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स्वास्थ्य

परीक्षा का तनाव ऐसे करें कम

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फाइल फोटो

इन दिनों परीक्षाएं चल रही हैं, ऐसे में ज्यादातार छात्र चिंता और तनाव के दौर से गुजर रहे हैं। परीक्षा को लेकर तनाव और घबराहट होना आम बात है। हर व्यक्ति की तनाव झेलने की क्षमता अलग होती है और हर व्यक्ति इसके लिए अलग तरह से रिएक्ट करता है।

हालांकि कई बार किशोरों के लिए परीक्षा के इस तनाव को झेलना बेहद मुश्किल हो जाता है। परीक्षा में तनाव के कई कारण हो सकते हैं जैसे बहुत सारा सिलेबस याद करना होता है, परीक्षा में आने वाले सवालों को लेकर हमेशा अनिश्चतता बनी रहती है। परिवार और दोस्तों को छात्रों से बहुत सारी उम्मीदें होती हैं। आगे किसी अच्छे कोर्स में एडमिशन लेने के लिए परीक्षा में अच्छे अंक लाना जरूरी होता है।

छात्रों में तनाव के कुछ लक्षण :

शारीरिक लक्षण : हार्ट रेट बढ़ना, सांस लेने में परेशानी, पेशियों में खिंचाव, बहुत ज्यादा पसीना आना, दिल की धड़कन बढ़ना, पेट में मरोड़, सिर में दर्द, मुंह सूखना, मतली/ पेट खराब होना, बेहोशी/ चक्कर आना, बहुत ज्यादा गर्मी / ठंड लगना, नींद न आना, बुरे सपने आना, थकान, भूख में कमी/ भूख लगने का समय बदलना।

व्यवहार में बदलाव : बेचैनी, चीजों से बचने की कोशिश करना, दूसरों से बचने की कोशिश करना, अधीरता महसूस करना, अपनी देखभाल कम करना, मादक पदार्थो का सेवन, अपने आप को नुकसान पहुंचाने वाला जोखिम भरा व्यवहार।

भावनात्मक लक्षण : रोने / हंसने की इच्छा, क्रोध, असहाय महसूस करना, डर, निराशा, अवसाद, चिड़चिड़ापन, हताश महसूस करना।

संज्ञानात्मक लक्षण : नकारात्मक सोच, भ्रमित/उलझन हेना, एकाग्रता और याददाश्त कम होना, सवाल हल करने में मुश्किल महसूस होना।

परीक्षा के तनाव को कैसे कम करें : 

अक्सर छात्रों को यह चिंता सताती है ‘अगर मैं फेल हो गया तो’ या ‘अगर मुझे परीक्षा में कुछ नहीं आया तो’। इस के लिए अपनी पढ़ाई पर अच्छी तरह ध्यान दें। अगर अपके दिमाग में इस तरह के विचार आते रहेंगे तो आप पढ़ाई में ध्यान नहीं लगा सकेंगे। अगर आप परीक्षा के तनाव से जूझ रहे हैं तो अपने आप को समझाने की कोशिश करें कि यह जीवन की छोटी सी अवस्था है, हमेशा ऐसा नहीं रहने वाला है।

परीक्षा के तनाव से कैसे बचें :

अभी से पढ़ना शुरू करें- सिर्फ सोचने से कुछ नहीं होने वाला है। सोचते रहने से तनाव और बढ़ेगा जिसका असर आपकी परीक्षा के परिणामों पर पड़ेगा। इसलिए सोचना छोड़ें और पढ़ना शुरू करें। उन विषयों पर ध्यान दें जिनमें आपको ज्यादा मेहनत करने की जरूरत है- योजना बनाएं। देखें कि कौन से विषय या अध्याय में आपको और पढ़ने की जरूरत है। इन पर ज्यादा ध्यान दें।

टाइम टेबल बनाएं– समय के अनुसार पढ़ना शुरू करें और बीच-बीच में ब्रेक लें। टाइम टेबल के अनुसार पढ़ें। हर एक-दो घंटे बाद दस मिनट का ब्रेक लें।

ग्रुप में पढ़ें– ग्रुप में पढ़ने के बहुत से फायदे होते हैं। अगर आपके सवाल या समस्याएं हैं तो आप एक दूसरे के साथ इन्हें हल कर सकते हैं। अपने कमजोर अध्यायों पर ध्यान दें। नोट्स बनाकर एक दूसरे के साथ शेयर करें। जब आप पढ़ने के लिए तैयार हों, टाइम टेबल बनाकर पढ़ना शुरू करें। ध्यान रखें हर विषय पर अलग तरह से ध्यान देने की जरूरत होती है।

ब्रेक लें – आप निश्चित समय तक पढ़ सकते हैं, इसके बाद आपको ब्रेक लेने की जरूरत होती है। छोटे ब्रेक लें, इस समय में अपने दोस्तों के साथ बातचीत करें, कॉफी पिएं। इस समय में आप सीढ़ी चढ़ने उतरने जैसा व्यायाम भी कर सकते हैं।

चलें-फिरें और व्यायाम करें : लगातार बैठ कर पढ़ने के बाद बीच में कुछ समय के लिए व्यायाम करना जरूरी है। एक्टिविटी बढ़ाने से तनाव कम होता है और आप बेहतर महसूस करते हैं। इस दौरान आप सैर करना, दौड़ना, तैरना, डांस करना जैसे व्यायाम कर सकते हैं।

सेहतमंद आहार लें : सेहतमंद आहार तनाव से जूझने में मदद करता है। प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, रिफाइंड काबोर्हाइड्रेट, चीनी से युक्त स्नैक्स खाने से तनाव बढ़ता है। इसके बजाए ताजा फल और सब्जियां, अच्छी गुणवत्ता का प्रोटीन, ओमेगा 3 फैटी एसिड तनाव से लड़ने में मदद करते हैं।

आराम करें : छात्र अक्सर पूरी रात बैठ कर पढ़ते रहते हैं। इससे उनकी नींद पूरी नहीं हो पाती और तनाव बढ़ता है। परीक्षा के दौरान दिमाग को आराम देने के लिए 6-8 घंटे की नींद लेना बहुत जरूरी है।

–आईएएनएस

स्वास्थ्य

भारतीय युवाओं में तेजी से बढ़ रही है हार्ट अटैक की समस्या

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Heart attack-
प्रतीकात्मक तस्वीर

भारतीय युवाओं में हार्ट अटैक की समस्या बढ़ती जा रही है और यदि इस समस्या पर रोक के उपाय नहीं किए गए तो यह महामारी का रूप अख्तियार कर सकती है।

यह कहना है हृदय रोग विशेषज्ञ और मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल चिकित्सक डॉ. नित्यानंद त्रिपाठी का। डॉ. त्रिपाठी ने आईएएनएस को जारी एक बयान में कहा है, “भारत में हृदय रोग की महामारी को रोकने का एकमात्र तरीका लोगों को शिक्षित करना है, वरना 2020 तक सबसे अधिक मौत हृदय रोग के कारण ही होगी।”

डॉ. त्रिपाठी ने कहा है, “दिल के दौरे का संबंध पहले बुढ़ापे से माना जाता था। लेकिन अब अधिकतर लोग उम्र के दूसरे, तीसरे और चौथे दशक के दौरान ही दिल की बीमारियों से पीड़ित हो रहे हैं। आधुनिक जीवन के बढ़ते तनाव ने युवाओं में दिल की बीमारियों के खतरे पैदा कर दिया है।

हालांकि अनुवांशिक और पारिवारिक इतिहास अब भी सबसे आम और अनियंत्रित जोखिम कारक बना हुआ है, लेकिन युवा पीढ़ी में अधिकतर हृदय रोग का कारण अत्यधिक तनाव और लगातार लंबे समय तक काम करने के साथ-साथ अनियमित नींद पैटर्न है।

धूम्रपान और आराम तलब जीवनशैली भी 20 से 30 साल के आयु वर्ग के लोगों में इसके जोखिम को बढ़ा रही है।” बयान के अनुसार, देश में हृदय अस्पतालों में दो लाख से अधिक ओपन हार्ट सर्जरी की जाती है और इसमें सालाना 25 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है। लेकिन यह सर्जरी केवल तात्कालिक लाभ के लिए होती है।

हृदय रोग के कारण होने वाली मौतों को रोकने के लिए लोगों को हृदय रोग और इसके जोखिम कारकों के बारे में अवगत कराना महत्वपूर्ण है। डॉ. त्रिपाठी के अनुसार, “कोरोनरी हृदय रोग ठीक नहीं हो सकता है, लेकिन इसके इलाज से लक्षणों का प्रबंधन करने, दिल की कार्यप्रणाली में सुधार करने और दिल के दौरे जैसी समस्याओं को कम करने में मदद मिल सकती है। इसके लिए जीवनशैली में परिवर्तन, दवाएं और नॉन-इंवैसिव उपचार शामिल हैं।

अधिक गंभीर मामलों में इंवैसिव और शल्य चिकित्सा उपचार की आवश्यकता होती है।”डॉ. त्रिपाठी ने कहा है, “सभी हृदय रोगियों में समान लक्षण नहीं होते हैं और एंजाइना छाती का दर्द इसका सबसे आम लक्षण नहीं है। कुछ लोगों को अपच की तरह असहज महसूस हो सकता है और कुछ मामलों में गंभीर दर्द, भारीपन या जकड़न हो सकता है।

आमतौर पर दर्द छाती के बीच में महसूस होता है, जो बाहों, गर्दन, जबड़े और यहां तक कि पेट तक फैलता है, और साथ ही धड़कन का बढ़ना और सांस लेने में समस्या होती है।”उन्होंने कहा है, “धमनियां पूरी तरह से अवरुद्ध हो जाती हैं, तो दिल का दौरा पड़ सकता है, जो हृदय की मांसपेशियों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है। दिल के दौरे में होने वाले दर्द में पसीना आना, चक्कर आना, मतली और सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्याएं हो सकती हैं।”

–आईएएनएस

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स्वास्थ्य

सेरिडॉन समेत तीन दवाओं से हटा बैन

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Medicines
प्रतीकात्मक तस्‍वीर

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सेरिडॉन, प्रिट्रान और डार्ट ड्रग्स दवाओं पर लगे बैन को हटा दिया। यह आदेश कोर्ट ने दवा निर्माताओं की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब देने को कहा है।

गौरतलब है, ये सभी दवाएं 328 दवाओं की उस लिस्ट में मौजूद हैंं, जिन्हें पिछले दिनों केन्द्र सरकार ने बैन कर दिया था। केन्द्र सरकार ने एक ही झटके में इन 328 फिक्स डोज कॉम्बीनेशन (एफडीसी) दवाओं की बिक्री पर रोक लगा दी थी। बता दें कि एफडीसी वे दवाएं हैं जो दो या दो से अधिक दवाओं के अवयवों (सॉल्ट) को मिलाकर बनाई जाती हैं। अधिकांश देशों में इन दवाओं के सेवन पर बैन लगा हुआ है।

जानकारी के अनुसार, ड्रग टेक्निकल अडवाइजरी बोर्ड ने इस पर एक कमिटी का गठन किया। कमिटी ने 343 दवाओं पर लगाए गए बैन को जायज ठहराया। इसके साथ ही छह दवाओं के निर्माण और बिक्री के लिए कुछ शर्तें लगा दी। सरकार ने इनमें से 328 दवाओं को बैन किया है। बैन के बाद से ही बाजार से इन दवाओं के बाहर होने का रास्ता साफ हो गया।

बता दें, देश में मौजूदा तमाम स्वास्थ्य संगठन लंबे अर्से से ये दावा करते आ रहे थे कि इन दवाओं के सेवन से मरीजों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ होता है औऱ ये जानलेवा भी साबित हो सकता है। एक ओर जहां अमेरिका, फ्रांस, जापान, जर्मनी और ब्रिटेन समेत अधिकांश देशों में एफडीसी पर बैन लगा है तो वहीं दूसरी ओर भारत सहित कई विकासशील देशों में ये बिकती हैं। देश में महज पुडुचेरी एक ऐसा राज्य है, जिसने एफडीसी पर बैन लगा दिया हैं।

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स्वास्थ्य

जानिए, कान में भरी गंदगी से बीमार दिल का कनेक्शन…

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Heart Disease
Heart Disease (Photo Credit- Hindustan Times)

भारत में जहां तकरीबन 1.7 मिलियन यानी 17 लाख लोग हर साल हार्ट डिजीज से मर रहे हैं, वहीं इस बीच एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार 95 प्रतिशत लोग जिनके कान में गंदगी भरी होती है और जिन्हें कान से संबंधित बीमारी होती हैं। वे लोग हार्ट डिजीज से भी पीड़ित होते हैं।

दरअसल मुंबई के रहने वाले एक डॉक्टर हिम्मतराव बावस्कर ने 888 ऐसे रोगियों पर रिसर्च किया, जो मधुमेह और उच्च रक्तचाप से ग्रसित थे। इस रिसर्च में उन्होंने पाया कि 95 फीसदी यानी 508 रोगियों के कान में गंदगी भरी थी और वे हार्ट डिजीज से ग्रसित थे। यही नहीं उनका कहना है कि डायागनल इयरलोब क्रीज (कान के निचले लोब पर तिरछी लकीर या सिकुड़न) बीमार दिल की बहुत बड़ी पहचान है।

जानकारी के मुताबिक 60 वर्ष की उम्र पार चुके लोगों में कान की गंदगी का होना एक आम बात है और उनमें हार्ट डिजीज का खतरा भी ज्यादा होता है। यह समस्या आज इतनी आम हो चुकी है की हर परिवार में कोई न कोई सदस्य हार्ट डिजीज से ग्रस्त है।

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