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ये ख़बर/नीति देश तोड़ने वाली है, इसीलिए नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त है!

हमारे संविधान का नीति-निर्देशक सिद्धान्त कहता है कि कल्याणकारी सरकारों को सम्पन्न तबके से ज़्यादा टैक्स लेकर ग़रीबों की ज़रूरतों को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। ज़ाहिर है, केजरीवाल की नीति ‘शर्मनाक, बचकाना और मूर्खतापूर्ण’ है! दिल्लीवालों को इसे ज़रूर समझना चाहिए, वर्ना ये नीति देश के टुकड़े-टुकड़े करवाकर ही मानेगी।

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GTB Hospital Kejriwal

केजरीवाल सरकार ने 1 अक्टूबर 2018 से उत्तर पूर्वी दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल में दिल्लीवासियों के लिए 80 फ़ीसदी आरक्षण की नीति लागू कर दी! पायलट प्रोजेक्ट के तहत शुरू हुआ ये प्रयोग अलोकतांत्रिक और अक्षम्य है। ये नीति न सिर्फ़ असंवैधानिक है, बल्कि देश की एकता और अखंडता पर किसी निर्वाचित सरकार की ओर से हुआ बेहद शर्मनाक हमला है! ये इतना गम्भीर मसला है कि सुप्रीम कोर्ट को फ़ौरन इसका स्वतः संज्ञान लेकर इसे ख़ारिज़ करना चाहिए। केजरीवाल की इस बेहद अफ़सोसनाक, अमानवीय, मूर्खतापूर्ण, ख़तरनाक और बचकानी नीति को लेकर आम आदमी पार्टी के लोग ये अफ़वाह भी फैला रहे हैं कि इस नीति को ‘दिल्ली वाले अच्छा फ़ैसला बता रहे हैं, जबकि बाहर के लोग नाराज़ हैं।’

दरअसल, दिल्ली सरकार में बैठे मूर्खों ने राजधानी के बड़े अस्पतालों में भीड़ घटाने के लिए वैसा ही वाहियात नुस्ख़ा ढूँढ़ा जैसा उन्होंने ‘ऑड-इवेन’ के ज़रिये दिल्ली को प्रदूषण से बचाने के लिए ढूँढ़ा था! मूर्खों के दिमाग़ में सिर्फ़ इतना ही आइडिया आ पाया कि ‘दिल्ली, सिर्फ़ दिल्लीवालों की है। इसके संसाधनों पर पहला हक़ भी दिल्लीवालों का है।’ लिहाज़ा, ऐलान हो गया कि ‘1 अक्टूबर से प्रयोग के तौर पर गुरु तेग बहादुर अस्पताल में दिल्ली से बाहर के मरीज़ों को मुफ़्त दवा और मेडिकल जाँच की सुविधा नहीं मिलेगी। यही नहीं, ओपीडी के मरीज़ों तथा अस्पताल के बिस्तरों पर भी दिल्लीवालों को 80 फ़ीसदी आरक्षण मिलेगा।’

अब पाँच दिन में ही इस नीति को सफल बता दिया गया। अस्पताल के मेडिकल डायरेक्टर सुनील कुमार ने आँकड़े देकर बताया कि ‘पहले रोज़ाना 8 से 9 हज़ार मरीज़ ओपीडी में पहुँचते थे। लेकिन अब संख्या 5 हज़ार पर सिमट गयी है। इसमें से क़रीब 3 हज़ार मरीज़ दिल्ली के हैं और बाक़ी बाहर के। यानी, अस्तपाल पर पहले दो तिहाई बोझ बाहरी मरीज़ों का था।’ केजरीवाल सरकार की इस नीति से ख़ासतौर पर उत्तर प्रदेश से आने वाले मरीज़ बहुत नाराज़ हैं। उनका कहना है कि देश की राजधानी दिल्ली पूरे देश की है इसलिए दिल्ली के अस्पतालों में बाहर वालों के लिए सीमाएँ लगाना सही क़दम नहीं है। ये देश को तोड़ने वाली भावना है, क्योंकि कल को यदि यूपी वालों ने दिल्ली के लिए पानी-बिजली, सब्ज़ी वग़ैरह को बन्द कर दिया तो दिल्लीवालों का क्या होगा?

इतनी पते की बात एक आदमी की समझ में तो आ सकती है, लेकिन आम आदमी पार्टी के कर्त्ताधर्ता, चिन्तकों और विचारकों के पास ऐसी अक़्ल कहाँ! इनके पास तो ये सूझबूझ भी नहीं है कि क्या ये मानवता का तकाज़ा है कि दिल्लीवाले अपने पड़ोसी राज्य के मरीज़ के इलाज़ के लिए बड़ा दिल नहीं दिखाएँ! क्या अस्पतालों में आरक्षण को लागू करना संविधान सम्मत है? क्या केजरीवाल जानते हैं कि उनकी भेदभावपूर्ण नीति, संविधान से मिले समानता के अधिकार की धज़्ज़ियाँ उड़ाती है? ये स्वतंत्रता के अधिकार का भी हनन है, क्योंकि संविधान हमें देश में कहीं भी रहने, रोज़गार करने और शोषण से मुक्ति का अधिकार देता है। संविधान की नज़र में हरेक भेदभाव शोषणकारी है, लिहाज़ा वर्ज़ित है। इसीलिए, सुप्रीम कोर्ट को नागरिकों के बुनियादी हक़ की सुरक्षा के लिए आगे आना चाहिए। ये उसका संवैधानिक दायित्व भी है।

अब सवाल ये है कि क्या दिल्ली सिर्फ़ दिल्लीवालों की है? दिल्ली के संसाधन के सिर्फ़ दिल्लीवालों की ही बदौलत हैं? क्या दिल्ली में देश भर के लोग नहीं रहते? क्या कोई दिल्ली वाला ‘बाहर’ से आये अपने रिश्तेदारों का इलाज़ यहाँ के सरकारी अस्पतालों में नहीं करवा सकता? क्या दिल्ली सरकार को मिलने वाले टैक्स सिर्फ़ दिल्ली वालों से ही हासिल होते हैं? क्या दिल्ली का व्यापार-कारोबार सिर्फ़ दिल्ली वालों तक ही सीमित है? दिल्ली में बिका सामान जब बाहर जाता है तो क्या उससे जुड़े टैक्स की आमदनी दिल्ली की जेब में नहीं आती?

दरअसल, केजरीवाल को इतनी भी समझ नहीं है कि उनके सरकारी स्कूलों में तो दिल्लीवासियों के बच्चों के दाख़िले को प्राथमिकता मिल सकती है, लेकिन अस्पतालों पर इसी नियम को लागू नहीं किया जा सकता। इसी तरह, दिल्ली की सड़कों को दिल्लीवालों के लिए ही आरक्षित नहीं रखा जा सकता। दिल्ली का बोझ चाहे जितना बेक़ाबू हो जाए, लेकिन यहाँ देश भर से आने वालों को ज़बरन नहीं रोका जा सकता। याद है ना कि कुछ वक़्त पहले शिवसेना ने मुम्बई में पर-प्रान्तीय के मुद्दे को लेकर कैसे हिंसक विरोध किया था! क्या तब देश भर ने इसकी कड़ी भर्त्सना नहीं की थी?

दरअसल, दिल्ली ही नहीं, दुनिया के किसी भी देश में इस तरह की नीति नहीं बनायी जा सकती। देश का मतलब ही यही होता है कि उसके हर हिस्से पर हर नागरिक का बराबर हक़ होगा और इसे लेकर हरेक नागरिक की ज़िम्मेदारी भी बराबर होगी। भारत में क्षेत्रीय असन्तुलन की समस्या उतनी ही पुरानी है, जितना पुराना भारत है। प्राचीन काल में भी क्या लोग परदेस में कमाने नहीं जाते थे? ये सही है कि किसी जगह के मुक़ाबले कोई और जगह बेहतर हो सकती है, लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं है कि कमतर जगहों से जुड़े लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाए। मरीज़ और बीमारी का ताल्लुक इंसानियत से है, मज़बूरी से है।

कोई भी शौकिया दिल्ली में इलाज़ करवाने नहीं आता। वो हालात से मज़बूर होता है। केजरीवाल को किसी की मज़बूरी से खेलने का कोई हक़ नहीं हो सकता। यदि किसी को अपने निवास के नज़दीक सही इलाज़ मिल जाए तो वो दिल्ली क्यों आएगा? उसके निवास के नज़दीक मुनासिब सुविधाएँ नहीं हैं, इसके लिए वहाँ की राज्य सरकारें ज़िम्मेदार हैं। राज्य सरकारें कब मायूस नहीं करती? कौन सी सरकार ऐसी है जो अपने नागरिकों की उम्मीदों पर ख़री उतरती है? ग़रीब देशों के पास विकसित देशों जैसे न तो संसाधन होते हैं और ना ही आमदनी। हमारे संविधान का नीति-निर्देशक सिद्धान्त कहता है कि कल्याणकारी सरकारों को सम्पन्न तबके से ज़्यादा टैक्स लेकर ग़रीबों की ज़रूरतों को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। ज़ाहिर है, केजरीवाल की नीति ‘शर्मनाक, बचकाना और मूर्खतापूर्ण’ है! दिल्लीवालों को इसे ज़रूर समझना चाहिए, वर्ना ये नीति देश के टुकड़े-टुकड़े करवाकर ही मानेगी।

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दिग्गज मिसाइल निर्माता कंपनी ईडी के घेरे में

कई सूत्रों ने पुष्टि की है कि एमबीडीए के भारत प्रमुख लोइस पीडीवाचे को सोमवार को ईडी की दिल्ली शाखा में पेश होने को कहा गया है। सूत्रों ने दावा किया कि भारतीय बलों के साथ कंपनी के जुड़ाव पर सवालों के अलावा उससे तलवार के एनजीओ में भुगतान पर भी सवाल किए जाएंगे।

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Rafale deal scam

नई दिल्ली, 17 फरवरी | राफेल लड़ाकू विमान विवाद के चरम पर पहुंचने के बाद मिसाइल बनाने वाली यूरोप की दिग्गज कंपनी एमबीडीए भारतीय जांच एजेंसियों के घेरे में आ गई है। एमबीडीए राफेल लड़ाकू विमान के लिए प्रमुख मिसाइल आपूर्तिकर्ता है और कंपनी 30 हजार करोड़ रुपये के ऑफसेट कार्यक्रम में शामिल है। ऑफसेट कार्यक्रम 36 युद्धक विमानों से जुड़ा है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कॉरपोरेट लॉबिस्ट दीपक तलवार से कंपनी के रिश्ते के संबंध में एमबीडीए के कंट्री हेड को जांच में शामिल होने के लिए समन जारी किया है।

सरकार के एक अधिकारी के मुताबिक, तलवार की एमबीडीए में हिस्सेदारी है। उसे पिछले महीने दुबई से प्रत्यर्पित कर लाया गया था। ऐसा माना जाता है कि उसने संप्रग शासन के दौरान एयरबस के साथ कई सौदों में मुख्य भूमिका निभाई थी।

कई सूत्रों ने पुष्टि की है कि एमबीडीए के भारत प्रमुख लोइस पीडीवाचे को सोमवार को ईडी की दिल्ली शाखा में पेश होने को कहा गया है। सूत्रों ने दावा किया कि भारतीय बलों के साथ कंपनी के जुड़ाव पर सवालों के अलावा उससे तलवार के एनजीओ में भुगतान पर भी सवाल किए जाएंगे।

सूत्रों के मुताबिक, तलवार के एनजीओ एडवांटेज इंडिया को 11 जून, 2012 से 17 अप्रैल, 2015 के बीच एमबीडीए और एयरबस से 88 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था। बाद में पूरी राशि फर्जी खरीद के जरिए निकाल ली गई थी।

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि ऐसा बहुत ही कम होता है कि एक यूरोपीय रक्षा कंपनी के कंट्री हेड को जांच में शामिल होने के लिए समन दिया गया हो।

सरकार के एक सूत्र ने दावा किया कि लोइस करीब एक दशक से भारत में कंपनी के संचालन का जिम्मा संभाल रहे हैं। मिराज अपग्रेड प्रोग्राम और राफेल पर भारत में लोइस के कार्यकाल के दौरान ही हस्ताक्षर किए गए थे और उसके पास गुप्त जानकारियां होंगी।

एक अधिकारी ने कहा, “अगर जरूरत पड़ी तो जांच एजेंसी समूह निर्यात निदेशक जीन लुक लामोथे को भी समन जारी कर सकती है। सबसे पहले लोइस से कंपनी द्वारा तलवार के एनजीओ को किए गए भुगतान के बारे में बताने के लिए कहा जाएगा।”

लोइस तक पहुंचने का प्रयास व्यर्थ हो चुका है। एमबीडीए के एक प्रवक्ता ने कहा, “एनबीडीए अधिकारियों के सवालों में पूरा सहयोग करेगी और जारी जांच पर कोई टिप्पणी नहीं करेगी। हम भारतीय बाजार के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।”

कंपनी ने दावा किया कि वह अपनी कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पहल के हिस्से के रूप में भारत में कई सामाजिक विकास कार्यक्रमों में शामिल है। इसमें ही एडवांटेज इंडिया को किया गया भुगतान भी शामिल हो सकता है।

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विदेशी कंपनियां उठा रही हैं गलाकाट घरेलू रक्षा स्पर्धा का फायदा – तहकीकात

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Rafale

नई दिल्ली, 17 फरवरी | कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछले साल 31 अगस्त को राफेल विमान सौदे में ‘वैश्विक भ्रष्टाचार’ के बारे में ट्वीट किया था। इससे महज एक सप्ताह पहले जर्मनी के हैम्बर्ग में तुर्की मूल के पूर्व जर्मन राजनेता और वर्तमान में एयरबस इंडस्ट्री के बिक्री निदेशक (लड़ाकू विमान अभियान) महमत तुर्केर से उनकी मुलाकात हुई थी। भारत हथियार डीलरों के समूह के जरिए काम करने वाली दुनिया की विमान विनिर्माता कंपनियों के लिए जंग का मैदान बन गया है। ये डीलर सौदे करने के लिए हर तरकीब का इस्तेमाल करते हैं। इनमें से कुछ में सरकार भी शामिल होती है। रक्षा प्रतिष्ठान का यह कहना है कि भारत में बड़ा खेल खेला जा रहा है।

विवादित हथियार डीलर संजय भंडारी के डिफेंस कॉलोनी स्थित आवास में 2016 में छापा पड़ा था और कथित तौर पर मीडियम मल्टी रोल कांबैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) सौदे से जुड़े दस्तावेज उसके पास से बरामद किए गए। दिल्ली पुलिस ने ऑफीशियस सीक्रेट एक्ट के तहत उसके खिलाफ मामला दर्ज किया था। उसके खिलाफ इंटरपोल का भी अलर्ट था। केंद्रीय गृहमंत्रालय के पास उसके खिलाफ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के कार्यकाल के दौरान 126 राफेल जेट की खरीद के सौदे से जुड़े कागजात की चोरी करने की रिपोर्ट मौजूद है।

भंडारी हालांकि सही मायने में अवांछित व्यक्ति नहीं है। तुर्केर की भंडारी से कई मुलाकातें हो चुकी हैं। भंडारी 2016 में हुई छापेमारी के बाद देश छोड़कर भाग गया। उनके पास नरेंद्र मोदी विरोधी गठबंधन तक पहुंच बनाने का विशेषाधिकार है क्योंकि वे फ्रांस में बने लड़ाकू हथियार से पूरी तरह लैस जेट विमानों की खरीद को लेकर सरकार पर निशाना साधने के लिए कांग्रेस के लिए जानकारी मुहैया करवाते हैं। भारत के बड़े विमान सौदे में भंडारी एकमात्र विवादित हथियार डीलर नहीं है जिस पर उंगली उठी है।

सुधीर चौधरी भारत के सबसे बड़े हाथियार एजेंट और लॉबिस्ट के रूप में शीर्ष स्तर है। वह केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच के घेरे में है और उम्मीद के अनुरूप वह देश से पलायन कर गया है। ग्रिमी पनामा पेपर्स मामले में उसका नाम सबसे बड़े खातधारकों में शुमार है।

भंडारी और चौधरी दोनों सरकार द्वारा प्रतिरक्षा के क्षेत्र में शुरू किए गए ऑफसेट कार्यक्रम के लाभार्थी रहे हैं। भंडारी को रिकॉर्ड 918 अरब डॉलर का अनुबंध मिला था। वह प्रियंका वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा का कारोबारी सहयोगी था। चौधरी से संबद्ध बेंगलुरू की कंपनी अल्फा डिजाइन को संप्रग के शासनकाल में 1,000 करोड़ रुपये का ऑफसेट कांट्रैक्ट दिया गया था। रक्षा सौदे में कुछ और गहरे राजनीतिक लिंक जुड़े हुए हैं, क्योंकि ऐसे सौदों में काफी पैसों की बात होती है।

पंजाब के पूर्व कांग्रेस विधायक अरविंद खन्ना का पुत्र और हथियार एजेंट विपिन खन्ना संप्रग सरकार के दौरान एंब्रेयर के साथ तीन विमानों की खरीद के सौदे के ऑफसेट कांट्रैक्ट में भारी रिश्वत लेने वालों में शामिल है। अरविंद खन्ना खुद अब हथियार एजेंट हैं।

चंडीगढ़ स्थित राजनेता संतोष बगरोडिया के भाई की सॉफ्टवेयर कंपनी आईडीएस इन्फोटेक ने 2007 में अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर सौदे में बड़ी रिश्वत ली थी। बगरोडिया के भाई सतीश की कंपनी को 1,400 करोड़ रुपये का ऑफसेट कांट्रैक्ट मिला था।

इस बड़े खेल में दुनियाभर में रक्षा सौदों के एजेंट, उनके संचालनकर्ता-हथियार विनिर्माता और विमान डीलरों ने सावधानीपूर्वक उन राजनेताओं की पहचान की है जिनके बारे में उनको लगता है कि वे उनके साझेदार बन सकते हैं।

विशेषाधिकार प्राप्त यूरोपीय संघ की खुफिया जानकारी में खुलासा हुआ है कि अमेरिका और चीन का मानना है कि अपने नेतृत्व में कांग्रेस को चुनावी लाभ दिलाने के लिए उग्र बने हुए राहुल गांधी उनकी भारत योजना के लिए महत्वपूर्ण हैं।

मोदी सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालय पाने का सपना पालने वाले अरुण शौरी शायद नोटबंदी, जीडीपी के आंकड़े राफेल सौदे समेत अन्य मुद्दों को उठाकर सरकार के पीछे पड़े हुए हैं। लेकिन कहानी कहीं बड़ी हो सकती है क्योंकि उनके साले रक्षा मामलों के लेखक हैं और वह लगातार 36 राफेल विमान की खरीद के विरोध में तर्क देते रहे हैं। उनके एक भतीजे टाटा कंपनी के लिए काम करते हैं और 2012 से टाटा डिफेंस की अगुवाई कर रहे हैं। रतन टाटा लॉकहीड मार्टिन के भारतीय साझेदार हैं। अमेरिकियों ने कहा है कि अगर भारत पेंटागन के विदेशी सैन्य बिक्री कार्यक्रम के तहत लॉकहीड मार्टिन के एफ-16 जेट विमान खरीदेगा तो वे सीएटीएसए प्रतिबंध हटा लेंगे।

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ओपिनियन

पाकिस्तान को पानी रोकने पर विशेषज्ञों की राय बंटी

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नई दिल्ली, 16 फरवरी | सीआरपीएफ की टुकड़ी पर गुरुवार को पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले के बाद कड़ी कार्रवाई करने की मांग को देखते हुए विशेषज्ञ पश्चिम और पूरब की तरफ बहने वाली सिंधु और ब्यास नदियों का पानी पाकिस्तान जाने से रोकने पर विचार कर रहे हैं। वहीं, कुछ इसकी संभाव्यता पर शक जता रहे हैं।

जल संसाधन मंत्रालय के सेवानिवृत्त शीर्ष अधिकारी एम. एस. मेनन का कहना है कि पाकिस्तान को दिए जानेवाले पानी को रोका जा सकता है। उन्होंने सिंधु जल समझौते पर लंबे समय से काम किया है।

उन्होंने कहा, “हमने अधिक पानी उपभोग करने की क्षमता विकसित कर ली है। स्टोरेज डैम में निवेश बढ़ाकर हम ऐसा कर सकते हैं। झेलम, चेनाब और सिंधु नदी का बहुत सारा पानी देश में ही इस्तेमाल किया जा सकता है।”

भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुआ सिंधु जल समझौता पूरब की तरफ बहने वाली नदियों – ब्यास, रावी और सतलुज के लिए हुआ है और भारत को 3.3 करोड़ एकड़ फीट (एमएएफ) पानी मिला है, जबकि पाकिस्तान को 80 एमएएफ पानी दिया गया है।

विवादास्पद यह है कि संधि के तहत पाकिस्तान को भारत से अधिक पानी मिलता है, जिससे यहां सिंचाई में भी इस पानी का सीमित उपयोग हो पाता है। केवल बिजली उत्पादन में इसका अबाधित उपयोग होता है। साथ ही भारत पर परियोजनाओं के निर्माण के लिए भी सटीक नियम बनाए गए हैं।

एक दूसरे सेवानिवृत्त अधिकारी, जो मंत्रालय में करीब दो दशकों तक सिंधु आयुक्त रह चुके हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान को पानी रोकना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि यह अंतराष्ट्रीय संधि है, जिसका भारत को पालन करना अनिवार्य है। उन्होंने कहा, “मैं नहीं समझता कि इस प्रकार का कुछ करना संभव है। पानी प्राकृतिक रूप से बहता है। आप उसे रोक नहीं सकते।”

पूर्व अधिकारी ने कहा कि अतीत में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई है, लेकिन लोग ऐसी मांग भावनाओं में बहकर करते रहते हैं।

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