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येदियुरप्पा के बाद प्रोटेम स्पीकर के चयन में भी राज्यपाल का शर्मनाक रवैया

उन प्रसंगों को देखते हुए राज्यपाल वजुभाई वाला का ये फ़र्ज़ बनाता था कि वो सुप्रीम कोर्ट से मुँह की खाने के बाद तो अपनी बदनीयत से बाज़ आते। लेकिन अफ़सोस कि राज्यपाल की गरिमा को बीजेपी ने अपना मोहरा बना दिया है।

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KG Bopaiah

पुरानी कहावत है कि ‘चोर चोरी से जाए, मगर हेराफ़ेरी से जाए!’ फ़िलहाल, कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला का रवैया बिल्कुल इसी कहावत के मुताबिक़ है। वजुभाई वाला का बर्ताव उन शातिर अपराधियों जैसा भी है जो एक झूठ या ग़लती को छिपाने के लिए बार-बार झूठ बोलता है या ग़लती पर ग़लती ही करता चला जाता है। राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का पहला कर्त्तव्य होना चाहिए कि उसका आचरण संवैधानिक, विधायी और न्यायिक सुचिता के अनुकूल हो और वो सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का सबसे बड़ा संरक्षक हो!

बदकिस्मती से वजुभाई वाला ने लोकलाज़ की सारी सीमाओं को तार-तार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ये बात साफ़ हो चुकी है कि वजुभाई वाला एक निष्पक्ष राज्यपाल की तरह नहीं बल्कि बीजेपी की कठपुलती और एजेंट की तरह व्यवहार कर रहे हैं। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रोटेम स्पीकर यानी कार्यवाहक सभापति की देखरेख में विधानसभा में बहुमत का परीक्षण करवाने का आदेश दिया। लेकिन बेहयाई की सारी सीमाओं और विधायी परम्पराओं को तोड़ते हुए राज्यपाल ने केजी बोपय्या को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त कर दिया। जबकि नव-निर्वाचित विधायकों में उनके भी वरिष्ठ लोग मौजूद हैं।

इसीलिए, काँग्रेस-जेडीएस गठबन्धन ने राज्यपाल के इस फ़ैसले को भी पक्षपातपूर्ण और विधायी परम्पराओं के ख़िलाफ़ बताया है। इस धड़े का कहना है कि बोपय्या जहाँ 4 कार्यकाल (टर्म) से विधायक हैं और 2008 में स्पीकर भी रह चुके हैं वो प्रोटेम स्पीकर बनाये जाने के लिए सर्वथा अयोग्य हैं। क्योंकि सदन में दो विधायक ऐसे हैं जो 8 टर्म का अनुभव रखते हैं और उम्र में भी बोपय्या से बड़े हैं। इनमें पहले स्थान पर हैं काँग्रेस के आरवी देशपांडे और बीजेपी के उमेश विश्वनाथ कट्टी। इन दोनों में से भी उमेश के मुक़ाबले देशपांडे की उम्र अधिक है।

काँग्रेस-जेडीएस का कहना है कि प्रोटेम स्पीकर के चयन का मुद्दा राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों के दायरे में नहीं आता है। बल्कि इसका निर्धारण विधायी परम्पराओं के मुताबिक़ होता है। इस परम्परा के मुताबिक़, सबसे अनुभवी या उम्रदराज़ विधायक को प्रोटेम स्पीकर बनाया जाता है। उधर, राज्यपाल के फ़ैसले को सही ठहराते हुए बीजेपी ने दलील दी है कि चार टर्म की वरिष्ठता भी कम नहीं होती। बोपय्या को इसलिए वरीयता दी गयी है क्योंकि वो पूर्व स्पीकर रह चुके हैं।

लेकिन काँग्रेस-जेडीएस का कहना है कि बोपय्या जब स्पीकर रहे तो कई मौकों पर उनका आचरण निष्पक्ष नहीं रहा। उन्होंने बीजेपी के पक्ष में काम किया। 2008 में बोपय्या को प्रोटेम स्पीकर बनाने के फ़ैसले की इसलिए भी अनदेखी की गयी क्योंकि तब एक-एक वोट की मारामारी वाले हालात नहीं थे। दोनों पक्षों की इसी टकराहट को देखते हुए काँग्रेस-जेडीएस की ओर से देर शाम एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया गया।

विधायी परम्परा ये है कि नयी विधानसभा के चुनाव के बाद राज्यपाल सबसे अनुभवी या/और उम्रदराज़ राजनेता को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त करते हैं। प्रोटेम स्पीकर का काम है कि वो सभी विधायकों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाये। इसके बाद सदन के सभी विधायक अपना नया स्पीकर चुनते हैं। नये स्पीकर का चुनाव सत्ता पक्ष का पहला शक्ति परीक्षण होता है। क्योंकि स्पीकर को भी सदन के बहुमत से ही चुना जाता है। अब यदि सत्ता पक्ष के पास बहुमत नहीं हुआ तो उसका स्पीकर चुना नहीं जा सकता।

सामान्य तौर पर नये स्पीकर को अपने निर्वाचन के तुरन्त बाद सदन के संचालन से जुड़े नियमों के मुताबिक़, विश्वास मत पर बहस और मतदान का संचालन करना होता है। किस पक्ष को कितने मत मिले और प्रस्ताव का क्या हश्र हुआ ये तय करने का अधिकार स्पीकर का ही होता है। स्पीकर का फ़ैसला एक तरह से अन्तिम ही होता है। क्योंकि उसे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में ही चुनौती दी जा सकती है। इन अदालती कार्रवाई में भी ज़्यादा से ज़्यादा स्पीकर के फ़ैसले को ग़लत करार दिया जाता है। स्पीकर की दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई के लिए उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता।

इसीलिए. जब कभी स्पीकर का आचरण पक्षपातपूर्ण होता है तो विधानसभा में अव्यवस्था फैल जाती है। यही अव्यवस्था अन्ततः विधायकों के बीच की हिंसा में बदल जाती है। स्पीकर के आपत्तिजनक व्यवहार की वजह से देश की कई विधानसभाओं में कई बार शर्मसार करने वाली हिंसक वारदातें हो चुकी हैं। उन प्रसंगों को देखते हुए राज्यपाल वजुभाई वाला का ये फ़र्ज़ बनाता था कि वो सुप्रीम कोर्ट से मुँह की खाने के बाद तो अपनी बदनीयत से बाज़ आते। लेकिन अफ़सोस कि राज्यपाल की गरिमा को बीजेपी ने अपना मोहरा बना दिया है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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बिहार : समस्तीपुर में डेयरी संयंत्र, भोजपुर में पशु आहार कारखाना लगेंगे

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dairy products

मोतिहारी, 19 जनवरी | बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने यहां शनिवार को कहा कि अगले वित्तीय वर्ष 2019-20 में बिहार राज्य दुग्ध सहकारी संघ लिमिटेड (कम्फेड) द्वारा समस्तीपुर में पांच लाख लीटर प्रतिदिन क्षमता के डेयरी संयंत्र और भोजपुर के बिहिया में 300 मीट्रिक टन प्रतिदिन उत्पादन क्षमता के पशु आहार कारखाने लगाए जाएंगे। पूर्वी चंपारण जिले के मठबनवारी में 11 महीने के रिकार्ड समय में बन कर तैयार मदर डेयरी के प्रति दिन एक लाख लीटर क्षमता के दूध प्रसंस्करण संयंत्र का शनिवार को उद्घाटन करने के बाद बिहार के उपमुख्यमंत्री ने कहा कि इस संयंत्र द्वारा मार्च से 1250 गांवों के 50 हजार किसानों से प्रतिदिन 2 लाख लीटर दूध का संग्रह किया जा सकेगा।

उन्होंने कहा कि अब सुधा व मदर डेयरी, दोनों मिलकर किसानों से दूध खरीदेगी।

मोदी ने कहा, “वर्तमान वित्तीय वर्ष में सुपौल में एक लाख लीटर क्षमता का डेयरी संयंत्र, समस्तीपुर व हाजीपुर में 30-30 मीट्रिक टन के दूध पाउडर संयंत्र, पटना व नालंदा में 20-20 हजार किलो दैनिक क्षमता के आइसक्रीम प्लांट स्थापित किए जाने के साथ ही पटना में पूर्व से स्थापित 100 मीट्रिक टन क्षमता के पशु आहार फैक्ट्री को 150 मीट्रिक टन में विस्तारित और 150 मीट्रिक टन की नई इकाई स्थापित की गई है।”

डेयरी स्थापित करने वाले किसानों को सरकार द्वारा 50 प्रतिशत तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को 66 प्रतिशत अनुदान दिए जाने का दावा करते हुए उन्होंने कहा कि किसानों की आमदनी केवल धान, गेहूं की खेती करने से दोगुनी नहीं होगी, बल्कि इसके लिए समग्र रूप से वानिकी, डेयरी, मछली और मुर्गी पालन को अपनाना होगा।

उन्होंने कहा कि फिलहाल बिहार में प्रतिदिन 18 लाख किलो दूध का संग्रह व 14 लाख लीटर की मार्केटिंग सुधा डेयरी द्वारा की जा रही है।

इस मौके पर केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह, बिहार सरकार में मंत्री प्रमोद कुमार, राणा रणधीर सिंह समेत कई अधिकारी और नेता मौजूद थे।

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मुकेश अंबानी ने ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ अभियान का आह्वान किया

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mukesh ambani

गांधीनगर, 18 जनवरी | औपनिवेशीकरण के खिलाफ महात्मा गांधी के अभियान को याद करते हुए रिलायंस इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक मुकेश अंबानी ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करने की गुजारिश की और कहा कि भारतीय डेटा भारतीयों के ‘स्वामित्व और नियंत्रण’ में होने चाहिए। उन्होंने यहां वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट 2019 में कहा, “हम अपने राष्ट्रपिता को उनकी 150वीं जयंती के वर्ष में श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। गांधी जी ने राजनीतिक औपनिवेशीकरण के खिलाफ आन्दोलन चलाया था.. आज हम सब मिलकर डेटा औपनिवेशीकरण के खिलाफ नया अभियान शुरू कर रहे हैं।” इस समिट का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था।

अंबानी ने कहा कि डेटा नई दुनिया में ‘नया तेल और धन’ है। उन्होंने कहा कि भारत के डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण भारतीय लोगों के हाथ में ही होना चाहिए और कॉर्पोरेट्स द्वारा नहीं किया जाना चाहिए, खासतौर से वैश्विक कॉर्पोरेशंस द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “माननीय प्रधानमंत्री, मैं आश्वस्त हूं कि आप अपने डिजिटल इंडिया मिशन के प्रमुख लक्ष्यों में इसे भी शामिल करेंगे।”

उन्होंने कहा, “भारत को इस डेटा संचालित क्रांति में सफल होने के लिए, हमें भारतीय डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण वापस भारत भेजना होगा.. दूसरे शब्दों में भारतीय संपत्ति वापस लौटानी होगी। भारतीय डेटा को भरतीयों द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए, न कि वैश्विक कॉर्पोरेट्स द्वारा। डेटा का नियंत्रण हमें अपने हाथों में लेने के लिए अभियान चलाने की आवश्यकता है।”

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अक्टूबर में कहा था कि सभी डिजिटल भुगतान कंपनियों जैसे गूगल प्ले, वाट्सएप और अन्य को अपने भारतीय कारोबार का डेटा स्थानीय तौर पर स्टोर करना चाहिए।

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ओपिनियन

बसपा-सपा गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं : शीला दीक्षित

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वरिष्ठ कांग्रेस नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कहना है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं मिल रहे हैं, लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस के परिणाम चौंकाने वाले होंगे।

शीला दीक्षित ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, “उनको एक साथ आने दीजिए। वे मिलते और जुदा होते रहे हैं और फिर साथ आ रहे हैं। मेरा अभिप्राय यह है कि उनमें स्थिरता नहीं है और वे स्थायित्व के संकेत नहीं दे रहे हैं। अब आगे देखते हैं।”

तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं दीक्षित (80) सपा और बसपा गठबंधन को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रही थीं। सपा और बसपा ने कांग्रेस को महागठबंधन से अलग रखते हुए प्रदेश में 80 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए एक गठबंधन किया है। दीक्षित को 10 जनवरी को दिल्ली कांग्रेस की कमान सौंपी गई।

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने से पहले शीला दीक्षित को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था। दीक्षित ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीद क्षीण पड़ गई है।

दीक्षित की टिप्पणी से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेता चुनाव अभियान के दौरान सपा और बसपा को निशाना बनाएंगे, जबकि उनका सीधा मुकाबला सत्ताधारी पार्टी भाजपा से होगा।

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है, लेकिन पार्टी ने भाजपा को शिकस्त देने वाले सेक्यूलर दलों के लिए दरवाजा खुला रखा है।

उत्तर प्रदेश में पार्टी नेता उम्मीदवारों को बता सकते हैं कि कांग्रेस ही नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से बाहर कर सकती है और भाजपा को शिकस्त दे सकती है।

कांग्रेस इस बात पर बल देंगे कि इस चुनाव के नतीजों से प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि देश का प्रधानमंत्री चुना जाएगा।

लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो ही सीटें बचा पाई थीं, जबकि उससे पहले 2009 में पार्टी ने 21 सीटों पर जीत हासिल की थी, जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) दूसरी बार केंद्र की सत्ता को बरकार रख पाई थी।

दीक्षित ने कहा कि उनसे कहा जाएगा तो वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी, लेकिन वह दिल्ली पर अपना अधिक ध्यान केंद्रित करेंगी क्योंकि उनको यहां काफी काम करना है।

उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी को कांग्रेस द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करने का अनुमोदन किया।

उन्होंने कहा, “पार्टी को इस पर फैसला लेने दीजिए। हम चाहते हैं और खासतौर से मैं चाहती हूंं और हमारे बीच अधिकांश लोग चाहते हैं। लेकिन इस पर पूरी पार्टी द्वारा फैसला लिया जाएगा।”

गैर-भाजपा दलों में प्रधानमंत्री का पद विवादास्पद मसला है। राहुल गांधी ने खुद भी कहा कि इसका फैसला चुनाव के बाद लिया जाएगा और पहला काम नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित करना है।

संपूर्ण भारत में महागठबंधन की संभावना पर पूछे जाने पर दीक्षित ने कहा कि लोग इस दिशा में प्रयासरत हैं, लेकिन इस पर अभी पूरी सहमति नहीं बन पाई है।

विपक्षी दलों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में गठबंधन की संभावना कम है, लेकिन भाजपा को शिकस्त देने के लिए राज्य विशेष में गठबंधन होगा।

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