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येदियुरप्पा के बाद प्रोटेम स्पीकर के चयन में भी राज्यपाल का शर्मनाक रवैया

उन प्रसंगों को देखते हुए राज्यपाल वजुभाई वाला का ये फ़र्ज़ बनाता था कि वो सुप्रीम कोर्ट से मुँह की खाने के बाद तो अपनी बदनीयत से बाज़ आते। लेकिन अफ़सोस कि राज्यपाल की गरिमा को बीजेपी ने अपना मोहरा बना दिया है।

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KG Bopaiah

पुरानी कहावत है कि ‘चोर चोरी से जाए, मगर हेराफ़ेरी से जाए!’ फ़िलहाल, कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला का रवैया बिल्कुल इसी कहावत के मुताबिक़ है। वजुभाई वाला का बर्ताव उन शातिर अपराधियों जैसा भी है जो एक झूठ या ग़लती को छिपाने के लिए बार-बार झूठ बोलता है या ग़लती पर ग़लती ही करता चला जाता है। राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का पहला कर्त्तव्य होना चाहिए कि उसका आचरण संवैधानिक, विधायी और न्यायिक सुचिता के अनुकूल हो और वो सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का सबसे बड़ा संरक्षक हो!

बदकिस्मती से वजुभाई वाला ने लोकलाज़ की सारी सीमाओं को तार-तार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ये बात साफ़ हो चुकी है कि वजुभाई वाला एक निष्पक्ष राज्यपाल की तरह नहीं बल्कि बीजेपी की कठपुलती और एजेंट की तरह व्यवहार कर रहे हैं। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रोटेम स्पीकर यानी कार्यवाहक सभापति की देखरेख में विधानसभा में बहुमत का परीक्षण करवाने का आदेश दिया। लेकिन बेहयाई की सारी सीमाओं और विधायी परम्पराओं को तोड़ते हुए राज्यपाल ने केजी बोपय्या को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त कर दिया। जबकि नव-निर्वाचित विधायकों में उनके भी वरिष्ठ लोग मौजूद हैं।

इसीलिए, काँग्रेस-जेडीएस गठबन्धन ने राज्यपाल के इस फ़ैसले को भी पक्षपातपूर्ण और विधायी परम्पराओं के ख़िलाफ़ बताया है। इस धड़े का कहना है कि बोपय्या जहाँ 4 कार्यकाल (टर्म) से विधायक हैं और 2008 में स्पीकर भी रह चुके हैं वो प्रोटेम स्पीकर बनाये जाने के लिए सर्वथा अयोग्य हैं। क्योंकि सदन में दो विधायक ऐसे हैं जो 8 टर्म का अनुभव रखते हैं और उम्र में भी बोपय्या से बड़े हैं। इनमें पहले स्थान पर हैं काँग्रेस के आरवी देशपांडे और बीजेपी के उमेश विश्वनाथ कट्टी। इन दोनों में से भी उमेश के मुक़ाबले देशपांडे की उम्र अधिक है।

काँग्रेस-जेडीएस का कहना है कि प्रोटेम स्पीकर के चयन का मुद्दा राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों के दायरे में नहीं आता है। बल्कि इसका निर्धारण विधायी परम्पराओं के मुताबिक़ होता है। इस परम्परा के मुताबिक़, सबसे अनुभवी या उम्रदराज़ विधायक को प्रोटेम स्पीकर बनाया जाता है। उधर, राज्यपाल के फ़ैसले को सही ठहराते हुए बीजेपी ने दलील दी है कि चार टर्म की वरिष्ठता भी कम नहीं होती। बोपय्या को इसलिए वरीयता दी गयी है क्योंकि वो पूर्व स्पीकर रह चुके हैं।

लेकिन काँग्रेस-जेडीएस का कहना है कि बोपय्या जब स्पीकर रहे तो कई मौकों पर उनका आचरण निष्पक्ष नहीं रहा। उन्होंने बीजेपी के पक्ष में काम किया। 2008 में बोपय्या को प्रोटेम स्पीकर बनाने के फ़ैसले की इसलिए भी अनदेखी की गयी क्योंकि तब एक-एक वोट की मारामारी वाले हालात नहीं थे। दोनों पक्षों की इसी टकराहट को देखते हुए काँग्रेस-जेडीएस की ओर से देर शाम एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया गया।

विधायी परम्परा ये है कि नयी विधानसभा के चुनाव के बाद राज्यपाल सबसे अनुभवी या/और उम्रदराज़ राजनेता को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त करते हैं। प्रोटेम स्पीकर का काम है कि वो सभी विधायकों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाये। इसके बाद सदन के सभी विधायक अपना नया स्पीकर चुनते हैं। नये स्पीकर का चुनाव सत्ता पक्ष का पहला शक्ति परीक्षण होता है। क्योंकि स्पीकर को भी सदन के बहुमत से ही चुना जाता है। अब यदि सत्ता पक्ष के पास बहुमत नहीं हुआ तो उसका स्पीकर चुना नहीं जा सकता।

सामान्य तौर पर नये स्पीकर को अपने निर्वाचन के तुरन्त बाद सदन के संचालन से जुड़े नियमों के मुताबिक़, विश्वास मत पर बहस और मतदान का संचालन करना होता है। किस पक्ष को कितने मत मिले और प्रस्ताव का क्या हश्र हुआ ये तय करने का अधिकार स्पीकर का ही होता है। स्पीकर का फ़ैसला एक तरह से अन्तिम ही होता है। क्योंकि उसे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में ही चुनौती दी जा सकती है। इन अदालती कार्रवाई में भी ज़्यादा से ज़्यादा स्पीकर के फ़ैसले को ग़लत करार दिया जाता है। स्पीकर की दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई के लिए उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता।

इसीलिए. जब कभी स्पीकर का आचरण पक्षपातपूर्ण होता है तो विधानसभा में अव्यवस्था फैल जाती है। यही अव्यवस्था अन्ततः विधायकों के बीच की हिंसा में बदल जाती है। स्पीकर के आपत्तिजनक व्यवहार की वजह से देश की कई विधानसभाओं में कई बार शर्मसार करने वाली हिंसक वारदातें हो चुकी हैं। उन प्रसंगों को देखते हुए राज्यपाल वजुभाई वाला का ये फ़र्ज़ बनाता था कि वो सुप्रीम कोर्ट से मुँह की खाने के बाद तो अपनी बदनीयत से बाज़ आते। लेकिन अफ़सोस कि राज्यपाल की गरिमा को बीजेपी ने अपना मोहरा बना दिया है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

ओपिनियन

अटल बिहारी वाजपेयी : नए भारत के सारथी और सूत्रधार

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Atal-Bihari-Vajpayee

नई दिल्ली, 16 अगस्त (आईएएनएस)| भारत रत्न, सरस्वती पुत्र एवं देश की राजनीति के युगवाहक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का संपूर्ण जीवन राष्ट्रसेवा और जनसेवा को समर्पित रहा। वे सच्चे अर्थों में नवीन भारत के सारथी और सूत्रधार थे। वे एक ऐसे युग मनीषी थे, जिनके हाथों में काल के कपाल पर लिखने व मिटाने का अमरत्व था। ओजस्वी वक्ता विराट व्यक्तित्व और बहुआयामी प्रतिभा के धनी वाजपेयी की जीवन यात्रा आजाद भारत के अभ्युदय के साथ शुरू होती है और विश्व पटल पर भारत को विश्वगुरु के पद पर पुन: प्रतिष्ठित करने की आकांक्षा के साथ कई पड़ावों को जीते हुए आगे बढ़ती है। वे भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य थे। वे 1968 से 1973 तक भारतीय जन संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अटल बिहारी वाजपेयी में भारत का भविष्य देखा था। वाजपेयी 10 बार लोक सभा सांसद रहे। वहीं वे दो बार 1962 और 1986 में राज्यसभा सांसद भी रहे। वाजपेयी जी देश के एक मात्र सांसद थे, जिन्होंने देश की छह अलग-अलग सीटों से चुनाव जीता था। सन 1957 से 1977 तक वे लगातार बीस वर्षो तक जन संघ के संसदीय दल के नेता रहे। आपातकाल के बाद देश की जनता द्वारा चुने गए मोरार जी देसाई जी की सरकार में वे विदेश मंत्री बने और विश्व में भारत की एक अलग छवि का निर्माण किया।

इस दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ में पहली बार हिंदी में ओजस्वी उद्बोधन देकर वाजपेयी ने विश्व में मातृभाषा को पहचान दिलाई और भारत की एक अलग छाप छोड़ी। आपातकाल के दौरान उन्हें भी लोकतंत्र की हत्यारी सरकार की प्रताड़ना झेलनी पड़ी। उन्हें जेल में डाल दिया गया लेकिन उन्होंने जेल से ही कलम के सहारे अनुशासन के नाम पर अनुशासन का खून लिख कर राष्ट्र को एकजुट रखने की कवायद जारी रखी।

सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए विचारधारा की राजनीति करने वाले वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद पहले अध्यक्ष बने। उन्होंने तीन बार 1996, 1998-99 और 1999-2004 में प्रधानमंत्री के रूप में देश का प्रतिनिधित्व किया। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फलक पर देश को नई ऊंचाइयों पर प्रतिष्ठित करने वाले वाजपेयी के कार्यकाल में देश ने प्रगति के अनेक आयाम छुए।

अजातशत्रु अटल बिहारी वाजपेयी ने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नारे को आगे बढ़ाते हुए ‘जय जवान-जय किसान- जय विज्ञान’ का नारा दिया। देश की सामरिक सुरक्षा पर उन्हें समझौता बिलकुल भी गंवारा नहीं था। वैश्विक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने 1998 में पोखरण में पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण किए। इस परीक्षण के बाद कई अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद वाजपेयी की दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति ने इन परिस्थितियों में भी उन्हें अटल स्तंभ के रूप में अडिग रखा। कारगिल युद्ध की भयावहता का उन्होंने डट कर मुकाबला किया और पाकिस्तान को राजनीतिक, कूटनीतिक, रणनीतिक और सामरिक सभी स्तरों पर धूल चटाई।

वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में देश में विकास के स्वर्णिम अध्याय की शुरूआत हुई। वे देश के चारों कोनों को जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी अविस्मरणीय योजना के शिल्पी थे। नदियों के एकीकरण जैसे कालजयी स्वप्न के द्रष्टा थे। मानव के रूप में वे महामानव थे। सर्व शिक्षा अभियान, संरचनात्मक ढांचे के सुधार की योजना, सॉफ्टवेयर विकास के लिए सूचना एवं प्रौद्योगिकी कार्यदल का निर्माण और विद्युतीकरण में गति लाने के लिए केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग आदि योजनाओं की शुरुआत कर देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर करने में उनकी भूमिका काफी अनुकरणीय रही। वाजपेयी सरकार की विदेश नीति ने दुनिया में भारत को एक नेतृत्वकर्ता के रूप में प्रतिष्ठित रहा।

अपनी ओजस्वी भाषण शैली, लेखन व विचारधारा के प्रति निष्ठा तथा ठोस फैसले लेने के लिए विख्यात वाजपेयी को कई पुरस्कारों से नवाजा गया। उन्हें 1992 में पद्म विभूषण 1994 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार, 1994 में ही श्रेष्ठ सांसद पुरस्कार, भारत रत्न पंडित गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार और 2015 में उन्हें बांग्लादेश के सर्वोच्च अवार्ड फ्रेंड्स ऑफ बांग्लादेश लिबरेशन वार अवॉर्ड से उन्हें सम्मानित किया गया। देश के विकास में अमूल्य योगदान देने एवं अंतर्राष्ट्रीय फलक पर देश को सम्मान दिलाने के लिए वाजपेयी को 2015 में देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया गया।

— आईएएनएस

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अटल थे, अटल हैं, अटल रहेंगे!

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Atal Behari Atal

वे साधारण परिवार में जन्मे, साधारण से प्राइमरी स्कूल में पढ़े और साधारण से प्राइमरी स्कूल टीचर के बच्चे हैं। उनके पिता का नाम कृष्ण विहारी वाजपेयी और दादा थे पंडित श्याम लाल वाजपेयी। उन्होंने सारे देश के सामने एक बार कहा था- ‘मैं अटल तो हूं पर ‘बिहारी’ नहीं हूं। तब लोगों ने इसे अजीब ढंग से लिया था।

लोगों को लगा कि वे ‘बिहार’ का अपमान कर रहे हैं। वस्तुत: उन्होंने कहा था कि असल में उनके पिता का नाम ‘वसंत – विहार’, ‘श्याम-विहार’, ‘यमुना विहार’ की तरह ही ‘विहार’ है, तो उनका मूल नाम है- अटल विहारी। ये तो बीबीसी लंदन ने शुरू कर दिया ‘ए.बी.वाजपेयी’ तो सब इसी पर चल पड़े।

संसद में एक बार अटल जी के लिए किसी ने कहा कि ‘वे आदमी तो अच्छे हैं लेकिन पार्टी ठीक नहीं है।’ इस पर अटल जी ने अपने भाषण में कहा भी था कि, ‘मुझसे कहा जाता है कि मैं आदमी तो अच्छा हूं, लेकिन पार्टी ठीक नहीं है, मैं कहता हूं कि मैं भी कांग्रेस में होता अगर वह विभाजन की जिम्मेदार नहीं होती।’

यूं तो वे भी पुराने कांग्रेसी थे। पहले सभी कांग्रेसी थे। आरंभिक दिनों में विजय राजे सिंधिया भी कांग्रेस में थी, जिवाजी राव सिंधिया भी कांग्रेस में थे। कांग्रेसी इस आरोप का उत्तर नहीं दे पाएंगे, क्योंकि कांग्रेस ही शायद कांग्रेस का इतिहास नहीं जानती। उन पर जो सबसे पहला आरंभिक प्रभाव था वो कई कवियों का रहा। मध्य प्रदेश के ही कई कवि अटल विहारी वाजपेयी के कालेज में थे।

डॉक्टर शिव मंगल सिंह ‘सुमन’ एक प्रगतिशील कवि और लेखक भी थे। अटल जी ने लाल किले से उनकी कविताएं भी पढ़ी हैं और अटल जी की जो बहुत मशहूर कविता है- ‘हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, और ‘काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं.’. उस पर ‘सुमन जी’ का प्रभाव है। इसी तरह की एक और कविता- ‘गीत नया गाता हूं’।

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उनकी भाषा पर भी ‘सुमन जी’ का प्रभाव है। दिलचस्प बात ये है कि ‘सुमन जी’ की भाषण शैली और कविता पाठ में ‘निराला जी’ का प्रभाव है। ये बात मुझे नीरज जी ने एक बार बताई थी कि सुमन जी निराला जी की शैली में कविता पढ़ते हैं।

महत्वपूर्ण बात ये है कि अटल जी भारतीय राजनीति में नेहरू जी के बाद एक अनूठे नक्षत्र हैं। यहां तक कि जब अटल जी पहली बार संसद में पहुंचे तो उनका भाषण सुन कर नेहरू जी ने कहा था- यह नौजवान नहीं मैं भारत के ‘भावी प्रधानमंत्री’ का भाषण सुन रहा हूं। ये बात उनके ‘बॉयोडाटा’ में लिखी हुई है। ये बात कहना कोई साधारण बात नहीं है। यह एक द्रष्टा की दृष्टि है। हीरे की परख जौहरी ही कर सकता है। बात ये है कि प्रतिभा की परख ही प्रतिभा ही कर सकती है।

नेहरू जी ने पहले ही दिन देख लिया कि भारत का भावी प्रधानमंत्री बोल रहा है। अटल जी प्रधानमंत्री बने, एक बार नहीं, दो बार नहीं, तीन बार प्रधानमंत्री बने। उन्होंने जवाहर लाल जी और इंदिरा जी के रिकॉर्ड को भी तोड़ा। भारत में ऐसा कोई प्रधानमंत्री नहीं हुआ, शायद कोई हो, जो तीन – तीन बार प्रधानमंत्री बने। अटल जी का राजनीति में कभी कोई ‘ग्रुप’ था ही नहीं।

अटल जी तो ‘भगवान राम’ की तरह हैं, जिनके पास ‘हनुमान’ भी अपना नहीं किसी और का है। हनुमान ‘सुग्रीव’ के थे। मसलन- प्रमोद महाजन थे, जो लालकृष्ण आडवाणी के आदमी माने जाते थे, मगर भगत रहे अटलजी के। आप अटल जी की एक और विशेषता देखें, अटल जी के जो सबसे बड़े सलाहकार थे वे कांग्रेस के दिग्गज नेता द्वारका प्रसाद मिश्र के बेटे हैं। अटल जी के सबसे अच्छे मित्र थे शहाबुद्दीन, जिन्हें अटल जी राजनीति में लाए, वे आईएफएस और मुसलमान हैं। विश्व में किसी राजनेता का ऐसा नैतिक साहस है कि, बिल क्लिंटन का भी नहीं, कि किसी से उनके क्या संबंध हैं, आध्यात्मिक संबंध, प्रेम संबंध या भावनात्मक संबंध, वे सब जग जाहिर है।

शीला कौल जो उनके साथ रहती थीं.. आप इसे मित्रता कहे, प्रेम संबंध कहें, मीरा का संबंध कहें, या फिर राधा का संबंध कहें, लिव इन रिलेशन कहें, लेकिन मैं इससे पूरी तरह सहमत हूं कि वे जो करते थे खुलकर करते, वही करते जो उन्हें उचित लगता। कृष्ण की तरह करते, जैसे कृष्ण ने सत्यभामा और रुक्मिणी के होते हुए राधा के संबंध को छुपाया नहीं।

जब वे कष्ट में रहे तब तो मैंने उन्हें रायसीना रोड के सुधीर के ढाबे से ‘दाल’ मंगाकर भी खाते देखा है। तब तो भारत वर्ष में कहीं से उनका कोई रिश्तेदार नहीं आया। अब तो अनूप मिश्रा और करुणा शर्मा भी देखी जाती हैं, जो रिश्तेदार हैं। परिवार जन भी आ गए, प्रधानमंत्री जो बन गए। पर तब एक मात्र शीला जी रही जो सुख दुख में उनके साथ खड़ी थी। लेकिन किसी ने इसे देखा नहीं। हिंदुस्तान के किसी राजनीतिज्ञ ने, प्रेस ने इस विषय को उठाया भी नहीं, कि प्रधानमंत्री आवास में एक महिला भी रहती है।

मुझे याद है पहली बार प्रधानमंत्री बनने पर जब मैं उन्हें बधाई देने गया था तो सो ‘ऊषा सिंहल’ के साथ गया था। ऊषा दीदी माननीय अशोक सिंहल जी की इकलौती बहन थीं। इनके सात भाई थे, अशोक भैया, आनंद भैया, पूर्व डीजी पुलिस और ब्लड प्रेशर सिंहल के नाम से मशहूर भारतेंदु प्रकाश सिंहल, विचारक, चिंतक और लेखक, उद्योग पति विवेक सिंहल, और अब नहीं रहे पीयूष सिंहल- इन सात भाइयों की एक बहन। वे कहती थीं, ‘ये सात भैया एक तरफ और राज भैया एक तरफ’।

मुझे उषा जी अपना भाई मानती थी और राखी बांधती रही। ऊषा जी अटल जी को भी राखी बांधती रही हैं। उन्हें पतरकु (दुबले पतले वाले) भैया कहती रहीं। उस समय अटल जी के सेवक सर्वस्व थे शिवकुमार ‘मूंछड़ जी’। दीदी ने शिवकुमार जी के सामने ही एक बार पूछ लिया अटल जी से कि ‘क्या शीला जी भी यहीं रहती है पतरकू भैया!’ तो अटल जी शर्माने लगे और कहने लगे- ‘हां, यहीं रहती है ऊषा बहिन’।

लेकिन ये विश्व के इतिहास की एक अनोखी घटना है। क्या कोई ऐसी और घटना बता सकता है, जहां प्रधानमंत्री के घर में एक अनजान महिला जो उनकी पत्नी नहीं हो उसके बाद भी अपने दत्तक दामाद के साथ वहीं रहती हो। रंजन भट्टाचार्य के साथ दत्तक बेटी भी। तो प्रेस ने क्यों नहीं उठाया ये सवाल। कभी किसी ने ध्यान भी नहीं दिया।

जब मैंने प्रभाष जोशी जी पर लेख लिखा तो करीब 160 से ज्यादा पत्र मेरे पास आए। इनमें शरद पवार और काजमी जैसे लोगों के पत्र भी हैं, जिनमें लिखा है कि आप में अपने पिता की ही तरह हंस की प्रवृत्ति है कि दूध और जल को अलग कर देते हैं। कंकड़ से मोती चुनने और नीर क्षीर विवेक का।

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ये सब जो तुलनात्मक अध्ययन है वो मैं इसलिए बता रहा हूं कि कांग्रेस क्या, कोई पार्टी क्या, कोई मीडिया क्या, ये मुद्दा कोई इसलिए नहीं उठा पाया क्योंकि ये जो सज्जन थे जवाहर लाल नेहरू के साले, कमला नेहरू जी के भाई थे। उन्हीं की पत्नी थीं शीला कौल। कांग्रेस इस मुद्दे को उठा नहीं सकती थी, लेकिन प्रेस ने भी नहीं उठाया। इसकी वजह आपने नहीं सोची होगी।

विचार करें, क्योंकि अटल जी का ‘चरित्र’ सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा था। उनके चरित्र पर कोई धब्बा नहीं है। उसके बावजूद उन्होंने अशोक सिंहल जी के डांटने पर एक बार संसद में कहा था, ” मैं कुंआरा तो हूं, ब्रह्मचारी नहीं।” इसे कहने के लिए बेहद नैतिक साहस चाहिए। प्रो.रज्जू भैया ने भी कहा था कि ये कहने के लिए बहुत नैतिक साहस चाहिए। लेकिन अशोक सिंहल जी को ये बात बुरी लगी थी।

उन्होंने कहा- ये क्या कोई कहने वाली बात है कि ‘मैं कुआंरा तो हूं, ब्रह्मचारी नहीं, यानी चरित्रहीन हूं।’ मगर ये बात नहीं है। जयप्रकाश नारायण ने एक बार गांधी जी के सामने शपथ ली, मैं प्रभावती जी के साथ बिस्तर पर नहीं सोऊंगा। बह्मचर्य का पालन करूंगा। पर प्रकाश झा ने एक लंबी फिल्म जयप्रकाश जी पर बनाई थी। उस पर मैंने पचासों आपत्तियां की थीं और बहुत अखबारबाजी भी हुई। पार्लियामेंट में भी हंगामा हुआ। इस फिल्म में एक इंटरव्यू में प्रकाश झा ने जयप्रकाश जी के मुंह से कहलवाया कि -‘मैं ऐसा नहीं रह पाया। बह्मचर्य का वैसा पालन नहीं कर पाया जैसा प्रभावती करती रहीं’। इसका आशय था कि जय बाबू कहीं-कहीं स्खलित भी हुए। मैंने इस पर आपत्ति भी की थी। लेकिन अटल जी का ये नैतिक साहस।

गांधी जी को हम लोग बहुत ज्यादा मानते हैं। उनके इस बात के लिए बहुत सम्मान देते हैं। उनके नैतिक साहस का सम्मान करते हैं। गांधी जी की आत्मकथा की बात करते हैं। उनके ‘सत्य के प्रयोग’ की बहुत बात करते हैं, लेकिन अटल जी के अनुभव या कहें कि एक्सपीरिएंस विद ट्रुथ पर आज तक कोई बात नहीं हुई। शायद ही कोई कर पाए। फिर भी उन्होंने देखा जाएतो ये सब कहा।

ये हिम्मत की बात है। साहस का विषय है कि भारत की राजनीति में पहला पुरुष है जिसके घर में एक महिला मित्र है। जो महिला है उनसे उनका क्या रिश्ता है ये पूछने का साहस किसी के पास नहीं है!

राजनीति में उनका कोई गुरु नहीं है। हालांकि लोग कहते हैं कि उनके गुरु ‘अमुक’ रहे हैं। कभी लोग बलराज मधोक को बता देते हैं, लोग कहते हैं कि मधोक जी ही उन्हें जनसंघ में ले आए। जबकि पहले से ही बलराज मधोक उन पर आरोप लगाते रहे कि वे जनसंघ में ‘कांग्रेस के एजेंट’ थे। जनसंघ में वे ‘जवाहर लाल नेहरू के आदमी’ हैं। पर आज बलराज मधोक दिल्ली में किसी को हैंड पंप से पानी खीचते नजर आते हैं। जनसंघ के संस्थापक मधोक जी रहे और तीन बार प्रधानमंत्री बने अटल जी! तो इस आदमी में कोई न कोई खूबी तो ऐसी होगी।

इन खूबियों को जरा देखिए और सोचिए। सबसे बड़ी खूबी कि गोविंदाचार्य ने कह दिया कि आप उन्हें ‘मुखौटा’ कह सकते हैं। वे ‘मुखौटा’ थे कि नहीं, इस बारे में आगे जाकर भारतीय जनता विश्लेषण करे। इसलिए ये बात तो आप इतिहास पर छोड़िए।

(लेखक दूरदर्शन महानिदेशालय में अपर महानिदेशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

By : राजशेखर व्यास

–आईएएनएस

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‘एक देश एक चुनाव’ यानी जनता को उल्लू बनाने के लिए नयी बोतल में पुरानी शराब

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MODI-SHAH

आज देश की बड़ी चुनौतियों में से प्रमुख है कि ये कैसे तय हो कि ‘जनता को उल्लू बनाने वाले नेता’ या ‘उल्लू बनने वाले लोगों’ में से कौन बड़ा बेवकूफ़ है? ये सवाल खड़ा होता है बीजेपी के उस ताज़ा शिगूफ़े से, जिसे ‘एक देश एक चुनाव’ के ढोल के रूप में पीटा जा रहा है। हालाँकि, इस लिहाज़ से बयानबाज़ी के सिवाय कुछ नहीं हो रहा। कुछ होगा भी नहीं। कुछ होना भी नहीं है। 2019 में तो हर्ग़िज़ नहीं! क्योंकि ‘एक देश एक चुनाव’ की कल्पना को हवा देने वालों का असली मक़सद बदलाव लाना नहीं बल्कि इसकी आड़ में सियासी रोटियाँ सेंकना है। इसीलिए सारे प्रसंग को ‘जनता को उल्लू बनाने’ की कवायद भी कह सकते हैं।

हम देख चुके हैं कि बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में जितनी बातें की थी, उनमें से ज़्यादातर का ताल्लुक ‘जनता को उल्लू बनाने’ से ही रहा है। याद है ना कि इन्होंने कश्मीरी पंडितों की घर वापसी के लिए कितना ढोल पीटा था! लेकिन हुआ क्या? एक भी कश्मीरी पंडित की आज तक घर वापसी नहीं हुई। मोदी राज से पहले भी बेचारे कश्मीरी पंडित अपने ही देश में ‘शरणार्थी’ थे और आज भी हैं! यही आलम अच्छे दिन, कालाधन वापसी, हर खाते में 15-15 लाख, सालाना दो करोड़ रोज़गार के अवसर, किसानों की आमदनी दोगुनी करने, महँगाई, पेट्रोल-डीज़ल-रसोई गैस के दाम, रुपये की गिरती क़ीमत, गंगा की सफ़ाई, बेटी बचाओ जैसे असंख्य जुमलों का भी रहा है।

लोकसभा के चुनाव महज नौ महीने दूर हैं। 2014 में जैसी हवा बीजेपी के पक्ष में बनी थी, उससे कहीं अधिक तीखी हवा अब बीजेपी के ख़िलाफ़ बह रही है। जनता मोदी राज की निपट जुमलेबाज़ी से तंग आ चुकी है। नोटबन्दी और जीएसटी जैसी नीतियों ने हरेक व्यक्ति को तकलीफ़ें दी हैं। इन्हें लेकर जितने सब्जबाग़ सजाये गये थे, वो सभी खोखले साबित हुए हैं। उल्टा साम्प्रदायिकता, गाय-गोबर-बीफ़-लिंचिंग और हिन्दू-मुसलमान के रूप में  नफ़रत का जैसा माहौल बीजेपी ने देश को दिया है, उससे आम जनता बेहद ख़फ़ा है। इसी से जनता का ध्यान भटकाने के लिए ‘एक देश एक चुनाव’ का पासा फेंका गया है।

झूठ फैलाया जा रहा है कि लोकसभा के साथ कम से कम 11 राज्यों के चुनाव तो संविधान में संशोधन किये बग़ैर ही करवाये जा सकते हैं। यदि ऐसा हो सकता है कि सरकार वैसे ही ताल ठोंककर ऐसा करने का ऐलान क्यों नहीं करती, जैसे बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने ऐलान कर दिया कि उन बाँग्लादेशी घुसपैठियों को कोई दिक्कत नहीं होगी, जो हिन्दू हैं। इसे ‘हिन्दू अन्दर मुसलमान बाहर’ कह सकते हैं। ये बात भी कभी लागू नहीं होगी। क्योंकि मोदी सरकार जिन-जिन कामों को नहीं करना चाहती है, उसके लिए विपक्ष पर ठीकरा फोड़ती है।

सत्ता में आप हैं। ‘एक देश एक चुनाव’ को लागू करने से आपको कोई नहीं रोक रहा। कोई रोक भी नहीं सकता। लिहाज़ा, करके दिखाइए। अपनी नाकामी का दारोमदार विपक्ष पर थोपने का कोई तुक़ नहीं हो सकता। सलाह-मशविरे की नौटंकी आप सिर्फ़ इसलिए करना चाहते हैं क्योंकि आपको सिर्फ़ जनता को उल्लू बनाना है कि आप देश में सुधार लाना चाहते हैं और विपक्ष ऐसा नहीं चाहता। आपको देशहित की परवाह है, जबकि विपक्ष देशहित के ख़िलाफ़ है। क्या नोटबन्दी से पहले, सर्ज़िकल हमले से पहले, पठानकोट में आईएसआई को बुलाने से पहले, बैंक लुटवाने से पहले, राफेल सौदे से पहले आपने विपक्ष से मशविरा किया था? नहीं ना! इन मोर्चों पर आप जो करना चाहते थे, वो आपने किया। वो बात अलग है कि आपको करने का शऊर नहीं था। इसीलिए आपकी नीयतख़ोरी की कलई खुलती चली गयी!

‘एक देश एक चुनाव’ को लेकर विधि आयोग से मुलाक़ात का कोई तुक़ नहीं है। विधि आयोग को इस लिहाज़ से कुछ नहीं करना है। चुनाव करवाने का काम चुनाव आयोग का है। वो जन-प्रतिनिधित्व क़ानून और संविधान से बँधा है। संविधान ने संसद और विधानसभाओं की मियाद पाँच साल तय कर रखी है। आप इस प्रावधान को बदल दीजिए। बस, हो गया काम। समस्या ख़त्म। फिर करवाइए ‘एक देश एक चुनाव’! हिम्मत है तो सारा ज़ोर संविधान संशोधन पर लगाइए। विपक्ष यदि रोड़ा अटकाएगा तो ख़ुद बेनक़ाब होगा। जनता है ना, उससे निपटने के लिए।

अरे यदि आपकी मंशा सही होती तो अब तक ‘एक देश एक चुनाव’ का रास्ता साफ़ हो चुका होता। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को शायद ही याद हो कि बीजेपी ने 2014 के चुनाव घोषणापत्र में ‘एक देश एक चुनाव’ के सिद्धान्त को अपनाने का वादा किया था। उसके बाद मोदी राज में ही, 2015 में, संसद की स्थायी समिति की 79वीं रिपोर्ट में ‘एक देश एक चुनाव’ के सिद्धान्त की पुरज़ोर सिफ़ारिश की। अब तो अब जबाब दीजिए कि 51 महीने बीतने के बावजूद ‘एक देश एक चुनाव’ का वादा लागू क्यों नहीं हुआ? सरकार बताये कि उसने सवा चार साल तक अपने घोषणापत्र और संसदीय रिपोर्ट को लेकर किया क्या?

सवा चार साल में भी बस, बयानबाज़ी होती रही। मोदी-शाह ख़ुद भी जहाँ-तहाँ बस बोलते ही रहे। 5 सितम्बर 2016 को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से भी बोलवाया। लेकिन ज़मीन पर हुआ कुछ भी नहीं। एक इंच भी बात आगे नहीं बढ़ी। संसद से पहले 1983 में निर्वाचन आयोग की सालाना रिपोर्ट में भी ‘एक देश एक चुनाव’ की पैरवी की गयी थी। मोदी-शाह कह सकते हैं कि ‘एक देश एक चुनाव’ को पहले की सरकारों को ही लागू कर देना चाहिए था। ये बात सही है। लेकिन यदि सारे काम पिछली सरकारें ही कर पातीं तो नयी सरकारें क्या करतीं! उन्होंने नहीं किया तो जनता ने उनका हिसाब किया। आप नहीं करेंगे तो क्या जनता आपको बख़्श देगी!

अभी आपके इशारे पर, भक्त मीडिया ये फैला रहा है कि आप ‘एक देश एक चुनाव’ को सर्वसम्मति से लागू करना चाहते हैं। इसके लिए सर्वदलीय बैठक बुलाना चाहते हैं। लगे हाथ ये भी बता दीजिए कि क्या बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में ये शर्त रखी थी कि वो ‘एक देश एक चुनाव’ का वादा तभी निभाएगी जब सभी राजनीतिक दल सर्वसम्मति पैदा करके उससे इसे लागू करने की फ़रियाद करेंगे? अरे, आप किसे उल्लू बनाना चाहते हैं! सर्वदलीय बैठक के लिए आपको विधि आयोग की किसी सिफ़ारिश की ज़रूरत नहीं है। ये सरकार का काम है। लेकिन सरकार का इरादा तो जनता को ग़ुमराह करने का है, इसीलिए बीजेपी के प्रतिनिधिमंडल ने विधि आयोग से मुलाक़ात का स्वाँग बिल्कुल ऐसे रचा, जैसे ‘नयी बोतल में पुरानी शराब!’ जनता को उल्लू बनाने के लिए चुनाव तक आये दिन इसी शराब को परोसा जाएगा!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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