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विपक्ष में है हिम्मत तो करे ऐलान कि सत्ता में लौटे तो ख़त्म होगा अनुच्छेद 164 और 356!

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Maharashtra Crisis

यदि आप महाराष्ट्र में आनन-फ़ानन में देवेन्द्र फड़नवीस और अजीत पवार की ताजपोशी के लिए राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी जैसे परजीवी को क़सूरवार मानते हैं, तो मानते रहें।

धुनते रहें अपना सिर। कोसते रहे मोदी-शाह को, संविधान को, लोकतंत्र को। अब कुछ नहीं होने वाला। या फिर, अब महाराष्ट्र में वही होगा जो दिल्ली चाहेगी।

उद्धव-शरद-सोनिया को अब एक बार फिर वैसी ही शानदार पटखनी मिल चुकी है, जैसी पिछले दिनों लालू-देवेगौड़ा-राहुल और महबूबा को मिली थी। साफ़ है कि विपक्ष की राजनीति करने वाले किसी भी महारथी ने बिहार, गोवा, कर्नाटक, उत्तराखंड, अरूणाचल और जम्मू-कश्मीर से अनुभवों और इतिहास से कुछ नहीं सीखा। दूसरी ओर, बीजेपी को अनुच्छेद 164 और 356 के इतिहास के सारे सबक याद हैं, कंठस्थ हैं।

बदलते दौर के साथ बीजेपी ने उन सारे सिद्धान्तों में महारथ हासिल कर ली जो कभी काँग्रेस का कॉपीराइट हुआ करती थी। बीजेपी ने सत्ता में पहुँचने से पहले भारत की मिट्टी से जो कुछ सीखा, उसे ही तो आज ताल ठोंककर और डंके की चोट पर आज़मा रही है।

इसीलिए सियासी कुश्तियों की विजेता बार-बार वही बनती है। एकलव्य की तरह बीजेपी ने काँग्रेस रूपी द्रोणाचार्य से सारी धनुर्विद्या को यूँ नहीं हथियाया। कठिन साधना करके वो पारंगत हुई है। उसने एक बार फिर विरोधियों के लिए बेहद मोटे अक्षरों से दीवार पर लिख दिया कि ‘अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत’।

अलबत्ता, अब खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचना चाहती है तो नोचती रहे। कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला! बेशक़, महाराष्ट्र ने बीजेपी और शिवसेना को साझा जनादेश दिया था। लेकिन ये भी सच है कि जनादेश से धोखाधड़ी सिर्फ़ शिवसेना ने नहीं की, बल्कि अजीत पवार ने भी तो वही किया। जो शिवसेना महाराष्ट्र में करने में विफल रही वही तो बीजेपी ने बिहार में सफलतापूर्वक करके दिखाया।

लिहाज़ा, कल तक जिस ‘पाप’ की गुनहगार शिवसेना थी, क्या आज वैसे ही ‘पापी’ अजीत पवार के पापों को धोकर बीजेपी ने कोई ‘पुण्य’ कमाया है? वक़्त जो भी लगे लेकिन राजनीति से इन सवालों का जबाब शायद ही कभी मिले। यदि कभी कुछ बदलेगा तो सुप्रीम कोर्ट से निकलने वाले ‘बोम्मई-2’ या ‘केशवानन्द भारती-2’ जैसे किसी फ़ैसले से ही बदलेगा।

जब ऐसा होगा, तब होगा। इसके होने तक राजनीति की काली-अँधेरी रात ऐसे ही जारी रहेगी।
कोई राज्यपाल साधु नहीं होता। अनुच्छेद 164 और 356 के रहते हो भी नहीं सकता। काँग्रेसी राज्यपाल भी कभी साधु नहीं रहे तो संघी राज्यपाल भला क्यों होने लगे? क्या सिर्फ़ इसलिए कि भगवा ख़ानदान ने कभी चाल-चरित्र-चेहरे की बात की थी? राजनीति तो चीज़ ही बातें बनाने की है।

कौन बातें नहीं बनाता? कौन तानाशाही नहीं करता? क्या काँग्रेस ने तानाशाही में कभी कोई कोर-कसर छोड़ी थी। अरे, काँग्रेस ने तो अनुच्छेद 164 और 356 की बदौलत अपनी पार्टी और अपने मुख्यमंत्री तक की सरकार को भी उखाड़ फेंका है! कोश्यारी ने वही किया जो ‘ऊपर’ से हुक़्म मिला। हमेशा यही होता रहा है। अब आप देते रहिए दुहाई कि राज्यपाल ने क्या सही किया और क्या ग़लत? देते रहिए मिसाल कि केन्द्र में कब-कब और किन-किन सरकारों ने कैसे-कैसे अनुच्छेद 164 और 356 के ज़रिये लोकतंत्र का चीरहरण किया? बताते रहिए कि कौन ज़्यादा नंगा है और कौन कम? जाइए सुप्रीम कोर्ट और कीजिए संसद का चक्का जाम! किसी का कुछ नहीं बनने-बिगड़ने वाला।

ख़रीद-फ़रोख्त और सौदेबाज़ी हो चुकी है। खेल ख़त्म और पैसा हज़म। भविष्य में शिवसेना और काँग्रेस में भी टूट-फूट हो जाए तो ताज़्ज़ुब मत कीजिएगा। राजनीति अब गाँधी के उसूलों पर नहीं, बल्कि रुपये पर छपी उनकी तस्वीर के पीछे चलती है।

याद रखिए, बीजेपी आज ‘तानाशाही’ के जिन सिद्धान्तों पर चल रही है, उसकी पाठशाला का शिलान्यास जवाहर लाल नेहरू ने ही नम्बूदरीपाद की सरकार को गिराकर किया था। वही पाठशाला 70 सालों में देखते ही देखते विश्वविद्यालय में बदल चुकी है। केन्द्र की हरेक सरकार इस विश्वविद्यालय की निरंकुश कुलपति रह चुकी है।

अभी तो बीजेपी का कार्यकाल है। उस पर दोष क्यों? कोई अपवाद नहीं है। लिहाज़ा, विधवा-विलाप से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। बस, ख़त्म बात। दरअसल, संविधान निर्माताओं और उसकी व्याख्या करने वाले सुप्रीम कोर्ट की अनुच्छेद 164 और 356 को लेकर चाहे जो धारणा रही हो, लेकिन ये अकाट्य सच है कि इन्हीं दोनों अनुच्छेदों की बदौलत होने वाला सियासी नंगा नाच आज भारतीय राजनीति और संविधान के सबसे बड़े कलंक का दर्ज़ा हासिल कर चुका है।

बेशक़, संविधान एक नायाब दस्तावेज़ है। लेकिन अनुच्छेद 164 और 356 इसके ऐसे ‘ब्लैक-होल’ की तरह है जो 70 सालों में और स्याह ही होते चले गये। अनुच्छेद 164 की बदौलत ही राज्यपाल किसी को भी मुख्यमंत्री बना देते हैं या कभी भी जल्लाद बनकर किसी भी सरकार का गला दबा देते हैं। उनसे ये काम केन्द्र सरकार अनुच्छेद 356 के तहत करवाती है।

भारतीय राजनीति में अनुच्छेद 164 और 356 के बेज़ा इस्तेमाल की बुनियाद भले ही नेहरू युग में काँग्रेसियों ने रखी। लेकिन कालान्तर में दिल्ली में सत्तासीन हुई हरेक सशक्त या लूली-लंगड़ी राजनीतिक शक्ति ने भी अपने सियासी स्वार्थ के लिए इसका अपार दोहन किया। अनुच्छेद 164 और 356 ने ही राजनीति में सुचिता और विचारधारा जैसी सभी बातों को क़िताबी और काल्पनिक बना दिया।

संविधान के यही दोनों अनुच्छेद समाज में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली उपमा के संवाहक हैं। व्यवहार में इससे ज़्यादा दबंगई, अतार्किकता और मनमानीपूर्ण आचरण और कुछ नहीं है। किसी ज़माने में जिन तर्कों के साथ किसी की बहू-बेटी को घर से उठा लिया जाता था, उसी तरह से संविधान के लागू होने के बाद किसी निर्वाचित सरकार को या तो चुटकियों में ज़मींदोज़ कर दिया जाता है या फिर सारे विधि-विधान को ताक़ पर रखकर किसी की भी ताजपोशी कर दी जाती है।

राज्यपाल को केन्द्र में बैठे अपने आकाओं के इशारे पर नाचना पड़ता है। वहाँ से मिली उधार की साँसों पर ही जीना पड़ता है। उसे राजभवन की शान-ओ-शौक़त का लुत्फ़ उठाते हुए दिल्ली की ओर मुँह करके बस एक ही मंत्र-जाप करना होता है कि ‘जो तुमको हो पसन्द वही बात कहेंगे, तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे!’ इस मंत्र को ही राज्यपाल का निजी संविधान या ‘इन्दीवर कोड’ भी कह सकते हैं। 1970 की ‘फ़िल्म सफ़र’ में इसी ‘इन्दीवर कोड’ का शानदार फ़िल्मांकन हुआ।

राजनीतिक संगीत की दृष्टि से देखें तो ‘राज्यपाल’ सबसे ढीठ या बेशर्म राग है। इसके गायन, वादन और नृत्य जैसी विधाएँ किसी व्याकरण या मर्यादा से नहीं बँधी हैं। इसे किसी भी प्रहर में गाया जा सकता है। ये आरोह-अवरोह, ताल, ख़्याल जैसी शास्त्रीय वर्जनाओं से भी सर्वथा उन्मुक्त है। यहाँ तक कि अराजकता का कोई भी दायरा इसकी पैमाइश नहीं कर सकता।

कहने को राज्यपाल अपने राज्य का संवैधानिक मुखिया है, लेकिन उसकी औकात केन्द्र सरकार के चपरासी या अर्दली से ज़्यादा नहीं होती। इसीलिए उसे केन्द्र की कठपुतली, एजेंट या दलाल भी कहते हैं। केन्द्र की सत्ता में रहने वाली हरेक पार्टी जब सत्ता से बाहर होती है तो राज्यपाल में नीति और मर्यादा के तत्व ढूँढ़ती फ़िरती है।

लेकिन अपने चुनावी घोषणापत्र या संकल्प-पत्र में कभी ये नहीं कहती कि जब वो सत्ता में लौटेगी तो अनुच्छेद 164 और 356 को कलंक-मुक्त करने का इन्तज़ाम करेगी। ये पुलिस-सुधार जैसा ही राजरोग है। कोई इसका पुख़्ता इलाज़ नहीं करना चाहता।

लिहाज़ा, हिम्मत है तो विपक्ष में बैठी काँग्रेस और उसके सहयोगी ये ऐलान करे कि वो जब कभी सत्ता में लौटेंगे तो अनुच्छेद 164 और 356 के दुरुपयोग के सभी दरवाज़ों को हमेशा-हमेशा के लिए बन्द करके दिखाएँगे। ज़रूरत पड़ी तो राज्यपाल के पद को ही ख़त्म करके दिखाएँगे।

बिल्कुल वैसे ही जैसे सत्ता की ख़ातिर बीजेपी ने 370, राम मन्दिर और समान नागरिक संहिता के अपने एजेंडे से चाहे जितना समझौता किया हो, लेकिन पार्टी के संकल्प पत्रों में चुनाव दर चुनाव इनके प्रति अपनी निष्ठा ज़ाहिर करती रही।

दरअसल, सत्ता का स्वभाव है कि वो हमेशा निरंकुश ही रहना चाहती है। इसीलिए अब सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट ही एकमात्र ऐसी जगह है जहाँ से इस राजरोग का इलाज़ मुमकिन है। लेकिन ये कब होगा, कैसे होगा, होगा भी कि नहीं, इसे कोई नहीं जानता। ‘देवो न जानाति कुतो मनुष्यम्’ यानी देवता भी नहीं जानते तो इंसान की औक़ात ही क्या है!

ओपिनियन

हेमंत की ‘बदलाव यात्रा’ ने बदली झारखंड की सत्ता और सियासत

हेमंत सोरेन ने ‘बदलाव यात्रा’ की शुरुआत संथाल परगना के साहिबगंज से की थी और इसका समापन रांची में हुआ। इस यात्रा के दौरान उन्होंने पूरे झारखंड के सुदूर इलाकों का दौरान किया और लोगों की समस्याएं सुनीं और उसके समाधान का वादा किया।

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Jharkhand CM oath-taking ceremony

रांची। झारखंड की राजनीति में एक सौम्य और साधारण चेहरा माने जाने वाले हेमंत को भले ही राजनीति विरासत में मिली है, परंतु अपने पिता शिबू सोरेन की छांव से खुद को बाहर निकाल कर उन्होंने अपने संघर्ष के बल दोबारा राज्य की सत्ता हासिल की है।

हेमंत ने चुनाव पूर्व अपने सहयोगियों के साथ सीट बंटवारे में उदारता दिखाई और सहयोगियों को खुश रखा। उन्होंने अपनी टीम को लेकर संघर्ष किया और झामुमो को उस जगह पहुंचाया, जहां पहुंचना कठिन-सा लगने लगा था। विधानसभा चुनाव में झामुमो सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। उन्होंने सहयोगियों के साथ ऐसा समन्वय बनाया कि सभी ने एक-दूसरे को सहयोग किया और गठबंधन बहुमत के आंकड़े से काफी आगे निकल गया।

हेमंत ने राजनीति का ककहरा अपने पिता शिबू सोरेन से सीखा है और राजनीति में उनका आगमन बड़े भाई दुर्गा सोरेन के आकस्मिक निधन के बाद हुआ। लेकिन जब उन्होंने राजनीति में कदम रखा तो इस मजबूती के साथ कि आज वह दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बन पाए हैं। हमेशा जनता के बीच रहना उनकी राजनीति का अहम हिस्सा रहा है और उसी के परिणामस्वरूप वह आगे बढ़ते चले गए। पारिवारिक और सामाजिक व्यक्ति की पहचान के साथ 2019 के विधानसभा चुनाव में हेमंत ने नई रणनीति बनाई और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की रघुवर दास सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया।

हेमंत ने अपने आज के अभियान की शुरुआत सितंबर, 2018 से ही कर दी थी। लोकसभा चुनाव से पहले जो अभियान झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने शुरू किया था, उसे ‘संघर्ष यात्रा’ का नाम दिया था। इसके तहत वह राज्य के सभी 263 प्रखंडों में पहुंचे और वहां जाकर सभाएं की। उन्होंने कार्यकर्ताओं में जोश भरा और युवाओं को पार्टी से जोड़ा।

इस दौरान झारखंड के लिए शहीद हुए आदिवासियों को उन्होंने सम्मानित भी किया। इसी दौरान उन्होंने अपनी एक 12 सदस्यीय टीम बनाई, जिसने बड़े पैमाने पर डिजिटल प्रचार अभियान चलाया।

लातेहार से झामुमो के नवनिर्वाचित विधायक वैद्यनाथ राम कहते हैं, “हेमंत को प्रारंभ से ही सादगी पसंद है। वह वन-टू-वन लोगों से मिलते हैं और उनकी समस्याओं को सुनकर उनके समाधान की कोशिश करते हैं। इससे लोगों में विश्वास पैदा होता है।”

झामुमो के संगठन से जुड़े एक नेता का कहना हैं, “संघर्ष यात्रा की समाप्ति के बाद हेमंत ‘बदलाव यात्रा’ पर निकल गए और उन्होंने लोगों से सत्ता बदलने की अपील की। इस दौरान उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को एकजुट रखा। पार्टी में ‘वन मैन’ की रणनीति के तहत सोरेन ने जमकर मेहनत की और सहयोगी दलों के साथ जुड़ाव बनाए रखा।”

हेमंत सोरेन ने ‘बदलाव यात्रा’ की शुरुआत संथाल परगना के साहिबगंज से की थी और इसका समापन रांची में हुआ। इस यात्रा के दौरान उन्होंने पूरे झारखंड के सुदूर इलाकों का दौरान किया और लोगों की समस्याएं सुनीं और उसके समाधान का वादा किया। लोगों की समस्याओं, उनके समाधान के मुद्दों को उन्होंने घोषणा-पत्र में शामिल किया।

इसका परिणाम यह हुआ कि संथाल परगना के आदिवासी बहुल सीटों तक सीमित मानी जाने वाली पार्टी राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में पहुंच गई। झामुमो का जनाधार बढ़ा, और पहली बार लातेहार और गढ़वा विधानसभा में झामुमो के उम्मीदवारों की जीत हुई।

सोरेन ने अपने अभियान को आधुनिक बनाने के लिए एक प्रोफेशनल टीम को सोशल मीडिया के लिए उतारा। झामुमो के कार्यकर्ताओं को इसके लिए प्रशिक्षण दिलाया और सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया। दूसरी ओर, सुदूर क्षेत्रों में पहुंचने के लिए उन्होंने साइकिल को साधन बनाया, जिस पर सवार होकर कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव लोगों से मुलाकात की और झामुमो का संदेश पहुंचाया।

हेमंत की इस कुशल रणनीति का परिणाम रहा कि भाजपा का ‘अबकी बार 65 पार’ का नारा धरा का धरा रह गया और झामुमो, राजद और कांग्रेस गठबंधन बहुमत का आंकड़ा पार कर सत्ता पर काबिज हो गया।

अब हेमंत के सामने झारखंड के लोगों से किए वादे निभाने की चुनौती है। देखने वाली बात होगी कि हेमंत अपने वादों को निभाने को लेकर कितना खरा उतर पाते हैं।

BY: मनोज पाठक

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ओपिनियन

पुलिस और सेना, सिर्फ़ तब बर्बर नहीं होती जब ‘ऊपर’ से हुक़्म होता है!

IT Cell की बदौलत तरह-तरह के झूठ, अफ़वाह और विरोधियों के चरित्र-हनन का सहारा लेकर बीजेपी ने 2014 में सबको धूल चटा दी। तब तक उसका IT Cell अभेद्य दुर्ग की तरह अपराजेय बन चुका था। 2015 में आम आदमी पार्टी ने भी बीजेपी के आज़माये हुए इसी नुस्ख़े को और सफलता से अपनाया।

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Police and Students Jamia

नये नागरिकता क़ानून का उग्र विरोध असम से शुरू भले ही हुआ, लेकिन अब ये तक़रीबन देशव्यापी है। विरोध स्वरूप सड़कों पर उतरने वाले नागरिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सरकारी तंत्र की सारी अपीलें भी बेअसर साबित हैं। विरोध की आग के रोज़ाना किसी न किसी नये इलाके में फैलने की ख़बरें हैं। विरोधियों को कुचलने के लिए पुलिस की बर्बरता, सरकारी सम्पत्तियों की तबाही, तरह-तरह की अफ़वाहों का फ़ैलना, जनजीवन का अस्त-व्यस्त होना, मृतकों और घायलों की संख्या का बढ़ना, विपक्षी पार्टियों का आक्रोशित होना और सत्ता पक्ष की ओर से विरोधियों पर सियासी रोटियाँ सेंकने का आरोप लगाना — ये सभी बातें हमेशा होती रही हैं। हालाँकि, अब ज़माना बदल चुका है।

अब यदि आपको ये जानना है कि देश के किसी इलाके के हालात कैसे हैं तो इसका बेहद आसान ‘बैरोमीटर’ है कि यदि वहाँ मोबाइल और इंटरनेट बैन हुआ है या नहीं? यदि नहीं हुआ तो हालात काबू में हैं, यदि हुआ है तो स्थिति चिन्ताजनक और गम्भीर है। यदि लैंडलाइन का सम्पर्क भी ख़त्म है और लोगों की आवाजाही पर मनाही है या फिर कड़ा अंकुश है तो समझिए कि माहौल बेहद ख़तरनाक मुक़ाम पर है। पुलिस या सेना की बर्बरता अपने चरम पर है, मानवाधिकारों का वजूद ख़त्म है, प्रभावित इलाके के नागरिकों को बुनियादी सुविधाओं के लाले पड़े हैं।

Representative image: Police lathi charge Credit: YouTube screengrab

सरकारी तंत्र का हरेक बयान हमेशा लीपा-पोती भरा ही होता है। इसके रवैये में इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता कि सरकार किसकी है, सत्ता में कौन है? पुलिस या सेना को जब ‘ऊपर’ से हुक़्म मिलता है कि ‘विरोध को कुचल दो’ तो वो ‘हिंसा’ का इन्तज़ाम करती है। ऐसे तत्वों को विरोधियों के बीच घुसेड़ा जाता है जो हिंसा के हालात पैदा करें कि ‘पुलिस अपनी पे आ जाए’। पुलिस का अपनी पर आना ही बर्बरता है। वो विरोधियों को दंगाई, ज़िहादी, नक्सली, माओवादी जैसा बताएगी और उनका क़त्ल करके लाश को नदी या नहर में बहा देने से भी गुरेज़ नहीं करेगी। एनकाउन्टर तो उसके लिए चुटकियों का खेल है।

यदि ‘ऊपरी हुक़्म’ संयम दिखाने का है तो दर्ज़नों बसों-वाहनों-दुकानों और घरों के फूँके जाने के बावजूद किसी की भी मौत की ख़बर नहीं आएगी। इसीलिए कभी जहाँ महज धारा-144 वाली निषेधाज्ञा से ही बात बन जाती है, वहीं कभी कर्फ़्यू और सेना के फ़्लैग मार्च से भी बात नहीं बनती। अयोध्या विवाद का फ़ैसला आया तो निषेधाज्ञा से ही बात बन गयी। लेकिन 2016 के जाट आरक्षण आन्दोलन के वक़्त सेना का फ़्लैग मार्च भी हरियाणा की व्यापक तबाही को नहीं रोक सका। अभी 5 दिसम्बर 2019 को संसद के सामने ‘रेप और हत्या’ का विरोध कर रही इकलौती युवती पर बर्बरता दिखायी गयी। जबकि इसी संसद से फर्लांग भर दूर नार्थ ब्लॉग के सामने, 1996 में पत्रकारों को प्रदर्शन करने दिया गया।

केन्द्रीय गृह मंत्रालय यानी नार्थ ब्लॉक के सामने प्रदर्शन का वो इकलौता मौका था। तब सरकार या पुलिस ने बर्बरता नहीं दिखायी। उस अप्रत्याशित प्रदर्शन की अगुवाई अपने दौर के मशहूर सम्पादक सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने की थी और इसमें बीएसपी नेता कांशीराम के उस रवैये के ख़िलाफ़ विरोध जताया गया था, जिसमें उन्होंने रिपोर्टर आशुतोष को थप्पर मारा था। 2012 के निर्भया कांड के बाद विजय चौक और राजपथ जैसे अति-संवेदनशील और सुरक्षित इलाकों पर भी प्रदर्शन हुए, लेकिन पुलिस को बर्बरता दिखाने का हुक़्म नहीं था। अलबत्ता, ये वही दिल्ली पुलिस थी जिसने जून-2011 में रामदेव को सलवारी बाबा बनने के लिए मज़बूर कर दिया था।

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Demonstrators during a protest at Vijay Chowk, following the gangrape of a para-medical student in a moving bus, in New Delhi, December, 2012. (Sonu Mehta / HT File )

इसी पृष्ठभूमि में नागरिकों के लिए ये समझना बेहद ज़रूरी है कि आख़िर, मोबाइल या इंटरनेट बैन की नौबत क्यों आती है? दरअसल, बीजेपी या संघ परिवार का संचार-तंत्र हमेशा से बेजोड़ रहा है। कोई भी, कभी भी उनके आसपास तक नहीं फटक पाया। सोशल मीडिया और मोबाइल की मौजूदा पहुँच की बात तो छोड़िए, 1995 में देश में ‘टेली-डेन्सिटी’ भी बेहद मामूली सी थी, लेकिन तब 21 सितम्बर को गणेश चतुर्थी को ऐसी अफ़वाह फैली कि सारी दुनिया में गणेश जी प्रतिमाएँ दूध पीने लगी थीं। संचार-तंत्र की वो अद्भुत मिसाल थी। वहाँ से संघ-बीजेपी में जो आत्मविश्वास पनपा वो साल 2011-12 तक आते-आते अपने चरम पर जा पहुँचा। अब तक बीजेपी के IT Cell ने सारा मोर्चा सम्भाल लिया था।

WhatsApp University और सोशल मीडिया से कैसे-कैसे चमत्कार हो सकते हैं, इसे अमेरिका ने सारी दुनिया को उस वक़्त दिखाया, जब अनोखे प्रचार-तंत्र का फ़ायदा उठाकर जनवरी 2009 में बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बने। बीजेपी ने उस प्रयोग से न सिर्फ़ सबसे अच्छा सबक सीखा, बल्कि इसमें महारत भी हासिल की। अपने IT Cell की बदौलत तरह-तरह के झूठ, अफ़वाह और विरोधियों के चरित्र-हनन का सहारा लेकर बीजेपी ने 2014 में सबको धूल चटा दी। तब तक उसका IT Cell अभेद्य दुर्ग की तरह अपराजेय बन चुका था। 2015 में आम आदमी पार्टी ने भी बीजेपी के आज़माये हुए इसी नुस्ख़े को और सफलता से अपनाया।

Anna-Movement-Kiran-Bedi-Anna-Hazarey-Kejriwal-and-Sisodia
Anna Movement: Kiran Bedi, Anna Hazarey, Arvind Kejriwal and Manish Sisodia-
March 30, 2012

इसके बाद, राजनीति और राजकरण या गवरनेंस की रंगत ऐसी बदली कि इंटरनेट और मोबाइल बहुत बड़े हथियार बन गये। अब सत्ता में बैठे नेता और मंत्री अलग-अलग तरह की बातें फ़ैलाते हैं, तो अफ़सरों का हथकंडा कुछ और होता है। देखते ही देखते आईटी सेल का मुख्य काम भी ‘हिन्दू-मुस्लिम नैरिटव’ को हवा देना बन गया। इसी ने देश में ऐसी फ़िज़ा बनायी कि जो सरकार के साथ नहीं है, वो देशद्रोही है। अनुच्छेद-370 को ख़त्म करने के बाद कश्मीर में लोकतंत्र बर्ख़ास्त है। राज्य के बड़े-बड़े नेता अब भी जेलों में हैं। महीनों तक वहाँ इंटरनेट, मोबाइल और फ़ोन इसलिए ठप रहे क्योंकि सरकार नहीं चाहती है कि उसके नागरिक ही अपने नागरिकों के हाल-चाल की हक़ीक़त जानें। इसे दमन तो कहा जा सकता है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ऐसे दमनकारी हथकंडों का इस्तेमाल करने वाली बीजेपी कोई पहली और एकलौती पार्टी है। हमेशा से सत्ताधारी पार्टियों ने ऐसे ही तेवर अपनाये हैं। पुलिस और सेना हमेशा से बर्बर ही रही है। कोई अपवाद नहीं है।

अभी नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर बने हालात में सिर्फ़ इतना फ़र्क नज़र आया है कि बीजेपी का आईटी सेल और उसके तमाम छोटे-बड़े नेता और मंत्री तब तक साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए काम करते हैं, जब तक कि उन्हें सामने से भी माकूल जवाब ना मिलने लगे। हिंसा या विरोध प्रभावित इलाकों में जब ये जवाब ज़्यादा दमदार साबित होने लगते हैं तो क़ानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए विरोधियों के संचार-तंत्र को निष्क्रिय कर दिया जाता है। ऐसा कभी नहीं हुआ कि अफ़वाह फ़ैलाने की तिकड़मों को किसी एक पक्ष ने ही आज़माया हो। सरकारें और पुलिस भी ख़ूब झूठ फ़ैलाती रही हैं। अलबत्ता, हरेक मौक़े के लक्ष्य अलग-अलग ज़रूर होते हैं।

Jamia Milia Students CAB Protest 4
Jamia Milia Students Anti CAB Protest at Delhi Jamia Nagar Area.

मसलन, दिल्ली में गरमाये विरोध का ताना-बाना यहाँ के आगामी विधानसभा चुनाव से जुड़ा है। IT Cell की मंशा है कि जामिया और जेएनयू के छात्रों के विरोध को मुसलमानों के विरोध की तरह पेश किया जाए। ऐसा करने से यदि हिन्दुओं का ध्रुवीकरण हो गया तो शायद, बीजेपी की दिल्ली में लाज़ बच जाए, वर्ना ज़मीनी स्तर पर हवा उसके ख़िलाफ़ है। हाल का चुनावी सर्वे भी इसकी पुष्टि करता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि यही फ़ार्मूला देश के अन्य इलाकों में भी लागू हो। मिसाल के तौर पर, दिल्ली में जामिया और ओखला के इलाकों में तो इंटरनेट बैन होगा, लेकिन बंगाल और असम में ये किसी छोटे इलाके तक सीमित नहीं रहेगा। अलीगढ़ और हैदराबाद में अपेक्षाकृत बड़ा इलाका प्रभावित होता है तो लखनऊ का छोटा क्षेत्र।

हालाँकि, इसी नियम के तहत, कश्मीर के इंटरनेट बैन को सबसे व्यापक व्यापक बनाया जाता है। लेकिन 2016 और 2018 में पश्चिम बंगाल का माल्दा साम्प्रदायिक आग में सुलगता रहता है और वहाँ इंटरनेट पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगता, क्योंकि तब IT Cell जैसी सामग्री फैला रहा था, उससे बीजेपी को बंगाल के चुनाव में फ़ायदा मिलने की उम्मीद दिख रही थी। ज़ाहिर है, यदि माहौल बीजेपी या सरकार के ख़िलाफ़ होगा तो इंटरनेट का बैन होना तय है। अलबत्ता, ये भी सही है कि किसी भी विरोध के हिंसक होने से सत्तारूढ़ पार्टी को ही फ़ायदा होता है क्योंकि हिंसा से आन्दोलन की गरिमा गिरने लगती है, उसकी शुचिता भंग होती है। आन्दोलनकारियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती ख़ुद को हिंसा से दूर रखने और किसी के उकसावे में नहीं आने की होनी ही चाहिए। वर्ना, सारी मेहनत पर पानी फिरते देर नहीं लगती।

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आज वक़्त है कि आप महात्मा गाँधी के इस भाषण को ज़रूर पढ़ें

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Mahatma Gandhi Speech After Freedom

नागरिकता क़ानून को लेकर उत्तर-पूर्वी राज्य उबल रहे हैं। सरकार को शान्ति और ‘ऑर्डर’ क़ायम रखने के लिए सेना को बुलाने का आख़िर तरीक़ा अपनाने के लिए मज़बूर होना पड़ा है। हालाँकि, यही वो सबसे मुफ़ीद वक़्त है, जब भारतवासियों को महात्मा गाँधी के उस भाषण को पढ़ना चाहिए जो उन्होंने 15 नवम्बर 1947 को दिल्ली में हुई अखिल भारतीय काँग्रेस समिति की बैठक में बोला था। पेश है उसी भाषण के अंश, जिसे ‘सम्पूर्ण गाँधी वांगमय के 10वें खंड के पृष्ठ 35-38’ से लिया गया है।

महात्मा गाँधी

“…मैंने करने या मरने की प्रतिज्ञा की थी। अवसर आने पर सचमुच मैं करूंगा या मर जाऊंगा। मैंने जो कुछ देखा है उससे इतना समझ गया हूं कि हम सब तो पागल नहीं हुए हैं लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है जिनका दिमाग फिर गया है। पागलपन की इस लहर के लिए क्या चीज़ ज़िम्मेदार है? कारण कुछ भी हो लेकिन यह बात स्पष्ट है कि अगर हमने इस पागलपन से छुटकारा नहीं पाया तो जो आज़ादी हमें मिली है, उससे हम हाथ धो बैठेंगे। आज हम जिस संकट की स्थिति में है उसकी गम्भीरता आपको समझनी और स्वीकार करनी चाहिए। आपको अत्यन्त गम्भीर समस्याओं का सामना करना है और उसका समाधान ढूंढने का प्रयत्न करना है।

…मैं चाहता हूं कि आप कांग्रेस के बुनियादी सिद्धान्तों के प्रति सच्चे रहें और हिन्दुओं तथा मुसलमानों में एकता स्थापित करें। यह एकता वह आदर्श है जिसकी प्राप्ति के लिए कांग्रेस 60 वर्षों से भी ज़्यादा समय से काम करती रही है। यह आदर्श अभी भी कायम है। कांग्रेस ने कभी ऐसा नहीं कहा है कि वह केवल हिन्दुओं के हितों के लिए ही कार्य करती है। जबसे कांग्रेस का जन्म हुआ है तब से ही वह जिस चीज़ का दावा करती रही है, क्या उसे छोड़ दें और नया सुर अलापने लगें? कांग्रेस भारतवासियों का संगठन है, उन सबका अपना संगठन है जो इस देश में निवास करते हैं, चाहे वे हिन्दू हों, या मुसलमान, ईसाई, सिख या पारसी। मुसलमान, ईसाई और पारसी कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर रह चुके हैं। लेकिन आज हम एक दूसरा ही नारा सुनते हैं। मैं आप को बता दूं कि आज हम जो सुनते हैं वह कांग्रेस की आवाज़ नहीं है।

…आज जो कुछ हो रहा है उससे मैं लज्जित हूं। भारत में ऐसी चीज़ें कभी नहीं होनी चाहिए। हमें यह बात समझानी होगी कि भारत केवल हिन्दुओं का नहीं है और न पाकिस्तान केवल मुसलमानों का। मैंने हमेशा माना है कि यदि पाकिस्तान केवल मुसलमानों का ही देश बन गया तो यह ऐसा पाप होगा जो इस्लाम को ही नष्ट कर देगा। इस्लाम ने ऐसी शिक्षा कभी नहीं दी है। अगर हिन्दू, हिन्दुओं की हैसियत से भारत के एक पृथक राष्ट्र होने का दावा करें और मुसलमान पाकिस्तान में ऐसा दावा करें तो यह कभी चल नहीं सकता। सिखों ने भी कभी-कभी सिक्खिस्तान की बात की है। यदि हम ऐसे दावे करेंगे तो भारत और पाकिस्तान दोनों नष्ट हो जाएंगे, कांग्रेस नष्ट हो जाएगी, और हम सब नष्ट हो जाएंगे।

मैं मानता हूं कि भारत हिन्दू और मुसलमान, दोनों का है। जो कुछ हुआ उसके लिए आप मुसलिम लीग को दोषी ठहरा सकते हैं और कह सकते हैं कि दो-राष्ट्र का सिद्धान्त इस बुराई की जड़ है, और मुसलिम लीग ने ही यह विष-बीज बोया था। फिर भी मेरा कहना है कि दूसरों ने बुराई की, केवल इसी कारण हम भी बुराई करें तो हम हिन्दू धर्म के साथ घात करते हैं। अपने बचपन से ही यह मैं जानता हूं कि हिन्दू धर्म हमें बुराई के बदले भलाई करने की शिक्षा देता है। पापी को उसका पाप ही ले डूबता है। क्या उनके साथ हम भी डूब मरें? हिन्दू धर्म ने मुझे जो सिखाया है, 60 वर्षों के मेरे अनुभव से उसकी पुष्टि हुई है। इस्लाम भी यही बात कहता है। कांग्रेस का यह बुनियादी सिद्धान्त है कि भारत जितना हिन्दुओं का है, उतना ही मुसलमानों का भी है। मैं यह भी जानता हूं कि जो कुछ भी हुआ है उसमें कांग्रेस का कोई हाथ नहीं था।…

कुछ लोगों का कहना है कि पाकिस्तान में हिन्दुओं और सिखों पर जो अत्याचार किये गये हैं, उनसे ज़्यादा नृशंस अत्याचार हम यहां मुसलमानों पर करें तो इससे पाकिस्तान के मुसलमानों को एक अच्छा सबक मिलेगा। बेशक उन्हें सबक तो मिल जाएगा, लेकिन इस बीच आपका क्या होगा? आप कहते हैं कि आप भारत में मुसलमानों को नहीं रहने देंगे, लेकिन मेरी मान्यता है कि साढ़े तीन करोड़ मुसलमानों को यहां से भगाकर पाकिस्तान पहुंचा देना असम्भव है। उन्होंने क्या अपराध किया है? बेशक मुसलिम लीग अपराधी है, लेकिन हर मुसलमान तो दोषी नहीं है। अगर आप समझते हैं कि वे सभी देशद्रोही हैं और पाकिस्तान के पांचवें दस्ते का कार्य करते हैं, तो बेशक उन्हें गोली मार दीजिए, लेकिन यह सोचना कि वे मुसलमान हैं, इसलिए अपराधी हैं, गलत है। यदि आप उन्हें मारते पीटते हैं, धमकाते हैं, तो वे पाकिस्तान भाग जाने के अलावा क्या कर सकते हैं? आख़िरकार जीवन तो उन्हें प्यारा है ही। लेकिन आपके लिए ऐसा करना उचित नहीं है। इस तरह आप कांग्रेस को बदनाम करेंगे, अपने धर्म को बदनाम करेंगे और राष्ट्र को बदनाम करेंगे।

यदि आप इस बात को समझते हैं कि जिन मुसलमानों को मजबूरन पाकिस्तान जाना पड़ा है, उन्हें वापस बुलाना आपका कर्तव्य है। हां, जो मुसलमान पाकिस्तान में विश्वास रखते हैं, और वहीं अपनी खुशी हासिल करना चाहते हैं, वे शौक से जाएं। उनके लिए कोई रोक टोक नहीं है। उन्हें वहां जाने के लिए सैनिक बलों की सुरक्षा की ज़रूरत नहीं होगी। वे अपनी खुशी से और अपने खर्च से वहां जाएंगे। लेकिन जो लोग आज वहां जा रहे हैं, उनके लिए विशेष परिवहन व्यवस्था और विशेष सुरक्षा की आवश्यकता है। इस प्रकार का अस्वाभाविक देशत्याग, और वह भी कृत्रिम परिस्थितियों में, हमारे लिए शर्म की चीज़ है। आपको घोषणा कर देना चाहिए कि जिन मुसलमानों को मजबूरन अपने घर छोड़ने पड़े हैं, और जो लौटना चाहते हैं, उनका आपके बीच स्वागत है। आप उन्हें आश्वासन दें कि भारत में वे और उनका धर्म सुरक्षित रहेंगे। ये आपका कर्तव्य है, आपका धर्म है। पाकिस्तान कुछ भी करे। आपको मानवीयता और सभ्यता कायम रखनी है। यदि आप वही काम करेंगे जो उचित है , तो देर-सबेर पाकिस्तान को भी आपका अनुसरण करना पड़ेगा।

आज जो स्थिति है, उसमें हम दुनिया के सामने अपना मस्तक ऊंचा नहीं रख सकते और हमें स्वीकार करना पड़ेगा कि हम पाकिस्तान के कुकर्मों की नकल करने पर मजबूर हुए हैं। और ऐसा करके हमने उसके तौर-तरीकों को उचित ठहराया है। हम इस तरह कैसे चलते रह सकते हैं? जो कुछ हो रहा है, वह युद्ध के लिए दोनों को भड़काने वाली बात है, और इसका निश्चित परिणाम युद्ध ही होगा। और आपको जवाहरलाल का साथ छोड़ना होगा। यह उन्हीं के कारण है कि आज संसार में हमारी इतनी इज्ज़त है। भारत से बाहर उनका सम्मान विश्व के एक अत्यन्त महान राजनेता के रूप में किया जाता है। अनेक यूरोपीय लोगों ने मुझे बताया है कि संसार ने उन जैसे ऊंचे दिमाग का राजनेता नहीं देखा है। मैं ऐसे अमेरिकियों को जानता हूं जो जवाहरलाल की इज्ज़त राष्ट्रपति ट्रूमैन से ज्यादा करते हैं। वे लोग भी जवाहरलाल के नेतृत्व के नैतिक मूल्यों की इज्ज़त करते हैं। जिनके पास अथाह धन है, बड़ी-बड़ी फ़ौजें हैं और अणु बम है। हम हिन्दुस्तानियों को इस बात की सही कद्र करनी चाहिए।”

[सम्पूर्ण गांधी वांगमय के 10वें खंड के पृष्ठ 35-38 से साभार]

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