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लाइफस्टाइल

जानिए 1 अप्रैल फूल क्यों मनाया जाता है

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एक अप्रैल को मूर्ख दिवस मनाते हैं. हमलोग इस दिन एक-दूसरे के साथ झूठा मजाक करते हैं. इसकी शुरुआत फ्रांस में 1582 में उस वक्त हुई, जब पोप चार्ल्स IX ने पुराने कैलेंडर की जगह नया रोमन कैलेंडर शुरू किया.

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इससे के महत्वपूर्ण फैक्ट्स:
1. पहले नया साल 1 अप्रैल को मनाया जाता था, लेकिन 1582 में इसे 1 जनवरी कर दिया गया. कुछ लोग पुरानी तारीख पर ही नया साल मनाते रहे और उन्हें ही अप्रैल फूल का तमगा दिया गया.

2. डेनमार्क में अप्रैल फूल 1 मई को मनाया जाता है. इसे मज-कट कहते हैं.

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3. फ्रांस, इटली, बेल्जियम में कागज की मछलियां बनाकर लोग एक-दूसरे के पीछे चिपका देते हैं.

4. स्पेनिश बोलने वाले देशों में 28 दिसंबर को अप्रैल फूल मनाया जाता है, इसे डे ऑफ होली इनोसेंट्स कहा जाता है.

5. ईरानी फारसी नववर्ष के 13वें दिन एक-दूसरे पर तंज कसते रहते हैं. यह 1 या 2 अप्रैल का दिन होता है.

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लाइफस्टाइल

सर्दियों में बालों की ऐसे करें देखभाल

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सर्दियों के मौसम में तापमान में गिरावट होने और ठंडी हवाओं के चलने से बालों में रूखापन आ जाता है। प्राकृतिक तेल और नमी चली जाती है, जिससे बाल रूखे और बेजान नजर आते हैं, इसलिए बालों की उचित देखभाल बेहद जरूरी है।

‘द बॉडी शॉप इंडिया’ की प्रमुख (ट्रेनिंग) शिखी अग्रवाल और सौंदर्य विशेषज्ञ ब्लॉसम कोचर ने सर्दियों के दौरान बालों की देखभाल के संबंध में ये सुझाव दिए हैं :

* दो मुंहे व रूखे बालों से छुटकारा पाने के लिए सर्दियों में हर कुछ हफ्ते पर नियमित रूप से ट्रिमिंग कराएं।

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* बालों में मौजूद अतिरिक्त तेलों से छुटकारा पाने के लिए ड्राइ शैम्पू का इस्तेमाल करें। यह बालों में प्राकृतिक ऑयल को बनाए रखता है और अतिरिक्त तैलीयपन को दूर  करता है।

* बार-बार शैम्पू करने से बालों से नमी और प्राकृतिक तेल का सुरक्षात्मक लेयर निकल जाता है, इसलिए शैम्पू कम करें। गीले बालों में कंघी न करें, क्योंकि इससे बाल ज्यादा     टूटते हैं।

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* हेयर स्क्रब का इस्तेमाल करें। इसके इस्तेमाल से सिर की मृत त्वचा निकल जाती है और बाल मुलायम हो जाते हैं। फिर इसे पानी से धो लें।

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* बालों की कंडीशनिंग जरूर करें, इससे बाल मुलायम और मजबूत बनते हैं। बालों पर कंडीशनर पांच मिनट तक लगाए रखने के बाद गुनगुने पानी से धो लें।

सिल्की व मुलायम बालों के लिए आप हेयर मास्क का इस्तेमल भी कर सकती हैं। बालों में चौड़े दांत वाले कंघी का इस्तेमाल करें, ताकि कंडीशनर पूरे बालों को अच्छे से कवर कर ले।

रूसी से बचाव के उपाय :

* मृत त्वचा और फ्लेक्स निकालने के लिए बाल में अच्छे से कंघी करें और सिर पर रूसी को कंट्रोल में करने वाले लोशन को लगाए। 7-10 मिनट तक हल्के हाथों से मसाज करें।

* एक कटोरी में एंटी डैंड्रफ शैम्पू को लेकर उसमें थोड़ा पानी मिलाए। अब इस मिश्रण को रूई के फाहे से बालों पर लगाएं। बालों पर पानी स्प्रे करके हल्के हाथों से 10 मिनट तक मसाज करें। बालों को 10 मिनट और शावर कैप में रखे और फिर पानी से धो लें।

* शैम्पू के बाद बालों को तौलिएं से पोंछकर सुखा लें और फिर बालों के सिरों पर एंटी डैंड्रफ कंट्रोल कंडीशनर लगाएं। दो मिनट तक लगाए रहने के बाद पानी से धो लें।

* डैंड्रफ कंट्रोल कॉन्सन्ट्रेट को पूरे सिर पर अच्छी तरह से लगाकर हल्के हाथों से धीरे-धीरे मसाज करें और इसे लगा रहने दें।

–आईएएनएस

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लाइफस्टाइल

लोहड़ी के दिन पंजाबी सूट में दिखें आकर्षक

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ढोल-नगाड़े के साथ मनाई जाने वाली लोहड़ी का त्योहार आ रहा है। सभी महिलाएं इस त्योहार में फैशनेबल व सूंदर दिखना चाहती हैं। सर्दियों में अनारकली या स्ट्रेट फिट कुर्ता पहनकर आप स्मार्ट लुक पा सकती हैं और इस त्योहार का आनंद ले सकती हैं।

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आइए हम आपको बताते है की इस लोहड़ी क्या पहनें….

* परंपरागत पटियाला स्टाइल कुछ सालों से सबकी पसंद बना हुआ है, खासकर नवविवाहिता दुल्हनों का यह पसंदीदा परिधान है। आप चाहें तो पारंपरिक जरदोजी के काम के साथ बोल्ड रंगों वाले पंजाबी स्टाइल का पटियाला सूट पहन सकती हैं।

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* फैशन की दीवानी लड़कियों व महिलाओं के बीच अनारकली सूट बेहद लोकप्रिय है। यह एथनिक स्टाइल और सहजता का बेहतरीन संयोजन है।

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आप चटक व चमकीले रंग का अनारकली सूट पहन सकती हैं, जिसमें आप बेहद खूबसूरत नजर आएंगी।

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* अगर आप पटियाला या अनारकली नहीं पहनना चाहती हैं तो फिर स्ट्रेट पैंट के साथ लॉन्ग कुर्ता भी पहन सकती हैं। लोहड़ी के मौके पर यह परिधान आपको एक नया लुक देगा। खूबसूरत एक्सेसरीज के साथ जॉर्जेट या सिल्क कपड़े के लॉन्ग शर्ट को पैटर्न वाले पैंट के साथ पहनें।

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* लोहड़ी के मौके पर आप चटख रंग का फ्लेयर कुर्ता भी पहन सकती हैं। कंप्लीट लुक के लिए सुनहरे धागे की कढ़ाई या पंरपरागत कढ़ाई वाले कुर्ते के साथ शरारा स्टाइल वाला सलवार पहनें।

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* जैकेट स्टाइल का कुर्ता भी आप पहन सकती हैं। यह न सिर्फ आपको स्टाइलिश लुक देगा, बल्कि सर्द रात में गर्माहट भी देगा।

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Wefornews Bureau

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ज़रा हटके

‘मुस्लिम लड़कियों की घर व स्कूल की शिक्षा में फर्क नहीं’

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Muslim Girl

करीब एक दशक पहले लतिका गुप्ता ने जब दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन आरंभ किया था तो वह यह जानने को लेकर उत्सुक थीं कि लड़कियों के जीवन पर धर्म और लैंगिक पहचान का परस्पर क्या प्रभाव पड़ता है। इस लगभग अनजान से पहलू की तलाश में वह जिस यात्रा पर निकलीं, उसका समापन एक एक पुस्तक के रूप में हुआ, जो हाल ही में प्रकाशित हुई है।

अंग्रेजी में लिखी गई पुस्तक ‘एजुकेशन, पॉवर्टी एंड जेंडर : स्कूलिंग मुस्लिम गर्ल्स इन इंडिया’ (शिक्षा, निर्धनता, लिंग : भारत में मुस्लिम बालिकाओं की स्कूली शिक्षा) में बच्चियों की शिक्षा पर धर्म और संस्कृति के प्रभावों को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है और इसके लिए ‘घर’ और ‘विद्यालय’ के बीच के पारस्परिक प्रभावों की पड़ताल की गई है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के केंद्रीय शिक्षा संस्थान में सहायक प्रोफेसर लतिका गुप्ता उस समय जिस पाठ्यक्रम में अध्यापन कर रही थीं, उसमें लड़कियों को अपने समाजीकरण पर विचार प्रस्तुत करने के मौके दिए जाते थे। उन्होंने पाया कि उनकी एक-दो छात्राओं को छोड़कर बाकी सब एक बात में समान थी कि वे सांस्कृतिक कसौटियों के पालन पर दृढ़ हैं लेकिन व्यक्तिगत विकास के प्रति उदासीन नजर आती हैं।

गुप्ता ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “मैं अक्सर हैरान रहती थी कि मेरी छात्राएं अपने घरों में धार्मिक कार्यक्रमों या घरेलू कामकाज में शामिल होने की वजहों से कक्षाएं छूटने से क्यों नहीं शर्मिदा महसूस करती हैं। ऐसी कौन-सी बात है जिनको लेकर उनमें अपने आपको विकसित करने की समझ पैदा नहीं हो पा रही है और वे पढ़ाई में अपनी ज्यादा-से ज्यादा ऊर्जा नहीं लगा पा रही हैं? यह मेरा व्यक्तिगत एजेंडा बन गया कि उन ताकतों का पता लगाऊं जो लड़कियों की जिंदगी और उनकी अपनी पहचान को आकार देतीं हैं।”

उनकी किताब में एक समुदाय की धार्मिक व सांस्कृतिक रूपरेखा और विद्यालय जीवन के पारस्परिक संबंध को तलाशने का प्रयास किया गया है। यह अध्ययन निम्न सामाजिक-आर्थिक हालात में में पल रहीं मुस्लिम बालिकाओं के शैक्षणिक अनुभव की जटिलता को समझने का साधन भी है। यह उस परिवेश में बारे में भी बताता है, जहां धर्म और लिंग के एक साथ मिलने से विशिष्ट सामाजिक व आर्थिक संदर्भ में एक सामाजिक ताकत का निर्माण होता है।

गुप्ता ने अल्पसंख्यकों के एक विद्यालय में पढ़ने वाली लड़कियों की पहचान का अध्ययन किया। इस विद्यालय का संचालन संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के तहत उल्लिखित प्रावधानों के तहत होता है, जिनमेंधार्मिक अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान चलाने की इजाजत दी गई है।

उन्होंने स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियों से उनके जीवन व उनकी आकांक्षाओं और उनकी पहचान के विभिन्न आयामों के बारे लिखवाकर उनके जीवन के अनुभवों का संकलन किया। इस प्रकार करीब एक साल तक लगातार उनके अनुभवों और उनके माता-पिता से बातचीत का उन्होंने संकलन करके उन सारे तथ्यों का गहन अध्ययन व विश्लेषण किया।

गुप्ता ने पाया कि विद्यालय की ओर से अपनी छात्राओं में वैसी क्षमता व योग्यता नहीं पैदा की जाती है जिससे वे अपने जीवन में आर्थिक व बौद्धिक संभावनाओं का उपयोग अपने के लिए कर पाएं। घर की जिंदगी और बाहर के जीवन में इनकी लैंगिक पहचान को लेकर किसी तरह का दखल स्कूल का नहीं होता।

गुप्ता की किताब दरियागंज के एक स्कूल में किए गए अध्ययन पर आधारित है। हालांकि निजता को बनाए रखने के मकसद से पूरी किताब में स्कूल का जिक्र महज मुस्लिम गर्ल्स स्कूल (एसएसजी) के रूप में हुआ है।

अध्ययन में मुस्लिम समुदाय की लड़कियों के लिए स्कूल और घर के बीच के मूल्यों और व्यवहारों में एक निरंतरता पाई गई। दरियागंज की मुस्लिम लड़कियों के लिए कोई वैकल्पिक आचरण का रूप उपलब्ध नहीं है। लड़कियां जो घर में सीखती हैं, वही स्कूल में सीखती हैं। टीचर और मां, दोनों से उन्हें समान शिक्षा मिलती है जबकि टीचर शिक्षित होती हैं और उन्हें पेशागत तालीम भी मिली होती है।

गुप्ता ने कहा कि एमजीएस की लड़कियों के जीवन में स्कूल की भूमिका लैंगिक सामाजीकरण के सुव्यवस्थित लक्षणों और महिला जीवन के पूर्व निर्धारित व स्पष्ट मकसदों के मध्य आती है। दोनों तरफ के दबाव के कारण लड़कियों को ज्ञान के विविध क्षेत्रों की जानकारी हासिल करने व उनमें शामिल होने की इजाजत देने के लिए स्कूल के पास बहुत कम संभावना बच जाती है। साथ ही अध्ययन में पाया गया कि अधिकांश मुस्लिम छात्राएं हिंदुओं के बारे में अच्छा और सहिष्णु नजरिया रखती हैं।

गुप्ता ने कहा कि अध्ययन में उन्होंने पाया कि लड़कियों का यह मानना है कि पत्नी के लिए जरूरी है कि वह सास-ससुर, पति व बच्चों की सेवा करे। वे पति से अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए सहज आर्थिक योगदान की अपेक्षा रखती हैं। किसी भी लड़की को यह नहीं लगता कि एक महिला के लिए अच्छी पत्नी होने के लिए परिवार को अपने दम पर आर्थिक सहयोग देना आवश्यक है।

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