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विपक्ष में है हिम्मत तो करे ऐलान कि सत्ता में लौटे तो ख़त्म होगा अनुच्छेद 164 और 356!

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Maharashtra Crisis

यदि आप महाराष्ट्र में आनन-फ़ानन में देवेन्द्र फड़नवीस और अजीत पवार की ताजपोशी के लिए राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी जैसे परजीवी को क़सूरवार मानते हैं, तो मानते रहें।

धुनते रहें अपना सिर। कोसते रहे मोदी-शाह को, संविधान को, लोकतंत्र को। अब कुछ नहीं होने वाला। या फिर, अब महाराष्ट्र में वही होगा जो दिल्ली चाहेगी।

उद्धव-शरद-सोनिया को अब एक बार फिर वैसी ही शानदार पटखनी मिल चुकी है, जैसी पिछले दिनों लालू-देवेगौड़ा-राहुल और महबूबा को मिली थी। साफ़ है कि विपक्ष की राजनीति करने वाले किसी भी महारथी ने बिहार, गोवा, कर्नाटक, उत्तराखंड, अरूणाचल और जम्मू-कश्मीर से अनुभवों और इतिहास से कुछ नहीं सीखा। दूसरी ओर, बीजेपी को अनुच्छेद 164 और 356 के इतिहास के सारे सबक याद हैं, कंठस्थ हैं।

बदलते दौर के साथ बीजेपी ने उन सारे सिद्धान्तों में महारथ हासिल कर ली जो कभी काँग्रेस का कॉपीराइट हुआ करती थी। बीजेपी ने सत्ता में पहुँचने से पहले भारत की मिट्टी से जो कुछ सीखा, उसे ही तो आज ताल ठोंककर और डंके की चोट पर आज़मा रही है।

इसीलिए सियासी कुश्तियों की विजेता बार-बार वही बनती है। एकलव्य की तरह बीजेपी ने काँग्रेस रूपी द्रोणाचार्य से सारी धनुर्विद्या को यूँ नहीं हथियाया। कठिन साधना करके वो पारंगत हुई है। उसने एक बार फिर विरोधियों के लिए बेहद मोटे अक्षरों से दीवार पर लिख दिया कि ‘अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत’।

अलबत्ता, अब खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचना चाहती है तो नोचती रहे। कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला! बेशक़, महाराष्ट्र ने बीजेपी और शिवसेना को साझा जनादेश दिया था। लेकिन ये भी सच है कि जनादेश से धोखाधड़ी सिर्फ़ शिवसेना ने नहीं की, बल्कि अजीत पवार ने भी तो वही किया। जो शिवसेना महाराष्ट्र में करने में विफल रही वही तो बीजेपी ने बिहार में सफलतापूर्वक करके दिखाया।

लिहाज़ा, कल तक जिस ‘पाप’ की गुनहगार शिवसेना थी, क्या आज वैसे ही ‘पापी’ अजीत पवार के पापों को धोकर बीजेपी ने कोई ‘पुण्य’ कमाया है? वक़्त जो भी लगे लेकिन राजनीति से इन सवालों का जबाब शायद ही कभी मिले। यदि कभी कुछ बदलेगा तो सुप्रीम कोर्ट से निकलने वाले ‘बोम्मई-2’ या ‘केशवानन्द भारती-2’ जैसे किसी फ़ैसले से ही बदलेगा।

जब ऐसा होगा, तब होगा। इसके होने तक राजनीति की काली-अँधेरी रात ऐसे ही जारी रहेगी।
कोई राज्यपाल साधु नहीं होता। अनुच्छेद 164 और 356 के रहते हो भी नहीं सकता। काँग्रेसी राज्यपाल भी कभी साधु नहीं रहे तो संघी राज्यपाल भला क्यों होने लगे? क्या सिर्फ़ इसलिए कि भगवा ख़ानदान ने कभी चाल-चरित्र-चेहरे की बात की थी? राजनीति तो चीज़ ही बातें बनाने की है।

कौन बातें नहीं बनाता? कौन तानाशाही नहीं करता? क्या काँग्रेस ने तानाशाही में कभी कोई कोर-कसर छोड़ी थी। अरे, काँग्रेस ने तो अनुच्छेद 164 और 356 की बदौलत अपनी पार्टी और अपने मुख्यमंत्री तक की सरकार को भी उखाड़ फेंका है! कोश्यारी ने वही किया जो ‘ऊपर’ से हुक़्म मिला। हमेशा यही होता रहा है। अब आप देते रहिए दुहाई कि राज्यपाल ने क्या सही किया और क्या ग़लत? देते रहिए मिसाल कि केन्द्र में कब-कब और किन-किन सरकारों ने कैसे-कैसे अनुच्छेद 164 और 356 के ज़रिये लोकतंत्र का चीरहरण किया? बताते रहिए कि कौन ज़्यादा नंगा है और कौन कम? जाइए सुप्रीम कोर्ट और कीजिए संसद का चक्का जाम! किसी का कुछ नहीं बनने-बिगड़ने वाला।

ख़रीद-फ़रोख्त और सौदेबाज़ी हो चुकी है। खेल ख़त्म और पैसा हज़म। भविष्य में शिवसेना और काँग्रेस में भी टूट-फूट हो जाए तो ताज़्ज़ुब मत कीजिएगा। राजनीति अब गाँधी के उसूलों पर नहीं, बल्कि रुपये पर छपी उनकी तस्वीर के पीछे चलती है।

याद रखिए, बीजेपी आज ‘तानाशाही’ के जिन सिद्धान्तों पर चल रही है, उसकी पाठशाला का शिलान्यास जवाहर लाल नेहरू ने ही नम्बूदरीपाद की सरकार को गिराकर किया था। वही पाठशाला 70 सालों में देखते ही देखते विश्वविद्यालय में बदल चुकी है। केन्द्र की हरेक सरकार इस विश्वविद्यालय की निरंकुश कुलपति रह चुकी है।

अभी तो बीजेपी का कार्यकाल है। उस पर दोष क्यों? कोई अपवाद नहीं है। लिहाज़ा, विधवा-विलाप से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। बस, ख़त्म बात। दरअसल, संविधान निर्माताओं और उसकी व्याख्या करने वाले सुप्रीम कोर्ट की अनुच्छेद 164 और 356 को लेकर चाहे जो धारणा रही हो, लेकिन ये अकाट्य सच है कि इन्हीं दोनों अनुच्छेदों की बदौलत होने वाला सियासी नंगा नाच आज भारतीय राजनीति और संविधान के सबसे बड़े कलंक का दर्ज़ा हासिल कर चुका है।

बेशक़, संविधान एक नायाब दस्तावेज़ है। लेकिन अनुच्छेद 164 और 356 इसके ऐसे ‘ब्लैक-होल’ की तरह है जो 70 सालों में और स्याह ही होते चले गये। अनुच्छेद 164 की बदौलत ही राज्यपाल किसी को भी मुख्यमंत्री बना देते हैं या कभी भी जल्लाद बनकर किसी भी सरकार का गला दबा देते हैं। उनसे ये काम केन्द्र सरकार अनुच्छेद 356 के तहत करवाती है।

भारतीय राजनीति में अनुच्छेद 164 और 356 के बेज़ा इस्तेमाल की बुनियाद भले ही नेहरू युग में काँग्रेसियों ने रखी। लेकिन कालान्तर में दिल्ली में सत्तासीन हुई हरेक सशक्त या लूली-लंगड़ी राजनीतिक शक्ति ने भी अपने सियासी स्वार्थ के लिए इसका अपार दोहन किया। अनुच्छेद 164 और 356 ने ही राजनीति में सुचिता और विचारधारा जैसी सभी बातों को क़िताबी और काल्पनिक बना दिया।

संविधान के यही दोनों अनुच्छेद समाज में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली उपमा के संवाहक हैं। व्यवहार में इससे ज़्यादा दबंगई, अतार्किकता और मनमानीपूर्ण आचरण और कुछ नहीं है। किसी ज़माने में जिन तर्कों के साथ किसी की बहू-बेटी को घर से उठा लिया जाता था, उसी तरह से संविधान के लागू होने के बाद किसी निर्वाचित सरकार को या तो चुटकियों में ज़मींदोज़ कर दिया जाता है या फिर सारे विधि-विधान को ताक़ पर रखकर किसी की भी ताजपोशी कर दी जाती है।

राज्यपाल को केन्द्र में बैठे अपने आकाओं के इशारे पर नाचना पड़ता है। वहाँ से मिली उधार की साँसों पर ही जीना पड़ता है। उसे राजभवन की शान-ओ-शौक़त का लुत्फ़ उठाते हुए दिल्ली की ओर मुँह करके बस एक ही मंत्र-जाप करना होता है कि ‘जो तुमको हो पसन्द वही बात कहेंगे, तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे!’ इस मंत्र को ही राज्यपाल का निजी संविधान या ‘इन्दीवर कोड’ भी कह सकते हैं। 1970 की ‘फ़िल्म सफ़र’ में इसी ‘इन्दीवर कोड’ का शानदार फ़िल्मांकन हुआ।

राजनीतिक संगीत की दृष्टि से देखें तो ‘राज्यपाल’ सबसे ढीठ या बेशर्म राग है। इसके गायन, वादन और नृत्य जैसी विधाएँ किसी व्याकरण या मर्यादा से नहीं बँधी हैं। इसे किसी भी प्रहर में गाया जा सकता है। ये आरोह-अवरोह, ताल, ख़्याल जैसी शास्त्रीय वर्जनाओं से भी सर्वथा उन्मुक्त है। यहाँ तक कि अराजकता का कोई भी दायरा इसकी पैमाइश नहीं कर सकता।

कहने को राज्यपाल अपने राज्य का संवैधानिक मुखिया है, लेकिन उसकी औकात केन्द्र सरकार के चपरासी या अर्दली से ज़्यादा नहीं होती। इसीलिए उसे केन्द्र की कठपुतली, एजेंट या दलाल भी कहते हैं। केन्द्र की सत्ता में रहने वाली हरेक पार्टी जब सत्ता से बाहर होती है तो राज्यपाल में नीति और मर्यादा के तत्व ढूँढ़ती फ़िरती है।

लेकिन अपने चुनावी घोषणापत्र या संकल्प-पत्र में कभी ये नहीं कहती कि जब वो सत्ता में लौटेगी तो अनुच्छेद 164 और 356 को कलंक-मुक्त करने का इन्तज़ाम करेगी। ये पुलिस-सुधार जैसा ही राजरोग है। कोई इसका पुख़्ता इलाज़ नहीं करना चाहता।

लिहाज़ा, हिम्मत है तो विपक्ष में बैठी काँग्रेस और उसके सहयोगी ये ऐलान करे कि वो जब कभी सत्ता में लौटेंगे तो अनुच्छेद 164 और 356 के दुरुपयोग के सभी दरवाज़ों को हमेशा-हमेशा के लिए बन्द करके दिखाएँगे। ज़रूरत पड़ी तो राज्यपाल के पद को ही ख़त्म करके दिखाएँगे।

बिल्कुल वैसे ही जैसे सत्ता की ख़ातिर बीजेपी ने 370, राम मन्दिर और समान नागरिक संहिता के अपने एजेंडे से चाहे जितना समझौता किया हो, लेकिन पार्टी के संकल्प पत्रों में चुनाव दर चुनाव इनके प्रति अपनी निष्ठा ज़ाहिर करती रही।

दरअसल, सत्ता का स्वभाव है कि वो हमेशा निरंकुश ही रहना चाहती है। इसीलिए अब सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट ही एकमात्र ऐसी जगह है जहाँ से इस राजरोग का इलाज़ मुमकिन है। लेकिन ये कब होगा, कैसे होगा, होगा भी कि नहीं, इसे कोई नहीं जानता। ‘देवो न जानाति कुतो मनुष्यम्’ यानी देवता भी नहीं जानते तो इंसान की औक़ात ही क्या है!

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राहुल गांधी वापस संभालेंगे कांग्रेस की कमान?

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Rahul gandhi

नई दिल्ली/वायनाड (केरल), 6 दिसम्बर | पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी वापस पार्टी की कमान संभालने वाले हैं। इस बात की संभावना है कि अगले साल के आरंभ में दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद वह दोबारा पार्टी की कमान संभालें। कांग्रेस महासचिव के. सी. वेणुगोपाल का कहना है कि देश अब ज्यादा चाहने लगा है कि वह नेतृत्व की भूमिका में हों।

राहुल गांधी के साथ केरल स्थित उनके संसदीय क्षेत्र वायनाड गए वेणुगोपाल ने संवाददाताओं से कहा, “देश नाजुक दौर से गुजर रहा है। पार्टी को उनके नेतृत्व की जरूरत है और पार्टी के कार्यकर्ताओं की ओर से उनकी वापसी की मांग उठने लगी है। हमें उम्मीद है कि वह उनकी बात सुनेंगे।”

अगले कुछ महीनों में कांग्रेस का अधिवेशन होने वाला है जिसमें पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी की नियुक्ति को मंजूरी प्रदान की जाएगी।

एक सूत्र ने बताया कि उस सम्मेलन में राहुल गांधी की वापसी को लेकर आवाज उठेगी क्योंकि पार्टी के युवा नेताओं ने इसकी योजना बनाई है।

पार्टी संगठन में राहुल गांधी को प्रोन्नति करने की मांग पहली बार अखिल भारतीय कांग्रेस कमेर्टी के हैदराबाद अधिवेशन में 2006 में उठी थी जहां उत्तर प्रदेश के पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनके पक्ष में नारे बुलंद किए थे और 2007 में उनको पार्टी का महासचिव बनाया गया। उसके बाद उनको उपाध्यक्ष बनाने की मांग 2013 में जयपुर अधिवेशन में उठी।

पार्टी के विभिन्न वर्गो की मांग के बाद राहुल गांधी 2017 में निर्विरोध कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित हुए, लेकिन 2019 के आम चुनाव में उनके नेतृत्व में पार्टी का प्रदर्शन खराब रहने के कारण उन्होंने उसकी जिम्मेदारी लेते हुए मई में इस्तीफा दे दिया। पार्टी की ओर से उनसे दोबारा विचार करने का आग्रह बार-बार किए जाने के बाद भी वह नहीं माने। इसके बाद अगस्त में सोनिया गांधी को पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

राहुल गांधी भले ही पार्टी के प्रमुख न हों लेकिन उनका फैसला पार्टी का फैसला होता है जैसाकि शिव सेना-कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस गठबंधन नीत महाराष्ट्र सरकार में नितिन राउत की मंत्री के रूप में नियुक्ति और नाना पटोले के विधानसभाध्यक्ष बनने से जाहिर होता है।

सूत्र ने बताया कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन स्थल को लेकर पार्टी अंतिम फैसला लेने वाली है जोकि कांग्रेस शासति मध्यप्रदेश या राजस्थान में जनवरी व फरवरी में होने वाली है।

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आख़िर कोई दास्तान-ए-प्याज़ बताता क्यों नहीं?

सरकार कभी अफ़ग़ानिस्तान से तो कभी मिस्र से प्याज़ के आयात का भारी-भरकम आँकड़ा देकर कहती है कि ‘देश में तो सब ठीक है’। प्याज़ का दाम न तो कोई राष्ट्रीय समस्या है और ना ही कोई प्राकृतिक आपदा। हरेक दो-तीन साल पर प्याज़ ऐसे ही और लाल हो उठता रहा है, तो प्याज़ के भाव घटने के बजाय बढ़ क्यों रहा है?

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People buy onion

प्याज़ के दाम को लेकर देशभर में हाहाकार है। इसे शतक-वीर कहा जा रहा है क्योंकि इसका दाम 100 रुपये प्रति किलोग्राम को पार कर चुका है। सरकार कहती है कि मौसम की मार की वजह से प्याज़ का उत्पादन क़रीब 28-29 फ़ीसदी गिरा है। लेकिन कोई ये बताने वाला नहीं है कि 30 प्रतिशत पैदावार घटने से दाम सामान्य के मुक़ाबले चार से पाँच गुना यानी 400 से 500 फ़ीसदी तक क्यों बढ़ गये? क्या उत्पादन में आयी गिरावट को देखते हुए जनता ने ज़्यादा प्याज़ खाना शुरू कर दिया, वो भी इतना ज़्यादा कि दाम बढ़ने के बावजूद ख़पत भी बेतहाशा बढ़ने लगे? वर्ना, दाम बढ़ने पर तो ख़पत घटनी चाहिए। वो बढ़ कैसे सकती है?

प्याज़ के दाम में ऐसी आग भी तब लगती है जब अर्थव्यवस्था की विकास दर के औधें मुँह गिरने का सिलसिला सालों-साल से जारी है। विकास दर गिरने का मतलब है — देश के सकल घरेलू उत्पादन में गिरावट। इसका स्वाभाविक असर होता है — जनता की औसत आमदनी में कमी। यानी, आम आदमी की आमदनी घट रही है, बेरोज़गारी बढ़ती ही जा रही है, तो फिर वो लोग कौन और कितने हैं जो आसमान छूती क़ीमतों के बावजूद प्याज़ पर टूटे पड़े हैं? प्याज़ को लेकर सीधा और छोटा सा सवाल सिर्फ़ इतना ही है। लेकिन सही जबाब नदारद है।

सरकार कभी अफ़ग़ानिस्तान से तो कभी मिस्र से प्याज़ के आयात का भारी-भरकम आँकड़ा देकर कहती है कि ‘देश में तो सब ठीक है’। सारा क़सूर विश्व बाज़ार की तेज़ी का है। ज़रूर होगा। सरकार भला क्यों झूठ बोलेगी? वो तो अब बस इतना बता दे कि क्या भारतीय जनता उस दौर में भी बेहद महँगे प्याज़ की बेतहाशा ख़पत कर रही है, जब उसका दाम आसमान छू रहा हो? बेशक़, प्याज़ का दाम न तो कोई राष्ट्रीय समस्या है और ना ही कोई प्राकृतिक आपदा। हरेक दो-तीन साल पर प्याज़ ऐसे ही और लाल हो उठता रहा है। पिछली सरकारों ने भी प्याज़ पर कोई कम आँसू तो बहाये नहीं। लिहाज़ा, सवाल फिर वही है कि यदि प्याज़ की राष्ट्रीय किल्लत है तो आँसुओं की सकल मात्रा घटने के बजाय बढ़ क्यों रही है?

अरे! जब प्याज़ ही कम होगा तो इसे छीला-काटा भी कम ही जाएगा। कम प्याज़ कटेंगे तो इसके काटने पर बहने वाले आँसुओं की मात्रा भी तो घटनी चाहिए या नहीं? बहरहाल, प्याज़ की किल्लत जितनी भी सच्ची या झूठी हो, लेकिन इसे लेकर होने वाली बातों में कहीं कोई कंजूसी नहीं है। हर कोई प्याज़-मर्मज्ञ बना फिरता है। आपने ज़रा सा ज़िक्र छेड़ा नहीं कि सामने वाला फ़ौरन शुरू हो जाएगा। देखते ही देखते अपनी बातों से आपको छलनी कर देगा। इसकी वजह बहुत सीधी है। लोकतंत्र में जनता अपनी सरकार के दिखाये रास्ते पर चलती है। सरकार भी ज़मीन पर कुछ करे या ना करे, बातें करने में कभी कंजूसी नहीं करती। दरअसल, ये दौर ही बातों का है। बातें करना ही असली काम है। कमर्ठता की निशानी है।

ये लेख भी तो बातें ही कर रहा है। इससे न तो प्याज़ का उत्पादन होगा और ना आयात। दाम भी कम होने से रहा। सरकार भी जागने से रही। फिर भी बातें करने का धर्म तो निभाना ही होगा। कोई अपना धर्म कैसे छोड़ सकता है भला? कुत्ते का धर्म है भौंकना, साँप का धर्म है डसना, मच्छर का धर्म है ख़ून चूसना। ऐसे ही क़ुदरत ने हर चीज़ का एक धर्म तय कर रखा है। सभी अपने-अपने धर्म का पालन करना होता है। इसीलिए जितनी बातें प्याज़ की कमी की होती है, उतनी ही इसके आयात की भी होती है। कमोबेश वैसे ही जैसे 2016-17 में दालों के आयात की अनन्त बातें हुआ करती थीं।

ज़रा उस दौर को याद करें। क्या तब सरकार ने आयात की धमकी देकर या वास्तव में दालों के आयात करके इसकी किल्लत को दूर करने और दाम को काबू में लाने की कोशिश नहीं की थी? बेशक़ की थी। सरकार कार्रवाई नहीं करती तो क्या दालें 500 रुपये प्रति किलोग्राम के दाम से नहीं बिकती? तब भी तो खाद्य आपूर्ति मंत्री की ओर से जनता को मीठी गोली दी जाती थी कि ‘दालों का ऐसा आयात किया जा रहा है, मानों सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त होकर ही मानेंगे।’ बातें ख़ूब हुईं इसीलिए दाल के दाम तभी नरम पड़े जब किसानों ने बम्पर पैदाकर करके दिखाया। हालाँकि, ज़्यादा दलहन उत्पादन के बावजूद अभागे किसानों की दुर्दशा बनी ही रही, क्योंकि उनके मुनाफ़े को बिचौलियों, आढ़तियों और सूदख़ोरों की मिलीभगत ने हड़प लिया।

कालाबाज़ारियों और मिलावटख़ोरों की तब भी पौ-बारह थी और आज भी है। इनके लिए कमी दालें बहार का सबब बनती हैं तो कभी आलू-प्याज़ और टमाटर जैसी चीज़ों के दाम। केन्द्र की हो या राज्यों की, इस पार्टी की हो या उस पार्टी की, कोई भी कालाबाज़ारियों का बाल तक बाँका नहीं कर पाता। आयात करने वाली सरकारी कम्पनियों को तभी नींद से जगाया जाता है, जब चिड़ियाँ खेतों को चुग कर फ़ुर्र हो चुकी होती हैं। सौ दिन चले अढ़ाई कोस के संस्कारों में ढली सरकारी कम्पनियाँ क़ीमतों को नीचे लाने के लिए यदि एक लाख टन सामान की ज़रूरत होगी तो हज़ार टन का आयात करते-करते हाँफ़ने लगती हैं।

अब ज़रा ये समझिए कि ऐसी तमाम बातें कितनी बनावटी होती हैं? सरकार के पास एक से बढ़कर एक एक्सपर्ट यानी विशेषज्ञ होते हैं, जो वक़्त रहते आगाह करते हैं कि अति-वृष्टि यानी अत्यधिक बारिश की वजह से किसानों की किन-किन फ़सल को कैसा-कैसा नुकसान होने वाला है। इसी बुरी ख़बर से कालाबाज़ारियों में ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है। ज़माख़ोर तैयार होकर शिकार पर निकल पड़ते हैं। सरकारी बाबुओं को भी रिश्वतख़ोरी और मक्कारी की ख़ुराक़ मिल जाती है। छापेबाज़ी का ढोंग किया जाता है। तरह-तरह की झूठी ख़बरें ‘प्लांट’ होती हैं। इससे जनता को बहकाया और बरगलाया जाता है।

वर्ना, ज़रा सोचिए कि यदि हम भारत में 80 प्रतिशत ईंधन की आपूर्ति आयातित कच्चे तेल से हमेशा कर सकते हैं कि तो वक़्त रहते प्याज़ का आयात करके क़ीमतों पर नकेल क्यों नहीं कस पाते? क्या सिर्फ़ इसलिए कि कच्चे तेल का आयात हमारी बड़ी प्राथमिकता है, क्योंकि यही केन्द्र और राज्य सरकारों की आमदनी यानी टैक्स-संग्रह का सबसे बड़ा ज़रिया है। दूसरे शब्दों में कहें तो कच्चे तेल के आयात में यदि कोताही होगी तो ये सरकार को बहुत ज़्यादा भारी पड़ेगा। उसके कर्मचारियों को तनख़्वाह के लाले पड़ने लगेंगे। सरकारी ठाठ-बाट और शान-ओ-शौक़त पर आँच आएगी। दूसरी ओर प्याज़-टमाटर, खाद्य तेल और दालों की क़ीमतों के चढ़ने-उतरने से सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उल्टा उसके चहेते ज़माख़ोरों में हर्ष और उल्लास की लहर दौड़ने लगेगी। तभी तो ‘अच्छे दिन’ का मज़ा मिलेगा।

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किन पंच-तत्वों पर निर्भर रहेगी महाराष्ट्र के महा-प्रयोग की तक़दीर?

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Maharashtra Govt Collision

राजनीति को ‘अनन्त सम्भावनाओं का खेल’ कहा गया है। इसमें कोई भी अछूत नहीं होता। राजनीति का सत्ता और कुर्सी के पीछे भागना अनिवार्य है। राजनीतिक विचारधाराएँ सिर्फ़ मुखौटा होती हैं। विजेता ही नैतिकता को परिभाषित करता है। नहीं जीतने वाले अंगूरों को खट्टा बताते रहते हैं। राजनीति में खाने और दिखाने के दाँत हमेशा अलग ही होते हैं। राजनीति में किसी की भी कथनी और करनी हमेशा एक जैसी नहीं होती। गठबन्धन को राजनीति का प्रमुख वाद्ययंत्र कह सकते हैं। इसके साज़िदें बेमेल सुरों के तालमेल से सुरीलापन विकसित करते हैं। इसीलिए यक्ष-प्रश्न ये है कि महाराष्ट्र में सियासी सुरीलेपन की अभी जो तरंगें उभरी हैं, वो कैसे सुहानी रह पाएँगी?

चुनाव पूर्व गठबन्धन जहाँ प्रतिद्वन्दियों की ताक़त का अन्दाजा लगाकर बनते हैं, वहीं चुनाव बाद वाले गठबन्धन ‘जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी’ के उसूल से चलती है। गठबन्धन की बुनियाद परस्पर मान-सम्मान, सह-अस्तित्व, साफ़-सुथरा लेन-देन या हिसाब-क़िताब तथा भूल-चूक लेनी-देनी के उसूलों से चलता है। गठबन्धन तभी तक टिकाऊ रहता है जब तक कि एक-साथ हुए राजनीतिक दल अपनी-अपनी थालियों में खाकर सन्तुष्ट रहते हैं। जैसे ही दूसरे की थाली में हाथ मारने की कोशिशें होती हैं, वैसे ही गठबन्धन टूटने लगता है। गठबन्धन की समन्वय समिति ही उसे रस्सी की तरह बाँधे रखती है। ये ‘थर्ड अम्पायर या वीडियो रेफ़री’ की तरह होते हैं। इनके निष्पक्ष रहने तक ही गठबन्धन का मैच चलता है।

राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले सुधी पाठक उपरोक्त नियमों को खेल के मैदान की सीमा-रेखाओं या लक्ष्मण-रेखाओं की तरह भी देख सकते हैं। इन्हीं सरहदें अथवा चुनौतियों से तय होगा कि मुम्बई में उद्धव ठाकरे की अगुवाई में बनी महाविकास अघाड़ी सरकार कितनी टिकाऊ और सुरीली होगी? महाराष्ट्र का महा-प्रयोग अब निम्न पंच-तत्वों पर ही निर्भर रहेगा। इसे परीक्षा के उस प्रश्न-पत्र की तरह देखा जा सकता है, जिसमें सबसे ऊपर निर्देश लिखा है कि ‘प्रश्न संख्या एक अनिवार्य है!’

उदार बनाम कट्टर हिन्दुत्व

भारतीय राजनीति में हिन्दुत्व का अंश हमेशा रहा है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि गाँधी के अनुयायी उदार वाले रास्ते पर चले और संघ के खिलाड़ियों ने कट्टर की राह थामी। एक पर अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के आरोप लगे तो दूसरे पर बहुसंख्यकों को उकसाने के। एनसीपी और काँग्रेस की छवि जहाँ नरम हिन्दुत्व वाली है, वहीं शिवसेना की पहचान आक्रामक हिन्दुत्व वाली रही है। शिवसैनिकों के लिए विनम्र बनना भले ही बहुत मुश्किल हो, लेकिन सरकार चलानी है तो अपने तेवरों से समझौता करना ही होगा।

उद्धव का अयोध्या दौरा रद्द करना ये बताता है कि वो लचीलेपन के लिए राज़ी हैं। शिवसैनिकों को अब परप्रान्तीयों को आड़े हाथों लेने के अपने अन्दाज़ से भी परहेज़ करना होगा। गोडसे को देशभक्त बताने पर बीजेपी जैसी सख़्ती से अपनी सांसद प्रज्ञा ठाकुर के साथ पेश आयी है, उसे देखते हुए सावरकर को भारत-रत्न देने के अपने नज़रिये से शिवसेना को भी तौबा करना होगा। नाटक-फ़िल्म का हिंसक विरोध करने के पुराने रवैये से बचना होगा। क्रिकेट मैच से पहले पिच खोदने वाले आदतें छोड़नी होंगी। शिवसेना में यदि ऐसे बदलाव दिखे तभी महाविकास अघाड़ी की सरकार पाँच साल चल जाएगी।

तोड़-फोड़ से बचाव का कवच

तीनों दलों को अपने-अपने घरों को दलबदलुओं की सेंधमारी से बचाना होगा। काँग्रेस-एनसीपी को कर्नाटक, गोवा, बिहार, अरूणाचल, मेघालय, मिज़ोरम, उत्तराखंड जैसे राज्यों से मिले सबक को गाँठ बाँधकर रखना होगा। बीजेपी के मुँह में नरभक्षी का ख़ून लगा हुआ है। वो तोड़-फोड़ करके महाविकास अघाड़ी की गाड़ी को पंचर करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ने वाली, लिहाज़ा तीनों दलों को अपने असन्तुष्टों को साधने के लिए पुख़्ता कवच विकसित करना होगा। इस लिहाज़ से तीनों दलों को ही एक-दूसरे पर निगरानी रखते हुए उनकी मदद के लिए तत्पर रहना होगा। शिवसेना के लिए भी ये बेहतर होगा कि पवार परिवार की तर्ज़ पर वक़्त रहते राज ठाकरे से सुलह-सफ़ाई करके अपने परिवारिक क़िले को मज़बूत बना ले। वर्ना, परिवारिक घाव उसे बहुत भारी पड़ सकता है।

ताल-मेल की तकनीक

सरकार चलाने का असली मंत्र परस्पर ताल-मेल ही होगा। इसके कई रूप हैं। नीतियों के लिए तो ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ बन गया, लेकिन जब तक ‘मुख्यमंत्री का फ़ैसला अन्तिम’ वाला नियम चलेगा तभी तक सरकार बग़ैर खटपट के चल पाएगी। मुख्यमंत्री को भी सहयोगियों को उनकी राजनीति के लिए पर्याप्त जगह छोड़नी होगी। जल्द ही ये ऐलान भी ज़रूरी है कि क्या शिवसेना, अब यूपीए का हिस्सा बन चुकी है? यदि हाँ, तो फिर भविष्य के चुनावों में उतरने के लिए महाविकास अघाड़ी का फ़ॉर्मूला क्या होगा? तीनों दलों के नेताओं का दावा भले ही ये हो कि सरकार के फ़ैसले आमसहमति से लिये जाएँगे, लेकिन रोज़मर्रा में यही असली अग्नि-परीक्षा होगी। अघाड़ी में उद्धव जैसे नौसिखिए को सीखना होगा कि वो अनुभवी मुख्यमंत्रियों पृथ्वीराज चाव्हाण, अशोक चाव्हाण, शरद पवार, सुशील कुमार शिन्दे जैसों को कैसे साध पाएँगे? अन्य नेताओं की महत्वाकांक्षों को काबू में रखना भी तलवार की धार पर चलने जैसा होगा।

केन्द्र से सम्बन्ध

मौजूदा केन्द्र सरकार के पास अपार बहुमत है। उसे इसका अहंकार होना स्वाभाविक है। बीजेपी को विरोधी दलों की सरकारों को अस्थिर करके गिराने का चस्का लग चुका है। चुनाव में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी महाराष्ट्र बीजेपी विपक्ष में शान्ति से नहीं बैठने वाली। वो सरकार की नाक में दम करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ने वाली। केन्द्र सरकार से उसे पूरी शह मिलती रहेगी। ऐसे में महाराष्ट्र और केन्द्र सरकार के सम्बन्धों का हमेशा तल्ख़ रहना तथा राजभवन में सियासी साज़िशों का होना स्वाभाविक है। उद्धव इस चुनौती से अच्छी तरह से वाक़िफ़ हैं। तभी तो उन्होंने ‘मुख्यमंत्री की कुर्सी को नुकीली कीलों से भरपूर’ कहा है। उन्हें अब केन्द्र में अपनी सरकार होने का लाभ नहीं मिलेगा। ‘केन्द्र से रिश्ते की तासीर’ अब बहुत कठिन चुनौती होगी।

चुनावी वादे निभाना

हरेक सरकार अपने चुनावी वादों को ‘पहली प्राथमिकता’ भले ही बताती है, लेकिन व्यवहारिक राजनीति का तकाज़ा इसे ‘आख़िरी प्राथमिकता’ बना देता है। लिहाज़ा, जब तक महाविकास अघाड़ी उपरोक्त चारों प्रश्नों या चुनौतियों के सही-सही समाधान करने में सफल रहेगी, तभी तक इस पाँचवें मुद्दे यानी चुनावी वादों को निभाने की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता निकलता रहेगा। तीन दलों को मिलकर एक-दूसरे के साथ ताल-मेल बिठाकर उन चुनावी मुद्दों को अमली जामा पहनाने की कोशिश करनी होगी जिसे ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ में जगह मिली है। तीनों दलों को बराबर से इस बात के लिए सतर्क रहना होगा कि उन पर भ्रष्टाचार के इतने गम्भीर आरोप नहीं लगें जिनका सामना करना मुश्किल हो जाए। तीनों को ये नहीं भूलना चाहिए कि सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग, हर पल उनके शिकार की फ़िराक़ में क्यों नहीं रहेंगे?

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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