर इसे क्षत-विक्षत किया जाता है? भारत में भी बीजेपी शासित कर्नाटक के कोलार ज़िले में सोने की खदानें हैं। इन्हें अब तक बन्द क्यों नहीं किया गया? देसी गाय के दूध में यदि सोना है तो सोने का आयात और तस्करी क्यों होती है? गायों को सड़कों पर घूम-घूमकर कूड़ा-कचरा और पॉलीथीन क्यों खाना पड़ता है? गाय को माता बताकर उसे पूजने वालों, गऊदान रूपी सनातनी कर्मकांड का महिमामंडन करने वालों के सत्ता-काल में भी गौवंश के प्रति ऐसा सतत अनर्थ आख़िर क़ायम कैसे है?

ये कैसी विचित्र बात है कि जो शराब पीते हैं वो गाय की अहमियत को नहीं समझ सकते? मुझे कूड़ा-कचरा खाने वाली गायों के मूत्र के सेवन से सख़्त आपत्ति और परहेज़ है। लेकिन मेरी आपत्ति से उन्हें क्या? बाबू मोशाय के जीवन का तो बस एक ही लक्ष्य है कि बंगाल के हिन्दुओं में धार्मिक अन्धविश्वास और भ्रान्तियों को फैलाकर ममता दीदी को सत्ता से बाहर करना और यदि मोदी-शाह की कृपा हो जाए तो सूबे का अगला मुख्यमंत्री बनना। बाक़ी मेरे जैसों को तो उन्होंने अस्वस्थ का सर्टिफ़िकेट भी इसलिए दे दिया है क्योंकि मैं गोमूत्र नहीं पीता। अब यदि उनके बयान से किसी की मानहानि हुई है तो हुआ करे, उनकी बला से। वो तो हर क़ानून और संविधान से ऊपर हैं।

रही बात गधे की विशेषता बताने की तो इसे लेकर मुझे मिर्ज़ा असदउल्ला बेग़ ख़ान उर्फ़ ग़ालिब के चर्चित किस्सों की याद अनायस ही आ गयी। हुआ यूँ कि ग़ालिब को आम बहुत पसन्द थे। इतने कि उन्हें आम के आगे गन्ने की मिठास भी कमतर लगती थी। उन्होंने एक दोस्त से कहा था कि ‘मुझसे पूछो तुम्हें ख़बर क्या है, आम के आगे नेशकर क्या है’। नेशकर यानी गन्ना। आम के प्रति ग़ालिब की चाहत को देखते हुए ही गर्मी के मौसम में उनके दोस्त उन्हें तरह-तरह के आमों की टोकरियाँ भिजवाया करते थे। लेकिन ग़ालिब के एक अज़ीज़ दोस्त हकीम रज़ी उद्दीन ख़ान को आम बिल्कुल पसन्द नहीं थे।

एक दफ़ा ग़ालिब और हकीम रज़ी उद्दीन अपने घर के बरामदे में बैठे थे। आम को लेकर दोनों एक-दूसरे की पसन्द-नापसन्द से बख़ूबी वाक़िफ़ थे। इसके बावजूद, उनकी गुफ़्तगूँ के दौरान, जैसे ही घर के सामने से एक गधा-गाड़ी गुज़री तो इसके गधे ने रास्ते में पड़े आम के छिलके को सूँघा और अपना मुँह हटाकर चलता बना। ये देख हकीम साहब ने अचानक विषयान्तर करते हुए चुहल की कि ‘आप भले ही आम के दीवाने हैं लेकिन देखिए कि एक गधा भी आम नहीं खाता!’ इस पर हाज़िर-जबाब ग़ालिब ने कहा कि ‘जी हाँ, इसमें कोई शक़ नहीं कि गधे आम नहीं खाते!’

अब मैं जनाब दिलीप घोष से कैसे पूछूँ कि भले ही मैं गोमूत्र नहीं पीता कि लेकिन मुझे भी ग़ालिब की तरह आम बहुत पसन्द हैं, लिहाज़ा, मुझे ‘गधा’ माना जाएगा या नहीं? मज़ेदार बात ये भी है कि गोबरपट्टी में गधे को महज एक पशु के नाम की तरह ही नहीं बल्कि मूर्खता की एक उपमा के रूप में भी पेश किया जाता है। अब मैं घोष बाबू को मूर्ख कहकर उनकी हेठी करने की हिमाक़त तो करने से रहा कि अनर्थ से हमेशा डरना चाहिए। बहरहाल, जब ग़ालिब और आम की बात हुई है तो ग़ालिब के आम-प्रेम से जुड़े एक और मशहूर किस्से का ज़िक्र भी लाज़िमी है।

हुआ यूँ कि एक बार ग़ालिब और बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र अपने कुछ साथियों के साथ दिल्ली के लाल क़िला यानी क़िला-ए-मुबारक़ के बाग़-ए-हयात बख़्श में टहल रहे थे। इस बाग़ में कई किस्म के आम के पेड़ थे। लेकिन इसके आम सिर्फ़ बादशाह, शहज़ादों और हरम की औरतों के लिए होते थे। बाग़ के टहल-क़दमी के दौरान ग़ालिब हरेक पेड़ पर झूल रहे आमों को बड़े ध्यान से देख रहे थे। ये देख बादशाह ने उनसे पूछ लिया कि ‘अमां, आप हर आम को इतने ध्यान से क्यों देख रहे हैं?’

जबाब में ग़ालिब ने बेहद संजीदगी से कहा कि ‘मेरे मालिक और मेरे रहनुमा, एक बार किसी शायर ने कहा था कि हर आम पर, उसके खाने वाले का नाम लिखा होता है। मैं अपने दादा, अब्बा और अपना नाम तलाश रहा हूँ।’ बादशाह, ये सुनकर मुस्कुराये। फिर ग़ालिब की हाज़िर जबाबी की दाद देते हुए उन्होंने पुराने दस्तूर को तोड़कर शाम तक मिर्ज़ा के घर बाग़ के आमों की टोकरी भिजवा दी।

आख़िर में, फिर से रुख़ करते हैं दिलीप घोष के गाय-ज्ञान की ओर। ताकि इनका अहम गाय-सिद्धान्त एक जगह मिल सके। गाय तो लेकर दिलीप घोष के दो अन्य बयान भी कोई कम दिलचस्प या हास्यास्पद नहीं है। पहला बयान है कि ‘विदेश से जिन नस्लों की गायें हम लाते हैं, वे गाय नहीं हैं। वे एक तरह के जानवर हैं। ये विदेशी नस्लें गायों की तरह आवाज़ नहीं निकालती हैं। वे हमारी गोमाता नहीं बल्कि हमारी आँटी हैं। अगर हम ऐसी आँटियों की पूजा करेंगे तो देश के लिए अच्छा नहीं होगा।’ और दूसरा बयान है कि ‘कुछ बुद्धिजीवी सड़कों पर गोमाँस खाते हैं, मैं उनसे कहता हूं कि वे कुत्ते का माँस भी खाएँ, जिससे उनका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। उन्हें जिस भी जानवर का माँस खाना हो खाएँ लेकिन सड़कों पर क्यों, अपने घर पर खाएँ?’

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गरीब-कल्याण-रोजगार-योजना

मेरा 30 साल का सारा पत्रकारीय अनुभव और कौशल ये पता नहीं लगा पाया कि बिहार और बंगाल की चुनावी बेला को ध्यान में रखकर घोषित हुआ केन्द्र सरकार का चमत्कारी ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ वास्तव में ज़मीन पर कब से और कितना चमत्कार दिखा पाएगा? कोरोना की मार खाकर बदहवासी के साथ अपने गाँवों को लौटे कितने स्किल्ड (हुनरमन्द) प्रवासी मज़दूरों को, कितने दिनों का, कितनी आमदनी वाला और कैसा रोज़गार देकर उनका उद्धार करके उन्हें और उनके गाँवों को ख़ुशहाल बना पाएगा?

कृपया मेरी इस वेदना पर यक़ीन करें कि 30 साल के अपने पत्रकारीय जीवन में मैंने कभी किसी एक ख़बर का ब्यौरा जानने के लिए इतनी मगज़मारी या इतनी मेहनत नहीं की, जितना बीते चार दिनों में की। जब से वित्तमंत्री ने इस अभियान का एलान किया, और इसके शुभारम्भ के लिए बिहार के खगड़िया ज़िले को चुना गया, तभी से मैं इस सरकारी योजना का पूरा ब्यौरा जानने के लिए बेताब था। क्योंकि तमाम सरकारी शोर-शराबे और डुगडुगी बजाकर मुनादी करवाने वाले चिरपरिचित अन्दाज़ के साथ शुरू हुई 50,000 करोड़ रुपये के अभियान का वास्ता जिस ‘ग़रीब’, ‘कल्याण’ और ‘रोज़गार’ से है, वहीं तीनों मिलकर ही को असली ‘भारत’ बनाते हैं।

लिहाज़ा, ‘इंडिया’ वाली कोरोना और भारत-चीन सीमा विवाद के सच-झूठ पर नज़र रखते हुए मैं ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ की बारीकियाँ जानने में भी जुटा रहा। केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के कुछेक आला अफ़सरों से भी सम्पर्क किया, लेकिन सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों, ट्वीटर-फ़ेसबुक के ढकोसलों और पॉवर प्लाइंट प्रेज़ेंटेशन वाले ऑडियो-वीडियो भाषणबाज़ी के सिवाय और कुछ भी हाथ नहीं लगा।

दरअसल, किसी भी सरकारी योजना को तमाम बन्दिशों से गुज़रना पड़ता है। जैसे, यदि सरकार एक बाँध बनाना चाहे तो महज इसका एलान होने या बजट आबंटन होने या शिलान्यास होने से काम शुरू नहीं हो जाता। ज़मीन पर काम शुरू होने की प्रक्रिया ख़ासी लम्बी और जटिल होती है। मसलन, बाँध कहाँ बनेगा, वहाँ का नक्शा बनाने के लिए सर्वे होगा, सर्वे से विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) बनेगी, फिर तरह-तरह के टेंडर होंगे और टेंडर अवार्ड होने के बाद बाँध के निर्माण का काम शुरू होगा। इसके साथ ही ये पता लगाया जाएगा कि बाँध में कितना इलाका डूबेगा, वहाँ के लोगों का पुर्नवास कहाँ और कैसे होगा, इसकी लागत और अन्य झंझट क्या-क्या होंगे? इसके बाद भी सारा मामला इतना जटिल होता है कि दस साल की परियोजना, अनुमानित लागत के मुकाबले पाँच गुना ज़्यादा वास्तविक लागत से तीस साल में तैयार हो पाती है।

इसी तरह ये जानना भी ज़रूरी है कि सरकार 50,000 करोड़ रुपये की जिस ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ की बात कर रही है, उसके विभिन्न आयाम क्या-क्या हैं? क्योंकि अभी तक सरकार ने इस अभियान को ‘गड्ढे खोलने वाली’ मनरेगा से अलग बताया है। मनरेगा में 202 रुपये मज़दूरी और साल के 365 दिनों में से कम से कम 100 दिन काम की गारंटी की बातें हैं। अब चूँकि कोरोना की वजह से शहरों से गाँवों को लौटे प्रवासी मज़दूरों की ‘स्किल मैपिंग’ करवाने की बातें भी हुई हैं तो क्या अलग-अलग स्किल के हिसाब से लोगों को अलग-अलग मज़दूरी भी मिल जाएगी? इस सवाल का कहीं कोई ब्यौरा नहीं है।

इसी तरह, ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ को लेकर फ़िलहाल, इतना ही बताया गया है कि इसे प्रवासी मज़दूरों की सहायता के लिए देश के 733 में से 116 ज़िलों में 125 दिनों तक मिशन मोड में चलाया जाएगा। ये ज़िले 6 राज्यों – बिहार (32), उत्तर प्रदेश (31), मध्य प्रदेश (24), राजस्थान (22), ओडिशा (4) और झारखंड (3) के हैं। इनमें से बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश तो ऐसे हैं जिन्हें 1980 में बीमारू राज्य का ख़िताब मिला था। बीते 40 वर्षों में इन बीमारू राज्यों ने विकास के एक से बढ़कर एक अद्भुत ध्वजवाहकों की सरकारें देखीं, लेकिन कोई भी अपने राज्य को बीमारू के कलंक से उबार नहीं सका। उल्टा जिन आधारों पर ये बीमारू बताये गये थे, उसके मुताबिक इनसे अलग हुए झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड भी बीमारू राज्यों की श्रेणी में ही जा पहुँचे।

अगली ज्ञात जानकारी है कि ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ को 12 विभिन्न मंत्रालयों का साझा कार्यक्रम बनाया जाएगा। इनके नाम हैं – ग्रामीण विकास, पंचायती राज, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग, खान, पेयजल और स्वच्छता, पर्यावरण, रेलवे, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, नयी और नवीकरणीय ऊर्जा, सीमा सड़क, दूरसंचार और कृषि मंत्रालय। इन सभी की अफ़सरशाही के बीच समन्वय की ज़िम्मेदारी ग्रामीण विकास मंत्रालय की होगी। अभियान के तहत कम्युनिटी सैनिटाइजेशन कॉम्पलेक्स, ग्राम पंचायत भवन, वित्त आयोग के फंड के तहत आने वाले काम, नेशनल हाइवे वर्क्स, जल संरक्षण और सिंचाई, कुएँ की खुदाई, वृक्षारोपण, हॉर्टिकल्चर, आंगनवाड़ी केन्द्र, प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण), प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, रेलवे, श्यामा प्रसाद मुखर्जी RURBAN मिशन, PMKUSUM, भारत नेट के फाइबर ऑप्टिक बिछाने, जल जीवन मिशन आदि 25 स्कीम्स में काम कराये जाएँगे।

लेकिन अभी कोई नहीं जानता कि इन दर्जन भर मंत्रालयों को अपनी-अपनी योजनाओं के लिए ‘स्किल्ड प्रवासी मज़दूर’ क्या ग्रामीण विकास मंत्रालय सुलभ करवाएगा या फिर उनके बजट को लेकर उन्हें सिर्फ़ वाहवाही देने की कोई ख़ुफ़िया रणनीति है? हालाँकि, जितनी जानकारी अभी तक सामने आयी है, उसके आधार पर इसे ‘अच्छे दिन’ की एक और उपलब्धि बताना जल्दबाज़ी होगी। लेकिन ये मानने का भी कोई आधार तो हो ही नहीं सकता कि सरकारी अमला इस अभियान को ज़मीन पर उतारने में महीनों से पहले कामयाब हो जाएगा। ध्यान रहे कि सरकार का पहिया बहुत भारी होता है और काफ़ी मुश्किल से घूम पाता है।

अब ज़रा 50,000 करोड़ रुपये की भारी भरकम रकम की महिमा को भी खंगाल लिया जाए। एक मोटा अनुमान है कि किसी भी सरकारी निर्माण पर क़रीब आधी रकम मज़दूरी पर खर्च होती है। इसका मतलब ये हुआ कि ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ के तहत ताज़ा एलान में मज़दूरी का हिस्सा क़रीब 25,000 करोड़ रुपये होगा। इसे यदि 125 से विभाजित करें तो रोज़ाना का 200 करोड़ रुपये बैठेगा। इसे 116 ख़ुशनसीब ज़िलों से विभाजित करें तो हरेक ज़िले के हिस्से में रोज़ाना के 1.72 करोड़ रुपये आएँगे। अब यदि हम ये मान लें कि स्किल्ड प्रवासी मज़दूरों को मनरेगा के मज़दूरों के मुकाबले डेढ गुना वेतन भी मिला तो इसका औसत रोज़ाना 300 रुपये बैठेगा। इस 300 रुपये से यदि 1.72 करोड़ रुपये को विभाजित करें तो हम पाएँगे कि 125 दिनों में हरेक लाभान्वित ज़िले में 57,471 प्रवासी मज़दूरों की ही किस्मत सँवर पाएँगी।

अलबत्ता, यदि मज़दूरी 300 रुपये से ज़्यादा हुई तो मज़दूरों की संख्या उसी अनुपात में घटती जाएगी। अब ज़रा सोचिए कि इस अभियान से उन एक करोड़ से ज़्यादा प्रवासी मज़दूरों में से कितनों का पेट भरेगा, जिन्हें रेलवे की श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के ज़रिये शहरों से उनके गाँवों को भेजा गया है। यहाँ उन अभागे प्रवासी मज़दूरों का तो कोई हिसाब ही नहीं है जो चिलचिलाती धूप में सैकड़ों किलोमीटर लम्बी सड़कों को पैदल नापकर या रेल की पटरियों पर चलकर अपने गाँवों को पहुँचे हैं।

ज़रा तस्वीर का दूसरा पहलू भी देखिए कि वित्त मंत्रालय ने 2016 के आर्थिक सर्वेक्षण में बताया था कि देश में कुल कामगार 48 करोड़ से ज़्यादा हैं और हरेक तीसरा कामगार प्रवासी मज़दूर है। यानी, प्रवासी मज़दूरों की संख्या 16 करोड़ बैठी। हालाँकि, महीने भर पहले जब वित्त मंत्री ने 21 लाख करोड़ रुपये के पैकेज़ का ब्यौरा दिया तो उन्होंने प्रवासी मज़दूरों की संख्या को 8 करोड़ मानते हुए उन्हें तीन महीने तक 5 किलो चावल या गेहूँ मुफ़्त देने के बजट का वास्ता दिया था। साफ़ है कि ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान के असली लाभार्थियों की संख्या जितनी बड़ी है, उसके लिए 50,000 करोड़ रुपये और 12 मंत्रालयों की सारी क़वायद ऊँट के मुँह में जीरा ही साबित होगी।

फ़िलहाल, इतना ज़रूर है कि अक्टूबर-नवम्बर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सत्ता पक्ष इस अभियान को लेकर ख़ूब ढोल पीटता रहेगा। 25 अक्टूबर को बिहार में दुर्गापूजा की धूम रहेगी, फिर 14 नवम्बर को दिवाली और 20 नवम्बर को छठ पूजा की। बिहार की मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 29 नवम्बर तक है। इससे पहले जनादेश आ ही जाएगा। और हाँ, ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ की 125 दिनों की मियाद 26 अक्टूबर को ख़त्म हो जाएगी। हालाँकि, सरकार का कहना है कि वो इस अभियान को आगे भी जारी रख सकती है। लेकिन बात कैसे और कब आगे बढ़ेगी? इसे जानने के लिए तो इन्तज़ार करना ही होगा।

तब तक यदि प्रवासी मज़दूरों के सामने भूखों मरने की नौबत आ गयी तो सरकार का वैसे ही कोई दोष नहीं होगा, जैसे कोरोना संक्रमितों की संख्या का रोज़ाना अपना ही रिकॉर्ड तोड़ने का सिलसिला जारी है। या फिर, जैसे विकास का सारा बोझ अपने कन्धों पर उठाये पेट्रोल-डीज़ल के दाम रोज़ाना नये रिकार्ड बनाने में जुटे हुए हैं। या फिर, लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर बग़ैर किसी घुसपैठ के बावजूद भारतीय सैनिक ख़ुद को शहीद करने पर आमादा रहे हैं, वायुसेना के लड़ाकू विमानों की अग्रिम अड्डों पर तैनाती और ‘फ़्लाई पास्ट’ हो रहा है तथा शान्ति का नारा लगा रहे चीनी सेना के जबाब में हमारी थल सेना भारतीय इलाके में मज़मा लगाकर और तालियाँ बजाकर उनका अभिनन्दन कर रही है। ज़ाहिर है, 130 करोड़ भारतीयों में से जितने भी ‘नासमझ’ हैं वो ‘झुकने और बिकने’ का मतलब तो बहुत अच्छी तरह से समझ चुके हैं!

Mukesh Kumar Singh मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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ब्लॉग

शेयर बाजार में पूरे सप्ताह रहा उतार-चढ़ाव, 1.5 फीसदी टूटे सेंसेक्स, निफ्टी

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Stock Market Down

मुंबई, 13 जून (आईएएनएस)। घरेलू शेयर बाजार में इस सप्ताह भारी उतार-चढ़ाव का दौर लगातार जारी रहा, लेकिन लगातार दो सप्ताह बढ़त कायम नहीं रह पाई। घरेलू कारकों और कमजोर विदेशी संकेतों से सेंसेक्स और निफ्टी दोनों पिछले सप्ताह के मुकाबले करीब 1.5 फीसदी की गिरावट के साथ बंद हुए।

बंबई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) के 30 शेयरों पर आधारित संवेदी सूचकांक सेंसेक्स पिछले सप्ताह के मुकाबले 506.35 अंकों यानी 1.48 फीसदी की गिरावट के साथ 33,780.89 पर बंद हुआ।

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के 50 शेयरों पर आधारित संवेदी सूचकांक निफ्टी पिछले सप्ताह के मुकाबले 169.25 अंकों यानी 1.67 फीसदी की कमजोरी के साथ 9972.90 पर ठहरा।

बीएसई मिडकैप सूचकांक पिछले सप्ताह से 45.99 अंकों यानी 0.37 फीसदी की कमजोरी के साथ 12,600.15 पर जबकि स्मॉलकैप सूचकांक 9.90 अंक फिसलकर 11,845.27 पर रूका।

सप्ताह के आरंभ में हालांकि सोमवार को सेंसक्स 83.34 अंकों की बढ़त बनाकर 34370.58 पर रूका और निफ्टी 25.30 अंक चढ़कर 10,167.45 पर बंद हुआ, लेकिन अगले सत्र में मंगलवार को गिरावट आ गई और सेंसक्स पिछले सत्र से 413.89 अंक यानी 1.20 फीसदी की कमजोरी के साथ 33956.69 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 120.80 अंकों यानी 1.19 फीसदी की गिरावट के साथ 10,046.65 पर ठहरा।

घरेलू बाजार में बुधवार को फिर रिकवरी आ गई और सेंसेक्स 290.35 अंक चढ़कर 34,247.05 पर ठहरा, जबकि निफ्टी 69.50 अंकों की बढ़त के साथ 10,116.15 पर रूका। अगले दिन फिर बाजार में बिकवाली के भारी दबाव में सेंसेक्स पिछले सत्र से 708.68 यानी 2.07 फीसदी लुढ़ककर 33,538.37 पर बंद हुआ। निफ्टी भी पिछले सत्र से 214.15 अंकों यानी 2.12 फीसदी की गिरावट के साथ 9,902 पर बंद हुआ।

सप्ताह के आखिरी सत्र में हालांकि काफी उतार-चढ़ाव रहा, लेकिन आखिर में जबरदस्त रिकवरी के साथ सेंसेक्स पिछले सत्र से 242.52 अंक चढ़कर 33,780.89 पर ठहरा और निफ्टी ने भी 70.90 अंकों की बढ़त बनाई फिर भी 10,000 के मनोवैज्ञानिक स्तर को बनाए रखने में नाकाम रहा।

कोरोनावायरस का संक्रमण गहराने और प्रमुख टेलीकॉम कंपनियों को एजीआर बकाया मामले में सर्वोच्च न्यायालय से राहत नहीं मिलने से घरेलू बाजार में कारोबारी रुझान कमजोर हुआ। वहीं, अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार को लेकर जो संकेत दिया है वह आशावादी नहीं है, इसलिए विदेशी बाजारों में कमजोरी आई ,जिसका असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखा।

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