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ये ख़बर/नीति देश तोड़ने वाली है, इसीलिए नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त है!

हमारे संविधान का नीति-निर्देशक सिद्धान्त कहता है कि कल्याणकारी सरकारों को सम्पन्न तबके से ज़्यादा टैक्स लेकर ग़रीबों की ज़रूरतों को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। ज़ाहिर है, केजरीवाल की नीति ‘शर्मनाक, बचकाना और मूर्खतापूर्ण’ है! दिल्लीवालों को इसे ज़रूर समझना चाहिए, वर्ना ये नीति देश के टुकड़े-टुकड़े करवाकर ही मानेगी।

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GTB Hospital Kejriwal

केजरीवाल सरकार ने 1 अक्टूबर 2018 से उत्तर पूर्वी दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल में दिल्लीवासियों के लिए 80 फ़ीसदी आरक्षण की नीति लागू कर दी! पायलट प्रोजेक्ट के तहत शुरू हुआ ये प्रयोग अलोकतांत्रिक और अक्षम्य है। ये नीति न सिर्फ़ असंवैधानिक है, बल्कि देश की एकता और अखंडता पर किसी निर्वाचित सरकार की ओर से हुआ बेहद शर्मनाक हमला है! ये इतना गम्भीर मसला है कि सुप्रीम कोर्ट को फ़ौरन इसका स्वतः संज्ञान लेकर इसे ख़ारिज़ करना चाहिए। केजरीवाल की इस बेहद अफ़सोसनाक, अमानवीय, मूर्खतापूर्ण, ख़तरनाक और बचकानी नीति को लेकर आम आदमी पार्टी के लोग ये अफ़वाह भी फैला रहे हैं कि इस नीति को ‘दिल्ली वाले अच्छा फ़ैसला बता रहे हैं, जबकि बाहर के लोग नाराज़ हैं।’

दरअसल, दिल्ली सरकार में बैठे मूर्खों ने राजधानी के बड़े अस्पतालों में भीड़ घटाने के लिए वैसा ही वाहियात नुस्ख़ा ढूँढ़ा जैसा उन्होंने ‘ऑड-इवेन’ के ज़रिये दिल्ली को प्रदूषण से बचाने के लिए ढूँढ़ा था! मूर्खों के दिमाग़ में सिर्फ़ इतना ही आइडिया आ पाया कि ‘दिल्ली, सिर्फ़ दिल्लीवालों की है। इसके संसाधनों पर पहला हक़ भी दिल्लीवालों का है।’ लिहाज़ा, ऐलान हो गया कि ‘1 अक्टूबर से प्रयोग के तौर पर गुरु तेग बहादुर अस्पताल में दिल्ली से बाहर के मरीज़ों को मुफ़्त दवा और मेडिकल जाँच की सुविधा नहीं मिलेगी। यही नहीं, ओपीडी के मरीज़ों तथा अस्पताल के बिस्तरों पर भी दिल्लीवालों को 80 फ़ीसदी आरक्षण मिलेगा।’

अब पाँच दिन में ही इस नीति को सफल बता दिया गया। अस्पताल के मेडिकल डायरेक्टर सुनील कुमार ने आँकड़े देकर बताया कि ‘पहले रोज़ाना 8 से 9 हज़ार मरीज़ ओपीडी में पहुँचते थे। लेकिन अब संख्या 5 हज़ार पर सिमट गयी है। इसमें से क़रीब 3 हज़ार मरीज़ दिल्ली के हैं और बाक़ी बाहर के। यानी, अस्तपाल पर पहले दो तिहाई बोझ बाहरी मरीज़ों का था।’ केजरीवाल सरकार की इस नीति से ख़ासतौर पर उत्तर प्रदेश से आने वाले मरीज़ बहुत नाराज़ हैं। उनका कहना है कि देश की राजधानी दिल्ली पूरे देश की है इसलिए दिल्ली के अस्पतालों में बाहर वालों के लिए सीमाएँ लगाना सही क़दम नहीं है। ये देश को तोड़ने वाली भावना है, क्योंकि कल को यदि यूपी वालों ने दिल्ली के लिए पानी-बिजली, सब्ज़ी वग़ैरह को बन्द कर दिया तो दिल्लीवालों का क्या होगा?

इतनी पते की बात एक आदमी की समझ में तो आ सकती है, लेकिन आम आदमी पार्टी के कर्त्ताधर्ता, चिन्तकों और विचारकों के पास ऐसी अक़्ल कहाँ! इनके पास तो ये सूझबूझ भी नहीं है कि क्या ये मानवता का तकाज़ा है कि दिल्लीवाले अपने पड़ोसी राज्य के मरीज़ के इलाज़ के लिए बड़ा दिल नहीं दिखाएँ! क्या अस्पतालों में आरक्षण को लागू करना संविधान सम्मत है? क्या केजरीवाल जानते हैं कि उनकी भेदभावपूर्ण नीति, संविधान से मिले समानता के अधिकार की धज़्ज़ियाँ उड़ाती है? ये स्वतंत्रता के अधिकार का भी हनन है, क्योंकि संविधान हमें देश में कहीं भी रहने, रोज़गार करने और शोषण से मुक्ति का अधिकार देता है। संविधान की नज़र में हरेक भेदभाव शोषणकारी है, लिहाज़ा वर्ज़ित है। इसीलिए, सुप्रीम कोर्ट को नागरिकों के बुनियादी हक़ की सुरक्षा के लिए आगे आना चाहिए। ये उसका संवैधानिक दायित्व भी है।

अब सवाल ये है कि क्या दिल्ली सिर्फ़ दिल्लीवालों की है? दिल्ली के संसाधन के सिर्फ़ दिल्लीवालों की ही बदौलत हैं? क्या दिल्ली में देश भर के लोग नहीं रहते? क्या कोई दिल्ली वाला ‘बाहर’ से आये अपने रिश्तेदारों का इलाज़ यहाँ के सरकारी अस्पतालों में नहीं करवा सकता? क्या दिल्ली सरकार को मिलने वाले टैक्स सिर्फ़ दिल्ली वालों से ही हासिल होते हैं? क्या दिल्ली का व्यापार-कारोबार सिर्फ़ दिल्ली वालों तक ही सीमित है? दिल्ली में बिका सामान जब बाहर जाता है तो क्या उससे जुड़े टैक्स की आमदनी दिल्ली की जेब में नहीं आती?

दरअसल, केजरीवाल को इतनी भी समझ नहीं है कि उनके सरकारी स्कूलों में तो दिल्लीवासियों के बच्चों के दाख़िले को प्राथमिकता मिल सकती है, लेकिन अस्पतालों पर इसी नियम को लागू नहीं किया जा सकता। इसी तरह, दिल्ली की सड़कों को दिल्लीवालों के लिए ही आरक्षित नहीं रखा जा सकता। दिल्ली का बोझ चाहे जितना बेक़ाबू हो जाए, लेकिन यहाँ देश भर से आने वालों को ज़बरन नहीं रोका जा सकता। याद है ना कि कुछ वक़्त पहले शिवसेना ने मुम्बई में पर-प्रान्तीय के मुद्दे को लेकर कैसे हिंसक विरोध किया था! क्या तब देश भर ने इसकी कड़ी भर्त्सना नहीं की थी?

दरअसल, दिल्ली ही नहीं, दुनिया के किसी भी देश में इस तरह की नीति नहीं बनायी जा सकती। देश का मतलब ही यही होता है कि उसके हर हिस्से पर हर नागरिक का बराबर हक़ होगा और इसे लेकर हरेक नागरिक की ज़िम्मेदारी भी बराबर होगी। भारत में क्षेत्रीय असन्तुलन की समस्या उतनी ही पुरानी है, जितना पुराना भारत है। प्राचीन काल में भी क्या लोग परदेस में कमाने नहीं जाते थे? ये सही है कि किसी जगह के मुक़ाबले कोई और जगह बेहतर हो सकती है, लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं है कि कमतर जगहों से जुड़े लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाए। मरीज़ और बीमारी का ताल्लुक इंसानियत से है, मज़बूरी से है।

कोई भी शौकिया दिल्ली में इलाज़ करवाने नहीं आता। वो हालात से मज़बूर होता है। केजरीवाल को किसी की मज़बूरी से खेलने का कोई हक़ नहीं हो सकता। यदि किसी को अपने निवास के नज़दीक सही इलाज़ मिल जाए तो वो दिल्ली क्यों आएगा? उसके निवास के नज़दीक मुनासिब सुविधाएँ नहीं हैं, इसके लिए वहाँ की राज्य सरकारें ज़िम्मेदार हैं। राज्य सरकारें कब मायूस नहीं करती? कौन सी सरकार ऐसी है जो अपने नागरिकों की उम्मीदों पर ख़री उतरती है? ग़रीब देशों के पास विकसित देशों जैसे न तो संसाधन होते हैं और ना ही आमदनी। हमारे संविधान का नीति-निर्देशक सिद्धान्त कहता है कि कल्याणकारी सरकारों को सम्पन्न तबके से ज़्यादा टैक्स लेकर ग़रीबों की ज़रूरतों को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। ज़ाहिर है, केजरीवाल की नीति ‘शर्मनाक, बचकाना और मूर्खतापूर्ण’ है! दिल्लीवालों को इसे ज़रूर समझना चाहिए, वर्ना ये नीति देश के टुकड़े-टुकड़े करवाकर ही मानेगी।

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क्या कांग्रेस मप्र की जनता की आवाज सुनेगी?

राज्य की जनता ने भाजपा को सत्ता से उतारकर कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका दिया है। कांग्रेस क्या वास्तव में जनता की मंशा और भाव को समझ पा रही है? इस पर थोड़े सवाल उठ रहे हैं

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farmer strike in madhya pradesh

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में जनता ने किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया है, मगर कांग्रेस को बहुमत के करीब लाकर खड़ा कर दिया है। कांग्रेस सरकार बनाने जा रही है, बस सवाल एक ही उठ रहा है कि क्या कांग्रेस आलाकमान जनता की आवाज सुनेगी या राजनीतिक गणित के चलते अपना फैसला सुनाएगी।

राज्य के विधानसभा चुनाव के 11 दिसंबर की देर रात तक नतीजे आ गए, उसके बाद बुधवार को कांग्रेस विधायकों की भोपाल में बैठक बुलाई गई। इस बैठक में केंद्रीय पर्यवेक्षक के तौर पर ए.के. एंटनी आए, उन्होंने विधायकों की बैठक की, एक लाइन का प्रस्ताव पारित किया गया, जिसके जरिए मुख्यमंत्री चुनने का अधिकार पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को दिया गया। उसके बाद गुरुवार को प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और प्रचार अभियान समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने कई दौर की बात की।

कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी ने पर्यवेक्षक बनाकर भेजे गए एंटोनी की रिपोर्ट, शक्ति एप के जरिए पार्टी कार्यकर्ताओं से ली गई राय और नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों से आए नतीजों के साथ आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर रखकर कमलनाथ व सिंधिया की मौजूदगी में सभी प्रमुख नेताओं से चर्चा की। राहुल गांधी के साथ हुई बैठक में कमलनाथ, सिंधिया, एंटनी, प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया मौजूद रहे।

इतना ही नहीं, मप्र में मुख्यमंत्री को लेकर चल रही खींचतान के बीच सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी भी राहुल गांधी के आवास पर पहुंचीं। कहा जा रहा है कि मप्र के मुख्यमंत्री के मसले पर राहुल गांधी से सोनिया और प्रियंका ने भी चर्चा की।

वरिष्ठ पत्रकार रवींद्र व्यास का कहना है कि राज्य की जनता ने भाजपा को सत्ता से उतारकर कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका दिया है। कांग्रेस क्या वास्तव में जनता की मंशा और भाव को समझ पा रही है? इस पर थोड़े सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि दिल्ली में मुख्यमंत्री के नाम को लेकर कई घंटों तक माथापच्ची चली।

व्यास ने आगे कहा कि पार्टी हाईकमान कोई ऐसा फैसला भी नहीं करना चाहती, जिससे प्रदेश के मतदाताओं में नकारात्मक संदेश जाए। कांग्रेस को अंदेशा है कि अगर नकारात्मक संदेश चला गया, कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ गया तो लोकसभा चुनाव में संभावनाओं को बनाए रखना आसान नहीं होगा।

विधानसभा चुनाव में सफलता मिलने से कार्यकर्ताओं का उत्साह उफान पर है। राज्य के विभिन्न हिस्सों से सैकड़ों की तादाद में कार्यकर्ता राजधानी पहुंच चुके हैं। प्रदेश कार्यालय के बाहर सुबह से ही कार्यकर्ताओं का जमावड़ा है, कमलनाथ और सिंधिया के कटआउट, पोस्टर हाथ में थामे कार्यकर्ता जिंदाबाद के नारे लगाने में लगे हैं।

By : संदीप पौराणिक

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चुनाव

अब भारत से EVM का अलविदा होना ज़रूरी है!

EVM की तारीफ़ इसलिए भी की जाती थी कि इससे मतदान के नतीज़े महज कुछ घंटों में ही मिल जाते थे। लेकिन ताज़ा विधानसभा चुनाव की तमाम सीटों पर नतीज़े आने में 24 घंटे तक का वक़्त लग गया। इतना वक़्त तो बैलेट के दौर में पहले कभी नहीं लगा।

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evm

इतिहास बताता है कि तकनीकें न तो चिरजीवी होती हैं और ना कालजयी। हरेक तकनीक का अपना कार्यकाल होता है। नयी तकनीकें जन्म लेती हैं तो पुरानी का सफ़ाया होता है। EVM भी एक तकनीकी उपकरण है। इसका जीवन-काल पूरा हो चुका है! अब हमें वापस बैलेट यानी मतपत्र की ओर लौटना होगा। ये काम जितनी जल्दी होगा, उतना ही लोकतंत्र फ़ायदे में रहेगा। ताज़ा विधानसभा चुनावों ने उन आरोपों को और पुख्ता किया है कि EVM में घपला हो सकता है। बेशक़, ये हुआ भी है! तर्कवादी इसका सबूत चाहेंगे। ये स्वाभाविक है। मेरे पास घपलों के सबूत नहीं हैं। लेकिन प्रति-तर्क ज़रूर हैं।

सार्वजनिक जीवन में ‘छवि’ यानी इमेज़ का सबसे ज़्यादा महत्व है। EVM पर जितने लाँछन लगे हैं, उससे उसकी छवि कलंकित हुई है। ये लाँछन उन्हीं लोगों के हैं, जिन्हें EVM को विश्वसनीय बताना चाहिए। जब खिलाड़ी ही अम्पायर पर शक़ करें, तब अम्पायर को निष्ठा का निष्कलंकित होना अनिवार्य होना चाहिए। दर्जनों राजनीतिक दलों ने EVM की सच्चाई पर सवाल उठाये हैं। वैसे भी EVM में अब वो गुण भी नहीं रहे, जिसने कभी इसे श्रेष्ठ बनाया था।

मसलन, EVM की वजह से ये बात अब गोपनीय नहीं रह जाती कि किसी मतदान केन्द्र के मतदाताओं की पसन्द क्या रही है? कभी वोटों की गिनती से पहले EVM को बैलेट की तरह मिलाया जाता था ताकि मतदान की गोपनीयता पर आँच नहीं आये, लेकिन EVM में हुए घपलों को देखते हुए अब हरेक मशीन के आँकड़ों को अलग-अलग हासिल किया जाता है। कभी EVM की तारीफ़ इसलिए भी की जाती थी कि इससे मतदान के नतीज़े महज कुछ घंटों में ही मिल जाते थे। लेकिन ताज़ा विधानसभा चुनाव की तमाम सीटों पर नतीज़े आने में 24 घंटे तक का वक़्त लग गया। इतना वक़्त तो बैलेट के दौर में पहले कभी नहीं लगा।

EVM की ये भी तारीफ़ हुआ करती थी कि इससे बूथ कब्ज़ा करने वाले हतोत्साहित होते हैं। कभी ऐसा हुआ भी, लेकिन अब लोगों ने बेईमानी करने के नये-नये हथकंडे विकसित कर लिये हैं। जैसे मशीन की जाँच करने वाले Mock Poll की क़वायद को भी पोलिंग एजेंट की मिलीभगत से भ्रष्ट किया जा चुका है। ताज़ा चुनावों में तो कई ऐसे वीडियो भी वायरल हुए कि मतदान कर्मी EVM को लेकर उन जगहों पर जा पहुँचे जहाँ उनका होना पूरी तरह से ग़ैरक़ानूनी था। EVM के पक्ष में दलील भी थी कि इससे मतपत्र वाले काग़ज़ों की भारी बचत होती है। लेकिन अब साफ़ दिख रहा है कि ये बचत भारतीय लोकतंत्र के लिए काफ़ी भारी पड़ी है।

हमने देखा है कि मोदी राज ने उस EVM की ख़ूब तरफ़दारी की, जिसे लेकर ख़ुद उसने ही उस दौर में भरपूर हॉय-तौबा मचायी थी, जब वो विपक्ष में थी। लिहाज़ा, क्या वजह है कि सत्ता में आने के बाद बीजेपी को EVM पसन्द आने लगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने EVM में सेंधमारी की तकनीक को साध लिया है! 2014 के बाद हुए तमाम विधानसभा चुनावों में EVM की सच्चाई पर सवाल दाग़े गये। सुप्रीम कोर्ट के दख़ल के बाद चुनाव आयोग ने भी अपनी साख बचाने के लिए VVPAT (Voter-verified paper audit trail) की जुगत अपनायी। लेकिन इससे भी EVM की प्रतिष्ठा बहाल नहीं हुई।

EVM की तकनीक और मशीन यदि बेदाग़ होती तो आज सारी दुनिया में इसका डंका बज रहा होता। बेहतर तकनीक अपनी जगह बना ही लेती है। जीवन का कोई भी क्षेत्र नयी तकनीक से अछूता नहीं रहता। टेलिग्राम को किसने ख़त्म किया? पेज़र कहाँ चले गये? बजाज स्कूटर को कौन निगल गया? LED लाइट्स ने पुराने बल्ब-ट्यूब का क्या हाल किया? ऐसे असंख्य उदाहरण हैं। लेकिन तकनीक के बेहिसाब विस्तार के बावजूद तमाम विकसित देशों ने EVM को आज़माने के बाद इसे अनफिट ही क्यों पाया? क्यों चुनाव फिर से बैलेट पर ही लौट गये? वजह साफ़ है कि EVM की ख़ामियाँ, उसकी ख़ूबियों पर भारी पड़ीं! ये तर्क अकाट्य हैं।

सबसे बड़ा आरोप ये है कि EVM के हैकर्स विकसित हो चुके हैं! लेकिन चुनाव आयोग की ज़िद है कि मेरे सामने EVM को हैक करके दिखाओ, तभी मानेंगे कि हैकिंग सम्भव है! दुर्भाग्यवश, वो ये समझने को तैयार नहीं है कि करोड़ों-अरबों रुपये का वारा-न्यारा करने वाले हैकर्स और उनका फ़ायदा लेने वाले लोग क्यों अपने पाँव पर ही कुल्हाड़ी मारने को तैयार होंगे? इनसे ये अपेक्षा रखना नादानी होगी कि वो चुनाव आयोग की सनक को मिटाने के लिए अपनी कामधेनु का बलिदान दे दें!

अब तो ऐसे भी संकेत मिल रहे हैं कि EVM के हैकर्स, चुनाव जीतने और हारने वाली यानी दोनों पार्टियों से सौदा कर रहे हैं। जनाक्रोश से बचने के लिए वो हारने वाली पार्टियों की सीटों को सम्मानजनक बना रहे हैं तो जीतने वाले की जीत का अन्तर घटा रहे हैं। ये बात सच हो या अफ़वाह, लेकिन लोकतंत्र के लिए इसका किसी भी रूप में होना ही कोई कम नुकसानदायक नहीं है। सीता की अग्निपरीक्षा तो लंका में ही हो चुकी थी। फिर भी राम ने उन्होंने अयोध्या से बाहर इसलिए कर दिया क्योंकि एक धोबी ने सीता के शील-स्वभाव पर निराधार ही सही, लेकिन सन्देह की जता दिया था! EVM पर तो सन्देहों का भरमार है। बेचारे स्ट्रॉग रूम में भी महफ़ूज़ नहीं रहते! लिहाज़ा, अब EVM का अलविदा होना बेहद ज़रूरी है।

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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नोटबंदी ने राजनीतिक, आर्थिक उलझनें पैदा की : अरविंद सुबह्मण्यम

“इसका प्रमुख कारण भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था की एक व्यापक समझ में छिपा हुआ है, इस बारे में कि लोग वोट कैसे करते हैं।”

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Arvind Subramanian

नई दिल्ली, 9 दिसम्बर | देश के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुबह्मण्यम ने नोटबंदी और जीडीपी के आंकड़ों में संबंध स्थापित करते हुए कहा है कि नोटबंदी के कारण पैदा हुई उलझन के दोहरे पक्ष रहे हैं। क्या जीडीपी के आंकड़ों पर दिखे इसके प्रभाव ने एक लचीली अर्थव्यवस्था को प्रतिबिंबित किया है, और क्या वृद्धि दर के आंकड़ों ने आधिकारिक डेटा संग्रह प्रक्रिया पर सवाल खड़ा किए हैं।

सुबह्मण्यम इस समय हार्वर्ड केरेडी स्कूल में पढ़ा रहे हैं। वह यहां पेंगुइन द्वारा प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘ऑफ काउंसिल : द चैलेंजेस ऑफ द मोदी-जेटली इकॉनॉमी’ के विमोचन समारोह में हिस्सा लेने आए थे।

उन्होंने आईएएनएस के साथ एक बातचीत में पुस्तक के एक अध्याय ‘द टू पजल्स ऑफ डीमोनेटाइजेशन-पॉलिटिकल एंड इकॉनॉमिक’ का जिक्र किया।

उन्होंने अपनी पुस्तक में मौजूद दूसरे पजल का भी जिक्र किया, और यह पजल है भारत में पलायन और आर्थिक वृद्धि जैसी समकारी ताकतों के बावजूद क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में विचलन। उन्होंने कहा कि राज्यों की एक गतिशीलता प्रतिस्पर्धी संघवाद के तर्क के खिलाफ होती है।

उन्होंने कहा, “अपनी नई पुस्तक के जरिए मैं इस पजल (उलझन), नोटबंदी के बाद नकदी में 86 प्रतिशत कमी की बड़ी उलझन, बावजूद इसके अर्थव्यवस्था पर काफी कम असर की तरफ ध्यान खींचने की कोशिश की है।”

सुबह्मण्यम ने कहा, “ये उलझनें खासतौर से इस सच्चाई से पैदा होती हैं कि यह कदम राजनीतिक रूप से क्यों सफल हुआ, और जीडीपी पर इसका इतना कम असर हुआ..क्या यह ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हम जीडीपी को ठीक से माप नहीं रहे हैं, अनौपचारिक क्षेत्र को नहीं माप रहे हैं, या यह अर्थव्यवस्था में मौजूद लचीलेपन को रेखांकित कर रहा है?”

सुबह्मण्यम ने अपनी किताब में लिखा है, “नोटबंदी के पहली छह तिमाहियों में औसत वृद्धि दर आठ प्रतिशत थी और इसके बाद सात तिमाहियों में औसत वृद्धि दर 6.8 प्रतिशत।”

उन्होंने कहा, “इसका प्रमुख कारण भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था की एक व्यापक समझ में छिपा हुआ है, इस बारे में कि लोग वोट कैसे करते हैं।”

उन्होंने केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जीडीपी के बैक सीरीज डेटा को जारी करने के दौरान नीति आयोग की उपस्थिति को लेकर जारी विवाद का जिक्र किया। जीडीपी के इस आंकड़े में आधार वर्ष बदल दिया गया, और पूर्व की संप्रग सरकार के दौरान देश की आर्थिक विकास दर को कम कर दिया गया।

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि जीडीपी की गणना एक बहुत ही तकनीकी काम है और तकनीकी विशेषज्ञों को ही यह काम करना चाहिए। जिस संस्थान के पास तकनीकी विशेषज्ञ नहीं हैं, उसे इसमें शामिल नहीं होना चाहिए।”

सुब्रह्मण्यम ने कहा, “जब मानक बहुत ऊंचे होंगे और वृद्धि दर फिर भी समान रहेगी तो अर्थशास्त्री स्वाभाविक रूप से सवाल उठाएंगे। यह आंकड़े की विश्वसनीयता को लेकर उतना नहीं है, जितना कि आंकड़े पैदा करने की प्रक्रिया को लेकर और उन संस्थानों को लेकर जिन्होंने इस काम को किया है।”

क्या नोटबंदी पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में वह शामिल थे? सुब्रह्मण्यम ने कहा, “जैसा कि मैंने किताब में कहा है, यह कोई निजी संस्मरण नहीं है..यह गॉसिप लिखने वाले स्तंभकारों का काम है।”

सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बीच हाल के गतिरोध के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि आरबीआई के स्वायत्तता की हर हाल में रक्षा की जानी चाहिए, क्योंकि संस्थानों के मजबूत रहने से देश को लाभ होगा।

उन्होंने कहा, “मैंने इस बात की खुद वकालत की है कि आरबीआई को एक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, लेकिन इसके अधिशेष कोष को खर्च के लिए नियमित वित्तपोषण और घाटा वित्तपोषण में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। यह आरबीआई पर छापा मारना जैसा होगा।”

–आईएएनएस

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